उत्तराखंड के कालसी थाना क्षेत्र में एक हिंदू लड़की को प्रेम जाल में फँसाने, उससे शारीरिक संबंध बनाने, उसका अपहरण करने व मुँह खोलने पर जान से मारने की धमकी देने के संबंध में पुलिस ने हरिद्वार से शाहरुख को गिरफ्तार किया। शाहरुख ने अरविंद अरविंद बन लड़की को प्रेम जाल में फॅंसाया था।
पीड़िता को जब उसकी सच्चाई का पता चला तो उसने दूरियाँ बनानी शुरू कर दी। इस पर शाहरुख भड़क गया और उसने लड़की को परिवार समेत मारने की धमकी दी। इसके बाद लड़की को न चाहते हुए भी उसके साथ जाना पड़ा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, युवती की गुमशुदगी के बाद उसके ने थाना कालसी में तहरीर दी। उन्होंने बताया कि 23 अप्रैल को वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ खेत में गेहूँ काटने गए थे और उनकी 21 वर्षीय पुत्री घर में अकेली थी। वापस आए तो पुत्री घर में नहीं थी। एक व्यक्ति ने उनकी बेटी को एक युवक के साथ बैठकर मोटरसाइकिल पर जाते देखा था। बहुत पड़ताल के बाद भी बेटी का सुराग नहीं मिलने पर उन्होंने शिकायत दर्ज करवाई।
पुलिस ने मामले की गंभीरता देखते गुए फौरन युवती की तलाश शुरू कर दी। युवती की लोकेशन हरिद्वार में मिली। इसके बाद पुलिस उपमहानिरीक्षक अरुण मोहन जोशी के निर्देश पर पुलिस टीम तत्काल हरिद्वार रवाना की गई। वहाँ कॉल डिटेल व मुखबिर की सूचना पर गुमशुदा को फेरूपुर तिराहे से सकुशल बरामद कर अपहरणकर्ता शाहरुख (निवासी: फेरूपुर, थाना: पथरी जनपद, हरिद्वार) को गिरफ्तार किया।
इसके बाद लिखित शिकायत व पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर गुमशुदगी में अपहरण, दुष्कर्म व जान से मारने की धमकी की धाराएँ जोड़ आरोपित को न्यायालय में पेश किया गया। जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया। पूछताछ में शाहरुख ने बताया युवती करीब 2 वर्ष से अपनी बुआ के घर फेरूपुर हरिद्वार में रह कर स्विच बनाने की फैक्ट्री में काम करती थी, जहाँ पर उसकी मुलाकात सोनी नाम की महिला से हुई थी।
उसके माध्यम से वह शाहरुख नाम के लड़के से मिली। उसने शुरू में अपना नाम अरविंद बताया था। आरोपित शाहरुख उससे रोजाना फोन पर काफी देर तक बात करता और मिलता भी था। काफी समय तक शादी का झाँसा देकर शारीरिक शोषण करता रहा। बाद में लड़की को मालूम चला कि उसका असली नाम शाहरुख है। इसके बाद उसने शाहरुख से दूरियाँ बनानी शुरू कर दी।
लेकिन, शाहरुख को ये नागवार गुजरा। उसने युवती को जान से मारने की धमकी दी। डर से लड़की अपने घर लौट गई। घर आने के कुछ दिन बाद शाहरुख ने उसे फिर फोन कर अपने पास आने को कहा। लड़की ने इनकार किया तो उसने न केवल उसे मारने की बात की, बल्कि उसके परिवार को खत्म करने की धमकी दी। बता दें, इस मामले के संबंध में पुलिस ने लिखित शिकायत और पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर धारा 366/376/506 के तहत मामले को दर्ज किया है।
दिल्ली पुलिस ने बताया है कि सीएए और एनआरसी विरोधी आन्दोलनों को मिडिल ईस्ट (अरब देशों) से फंडिंग मिली। इसमें जामिया मिल्लिया इस्लामिया और शाहीन बाग़ स्थित दिल्ली के अन्य इलाक़ों में हुए विरोध प्रदर्शन शामिल हैं। सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को पटियाला हाउस कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने ऐसा कहा। रविवार को जामिया एलुमनाई के अध्यक्ष शिफा उर रहमान को गिरफ़्तार किया गया था।
अब उसे कोर्ट ने 10 दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया है। दिल्ली पुलिस के अनुसार, पूछताछ में पता चला है कि आरोपित शिफा उर रहमान को अरब देशों में बसे जामिया मिल्लिया इस्लामिया एलुमनाई एसोसिएशन के मेंबर्स से फंडिंग मिली। रहमान सभी प्रदर्शन स्थलों के बीच समन्वय बनाने का भी काम कर रहा था। फंडिंग देने वाले अरब के कई देशों में फैले हुए हैं। रहमान का नाम कॉन्ग्रेस नेता इशरत जहाँ से पूछताछ में सामने आया था।
इशरत जहाँ के साथ खालिद सैफई, मीरान हैदर, सफोरा जरगर, गुलिसीफा और ताहिर हुसैन को भी अब तक गिरफ़्तार किया जा चुका है। इन सब के अलावा प्रतिबंधित संगठन पीएफआई के 3 सदस्य भी पुलिस के शिकंजे में हैं। दिल्ली में विभिन्न प्रदर्शन स्थलों पर सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में हुए प्रदर्शनों की रूपरेखा शिफा उर रहमान ने ही तय की थी। उसने हर जगह जाकर भड़काऊ भाषण दिए और फ़रवरी में दंगे फैलाने में उसका अहम रोल रहा।
“revealed accused Shifa Ur Rehman received funds from members of alumni association of Jamia Millia Islamia based in Middle East countries and was co-coordinating at protest sites” https://t.co/agFklpyjBr
रहमान ने अमीर और बद्री आलम नामक दो व्यक्तियों और जामिया कोआर्डिनेशन कमिटी के अन्य लोगों के साथ मिल कर दिल्ली के कई प्रदर्शन स्थलों का दौरा किया था। अभी उससे पूछताछ पूरी नहीं हुई है। इसीलिए, दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया कि कई अन्य संदिग्धों के नाम सामने आए हैं, जिनके डिटेल्स रहमान से और अच्छे से पूछताछ कर के निकाले जा सकते हैं। बताया गया कि इन प्रदर्शनों और दंगों में भारी-भरकम रक़म खर्च की गई थी।
रहमान के सामने अब टेक्निकल डेटा को रख कर कस्टडियल इंटेरोगेशन किया जाएगा। फ़रवरी में हुए हिन्दू-वरोधी दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई थी। ये सब कुछ सीएए विरोधी प्रदर्शनों से शुरू हुआ था। इसके बाद ताहिर हुसैन जैसों ने दिल्ली में कत्लेआम मचाया। दंगों के पीछे की साज़िश की जाँच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा किया जा रहा है।
बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान (Irrfan Khan) का निधन हो गया है। हिंदुस्तान टाइम्स और बॉलीवुड डायरेक्टर सुजीत सरकार ने भी उनकी मौत की खबर को सोशल मीडिया पर शेयर किया।
इरफान खान पिछले लंबे वक्त से मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे, जहाँ अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया। हालाँकि, मीडिया में शुरू के कुछ देर तक उनकी मौत पर भ्रम की स्थिति थी बनी हुई थी और कहा जा रहा था कि इरफान खान की स्थिति अब नियंत्रण में है। लेकिन बॉलीवुड के निर्देश सुजीत सरकार ने कुछ देर पहले ही ट्वीट करते हुए लिखा –
“मेरे प्रिय मित्र इरफान, तुम लड़े और लड़ते रहे। मुझे तुम पर हमेशा गर्व रहेगा। हम दोबारा फिर मिलेंगे। ॐ शांति ॐ शांति।”
इरफान खान की मौत पर उनके परिवार की ओर से भी आधिकारिक बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया – ”मैं हार गया। इरफान खान अक्सर इन शब्दों का प्रयोग किया करते थे। साल 2018 में कैंसर से लड़ते समय भी इरफान ने अपने नोट में ये बात कही थी। इरफान खान बेहद कम शब्दों में अपनी बात कहा करते थे और बात करने के लिए आँखों का ज्यादा इस्तेमाल करते थे।”
Irfan Khan was a versatile actor. Sorry to hear about his demise. My heartfelt condolences to his family, friends and fans. Om Shanti
हिंदुस्तान टाइम्स ने भी ट्वीट के जरिए इरफान खान की मौत की खबर को सच बताया है। ज्ञात हो कि इरफान खान न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से जंग लड़ रहे थे। इसी कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
कुछ दिन पहले ही इरफान खान की माँ सईदा बेगम ने शनिवार को जयपुर में अपने निवास में अंतिम सांस ली थी। लॉकडाउन के कारण अभिनेता इरफान खान अपनी माँ के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके थे। तब उन्होंने कथित तौर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से माँ का अंतिम संस्कार किया था।
गीतकार जावेद अख्तर और लेखक तारिक फतेह के बीच एक टीवी डिबेट में तीखी बहस हुई। इस दौरान जावेद अख्तर कह बैठे कि उन्हें इस्लाम के बारे में कुछ नहीं पता, सिर्फ़ मोटी-मोटी बातें पता है। लेकिन, साथ ही कुछ देर बाद फिर वही जावेद अख्तर कुछ ‘अच्छे मजहबियों’ का नाम गिनाने लगे। तारिक फतेह ने इस दौरान जावेद अख्तर को आइना दिखाते हुए कहा कि आमतौर पर उन मुस्लिमों पर फख्र किया जाता है, जिनके नाम पर शहर बसे हैं, लेकिन हकीकत में उन्होंने लाखों लोगों का ख़ून बहाया है।
तारिक फतेह ने कहा कि उनके पूर्वजों ने 1850 में इस्लाम अपनाया था। उन्होंने बताया कि भारत में रह रहे उनके मजहब के लोगों में ट्रेंड है कि वो अरबी नाम रखते हैं और यहाँ की ज़मीन के साथ जुड़ना ही नहीं चाहते। उन्होंने पाकिस्तान पर उर्दू के माध्यम से सिंधी, बलूची और पंजाबी भाषा के क़त्ल का आरोप लगाया। जावेद अख्तर ने कहा कि भारत में कथित अल्पसंख्यकों की जनसंख्या 20 करोड़ है, उन्हें एक विचारधारा में बाँधना सही नहीं है।
‘आजतक’ पर टीवी डिबेट में जावेद अख्तर ने दावा किया कि उन्होंने तीन तलाक, पर्दे और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के ख़िलाफ़ कई कार्यक्रम किए हैं और इसके लिए उन्हें जान का ख़तरा भी रहता था। तारिक फतेह ने कहा कि अगर दुनिया भर के 10% मुस्लिम भी फ़ण्डामेंटालिस्ट हो गए तो पूरी दुनिया ख़त्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि समुदाय विशेष में जो जितने पढ़े-लिखे होते जा रहे हैं, वो उतने ही कट्टर होते हैं। जावेद अख्तर ने जवाब दिया कि गाँवों में कट्टरवाद नहीं है, सिर्फ़ शहरों में है।
तारिक फतेह ने कहा कि उन्हें हिंदुस्तान के ‘हिन्दू राष्ट्र” बनने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि इंग्लैंड में रानी के नाम पर शपथ ली जाती है, हर देश में वहाँ के इतिहास का कद्र करने की परंपरा रही है। तारिक फतेह ने कहा कि तैमूर से लेकर आज तक मुस्लिमों ने बड़ा जुर्म किया है। जावेद अख्तर ने तारिक फतह के ‘सोर्स ऑफ इन्फॉर्मेशन’ पर सवाल खड़े कर दिए और कहा कि हमें तो वही पता है, जो हमने पढ़ा है।
SHOCKING – India’s @JavedAkhtarJadu praises #AllaudinKhilji, the 13th century invader of India who plundered Bharat, razed the magnificent library of #Nalanda by burning 3 million books & killing 1000s of Buddhist monks & Hindu scholars. Claims, Sindh is not part of Hind. pic.twitter.com/XGqmGtDQlk
तारिक फतेह ने बच्चों का नाम तैमूर रखने पर आपत्ति जताई तो जावेद अख्तर ने जवाब दिया कि तैमूर ने कभी दिल्ली में शासन ही नहीं किया। तारिक फतेह ने बाबर और औरंगजेब को मुस्लिम होने के नाम पर लानत बताया। जावेद अख्तर ने इस दौरान अश्वमेध यज्ञ की आलोचना की और कहा कि ये साम्राज्यवाद की निशानी थी, जो आज नहीं चल सकती और ग़लत ही लगेगा। इसी तरह मुस्लिमों ने भी जो किया, वो उस वक़्त के हिसाब से ठीक था।
जावेद अख्तर ने इतना तक कह दिया कि तारिक फतेह ने इतिहास नहीं पढ़ा है। तारिक फतेह ने शहरों के नाम बख्तियारपुर और इलाहाबाद रखने पर आपत्ति जताई। इसके बाद जावेद अख्तर ने अल्लाउद्दीन खिलजी की तारीफ करते हुए कहा कि उसने अनाजों और सब्जियों के दाम नियंत्रित किए और मंगोलों को हराया, जिनसे भारत को बड़ा ख़तरा था। तारिक फतेह ने खिलजी द्वारा नालंदा यूनिवर्सिटी में 30 लाख किताबें जलाने की बात उठाई।
I asked Mr tarik Fateh if he believes that it is not true that Akbar Jahangir and were great kings and during their rule India had become richest country in the world with more than 30 % share in the world trade . Which historian he has read . No answer .
जावेद अख्तर ने इस दौरान कई और घटनाओं को गिना कर कहा कि उस दौरान ऐसा होता रहता था। इसके बाद कोरोना वायरस पर बहस शुरू हो गई और जावेद अख्तर ने तबलीगी जमात की हरकतों को आपराधिक बताया लेकिन साथ ही कहा कि कोरोना के लिए उन्हें पूरी तरह जिम्मेदार ठहरना ग़लत नहीं है। उन्होंने उन वीडियो को भी नकार दिया, जहाँ मुस्लिम सब्जी व फल विक्रेताओं द्वारा घृणित हरकतें की जा रही थीं’।
जब तारिक फतेह ने कहा कि एक वीडियो में तो ख़ुद उस मुस्लिम ने ऐसा स्वीकार किया है। इस पर जावेद अख्तर ने अजोबोग़रीब तर्क देते हुए कहा कि वो तो बूढ़ा और गरीब मुस्लिम है, उससे जॉन एफ केनेडी की हत्या की जिम्मेदारी लेने को कहा जाए, तो भी वो स्वीकार कर लेगा। जावेद अख्तर इसके बाद व्यक्तिगत हमले पर उतर आए। उन्होंने तारिक फतेह के भारत में अफसरशाही होने के बयान पर कहा कि यहाँ जो समस्या है, उसे सुलझा लिया जाएगा और इसके लिए उन्हें किसी पाकिस्तानी या कैनेडियन से राय नहीं लेनी है। बता दें कि तारिक फतेह पाकिस्तानी हैं, जिन्हें कनाडा में शरण मिली है।
‘आजतक’ पर तारिक फतेह और जावेद अख्तर की बहस
जावेद अख्तर ने तारिक फतेह से कहा कि उन्हें न तो इतिहास की जानकारी है और न ही उर्दू की। पाकिस्तान की बात आने पर जावेद अख्तर कहने लगे कि पाकिस्तान की समस्या से उन्हें क्या मतलब है? तारिक फतेह ने बताया कि सीरिया में 5 लाख मुस्लिमों को मुस्लिमों ने ही मारा और पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिस राजा दाहिर ने लोगों को पनाह दी, उन्हें जावेद अख्तर जैसों ने काफिर करार दिया।
इस दौरान जावेद अख्तर भारत में ‘मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग’ की चर्चा की और झारखण्ड के तबरेज की मौत को मुद्दा बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि तारिक फतेह इन मुद्दों पर ट्वीट नहीं करते। पूरी बहस के दौरान जावेद अख्तर ख़ुद को नास्तिक साबित करने में लगे रहे और कहा कि वो तो मानते ही नहीं हैं कि कोई ऊपरवाला है। उन्होंने दावा किया कि इत्तिफाक से किसी हिन्दू-मुस्लिम में झगड़ा हो गया तो तारिक फतेह कनाडा में बैठ कर ट्वीट करते हैं, उनका एजेंडा क्या है?
तारिक फतेह ने दिल्ली के बीच में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में लगे नारों की याद दिलाई। इस पर जावेद अख्तर ने पुलिस द्वारा लाइब्रेरी में घुस कर ‘छात्रों को मारने’ वाली बात उठाई, जिस पर पुलिस पहले ही स्पष्टीकरण दे चुकी है। जब तारिक फतेह ने इस्लामी शिक्षण संस्थानों की बात की तो जावेद अख्तर ने कहा कि वो हिन्दुओं की यूनिवर्सिटी पर ट्वीट क्यों नहीं करते? उर्दू वाली बात पर तारिक फतेह ने कहा कि वो ऐसी जबान नहीं बोलते, जिसके दो मायने निकले। वो पंजाबी बोलते हैं।
जावेद अख्तर इस दौरान मोहम्मद बिन कासिम का बचाव करते हुए बताते रहे कि वो तो पाकिस्तान में आया था, हिंदुस्तान में आया भी नहीं। उन्होंने फतेह द्वारा ‘मेरा हिंदुस्तान’ बोलने पर भी आपत्ति जताई। जावेद अख्तर पूरी डिबेट के दौरान तथ्यों और तर्कों से दूर ही भागते रहे।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के पगोना गाँव में दो साधुओं की हत्या के बाद मामले में राजनीति तेज हो गई है। पालघर मामले में चुप्पी साधने वाले सभी विपक्षी नेता आगे आकर इस मामले पर निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे हैं। इसी क्रम में कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने भी कल ट्वीट किया था और शिवसेना के संजय राउत ने भी इस घटना पर अपना शोक जताया था।
हालाँकि, अन्य विपक्षियों और इन नेताओं के ट्वीट में अंतर ये था कि वे लोग प्रत्यक्ष रूप से यूपी सरकार पर हमलावर थे। मगर, ये नेता अपने ट्वीट में सामंजस्य बिठाकर अपनी राजनीति कर रहे थे। साथ ही ये भी कह रहे थे कि इस मामले पर ‘भी’ राजनीति नहीं होनी चाहिए। अब इनकी इसी मंशा को भाँपते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से उन्हें करारा जवाब मिला। दरअसल, महाराष्ट्र में हुई घटना को लेकर सीएम योगी पर संप्रदाय की राजनीति करने का आरोप लगाने वाली शिवसेना ने जब बुलंदशहर के साधुओं पर आवाज उठाई तो योगी ने उन्हें बोला वे महाराष्ट्र संभाले, यूपी की चिंता न करें।
भयानक! बुलंदशहर, यूपी के एक मंदिर में दो साधुओं की हत्या, लेकिन मैं सभी से अपील करता हूं कि वे इसे सांप्रदायिक न बनाएं, जिस तरह से कुछ लोगों ने पालघर मामले में करने की कोशिश की।
मंगलवार को संजय राउत ने रात में दो ट्वीट किए। उन्होंने पहले लिखा, “भयानक! बुलंदशहर, यूपी के एक मंदिर में दो साधुओं की हत्या, लेकिन मैं सभी से अपील करता हूँ कि वे इसे सांप्रदायिक न बनाएँ, जिस तरह से कुछ लोगों ने पालघर मामले में करने की कोशिश की।”
बुलंदशहर के मंदिर में दो साधु-संतों की हत्या मामले में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने योगी आदित्यनाथ से फोन पर चर्चा की। उन्होंने साधुओं की हत्या को लेकर चिंता व्यक्त की। ऐसी अमानवीय घटना घटती है तब राजनीति न करके हमें एक साथ काम करते हुए अपराधियों को दंडित करवाना चाहिए :उद्धव ठाकरे
फिर, उन्होंने सीएम उद्धव ठाकरे को कोट करके लिखा, “बुलंदशहर के मंदिर में दो साधु-संतों की हत्या मामले में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने योगी आदित्यनाथ से फोन पर चर्चा की। उन्होंने साधुओं की हत्या को लेकर चिंता व्यक्त की। ऐसी अमानवीय घटना घटती है तब राजनीति न करके हमें एक साथ काम करते हुए अपराधियों को दंडित करवाना चाहिए।”
इन्हीं दो ट्वीट के बाद, योगी आदित्यनाथ ऑफिस से उन्हें दो टूक जवाब मिला। ट्वीट में लिखा गया कि CM योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में यूपी में काननू का राज है। यहाँ कानून तोड़ने वालों से सख्ती से निपटा जाता है। बुलंदशहर की घटना में त्वरित कार्रवाई हुई और चंद घंटों के भीतर ही आरोपित को गिरफ्तार किया गया। इतना ही नहीं, सीएम योगी के ऑफिस से शिवसेना को ये भी लिखा गया कि वे महाराष्ट्र संभालें, यूपी की चिंता न करें।
श्री @rautsanjay61 जी, संतो की बर्बर हत्या पर चिंता करना राजनीति लगती है? उ.प्र. के मुख्यमंत्री जी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री जी को फोन किया क्योंकि पालघर के साधु निर्मोही अखाड़ा से संबंधित थे।
फिर, योगी की ओर से मामले में हो रही राजनीति पर जवाब आया। ट्वीट में संजय राउत को टैग करते हुए लिखा, “श्री संजय राउत जी, संतो की बर्बर हत्या पर चिंता करना राजनीति लगती है? यूपी के मुख्यमंत्री जी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री जी को फोन किया क्योंकि पालघर के साधु निर्मोही अखाड़ा से संबंधित थे। सोचिए, राजनीति कौन कर रहा है?”
उल्लेखनीय है कि जब पालघर में दो साधुओं को मारा गया था, उस समय योगी आदित्यनाथ ने महाराष्ट्र के सीएम से फोन पर बात करके उपयुक्त जाँच की माँग की थी। अब ये सब जानते हैं कि वो स्पष्ट तौर पर लिंचिंग का मामला था। जहाँ करीब 200 लोगों की भीड़ ने संतों को दौड़ा-दौड़ाकर मारा था और वहाँ सामने खड़ी पुलिस मूक थी। बुलंदशहर में साधुओं की हत्या का मामला पूरा उलट है। जहाँ एक नशेड़ी ने अपना गुस्सा उतारने के लिए साधुओं की जान ले ली।
अब हालाँकि ऐसा नहीं कि ये मामला जाँच का विषय नहीं है। मगर जितना स्पष्ट पालघर का मामला था कि वहाँ साधुओं को जानकर निशाना बनाया गया, उससे साफ शायद ही कोई अन्य मामला हो, जिसपर शिवसेना चुप रही। लेकिन बुलंदशहर मामले में यूपी सरकार और प्रशासन अपना काम कर रही है और उन्होंने आरोपित मुरारी उर्फ राजू को गिरफ्तार भी कर लिया है। बाकी पूछताछ जारी है और लोगों का आज भी यही कहना है कि साधु संतों पर हमला संस्कृति पर प्रहार है।
दिल्ली की अरविन्द केरजीवाल सरकार में माइनॉरिटी कमीशन (दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग) के अध्यक्ष ज़फरुल इस्लाम ख़ान ने भारत के हिन्दुओं को अरबी मुस्लिमों की धमकी है। ज़फरुल इस्लाम ख़ान ने कुवैत को ‘भारतीय मुस्लिमों के साथ खड़े होने’ के लिए धन्यवाद दिया है। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि कट्टर हिन्दू ऐसा समझते थे कि बड़े स्तर पर आर्थिक रिश्तों को देखते हुए अरब देश भारत में हो रहे ‘मुस्लिमों के अत्याचार’ को नज़रअंदाज़ कर देगा, जबकि कुवैत ने ऐसा नहीं किया।
ज़फरुल इस्लाम ख़ान ने भारत को दिखाया अरब का डर
ज़फरुल ने कहा कि कट्टर हिन्दू ये भूल गए थे कि अरबी मुस्लिमों की आँखों में भारतीय मुस्लिमों की साख काफ़ी ऊँची है। बकौल ज़फरुल, भारत के मुस्लिमों ने इस्लाम के लिए जो किया है, उसे देखते हुए अरबी उन्हें सिर-आँखों पर रखते हैं। भारतीय मुस्लिमों अरबी और इस्लामी अध्ययन में पारंगत हैं, दुनिया को दुनिया भर में इस्लामी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी विरासत में अपने अहम योगदान दिया है।
ज़फरुल ने इन लोगों को शाह वलीहुल्ला देहलवी, अबू हस्सान नदवी, बहुदुद्दीन खान और ज़ाकिर नाइक का नाम गिनाया। बता दें कि मलेशिया में रह रहे ज़ाकिर नाइक को वापस लाने के लिए भारत सरकार प्रयत्न कर रही है और उसके ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर आतंकियों को भड़काने तक के आरोप हैं। भारत में कई जगह युवा कट्टर मुस्लिमों के यहाँ से ज़ाकिर नाइक की सीडी मिली, जिसे देख कर वो आतंक की राह अपनाते रहे हैं।
दोस्तों में आप के समक्ष दिल्ली अल्पसंख्यक कमिशन के Chairman श्री जफरुल इस्लाम खान साहब का आज लिखी चिट्ठी की प्रति पेश कर रहा हूँ। यह चिट्ठी बहुत कुछ कहता है इस चिट्ठी में न केवल ज़ाकिर नायक को हीरो के रूप में प्रस्तुत किया गया है अपितु इसमें हमले(Avalanche) की धमकी भी दी गयी है। pic.twitter.com/LlN94ygMRX
ज़फरुल ने चेताया कि कट्टर हिन्दुओं को शुक्र मनाना चाहिए कि भारत के मुस्लिमों ने अरब जगत से कट्टर हिन्दुओं द्वारा हो रहे ‘घृणा के दुष्प्रचार, लिंचिंग और दंगों’ को लेकर कोई शिकायत नहीं की है और जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन अरब के मुस्लिम एक आँधी लेकर आएँगे, एक तूफ़ान खड़ा कर देंगे। ज़फरुल इस्लाम ने मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को बयान जारी कर के ये बातें कहीं।
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष का CAA-NRC प्रदर्शन के दौरान काला इतिहास
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि ज़फरुल इस्लाम ने न सिर्फ़ ज़ाकिर नाइक को एक हीरो के रूप में प्रस्तुत किया है बल्कि भारत को अरबी मुस्लिमों के हमले की भी धमकी दी है। ज़फरुल एनआरसी-सीएए आंदोलन के दौरान सीजेआई एसए बोबडे को पत्र लिख कर सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना और विरोध करना सभी लोगों के मूलभूत अधिकारों में शामिल है। उन्होंने लिखा था:
“अभी देश भर के कई इलाक़ों में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा है, जिसमे पुलिस का व्यवहार काफ़ी आपत्तिजनक रहा है। पुलिस ने शांतिपूर्ण होने के बावजूद कई प्रदर्शनों को बंद कर दिया, कई जगह धारा-144 लगा दी और मोबाइल व इंटरनेट सेवाओं को ठप्प कर दिया। ये सब जनता को उनके अधिकार से वंचित रखने के लिए किया जा रहा है। मेरठ, बिजनौर, सीमापुरी और वाराणसी के अलावा दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर हमले भी किए। न सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों के हाथ-पाँव व खोपड़ियाँ तोड़ दी गईं बल्कि 2 दर्जन को मार भी डाला गया।“
जब ज़फरुल इस्लाम ने CJI को लिखा था पत्र
इस पत्र में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष ज़फरुल इस्लाम ने पुलिस पर प्रदर्शनकारियों के घरों में घुस कर उन पर क्रूरता से हमला करने का भी आरोप मढ़ा था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की थी। हालिया तबलीगी जमात मामले में भी ज़फरुल ने महामारी फैलाने वालों का महिमामंडन किया। उन्होंने दावा किया कि सरकार जमातियों से कोरोना के इलाज के लिए प्लाज्मा डोनेशन तो ले रही है लेकिन उनके साथ बड़े अपराधियों की तरह व्यवहार कर रही है।
हालाँकि, ये छिपा नहीं है कि सीएए विरोधी प्रदर्शन कितना ‘शांतिपूर्ण’ था। शाहीन बाग़ में चंद लोगों ने पूरी दिल्ली को बंधक बना आकर रखा और वहाँ पिकनिक मनाते रहे। इन्हीं प्रदर्शनों के कारण दिल्ली में हिन्दू-विरोधी दंगे हुए। साथ ही सीएए विरोध की आड़ में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नज़र में देश को बदनाम करने की साज़िश रची गई। शरजील इमाम जैसों ने संविधान को ही भला-बुरा कहा।
स्वास्थ्य सुविधाओं को बताया कैदखाना
ज़फरुल ने दावा किया कि उन्होंने अब तक जितने भी आइसोलेशन सेंटर के बारे में जानकारी जुटाई है, हर जगह रह रहे लोगों ने बताया है कि वहाँ हज़ारों लोगों को बंद कर के रख दिया गया है और उन्हें समय पर भोजन नहीं दिया जा रहा है, बाहर से कुछ ख़रीदने भी नहीं दिया जा रहा है और उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखा गया है। ये आरोप अजीब है क्योंकि क्वारंटाइन फैसिलिटी अपने-आप में स्वास्थ्य सुविधा है, जहाँ डॉक्टरों और नर्सों की निगरानी में मरीजों की अच्छी देखभाल की जाती है।
ज़फरुल इस्लाम ने आइसोलेशन सेंटरों को बताया क़ैदख़ाना
उन्होंने नंदनगिरी आइसोलेशन सेंटर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ 2000 लोगों को बड़े अपराधियों की तरह बंधक बना कर कैद कर दिया गया है। प्लाज्मा डोनेशन की बात करते हुए ज़फरुल शायद यह भूल गए कि दसियों हज़ारों लोगों के बीच कोरोना फैलाने के बाद एकाध ने प्लाज्मा डोनेट कर दिया तो इससे मरकज़ में जुटे हज़ारों जमातियों का गुनाह ख़त्म नहीं हो जाता। सोशल मीडिया पर उनके बयान का विरोध हो रहा है।
RBI द्वारा मेहुल चोकसी और विजय माल्या की कथित कर्जमाफी के कारण ‘कर्ज माफ़’ करने और उन्हें ‘राईट ऑफ़’ किए जाने की बहस छिड़ गई है। यहाँ तक कि मुख्यधारा की मीडिया ने भी लोगों को गुमराह करने का काम किया है। मीडिया द्वारा यही बात सामने रखी जा रही है कि सरकार ने मेहुल चोकसी और विजय माल्या का कर्ज माफ़ कर दिया है, जबकि हकीक़त कुछ और ही है।
सरकार ने कर दिया मेहुल चोकसी का कर्ज माफ़?
रिपोर्ट्स के अनुसार, देश के बैंकों ने 50 बड़े विलफुल डिफाल्टर्स का 68,607 करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया है। जिसका अर्थ यह होता है कि अब बैंक यह मान चुके हैं कि ये कर्ज वापस नहीं मिलने वाले हैं। इनमें भगोड़ा हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी भी शामिल है। वहीं कॉन्ग्रेस ने भी तकनीकी शब्दावली का सहारा लेकर केंद्र सरकार पर चोरों का साथ देने का तंज किया है।
पहली बात तो यह है कि RBI कर्ज को राईट-ऑफ़ करने का काम नहीं करता है, बल्कि बैंकों द्वारा NPA के लिए यह प्रावधान किया जाता है। ना ही RBI ऐसी संस्था है जो गैर-सरकारी और गैर-बैंक संस्थाओं को कर्ज देती है, इस प्रकार अधिकतर मीडिया रिपोर्ट्स प्रथम स्तर पर ही भ्रामक और गलत हैं।
असल में विलफुल डिफाल्टर उन कर्जदारों को कहते हैं जो सक्षम होने के बावजूद जानबूझकर कर्ज नहीं चुका रहे होते हैं। लेकिन जब बैंक को इनसे दिया गया कर्ज वापस मिलने की उम्मीद नहीं रहती तो बैंक इनके कर्ज को ‘राइट ऑफ’ कर देते हैं यानी बट्टे खाते में डाल देते हैं। दूसरे शब्दों में, ‘राइट ऑफ‘ वो रकम होती है जिसे लोन में देने के बाद बैंक वसूल नहीं पाती है और फिर सरकार से इजाजत लेकर उसे अपने खाते से निकाल देती है। हालाँकि, तब भी बैंक के पास इन्हें वसूलने का अधिकार सुरक्षित रहता है।
राईट-ऑफ़ और कर्ज माफ़ी का अंतर
सबसे पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि लोन ‘राईट ऑफ़’ करने का अर्थ क्या है। दरअसल, एक बैलेंस शीट में परिसंपत्तियों (Asset) और देनदारियों (Liabilities) की वास्तविक स्थिति को दर्शाया जाना चाहिए। इसलिए बैंकों को उधारकर्ताओं को दिए गए ऋण को ‘write-off’ दर्शाना होता है, अब यह एक कमजोर संपत्ति (गंदे कर्ज) मानी जाती है, जो कि सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करता है और जिसका कि मीडिया गलत वर्णन करता है।
अब यदि बैंक दी गए लोन को ‘बट्टा खाता’ यानी Write-Off नहीं करता है, तो वास्तव में इसका अर्थ यह होगा कि यह भी बैंक की उच्च गुणवत्ता वाली संपत्ति ही है, जबकि वास्तव में इस संपत्ति की गुणवत्ता अब खराब हो गई है। इस कारण दी गए लोन को राईट ऑफ़ करना बैंक की पारदर्शिता का हिस्सा है क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक ऐसी शाखा पर विश्वास नहीं करना चाहेगा, जो अपनी संपत्ति की वास्तविक जानकारी छुपाती हो।
इस तरह से, ‘राइट-ऑफ’ एकाउंटिंग की एक विशुद्ध तकनीकी प्रक्रिया है। वह लोन, जिसे उधारकर्ता द्वारा चुकाया नहीं जा सकता है, राईट-ऑफ़ कर दिया जाता है। यहाँ तक कि जब इन ऋणों को राईट ऑफ़ कर दिया जाता है, तो विभिन्न प्रकार की वसूली प्रक्रियाएँ SARFAESI अधिनियम के तहत की जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में बैंक ऐसे ऋणों के खिलाफ सुरक्षित परिसंपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेता है और ऋणों की वसूली के लिए उन्हें बेच देता है।
तो क्या लोन ‘राइट ऑफ’ करने का मतलब लोन माफ कर दिया जाना है? निश्चित रूप से नहीं। यहाँ तक कि आरबीआई ने फरवरी, 2016 में एक स्पष्टीकरण जारी किया था, उस समय रघुराम राजन आरबीआई प्रमुख थे। इसमें भी लोन राईट ऑफ़ करने और माफ़ करने के बीच के अंतर को स्पष्ट किया था।
तब रघुराम राजन ने दावा किया था कि बैंकों के सामने सबसे ज्यादा बैड लोन वर्ष 2006 से 2008 के बीच आवंटित किए गए थे। उन्होंने कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह ऐसा समय था जब आर्थिक विकास दर बेहद अच्छी थी और बैंकों को अधिक से अधिक कर्ज देकर इस रफ्तार को बढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन ऐसी परिस्थिति में बैंकों को चाहिए था कि वह कर्ज देने से पहले यह सुनिश्चित करता कि जिन कंपनियों को वह कर्ज दे रहा है उनका स्वास्थ्य अच्छा है और वह समय रहते अपने कर्ज का भुगतान करने की स्थिति में हैं।
रघुराम राजन ने दावा किया कि जहाँ बैंकों ने इस दौरान नया कर्ज बाँटने में लापरवाही बरती वहीं ऐसे लोगों को कर्ज देने का काम किया जिनका कर्ज नहीं लौटाने का इतिहास रहा।
हालाँकि, आदर्श परिस्थितियों में ‘राईट-ऑफ’ की जरूरत नहीं होगी। बैंक द्वारा दिए गए लोन समय से वापस कर दिए जाएँगे। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में ‘राइट-ऑफ’ की विशेष जरूरत होती है क्योंकि पहले दिए गए लोन, अब कमजोरी के संकेत दिखा रहे हैं। बैंकिंग संस्थान आवश्यक कार्रवाई के लिए चाहते हैं कि इन्हें राईट ऑफ़ किया जाए। यह स्पष्ट है कि ‘राइट-ऑफ’ किसी भी तरह से ‘लोन माफ़ी’ नहीं है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार राज्य की 23 करोड़ आबादी को वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से बचाने के साथ बाहरी राज्यों में फँसे नागरिकों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुँचाने और करीब 15 लाख प्रवासी श्रमिकों के लिए राज्य में ही रोजगार देने के अभियान में जुटी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजधानी लखनऊ में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) सुबह टीम-11 के साथ हुई बैठक में इस संबंध में कई बड़े फैसले लिए।
मुख्यमंत्री ने टीम-11 के साथ मीटिंग में सबसे पहले उत्तर प्रदेश में कोविड-19 की स्थिति की समीक्षा की। सीएम योगी ने कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित आगरा, लखनऊ, कानपुर, गौतमबुद्ध नगर और मेरठ में ताजा स्थिति के संबंध में जायजा लिया और जरूरी निर्देश दिए। इसके बाद उन्होंने श्रमिकों और युवाओं को राज्य में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के संबंध में चर्चा की।
सीएम योगी ने दूसरे प्रदेशों से लॉकडाउन के दौरान अब तक यूपी में आए सभी प्रवासी श्रमिकों व युवाओं के लिए गाँवों, कस्बों और संबंधित जनपदों में ही 15 लाख रोजगार व नौकरियाँ उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई कमिटी की प्रगति की समीक्षा की और उन्हें इसमें गति प्रदान करने के लिए कहा।
सीएम ने कहा कि ये वो मजदूर हैं जो दूसरे प्रदेशों में काम करते थे और लॉकडाउन के कारण लौट आए हैं या लौटने वाले हैं। सीएम योगी ने यह भी कहा है कि लॉकडाउन के बाद राज्य में अकाल जैसी स्थिति बिल्कुल नहीं होगी।
उन्होंने कहा कि मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण काम है। हमने पंचायतीराज विभाग के प्रमुख सचिव मनोज कुमार सिंह को निर्देशित किया है कि ग्राम प्रधानों के माध्यम से मनरेगा और गाँवों के विकास कार्यों को आगे बढ़ाएँ। उत्तर प्रदेश में देश के बाकियों के राज्यों की तुलना में कोरोनावायरस के कम मामले हैं। देश भर में लगे लॉकडाउन की वजह से कई प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्य वापस लौट आए हैं। उनके लिए भी रोजगार की व्यवस्था की जा रही है।
इस दौरान उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि बुधवार (अप्रैल 29, 2020) से मध्यप्रदेश में मौजूद यूपी के मजदूरों को वापस लाने की व्यवस्था शुरू की जाए। इसके साथ ही सीएम ने जानकारी दी कि प्रयागराज में रह रहे 10000 छात्र-छात्राओं को उनके घर पहुँचाने की व्यवस्था प्रारंभ की गई है, उसे पूरी तरह सुनिश्चित की जाए। उन्होंने बताया कि कोटा से आए 11000 छात्र-छात्राओं को परीक्षण कराकर उन्हें घरों में क्वारंटाइन किया गया है। सीएम ने इन छात्रों के देखरेख का भी निर्देश दिया है।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इससे पहले एक मीटिंग के दौरान कहा था कि में 3 से 6 महीनों के भीतर कम से कम 15 लाख लोगों के रोजगार सृजन की ठोस कार्ययोजना बनाई जाए। इसके लिए उन्होंने विभिन्न विभागों को सप्ताह भर में कार्ययोजना बनाकर प्रस्तुत करने निर्देश दिए थे।
उन्होंने कहा था कि एमएसएमई, ओडीओपी, एनआरएलएम, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण, दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना, कौशल विकास मिशन, खादी ग्रामोद्योग तथा मनरेगा के माध्यम से रोजगार सृजन के कार्यों में तेजी लाई जाए। लॉकडाउन के बाद रोजगार पैदा करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की चुनौती है। इसके लिए अभी से तैयारी की जाए। इसके लिए उन्होंने बहुत सारे सुझाव भी दिए थे। इससे पहले सीएम योगी आदित्यनाथ ने खादी से मास्क बनाने का तरीका अपनाकर 20 लाख महिलाओं व 6 लाख बुनकरों को रोजगार उपलब्ध करवाया था।
मुजफ्फरनगर के खतौली क्षेत्र में दिल्ली के शाहीन बाग से इस्लामनगर लौटे व्यक्ति की होम क्वारंटाइन के दौरान मौत के बाद उसके स्वजनों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आ रही हैं। मृत व्यक्ति के भाई की कोरोना रिपार्ट भी रविवार को पॉजिटिव आई है, जबकि उसके परिवार के चार लोग पहले ही कोरोना पॉजिटिव मिल चुके हैं।
कोरोना संदिग्ध के जनाजे में शामिल लोगों की तलाश तेज
यानी कि अभी तक उसके परिवार से पाँच लोगों की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आ चुकी है। अब पुलिस उन लोगों की तलाश में जुट गई है, जिन्होंने लॉकडाउन का उल्लंघन करके मृतक के अंतिम संस्कार में भाग लिया था।
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संक्रमित शख्स 12 अप्रैल को लॉकडाउन के दौरान दिल्ली से इस्लामनगर स्थित अपने घर लौटा था। बताया जा रहा है कि दिल्ली में रहने के दौरान मृतक ने कई बार शाहीन बाग का दौरा किया था। यहाँ तबियत बिगड़ने पर उसे 13 अप्रैल को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया था। 14 अप्रैल को उसकी मौत हो गई।
मृतक का नहीं हुआ था कोरोना टेस्ट
इसके बाद परिजन और रिश्तेदारों के अतिरिक्त आस पास के गाँव तक के लोगों ने उसके जनाजे में हिस्सा लिया। नजदीक के घर में उसके शव को नहलाया गया। इसके बाद कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। बता दें कि उसका कोरोना टेस्ट नहीं हुआ था। प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग ने उसका सैंपल भी नहीं लिया था।
उसकी मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने उसके परिवार के सदस्यों के सैंपल लिए थे, जिनमें मृतक की माँ के अलावा दो साल का बेटा, 4 साल की बेटी और 10 साल की बहन भी कोरोना पॉजिटिव आ चुके हैं। रविवार को आई जाँच रिपोर्ट में मृतक का भाई भी कोरोना संक्रमित मिला है। इस रिपोर्ट से इस्लामनगर और पुलिस प्रशासन में भी हड़कंप मचा है। स्वास्थ्य विभाग ने संक्रमित पाए गए युवक को कोविड-19 अस्पताल बेगराजपुर मेडिकल कॉलेज भेज दिया है। फिलहाल मृतक की बीबी का सैंपल नहीं लिया गया है, क्योंकि वो रोजा रख रही है।
इस्लामनगर पहले से ही हॉटस्पॉट है। स्वास्थ विभाग करीब 150 लोगों के सैंपल लेकर जाँच के लिए भेज चुका है, जिनकी रिपोर्ट का इंतजार है। उधर, नए कोरोना संक्रमित मिलने के साथ ही जनपद में कोरोना पॉजिटिव की संख्या टोटल 23 हो गई है, जिनमें से चार मरीज कोरोना पर विजय पाकर स्वस्थ हो चुके हैं।
गौरतलब है कि सीएए विरोध के नाम पर दिल्ली के शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी कई दिनों तक धरने पर बैठे हुए थे और लगातार नियम-क़ानून को धता बता रहे थे। उन्होंने कोरोना वायरस से बचाव व सावधानी को लेकर सरकार, डॉक्टरों व विशेषज्ञों की सलाहों को धता बताया था। किसी ने कहा था कि ये क़ुरान का वायरस है जो मजहब वालों को कुछ नहीं करेगा, तो किसी ने पूछा था कि क्या गारंटी है कि भीड़ न जुटाने से कोरोना वायरस नहीं होगा? 17 अप्रैल को वहाँ पर तीन कोरोना पॉजिटिव पाए गए। जिसके बाद 24 अप्रैल को बुल्डोजर चला कर धरनास्थल से तंबू हटा दिए गए।
प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोना वायरस (COVID-19) के उपचार की बात पर स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा है कि यह थेरेपी अभी तक साबित नहीं हुई है और अभी सिर्फ प्रायोगिक चरण में ही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि कोरोना वायरस के उपचार में यदि प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग दिशानिर्देशों के अनुसार नहीं हुआ तो यह जान के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।
जानलेवा हो सकता है प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग – ICMR
स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा – “आइसीएमआर (ICMR) द्वारा प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग किया जा रहा है। हालाँकि, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसे उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके प्रभाव का अध्ययन करने के लिए आइसीएमआर (ICMR) द्वारा राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन शुरू किया गया है। जब तक आइसीएमआर (ICMR) अपने अध्ययन का समापन नहीं करता है और एक मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है, तब तक प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग केवल अनुसंधान या परीक्षण के उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए। यदि उचित दिशा-निर्देश के तहत प्लाज्मा थेरेपी का सही तरीके से उपयोग नहीं किया जाता है तो यह जीवन के लिए खतरा भी पैदा कर सकता है।”
Until ICMR concludes its study & a robust scientific proof is available, Plasma therapy should be used only for research or trial purpose. If plasma therapy is not used in proper manner under proper guideline then it can also cause life threatening complications: Lav Aggarwal,MHA https://t.co/zz9nBRRztg
इसके साथ ही आइसीएमआर ने यह भी सुझाव दिया है कि प्लाज्मा थेरेपी के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्त्व आवश्यक है। दरअसल, सार्स-सीओवी (SARS-CoV), एच1एन1(H1N1) और मर्स सीओवी (MERS-CoV) जैसे खतरनाक वायरस के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया गया था।
भारत में भी कोरोना वायरस का पहला प्लाज्मा परीक्षण (Plasma for Corona Treatment) देश में सफल रहा है। लेकिन इसके बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह जानकारी भी दी गई कि यह थेरेपी अभी सिर्फ और सिर्फ ट्रायल और टेस्टिंग के लिए ही अप्रूव हुई है और इसका इलाज के लिए प्रयोग खतरनाक हो सकता है।
प्लाज़्मा थेरेपी पर लिबरल मीडिया गिरोह की रूचि
प्लाज़्मा थेरेपी के चर्चा में आते ही अचानक से ‘सेक्युलर’ राजनेता और ‘वाम-उदारवादी’ लिबरल गिरोह सक्रीय हो उठे। प्लाज्मा डोनेट करते हुए एक तबलीगी की तस्वीर को आधार बनाकर बहस का मुद्दा यह बना दिया गया कि मुस्लिम भी कोरोना वायरस के इलाज के लिए आगे आ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग आज तक यह स्वीकार करने में कतराते रहे कि देश में कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा स्रोत तबलीगी जमात रहा है, वह भी इस बात पर गद्य लिखते नजर आने लगे।
सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं तस्वीरें
मीडिया के वाम-उदारवादी वर्ग ने तबलीगियों की एक तस्वीर को इतना भुनाने का प्रयास किया कि यदि प्लाज्मा पर ICMR का स्पष्टीकरण न आता तो शायद अब तक प्लाज़्मा को सेक्युलर साबित कर दिया गया होता। इस वर्ग ने प्रलाप कर के ‘तबलीगी जमात’ के बदले ‘सिंगल सोर्स’ लिखने पर मजबूर किया।
हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों को भुनाकर आज दिल्ली की सत्ता पर बैठे अरविन्द केजरीवाल ने भी फ़ौरन प्लाज्मा को गंगा-जमुनी तहजीब की ही अगली योजना साबित करने का प्रयास करते हुए बयान दिया कि हिंदू का प्लाज्मा मुस्लिम और मुस्लिम का प्लाज्मा हिंदू की जान बचा सकता है।
उल्लेखनीय है कि तबलीगी जमात का तांडव महीने भर से ही पहले से जारी है, बावजूद इसके किसी भी नेता और सेक्युलर मीडिया ने यह हिम्मत नहीं जुटाई कि वह मुस्लिमों की हरकतों पर खुलकर कह सके। इस देश के बुद्धिजीवी वर्ग के हालात यह हैं कि उन्हें यह कहने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ कि उन्हें यह साबित करने का प्रयास करना पड़ रहा है कि मुस्लिम भी चाहते हैं कि कोरोना ठीक हो जाए।
वास्तव में यह तो स्पष्ट सन्देश है कि मुस्लिम यदि कुछ सकारात्मक पहल करते हैं तो यह उनकी तरफ से समाज पर उपकार माना जाने लगा है। वरना मुस्लिमों के अलावा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने निरंतर शासन और व्यवस्था के साथ तालमेल बनाने के बजाए उन्हें बदतर बनाने की कोशिश की हो।
उदाहरण के तौर पर यदि तबलीगी जमात को ही लिया जाए तो 2002 में कारसेवकों को साबरमती एक्सप्रेस में जिन्दा जलाने से लेकर अलकायदा के हर दूसरे आतंकी अभियान में मौजूद यह संगठन इस बार भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के बड़े हिस्से में कोरोना का प्रमुख स्रोत बनता गया। प्लाज़्मा थेरेपी में मुस्लिमों की एक तस्वीर से मीडिया का जो वर्ग बवाल काट रहा है उसमें आज तक इतना भी दम विकसित नहीं हो सका है कि वह इन सभी मुद्दों पर चर्चा भी कर सके।
अच्छे मुस्लिम-बुरे मुस्लिम
देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर के लोगों ने अच्छे और बुरे मुस्लिमों के मुद्दे पर जमकर साहित्य लिखा है। एक पीढ़ी ने जहाँ अब्दुल कलाम के नाम पर मुस्लिमों के गुनाहों को ढकने की कोशिश कर दी वहीं दूसरी पीढ़ी भी एक ऐसे मुस्लिम को तलाश रही है जिसके आधार पर वो अगली दो-तीन पीढ़ियाँ काट दें। इस बीच सभी जानते हैं कि इन गिने-चुने नामों को छोड़कर बाकी के 99.99% मुस्लिम क्या कर रहे होंगे।
यह ऐसे ही है जैसे एक ताजमहल की भव्यता को मिसाल बनाकर इसी लिबरल गिरोह की जमात ने नालंदा की बर्बादी को गायब कर दिया। इसी तरह मुस्लिमों की एक बिरियानी को इस तरह से पेश किया जाता रहा है जैसे भारतीय इसके बिना कुपोषण से मर रहे थे। कुछ समय पहले ही सबा नक़वी मुस्लिमों द्वारा समाज पर किए गए एहसानों को गिनाती हुई नजर आ रहीं थीं। हालाँकि, यह उन्हें महंगा ही पड़ा।
प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग होना एक बात है। यह भी हो सकता है कि यह प्रयोग आगे सफल भी हो या असफल भी, लेकिन तमाम लिबरल गिरोह की कवरेज की भाषा ऐसी है मानो कोरोना वायरस का एकमात्र समाधान यही है और वो भी इस समय सिर्फ तबलीगियों के पास है, जैसा कि दिखाया भी जा रहा है।
फिलहाल ICMR ने प्लाज़्मा थेरेपी की सार्वजानिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध की बात कही है। तब तक कम से कम लिबरल गिरोह को इसे मुस्लिमों द्वारा मानवता पर किया गया उपकार साबित करने की जल्दबाजी से बचना चाहिए।