जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीजीपी दिलबाग सिंह ने आज (अप्रैल 22, 2020) मीडिया से बात करते हुए एक बड़ा खुलासा किया है। दिलबाग सिंह के अनुसार पाकिस्तानी आतंकी कैंपों में कोरोना संक्रमण फैल गया है। इसलिए अब पाकिस्तान इन्हीं कोरोना संंक्रमित आतंकियों को कश्मीर में भेजने का प्रयास कर रहा है जोकि चिंता की बात है।
डीजीपी दिलबाग सिंह ने यह खुलासा आज गंदेरबल में पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में बने कोरोना वार्ड के निरीक्षण के दौरान किया। दिलबाग सिंह ने बताया पाकिस्तान ने बड़ी संख्या में ऐसे आतंकियों को कश्मीर घाटी में भेजने की तैयारी कर ली है।
उन्होंने बताया कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि पाकिस्तान में आतंकी कैंपों में कोरोना फैल गया है। अब पाकिस्तान कोरोना के मरीज आतंकियों को भी एक्सपोर्ट करेगा और यहाँ लोगों में इन्फेक्शन फैलाएगा।
#WATCH “What we have heard is that till now, Pakistan used to export terrorists, now they will export coronavirus positive patients to infect people in Kashmir. It is a matter of concern,” says, Jammu and Kashmir DGP Dilbag Singh pic.twitter.com/lx90yErJKW
इससे पहले पिछले दिनों सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान से एक आतंकी के फोन को टेप किया था। जिसमें इस आतंकी ने दक्षिण कश्मीर में अपने परिवार से बात की थी। फोन में आतंकी ने इस बात का खुलासा किया था कि कैंप में कई आतंकी कोरोना का शिकार बन गए हैं। साथ ही पाकिस्तानी सेना उनकी कोई मदद नहीं कर रही है।
फोन कॉल में यह भी बताया गया था कि किस तरह ऐसे हालात में भी पाकिस्तानी सेना आतंकियों को दवा के बदले सिर्फ हथियार दे कर सरहद पार करने को कह रही है। मार्च महीने की शुरुआत से यदि देखें तो विभिन्न एनकाउंटर में सुरक्षा बलों ने बीस के करीब आतंकियों को मार गिराया है। जिन में 5 को सरहद पार करते हुए कुपवाड़ा में मार गिराया गया, लेकिन अभी तक किसी भी मारे गए आतंकी में कोरोना संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। इसके अलावा बीते सप्ताह किश्तवाड़ा में दो आतंकियों को मारा गया था।
बता दें, कश्मीर को लेकर इससे पहले खबर आई थी कि कश्मीर में दहशतगर्दी फैलाने के लिए वह जैश के आतंकियों को अफगानिस्तान में ट्रेनिंग दे रहा था। साथ ही वह कोरोना संक्रमितों की घुसपैठ कराने की भी फिराक में है।
गौरतलब है कि कोरोना महामारी के बीच इस खबर के अलावा ये भी सूचना है कि लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर का आतंकी संगठन और नक्सली भी फायदा उठाने में जुट गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार नक्सलियों से लेकर आतंकी संगठनों तक ने इसके लिए अपने स्लीपर सेल को सक्रिय करना शुरू कर दिया है।
कोरोना वायरस के चलते देश में जारी लॉकडाउन के बीच इन दिनों पश्चिम बंगाल में हो रहा राशन वितरण और उसमें बरती जा रही अनियमितताएँ राज्य सरकार की व्यवस्थाओं की पोल खोल रही हैं। आश्चर्य की बात यह कि अब इसके खिलाफ जो भी आवाज निकाल रहा है उसे ममता की पुलिस जमकर पीट रही है।
कुछ ऐसा ही मामला बुधवार को देखने को मिला। राशन वितरण में हो रही अनियमितताओं का जब स्थानीय लोगों ने विरोध किया तो उन्हें पुलिस की लाठियाँ खानी पड़ी। विरोध के चलते पुलिस और लोगों के बीच घंटों तक झड़पें होती रहीं। इस दौरान पुलिस ने लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। महिलाओं को भी नहीं छोड़ा।
दरअसल पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24 परगना के बदुरिया इलाके में बुधवार को राशन वितरण किया जा रहा था। इसी बीच स्थानीय लोगों ने राशन वितरण में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए प्रशासन के खिलाफ विरोध करना शुरू कर दिया। गुस्साए लोगों की भीड़ ने रास्ता जाम कर दिया। इस पर वहाँ मौजूद पुलिस ने आपत्ति जताई। कुछ ही देर में पुलिस और विरोध कर रहे लोगों के बीच तीखी झड़प शुरू हो गई।
इस बीच पुलिस ने विरोध कर रहे लोगों पर जमकर डंडे बरसाए। ANI द्वारा जारी वीडियो में आप देख सकते हैं कि कुछ पुलिसकर्मी विरोध कर रही एक महिला को डंडों से जमकर पीट रहे हैं। इस दौरान महिला खुद का बचाव करने की कोशिश कर रही है।
बदुरिया नगर पालिका वार्ड नंबर 9 से पार्षद अरित्रा घोष ने बताया कि दो दिन पहले ही हमने वहाँ प्रत्येक परिवार को राशन सामग्री दी थी। आज मुझे एक जानकारी मिली कि स्थानीय लोगों ने सड़क को अवरुद्ध कर दिया है और जब पुलिस वहाँ गई तो उन पर हमला किया गया। अब इस मामले की पुलिस जाँच कर रही है।
Day before yesterday we had given ration material to each family there. Today I got an info that locals have blocked the road &when Police went there they were attacked. Administration is looking into the matter now: Aritra Ghosh, Baduria Municipality Councillor of Ward no 9. pic.twitter.com/9K92HNIKfR
इससे पहले पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की कार्यशैली पर लॉकडाउन के बीच राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने सवाल उठाए थे। राज्यपाल ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि निशुल्क राशन गरीबों के लिए हैं, तिजोरियों में बंद करने के लिए नहीं है। धोखाधड़ी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। दरअसल, बंगाल के कई इलाकों में मुफ्त राशन वितरण में भारी अनियमितताएँ बरते जाने की खबरें सामने आई हैं।
वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राशन वितरण में गड़बड़ी को लेकर मिली कई शिकायतों के बाद तत्काल प्रभाव से राज्य के खाद्य आपूर्ति विभाग के प्रधान सचिव को हटा दिया था। उसके बाद भी कई जगहों पर अनियमितता के मामले सामने आ रहे हैं। विपक्षी दल खासकर भाजपा और माकपा निशुल्क राशन के राजनीतिक आवंटन का आरोप लगा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा, सत्ताधारी दल के लोगों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर कब्जा कर लिया है। पीडीएस एक बड़ा घोटाला बनती जा रही है। मुझे शक है कि यह अब तक सबसे बड़ा घोटाला भी हो सकता है। @KailashOnline@shalabhmanihttps://t.co/jOgdu3hk0q
डॉक्टरों और मेडिकल कर्मचारियों पर हो रहे हमलों पर अब केंद्र सरकार सख्त हो गई है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जानकारी दी है कि सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया है, जिसमें डॉक्टरों पर हमला करने वालों के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है। इसमें मेडिकल कर्मचारियों और आशा कर्मचारियों की भी सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। उन पर हमला करने वालों को 6 महीने से लेकर 7 साल तक के जेल की कड़ी सज़ा मिल सकती है।
साथ ही हमलावरों पर 5 लाख रुपए तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जो घटना की गंभीरता पर निर्भर होगा। हाल ही में डॉक्टरों पर लगातार हो रहे हमलों के कारण ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन’ भी नाराज़ था और इसके बैनर तले देश भर के मेडिकल कर्मचारियों ने प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आश्वासन के बाद आईएमए ने अपना विरोध प्रदर्शन ख़त्म किया। आईएमए लगातार माँग कर रहा था कि इसके लिए कोई कड़ा क़ानून बनाया जाए।
इसके लिए एसोसिएशन ने एक ‘वाइट अलर्ट’ जारी किया था, जिसके तहत इन हमलों के विरोध में 22 अप्रैल को कैंडल जला कर प्रदर्शन किया गया था। एसोसिएशन ने कहा कि ये अलर्ट एक तरह की वार्निंग है। मुरादाबाद सहित कई अन्य इलाक़ों में भी ऐसे ही डॉक्टरों ओर हमले किए गए थे। इंदौर में भी डॉक्टरों पर हमले हुए थे। डॉक्टरों ने कहा था कि अगर उनकी सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई तो फिर उनके पास घर में बैठने के अलावा क्या बच जाएगा?
If damage is done to the vehicles or clinics of healthcare workers, then a compensation amounting to twice the market value of the damaged property will be taken from the accused: Union Minister Prakash Javadekar pic.twitter.com/XOM6tDP5QA
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्द्धन ने अमित शाह के साथ मिल कर देश भर के कई डॉक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर बातचीत की और साथ ही उन्हें आश्वासन दिया। अब इसके बाद उनका विरोध प्रदर्शन भी ख़त्म हो गया है। मंत्रियों ने कहा कि डॉक्टरों की सुरक्षा और सम्मान करना सरकार का प्रमुख लक्ष्य है। हालाँकि, आईएमए के कई पूर्व अधिकारियों ने भी डॉक्टरों से अपील की थी कि वो ऐसा कुछ भी न करें, जिससे इस आपदा की घड़ी में देश की जनता के लिए दिक्कतें खड़ी हो।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक बार फिर पुलिस पर हमला किया गया है। हमला तब हुआ जब पुलिस लॉकडाउन का पालन कराने सब्जी मंडी भुजपुरा पहुॅंची थी।
यह इलाका मुस्लिम बहुल है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सब्जी मंडी के दुकानदारों ने पुलिस पर हमला बोल दिया। एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। घटना के बाद इलाके में बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स तैनात कर दिया गया है।
#WATCH Aligarh: A clash broke out between Police & a group of people in the city today. Circle Officer says, “Vegetable sellers were quarreling among themselves when shops were being closed. When Police intervened, people started pelting stones at them.” (Note: abusive language) pic.twitter.com/Dw9pTWeScH
जानकारी के मुताबिक भुजपुरा क्षेत्र में मौजूद सब्जी मंडी में बुधवार को लॉकडाउन के दौरान समय अवधि पूरी होने पर पुलिस की एक छोटी टीम दुकानें बंद कराने पहुँची थी। इसी बीच अचानक से दुकानदारों ने भीड़ के साथ मिलकर पुलिस टीम पर ईंट-पत्थरों से हमला कर दिया।
घटना की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स के साथ सीओ प्रथम तत्काल मौके पर पहुँचे। इसके बाद हालात पर काबू पाया गया। सीओ प्रथम विशाल पाण्डेय ने बताया कि अवधि पूर्ण होने के बाद सब्जी विक्रेता अपने घरों को जा रहे थे। इसी दौरान विक्रेताओं में आपस में किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया।
जब लेपर्ड कर्मियों ने सब्जी विक्रेताओं के झगड़े में हस्तक्षेप किया तो मौके का फायदा उठाकर भीड़ ने हमला कर दिया। हालाँकि अब पुलिस आरोपितों की पहचान के साथ मामले की जाँच में जुट गई है। सीओ के मुताबिक जल्द ही सभी आरोपितों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा।
इससे पहले दो अप्रैल को अलीगढ़ के रघुवीरपुरी पुलिस चौकी इलाके की एक मस्जिद में लॉकडाउन के बीच सामूहिक नमाज की सूचना पर पहुँची पुलिस टीम पर भीड़ ने हमला कर दिया था। छतों से की गई पत्थरबाजी में पुलिस को जान बचाकर भागना पड़ा था। बाद में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
दरअसल तीन दिन पहले पूरे अलीगढ़ जिले में कोरोना का एक भी मामला नहीं था, लेकिन सोमवार को जिले में कोरोना पॉजिटिव घोषित हुए उस्मानपाड़ा के 55 वर्षीय मरीज ने अचानक से दम तोड़ दिया। वहीं, मंगलवार को उसकी बेटी और बहनोई को रैपिड टेस्ट में कोरोना पॉजिटिव पाया गया। इसके बाद से ही जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जिले में एक बार फिर से सख्ती बढ़ा दी है।
महाराष्ट्र दो साधुओं सहित तीन लोगों की भीड़ द्वारा हुई निर्मम हत्या के मामले को न सिर्फ़ मीडिया बल्कि पालघर पुलिस ने भी दबाने की भरसक कोशिश की। अगर ऐसा नहीं होता तो घटना के तीन दिन बाद वीडियो वायरल होने पर पुलिस और प्रशासन हरकत में नहीं आता। पालघर पुलिस ने मॉब लिंचिंग को दबाने के लिए बार-बार बयान भी बदले।
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी तभी बयान दिया, जब इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और जनाक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा था। यहाँ हम आपको बताएँगे कि वीडियो वायरल होने से पहले पुलिस कैसे इस मामले को दबाने के लिए अलग-अलग बातें बोल रही थी।
16 अप्रैल को हुई इस निर्मम घटना में महाराज कल्पवृक्ष गिरी और सुशिल गिरी महाराज की हत्या कर दी गई थी। इस खबर को स्थानीय और अंग्रेजी मीडिया द्वारा कवर किया गया। लेकिन ‘चोरी के शक में हत्या’ वाले एंगल के कारण लोगों का इस पर ध्यान ही नहीं गया।
अप्रैल 18 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में एक ख़बर आई थी, जिसमें कासा पुलिस थाने के असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा था कि पुलिस ने पीड़ितों को बचाने की पूरी कोशिश की। लेकिन भीड़ उग्र और आक्रामक थी जिसकी वजह से पुलिस उन्हें बचा नहीं पाई। असिस्टेंट इंस्पेक्टर आनंदराव काले का कहना था कि भीड़ ने पुलिस पर भी हमला किया, पत्थरबाजी की।
हालाँकि, वीडियो में ठीक उसके उलट दृश्य दिख रहा है। पुलिस ने साधुओं को बचाने की कोई चेष्टा नहीं की। जब भीड़ ने उन साधुओं पर हमला किया तो आत्मरक्षा के लिए उन्होंने पुलिस का हाथ पकड़ा, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उनका हाथ झटक दिया।
अब ‘पीटीआई’ में प्रकाशित काले के बयान को देखते हैं। इसमें उन्होंने कहा था कि जब तक पुलिस घटनास्थल पर पहुँची, तब तक तीनों की हत्या हो चुकी थी और उनके शव वहाँ पर पड़े हुए थे। साथ ही कहा गया कि उनकी गाड़ी भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। ये दावा भी झूठा है, क्योंकि वीडियो में पुलिस वाले वहाँ पर मौजूद दिख रहे हैं।
Read this statement by an asst police inspector quoted by HT in a report two days ago. “The mob was strong and we tried to save the passengers but it also targeted us…”
वहीं ‘द हिन्दू’ में अलग ही किस्म की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इसमें कहा गया कि पुलिस जब वहाँ पहुँची तो सभी पीड़ित घायल अवस्था में वहाँ पड़े हुए थे। कासा पुलिस थाने ने कहा था कि जब उनकी पेट्रोलिंग गाड़ी वहाँ पर पहुँची तो पाया कि तीनों घायल अवस्था में पड़े हुए थे। फिर ग्रामीणों ने पुलिस की गाड़ी को घेर कर वहाँ पत्थरबाजी की, जिसके बाद जवानों को वहाँ से जान भगा कर भागना पड़ा। ये कासा थाने के हवाले से द हिन्दू ने कहा है।
मॉब लिंचिंग पर पालघर पुलिस के बार-बार बदलते बयान के बीच इस मामले की जाँच सीआईडी को सौंप दी गई है। महाराष्ट्र सरकार कह रही है कि आरोपितों में कोई भी मजहब विशेष से नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट में एक पीआईएल दाखिल कर अधिवक्ता अलख आलोक श्रीवास्तव ने पूरी घटना की सीबीआई जाँच कराने की माँग की है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने महाराष्ट्र के डीजीपी को एक नोटिस भेज कर पुलिसकर्मियों की असंवेदनशीलता पर जवाब-तलब किया है। अब तक 110 लोगों की गिरफ्तारी की ख़बर है, जिनमें से 101 आरोपितों को 30 अप्रैल तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
मॉब लिंचिंग के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के परिजनों ने भाजपा सरपंच चित्रा चौधरी को पुलिस से मिलीभगत के शक में कथित तौर पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपितों के परिजनों को शक है कि सरपंच ने ही मामले की जानकारी पुलिस को दी थी।
इस मामले को लेकर शिवसेना नेता विजय कृष्ण ने लाइव डिबेट के दौरान पार्टी से इस्तीफा देने का खुलासा किया। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को खुली चुनौती दी। उन्होंने कहा कि सरकार हिंदुओं को कलंकित कर रही है और वह अपने द्वारा दिए गए बयानों को लेकर गिरफ्तार होने के लिए भी तैयार हैं।
20 वर्षों से हिंदू रीति-रिवाज से जीवन यापन कर रहे हरियाणा के 6 मुस्लिम परिवारों ने बीते दिन एक घटना के बाद हिंदू धर्म में घर वापसी कर ली। डूम समाज से ताल्लुक रखने वाले 6 परिवारों के मुखिया ने कहा कि औरंगजेब के समय उनके पूर्वज हिंदू थे, जिन्होंने दवाब में आकर मुस्लिम धर्म को अपना लिया था, लेकिन आज हम सभी ने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म में वापसी की है।
कोरोना संकट में उन्मादियों का आतंक देख 6 मुस्लिम परिवारों ने छोड़ा इस्लाम,अपनाया हिन्दूधर्म।
हरियाणा राज्य के जींद जिले के 6 मुस्लिम परिवारों ने इस्लाम को छोड़कर अपने पूर्वजों के सनातन धर्म में घरवापसी की है।
जानकारी के मुताबिक हरियाणा जींद जिले के दनौदा गाँव में रहने वाले 6 मुस्लिम परिवारों के बुजुर्ग निक्काराम का चार दिन पूर्व (18 अप्रैल) को देहांत हो गया। मुस्लिम धर्म के अनुसार शव को दफन किया जाता है, लेकिन परिवार के सदस्यों ने शव का हिंदू रीति से दाह संस्कार किया। इसी के बाद पूरे परिवार ने हिंदू धर्म में वापसी की इच्छा जताई और फिर घर पर हवन यज्ञ करा जनेऊ पहनकर परिवार के सभी 35 सदस्यों ने फिर से हिंदू धर्म में वापसी कर ली।
जानकारी के मुताबिक डूम जाति से ताल्लुक रखने वाला परिवार पिछले करीब 20 सालों से हिंदू रीति रिवाजों का पालन कर रहा था। वह हर वर्ष अपने घरों में हिंदू त्यौहारों को ही मनाते हैं। इन्हीं परिवार से रमेश कुमार ने बताया कि उन्होंने कभी भी कोई धार्मिक कार्य मुस्लिम रीति रिवाज से नहीं किया है। इतना ही नहीं परिवार में उनका एक भाई प्रवीण आरएसएस से संबंध रखता है और कावड़ भी लाता है।
औरंगजेब के डर से हरियाणा में पूर्वजों ने अपनाया था इस्लाम
रमेश कुमार के अनुसार उन्होंने छह महीने पहले मकान बनाया था। तब भी घर में हवन करवाया था। अब कोरोना के चलते गाँव में लगने वाले ठीकरी पहरे व नाके पर सरपंच को बोलकर खुद हवन करवाया। इतना ही नहीं गाँव में डूम जाति के छह परिवारों में से चार के यहाँ मंदिर बने हुए हैं और परिवार में सभी के नाम हिंदू धर्म के हैं। उन्होंने बताया कि औरंगजेब के समय उनके पूर्वज हिंदू थे और दवाब के चलते पूर्वजों ने मुस्लिम धर्म को अपना लिया था, लेकिन अब शिक्षित परिवार के युवकों को इसका ज्ञान हुआ तो पूरे परिवार ने सहमति से बिना किसी दवाब में आकर हिंदू धर्म को अपना लिया।
जागरण में प्रकाशित खबर की कटिंग
रमेश ने वर्तमान हालाात पर अपना दुख प्रकट करते हुए कहा कि कहा कि आज पूरे विश्व के साथ-साथ देश भी कोरोना वायरस से जूझ रहा है। बचाव के लिए पूरे देश में लॉक डाउन लगा हुआ है, लेकिन कुछ लोग प्रधानमंत्री के आदेशों को दरकिनार करके जमात में शामिल हुए और फिर हजारों लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया। ऐसा करना मानव धर्म के खिलाफ है।
वहीं गाँव के सरपंच पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि डूम के परिवार के सदस्यों ने बिना किसी दबाव और अपनी इच्छा से हिंदू धर्म में वापसी की है। संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को अपना सकता है। इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं, बल्कि पूरे गाँव ने इनके इस फैसले का सम्मान किया है।
विश्व हिन्दू परिषद ने रखे थे धर्मान्तरण के बड़े आँकड़े
पिछले साल ही विश्व हिन्दू परिषद् ने भी जो स्वेच्छा से हिन्दू धर्म में वापस आना चाहते हैं उनका स्वागत करते हुए यह कहा था कि बड़े पैमाने पर इस्लाम और ईसाईयत में होने वाले मज़हबी मतांतरण देश पर भी एक हमला हैं, और देश के लोगों को बाँट देने की एक साजिश हैं। उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद की माँग है कि सरकार मज़हबी मतांतरण के खिलाफ एक कठोर कानून लेकर आए।
कोरोना वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए जब से लॉकडाउन हुआ है प्रवासी मजदूरों के फॅंसने की खबरें अलग-अलग शहरों से आती रही है। लेकिन, राजस्थान के सीकर में प्रवासी मजदूरों ने अपनी मेहनत से एक स्कूल का रूप ही बदल दिया है।
सीकर के पलसाना गॉंव के एक स्कूल में प्रवासी मजदूरों को क्वारंटाइन कर रखा गया था। पुताई कर प्रवासी मजदूरों ने इस इस स्कूल को नया रूप दे दिया है।
राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार पलसाना कस्बे के शहीद सीताराम कुमावत व सेठ केएल ताम्बी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। यहाँ इस समय हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के 54 मजदूर रखे गए हैं। मजदूरों के मुताबिक, वे मेहनतकश लोग हैं। खाली बैठने से बीमार हो जाते। इसलिए स्कूल की पुताई कर दी।
राजस्थान पत्रिका के सीकर संस्करण में प्रकाशित खबर
मजदूरों का कहना है कि गाँव के सरपंच और गाँव के भामाशाहों ने उनके रहने-खाने-पीने की इतनी अच्छी व्यवस्था की, जिसकी वे कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। बस इसी के बदले उनके मन में गाँव वालों के लिए कुछ करने की बात आई और उन्होंने स्कूल की पुताई शुरू कर दी।
खबर के मुताबिक उन्होंने बीते शुक्रवार को खुद पहल करके सरपंच से रंग-रोगन का सामान लाकर देने का कहा। इसके बाद सरपंच और विद्यालय स्टाफ की ओर से सामग्री उपलब्ध कराने के बाद मजदूरों ने अपना काम शुरू किया। इस दौरान शिविर का निरीक्षण करने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव जगत सिंह पँवार भी सेंटर पर पहुँचे। उन्होंने निरीक्षण के बाद सेंटर पर ठहरे लोगों से काफी देर तक बात की। वे इन प्रवासी मजदूरों को काम करता देख काफी खुश भी हुए। जगत सिंह पँवार ने कहा कि यहाँ के सरपंच, विद्यालय स्टाफ एवं भामाशाहों के साथ प्रवासी लोगों की ओर से एक परिवार की तरह किया जा रहा कार्य अन्य सेंटर्स के लिए रोल मॉडल है।
बता दें, जिस तरह गाँव वालों के सेवाभाव को देखकर सभी मजदूर बेहद खुश है, उसी तरह उनके इस काम को देखकर गाँव वाले भी मुग्ध हैं। पलसाना के सरपंच रूप सिंह शेखावत बताते है, प्रशासन की ओर से सेंटर स्थापित करने के बाद प्रवासी लोगों के भोजन पानी व ठहरने की जिम्मेदारी दी गई। अब प्रवासी लोगों ने खुद कार्य करने की इच्छा जताई, तो उन्हें पुताई के लिए सामान उपलब्ध करवा दिया गया। उनके इस व्यवहार से पूरा गाँव अभिभूत है।
स्कूल के प्रधानचार्य का कहना है कि पिछले 9 साल से रंग-रोगन का काम नहीं हुआ था। जब मजदूरों ने अपनी ओर से इच्छा व्यक्त की तो सभी शिक्षकों ने वेतन से सामग्री लाकर दी। इस काम के लिए मजदूरों ने भी पैसे लेने से मना कर दिया।
गौरतलब है कि जिस राजस्थान से ये सुखद खबरें आई हैं। उसी राजस्थान से बीते दिनों पुलिसकर्मियों पर हमले की खबर आई थी। जहाँ स्थानीयों द्वारा कोरोना योद्धाओं को बेहरमी से पीटा गया था। इस दौरान उनपर लाठी-डंडे और तलवार से हमला हुआ था।
मुरादाबाद में पिछले सप्ताह पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला करने वाले पाँच पत्थरबाजों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। इसकी जानकारी मिलते ही जेल प्रशासन के साथ पूरे जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया है। इसके बाद जेल और संबंधित थानों को सैनेटाइज करने का काम शुरू हो गया है। नागफनी थाने के सभी पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन कर दिया गया है। वहीं अब सैकड़ों पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन करने पर विचार किया जा रहा है।
मुरादाबाद के नवाबपुरा इलाके में 15 अप्रैल को सर्वे करने गई स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की टीम पर स्थानीय लोगों ने पत्थरबाजी कर दी थी। इसके आरोप में गिरफ्तार किए गए 17 लोगों को पुलिस ने जेल भेज दिया था। साथ ही सभी के सैंपल लेकर जाँच के लिए भेज दिए, लेकिन मंगलवार को आई रिपोर्ट में इन्ही में से पाँच पत्थरबाजों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया।
इसके बाद प्रशासन ने तत्काल पाँचों को जिला अस्पताल स्थित वार्ड में भर्ती करा दिया। उधर जेल के अन्य बंदियों को एक मॉडर्न पब्लिक स्कूल स्थित अस्थाई जेल में शिफ्ट करने की कार्रवाई की जा रही है। मंगलवार को आई जाँच रिपोर्ट में नवाबपुरा निवासी 5 पत्थरबाज महफूज अली, फहीम अहमद, सब्लू आजम, असद और दिल्ली निवासी कृष्णा कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। जेल प्रशासन ने इसकी पुष्टि की है।
जाँच रिपोर्ट सामने आते ही पुलिस प्रशासन के साथ पूरे जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया है। वहीं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जेल के साथ नागफनी थाने को भी सैनेटाइज किया है और नागफनी के सभी पुलिस स्टाफ को तत्काल क्वारंटाइन कर दिया गया है। वहीं शेष सैकड़ों पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन करने पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि जिस समय पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार किया था उस समय कई बड़े पुलिस अधिकारियों के साथ सौ से अधिक पुलिस फोर्स के जवान मौजूद थे।
गौरतलब है कि 15 अप्रैल को नागफनी थाना क्षेत्र के नवाबपुरा इलाके में स्वास्थ्य विभाग की टीम कोरोना वायरस की चपेट में आकर जान गँवाने वाले सरताज अली के करीबियों को क्वॉरंटाइन करने गई डॉक्टरों और पुलिस टीम पर लोगों ने पथराव कर दिया था। इस हमले में तीन डॉक्टर गंभीर रुप से घायल हो गए थे। मामले में तत्काल कार्रवाई करते हुए पुलिस ने 7 महिलाओं सहित 17 लोगों को गिरफ्तार कर दूसरे दिन जेल भेज दिया था।
वहीं डॉक्टरों और पुलिस टीम पर हमला करने के मामले में कारोबारी डिल्लन को मास्टर माइंड माना जा रहा है। इतना ही नहीं मामले का मास्टर माइंड अभी पुलिस की पकड़ से दूर है। इसे देखते हुए पुलिस ने डिल्लन के बारे में जानकारी देने वाले को इनाम देने की घोषणा कर दी है। पुलिस का कहना है कि डिल्लन का पूरा कुनबा मोस्ट वांटेड हो गया है, क्योंकि नवाबपुरा बवाल में कारोबारी डिल्लन के कुनबे ने ही लोगों को भड़काया था।
This is from Moradabad. People, you can identify with their cloth, started pelting stones on health workers n police. Watch till end to see what happened. pic.twitter.com/4ovqOgbozd
दरअसल, पूरा कुनबा पत्थरबाजी करते कैमरे में कैद पाया गया था। इससे पहले डिल्लन की पत्नी शमीम बेगम, बेटी शबनम को पुलिस मौके से गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, लेकिन बेटा शानू उर्फ सलीम, नदीम उर्फ राजू और खुद डिल्लन अन्य बवालियों के साथ फरार है।
महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की भीड़ ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी। लेकिन कॉन्ग्रेस चुप रही, क्योंकि राज्य में वह शिवसेना के साथ सत्ता में साझीदार है। इस मॉब लिंंचिंग पर चुप्पी को लेकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गॉंधी को घेरते हुए ‘रिपब्लिक टीवी’ के संस्थापक अर्नब गोस्वामी ने तीखे सवाल पूछे हैं।
अर्नब ने कहा कि इस मामले में मीडिया का रवैया काफ़ी पक्षतापूर्ण है। कोरोना वायरस पर तो सभी न्यूज़ चैनल कार्यक्रम कर रहे हैं। लेकिन साधुओं की मॉब लिंचिंग पर सारे के सारे मौन धारण किए हुए हैं। इस दौरान उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर भी निशाना साधा और उनसे सवाल पूछे।
अर्नब ने याद दिलाया कि देश की 80% जनसंख्या सनातन धर्म को मानती है। सनातनी है। वे साधुओं की क्रूरता से की गई हत्या से व्याकुल दिखे। अर्नब ने कहा कि आज भारत में हिन्दू होना और भगवा वस्त्र धारण करना पाप हो गया है।
मॉब लिंचिंग पर सोनिया गॉंधी को घेरते हुए उन्होंने पूछा कि अगर किसी मौलवी या किसी पादरी की इस तरह से हत्या की गई होती तो क्या मीडिया, सेक्युलर गैंग व राजनीतिक दल आज शांत होते? एक पैनलिस्ट ने जवाब दिया कि अगर ऐसा होता तो अब तक पता नहीं क्या-क्या जला दिया गया होता।
इसके बाद अर्नब ने पूछा कि अगर पादरियों की हत्या होती तो क्या ‘इटली वाली एंटोनिया माइनो’ चुप रहतीं? इस दौरान पैनल में ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ पर ठुमके लगाने वाले और ख़ुद को संभल स्थित कल्कि धाम का पीठाधीश्वर बताने वाले आचार्य प्रमोद कृष्णन भी मौजूद थे। वे कॉन्ग्रेस नेता भी हैं।
अर्नब ने उनसे कहा कि अगर किसी पादरी की हत्या होती तो आपकी पार्टी और आपकी पार्टी की ‘रोम से आई हुई, इटली वाली’ सोनिया गाँधी बिलकुल चुप नहीं रहतीं। अर्नब ने दावा किया कि मॉब लिंचिंग पर सोनिया गाँधी आज चुप हैं तो इसका मतलब है कि वो मन ही मन में खुश भी हैं। मॉब लिंचिंग पर सोनिया गॉंधी की चुप्पी को लेकर अर्नब ने कहा:
“सोनिया गाँधी तो खुश हैं। वो इटली में रिपोर्ट भेजेंगी कि देखो, जहाँ पर मैंने सरकार बनाई है, वहाँ पर हिन्दू संतों को मरवा रही हूँ। वहाँ से उन्हें वाहवाही मिलेगी। लोग कहेंगे कि वाह, सोनिया गाँधी ने अच्छा किया। इनलोगों को शर्म आनी चाहिए। क्या उन्हें लगता है कि हिन्दू चुप रहेंगे? आज प्रमोद कृष्णन को बता दिया जाना चाहिए कि क्या हिन्दू चुप रहेंगे? पूरा भारत भी यही पूछ रहा है। बोलने का समय आ गया है।”
बता दें कि अर्नब गोस्वामी ने हाल ही में एक लाइव शो के दौरान ही एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से त्यागपत्र दे दिया था। अर्नब ने अपने इस्तीफे के लिए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के गिरते हुए मूल्यों को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने व्यक्तिगत पूर्वग्रहों के लिए नैतिकता से समझौता किया है। उन्होंने कहा कि वह काफी लंबे वक्त से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्य हैं। लेकिन अब यह मात्र कुछ लोगों का समूह है, जिनमें फेक खबरों को फेक कहने का दम नहीं है।
विश्व भर में कोरोना के मद्देनजर लागू लॉकडाउन के बावजूद संक्रमण के आँकड़ों में इजाफा देखा जा रहा है। इसके साथ घरेलू हिंसा के आँकड़ों में वृद्धि एक व्यापक समस्या बनकर सुर्खियों में आई है। भारत, ब्राजील, चीन के अलावा यूके, यूएस और फ्रांस में भी इस बीच घरेलू हिंसा के मामलों में उछाल देखने को मिला है।
भारत की राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस संबंध में जानकारी देते हुए पिछले दिनों भी कहा है कि लॉकडाउन के बाद मामलों में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। इस साल 27 फरवरी से 22 मार्च तक यह आँकड़ा 397 था। 23 मार्च से अप्रैल 16 के बीच यह बढ़कर 587 हो गया। WHO ने भी वैश्विक स्थिति देखते हुए इस मामले पर कॉन्फ्रेंस कर हर देश से उपयुक्त कदम उठाने को कहा है।
अब हालाँकि, कुछ लोग लॉकडाउन के बीच बढ़े इन आँकड़ों के लिए सरकार, प्रशासन, कानून, निरक्षरता व पिछड़े समाज को जिम्मेदार ठहराएँगे। कुछ इन बढ़े आँकड़ों के पीछे लॉकडाउन को ही वजह समझना शुरू कर देंगे। मगर इससे पहले इन आँकड़ों को देखकर हम अतिभावुक हों व लॉकाडउन को कोसना शुरू करें, सरकार, प्रशासन, कानून, अदालत पर सवाल उठाएँ, उससे पहले कुछ बातों पर गौर करना बेहद जरूरी है।
पहली बात तो ये कि पूरे देश में लॉकडाउन वर्तमान की वह आवश्यकता है जिसका इस समय कोई और विकल्प नहीं है। यदि मानव जाति को कोरोना के कहर से संरक्षित करना है तो उन्हें कुछ दिन घरों में लॉकडाउन रहना ही होगा। इसके उलट दूसरी बात घरेलू हिंसा जिसके आँकड़ों में उछाल को लॉकडाउन से जोड़ा जा रहा है, वह देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैली पितृसत्ता का प्रमाण है। वो पितृसत्ता जो एक जहरीली व्यवस्था के रूप में सदियों से समाज में तटस्थ रही। मगर भागती दुनिया की बराबरी करने की होड़ में हमें ऐसा लगा कि ये बीते समय की बात है।
इतिहास की यही कुरीति आज महामारी के बीच पैदा हुई मजबूरियों का फायदा उठाकर फिर उभर आई है। हालाँकि खत्म ये कभी नहीं हुई थी। लेकिन भ्रम में जीने वालों ने खुद के ख्यालों से इसे डायवर्ट कर दिया था। आज जब हर देश में घरेलू हिंसा की समस्या को प्राथमिकता से दिखाया जा रहा है, तो समझ आता है कि इसका लेना-देना निरक्षरता या पिछड़े समाज से नहीं है। बल्कि इसका एकमात्र कारण वो सोच है जो पुरुषों को ये मानने का अधिकार देती है कि उनके घर की महिलाएँ व बच्चे उनकी वो वस्तु हैं जिस पर वे जब जी चाहे अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।
साभार: euractiv
लॉकडाउन में कमियाँ निकालने से पहले और उससे जोड़कर कोई भी घोषणा करने से पहले हमें समझने की जरूरत है कि इस बीच बाहरी अपराधों जैसे रेप, हत्या, मार पिटाई, चोरी-चकारी आदि मामलों में बहुत कमी कैसे आई है और आखिर क्यों डोमेस्टिक वायलेंस बढ़ा है? क्षण भर विचार करने पर मालूम होगा कि आधुनिकता का राग अलापे जो पुरुष लॉकडाउन से पहले जगह-जगह विचरण कर अपना मन बहलाया करते थे, वो अब घर में बैठे हैं। इसके कारण बाहर का समाज सुरक्षित होता जा रहा है लेकिन घरों में रहने वाली महिलाएँ व बच्चे खतरे में आ गए हैं।
विश्व भर में हो रही घटनाएंघरेलू हिंसा में वृद्धि के मायने
वास्तविकता में सच तो ये है कि ये घरेलू हिंसा का लॉकडाउन से कोई संबंध नहीं है। ये केवल पितृसत्ता से जकड़े समाज का एक परिणाम है जो एक जगह स्थिर होने के कारण फिर से अपना असली चेहरा दिखाने लगा है। ऐसे समाज के लिए बराबरी और समानता सिर्फ़ दोयम दर्जे का विषय है या फिर दिखावे का। पुरुष प्रधानता इनके लिए मुख्य विषय है।
अगर हर देश से आते आँकड़ों को देखकर भी हम इन बातों से तसल्ली कर रहे हैं कि इनके लिए हमें सरकार मदद करेगी, कानून सहायता देगा, अदालत फैसला करेगी, तो समझ लीजिए, ये समस्या का हल नही बल्कि समस्या को दुसरे के सहारे टालने की प्रक्रिया है। जब तक पितृसत्ता है तब तक घरेलू हिंसा के पीड़ितों को रेस्क्यू करने का सिलसिला साल दर साल चलता रहेगा। भले ही लॉकडाउन के बाद ये आँकड़े सामान्य हो जाएँगे, लेकिन खत्म कभी नहीं होंगे। हर दूसरे नहीं हर दसवें घर से एक मामला जरूर आएगा।
और, सत्ता कब किसके हाथ में आएगी और वे कब आपके लिए क्या कदम उठाएगी ये भी अनिश्चितकाल की प्रक्रिया है। आज मलेशियन सरकार के एक फैसले को सुनकर हम इसे और अच्छे से समझ सकते हैं। वहाँ घरेलू हिंसा के आँकड़ों को बढ़ता देख सरकार ने महिलाओं को सुझाव दिया कि वे घर में रह रहे पुरुषों को टोके नहीं, बल्कि अगर उनसे कुछ काम करवाना है तो फिर उनके सामने डोरेमॉन की आवाज निकालें या अपनी बात मजाकिया अंदाज में कहें, जिससे उन्हें टोकना न बुरा लगे। इसके अलावा वे घर में मेकअप करके भी रखें और अच्छे कपड़े पहनकर भी रखें।
गौरतलब है कि सरकार के इस तरह के सुझाव (मेकअप आदि को लेकर) भी एक तरह से स्त्रियों के ऑब्जेक्टिफिकेशन की ही बात है। इसकी कई कार्यकर्ताओं व संस्थाओं ने आलोचना भी की है और इसके कारण वहाँ की सरकार को अपने इन सुझावों के लिए माफी माँगनी पड़ी।
मलेशियन सरकार द्वारा पोस्ट किया गया सुझाव
ऐसे ही फ्रांस सरकार को देखिए। फ्रांस में लॉकडाउन के बाद घरेलू हिंसा में 36 प्रतिशत का उछाल आया तो उन्होंने एक्शन लेने की बात पर महिलाओं के लिए होटल के रूम बुक कर दिए। भारत में तसल्ली की बात ये है कि न्यायपालिका इन बढ़े आँकड़ों पर गंभीर है और हर जगह बंदी के बावजूद इस पर कदम उठाने की दिशा में सुनवाई कर रही है।
साभार: indian express
आज यदि हम ये भी मान रहे हैं कि औरतें जागरूक हो रही हैं, आधुनिक हो रही हैं, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, तो ये भी अपवादों का उदाहरण है। विश्व भर में ऐसी अनेकों महिलाएँ हैं जो पुरुषों के अत्याचार को सहने के लिए खुद को मानसिक तौर पर तैयार किए हुए हैं। ऐसी महिलाओं का किसी संस्कृति, समाज, सभ्यता, सीमा से कोई लेना-देना नहीं है। बस इसकी एक वजह है कि वे अपने साथी या परिवार से भावनात्मक तौर पर इस कदर जुड़ी हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आता कि उनके साथ क्या हो रहा है। भारत में तो डोमेस्टिक वायलेंस सह रही महिलाओं के कई उदाहरण हमारे पास पहले से ही हैं। मगर, जिन देशों की सभ्यता को प्रगति के मानक मानते हैं वहाँ भी औरतें इतनी ही लाचार हैं। इनके अतिरिक्त वे महिलाएँ जो वर्तमान में नारी विषयों पर लिखती हैं उनमें से भी कई इसकी पीड़िता होती हैं।
क्रेजी लव्स की लेखिका लेस्ली मॉर्गन वर्तमान में अमेरिकन राइटर होने के अलावा नारीवाद का एक बड़ा चेहरा हैं। वे खुद एक वीडियो में कहती हैं कि उन्हें घरेलू हिंसा समझने में सालों साल लगे और जब उन्हें समझ भी आया तो करीब दो साल उन्होंने अपने साथी से अलग होने में लगाए। उनका मानना है कि लॉकडाउन ने भले ही घरेलू हिंसा के मामले को बढ़ावा दिया है। लेकिन इसे एक अवसर की तरह देख सकते हैं कि पीड़िताएँ अपने साथी को छोड़ने के लिए खुद को तैयार करें या फिर उनकी शिकायत करें।
आज कई नारी विषय पर लिखने वाले कार्यकर्ताओं और लेखकों का ये भी मानना है कि इस लॉकडाउन में घर पर ज्यादा समय बिताने के कारण हिंसा हो रही हैं। जहाँ पुरुष कभी दारू न मिलने के कारण अपराध कर रहे हैं, तो कभी घरेलू कामों का दबाव बनाए जाने के कारण ऐसा कर रहे हैं। आउटलुक ने पदमा रेवाड़ी नामक मनोवैज्ञानिक के हवाले से बताया है कि उनके घरेलू कार्यों में सहायता करने वाली खुद घरेलू हिंसा का शिकार हैं। वे कहती हैं कि उनकी सहायिका को इन दिनों और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उसका पति बिना शराब के अधिक हिंसक होता है।
अंत में यही जानिए कि आज के समय में कई ऐसी संस्थाएँ हैं जो महिलाओं को इस नर्क से निकालने के लिए अथक प्रयास कर रही हैं। अमेरिका से लेकर भारत तक में इनका विस्तार है। इसके अलावा देश की सरकारें भी अपनी ओर से समाज में औरतों को अधिकार दिलवाने के लिए कार्य कर रही हैं। न्यायपालिका और प्रशासन भी इसी पर मंथन करते हैं कि कैसे बढ़ते समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारा जाए। उन्हें कैसे स्वावलंबी जीवन प्रदान किया जाए। मगर, अधिकांश महिलाओं की मनोस्थिति को समझकर लगता है कि जिन्हें घरेलू हिंसा से निजात पानी है, उन्हें अपने अधिकारों के लिए अब खुद आवाज उठानी होगी।
उन्हें खुद आत्मसम्मान के साथ या तो उस माहौल से खुद को अलग करने का फैसला लेना होगा या फिर उस व्यक्ति विशेष और सोच को सबक सिखाने के लिए दंड दिलवाना होगा। इसके लिए ये जरूर है कि उन्हें जागरूक होना पड़ेगा, मजबूत होना होगा। मगर जब तक बर्दाश्त और सहनशीलता के भाव आदर्श नारी और उसके हॉर्मोन्स को जस्टिफाई करने के लिए प्रयोग किए जाएँगे, तब तक ये घरेलू हिंसा बढ़ती रहेगी और इसके पीछे लॉकडाउन एक कारण कभी नहीं होगा।