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मध्य प्रदेश: कोरोना संक्रमित शाहिदा बी की बहन की भी मौत के बाद जनाजे में शामिल हुए दर्जनों लोग दहशत में

मध्य प्रदेश में कोरोना पॉजिटिव शख्स शाहिदा बी के जनाजे में शामिल होने वाले लोगों के बीच यह जानकर दहशत फैल गई कि उसकी बहन की भी कुछ दिनों पहले मौत हो गई है। फिलहाल, इस बात का पता नहीं चला है कि शाहिदा की बहन की मृत्यु किस वजह से हुई है।

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश के जबलपुर के हनुमानताल थानांतर्गत चाँदनी चौक निवासी कोरोना पॉजिटिव शायरा बी उर्फ शाहिदा बी (62) के जनाजे में अनुमति से अधिक लोगों के शामिल होने पर पुलिस ने FIR दर्ज कर लिया है।

शाहिदा की मौत 20 अप्रैल को हुई थी। उसके जनाजे में भी अनुमति से अधिक भीड़ होने की वजह से गोहलपुर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज किया गया है।

शाहिदा के जनाजे में जुटाई गई 40 लोगों की भीड़

हनुमानताल पुलिस ने बताया कि शाहिदा की 19 अप्रैल को कोरोना वायरस की वजह से मौत हो गई थी। जिसके बाद अधिकारियों ने बीमारी पर अंकुश लगाने के लिए गाइडलाइंस के मुताबिक जनाजे में शामिल होने वाले लोगों की एक सीमा तय की थी, मगर इसके बावजूद शव यात्रा में रिश्तेदारों और परिवार के 40 लोगों की भीड़ जमा की गई और रात में 11 बजे शव को मोतीनाला से होते हुए मंडी मदार टेकरी कब्रिस्तान में दफनाया गया। इसकी वजह से इलाके में दहशत फैल गई है, क्योंकि इस मार्ग से पूरे शहर में कोरोना वायरस फैलने का खतरा है।

शाहिदा की बहन के जनाजे में शामिल हुए 50 लोग

शाहिदा की मौत के एक दिन बाद ही 20 अप्रैल को उसकी छोटी बहन फिरदौस बेगम (50) की मौत हो गई। वो तलैया की रहने वाली थी। शाहिदा के जनाजे की तरह ही फिरदौस के पति मोहम्मद फ़िरोज़ ने भी उसके जनाजे में रिश्तेदारों की लगभग 50 लोगों की भीड़ इकट्ठा की थी। जिससे पूरे शहर में फिर से दहशत फैल गई। दोनों थानों में, पुलिस ने अंतिम संस्कार जुलूस में शामिल लोगों के खिलाफ धारा आईपीसी की धारा 188, 269 और 270 के तहत मामला दर्ज किया है।

पुलिस ने भले ही दोनों के जनाजे में शामिल लोगों पर एफआईआर दर्ज कर लिया है, लेकिन प्रशासन की चूक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कोरोना संदिग्ध का पहले बिना जाँच रिपोर्ट आए शव परिजनों के सुपुर्द कर दिया और फिर बिना प्रोटोकॉल का पालन कराए अंतिम संस्कार होने दिया। जबकि इस तरह के मामले में तहसीलदार और आरआई की मौजूदगी में कोरोना प्रोटोकाल का पालन कराया जाना कलेक्टर की जवाबदेही थी।

गौरतलब है कि पिछले दिनों महाराष्ट्र के मालेगाँव में जनाजे के लिए 500-600 लोगों की भीड़ जुटी थी। ये सभी लोग कब्रिस्तान जा रहे थे। जबकि सरकार का आदेश है कि किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में 5 से ज्यादा लोग नहीं होने चाहिए, बावजूद इसके मालेगाँव में 500 से ज्यादा लोगों की भीड़ जुट गई। पुलिस ने रास्ते में ही उन सबको रोका और भीड़ को किसी तरह तितर-बितर किया। बावजूद इसके 25-30 लोग कब्रिस्तान पहुँच गए। इसी तरह तमिलनाडु में डॉक्टरों के मना करने के बावजूद कोरोना संक्रमित मरीज का जनाजा नहीं सुनी, कोरोना संक्रमित पिता का निकाला जनाजा निकाला।

‘मुख्तार अब्बास नकवी शिया मुस्लिम, समुदाय पर कलंक’ – तबलीगियों को जिम्मेदार ठहराने की ऐसी मिली सजा

भाजपा नेता और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को तबलीगी जमात को खुद को कोरोना वॉरियर्स बताने पर लताड़ा। उन्होंने उद्दंड जमातियों पर वास्तविक कोरोना वॉरियर्स को अपमानित करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हर हिंदुस्तानी मुस्लिम को तबलीगी साबित करने की ‘सुनियोजित घटिया तबलीगी साजिश’ रची गई है।

मुख्तार अब्बस नकवी ने इसको लेकर दो ट्वीट किए। एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, “भारत में कोरोना फैलाने वाले तबलीगी अपने आप को ‘कोरोना वारियर्स’ बता रहे हैं। कमाल है… तबलीगी अपने गुनाहों पर शर्म करने के बजाय लाखों कोरोना वॉरियर्स का अपमान कर रहे हैं। इसे कहते हैं ‘चोरी और सीनाजोरी’।”

इसके तुरंत बाद ही उन्होंने एक और ट्वीट करते हुए लिखा, “बेशक कुछ राष्ट्रभक्त मुस्लिमों ने जरूरतमंदों को प्लाज्मा दिया है पर उन्हें तबलीगी कहना ठीक नहीं। हर हिंदुस्तानी मुस्लिम को तबलीगी साबित करने की ‘सुनियोजित घटिया तबलीगी साजिश’ है।”

उनके इस बयान के बाद उन्हें समुदाय विशेष के एक वर्ग द्वारा सोशल मीडिया पर बुरी तरह से ट्रोल किया गया। कुछ लोगों ने उनके शिया होने की तरफ इशारा किया और दावा किया है कि शिया समुदाय ने पूरी दुनिया को भारी नुकसान पहुँचाया है।

दूसरे ने इस तरफ इशारा किया कि भाजपा ने अभी तक ‘घरवापसी’ क्यों नहीं की?

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर समुदाय विशेष के कई लोगों ने उनकी इस टिप्पणी के लिए गालियों की बौछार कर दी।

इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री नकवी को समुदाय का कलंक भी कहा गया, लानतें दी गईं, क्योंकि उन्होंने तबलीगी जमात की आलोचना की थी। उसी तबलीगी जमात की, जिसने कोरोना वायरस के फैलने में अहम भूमिका निभाई थी।

इसमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने उन पर चाटुकारिता करने का आरोप लगाया और साथ ही लगे हाथों उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा।

दरअसल कुछ जमातियों ने कोरोना से ठीक होने के बाद प्लाज्मा डोनेट करने का फैसला किया। जिसके बाद समुदाय विशेष के लोग उनके उन कुकर्मों को छिपाने में लगे थे, जिसकी वजह से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था खतरे में है। मुख्तार अब्बास नकवी ने इन्हीं लोगों को जवाब देते हुए ये ट्वीट किया था।

दरअसल दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में तबलीगी जमात के मजहबी कार्यक्रम हुए, जिसमें प्रशासन के दिशा-निर्देशों और लॉकडाउन का खुला उल्लंघन किया गया। इसके बाद हज़ारों लोग अलग-अलग राज्यों में जाकर छिप गए। उन्हें खोजने गए पुलिसकर्मियों और उनकी स्क्रीनिंग के लिए गई मेडिकल टीम पर हमले हुए। ऐसी एक-दो नहीं बल्कि दसियों घटनाएँ हुईं। इस तरह देश के कोने-कोने में छिपे जमातियों के संपर्क में आने से कोरोना केस में धड़ल्ले से वृद्धि देखने को मिली।

हावड़ा में लॉकडाउन का पालन करवाने गई पुलिस पर हमला, घेर कर मारने लगी भीड़: रैपिड एक्शन फोर्स ने बचाया

सरकार ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा को गैर जमानती अपराध बनाया है। साथ ही ऐसा करने वाले को सात साल की सजा हो सकती है। लेकिन इसके बाद भी पुलिसकर्मियों पर हमले रूक नहीं रहे हैं। देश के कई हिस्सों से चिकित्साकर्मियों और पुलिस बल पर हमले की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसा ही एक मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा से सामने आया है, जहाँ लॉकडाउन लागू करा रहे पुलिसकर्मियों पर लोगों ने हमला कर दिया।

बताया जा रहा है कि इस हमले में दो से तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए। दरअसल यह घटना बेलिलियस रोड इलाके में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) दोपहर बाद घटी। जब पुलिस सड़क पर घूम रहे लोगों को घर में जाने के लिए कह रही थी तभी लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया।

इसके अलावा हावड़ा के टिकियापारा इलाके में भारी भीड़ जमा हो गई थी। जब लॉकडाउन का उल्लंघन होता दिखा तो पुलिस वहाँ पहुँच गई। पुलिस ने इस दौरान भीड़ को वहाँ से हटाने की कोशिश की तो भीड़ में कुछ अराजक तत्वों ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया और बोतलें भी फेंकीं गईं।

बताया जा रहा है कि अराजक तत्वों ने पुलिस की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की है। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें भीड़ को पुलिस के ऊपर हमला करते हुए देखा जा सकता है। ये भीड़ इतनी बेकाबू और आक्रामक थी कि रैपिड एक्शन फोर्स की टीम को बुलानी पड़ी।

पुलिस पर पथराव की यह पहली घटना नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव किया। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए। मामले में पुलिस ने अब तक 15 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि पुलिस पर पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।

वहीं शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर लॉकडाउन का उल्लंघन कर सामूहिक रूप से नमाज अदा की गई। बहराइच, शाहजहाँपुर में नमाजियों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया। फिरोजाबाद में घंटों मजहबी नारे लगाए। इसके बाद एम्बुलेंस को निशाना बनाते हुए तोड़फोड़ की गई। इसी तरह दिहवाकला स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने की सूचना मिली तो नमाजियों ने सिपाहियों पर हमला बोल दिया

NITI आयोग के अधिकारी में कोरोना वायरस की पुष्टि के बाद 48 घंटे के लिए बंद की गई बिल्डिंग

देश में कोरोना के फैलते संक्रमण ने नीति आयोग (NITI Aayog) को भी अब अपनी चपेट में ले लिया है। मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को नीति आयोग में काम करने वाला एक अधिकारी कोरोना पॉजिटिव पाया गया। यह सूचना आज सुबह 9 बजे मिली। इसके बाद पूरी बिल्डिंग को 48 घंटों के लिए सील कर दिया गया है। इसकी जानकारी नीति आयोग ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से दी है।

ट्वीट में नीति आयोग की ओर से कहा गया, “नीति भवन में काम करने वाले एक कर्मचारी को कोविड-19 (COVID-19) पॉजिटिव पाया गया है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय की ओर से जारी सभी दिशानिर्देशों का नीति आयोग पालन कर रहा है। बिल्डिंग को सील कर दिया गया है।”

नीति आयोग में सलाहकार आलोक कुमार ने इस संबंध में कहा, “NITI भवन में एक निदेशक स्तर का अधिकारी कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। आज सुबह 9 बजे, उन्हें अपनी रिपोर्ट मिली और फिर उन्होंने अधिकारियों को सूचित किया।”

उन्होंने ये भी बताया कि इस सूचना मिलने के बाद बिल्डिंग को 48 घंटे के लिए बंद कर दिया गया है। वहाँ डिसइन्‍फेक्‍शन और सेनिटाइजेशन का काम किया जा रहा है और कोविड पॉ‍जिटिव पाए गए अधिकारी के संपर्क में आए सभी लोगों को सेल्‍फ क्‍वारंटाइन में रहने को कहा गया है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का एक कर्मचारी भी कोरोना संक्रमित पाया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक वो 16 अप्रैल को 2 रजिस्ट्रार के कॉन्टैक्ट में आया था। इसके बाद दोनों को सुरक्षा लिहाज से सेल्फ क्वारंटाइन करने की सलाह दी गई। इसके अलावा, संक्रमित पाए गए कर्मचारी का इलाज फिलहाल दिल्ली के सरकारी अस्पताल में चल रहा है। प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए कुछ अन्य लोगों को भी ढूँढा जा रहा है, जो उसके संपर्क में थे।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में इससे पहले नागर विमानन मंत्रालय के मुख्यालय को भी सील किया गया था। वहाँ भी एक कर्मचारी कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया था जो 15 अप्रैल को दफ्तर गया था।

बता दें कि देशव्यापी लॉकडाउन और सख्ती के बाद भी देशभर में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटे में 1543 नए मामले सामने आए हैं और 62 लोगों की मौत हो गई है, जो अब तक सर्वाधिक है।

तेज प्रताप ने अर्नब को कहा ‘वायरस’, लोगों ने पूछा- ‘तुम्हारे अब्बा किस प्रकार के वायरस थे, जो उन्हें वैक्सिंग की जरूरत पड़ी है’

महाराष्ट्र के पालघर में भीड़ द्वारा तीन साधुओं की पीट-पीट कर हत्या के संदर्भ में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के खिलाफ टिप्पणी करने को लेकर रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी से मुंबई पुलिस ने सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को लगभग 12:30 घंटों तक लगातार पूछताछ की। इसी कड़ी में सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं तेज प्रताप जिन्होंने अर्नब को ‘वायरस’ कह दिया।

पूछताछ की वजह से सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को दोनों चैनलों पर आने वाले अपने नियमित कार्यक्रमों में भी अर्नब उपस्थित नहीं हो सके। हालाँकि, पूछताछ के बाद वो फिर से चैनल पर दिखे और सोनिया गाँधी से सवाल पूछे। पूछताछ के बाद अर्नब गोस्वामी ने कहा कि वो अपने बयान पर अब भी कायम हैं।

इस बीच राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे ने अर्नब गोस्वामी को ‘वायरस’ कहा है। उन्होंने अर्नब गोस्वामी को निशाने पर लेते हुए ट्विटर पर लिखा, “उस ‘वायरस’ को उसी प्रकार के ‘वैक्सीन’ की जरूरत थी। मैं मुंबई पुलिस के साथ हूँ।”

हालाँकि, लोगों ने उन्हें असली तरह से समझा दिया कि वायरस कौन है और वैक्सीन कौन है। इंदौर से भाजपा विधायक रमेश मेंडोला ने लिखा, “गलत समझ रहे हो आप। वो वायरस नहीं, खुद वैक्सीन है।”

एक यूजर ने लिखा, “तुम्हारे अब्बा किस प्रकार के वायरस थे, जो उन्हें वैक्सिंग की जरूरत पड़ी है, चोर जेल में है।”

राजेन्द्र सिंह विशेन नाम के एक यूजर ने लिखा, “चोर की औलाद और किसके साथ हो सकती थी। पर कौन सी वाली पुलिस वही जिसने दो संन्यासियों का हाथ पकड़ हत्यारों को सौंप के सो गई।”

प्रभात कुशवाहा ने लिखा, फिर तो लालू नाम के वायरस के साथ जो हो रहा, उससे भी सहमत होगे?

एक ने लिखा, “देखो देखो कौन भौंक रहा है, जिसका खुद का बाप जेल में सड़ रहा है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “हे मंदबुद्धि, जिनके पिता खुद बेज़ुबानो को ठग चुके हो। उनके मुँह से ऐसे विचार अच्छे नही लगते। ये तो वही बात कर दी। 100 चूहे खा के बिल्ली हज को चली।”

काजल सिंह नाम की एक यूजर लिखती हैं, “मैं भी तिहाड़ जेल की पुलिस के साथ हूँ, जिन्होंने एक चारा चोर को बाँध कर रखा हुआ है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “मैं आपके विरोध में हूँ। आपके परिवार ने बिहार को लूटा है, बस यह याद रखिएगा। बाकी मिस यू पापा बोलने से काम नहीं चलेगा गुनाह की सजा मिली है उन्हें।”

एक ने लिखा, “लगता है चरसी को चरस का डोज #AntonioMaino ने भिजवा दिया है इस लॉकडाऊन में। मैं अर्नब के साथ हूँ।”

रितेश कुमार सिंह ने इस पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि जितनी पूछताछ अर्नब गोस्वामी से की, अगर इतनी पूछताछ पालघर में साधुओं की नृशंस हत्या करने वालों से कर लेते तो अब तक असली कातिल देश के सामने आ जाते।

सुनील कुमार ने लिखा, “कुछ वायरस तो ऐसे थे जो जानवरों का चारा खा गए, लेकिन खुशी है की उस वायरस का इलाज हो गया।”

बता दें कि अर्नब ने पूछताछ के बाद कहा कि उन्होंने पुलिस का पूरा सहयोग किया है और अगर उन्हें फिर से बुलाया जाता है तो भी वो जाएँगे। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें गिरफ़्तार होने का भी डर नहीं है। अर्नब गोस्वामी ने कहा कि मुद्दा वो नहीं हैं बल्कि असली मुद्दा पालघर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या का है। अर्नब गोस्वामी ने आरोप लगाया था कि मुंबई पुलिस उन पर हुए हमलों के मामले में कॉन्ग्रेस की साज़िश को कवर-अप करने में जुट गई है। 

लॉकडाउन में बांद्रा स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों को भड़काकर भीड़ जुटाने वाले विनय दुबे को जमानत, केंद्र सरकार को दी थी चेतावनी

देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान मुंबई में बांद्रा रेलवे स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ जुटाने के आरोपित विनय दुबे को आज (अप्रैल 28, 2020) स्थानीय कोर्ट से जमानत मिल गई। बांद्रा की एक अदालत ने मंगलवार को दुबे को 15 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दी। दुबे को 14 अप्रैल को बांद्रा रेलवे स्टेशन पर भीड़ जुटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उसे एरोली की नवी मुंबई पुलिस ने पकड़ा गया था।

बता दें, दुबे के ऊपर आईपीसी की धारा 117, 153A, 188, 269, 270, 505(2) और सेक्शन 3 के तहत मामला दर्ज किया गया था। इससे पहले उसने 15 अप्रैल को कोर्ट में पेश किया गया था।

गौरतलब है कि बीते 14 अप्रैल को बांद्रा और व मुंब्रा में हजारों प्रवासी सड़क पर आ गए थे। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को बल का प्रयोग कर व मजहबी नेताओं को अल्लाह का हवाला देकर भीड़ को तितर-बितर करना पड़ना। इस संबंध में नवी मुंबई पुलिस ने विनय दुबे को गिरफ्तार किया था।

विनय पर आरोप लगा था कि वह 18 अप्रैल को कुर्ला में प्रवासी मजदूरों के बड़े आंदोलन की धमकियाँ पुलिस को दे रहा था। इसके अलावा उसका एक वीडियो भी सामने आया थे। जिसमें वह न केवल राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के ख़िलाफ़ ह़़जारों प्रवासियों को भड़काता दिखा था, बल्कि सरकार को चेतावनी भी दे रहा था।

बता दें, फेसबुक पर पोस्ट वीडियो में दुबे उत्तर प्रदेश तक प्रवासियों की पदयात्रा का नेतृत्व करने की बात कर रहा था। साथ ही लोगों से अपील कर रहा था कि अगर, लोग उसका साथ देना चाहते हैं, तो वे उससे व्हॉट्सअप पर संपर्क करें।

इसके अलावा विनय अपनी वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की और केंद्र सरकार की आलोचना करता दिखा था। उसने लॉकडाउन के संबंध में केंद्र सरकार को अल्टीमेटम दिया कि या तो वे 14 और 15 अप्रैल तक सभी परेशानियों का निवारण करें वरना वो 20 अप्रैल से पदयात्रा शुरू कर देगा। 

गौरतलब है कि खुद को सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी बताने वाले विनय दुबे भाजपा के खिलाफ लगातार जहर उगलता रहा है। कई तस्वीरों में एनसीपी और मनसे के नेताओं से उसकी करीबी दिखाई पड़ती है। उसके फेसबुक अकाउंट से अपलोड फोटोज में से एक में वह मनसे प्रमुख राज ठाकरे के साथ दिखाई देता है।

इमरजेंसी में स्नेहलता, आज अर्नब: विरोधियों के दमन का कॉन्ग्रेसी तरीका

महाराष्ट्र में हुई साधुओं की हत्या के बाद रिपब्लिक भारत के संस्थापक अर्नब गोस्वामी से हो रही पूछताछ ने एक बार फिर कॉन्ग्रेस काल की झलक दिखाई है। महज एक कांड से ही कॉन्ग्रेस ने स्पष्ट कर दिया कि वह आज भी विरोधी स्वर को कुचलने के अपने तरीकों में कितनी स्पष्ट है। यह झलक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र में 2014 के व्यापक सत्ता परिवर्तन के बाद देशभर में मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फ़ासिज़्म जैसे शब्द बच्चे-बच्चे के मुँह से सुने जाने लगे।

मानो इन विशेषणों का उद्भव ही केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद हुआ हो। लेकिन ये लोग कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी (Snehalata Reddy) की कहानी पर बात नहीं करते, जिनका जीवन इस आपातकाल ने सिर्फ एक आरोप के चलते खत्म कर दिया कि वह ‘एक राजनीतिक शरणार्थी’ से दोस्ती रखतीं थीं। एक लोकतान्त्रिक देश में आपातकाल की दलील पर एक अभिनेत्री को ऐसे कठिन दौर से गुज़रना पड़ा, जब उन्हें अनेक यातनाएँ झेलनी पड़ीं और अंत में उनकी तड़पकर मौत हो गई।

‘लौह महिला’ इंदिरा गाँधी के आपातकाल की वह नारकीय यातनाएँ

स्नेहलता रेड्डी की कहानी भारतीय लोकतंत्र के उन स्याह 19 महीनों के दौरान की है जिस त्रासदी को संविधान आपातकाल का नाम देता है। कहा जाता है कि यह निर्णय कॉन्ग्रेस की लौह महिला इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में ‘फासीवादी शक्तियों’ से लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए लिया गया था। उस समय के बड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस को पकड़ने के लिए पुलिस द्वारा उनकी मित्र और कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी पर किए गए बेहिसाब शोषण का यह किस्सा शायद ही लोगों तक आज भी पहुँच सका हो।

आपातकाल के नाम पर लाखों बेकसूर लोगों पर मनचाहे कानून के तहत कार्रवाई कर के उन्हें जेल की नारकीय यातनाओं में भेज दिया गया। इनमें से कुछ वो लोग भाग्यशाली ही कहे जा सकते हैं जो या तो जीवित रह सके या फिर मौत के बाद ही सही लेकिन कहानियों का हिस्सा बन सके। जेल में अटल बिहारी वाजपयी की बगल की ही जेल में रखीं गईं स्नेहलता रेड्डी की चीख ने उन्हें शायद मृत्यु तक पीछा किया होगा लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता में रहते जितने वाम-उदारवादियों और ‘विचारकों’ की जमात तैयार की, उसे यह चीखें और निर्मम कहानियाँ नहीं सुनाईं दीं।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी के सैनिक, लाखों निर्दोषों को बिना कारण बताए जेल में ठूँस रहे थे। इनमें से अधिकतर की गिरफ्तारी मीसा (मैंनेटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट/ MISA/Maintenance of Internal Security Act) के तहत हुई थी। कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता पर आरोप लगाया गया कि वो डाइनामाइट से दिल्ली में संसद भवन और अन्य मुख्य इमारतों को धमाका कर उड़ाना चाहती थीं। स्नेहलता पर IPC की धारा 120, 120A के तहत आरोप लगाए गए। हालाँकि आखिर में इनमें से कोई भी आरोप साबित नहीं हुआ और राज्य ने उन्हें वापस ले लिया। लेकिन ‘मीसा’ के तहत स्नेहलता की कैद जारी रही।

कहा जाता है कि जब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी अपने ओजस्वी भाषणों और उससे भी धारदार नारों के चलते बेंगलुरु जेल में बंद कर दिए गए थे, तभी उनके साथ भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी को भी रखा गया था। उस समय भारतीय जनसंघ के युवा और उर्जावान चेहरों में यही दो नाम सबसे पहले आते थे।

स्नेहलता को धोखे से जेल में डाल दिया गया। बैंगलोर केंद्रीय कारावास पहुँचते ही उन्हें ढेरों अपमानजनक अनुभवों का सामना करना पड़ा। वहाँ उन्हें एक हवादार कोठरी में बंद कर दिया गया, जिसका आकार एक व्यक्ति के हिसाब से पर्याप्त था। इस कोठरी में पेशाबघर की जगह पर कोने में एक छेद बना हुआ था, और दूसरे छोर पर लोहे का एक जालीदार दरवाजा लगा हुआ था।

आपातकाल के नाम पर यातनाएँ

स्नेहलता ने फर्श पर सोकर रातें गुजारीं। जेल में उनकी रातें इस भय में ज्यादा गुजरने लगीं कि उनके पीछे उनके परिवार से क्या सलूक किया जा रहा होगा, क्योंकि वह उनसे जेल में मिलने भी नहीं आए थे। किसी तरह आखिरकार उनके घरवाले यह पता लगाने में कामयाब रहे कि स्नेहलता को किस जेल में बंद किया गया है। ऐसे समय में, जब नागरिकों के सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था, उन्हें आठ महीने तक बिना मुकदमा चलाए हुए असीम यातनाओं के बीच बेंगलुरु सेंट्रल जेल में रखा गया।

उसी समय जेल में दोनों नेताओं को किसी महिला की चीखें सुनाई देती और बाद में उन्हें पता चला कि वह कोई अपराधी या नेता नहीं बल्कि कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी थीं। स्नेहलता पर डायनामाईट केस में शामिल होने का आरोप लगाया गया और उन्हें मई 02, 1976 को गिरफ़्तार किया गया था।

बेंगलुरु की ही जेल में क़ैद उनके साथ बेहद अमानवीय दुर्व्यवहार किए गए। मधु दंडवते जो कि उस समय उसी बैंगलोर के जेल में थे, उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा था कि उन्हें रात के सन्नाटे में स्नेहलता की चीखती हुई आवाजें सुनाई देतीं थीं।

जेल में लिखी हुई एक छोटी सी डायरी में स्नेहलता ने लिखा-

“जैसे ही एक महिला अंदर आती है, उसे बाकी सभी के सामने नग्न कर लिया जाता है। जब किसी व्यक्ति को सजा सुनाई जाती है, तो उसे पर्याप्त सजा दी जाती है। क्या मानव शरीर को भी अपमानित किया जाना चाहिए? इन विकृत तरीकों के लिए कौन जिम्मेदार है? इन्सान के जीवन का क्या मकसद है? क्या हमारा मकसद जीवन मूल्यों को और बेहतर बनाना नहीं है? इन्सान का उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, उसे मानवता को आगे बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।”

खुद जेल की यातनाओं का हिस्सा होने के बावजूद स्नेहलता ने अन्य कैदियों के अधिकारों के लिए जंग जारी रखी। उन्होंने साथ के कैदियों का मनोबल बढ़ाया। आखिरकार उनकी मेहनत कुछ हद तक रंग लाई और कम से कम कैदियों को पहले से बेहतर खाना दिया जाने लगा। उन्होंने लिखा-

“महिलाओं को पहले बुरी तरह से पीटा जाता था, लेकिन अब इसमें कुछ कमी आई। कम से कम मैंने उनके अंदर के भय को तो दूर कर ही दिया है। मैंने तब तक भूख हड़ताल की, जब तक कैदियों को मिलने वाले खाने की गुणवता में सुधार नहीं हुआ।”

स्नेहलता अस्थमा की मरीज थीं, बावजूद इसके उन्हें घोर यातनाएँ दीं जाती और जेल में उन्हें निरंतर उपचार भी नहीं दिया गया। यह बातें स्वयं स्नेहलता ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समक्ष रखीं थीं। जेल में मिलने वाली क्रूर यातनाओं ने और उस वास्तविकता ने स्नेहलता को बेहद कमजोर कर दिया और उनकी हालत गंभीर हो गई। जनवरी 15, 1977 को उन्हें पैरोल पर रिहा कर दिया गया। और रिहाई के 5 दिन बाद ही 20 जनवरी को हार्ट अटैक के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

सवाल यह भी रह गया कि ऐसी ही न जाने और कितनी स्नेहलताएँ इंदिरा गाँधी और कॉंग्रेस की सत्ता में बने रहने की चाह की बलि चढ़ीं। स्नहेलता की मृत्यु के बाद मानवाधिकार आयोग ने उनकी डायरी के कुछ पन्ने जारी किए, जिनमें उन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचार और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का वर्णन किया था।

स्नेहलता द्वारा जेल में लिखी गई डायरी के पन्ने

जून, 2015 में ‘द हिंदू’ के एक लेख में स्नेहलता की बेटी नंदना रेड्डी ने बताया कि उनकी माँ औपनिवेशिक ब्रिटिश राज की प्रबल विरोधी थीं। जब वह कॉलेज गईं तो उन्होंने अपने भारतीय नाम को वापस अपना लिया था और वह केवल भारतीय कपड़े और एक बड़ा ‘बॉटू’ पहनती थी। नंदना ने लिखा कि उनकी माँ ने प्रसिद्ध श्री किट्टप्पा पिल्लई से भरतनाट्यम सीखा और एक बहुत ही कुशल नर्तकी बन गईं।

कॉन्ग्रेस को कम कर आँकने की भूल कर रहा है देश

कॉन्ग्रेस ने सत्ता और शासन के लिए हमेशा हर तरीके को अपनाया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ पूरा देश आज कॉन्ग्रेस को एक सिमट चुकी कहानी समझते आ रहा है, वह महाराष्ट्र जैसे राज्य में एक पत्रकार को 12 घंटों तक पुलिस की पूछताछ के लिए बिठा सकती है। विरोधियों के स्वर को कुचलने और असत्य को स्थापित करने में यह पार्टी आज भी उतनी ही नीतिकुशल, शक्तिशाली और बलवान है, जितनी की आपातकाल के समय थी।

यह शासन के साम-दाम-दंड भेद को जानती है इसके एक इशारे पर किसान से लेकर साहित्यकार सड़कों पर उतर आते हैं और ख़ास बात देखिए कि सत्ता की भूख ले लिए स्नेहलता जैसी कहानियों की जिम्मेदार इस कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने तंत्र के जरिए कभी किसी को सोचने का अवसर नहीं दिया कि वास्तव में फ़ासिस्ट कौन रहे हैं?

गुजरात: कसम आला मस्जिद इलाके में पुलिस पर तलवार-डंडों से हमला, 10 गिरफ्तार, मुख्य आरोपित नजीर समेत 7 फरार

वडोदरा के नगरवाड़ा इलाके में कसम आला मस्जिद (Kasam Aala mosque) के नजदीक पुलिस टीम पर हमला करने वाली भीड़ में शामिल 17 नामजद आरोपितों में से 10 को आज गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। बता दें, सोमवार को पुलिस टीम पर 50 से अधिक लोगों की भीड़ ने उस समय हमला किया था जब वह लॉकडाउन का पालन कराने क्षेत्र में गए थे। इसके बाद इस मामले के संबंध में एफआईआर दर्ज हुई थी। 

देशगुजरात की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में मुख्य आरोपित की पहचान नजीर सिंधी के रूप में हुई है। नजीर पर आरोप है कि इसी ने पुलिस ऑफिसर गौतम कांति के साथ गाली-गलौच की और बाद में धमकी दी कि यदि उन्होंने जगह को खाली नहीं किया तो वह उन्हें मार देगा। 

हालाँकि बता दें, गुजरात पुलिस ने जिन 10 लोगों को गिरफ्तार किया है उनमें नजीर शामिल नहीं है। वे उन 7 लोगों में शामिल है जो घटना के बाद से फरार हैं। मगर, मामले के मद्देनजर पुलिस ने जिन 17 लोगों पर केस दर्ज किया है, उनकी पहचान नजीर, इजवान, सलीम, रमीज, आसिफ, सोहिल, रियाज, फजल, दिलाफ, जावेद, ताहिर, आबिद, निजाम, अनीस, साजिश, जेनुल और जाहिर के रूप में हुई है।

जानकारी के अनुसार, सोमवार को सुबह 5 बजे सेहरी के बाद इस इलाके में कुछ लोग लॉकडाउन का उल्लंघन करते हुए सड़कों पर घूमते दिखे थे। जब पुलिस ने जाकर इनसे घर में रहने की अपील की तो ये भीड़ अचानक हिंसक हो गई और नजीर व उसके साथी डंडे और तलवारों से लैस होकर पुलिस के सामने आ खड़े हुए। इसके बाद उन्होंने भीड़ को उकसाया और फिर भीड़ पर पत्थर व बोलतें फेंकी गईं। इस बीच नजीर ने पुलिस पर साइकिल उठाकर भी हमला किया।

इसके बाद के हालात देखते हुए पुलिस को अधिक फोर्स बुलानी पड़ी। तब जाकर वह भीड़ पर काबू कर पाए। बाद में कुछ महिलाओं ने हिंसा की सफाई में पुलिस पर भी इल्जाम लगाया कि पुलिस वालों ने पी रखी थी। हालाँकि, सभी पहलुओं को देखते हुए पुलिस ने टीम पर हमला करने वाली भीड़ में शामिल आरोपितों के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के अलावा धारा 353, 332, 323,337,269, 249b, 506, 143, 147, 148, 149 के तहत मामला दर्ज किया है।

अंबाला: कोरोना संदिग्ध बुजुर्ग महिला के अंतिम संस्कार पर बवाल, ग्रामीणों ने पुलिस और डॉक्टरों पर किया पथराव, लाठी-डंडों से हमला

कोरोना वायरस के कहर के बीच सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को हरियाणा के अंबाला में कोरोना वायरस संदिग्ध के अंतिम संस्कार को लेकर हंगामा हो गया। कोरोना संदिग्ध एक बुजुर्ग महिला के दाह संस्कार के लिए पहुँची पुलिस का स्थानीय लोगों ने विरोध किया। लगभग 200 से 400 लोग जमा हो गए और पुलिस पर हमला बोल दिया, जिसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करके लोगों को वहाँ से भगाना पड़ा।

डीएसपी अंबाला राम कुमार ने बताया कि महिला की मौत अंबाला छावनी स्थित सिविल अस्पताल में हुई थी। उन्हें साँस लेने में समस्या होने की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहाँ डॉक्टरों ने एहतियातन महिला का सैंपल जाँच के लिए भेजा था। हालाँकि, तब तक महिला की मौत हो गई। छावनी से लगे चाँदपुरा गाँव के स्थानीय श्मशान में सोमवार शाम को बुजुर्ग महिला का दाह संस्कार किया जा रहा था।

संक्रमण फैलाने का लगाया आरोप

ग्रामीणों को शक था कि अंबाला की महिला की मौत कोविड-19 से हुई है और उसका दाह संस्कार वहाँ करने से इलाके में भी संक्रमण फैल सकता है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने लोगों को आश्वस्त किया कि संक्रमण का कोई खतरा नहीं है और अंतिम संस्कार का विरोध नहीं करने को कहा। डीएसपी ने बताया कि यह जगह कोरोना और इसी तरह के मामले से जुड़े लोगों के अंतिम संस्कार के लिए तैयार किया गया है। मगर समझाने के बावजूद 300 से 400 लोग वहाँ एकत्र हो गए और हंगामा करने लगे।

एक दर्जन लोग हिरासत में

डीएसपी ने बताया कि लोगों ने अंबाला में लॉकडाउन तो तोड़ा ही साथ ही पुलिस और डॉक्टरों की टीम पर हमला कर दिया। गाँव वालों ने न सिर्फ लाठी-डंडों से पुलिस और डॉक्टरों की टीम पर हमला किया, बल्कि एंबुलेंस को भी नुकसान पहुँचाया और तोड़ फोड़ किया। ग्रामीणों ने पुलिस-डॉक्टरों की टीम पर पथराव भी किए। मामला इस कदर बिगड़ गया कि भीड़ हटाने के लिए पुलिसवालों को लाठीचार्ज करनी पड़ी। इसके बाद वहाँ से भीड़ हटी और महिला का दाह संस्कार किया जा सका। पुलिस ने बताया कि एक दर्जन लोगों को हिरासत में लिया गया है।

पुलिस पर पथराव की यह पहली घटना नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव किया। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए। मामले में पुलिस ने अब तक 15 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि पुलिस पर पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।

वहीं शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर लॉकडाउन का उल्लंघन कर सामूहिक रूप से नमाज अदा की गई। बहराइच, शाहजहाँपुर में नमाजियों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया। फिरोजाबाद में घंटों मजहबी नारे लगाए। इसके बाद एम्बुलेंस को निशाना बनाते हुए तोड़फोड़ की गई। इसी तरह दिहवाकला स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने की सूचना मिली तो नमाजियों ने सिपाहियों पर हमला बोल दिया

कहीं बूढ़े महंत ने दिया दान तो कहीं पशु-पक्षियों को भोजन: 5 छोटे मंदिर जो कोरोना आपदा के बीच कर रहे बड़े काम

कोरोना वायरस की आपदा के बीच भारत के सारे मंदिर और मठ एक ही ध्येय लेकर चल रहे हैं और वो है जनसेवा, यानी राहत-कार्य। यहाँ हम आपको 5 ऐसे मंदिरों के बारे में बताएँगे, जिनके बारे में लोगों को ज्यादा नहीं पता लेकिन वो लोगों की भलाई, दान और समाजसेवा के मामले में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। इससे पहले हम आपको उन बड़े मंदिरों के बारे में बता चुके हैं, जिन्होंने आगे बढ़ कर इस विकट परिस्थिति में जनता व सरकार की मदद की।

जम्मू के अखनूर में स्थित है ‘पूली वाले मंदिर’, जिसके महंत हैं गणेश दास। उन्होंने कारगिल युद्ध और बाढ़ आपदा के दौरान भी 11-11 हज़ार रुपए की धनराशि दान दी थी। छोटे से मंदिर के बड़े दिल वाले महंत ने इस बार भी इतनी ही राशि पीएम केयर्स फण्ड में दान दी है। उन्होंने भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष शामलाल शर्मा को चेक सौंपा। मंहत गणेश दास ने कहा कोरोना वायरस महामारी से लोगों को हिदायतों का पालन करना होगा और गरीब परिवार की मदद के लिए आगे आना होगा

अब आते हैं उत्तराखंड के पौड़ी में स्थित कंडोलिया मंदिर पर। कंडोलिया मंदिर ने सीएम राहत कोष में 2.11 लाख रुपए की मदद की है। मंदिर समिति के अध्यक्ष जसपाल सिंह नेगी ने कहा कि जब इस समय पूरा देश कोरोना की चपेट में आया हुआ है और कई ज़रूरतमंद फँसे हुए हैं, लॉकडाउन में केंद्र व राज्य सरकार अच्छे से क़दम उठा रही है। उन्होंने कहा कि मंदिर द्वारा दान की गई राशि जनता की बेहतरी में ख़र्च की जाएगी।

राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहाँ का झंडेवालान मंदिर तो लगातार जनसेवा कर रहा है, लक्ष्मी नगर के शुभाष चौक स्थित ‘श्री दुर्गा एवं श्याम मंदिर’ द्वारा संचालित ‘श्याम रसोई’ के माध्यम से गरीबों को खाना खिलाया जा रहा है। मंदिर के संचालक आचार्य दिनेश शर्मा का कहना है कि श्याम बाबा की कृपा से लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए रोजाना राशन किट वितरण का कार्य किया जा रहा है। मंदिर ने कहा है कि किसी को भी भोजन की कमी हो तो वो संपर्क करे।

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद स्थित आमला में तो आम आदमी के अलावा पशु-पक्षियों का भी ध्यान रखा जा रहा है। यहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और रेलवे कॉलोनी स्थित छोटे से हनुमान मंदिर की समिति पशु-पक्षियों के भोजन का जुगाड़ कर रही है। यहाँ आरएसएस लगभग 1 महीने से जनसेवा के कार्य में रत है। नगर और अंचल के 10 हज़ार से भी अधिक लोगों के खाने का इंतजाम अब तक किया जा चुका है।

होशंगाबाद में ही शिवनी मालवा में ‘राम जानकी राधा कृष्ण मंदिर’ स्थित है, जहाँ हो रहे राहत कार्य का जायजा लेने ख़ुद न्यायाधीश यशवंत मालवीय पहुँचे और वो क़ाफी प्रभावित भी नज़र आए। वहाँ ‘जनता रसोई’ चल रही है, जिसके माध्यम से कार्यकर्ता घर-घर जाकर भोजन का वितरण कर रहे हैं। जस्टिस मालवीय ने न सिर्फ़ वित्तीय मदद की बल्कि आगे भी सहायता का आश्वासन दिया। यहाँ भी सोशल डिस्टन्सिंग का पूरा पालन किया जा रहा है।

इसकी तुलना आप कई मस्जिदों से कर सकते हैं। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ मस्जिद ने दान देना तो दूर, उल्टा लॉकडाउन का उल्लंघन कर पूरे देश में महामारी फैला दी। एक वायरल वीडियो के अनुसार, जब पुलिस ने एक मस्जिद में जाकर मौलवी से आग्रह किया कि वो मस्जिद के माइक से कोरोना के ख़तरों के प्रति लोगों को आगाह करें तो उसने इनकार करते हुए कहा कि ये अल्लाह का घर है और कभी बंद नहीं होगा।