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खग ही जाने खग की भाषा: रामचरित मानस के बहाने कोरोना और चमगादड़ वाली धूर्तता के पीछे का सच

“खग ही जाने खग की भाषा”, हिंदी का एक प्रचलित मुहावरा है। मोटे तौर पर इसका इस्तेमाल तब होता है जब दो लोग बात तो सार्वजनिक तौर पर कर रहे हों मगर उसका गूढ़ अर्थ केवल वही दोनों समझ रहे हों। बाकी लोगों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं निकलता है। जो लोग संवाद (कम्युनिकेशन, मास कम्युनिकेशन) जैसे विषय पढ़ते हैं, उन्होंने इसे किसी ना किसी अध्याय में टार्गेटेड कम्युनिकेशन के नाम से पढ़ रखा होता है। जासूसी फिल्मों के शौक़ीन लोगों ने भी देखा होगा कि कैसे कोई चिट्ठी जो आम सी लगती है, उसमें छुपा कोई कूट सन्देश निकल आता है।

ये सब टार्गेटेड कम्युनिकेशन है, जिसे मोटे तौर पर “खग ही जाने खग की भाषा” कह दिया जाता है। इस जुमले के पैदा होने के पीछे रामचरितमानस है। रामचरितमानस को अलग-अलग जगह दो लोगों के संवाद के तौर पर लिखा गया है। जैसे अगर शुरुआत का हिस्सा देखें तो ये शिव-पार्वती संवाद है। रामचरितमानस का आखरी हिस्सा काकभुशुण्डी और गरुड़ का संवाद है। वहाँ होता कुछ यूँ है कि गरुड़ जी राम कथा सुनना-समझना चाहते थे मगर खुद भगवान भी उन्हें समझा पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे।

अंततः उन्होंने निर्णय लिया कि कोई पक्षी (खग) ही गरुड़ को रामकथा समझा पाएगा। इसलिए गरुड़ को काकभुशुण्डी जी के पास रामकथा के श्रवन के लिए भेज दिया गया और कहा गया “खग ही जाने खग की भाषा”। ये कहानी आज इसलिए याद आई क्योंकि रामचरितमानस के उत्तर काण्ड में जहाँ काकभुशुण्डी, गरुड़ को सात प्रश्नों के उत्तर दे रहे होते हैं, वहाँ किसी ने “चमगादड़” शब्द देख लिया। वहाँ काम-क्रोध, लोभ इत्यादि की बीमारी से तुलना की गई है तो “रोग” शब्द भी नजर आ गया।

अब इस (संभवतः धूर्त) व्यक्ति को ये भी पता था कि अधिकांश हिन्दुओं की रामचरितमानस में श्रद्धा तो है, लेकिन कभी उन्होंने इसे पूरा पढ़ा नहीं! तो एक पन्ने की तस्वीर को उन्होंने दोहा संख्या 120 में चमगादड़ और रोग का जिक्र है, ऐसा कहकर व्हाट्स-एप्प इत्यादि माध्यमों से दौड़ा दिया। पूरा पढ़ने वालों को पता होता है कि वहाँ काम को वात (वायु), लोभ को कफ, और क्रोध को पित्त कहा गया है, जिनके बढ़ने से रोग होता है। सबकी निंदा करने वाले अगले जन्म में चमगादड़ होंगे, शायद उल्टा लटकने वाले, तुलसीदास जी का ऐसा आशय रहा होगा।

इसका वो मतलब तो बिलकुल नहीं जो बताया जा रहा है। बाकी अगर खुद भी ऐसा फॉरवर्ड देखा हो तो सोचियेगा, अभी दस-बारह दिन बाकी हैं। इतने दिनों में अगर पूरी रामचरितमानस एक बार पढ़ लें, तो कम से कम कोई इतनी आसानी से तो नहीं ठग पाएगा! थोड़ी मेहनत तो करवाइए ठगों से।

उम्माह के पैरोकार इक़बाल ने कैसे बदल दिया था ‘सारे जहाँ से अच्छा’ तराना: कट्टरपंथी थे Pak के जनक

अल्लामा इक़बाल, जिन्हें मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान कहा जाता है, यानी पाकिस्तान का विचारक। ये सही भी है क्योंकि सबसे पहले ‘टू नेशन थ्योरी’ की बात इन्होंने ही की थी। इन्हें शायर-ए-मशरिक, अर्थात पूरब का शायर भी कहा जाता है। इक़बाल को हाकिम-उल-उम्मत, अर्थात उम्माह का विद्वान भी कहा गया है। यहाँ उम्माह आते ही आप समझ गए होंगे कि इसका अर्थ है मुस्लिमों का शासन। यही मुहम्मद इक़बाल की विचारधारा भी थी- पूरी दुनिया के मुस्लिम एक राष्ट्र के रूप में हैं। ‘तराना-ए-मिल्ली’ का सार यही है कि पैगम्बर मुहम्मद ही सारी दुनिया के मुस्लिमों के नेता हैं। इन्होंने इस्लाम में राष्ट्रवाद की भावना होने की बात को ही नकार दिया।

अल्लामा इक़बाल के बारे में एक बात जाननी ज़रूरी है कि उनका परिवार पहले कश्मीरी पंडित था, जिसने बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया था। उनका जन्म नवंबर 8, 1877 को सियालकोट में हुआ था। इक़बाल के ‘तराना-ए-हिंदी’ को न सिर्फ़ भारत में पढ़ाया गया बल्कि इसे देशभक्ति दिखाने के लिए भी गाया जाता रहा है। इक़बाल, जिसने पहली बार भारत विभाजन की बात की, जिसने भारत को धमकाया और जिसकी विचारधारा की आड़ में मजहबी कट्टरता ऐसी फैली कि देश में आग लग गई। कट्टरवाद के उस जनक को भारत में पूजा जाना आश्चर्यजनक है। हाँ, पाकिस्तान में उनका सम्मान होना समझ में आता है।

अल्लामा इक़बाल के दोनों तराने और उनके बीच का अंतर

इक़बाल ने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान 1904 में लिखा था। इसे मूलतः बच्चों के लिए लिखा गया था, जो देशभर में लोकप्रिय हुआ। समय के साथ सिर्फ़ इक़बाल ही नहीं बदले बल्कि उन्होंने अपने तराने को भी तोड़-मरोड़ के बदल दिया। मोहम्मद इक़बाल उस समय गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में लेक्चरर थे। उनके एक छात्र लाला हरदयाल ने उन्हें एक कार्यक्रम को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित किया था, जहाँ उन्होंने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ गाया। उन्होंने भाषण देने की जगह अपने इस तराने को ही गाया और सभा में लोगों ने इसकी खूब प्रशंसा की। हरदयाल ने बाद में ग़दर पार्टी की स्थापना की और सिविल सर्विस को ठोकर मार कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे।

अब आते हैं कट्टरपंथी इक़बाल पर, जिन्होंने ‘तराना-ए-मिल्ली’ लिख कर इस्लाम के शासन की बात की और उनकी देशभक्ति तेल लेने चली गई। ‘तराना-ए-हिंदी‘ की पहली पंक्तियाँ तो आपको याद ही होंगी। इसका अर्थ भी सभी को लगभग पता ही है- हिंदुस्तान बाकी सारी दुनिया से अच्छा है और ये एक ऐसा चमन है, जिसमें हम सब बुलबुल के रूप में रहते हैं । वो पंक्तियाँ कुछ इस तरह से हैं:

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

आज भारत में कथित बुद्धिजीवियों का ही एक बड़ा वर्ग है जो फैज अहमद फैज और मुहम्मद इक़बाल को पूजने में लगा हुआ है और चाहता है कि बाकी लोग भी ऐसा ही करें। ऊपर वाले तराने के ठीक 4 साल बाद यूरोप से लौटे मुहम्मद इक़बाल की ‘तराना-ए-मिल्ली‘ की पहली पंक्तियाँ देखिए, जो बताता है कि किस तरह उनके मन में भारत के लिए कोई सम्मान था ही नहीं और उनकी नज़र में इस्लाम ही एकमात्र सत्ता थी:

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

इसका अर्थ है कि चीन और अरब हमारे हैं, हिंदुस्तान भी हमारा ही है। हम तो मुस्लिम हैं और ये सारी दुनिया ही हमारी है। यहाँ चीन का तात्पर्य पूरे मध्य एशिया से था। इसकी अगली पंक्तियों में उन्होंने लिखा है कि एक अल्लाह को मानना मुस्लिमों की साँस में, सीने में बसता है। इसकी अगली पंक्ति में वो लिखते हैं कि मुस्लिमों को मिटाना इतना आसान भी नहीं है। इसके बाद वो मंदिरों और मूर्ति पूजा का मखौल उड़ाते हुए लिखते हैं कि उन सबमें उनके ख़ुदा का घर सबसे ऊपर का स्थान रखता है। इसका एक अर्थ ये भी है कि मुस्लिमों का काबा जो है, उसका स्थान दुनिया के सारे मंदिरों से भी ऊपर है, सबसे ऊँचा।

इस्लाम की बात करते हुए इक़बाल लिखते हैं कि वो सब तलवारों से साए में बड़े हुए हैं और वो अर्धचंद्र का खंजर है न, वही उनके कौम की निशानी है। इस्लामिक मुल्कों के झंडों पर प्रतीकों में अर्धचंद्र और तारे मिलते हैं, यहाँ ‘क़ौमी निशाँ’ की बात इस्लाम के लिए ही हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। हिंदी तराने में हिमालय को भारत का संतरी बताने वाले मुहम्मद इक़बाल के लिए अब पहाड़ियों में भी इस्लाम घुस गया। तभी तो उन्होंने लिखा कि पश्चिम की वादियों में इस्लामी अजान ही गूँजता रहा और किसी में इतनी ताक़त नहीं हुई कि वो मुस्लिमों को आगे बढ़ने से रोक सके। इसके बाद इक़बाल स्पेन और टिगरिस के बहाने धमकाते हैं कि किस तरह इस्लाम ने वहाँ अपनी सत्ताएँ स्थापित की।

दोनों ही तरानों में इक़बाल का टोन बदलता नज़र आता है। एक में वो राष्ट्रवाद की बात करते हैं, दूसरे में उसी को नकार कर इस्लाम का बखान करते हैं। अंतर इतना है कि हिंदी तराने में इस्लाम की झलक मिलती है लेकिन ‘तराना-ए-मिल्ली’ में राष्ट्रवाद को नकार दिया जाता है। ‘तराना-ए-हिंदी’ की कुछ पंक्तियों को उद्धृत कर के ये कहा जाता है कि इक़बाल ख़ूब सेक्युलर थे, असल में इससे बड़ा मजाक कुछ हो ही नहीं सकता है। इक़बाल ने ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ से ‘सारा जहाँ हमारा’ तक का जो सफर तय किया, उसमें उनकी सोच नहीं बदली बल्कि उनके भीतर छिपी हुई सोच ही सामने आई। 1930 में उनका कट्टरवाद लाखों को अपने आगोश में ले लेता है।

मुस्लिम लीग के मंच पर अध्यक्षीय सम्बोधन

दरअसल, दिसंबर 29, 1930 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मुस्लिम लीग का 25वाँ वार्षिक सम्मलेन था और मुहम्मद इक़बाल ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में विभाजन की ऐसी नींव रखी, जिसका खामियाजा पूरे भारत को भुगतना पड़ा। उन्होंने धमकाया कि भारत में तब तक शांति का नामों-निशाँ भी नहीं हो सकता, जब तक मुस्लिमों को अलग देश और उन्हें अपना शासन न मिले। वहाँ ऐलान कर दिया कि एक मुस्लिम कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि उसके देश की नीतियाँ इस्लामी क़ानून से अलग हों क्योंकि इस्लाम में प्रारम्भ से ही सामाजिक व्यवस्था, न्याय और अन्य चीजों के लिए अलग से ही क़ानून है, जो इसे ईसाइयत से अलग बनाता है।

उनका सीधा कहना था कि इस्लाम की मजहबी व्यवस्था को मानने वाला मुस्लिम देश का क़ानून नहीं मानेगा, अगर वो इस्लामिक कानून से अलग हो। उन्होंने सेकुलरिज्म और राष्ट्रवाद को नकार दिया। आज उन्हीं की पंक्तियों को लेकर लोग उन्हें सेक्युलर बताने के लिए तुले हुए हैं। इसके बाद इक़बाल यूरोप और पश्चिम देशों में घूम-घूम कर न सिर्फ़ मुस्लिम लीग की विचारधारा के लिए समर्थन जुटाने लगे, बल्कि फंडिंग के लिए भी जी-जान लगा दिया। उनके जितने भी लेक्चर प्रकाशित हुए, उसमें मुहम्मद को नेता मानने की बात थी और उन मुस्लिम नेताओं की भी उन्होंने निंदा की, जो ‘इस्लामी समाज की भावनाओं’ को नहीं समझते थे।

उनका कहना था कि सेकुलरिज्म एक ऐसा हथियार है, जिसका इस्तेमाल कर के हिन्दू अब मुस्लिमों की विरासत, संस्कृति और राजनीतिक प्रभाव पर हावी हो जाएँगे। उनका कहना था कि इससे मुस्लिमों का मजहबी आधार कमजोर पड़ जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि भले ही ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत लेकिन पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रान्त को एक अलग राज्य का दर्जा मिलना चाहिए, जो सत्ता चलाने के मामले में स्वतंत्र हो। वो भारत के अंदर एक ‘मुस्लिम भारत’ की स्थापना की अवधारणा को सही ठहराते थे। उन्होंने समुदाय विशेष से स्पष्ट पूछा था कि क्या वो देश का क़ानून ऐसा चाहते हैं, जो इस्लाम के अनुरूप न हो?

इक़बाल को सेक्युलर साबित करने के पीछे की मंशा क्या?

इसके बाद 1932 में भी अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में मुहम्मद इक़बाल ने ये बातें दोहराईं। एक शायर इक़बाल में से नेता इक़बाल या फिर कट्टरपंथी इक़बाल को निकाल बहार कर उन्हें सेक्युलर साबित करने की होड़ एक बेहूदा प्रतियोगिता है, जो ओसामा बिन लादेन को ‘एक अच्छा पति’ या फिर आतंकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ बताने वाली होड़ से अलग नहीं है। इक़बाल को इस्लामी कट्टरवाद से अलग नहीं किया जा सकता। अगर पाकिस्तान नहीं भी बनता और उनकी चलती तो आज यहाँ भारत में एक समांनातर इस्लामी सत्ता चलते रहती, जो भारत को एक नरक में तब्दील करने की ताक़त रखती।

ये भी बताते चलें कि मुहम्मद इक़बाल ने अपनी ज़िंदगी के अधिकतर हिस्से अहमदिया बन कर जिया। इसके बाद उन्होंने अहमदिया संप्रदाय को अलविदा कह दिया क्योंकि उन पर कट्टरपंथियों का दबाव था और वे लोग मानते थे कि अहमदिया विधर्मी हैं। आज पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर हो रहा अत्याचार किसी से भी छिपा नहीं है। वो 1931 तक अहमदिया नेताओं के संपर्क में थे और ‘ऑल इंडिया कश्मीर कमिटी’ का अध्यक्ष भी किसी अहमदिया खलीफा को बनाना चाहते थे। यानी, इक़बाल के नाम पर ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की बात करने वालों को पता होना चाहिए कि इक़बाल ने अहमदिया पंथ क्यों छोड़ा!

रमजान पर मस्जिदों में वैसे ही लॉकडाउन का पालन कराया जाए, जैसा ईस्टर पर चर्चों में हुआ: डोनाल्ड ट्रम्प

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि रमजान के समय मस्जिदों में भी सोशल डिस्टन्सिंग का पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रमजान के दौरान पुलिस एवं प्रशासन मस्जिदों में सोशल डिस्टेंसिंग के लिए अलग व्यवस्था कर सकती है। ट्रम्प का इशारा राज्यों की तरफ था। उन्होंने कहा कि जिस तरह से चर्चों में सोशल डिस्टन्सिंग का पालन कराया गया, उस तरह से मस्जिदों में भी कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देखना पड़ेगा कि ईस्टर के समय जैसे चर्चों से लॉकडाउन का पालन कराया गया था, वैसे रमजान के दौरान मस्जिदों में कराया जाएगा या नहीं।

कोरोना वायरस को लेकर मीडिया को सम्बोधित कर रहे ट्रम्प ने कहा कि ईस्टर और रमजान के समय पुलिस-प्रशासन के बर्ताव में कुछ अंतर आ सकता है। ट्रम्प ने कहा कि वो अमेरिका में सालों से इस तरह के व्यवहार में गहरी असमानता देखते आ रहे हैं, इसीलिए रमजान के वक़्त ही पता चलेगा कि समुदाय विशेष से लॉकडाउन का पालन कैसे कराया जाता है। एक पत्रकार ने जब ट्रम्प से पूछा कि क्या वो ऐसा सोचते हैं कि मजहब के नेता लॉकडाउन का पालन नहीं करेंगे, तो ट्रम्प ने कहा कि नहीं वो ऐसा कुछ भी नहीं सोचते।

ट्रम्प ने बताया कि उन्होंने इमामों और नेताओं से फोन पर बातचीत की है। उन्होंने कहा कि पता नहीं इस देश के साथ क्या हो रहा है कि ईसाई समुदाय के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जाता, अच्छी तरह से ट्रीट नहीं किया जाता। बता दें कि 12 अप्रैल को ईस्टर के मौके पर देश भर में ईसाईयों को लॉकडाउन का पालन करने की सलाह दी गई थी लेकिन कुछ जगहों पर इसके उल्लंघन की ख़बर आई। ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ नार्थ अमेरिका’ ने समुदाय विशेष को सलाह दी है कि वो घर में ही नमाज पढ़ें और समूह में जुट कर दुआ वगैरह न करें।

अमेरिका में कोरोना से हालत बदतर

पूरे अमेरिका में अब तक कोरोना वायरस के 7,95,602 मामले आ गए हैं। इनमें से 43,177 लोगों की मौत हो चुकी है। हालाँकि, 72,561 लोग ठीक भी हुए हैं लेकिन अब भी 6,79,874 मामले सक्रिय हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि वो लोग चर्चों के मामले में तो आगे आते हैं लेकिन मस्जिदों की बात आते ही पीछे हट जाते हैं। उन्होंने कहा कि वो इस ट्रेंड को देख रहे है। रमजान गुरुवार (अप्रैल 23, 2020) को शुरू हो रहा है।

बता दें कि भारत ने भी आपदा की इस घड़ी में अमेरिका की मदद की है और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की एक बड़ी खेप यूएसए को भेजने का निर्णय लिया गया। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने पीएम मोदी को धन्यवाद भी दिया था। उससे पहले ख़ुद ट्रम्प भारत दौरे पर आए थे, जब दोनों देशों के बीच कई डील साइन किए गए थे। कोरोना आपदा के बीच भी पीएम मोदी और प्रेजिडेंट ट्रम्प की फोन पर बातचीत हुई थी

तेल के दाम को लेकर राहुल गाँधी ने करवाई अपनी बेइज्जती: कॉन्ग्रेस नेता ने ही समझाया WTI और ब्रेंट क्रूड का अंतर

दुनिया भर में क्रूड आयल के दाम घट रहे हैं और इसी बहाने विपक्ष भारत सरकार पर निशाना साधने में लगा हुआ है। 34 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल के भाव 0 यानी जीरो से भी नीचे चले गए हैं। अमेरिका सहित विश्व के अन्य हिस्सों में भी कच्चे तेल की माँग काफ़ी कम हुई है, जिसका परिणाम है कि भाव में जम कर गिरावट हुई है। अधिकतर देश लॉकडाउन में हैं और कोरोना संक्रमण की आपदा के कारण गाड़ियाँ निकल नहीं रहीं, इसीलिए तेल की माँग ही ख़त्म हो गई है। अब आते हैं राहुल गाँधी के आरोपों पर।

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पूछा कि दुनिया में कच्चे तेल की क़ीमतें अप्रत्याशित आँकड़ो पर आ गिरी हैं, फिर भी हमारे देश में पेट्रोल ₹69, डीज़ल ₹62 प्रति लिटर क्यों मिल रहा है? उन्होंने आगे कहा कि इस विपदा में जो दाम घटे, सो अच्छा। कब सुनेगी ये सरकार? राहुल गाँधी ने ये बयान तो दे दिया लेकिन शायद वो तेल के भाव गिरने की ख़बर को ठीक से पढ़ नहीं पाए। दरअसल, ‘अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI)’ की कीमतों में इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है, जिससे राहुल गाँधी भ्रमित हो गए।

भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा इम्पोर्टर है और देखा जाए तो यहाँ 85% तेल आयात से ही आता है। कच्चे तेल में गिरावट डब्ल्यूटीआई के भाव में देखने को मिली है जबकि भारत ब्रेंट क्रूड की सप्लाई पर निर्भर है- इस छोटी सी बात को राहुल गाँधी समझ नहीं पाए। ब्रेंट का भाव अब भी 20 डॉलर से ऊपर बना हुआ है, इसीलिए भारत को इससे कुछ राहत नहीं मिली है और डब्ल्यूटीआई में कीमतें कम होने से यहाँ तेल सस्ता नहीं हो जाएगा। राहुल गाँधी की ही पार्टी के नेता मिलिंद देवड़ा ने यही चीज समझाने की कोशिश की।

भाजपा आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने कहा कि राहुल को अपने ही साथी देवड़ा से सीखना चाहिए। देवड़ा ने बताया कि भारत आयात के मामले में ब्रेंट क्रूड पर निर्भर है, डब्ल्यूटीआई पर नहीं। उन्होंने जानकारी दी कि माँग कमजोर होने के कारण भारत के लिए अब तेल के आयात में कमी आएगी। उन्होंने लिखा कि पेट्रोल और डीजल के भाव में कमी होने का ग्राहकों को कोई फायदा नहीं मिल पाएगा। हालाँकि, अपनी बेइज्जती होने के बावजूद राहुल गाँधी ने ट्वीट डिलीट नहीं किया।

हाल ही में एक और मामले में कॉन्ग्रेस आईटी सेल ने राहुल गाँधी को शुभकामनाएँ देते हुए एक ट्वीट किया और ट्वीट में बताया गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने वायनाड में कोरोना वायरस रोकने के प्रयासों व तरीकों की प्रशंसा की है। राहुल ने भी इस फेक न्यूज़ को आगे बढ़ाया। उन्होंने सरकार पर कोरोना वायरस को लेकर निर्णायक कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया था और कहा था कि उसकी (सरकार की) ‘अक्षमता’ की भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि कोरोना वायरस की समस्या से निपटने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए।

दुबई में फँसे सोनू निगम को इस्लामी कट्टरपंथियों ने बनाया निशाना, 3 साल पुराने अजान ट्वीट पर घेरा

इस्लामी कट्टरपंथियों ने आज फिर से बॉलीवुड गायक सोनू निगम के 2017 के उस ट्वीट को लेकर हमला बोला, जिसमें उन्होंने मस्जिदों से लाउडस्पीकर से पाँच बार नमाज पढ़ने की बात कही थी। इसके लिए कट्टरपंथियों ने उन्हें कुत्सित और घृणित भी कह दिया।

कई लोगों ने तो अपने ट्वीट में दुबई पुलिस को भी टैग किया और उनसे सोनू के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया।

कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर हुए लॉकडाउन की वजह से सोनू निगम फिलहाल दुबई में फँस हुए हैं। बता दें कि जब लॉकडाउन की घोषणा की गई, तब वो उसी देश में थे और सारी यात्रा सेवाएँ बंद होने की वजह से वो वहाँ पर फँस गए हैं।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि सोनू निगम को अजान से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उन्हें तो इसके लिए लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिक्रिया दी थी। बता दें कि सोनू निगम ने पहले भी गणपति विसर्जन के दौरान लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर नाराजगी जताई थी।

सोनू निगम अजान विवाद

गौरतलब है कि 2017 में सोनू निगम ने मस्जिद पर लाउडस्पीकर पर होने वाली अजान को लेकर सवाल खड़ा किया था। उन्होंने ट्वीट करके लिखा था कि मस्जिद की अजान से उनकी नींद टूट गई। उन्होंने कहा था कि अगर मैं मुस्लिम नहीं हूँ तो मस्जिद की अजान की आवाज से उनको हर रोज क्यों सुबह उठना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हम आखिर कब तक धार्मिक रीतियों को जबरदस्ती ढोते रहेंगे। उन्होंने लिखा था कि मंदिर और गुरुद्वारे में भी ऐसा होने से उन्हें समस्या होती है। सोनू ने कहा कि जब बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था तब तो ऐसा नहीं होता था, आखिर अब ऐसा क्यों हो रहा है।

उस दौरान भी उनके ट्वीट्स को इस्लामोफोबिक करार दिया गया था और उनका खूब विरोध हुआ था। कुछ ने गायक के लिए गले के कैंसर के लिए भी कामना की थी।

उनका ट्वीट वायरल होने के बाद, रिज़वान मलिक द्वारा उनके सिर पर 21 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। पश्चिम बंगाल के एक मौलवी ने फतवा जारी किया था और और कहा था कि जो कोई भी सोनू निगम को गंजा करेगा, उसे 10 लाख रुपए का ईनाम दिया जाएगा।

इसके बाद सोनू ने सिर भी मुंडवाया था। हालाँकि इस बारे में जब मौलवी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि सोनू निगम ने सभी शर्तें पूरी नहीं की हैं। उन्होंने कहा, “मैंने 3 चुनौतियाँ दी थीं, जिनमें से 2 अभी बाकी हैं। हम 10 लाख रुपये तभी देंगे जब वह फटे हुए जूतों की माला पहनकर देश भर में घूमेंगे।”

हापुड़: जमातियों की सूचना देने पर 300 मुस्लिमों की भीड़ ने लाठी-डंडे, पत्थरों और चाकू से किया हिंदुओं पर हमला, 6 गिरफ्तार

उत्तरप्रदेश के हापुड़ जनपद में शहर कोतवाली क्षेत्र के सरावा गाँव में दो समुदायों के बीच शुरू हुई मामूली कहासुनी खूनी झड़प में बदल गई। जिसके बाद जमकर पथराव और चाकू से हमला हुआ जिसमें करीब 5 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए सूचना के बाद पहुँची पुलिस ने मामला शांत कराया तहरीर के आधार पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है।

मामले में इमरान, साजिद, हासम, मेहताब, नौशाद, इरफान, मोहसिन, अमन, परवेज आलम, यामीन. सफी उल्ला, गुल मोहम्मद, रिजवान और फुरकान को आरोपित बताया गया है। इसके अलावा कई अन्य अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

हापुड़ में इमरान ने भीड़ इकट्ठी कर हिंदुओं पर किया हमला

दरअसल, सरावा गाँव में राकेश त्यागी का पुत्र प्रशांत का इस्लाम के पुत्र इमरान के साथ कुछ हल्की फुल्की कहासुनी हो गई थी, लेकिन मामला शांत हो गया। दोपहर बाद जब प्रशांत गुलफाम की दुकान पर दाल लेने के लिए गया था तो फिर से मामला बढ़ गया और कहासुनी शुरू हो गई मामला बढ़ा तो प्रशांत पक्ष के लोगों ने इमरान पक्ष के लोगों से शांत रहने के लिए कहा और अपने पक्ष के प्रशांत और अन्य को डाँट डपट कर घर भेज दिया। 

250-300 की भीड़ के साथ साजिद ने किया चाकू से हमला

इमरान पक्ष के लोग शांत नहीं हुए और पीछे से लाठी-डंडों और हथियारों से लैस होकर प्रशांत पक्ष लोगों पर धावा बोल दिया। जिसके बाद जमकर पथराव हुआ। इमरान पक्ष के लोगों ने चाकू से भी हमला किया। जिसमें आशाराम त्यागी, प्रयास त्यागी, प्रशांत त्यागी, जॉनी त्यागी और मुकेश त्यागी घायल हो गए। घायल लोगों ने बताया कि उन्हें चाकू साजिद ने मारा था। उन्होंने बताया कि लगभग 250-300 मुस्लिमों की भीड़ ने उन पर हमला बोला।

लोगों की छतों पर एकत्र हो गए थे पत्थर

पथराव का एक वीडियों भी वायरल हुआ है, जिसमें साफ दिख रहा है कि कैसे सैकड़ों की मुस्लिम भीड़ हिंदू समुदाय के लोगों पर पथराव कर रही है और वो बचाव की कोशिश कर रहे हैं। यह पथराव लगभग एक घंटे तक होता रहा। पथराव के दौरान आसपास के लोगों के घरों में भी पत्थर फेंके गए। इस दौरान घरों की छतों पर काफी संख्या में पत्थर एकत्र हो गए। पथराव को देखकर जान बचाने के लिए लोग कमरों में कैद हो गए। घटना में घायल पाँचों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और पुलिस ने मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।

सूचना के बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने मामला शांत कराया। पुलिस मामले की जाँच में जुट गई हैं। पुलिस क्षेत्राधिकारी भी गाँव में पहुँचे। क्षेत्राधिकारी राजेश सिंह का कहना है कि तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज किया जा रहा है दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी।

जमातियों की सूचना देने पर भुगतने की दी थी धमकी

उल्लेखनीय है कि सरावा गाँव में कुछ दिन पहले दिल्ली के तबलीगी जमात में शामिल होकर आए एक ग्रामीण की कुछ लोगों ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को सूचना दी थी। जिसके बाद पुलिस ने उक्त व्यक्ति के अलावा कुछ लोगों को क्वारंटाइन किया था। हालाँकि सभी लोग क्वारंटाइन की अवधि पूरा करके अपने घर भी पहुँच चुके हैं। लेकिन बताया जाता है कि मुस्लिम समुदाय के युवकों में इसी बात को लेकर गुस्सा था। विवाद और मारपीट के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जमकर इसी बात को लेकर भुगत लेने की धमकियाँ भी दी थीं।

पहले भी बनाया जा चुका है हिंदुओं को निशाना

गौरतलब है कि दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों के दौरान भी मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाया गया था। मुस्लिम दंगाइयों ने हिंदुओं के घरों, उनकी गाड़ियों और उनके शैक्षणिक संस्थानों पर हमला करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रखी थी। इसी तरह उत्तराखंड में दिवाली के दौरान पटाखा फोड़ने पर मेहरुद्दीन, शाहनवाज, सोहैल सहित 60 मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदुओं पर हमला बोला था।

उमर खालिद और सहयोगियों पर UAPA के तहत केस दर्ज, दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों की साजिश का आरोप

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े एक मामले में दिल्ली पुलिस ने जामिया के छात्रों मीरन हैदर और सफूरा जरगर के खिलाफ गैर कानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम (UAPA) के तहत केस दर्ज किया है। बताया गया है कि हैदर की तरफ से पेश हुए वकील अकरम खान का कहना है कि पुलिस ने JNU छात्र नेता उमर खालिद के खिलाफ भी UAPA के तहत केस दर्ज किया है।

उमर खालिद और उसके साथियों पर UAPA के तहत आरोप दर्ज

रिपोर्ट्स के अनुसार हैदर और जरगर फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। उन्हें फरवरी माह में दिल्ली में भड़के हिन्दू विरोधी दंगों को भड़काने की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उल्लेखनीय है कि जरगर जामिया समन्वय समिति का मीडिया समन्वयक है और हैदर इस समिति का सदस्य है।

35 वर्षीय हैदर PhD छात्र है और दिल्ली में RJD की युवा इकाई का अध्यक्ष है, जबकि जरगर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम.फिल कर रहा है। पुलिस ने FIR में दावा किया है कि दिल्ली में भड़के हिन्दू-विरोधी दंगे एक पूर्व नियोजित साजिश थी, जिसे उमर के ही दो साथियों द्वारा रची गई थी।

FIR में इन छात्रों पर राजद्रोह, हत्या, हत्या के प्रयास, धार्मिक आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने और दंगे करने का मामला दर्ज है। FIR के मुताबिक, उमर खालिद ने 2 जगहों में भड़काऊ भाषण दिए थे और अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान इसे बंद करने के लिए लोगों से सड़क पर उतरने की बात कही थी।

ज्ञात हो कि दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगे डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा की पहली शाम से ही भड़के थे। FIR में बताया गया है कि हथियार, पेट्रोल बंद तेजाब की बोतलें और पत्थर कई घरों में साजिश के तहत इकट्ठे किए गए थे। इन कथित छात्रों पर यह भी आरोप हैं कि इन्होने 23 फरवरी को महिलाओं और बच्चों से जाफराबाद मेट्रो स्टेशन की सड़क को बंद करवाकर परिस्थितियों को तनावपूर्ण बनाया।

गौरतलब है कि दिल्ली में नागरिकता कानून के विरोध के नाम पर बड़े स्तर पर हिन्दू-विरोधी दंगों को अंजाम दिया गया था। यह सिलसिला शाहीन बाग़ से शुरू हुआ था जो गत दिसम्बर माह से ही अपनी गतिविधियों के कारण चर्चा का विषय बना रहा।

क्या है UAPA

इसके तहत कोई भी व्यक्ति जो आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होगा, उसे आतंकी घोषित कर प्रतिबंधित किया जा सकेगा। ऐसे लोग किसी आतंकी संगठन में तो शामिल नहीं होते, लेकिन वो सभी काम करते हैं, जो एक आतंकी संगठन के माध्यम से किया जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों को ‘लोन वुल्फ’ की संज्ञा दी जाती थी। इससे पहले सिर्फ़ आतंकी गतिविधियों में संलिप्त संगठनों को ही प्रतिबंधित किया जा सकता था।

राणा अयूब जैसों को चाहिए प्रोपगेंडा चलाने के लिए माल पानी, वरना जो मोदी सरकार कहेगी वो उसके उलट मायने खुद गढ़ लेंगी

देश में कोरोना से जंग लड़ने के दौरान जगह-जगह स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले हो रहे हैं। पुलिसकर्मियों पर थूका जा रहा है। साधुओं की लिंचिंग हो रही है। अस्पताल में अश्लील हरकतें जारी हैं। तबलीगी जमात अब भी जगह-जगह छिपे बैठे हैं। मौलाना साद का कुछ पता नहीं चल रहा। मगर, राणा अयूब जैसे मीडिया गिरोह के लोगों के लिए मुद्दा आज भी इनमें से कुछ नहीं है। उनके लिए देशव्यापी परेशानी का आज भी एक नाम है- इस्लामोफोबिया। मुरादाबाद से लेकर पालघर तक सामने आई तस्वीरें एक आम इंसान के लिए भले ही झकझोर देने वाली हैं। लेकिन इस गिरोह के लिए इन तस्वीरों का मोल शून्य बराबर है। 

इस्लामोफोबिया के बैनर तले एक अपराध की खबर को भी मजहबी रंग देकर वैश्विक परेशानी बनाने वाला गिरोह आज देश की अधिकांश समस्याओं और घटनाओं पर चुप्पी साधा हुआ है। कुछ एक हैं, जो खुद को इंसानियत का पैरोकार बताकर बैलेंस होने में जुटे है। मगर, राणा अयूब जैसे पत्रकार तो इस बीच अपना असली चेहरा दिखाने पर इस कदर उतारू हैं कि वो इन घटनाओं के जिक्र में अपना विपक्षी मत देने से भी परहेज कर रहे हैं और खुलेआम सिर्फ़ इस्लामोफोबिया के प्रोपगेंडे को आगे बढ़ाकर केंद्र सरकार को कोस रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर अयूब के केवल हाल के दो ट्वीट देखिए। एक ट्वीट में वे केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के बयान पर अपनी कुंठा व्यक्त करती हैं और दूसरे ही पल प्रधानमंत्री के बयान को अरब देशों का दवाब कहती हैं। अब हालाँकि दोनों ही ट्वीट को एक नजर में देखकर उनकी केंद्र सरकार के प्रति नफरत साफ पता चलती है। लेकिन यदि इन ट्वीटों पर थोड़ा समय दिया जाए तो ये भी पता चलता है कि राणा अयूब मोदी सरकार की बुराई करते-करते, हिंदुत्व को कोसते-कोसते उस गड्ढे में जाकर गिर पड़ी है। जहाँ पर उन्हें पाकिस्तान की तारीफ सुहाती है लेकिन वे ये नहीं समझ पातीं कि मुस्लिम पत्रकारिता करते करते जिस देश में वह रहती है, वे अब उसी के ख़िलाफ़ अपनी नफरतें जाहिर करने लगी हैं।

जी हाँ। वे मात्र मुस्लिम देशों को अपना आका समझने लगी है। स्थिति ये हो गई है कि उन्हें अगर झूठ नफरत फैलाने के लिए अपने विपक्षियों के बयानों से पर्याप्त माल पानी नहीं मिलता तो वे उसे खुद गढ़ लेती हैं। जैसा कि उन्होंने दो इन दो ट्वीट्स में किया। एक में वे वह देश के पीएम का मखौल उड़ाने से नहीं चूँकीं और इस बात को गुमान का विषय समझा कि उनका पीएम दूसरे देशों के दबाव में है। और दूसरे में वे देश की तारीफ करने वाले मंत्री पर इल्जाम लगाने से नहीं रुकी, जो उनके समुदाय का ही है। बस उसकी सोच कट्टरपंथियों ने नहीं मिलती

पहले ध्यान दीजिए प्रधानमंत्री मोदी ने दो दिन पहले अपने देश के नागरिकों को हिम्मत देने के लिए एक ट्वीट किया। उन्होंने उस ट्वीट में देश की ओर से विश्व को आश्वस्त किया कि कोरोना जैसी महामारी में वे एकजुट हैं। वे कहते हैं चूँकि कोरोना वायरस हमला करने से पहले धर्म, जाति, रंग, भाषा और सीमाएँ नहीं देखता है। इसलिए मुश्किल वक्त में सबको साथ मिलकर इस चुनौती से निपटने की जरूरत है।

अब, इस महामारी के दौरान और कथित इस्लामोफोबिया की अफवाहों के बीच ये ट्वीट देश के प्रधानसेवक की ओर से आना एक सामान्य और सराहनीय बात है। लेकिन राणा अयूब को इसमें अरब व इस्लामिक देशों का दबाव दिखता है। वो मानती है कि इस्लामिक देशों की फटकार के कारण प्रधानमंत्री एकजुट होने की बात कह रहे हैं। वरना उनकी नजर में तो नरेंद्र मोदी सिर्फ़ भारत को हिंदुओं का देश बनाना चाहते हैं। 

यहाँ दिलचस्प चीज़ ये भी देखने वाली है कि आज जिस अरब देश की आड़ में अयूब नाक ऊँची कर रही हैं। उसी अरब देश को वे उस समय कोस चुकी हैं, जब उसने प्रधानमंत्री को highest civilian award से सम्मानित किया था। पर, आज चूँकि अयूब की धारणा है कि यूएई व अन्य इस्लामिक देशों के कारण प्रधानमंत्री ने ऐसा ट्वीट किया तो उन्हें उनकी तारीफ करने से कोई गुरेज नहीं है और उन्हें अपना कर्ता-धर्ता मानने से भी।

इसके बाद, केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के बयान पर अयूब की प्रतिक्रिया देखिए। जहाँ वे उनके प्रति अपनी कुँठा निकालती हैं और भाजपा नेता को केंद्र सरकार के कर्मों को व्हॉइटवॉश करने वाला करार देती हैं। क्यों? ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि नकवी मानते हैं कि भारत मुस्लिमों के लिए एक सुरक्षित और सुंदर देश हैं। साथ ही ये भी कहते हैं कि इस देश में मुस्लिमों के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार सुरक्षित हैं।

जाहिर है। मुख्तार अब्बास नकवी की ये बात राणा अयूब को क्यों पचेगी। जिनका मानना है कि आऱएसएस के कार्यकर्ता  मुस्लिमों के घर में घुसकर उन्हें मारते हैं। जिनकी तारीफ पाकिस्तान तक करता है। जो प्रोपगेंडा फैलाने और इस्लामोफोबिया को बढ़ाने के लिए हिंसा के माहौल में भी मस्जिद में तोड़-फोड़ का वीडियो शेयर कर देती हैं। कोरोना के बीच सिर्फ़ अपना अजेंडा ट्विटर पर चलाती है। वे खुलकर मुस्लिमों से संबंधित घटनाएँ अपने ट्वीट पर शेयर करती है, उनके लिए एक्टिव हो जाती हैं। मगर, साधुओं की लिंचिग को बात करने का विषय भी नहीं समझतीं। वे विदेशों में भारत के ख़िलाफ़ कही बातों को प्रमुखता से बताती हैं और रमजान को महसूस करती हैं। मगर स्वास्थ्यकर्मियों पर होते अत्याचारों से कोई सरोकार नहीं रखती… वहीं राणा अयूब बिलकुल जाहिर है कि वे मुख्तार अब्बास नकवी की बात पर अपना गुस्सा दिखाए और केंद्र सरकार पर अपनी कुंठा निकालें।

क्योंकि, दिक्कत वास्तविकता में ये नहीं है कि उनकी सोच के ख़िलाफ़ भी कोई उसी समुदाय का व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया देता है। उनकी दिक्कत तो ये है कि वो जो चाहती हैं आखिर उसे उनका विपक्षी क्यों नहीं बोल रहा। उनकी परेशानी ये है कि न ही कोई भारत की तारीफ में दो शब्द बोले और न ही भारत की ओर से लोगों को आश्वस्त करे। उन्हें चाहिए अपने प्रोपगेंडा के लिए हवा, उन्हें चाहिए उसके लिए सामग्री। अगर विपक्षी उन्हें ये सब समय समय से मौजूद कराता रहता है तो उनका इस्लामोफोबिया का रोना जारी रहता है यानी उनके अस्तित्व को ऑकसीजन मिलती रहती है। लेकिन जैसे ही कोई देश में एकजुटता की बात करता है, मुस्लिमों को यहाँ सुरक्षित बताता है तो वो भड़क जाती हैं। उन्हें लगता है जैसे देश और देश की सरकार इस्लामिक देशों में उनकी छवि को धूमिल कर देंगे। फिर आखिर पाकिस्तान का कौन पत्रकार उनकी तारीफ करेगा और उन्हें पत्रकारिता की आड़ में कट्टरपंथ फैलाने का सहारा देगा। वे कैसे अपना अजेंडा चलाएँगी और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ एक निश्चित पाठकों को बरगलाएँगी।

बंगाल में शवों के साथ रहने को मजबूर कोरोना संदिग्ध, आइसोलेशन वॉर्ड के भीतर का वीडियो हुआ वायरल

पश्चिम बंगाल में आसनसोल के भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो ने कल कोरोना संक्रमितों के लिए किए गए इंतजाम की पोल पट्टी खोलते हुए ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो में दिखाया गया कि किस तरह टोलीगंज के एमआर बंगूर अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड के नाम पर कोरोना संदिग्धों को बदइंतजामी के साथ रखा जा रहा है। उन्होंने इस वीडियो पर ममता बनर्जी का ध्यान आकर्षित करवाते हुए पूरे मामले पर इंक्वायरी करवाने की अपील की। भाजपा नेता ने इस वीडियो पर हैरानी जताते हुए कहा कि ये वीडियो हर मायने में हैरान करने वाली है। इसके तथ्यों पर जल्द पड़ताल होनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि वीडियो को बनाने वाले व्यक्ति ने इसमें एक डेड बॉडी की तरफ कैमरा किया हुआ है और करीब 45 सेकेंड तक उसे दिखाया है कि कैसे वहाँ पड़े शव को कोई अटेंड करने नहीं आ रहा और उसके आस-पास लोग बिना सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किए घूम रहे हैं।

वीडियो बनाने वाले व्यक्ति ने दावा किया कि वहाँ अस्पताल प्रशासन ने शवों को डिस्पोज करने के लिए कोई प्रावधान नहीं किए हैं। उसने दर्शकों को दिखाने के लिए दूसरे शव की तरफ भी कैमरा घुमाया, जिसे वॉर्ड में ही थोड़ी दूर पर काले पर्दे के पीछे रखा गया है। वीडियो में उसने ये भी दिखाया कि वॉर्ड में लोग आसपास घूम रहे हैं और शवों के पास जाने से भी गुरेज नहीं कर रहे।

व्यक्ति वीडियो में कहता है कि यहाँ ऐसे लोग हैं, जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, लेकिन फिर भी राज्य में तेजी से परीक्षण के लिए कोई प्रावधान नहीं है। यहाँ टेस्ट का रिजल्ट भी कम से कम 4 से 5 दिनों के बाद आता है। वीडियो में गौर देने वाली बात है कि जैसे-जैसे कैमरा घूम रहा है- वहाँ वॉर्ड का सारा नजारा देखने को मिल रहा है और मालूम पड़ता है कि बेडों को भी उचित दूरी के हिसाब से नहीं सेट किया गया है।

अस्पताल में भर्ती इस मरीज के अनुसार, वह अस्पताल के वार्ड में गुरुवार को भर्ती हुआ है और उसने अब तक 5 से 6 लोगों की मौत होते देखी। उसके मुताबिक मरने वालों में ज्यादातर को साँस की दिक्कत के कारण जान गँवानी पड़ी। मुमकिन है इसका कारण उनका कोरोना पॉजिटिव होना ही रहा हो। लेकिन, वे टेस्ट का परिणाम आने से पहले ही चल बसे। मरीज कहता है कि उसे नहीं पता कि प्रशासन ने उनकी बॉडी के साथ क्या किया।

वॉर्ड की स्थिति दिखाते हुए मरीज ने कैमरा एक बुजुर्ग की ओर घुमाया और कहा, “जब दादाजी अस्पताल आए थे, वो बिलकुल ठीक थे। पर उन्हें खाँसी की शिकायत है।” बता दें कि इस वीडियो में सबसे चिंताजनक बात ये देखने को मिली कि प्रशासन जिंदा लोगों के प्रति तो लापरवाही बरत ही रहा, मगर जो मर गए हैं उन्हें भी वहाँ से निकालने काम नहीं कर रहा। उनके शव कोरोना संदिग्धों के बीच में ही पड़े हुए हैं।

गौरतलब है कि ये मामला सिर्फ़ इतना ही नहीं है। तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में बंगाल सरकार पर तथ्यों को छिपाने और आँकड़ों में हेराफेरी के आरोप लगे हैं। जिसके कारण इस समय ये मुद्दा पश्चिम बंगाल में अधिकारियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी चिंता बन गई है। इसके कारण तृणमूल कॉन्ग्रेस और डॉक्टरों के बीच विवाद भी बढ़ रहा है। 

स्वास्थ्यकर्मियों का मत है कि राज्य सरकार जबरदस्ती स्वास्थ्य प्रशासन को कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का डेटा सामने लाने से रोक रही है और कह रही है कि जब तक राज्य सरकार द्वारा नॉमिनेटिड पैनल मौतों को कोरोना से हुई मौतें नहीं घोषित करता तब तक वे इस पर कुछ न करें। इसके अलावा ICMR की कोलकाता विंग का ये भी आरोप है कि टीएमसी ने कोरोना संबंधित टेस्टों की गति को धीरे किया हुआ है।

रायबरेली के 33 नए कोरोना पॉजिटिव मामलों में 31 तबलीगी जमात से जुड़े, कई गलियों में जाकर बेचते थे फल सब्जी

उत्तर प्रदेश का रायबरेली कोरोना वायरस का नया केंद्र बन गया है। मंगलवार (अप्रैल 21,2020) को यहाँ एक साथ 33 नए कोरोना के मरीज सामने आए हैं। नए मरीजों के मिलने के बाद जिले में अब कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 35 हो गई है। एक साथ 33 मरीज पॉजिटिव मिलने से जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है, क्योंकि अभी तक जिले में मात्र 2 मरीज थे, जिससे सभी अधिकारी राहत की साँस ले रहे थे।

मगर एक साथ 33 कोरोना पाॅजिटिव मरीज मिलने से अफरा तफरी का माहौल पैदा हो गया है। आनन-फानन में प्रशासनिक और स्वास्थ्य टीम की ओर से सभी मरीजों को क्वारंटाइन कराया गया है। फिलहाल एहतियात के तौर पर शहर के फातिमा मस्जिद क्षेत्र को और बछरावा क्षेत्र को हॉटस्पॉट घोषित कर सील कर दिया गया है। जानकारी के मुताबिक 31 मरीज तबलीगी जमात से जुड़े हैं।

33 कोरोना मरीजों में 16 सहारनपुर जिले के हैं। जिन्हें कृपालु इंस्टिट्यूट में पूर्व में क्वारंनटाइन किया गया था। इनका ब्लड सैंपल एसजीपीजीआई लखनऊ भेजा गया था जिसकी रिपोर्ट पाजिटिव आई है। इसके अलावा रायबरेली निवासी 17 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पाजिटिव आई है।

रायबरेली के पाजिटिव लोगों में 7 कोतवाली रायबरेली के निवासी हैं तो बछरावाँ के 5, नसीराबाद कोतवाली क्षेत्र का 1, रोहनिया थाना क्षेत्र के 2, व दो अन्य थाना क्षेत्रो के हैं। अधिकारियों के मुताबिक इनमें से कुछ को पूर्व में शहर की फातिमा मस्जिद से पकड़कर कृपालु इंस्टिट्यूट में क्वारंटाइन किया गया था और कुछ को बछरावाँ कोतवाली क्षेत्र के कस्बे में एक घर से। इनमें से कई दिल्ली के निजामुद्दीन से जमात कर बस्ती जिले से होकर यहाँ आए थे।

2 कोरोना पॉजिटिव जमाती ने किया 33 को संक्रमित

इससे पहले उस समय हड़कंप मच गया था, जब क्वारंटाइन किए गए दो जमाती मोहम्मद नाजिम और अलीम की कोरोना रिपोर्ट पाजिटिव आई थी। आनन-फानन मे प्रशासनिक अधिकारी, स्वास्थ्य महकमे के अधिकारी और पुलिस बल मस्जिद पहुँचे। दोनों जमाती को टीम ने जिले के रोहनिया मे बने क्वारंटाइन रूम मे शिफ्ट कराया। बताया जा रहा है कि जो कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, ये मरीज उन्ही दो संक्रमित जमाती के संपर्क में आए थे। 

सब्जी बेचते थे संक्रमित, इसलिए बढ़ी मुसीबत

रायबरेली में संक्रमित मिले लोगों को लेकर जिला प्रशासन इसलिए ज्यादा चिंतित है, क्योंकि इनमें से अधिकांश फल-सब्जी का ठेला लगाते थे। ये लोग गलियों में जाकर फल सब्जी बेचते थे। अब जिला प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर है कि वह पता लगाए कि इन लोगों ने कहाँ-कहाँ और किसे-किसे फल सब्जियाँ बेचीं।