केरल से जाकर तबलीगी जमात के कार्यक्रम का हिस्सा बनने वाले 284 लोगों की गुमशुदगी ने प्रशासन को सकते में ला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन 284 लोगों की सूचना अब तक पुलिस को नहीं मिल पाई है। केरल के इन तबलीगी जमातियों के मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ आ रहे हैं, जिसके कारण इन्हें ट्रेस करना भी मुश्किल हो गया है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार केरल से तबलीगी जमात का हिस्सा बनने वाले 1000 से ज्यादा लोगों में से 518 लोग केरल वापस लौटे। जिन्हें हाल ही में पहचान करके क्वारंटाइन किया गया। हालाँकि, टेस्ट के बाद इनमें से केवल 6 लोग कोरोना पॉजिटिव आए।
इसके बाद 509 जमाती, जिन्होंने 12 से 28 मार्च तक के बीच में केरल से दिल्ली जाकर मरकज़ कार्यक्रम को अटेंड किया, वे फिलहाल तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में हैं। इनकी जानकारी राज्यों के गृह प्रशासन को सौंप दी गई है। इसके अलावा 20 अप्रैल तक राज्य में 408 कोरोना मामले आए हैं। जिन्हें उपयुक्त इलाज देकर ठीक करने का प्रयास जारी है। मगर, इस बीच राज्य प्रशासन की चिंता वे जमाती बन गए हैं, जो बहुत कोशिशों के बाद भी पकड़ में नहीं आ रहे।
Kerala model:
On @aajtak Kerala DGP said 284 Tablighis returned from Nizamuddin are untraceable. They have switched off their phones. 504 Kerala Tablighis are quarantined in various states, outside Kerala
मालूम रहे कि भारत में कोरोना का सबसे पहला मामला केरल में ही आया था। जिसके बाद पूरे देश में इसका प्रसार शुरू हुआ और आज आँकड़े 20 हजार पहुँचने वाले हैं। वहीं अकेले केरल में इन केसों की संख्या 408 पहुँच गई है। जिनमें से 288 रिकवर कर चुके हैं। जबकि वायरस के कारण 3 लोग दम तोड़ चुके हैं। अब समय के बीतने के साथ पुलिस को डर है कि अगर ये 284 जमाती जल्द से जल्द नहीं पकड़े जाते हैं तो ये अन्य लोगों को भी संक्रमित कर देंगे। इसलिए पुलिस इनकी धड़पकड़ में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। सूचना के अनुसार, तबलीगी जमात में केरल से गए लोगों की संख्या 1,311 थी।
बता दें कि 29 मार्च को आईबी निदेशक अरविंद कुमार ने राज्य डीजीपी को इन तबलीगियों की मूवमेंट पर जानकारी दी थी। राज्य मुख्यमंत्री ने भी इसके बाद पुलिस की योजना को मंजूरी देते हुए सभी जमातियों की पहचान करके क्वारंटाइन करने की बात की थी। लेकिन साथ ही ये भी आदेश दिया था कि ये बातें मीडिया सुर्खियों में न आए।
अब जब लाख कोशिशों के बाद 284 जमातियों की कोई सूचना नहीं मिल रही है, तो पुलिस के लिए ये एक सिरदर्दी बन गए हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, एक पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये जमाती प्रत्येक संपर्क में आने वाले व्यक्ति के जरिए इस संक्रमण को और फैला सकते हैं और इससे पूरे राज्य में वायरस का समुदाय के बीच विस्फोट हो सकता है।
गौरतलब है कि इससे पहले, सभी स्थिति को देखते हुए भी केरल सरकार ने 20 अप्रैल के बाद लॉकडाउन में कुछ छूट देने का एलान किया था। इस पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी। गृह मंत्रालय ने कहा था कि शहरों में रेस्तरां खोलने, बस यात्रा की अनुमति देने और निगम के इलाकों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम (MSME) उद्योगों को खोलने की अनुमित देना लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों को कमजोर करने के बराबर है।
स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले की घटनाएँ रुकती नहीं दिख रही। ताजा मामला कर्नाटक के मैसूर का है। यहॉं सुमय्या फिरदौस नामक आशा वर्कर पर हमला किया गया।
तीन युवकों को मास्क पहनने व सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह देना उसे महँगा पड़ गया। युवकों ने फिरदौस की सलाह मानने की बजाए उस पर हमला कर दिया। युवकों की पहचान महबूब, खलील और जीशान के रूप में हुई है।
घटना के बाद महिला ने इस मामले में पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाई। उसने बताया कि सोमवार को हलीम नगर के मैसूर में कोरोना संदिग्धों की जाँच करने गई थी। मगर वहाँ उसके साथ बदसलूकी हुई। आशाकर्मी की शिकायत पर पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया है।
An ASHA (Accredited Social Health Activist) worker from Mysuru, Sumayya Firdose said that she was threatened by 3 people when she asked them to maintain social distance&wear masks. “This is wrong, they cannot use foul language. We’re here to work”, she said. (21/04/20) #Karnatakapic.twitter.com/zUyDfpsbts
जानकारी के मुताबिक, सुमय्या फिरदौस नाम की आशाकर्मी बैनीमंतप सरकारी अस्पताल से जुड़े होने के कारण इलाके में जाँच के लिए गई थीं। जहाँ युवकों ने उनके साथ बदसलूकी की और उन्हें धमकी भी दी। महिला के मुताबिक तीनों युवकों से सवाल पूछे जाने पर वे उसे गाली देने लगे। जान से मारने की धमकी दी। महिला के मुताबिक मामला बढ़ने पर उन्हें आसपास के लोगों ने बचाया।
Karnataka: Three booked for attacking and threatening to kill ASHA worker Sumayya Firdose for asking them to follow coronavirus guidelines https://t.co/C6YAhYnu2e
बता दें इस मामले के संज्ञान में आने के बाद जिला इंचार्ज मिनिस्टर एसटी सोमेश्वर ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में मैसूर आयुक्त से बात की है। आरोपितों के ख़िलाफ़ एफआईआर भी दर्ज हो गई है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले बेंगलुरु के पदरायनपुरा इलाके में पुलिस और स्वास्थ्य अधिकारियों पर हमला हुआ था। इस संबंध में पुलिस ने 110 लोगों से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था। इससे पहले सादिक नगर इलाके में भी आशाकर्मियों पर हमले की खबर सामने आ चुकी है।
पुलिस और मेडिकल टीम पर हमले की हाल में कई घटनाएँ सामने आई है। बिहार के दरभंगा, हरियाणा के पंचकुला, बेंगलुरु के पदरायनपुर जैसे कई इलाकों से ऐसे मामले आए हैं। बेंगलुरु में हुए हमले की यदि बात करें तो यहाँ जिस भीड़ ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बेरहमी से हमला किया उसे फिरोजा नाम की महिला ने उकसाया था।
अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने भारत के डिजिटल मार्केट में अपने कदम बढ़ाने के लिए रिलायंस के साथ एक बड़ी डील की है। फेसबुक ने उद्योगपति मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के डिजिटल ऑपरेशन रिलायंस जियो में 5.7 बिलियन यानी 43,574 करोड़ रुपए का निवेश किया है।
इस डील के बाद फेसबुक भारत के लोगों को बिजनेस करने के नए अवसर प्रदान करेगा। इस बात का ऐलान खुद फेसबुक ने किया है। इस डील के बाद जियो की वैल्यू 4.62 लाख करोड़ रुपए हो गई है। फेसबुक उसकी सबसे बड़ी शेयरहोल्डर बन गई है।
डील के बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा है कि मैं मुकेश अंबानी और पूरी Jio टीम को उनकी साझेदारी के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। मैं नई डील को लेकर बहुत उत्साहित हूँ। उन्होंने कहा कि जियो प्लेटफार्म के साथ मिलकर फेसबुक कई प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। हम एक वित्तीय निवेश कर रहे हैं और इससे भी अधिक, हम कुछ प्रमुख परियोजनाओं पर एक साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो पूरे भारत में लोगों को बिजनेस के नए अवसर देगा।
मार्क जकरबर्ग ने कहा कि यह विशेष रूप से अभी महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे व्यवसाय हर अर्थव्यवस्था के लिए अहम होते हैं और उन्हें मदद की आवश्यकता होती है। भारत में 6 करोड़ से अधिक छोटे व्यवसाय हैं और लाखों लोग नौकरियों के लिए उन पर निर्भर हैं।
दरअसल, साल 2016 में जियो की लॉन्चिंग के बाद रिलायंस देश की एकमात्र ऐसी कंपनी के रूप में उभरी है, जो तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार में अमेरिकी तकनीकी समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है। रिलायंस ने मोबाइल टेलीकॉम से लेकर होम ब्रॉडबैंड तक हर चीज में तेजी से ई-कॉमर्स का विस्तार किया है।
वहीं भारत भी फेसबुक और उसके मैसेजिंग प्लेटफॉर्म वॉट्सऐप के लिए एक बड़ा मार्केट है। भारत में फेसबुक के 400 मिलियन यूजर्स हैं। इतना ही नहीं फेसबुक और व्हाट्सएप का इस्तेमाल भारत के बड़े हिस्से में किया जाता है। साथ ही, भारत इस समय एक बड़े डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के दौर में है। जियो इस समय करोड़ों भारतीय और छोटे बिजनेसमैन के लिए कारोबार आसान करने में मदद कर रहा है। कंसल्टेंसी पीडब्ल्यूसी के अनुसार, भारत में साल 2022 में इंटरनेट यूजर्स की संख्या बढ़कर 850 मिलियन होने की उम्मीद है।
कोरोना वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए भारत के प्रयासों की दुनियाभर में सराहना हो रही है। इसने पूरी दुनिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख और मजबूत की है। वे सबसे लोकप्रिय ग्लोबल लीडर हैं।
कोरोना से लड़ने के लिए अन्य देशों के मुकाबले भारत की नीति व प्रयास कई मायनों में अभूतपूर्व रहे हैं। इन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि 130 करोड़ की जनता वाले देश में ये संक्रमण व्यापक स्तर पर अब तक नहीं फैल पाया। लॉकाडउन जैसे फैसले यहाँ पर स्थिति बिगड़ने से पहले ही ले लिए गए। रोकथाम के उपायों पर भी खूब काम हुआ।
तबलीगी जमात से हॉट्सपॉट बनकर निकले नासूरों का पता लगने के बाद भी देशों ने खुद को बहुत स्तर तक इस महामारी के प्रकोप से बचाया। मगर, कुछ विरोधी फिर भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर उंगलियाँ उठाते रहे। अब इन्हीं सवालों का जवाब देते हुए एक पोल में दी गई रेटिंग आई है। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश के अन्य नेता से ज्यादा रेटिंग मिली है। इसे पोलस्टर मॉर्निंग कंसल्ट ने जारी किया है।
Amidst Coronavirus outbreak, PM Modi’s approval rating soars to 68%, higher than any other world leader: Here are the detailshttps://t.co/84IPjyUXvM
इस रेटिंग के मुताबिक भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सबसे अधिक है। जानकारी के अनुसार, साल की शुरुआत में नरेंद्र मोदी की रेटिंग 62% थी जो 14 अप्रैल तक बढ़कर 68% हो गई थी। मोदी के बाद दूसरे नंबर पर मेक्सिको के प्रेसिडेंट एंड्रेस मैनुअल लोपेज ओबराडोर हैं। जनवरी में उनकी रेटिंग 39% थी। उसके बाद थोड़ी गिरावट के साथ 36% पर पहुँच गई है। बावजूद इसके वे दूसरे नंबर पर हैं। लोकप्रियता में सबसे अधिक बढ़त देखने ऑस्ट्रेलियन प्राइम मिनिस्टर स्कॉट मॉरिसन की रेटिंग में देखने को मिली है। साल की शुरुआत में ये -26 थी जो अब 26 तक पहुँच गई है।
मॉर्निंग कंसल्ट के डेटा से पता चलता है कि सर्वे किए गए सभी दस देशों में, जापान के पीएम शिंजो आबे की अप्रुवल रेटिंग सबसे कम है (-33 पर), और नेट अप्रुवल में भी ये सबसे खराब गिरावट है। ग्राफ को यदि देखें तो नीली रेखा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रुवल रेटिंग को दर्शाती है और इसका लगातार सबसे ऊपर बने रहना बताता है कि पीएम मोदी इस मामले में किसी भी विश्व के अन्य नेता से ऊपर उठ गए हैं।
दिलचस्प यह है कि केवल कोरोना महामारी के बीच ही नहीं बल्कि साल की शुरुआत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेट अप्रुवल रेटिंग 62% के साथ सबसे ऊपर बनी हुई थी। मगर अब उनकी ये रेटिंग 68 पहुँचने के बाद उन्हें नेताओं से काफी बढ़त मिली है।
गौरतलब है कि अप्रैल 14 को देश की स्थिति को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन बढ़ाने का फैसला किया था। हालाँकि ये घोषणा करते हुए उन्होंने ये भी कहा था कि 20 अप्रैल तक हर एरिया हर क्षेत्र, हर नगर, हर राज्य पर सख्ती से निगरानी की जाएगी और फिर तय किया जाएगा कि जहाँ पर भी स्थिति सुधरी है वहाँ पर छूट दें। बता दें, 22 अप्रैल तक जो संक्रमितों की संख्या 15, 122 तक पहुँच गई है। वो संख्या 20 अप्रैल तक देश में 14, 175 पहुँच चुकी थी। जिसे देखते हुए कई राज्यों ने अपने यहाँ लॉकडाउन को बढ़ाए रखने का फैसला किए रखा।
अक्टूबर क्रांति के फलस्वरूप 1917 में विश्व में पहली बार लाशों के ढेर पर एक ऐसी शासन व्यवस्था का सृजन हुआ, जो पूर्ण रूप से नास्तिक प्रकृति की और कार्ल मार्क्स के विचारों के विचारों की ही परिणति थी। इसके पीछे प्रमुख व्यक्ति था सोवियत समाजवादी गणराज्य का वास्तुकार, रूसी साम्यवादी पार्टी का संस्थापक, बोल्शेविक क्रांति का प्रमुख नेता और महान नरसंहारक साम्यवादी व्लादिमीर लेनिन! आज सर्वहारा क्रांति के नायक कहे जाने वाले व्लादिमीर लेनिन का 150वाँ जन्मदिन है।
एक ओर जहाँ समाज का बड़ा वर्ग लेनिन-वाद (Leninism) से सदियों से अनुप्राणित रहा, वहीं वह लेनिन के उस ऐतिहासिक विप्लव (Revolution) के सच को नकारता ही आया है, जो लाखों बेगुनाहों की मौत की विभीषिका का आधार बनी। लेकिन फिर साम्यवाद (Communism) की पहली शर्त भी तो यही है, अर्थात – नकारना, अस्वीकरण और सत्य से विमुख रहने की कला ही साम्यवाद है।
व्लादिमीर लेनिन महज सोलह साल का था जब उसके पिता की मृत्यु ने उसे नास्तिक बना दिया। रही-सही कसर निर्वासन के दौरान पढ़े हुए कार्ल मार्क्स के मार्क्सवाद ने पूरी की। लेकिन इस बीच जिस एक बात ने उसे जारशाही के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा दी, वह थी ज़ार अलेक्जेंडर तृतीय (Tsar-The Russian monarch Alexander III) को मारने की योजना में शामिल उसके बड़े भाई साशा (Sacha) को दी गई फाँसी की सजा।
सवाल व्लादिमीर इलिच उल्यानोवा के एक ‘वाद’ (-ism) बन जाने तक के सफर मात्र का नहीं है, बल्कि प्रमुख सवाल यह है कि यदि यह लाखों लोगों की लाशों को जरिया बनाकर अपनी सनक को साकार रूप देने वाला लेनिन ना होता, तो भारत जैसे देश में आज खुद को वामपंथ का सिपहसलार बताने वाले कहाँ होते?
यह सीधा सवाल इस वामपंथी विचारधारा की अर्थी ढो रहे उन लोगों के अस्तित्व पर ही है, जिन्होंने महज दक्षिणपंथ और सत्ता के विरोध के लिए खुद को हत्यारे लेनिन और तानाशाह स्टालिन का वंशज होना तक स्वीकार कर लिया है। और यह हो भी क्यों नहीं? क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि यह वामपंथी समुदाय आरम्भ से ही अपनी वस्तुस्थिति को समझ पाने में आज तक सफल नहीं रहा है, फिर भी इसने मानो बाकी सभी विचारधाराओं को लाइसेंस वितरण की जिम्मेदारी अपने सर पर उठाई हुई है।
सर्वहारा और शासन में से शासन को चुनता आया है वामपंथ
वामपंथियों के पास आज के समय में भी खुद को प्रासंगिक बनाए रखने और अपने अस्तित्व को तर्कसंगत साबित करने का बस एक ही बहाना रहा है और वो ये कि इन्होंने खुद को हमेशा किसानों, मजदूरों (सर्वहारा) का शुभचिन्तक होने का मुखौटा ओढ़े रखा। लेकिन क्या खुद वामपंथी उस समय को भूल गए हैं जब जारशाही का निर्मम दमन कर वहाँ विरोधियों की लाशों के ढेर पर विश्व की पहली साम्यवादी सरकार के गठन के बाद रूस में छिड़े गृह युद्ध में उन्हीं किसानों को ख़त्म कर देने का ऐलान किया गया।
फासीवाद का ही व्यापक स्वरुप है लेनिनवाद
कम्युनिस्ट लेनिन की प्राथमिकता शासन थी या सर्वहारा? सत्ता की भूख में लेनिन एक ऐसा नेता बनकर उभरा, जिसने रूस की एक तानाशाही को खत्म करने के लिए खुद को एक क्रूर तानाशाह बना लिया। यहाँ तक कि अपने जीवन के अंतिम समय में वो सत्ता के नौकरशाही का चोला ओढ़ने को लेकर परेशान रहा और जोसफ़ स्टालिन की बढ़ती ताक़त को लेकर भी वह चिंता जताता देखा गया। हालाँकि बाद में स्टालिन ही लेनिन का उत्तराधिकारी बना और उसने भी तानाशाही का ही मॉडल अपनाया।
ऐसे कई प्रमाण हैं जिनसे पता चलता है कि जिस हिटलर को आज के नव-बुद्धिजीवी लेनिन-वादी कॉमरेड फ़ासिस्ट बताते नहीं थकते, उसी फ़ासिस्ट हिटलर की तरह ही लेनिन-वादियों के मसीहा लेनिन ने अपनी सेना को मजबूत करने का काम किया। लेनिन अपनी साम्यवादी तानाशाही को सिर्फ रूस तक ही सीमित नहीं रखना चाहता था बल्कि उसका ख्वाब पूरे यूरोप में इसका प्रसार करना था।
सेना में जबरन नौजवानों और कृषकों को भर्ती किया जाने लगा। किसानों से उनकी फसलों और अनाजों को देश के नाम पर सेना का पेट भरने के लिए छीन लिया गया। परिणाम यह हुआ कि इससे एक बड़ी तादाद में रूसी लोग भूख से मरने लगे और रूस की अर्थव्यवस्था तबाह होती गई।
Red Terror : क्रांति और बोल्शेविकों का लाल आतंक
निर्वासन के बाद रूसी क्रांति के वक्त 1917 में लेनिन के वापस लौटने के बाद रूस तीन साल तक गृहयुद्ध की आग में जला। आखिरकार बोल्शेविक जीते और सारे देश का नियंत्रण हासिल कर लिया। जुलाई, 1918 में बोल्शेविकों ने जार निकोलस द्वितीय को उसकी पत्नी और पाँच बच्चों के साथ फाँसी दे दी। क्रांति के बाद रूस में गृह युद्ध एक बड़ी समस्या बनकर उभरा। सिविल वॉर वहाँ की ‘रेड आर्मी’ और ‘व्हाइट आर्मी’ के बीच था।
रेड आर्मी बोल्शेविक तर्ज के समाजवाद के लिए लड़ रही थी, जबकि व्हाइट आर्मी समाजवाद के विकल्प के रूप में पूँजीवाद, राजशाही के लिए लड़ रही थी। 1920 में बोल्शेविकों ने लेनिन के नेतृत्व में विरोधियों को हरा दिया और 1922 में यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (यूएसएसआर) की स्थापना हुई।
जब रूस में छिड़े गृहयुद्ध के दौरान लेनिन के सामने शासन और सर्वहारा में से किसी एक को चुनने का समय आया, तब उसने सर्वहारा में ही जार को देखा। कहा गया कि दूसरी क्रांति पहली क्रांति की रक्षा के लिए हुई। लेनिन ने किसानों को अपनी सेना में शामिल होने के लिए मजबूर किया और उसके सैनिक भूखे ना रहें, यह सुनिश्चित करने के लिए उसने किसानों से उनका भोजन भी हड़प लिया।
गृहयुद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था का बहुत कुछ नष्ट कर दिया और लाखों लोग भूख से मर गए। रूस की क्रांति को उस वक्त झटका लगा, जब मार्च, 1918 में वामपंथी पार्टी ने ब्रेस्ट-लिटोवस्क समझौते का विरोध करते हुए बोल्शेविकों से अलग होने का निर्णय लिया। इसके बाद जुलाई से गृह युद्ध की शुरुआत हो गई। इस बारे में इतिहासकार मोशे लेविन कहते हैं कि वर्ष 1914 से 1921 के बीच रूस में जो हुआ, उसका नुकसान रूस को लंबे समय तक उठाना पड़ा।
नरसंहारक बोल्शेविक
लेनिन अपने विरोधियों को किसी भी कीमत पर कुचल देना चाहता था। इसका एक नमूना वह बोल्शेविक क्रांति के दौरान पेश कर चुका था और सत्ता हथियाने के बाद भी वह ऐसा करने से चूकने वाले नहीं था। लेनिन की ओर से रूस की सुरक्षा एजेंसियों ने उसका विरोध करने वाले हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा।
कम्युनिजम-किसान-मजदूर का नारा और कैपिटलिज्म यानी पूँजीवाद की धुर विरोधी सोच वाली बोल्शेविकों की सरकार बनते ही रूस में नरसंहार का खूनी खेल शुरू हो गया। जारशाही से मुक्ति का आह्वान कर सर्वहारा की बलि देकर अब उसी सर्वहारा के लिए कम्युनिस्ट लेनिन एक क्रूर और निर्दयी शासक बन चुका था। उसकी शासन व्यवस्था और उसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज की उसके इशारे पर हत्या कर दी जाने लगी।
इस तरह से रेड टेरेरिज्म यानी, लाल आतंक की शुरुआत रूसी क्रांति के साथ ही सन 1917 से हुई और यह तब तक चला जब तक कि बोल्शेविकों के विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को दबा नहीं दिया गया। लेनिन के राज्य में विरोधियों को रेड-टेरर का सामना करना पड़ा, ये वो हिंसक अभियान था। जो लेनिन की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चलाए गए। लाल सेना के साथ ही लेनिन की सरकार से समर्थन प्राप्त बोल्शेविकों की एक गुप्त पुलिस ‘चेका’ द्वारा इस कार्य को अंजाम दिया गया।
लेनिन ने अगस्त 09, 1918 को सार्वजनिक रूप से 100 विरोधियों को फाँसी देने का हुक्म भी दिया। इसके कुछ माह बाद ही चेका पुलिस ने सोशल रिवॉल्यूशनरी पार्टी के 800 सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया और हजारों को मजदूरी कैंपों में भेज दिया गया। हज़ारों लोगों को प्रताड़ना दी गई। वर्ष 1917-1922 के बीच लेनिन की सरकार ने रूसी गृहयुद्ध में दक्षिणपंथी और वामपंथी बोल्शेविक-विरोधी सेनाओं का भी निर्मम दमन किया।
लाल आतंक (1918-22) के दौरान 2,00,000 लोग मारे गए। अकाल और Dekulakization (Dekulakization राजनीतिक दमन का सोवियत अभियान था, जिसमें पहली पंचवर्षीय योजना, 1929-1932 की अवधि में समृद्ध किसान और उनके परिवारों के लाखों लोगों की गिरफ्तारी, निर्वासन सहित फाँसी दी गई। ये वो कृषक थे जिन्होंने बोल्शेविकों को जबरन अनाज देने से मना कर दिया था। लेनिन ने इन किसानों को रक्त चूसने वाले प्रेतों की संज्ञा दी थी) से 11 मिलियन लोग मारे गए। वहीं 7,00,000 लोग 1937-38 के दौरान लाल आतंकियों द्वारा मार दिए गए। 1929 और 1953 के बीच 4,00,000 अधिक मौत के घाट उतार दिए गए, जबकि जबरन जनसंख्या हस्तांतरण के दौरान 1.6 मिलियन लोग मरे और गुलाग, श्रम कालोनियों और उनके बंदोबस्त में कम से कम 2.7 मिलियन लोगों ने अपनी जान गॅंवाई।
इस प्रकार युद्धरत साम्यवाद के तले दशकों तक एक बड़े पैमाने पर निर्मम हत्या का तांडव जारी रहा और कुल मिलाकर, 20,000,000 सोवियत नागरिकों को शासन द्वारा मार दिया गया, या उनकी दमनकारी नीतियों के प्रत्यक्ष परिणामस्वरुप वो मारे गए। उल्लेखनीय है कि इस आँकड़े में वे मौतें शामिल नहीं हैं, जो या तो सैनिक के रूप में मरे या फिर बोल्शेविकों द्वारा मार दिए गए।
सन 1920 तक बोल्शेविकों का रेड-टेरर भयावह शक्ल ले चुका था। ख़ुफ़िया एजेंसी ‘चेका’ में लगभग 2 लाख बोल्शेविक भर्ती हो गए, जिन्होंने विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया। विरोधियों को यातना दी और सरेआम फाँसी पर लटकाया जाने लगा। लेनिन के शासन ने ‘चेका’ को खुली छुट दी थी, ये पूर्ण रूप से लाल आतंकी थे।
इस चेका पुलिस को साम्यवादी सरकार द्वारा सिर्फ एक ही निर्देश दिया गया था- वह ये कि हर विरोधी आवाज को किसी भी तरह से बंद करना! तात्पर्य अंततः यही निकलता है कि वामपंथ और कुछ नहीं बल्कि सत्ता के लिए फासीवाद का ही एक अपेक्षाकृत अधिक विनाशक तन्त्र है।
और एक बात यह कि क्या ये कैम्प द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर के होलोकॉस्ट (The Holocaust) से मेल नहीं खाते? क्या भारत में नागरिकता कानून (CAA) के विरोध में जब भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग यानी नव-वामपंथी डिटेंशन कैम्प की तुलना होलोकॉस्ट से कर रहे थे, तब उनकी कल्पना में लेनिन का यही कैम्प था?
लेनिन ने नरसंहार के बाद बताया था पूंजीवाद को आवश्यक
रूस में विरोधियों का खात्मा करने के बाद वहाँ जो भुखमरी फैली उसने घोर निराशा को जन्म दिया। सर्वहारा के दमन के बाद ‘सर्वहारा का मसीहा’ यही लेनिन एक बार फिर अपने शब्दों और पाखंड की विचारधारा का खुद ही उपहास करता नजर आया। उसने गरीबी, भुखमरी और रसातल में जा चुकी अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए नई आर्थिक नीतियों के ज़रिए हालात उलटने की कोशिश की।
एक समय युद्ध को अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद का प्राकृतिक प्रतिफल बताने वाले लेनिन ने गृहयुद्ध के बाद पूँजीवाद का ही समर्थन किया। जब रूसी अर्थव्यवस्था को सोशलिस्ट मॉडल के हिसाब से बदलने की उनकी कोशिशें थम गईं, तो लेनिन ने नई आर्थिक नीति का ऐलान किया, जिसमें प्राइवेट एंटरप्राइज़ को एक बार फिर इजाज़त दी गई और ये नीति उनकी मौत के कई साल बाद भी जारी रहीं।
वामपंथ का भारत में संघर्ष
आज हम सब यह जानते हैं कि कपटी कम्युनिस्टों ने वामपंथ के निकृष्ट अध्याय पर पर्दा डालने के लिए और इस विचारधारा को जायज ठहराने के लिए हर प्रकार का दुराग्रह किया है और इसके समर्थन में सबूत जुटाने के प्रयास किए हैं । कभी ये कहते नजर आते हैं कि भगत सिंह लेनिन के विचारों से ही क्रांतिकारी बने थे और कभी कहे जाते हैं कि यह आज के समाज की भी जरूरत है। जबकि खुद को लिबरल बताने की आड़ में आज इनका पहला संघर्ष सिर्फ और सिर्फ दक्षिणपंथ के अस्तित्व को नकारने तक सीमित हो गया है। वामपंथियों की पूरी ऊर्जा सिर्फ विरोधी विचारधारा को छोटा साबित करने की या फिर उन्हें ‘भक्त’ कहने में खर्च हुई जाती है।
सर्वहारा के मसीहा लेनिन के नाम पर मॉस्को के राज्य ऐतिहासिक संग्रहालय कुछ ऐसा है जो बुर्जुआ वर्ग के वाहनों के कुछ अंतिम उदाहरणों में से एक है- एक रोल्स रॉयस कार, सिल्वर घोस्ट मॉडल!
कम्युनिस्ट लेनिन सिर्फ एक पर ही नहीं रुका। उसके पास ऐसी कुल 9 रोल्स रॉयस कार थीं। यानी, जब रूसी किसान और सर्वहारा पूरे रूस में भूख से मर रहे थे, लेनिन ने अपनी लग्जरी कार में घूम-घूमकर लोगों को कम्युनिस्ट नीतियों के बारे उपदेश दिया। यानी, एक आकर्षक, पूँजीवादी, महँगी, बुर्जुआ रोल्स रॉयस में। क्या लेनिन का यही शगल आजकल के भारतीय स्वघोषित लेफ्ट-उदारवादियों की भी हकीकत से मेल नहीं खाती है?
यह ठीक उसी तरह से है जिस तरह से आज का वामपंथी कॉमरेड तमाम पूँजीवादी संस्थाओं का लाभ लेकर पूँजीवादी व्यवस्थाओं को कोसकर बुद्धिजीवी बना बैठा है। वह कहीं से भी सर्वहारा और कृषक वर्ग का हितैषी नजर नहीं आता, वह अभिजात्यता का दास है, फिर भी कहता है कि उसकी क्रांति का मूल सर्वहारा का विप्लव है।
बुतों को तोड़ने की कविता गाने वाले आज लेनिन के बुतों के उपासक हैं। जो धर्म को अफीम बताते हैं उन्होंने लेनिन को धर्म बना दिया। उसके मृत शरीर के चर्म को जीवित रखने के लिए लेनिन का ममी बन चुका शरीर मॉस्को के लाल चौक पर बने मकबरे में कैद हैं। वामपंथ की विचारधारा एक फूहड़ चुटकुले से अधिक कुछ भी नहीं हैं।
मॉस्को में लेनिन के शरीर को रसायनों की मदद से ममी बनाकर सुरक्षित रखा गया है
सनकी व्लादिमीर लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति के दम पर सर्वहारा यानी, कृषकों, श्रमिकों और गरीबों की लाशों के ढेर के ऊपर अपनी साम्यवादी सरकार बनाई। नव-उदारवादी और कम्युनिस्टों के लिए यह बेशक एक उपाधि हो सकती है कि लेनिन के हाथ मासूम लोगों के खून से रंगे हुए थे। उसकी विचारधारा का एकमात्र उदेश्य हर वामपंथी की तरह ही किसी भी हाल में राजनीतिक द्वंद्व में सबसे ऊपर वाली श्रेणी में स्वयं को प्रतिष्ठित करना था। फिर चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़ती, और उसने ऐसा किया भी।
सर्वहारा के ये तथाकथित ‘चिंतक’ और ‘विचारक’ कोरोना की महामारी के दौरान भी नंगे ही नजर आए हैं। इससे पहले जहाँ इनकी सुबहें सोशल मीडिया पर सत्ता के विरोध में प्रलाप और शाम इसी प्रपंच में समाप्त हो जाया करतीं थीं, यही सोशल मीडिया से पैदा हुई ‘वामपंथी विचारक जमात’ कोरोना के दौरान गरीब और बेसहारा लोगों की मदद के दौरान अपने बिलों में छुप गई। वहीं जिन लोगों को ये 2014 से ही ‘भक्त’ और अनपढ़ साबित करने का प्रयास करते नजर आते रहे, वही बेसहारा और जरुरतमंदों की पीड़ा से चिंतित दिखे और उनकी मदद कर रहे हैं।
यानी, वामपंथ की पहचान उसकी विरोध की प्रवृत्ति तक ही सीमित है। सिर्फ समय बदला है, लेकिन मूल में वही है। लेनिन से लेकर आज के जेएनयू के कॉमेरड और खुद को पत्रकारिता के प्रहरी बताने वाले वामपंथी, असल में सत्ता पिपासु हैं। विपरीत विचारधारा का उभार वे तब भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, आज भी नहीं कर पाते।
इन दिनों पाकिस्तान कोरोना महामारी के साथ कुछ कट्टरपंथियों की मनमानी से जूझ रहा है। इस बीच अब खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पर कोरोना का खतरा मँडराने लगा है। दरअसल, पिछले दिनों पाक पीएम को मोटी रकम का चेक सौंपने वाले एक युवक को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। पाक पीएम ने उक्त व्यक्ति के हाथों से अपने हाथ चेक लिया था।
Social worker and head of Edhi Foundation, Faisal Edhi recently met PM Imran Khan: Courtesy Pakistan’s GEO News pic.twitter.com/wU1pPG6RUd
पीएम इमरान खान से मुलाकात करने वाले शख्स के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद से ही पूरे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है। एक तरफ तो पीड़ित सहित उसके पूरे परिवार को क्वारंटाइन कर दिया गया है तो वहीं अब पीएम इमरान खान डॉक्टरी सलाह लेते घूम रहे हैं। एधी की रिपोर्ट आने के बाद पाकिस्तानी हुक्कमरानों में खलबली मची हुई है और वो चाह रहे हैं कि इमरान खुद को जल्द से जल्द क्वारंटीन कर लें।
पाकिस्तानी अखबार डॉन न्यूज ने भी फैसल एधी के बेटे साद एधी के हवाले से बताया कि प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद घर लौटने पर फैसल एधी की तबियत ठीक नहीं रही। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद घर लौटने पर ही उनमें कुछ लक्षण दिखाई देने लगे थे। हालाँकि, तीन से चार दिन के बाद यह लक्षण कम होने लगे। इस बीच, कोरोना जाँच के लिए नमूना भेजा गया तो मंगलवार को आई रिपोर्ट में उनको कोरोना पॉजिटिव पाया गया।
वहीं बताया गया कि मुलाकात के दौरान इमरान ने फैसल एधी को पहचाना नहीं था। जब लोग उनसे मिलकर लौटने लगे तो एक व्यक्ति ने इमरान से कहा कि यह फैसल एधी हैं। इसके बाद इमरान ने दरवाजे के पास खड़े होकर फैसल से कुछ देर तक बात की थी।
खबर के मुताबिक सामाजिक कार्यकर्ता फैसल एधी ने पिछले हफ्ते 15 अप्रैल को प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात कर कोरोना वायरस राहत कोष के लिए एक करोड़ रुपये का चेक सौंपा था। दरअसल फैसल एधी एदी फाउंडेशन के चेयरमैन और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार के पुत्र हैं। इस फाउंडेशन की स्थापना दिवंगत अब्दुल सत्तार एधी ने ही की थी और यह प्रमुख परमार्थ संगठन है।
गौरतलब है कि एधी फाउंडेशन पाकिस्तान में एंबुलेंस सेवा का एक बड़ा नेटवर्क ऑपरेट करता है। बता दें कि पाकिस्तान में कोरोना वायरस संक्रमितों का आँकड़ा साढ़े नौ हजार से ज्यादा पहुँच चुकी है और करीब दो सौ लोगों की मौत हो चुकी है।
देश में जारी लॉकडाउन के बीच कोरोना योद्धा अपनी जान की परवाह किए बिना कोरोना के खिलाफ घरों से बाहर रहकर जंग लड़ रहे हैं। अब इनका कोई तो सम्मान कर रहा है तो कोई अपने तरीके से इन्हें अपमानित भी कर रहा है। कुछ ऐसा ही मामला बिहार से आया, जहाँ एक सरकारी अधिकारी को लॉकडाउन के बीच पुलिसकर्मी द्वारा रोके जाने पर पुलिसकर्मी को उठक-बैठक की सजा भुगतनी पड़ी।
In Bihar’s Araria, a homeguard was made to do sit-ups as punishment and beg for mercy after he stopped an agriculture officer, asked for pass and checked his car. What an honourable way to thank Corona-fighters! pic.twitter.com/8kICdUdNAg
दरअसल, एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें आप देख सकते हैं कि एक पुलिसकर्मी कुछ अधिकारियों के सामने उठक-बैठक करते हुए उनसे माफी माँग रहा है, लेकिन कुछ ही देर में वायरल वीडियो की सच्चाई सभी के सामने आ गई।
जानकारी के मुताबिक मामला सोमवार को बिहार अररिया के बैरगाछी चौक इलाके का है। यहाँ पुलिस के साथ चौकीदार के रूप में कार्य कर रहे गणेश तात्मा ने लॉकडाउन के दौरान कृषि पदाधिकारी मनोज कुमार की गाड़ी को चेकिंग के लिए रोक लिया। अपनी गाड़ी को रुकते देख कृषि विभाग से जुड़े अधिकारी मनोज कुमार आग बबूला हो गए।
इसके बाद अधिकारी ने पुलिसकर्मी को उठक-बैठक करने की सजा का फरमान सुना दिया। साथ ही धमकाते हुए उससे माफी माँगने की भी बात कही। चौंकाने वाली बात यह है कि मौके पर मौजूद पुलिस के आला अधिकारी ने भी मनोज कुमार का समर्थन करते हुए चौकीदार की जमकर क्लास लगाई और फिर से अधिकारी से माफी माँगने की बात कही।
इतना ही नहीं वीडियो में मनोज कुमार ने चौकीदार को डाँटते हुए कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की वजह से वह जल्दी में हैं वरना उन्हें रोकने के बदले चौकीदार को जेल भिजवा देते। खबर के मुताबिक वीडियो वायरल होने पर अररिया एसपी धूरत सयाली ने टीम गठित कर इस मामले की जाँच के आदेश दे दिए हैं।
दरअसल, पास में खड़े किसी सज्जन ने इस पूरी घटना का वीडियो बना लिया, जोकि कुछ ही देर में सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो गया। वीडियो में पुलिस की वर्दी पहने हुए आदमी कान पकड़कर उठक-बैठक लगा रहा है और फिर हाथ जोड़कर घुटनों के बल अधिकारी से माफी भी माँग रहा है।
वहीं इस बीच दूसरी खबर उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर से आई, जहाँ एक जिलाधिकारी को लॉकडाउन के दौरान रोकने पर डीएम ने पुलिसकर्मी को अपने ऑफिस बुलाकर सम्मानित किया। मामला रामपुर जिले का है, यहाँ जिलाधिकारी आञ्जनेय कुमार सिंह जब रात में बाइक से शहर का जायजा लेने के लिए निकले तो उन्हें एक सिपाही ने रोककर बाहर घूमने का कारण पूछा।
इसके बाद सिपाही ने डीएम को लॉकडाउन की अहमियत समझाई। आधी रात लॉकडाउन का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई और सजा क्या क्या हो सकती है ये भी बताया। सिपाही के समझाने के बाद डीएम साहब ने अपनी मोटर साइकिल पर सवार होकर वहाँ से चुपचाप निकल गए।
पुलिसकर्मी की सख्त ड्यूटी से खुश होकर रामपुर डीएम ने अगली सुबह को ही उसी मोहित नाम के सिपाही को कलेक्ट्रेट में बुलवा लिया, जिसने डीएम को रात में समझाया था। डीएम ने खुश होकर न सिर्फ शाबासी दी बल्कि उसे प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया और कहा कि असली और सच्चा तो सही मायने में सिपाही ही सरकारी मुलाजिम निकला, जिसने एलआईसी चौराहे पर मुझे रोक लिया। बाकायदा उसने मुझे लॉकडाउन की अहमियत समझाई।
एक तरफ तो पूरा देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है दूसरी ओर ऐसे समय में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अपनी पहचान के अनुरूप केन्द्र सरकार की नीतियों को विरोध करने से बाज नहीं आ रही हैं। इस बार कोरोना वायरस को लेकर केंद्र और बंगाल सरकार में फिर से ठन गई है। गृह मंत्रालय ने आरोप लगाया है कि राज्य में पहुँची इंटर-मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल टीमों (ICMTs) के साथ बंगाल प्रशासन सहयोग नहीं कर रहा है।
Union Home Secretary Ajay Bhalla writes to West Bengal Chief Secretary Rajiv Sinha. Letter states,”It has been brought to notice of this ministry that both IMCTs, at Kolkata & Jalpaiguri respectively, have not been provided with requisite cooperation by state & local authorities” pic.twitter.com/yukzKy32PU
केन्द्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा को पत्र लिखकर कहा कि मंत्रालय के ध्यान में लाया गया है कि कोलकाता और जलपाईगुड़ी में इंटर-मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल टीमों के लिए राज्य और स्थानीय प्रशासन की ओर से जरूरी सहयोग नहीं किया गया। इन टीमों को क्षेत्रों का दौरा करने, स्वास्थ्यकर्मियों से मिलने और जमीनी स्तर को जानने से रोका गया।
स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम के लिए देश में 3 मई तक जारी लॉकडाउन के कार्यान्वयन और कुछ क्षेत्रों में इसके उल्लंघन की खबरों के साथ कोविड 19 की स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में इंटर-मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल की टीमें भेजी गई हैं, वहीं केन्द्र सरकार को दूसरे राज्यों में तो सहयोग मिल रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से इन टीमों को विभिन्न लोकेशन पर जाने और जमीनी स्थिति का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा रही है।
दरअसल, इन टीमों के कार्यक्षेत्र में हॉटस्पॉट्स, हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर, आपदा प्रबंधन, राज्यों की सहायता, लॉकडाउन के नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करना, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन, हेल्थवर्कर्स की सुरक्षा और शेल्टर्स की स्थिति जैसे मुद्दों को देखना बताया गया।
इसके बाद मंगलवार को गृह मंत्रालय ने कहा कि केंद्रीय दलों को पश्चिम बंगाल में कार्य नहीं करने दिया जा रहा है। खबर के मुताबिक गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक और पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि राज्य सरकार केंद्रीय दलों को कोलकाता की विभिन्न लोकेशंस पर जाकर काम करने की अनुमति दे। पत्र में कहा गया कि यह केंद्र सरकार के डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 का उल्लंघन है और साथ ही सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करने जैसा है।
इससे पहले सोमवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर इसे एकपक्षीय बताया था और राज्य में दल भेजने पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इस तरह का कदम एकपक्षीय और अनपेक्षित है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से आकलन के लिए टीम द्वारा अपनाए जाने वाले वे आधार साझा करने को कहा था, जिनके बिना उनकी सरकार आगे कोई कदम नहीं उठा पाएगी।
#WATCH Inter-Ministerial Central Team visiting Kolkata&Jalpaiguri, West Bengal aren’t receiving cooperation from State govt&local administration. They’re being stopped from visiting the areas¬ being allowed make on-spot assessment of situation:Home Ministry pic.twitter.com/MgvwwKVt04
पालघर जिले के गडचिनचले गाँव में 2 साधुओं सहित 3 लोगों की भीड़ द्वारा मॉब लिंचिंग किए जाने की भयानक घटना के बाद इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के परिजनों ने भाजपा सरपंच चित्रा चौधरी को पुलिस से मिलीभगत के शक में कथित तौर पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपितों के परिजनों को शक है कि सरपंच ने ही मामले की जानकारी पुलिस को दी थी।
मुंबई से गुजरात जाते समय पालघर जिले में 200 लोगों की भीड़ ने एक अफवाह के आधार पर दो साधुओं सहित तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। मामले में पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए 110 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। जानकारी के मुताबिक इलाके में अफवाह थी कि वे लोग बच्चों की किडनी सहित अन्य अंगों की तस्करी के लिए बच्चों का अपहरण करते थे। लोकमत की रिपोर्ट के अनुसार गिरफ्तार किए गए लोगों के परिजनों ने तीन लोगों के हत्यारोपियों की पहचान पुलिस से साझा करने के संदेह में भाजपा सरपंच, उनके दो बच्चों के साथ उनके पति को भी जान से मारने की धमकी दी है।
दरअसल, खूनखराबे की इस घटना को 16 अप्रैल 2020 को महाराष्ट्र के पालघर में अंजाम दिया गया था। जूना अखाड़े से जुड़े दो साधु, 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरि महाराज और 35 वर्षीय सुशील गिरि महाराज अपने ड्राइवर 30 वर्षीय नीलेश तेलगड़े के साथ मुंबई से गुजरात के लिए एक अन्य साधु के अंतिम संस्कार में शामिल होने जा रहे थे। इसी बीच रास्ते में पड़ने वाले गड़चिनचले गाँव में, 100 से अधिक लोगों की भीड़ ने उन्हें चोर समझकर जानलेवा हमला कर दिया। पुलिस का दावा किया है कि जब पुलिस की टीम पीड़ित व्यक्ति को बचाने के लिए मौके पर पहुँची तो वह भी भीड़ के हमले का शिकार हो गई।
सोशल मीडिया पर वायरल पालघर की घटना के भयावह दृश्य, जिनमें 100 से अधिक लोगों की भीड़ दो साधुओं और उनके ड्राइवर को पीट-पीटकर हत्या कर दी, जबकि इस दौरान पुलिस हमलावरों के सामने मूकदर्शक बनकर खड़ी दिखाई दे रही है।
साधु समुदाय के लोगों का कहना है कि यह गाँव आदिवासि बाहुल्य गाँव है, जिनमें से अधिकांश ईसाई हैं, जबकि कुछ मुस्लिम हैं। कुछ साधुओं का कहना है कि पुलिस ने आदिवासियों के डर से साधुओं को भीड़ के हवाले कर दिया, जिन्होंने बाद में उन साधुओं की लाठियों से पीट-पीटकर हत्या कर दी। आरोप यह भी है कि जब एक विशेष धर्म के आदिवासियों द्वारा साधुओं की पिटाई की जा रही थी तब पुलिस ने इसका किसी भी तरह से विरोध नहीं किया।
एफआईआर के मुताबिक घटनास्थल पर पहुँची पुलिस टीम का नेतृत्व करने वाले सहायक पुलिस निरीक्षक आनंद राव काले का दावा है कि तीन लोगों की जान लेने पर उतारू 400-500 लोगों की भीड़ के सामने कम संख्या वाली पुलिस की टीम बेबस थी। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पीड़ितों को बचाने के लिए पहुँची पुलिस टीम पर भी भीड़ ने हमला किया था।
यहाँ तक कि जब पुलिस ने अपने वाहन में पीड़ितों को बिठाकर बचाने की कोशिश की तो भीड़ ने पुलिस वाहन को भी क्षतिग्रस्त कर दिया और तीनों लोगों पर लगातार पत्थर फेंकते रहे। वहीं आनंद राव काले ने इस दौरान 400-500 की भीड़ में से पाँच लोगों की पहचान की है, जिनका नाम एफआईआर में शामिल किया गया है, जो कि जयराम भावर (25), महेश सीताराम रावटे (19), गणेश देवजी राव (31), रामदास रूपजी असारे (27) और सुनील सोमजी रावटे (25) के रूप में हैं।
घटना में 400-500 लोगों की भीड़ के साथ ही इन पाँच लोगों पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 120 (बी), 427, 147, 148 और 149 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोनोवायरस के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान लोगों की भीड़ इकट्ठा होने के आरोप में आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 के तहत भी मामले दर्ज किया गया है
वैश्विक विपदा की इस घड़ी में जब टीवी के पास नए एपिसोड या घटनाक्रम नहीं हैं तो वो पुराने एपिसोड और डॉक्युमेंट्री दिखा रहे हैं। लोगों का घर में मन लगा रहे सो आजकल पुराने प्रचलित कार्यक्रम भी प्रसारित हो रहे हैं। न्यूज़ चैनल के पास भी अपनी समस्याएँ हैं। ऐसे में जो चैनल जितना अधिक प्रयास करता है वो उतना ही अधिक फूहड़ साबित हो रहा है। कई न्यूज़ ऐंकर तो बने रहने को ख़बरों की टोह में गुलाटियाँ भी मार रहे हैं आजकल। इन सबके बीच एक चैनल और उसके प्रसिद्ध ऐंकर न केवल दिनों दिन ख़ुद को फूहड़ साबित कर रहे हैं बल्कि वायरस सरीखे ख़तरनाक भी होते जा रहे हैं।
जी हाँ, रवीश कुमार अब एक राष्ट्रीय आपदा बनते जा रहे हैं। नि:संदेह एक बड़ा वर्ग इनका फ़ॉलोअर है लेकिन उस हुजूम को अब नियमित तौर पर सिर्फ़ ज़हर का प्रसाद बाँट रहे हैं रवीश। माना कि रवीश जी के पास पड़े संविधान की कॉपी में मीडिया द्वारा सरकार की खिंचाई मात्र अवश्यंभावी गुण लिखा होगा।
खिंचाई, आलोचना और सरकार की ख़ामियों को उजागर करना ही चौथे खम्भे का काम है, ये भी लिखा होगा उसमें। किंतु सरकार के ख़िलाफ़ भड़ास मात्र निकालना है, विपक्ष और अपने समर्थकों की टोली में ज़हर ही फैलाना है ये कहाँ लिखा है, मुझे नहीं पता।
समय के साथ साथ जोकर बनते जा रहे रवीश कुमार कहते हैं- झूठी मीडिया से बचिए। पता नहीं किस बात की आंतरिक ख़ुशी चेहरे पर लिए वो कहते हैं- सरकारें कोरोना के प्रति अपनी नाकामी छुपाने को नई कहानियाँ गढ़ती हैं। उनके ताज़े प्राइम टाइम की चर्चा चहुँओर है।
अपनी आदत के मुताबिक़ हमेशा नकारात्मक और विपरीत दिशा में बात करने वाले रवीश जी इस कार्यक्रम में चीन का स्तुति गान गा रहे हैं। जिस वायरस की बात पर आज सारा विश्व चीन पर उँगली उठा रहा है, उस वायरस पर रवीश जी चीन को क्लीन चिट भी दे रहे हैं और कुछ विजुअल्स भी दिखा रहे की देखिए सब कुछ सामान्य है यहाँ।
मासूम और दयनीय है चीन: प्राइम टाइम में खुलासा
मुझे नहीं पता यह किस लालच या विवशता में हुआ होगा किंतु वामपंथी भर होने के एवज़ में यह प्राइम टाइम न केवल चीन को मासूम और दयनीय हालत को झेलने वाला बता रहा है बल्कि उसे सबसे सक्षम महामानव भी बता रहे। रवीश जी के गैंग में से एक कथित वैश्विक एक्स्पर्ट न केवल वुहान से वायरस फैलने को सम्भावना कह रहे हैं बल्कि वुहान से 1100 किलोमीटर उत्तर में बसे बीजिंग की क्लिप दिखाकर वो स्थिति को सामान्य बता रहे। दुनिया को पता है कि चीन के अंदर वायरस का प्रकोप वुहान के अलावा और कहीं न के बराबर फैला। किंतु एक्स्पर्ट महोदय को इस पर कोई शंका नहीं हुई।
वायरस कहाँ से फैला, किसने फैलाया ये अभी तक जाँच का विषय है, इसके बग़ैर न तो किसी को क्लीन चिट दिया जाना ठीक है और न ही आरोप तय करना। अच्छा होता एक्स्पर्ट महोदय चीन द्वारा वायरस के प्रसार को रोकने में टेक्नॉलजी के इस्तेमाल पर कुछ कहते। अच्छा होता वो चीनी सरकार के ख़िलाफ़ उबल रहे ग़ुस्से पर बात करते। उन्होंने इस बात पर भी कोई बात नहीं कही की आख़िर क्यों WHO के द्वारा चीन में मरने वालों की संख्या अपडेट हुई? आख़िर क्यों चीन झूठे कन्जम्प्शन और प्रोडक्शन के डेटा दिखा रहा है दुनिया को?
मुझे समझ नहीं आता की आख़िर क्यों ये कामरेड रूपी पत्रकार ख़ुद को सेक्युलर और विश्व राजनीति का एक्स्पर्ट तो कहते हैं किंतु वो ‘उईघर’ की चिंता नहीं करते और न कभी ये कहते कि चीन में उइगरों को नमाज़ नहीं पढ़ने दिया जाता है। बल्कि चीन पर हो रहे इस बहस में भी इन लोगों को चिंता इस बात की होती रही कि यहाँ जमात के नाम पर क़ौम विशेष का नाम ख़राब किया जा रहा है।
कार्यक्रम में रवीश कुमार जी को हिंदुस्तान की झूठी पत्रकारिता पर रोना तो आ रहा है किंतु वो चीन में वायरस रिपोर्ट करने वाले रिपोर्टर के ग़ायब होने पर चुप रह जाते हैं। वो वहाँ होने वाले पत्रकारिता के नाटक पर कुछ नहीं कहते, जिसमें हर एक ख़बर सरकार के विशेष विभाग द्वारा फ़िल्टर होता है। भारत में पत्रकारिता की स्वघोषित मिसाल रवीश जी भारत में डॉक्टर पर हुए हमले पर अपने हिसाब की सही वजह ढूँढकर उसे जस्टिफ़ाय करने लगते हैं।
यहाँ तक कि साधुओं की हत्या पर भी वो एक लाइन कह कर हें हें हें करके निकल जाते हैं कि ये हत्या धोखे में हुई। पुलिस ने क्यों उन साधुओं को भीड़ के हवाले कर दिया ये सवाल भी वो सिर्फ़ इसलिए नहीं करते क्योंकि वहाँ भाजपा की सरकार नहीं है। बल्कि इस मामले में तो वो इसलिए ख़ुश हैं क्योंकि मामला अब तक मज़हबी साबित नहीं हुआ।
विषय पर वापस आते हुए हम चीन की बात करते हैं। जब किसी कार्यक्रम में हम चीन और कोरोना की बात करते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए की ताइवान ने WHO को 31 दिसम्बर को ईमेल के द्वारा चीन की त्रासदी के बारे में बताते हुए कुछ प्रश्न किए थे किंतु चीन के दवाब में उसका जवाब नहीं दिया गया। यदि चीन ख़ुद परेशान है तो फिर इस वैश्विक संकट में वो निष्पक्ष जाँच क्यों नहीं होने देता? एक्स्पर्ट और रविश जी को या तो विषय की जानकारी नहीं या फिर वो छुपा रहे हैं कि चीन ने अपने लैब में यह झूठ साबित किया है कि इटली और अमेरिका के वायरस की प्रजाति अलग और पुरानी है।
जो मोदी की तारीफ़ कर दे, वो सब रवीश कुमार की नज़र में बुरे
हालाँकि, ऐसा नहीं होगा क्योंकि अव्वल तो मैं उनकी महिमामंडन वाली मंडली का सदस्य नहीं हूँ, शक्ल से भी कामरेड नहीं लगता हूँ और फिर शाम के बाद नशे में डूब कर लम्बी लम्बी फेंकने का शौक़ भी नहीं है मुझे। रवीश कुमार जी ने इसी कार्यक्रम में एक लाइन में हिंदुस्तानी पत्रकारों के संक्रमण की बात भी की। उन्हें यह बात सिर्फ़ एक लाइन में इसलिए समाप्त करनी पड़ी क्योंकि ख़ुद वो पिछले लगभग एक महीने से घर से नहीं निकले हैं। क्योंकि, पत्रकार लॉबी अब उनसे जवाब माँगने लगी है कि अन्य निकायों में रोज़गार पर चिंता में दुबले होते रविश जी आख़िर क्यों अभी मीडिया में जाती नौकरी पर चुप हैं। आख़िर क्यों रवीश ख़ुद अपने चैनल में छोटे पत्रकारों की तनख़्वाह में देरी पर चुप हैं? क्या वो पत्रकारों के मामले में हैंडल करने का चीनी तरीक़ा अपना रहे हैं?
भड़ास निकालने की हद देखिए कि चूँकि ट्रम्प ने मोदी की तारीफ़ कर दी तो इसीलिए ट्रम्प की भी बुराई हो। कार्यक्रम में उपस्थित एक्स्पर्ट महोदय ट्रम्प पर अपनी ज़िम्मेवारी और असफलता से बचने को चीन पर आरोप लगाते हैं। आजकल बेरोज़गारी में अमेरिका की ख़बर अधिक दिखाने की होड़ में रविश जी अक्सर ये कहते हुए पाए गए की “न्यूयॉर्क के मेयर से सीखना चाहिए भारत के मुख्यमंत्रियों को, वो बहादुरी से रोज़ाना ट्रम्प से सवाल करते हैं। अपने यहाँ तो कोई प्रधानमंत्री को सवाल ही नहीं पूछता।”
भले मानस रवीश कुमार और उनके औंघाए विशेषज्ञ को थोड़ा पढ़ना चाहिए। ये लोग पत्रकारिता में 20 साल लगा आए लेकिन बस ऊपर-ऊपर या फिर अपने हित की बात करके निकल लेते हैं। अमेरिका की ख़बर को पढ़िए। वहाँ न्यूयॉर्क के मेयर को सबसे अधिक गाली पड़ रही है। और वो भी इस वजह से कि उसने राष्ट्रपति ट्रम्प के आदेश के बाद भी न्यूयॉर्क शहर में पाबंदियाँ लगाने में देरी की और उसी का परिणाम आज भुगत रहा है न्यूयॉर्क।
भाई, यदि कुछ विदेशी अख़बार पढ़कर आप लोग एक्स्पर्ट बन जाते हैं तो मैं आज से स्वयं को विदेश मामलों का पत्रकार घोषित करता हूँ। क्योंकि मैं अख़बार भी पढ़ता हूँ और इन जगहों के लोगों से कॉन्टैक्ट में भी हूँ। मैं वामपंथी नहीं हूँ और न ही कथित सेक्युलर ही, रवीश के महिमा मंडन में लम्बे आलेख भी नहीं लिख पाता हूँ और न ही क़ब्ज़ पीड़ित मुस्कान ला पाता हूँ चेहरे पर। किंतु दुष्कर देश चीन और पाकिस्तान के मित्र हैं सम्पर्क में, जो मुझे आपका झूठ पकड़ने में मदद कर जाते हैं। महोदय, आप अपने फ़ॉलोअर को बरगलाइए। वो उछल-उछल कर आपको वाह-वाह कहेंगे। बाकी, वो सब जो आपके छद्म अजेंडे को पहचान गए हैं वो आपकी खोल देंगे सर। और धनिया भी बो देंगे।