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भारत ने चीन को सबक सिखाने के लिए बदले FDI के रूल, करोड़ों के नुकसान से घबराया ‘वुहान’ कोरोना वायरस का जनक

पूरी दुनिया को मौत की सौगात देकर चीनी कम्पनियाँ तेजी से अपने व्यापार को बढ़ाने मे लगीं है। चाइना के सेंट्रल बैंक द्वारा भारतीय कंपनी हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कॉपोर्रेशन (HDFC) में हिस्सेदारी बढ़ाकर 1 फीसदी से ज्यादा बढ़ा लिया है। ऐसी खबरें आई है कि कोरोना से फैली अफरा-तफरी का फायदा उठाते हुए चीन पूरी दुनिया में अपना निवेश तेजी से बढ़ा रहा है।

जिसके चलते भारत सरकार ने FDI के नियमों को थोड़ा सख्त करते हुए विदेश से होने वाली निवेश के लिए सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया है। साथ ही सरकार ने आदेश जारी करते हुए कहा है कि जिन-जिन देशों से भारत की सीमा लगती है वहाँ से होने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट को पहले सरकार से मंजूरी लेनी होगी। अब तक ये इन्वेस्टमेंट ऑटोमेटिक रूट से हो जाते थे। अब चीन समेत सभी पड़ोसी देशों से FDI पर मंजूरी लेनी जरूरी होगी।

भारत सरकार के इस कदम से चीन बुरी तरह से बौखला गया है। चीन ने भारत के इस कदम को WTO नियमों का उल्लंघन और भेदभावपूर्ण बताया है। चीन ने भारत के इस कदम को मुक्त व्यापार के खिलाफ भी बताया है। चीन की तरफ से कहा गया है कि चीन ने भारत में बहुत बड़ा निवेश किया है। भारत में चीन ने 8 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। चीन के निवेश से भारत में बहुत सारे जॉब क्रिएट हुए हैं। चीन ने अभी सिर्फ भारत सरकार को एक चिट्ठी लिख कर अपनी आपत्ति जताई है। लेकिन आगे ये मामला WTO तक जा सकता है।

बता दें ऐसा सिर्फ भारत ने ही नही किया है, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, इटली भी ऐसे कदम उठा चुके हैं। कोरोना की वजह से ये कदम उठाए गए हैं। सरकार के इस कदम का लक्ष्य वैल्यूएशन में गिरावट का फायदा उठाने वालों पर सख्ती करना है।

आख़िर भारत को क्यों उठाना पड़ा ये कदम

रिपोर्ट्स के अनुसार चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने हाउसिंग लोन देने वाली भारत की दिग्गज कंपनी HDFC लिमिटेड के 1.75 करोड़ शेयर खरीद लिए है। चीन के पीपल्स बैंक (PBOC) ने मार्च तिमाही में कंपनी में अपनी हिस्सेदारी 0.8 फीसदी से बढ़ाकर 1.01 फीसदी कर लिया है। पीपल्स बैंक ने यह हिस्सेदारी ओपन मार्केट से खरीदी है। ऐसे में कई लोग इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि FDI रूट के जरिए ओपन मार्केट से स्टेक खरीदना अधिग्रहण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।

‘हनुमान और गणेश जानवर हैं, जीसस को अपनाओ: देखिए कैसे पालघर में चल रहा था घृणा का खेल’

पालघर में दो साधुओं की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या के मामले में 110 लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं। वहाँ हुई इस घटना के बाद तरह-तरह को बातें सामने आ रही हैं। जैसे, वहाँ एक डॉक्टर पर हमला हो चुका था और एक मानसिक रूप से बीमार तमिल व्यक्ति को मारा-पीटा गया था, जिसके बाद पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। हत्यारी भीड़ के साथ एनसीपी और सीपीएम के नेताओं की मौजूदगी भी संदेह खड़ा करती है। आख़िर क्या कारण है कि साधुओं के प्रति घृणा का अंजाम इस वारदात के रूप में हुआ? भगवा के प्रति इस घृणा का कारण क्या? पहली नज़र में ही ये आम वारदात नहीं लगती।

उस क्षेत्र में मिशनरियों का प्रभाव होने की बात भी पता चली है। यहाँ 2019 में ही मिशनरियों का एक वीडियो सामने आया था, जो बताता है कि वो धर्मान्तरण के लिए क्या-क्या कर रहे हैं। क्या उन्हें ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, जो लगातार लोगों में हिन्दू देवी-देवताओं और साधु-संतों के ख़िलाफ़ ज़हर भरने में लगे रहते हैं। अप्रैल 2019 में ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसकी चर्चा अब फिर से हो रही है। ये वीडियो मिशनरियों की सच्चाई को बयान करता है।

इस वीडियो में मिशनरी कहते दिख रहे हैं कि गणपति तो हाथी हैं और हनुमान एक बन्दर हैं, ऐसे झूठे भगवान तुम्हें कैसे बचा सकते हैं? साथ ही वो जीसस क्राइस्ट को स्वीकार करने की अपील भी कर रहे हैं। ये वीडियो महाराष्ट्र के कोंकण स्थित पालघर का था, जहाँ से कुछ दूरी पर आज ये घटना हुई है। जहाँ साधुओं की हत्या हुई, वो भी पालघर जिला ही है। भगवान गणेश और हनुमान के लिए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने वाले ये मिशनरी लोगों के दिलों में हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति घृणा भर रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में अक्सर सामने आता ही रहता है। देखें वीडियो:

पालघर हत्याकांड पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर भी सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने भी तभी ट्वीट किया, जब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। साथ ही इसे साम्प्रादायिक एंगल न देने की अपील भी की गई। एनसीपी और सीपीएम नेताओं की मौजूदगी पर सरकार की तरफ से कुछ नहीं कहा गया है। उद्धव ठाकरे ने आज फिर से बयान दिया, जिसमें उनका पूरा जोर इसे सांप्रदायिक रंग न देने को लेकर था। हालाँकि, शिवसेना के अन्य नेतागण सोशल मीडिया पर इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप करने में ही जुटे हुए हैं। तभी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र सरकार से रिप्लाई माँगा है।

दिखा लॉकडाउन का व्यापक असर, 3.4 के बजाए अब 7.5 दिन में दोगुने हो रहे केस: स्वास्थ्य मंत्रालय

भारत में बढ़ रहे कोरोना वायरस के मामलों को लेकर स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के संयुक्‍त सचिव लव अग्रवाल ने अहम जानकारी दी है। लव अग्रवाल ने कहा कि केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री हर्षवर्धन ने राजीव गाँधी स्‍पेशियलिटी हॉस्पिटल का दौरा किया। जिस दौरान उन्होंने स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों के मेहनत और योगदान की प्रशंसा की। लॉकडाउन से पहले और अब की तुलना में उन्होंने बताया कि कोरोना वायरस के मामले आए दिन काम होते नजर आ रहें हैं। जहाँ आँकड़े लॉकडाउन से पहले मरीजों की संख्या 3.4 दिन में दोगुनी हो रही थी। वहीं अब मरीजों की संख्या 7.5 दिन में डबल हो रही हैं।

18 राज्यों मे इसका बेहतर प्रदर्शन देखा गया है। कुछ राज्यों में मामले डबल होने की दर 20-30 दिनों से भी अधिक है। साथ ही ओडिशा और केरल में यह दर 30 दिन से भी ज्‍यादा है। गोवा में अब कोरोना वायरस का कोई भी सक्रिय केस नहीं है। काफी पुराने मरीज अबतक ठीक भी किए जा चुके हैं।

अन्य राज्यों में मरीजों के संख्या

बाकी राज्यों की बात करे तो दिल्‍ली में 8.5 दिन में मामले डबल हो रहे हैं। जबकि कर्नाटक में 9.2 दिन, तेलंगाना में 9.4 दिन में, आंध्र प्रदेश में 10.6 दिन में, जम्मू-कश्मीर में 11.5 दिन, पंजाब में 13.1 दिन, छत्तीसगढ़ में 13.3 दिन, तमिलनाडु में 14 दिन और बिहार 16.4 दिन में मामले डबल हो रहे हैं।

भारत के कई राज्य ऐसे भी, जहाँ 14 दिन से कोई नया केस नही

जानकारी के मुताबिक 59 जिले ऐसे भी हैं, जहाँ 14 दिनों से कोरोना वायरस का एक भी मामला सामने नहीं आया है। और यहीं वजह है कि लॉकडाउन को भारत का सफल कदम बताया जा रहा हैं। 19 अप्रैल तक 18 राज्यों में डबलिंग रेट की औसत देश की औसत से बेहतर है। उन्‍होंने कहा कि कुछ हॉटस्पॉट्स की वजह से कोरोना की स्थिति बिगड़ रही है और बिगड़ती ही जा रही है। जल्द से जल्द इन सभी जगहों की स्थिति का आकलन कर सख्त कदम भी उठाए जा रहें है। साथ ही इस आपदा से जल्द निजात पाने के लिए प्रबंधन अधिनियम 2005 के अंतर्गत गृह मंत्रालय ने 6 इंटर मिनीस्टीरियल सेंट्रल टीमों का गठन किया है।

औरंगज़ेब से हरिद्वार और वाराणसी को बचाया, आज अपने ही देश में मारे जा रहे: दशनामी नागा साधुओं का उपकार भूल गया देश

महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं सहित 3 लोगों की मॉब लिंचिंग गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) को कर दी गई, जो साधु-संतों और भगवा के प्रति घृणा से सने माहौल की ओर इशारा करता है। भीड़ के साथ एनसीपी और सीपीएम नेताओं के खड़े होने की बात भी सामने आई। 3 दिनों बाद जब इस वीभत्स घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होना शुरू हुआ, तब आमजनों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। तब जाकर पुलिस कहीं हरकत में आई और 110 लोगों की गिरफ़्तारी व 2 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने की बात कही गई। वीडियो में देखा जा सकता है कि वृद्ध साधु ने बचाव के लिए पुलिसकर्मी का हाथ पकड़ा तो उसने झटक दिया।

वो दोनों साधु कल्पवृक्ष गिरी और सुशील गिरी दशनामी सम्प्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। इनका इतिहास देशभक्ति से ओतप्रोत है, जिसकी चर्चा हम करेंगे लेकिन उससे पहले दशनामी क्या होते हैं, ये जानकारी दे दें। जैसा कि हमें पता है, बौद्ध मठों और विहारों के पतन के बाद भारत में अद्वैत दर्शन का प्रभाव बढ़ा और वैदिक सिद्धांतों की पुनर्स्थापना होने लगी। इसमें आदि शंकराचार्य का योगदान था, जिन्होंने देश के चार कोने में चार मठ स्थापित किए। इनमें स्थापित सन्यासियों के 10 सम्प्रदायों को शंकराचार्य ने अरण्य, आश्रम, भर्ती, गिरी, पर्वत, पुरी, भारती, सरस्वती, सागर, तीर्थ और वन नामक 10 सम्प्रदाय स्थापित किए।

दशनामी साधुओं का प्रारंभिक इतिहास

आप देखते होंगे कि इनमें से कई सरनेम के रूप में विख्यात हैं। दरअसल, अलग-अलग संप्रदाय के सन्यासियों ने इन्हीं नामों को अपना अंतिम नाम बना लिया। इससे उनके संप्रदाय की स्वतः पहचान हो जाती है। शंकराचार्य द्वारा स्थापित शैव संप्रदाय के सन्यासी ही दशनामी कहलाए। दशनामी में कई नागा भी हुए, जिनका युद्ध का पुराना इतिहास रहा है। पहले दशनामी संप्रदाय के सन्यासी आमतौर पर नंगे रहा करते थे। ‘जनसत्ता’ के संस्थापक संपादक रहे प्रभाष जोशी ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू होने का धर्म‘ में उल्लेख किया है कि दशनामी साधु देश भर में घूमा करते थे लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इन पर पाबंदियाँ लगा दी।

उन्हें गाँवों और बस्तियों में जाने से रोका जाने लगा। कुम्भ और सिंहस्थ में भी इन्हें परेशान किया गया लेकिन इन्होने अपनी पुरातन परंपरा जारी रखी। इन्हें युद्धक सन्यासी भी कहा जाने लगा क्योंकि ये अस्त्र-शास्त्र और लड़ाई में निपुण होते चले गए। ये अधिकतर राजस्थान में फैले मठों में रहते थे जो भिक्षा माँग कर खाते थे और सिपाही के रूप में भी काम करते थे। कर्नल टॉड ने इनके बारे में लिखा है कि ये मादक जड़ी-बूटी व द्रव्य का सेवन भी किया करते थे। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में इस्लामी आक्रांताओं का आतंक बढ़ गया था और फ़क़ीर भी सन्यासियों को मारने लगे थे, जिससे बनारस के मधुसूदन सरस्वती चिंतित थे।

उन्होंने ही सन्यासियों की युद्धक टुकड़ी बनाई, जो रक्षा के लिए तलवार उठाती थी। इसके लिए उन्होंने बादशाह अकबर तक भी अपनी बात पहुँचवाई थी। इस टुकड़ी की खासियत ये थी कि इसमें सभी जातियों के लोग शामिल थे। ऐसा नहीं है कि इससे पहले युद्ध करने वाले सन्यासी नहीं होते थे, वो पहले भी मौजूद थे। दशनामी सम्प्रदायों में ही अखाड़े होते हैं। इनमें से जूना अखाडा सबसे लोकप्रिय है, जिसे भैरव अखाडा भी कहा जाता है। पालघर में मारे गए दोनों ही साधु जूना अखाड़ा से ही सम्बन्ध रखते थे। इस अखाड़ा का मुख्यालय वाराणसी में है और दत्तात्रेय को इसका इष्टदेव माना गया है। इसी तरह महानिर्वाणी दशनामी का पाँचवा अखाड़ा है।

इस्लामी आक्रांताओं से किया था युद्ध

इसकी स्थापना झारखण्ड के कुण्डागढ़ स्थित सिद्देश्वर मंदिर में हुई थी। वाराणसी में जब औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मंदिर हमला करवाया था तो इन्हीं सन्यासियों ने मंदिर की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे। वाराणसी को औरंगज़ेब के कहर से इन्हीं सन्यासियों ने बचाया था। औरंगज़ेब की फ़ौज और इन सन्यासियों के बीच भीषण लड़ाई हुई थी। इसका मुख्य केंद्र प्रयाग में है और ये कपिल को अपना इष्ट मानते हैं। कुम्भ और सिंहस्थ में इन्हें आगे जगह दी जाती है। अंग्रेज मानते थे कि शैव और वैष्णव सन्यासी एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं, इसीलिए उन्होंने सन्यासियों के शस्त्र धारण पर रोक लगा दी। वैष्णव संप्रदाय के भी सन्यासी होते थे और उनमें से कई बैरागी कहे जाते थे।

अगर आज हम भारत के इतिहास को देखते हैं कि हमें पता चलता है कि इस्लामी आक्रांताओं से लड़ने में जहाँ हमारे योद्धाओं ने अहम भूमिका निभाई, साधु-सन्यासियों ने भी मंदिरों और धर्म की रक्षा के लिए जान दाँव पर लगा दिए। सोचा जाए तो ईसाई शक्तियों के पास सबकुछ था- अत्याधुनिक हथियार, धर्मान्तरण के लिए प्रलोभन और सत्ता का संरक्षण। इन सबके बावजूद अगर आज हिन्दू धर्म मजबूती से बचा हुआ है तो इसके पीछे आम जनमानस में राम-कृष्ण के प्रति आस्था जगाने वाले भक्ति योग के संतों के अलावा सन्यासियों के संघर्ष का भी योगदान है। आज इन्हीं साधु-संतों का अपमान हो रहा है, उनकी मॉब लिंचिंग कर दी जा रही है।

अगर नागा साधुओं की परंपरा की बात करें तो ये हजारों साल पुरानी है। कई प्राचीन वैदिक ग्रंथों में भी दिगंबर नागा साधुओं के संदर्भ मिलते हैं। अखाड़े के सदस्य शास्त्रों के साथ शस्त्र विद्या में भी निपुण होते थे ताकि अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए ज़रूरत पड़ने पर यज्ञ की समिधा के साथ अपने प्राणों की आहुति देने के लिए भी तैयार रहें। 1666 में जब औरंगजेब की सेना ने हरिद्वार पर हमला किया तो भी नागा साधु उनका विरोध करने के लिए योद्धाओं के रूप में आगे आए। आज ऐसे कई मंदिर जो औरंगजेब के समय ध्वस्त हो मस्जिद बनने से रह गए। उसमें तत्कालीन शासकों के साथ नागा साधुओं का बड़ा योगदान है।

सन्यासी विद्रोह: अँग्रेजों के ख़िलाफ़ उठाया हथियार

बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ भी सन्यासी उठ खड़े हुए थे, जिसे ‘सन्यासी रिबेलियन’ के रूप में जाना जाता है। ये 1770 में ही शुरू हो गया था, जब बक्सर युद्ध के बाद ब्रिटिश लोगो से टैक्स वसूलने लगे थे। सन्यासियों ने जलपाईगुड़ी के मुर्शिदाबाद और वैकुण्ठपुर जंगलों में सशस्त्र युद्ध किए। जहाँ बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपनी पुस्तक ‘आनंद मठ’ में इसे हिन्दुओं का आंदोलन कहा है, वामपंथी इतिहासकारों ने इसे साम्राज्यवाद और सामंतवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई बताया। अवध व बंगाल के नवाबों और महाराष्ट्र के राजपूत राजाओं की सेना में भी सन्यासियों को शामिल किया गया था। ये आंदोलन लगभग 5 दशक तक चलता रहा था।

सबसे बड़ी बात तो ये कि इसमें फकीरों ने भी सन्यासियों का साथ दिया था क्योंकि तब उनकी भी जान पर बन आई थी। आज देश में ऐसे ही सन्यासियों को कई लोग हेय दृष्टि से देखने लगे हैं, जिनका इतना उज्जवल इतिहास रहा है। जिन्होंने इस्लामी आक्रांताओं और अंग्रेजों से युद्ध किया, उन सम्प्रदायों के लोग आज सुरक्षित नहीं हैं। ऐसा तभी होता है, जब देश ने इनके उपकार को भूल कर इन्हें उचित सम्मान देना बंद कर दिया है। आज ज़रूरत है कि पाठ्यक्रमों में भी इन सन्यासियों की बहादुरी को शामिल किया जाए, जहाँ औरंगज़ेब और खिलजी की जीवनियाँ भरी पड़ी हैं। क्या हम इन सन्यासियों के प्रति कृतज्ञ नहीं हैं?

मुंबई में 53 पत्रकार हुए कोरोना संक्रमित: 171 लोगों का लिया गया था सैंपल, सभी को किया गया क्वारंटाइन

देश में कोविड-19 का कहर लगातार जारी है। अलग-अलग जगहों से इसके बढ़ते संक्रमण की खबरे आ रही हैं। हाल ही में इस महामारी की वजह से इंदौर के पुलिस अधिकारी की मौत की खबर सामने आई थी। यह महामारी अब उन लोगों को भी अपने चपेट में ले रही है, जो इस वक़्त देश की सेवा और सुरक्षा में दिन रात तैनात हैं।

इस बीच मुंबई से बड़ी खबर सामने आई है। खबर ये है कि यहाँ 53 मीडियाकर्मियों का टेस्ट पॉजिटिव आया है। इनमें से अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हुए हैं।पत्रकारों की एक एसोसिएशन के पदाधिकारी से मिली जानकारी के अनुसार पिछले सप्ताह यहाँ आयोजित एक विशेष शिविर में 171 मीडियाकर्मियों का परीक्षण किया गया था। जिसमें कम से कम 53 पत्रकार कोरोना संक्रमित पाए गए।

वहीं बृहन्मुंबई नगर निगम ने भी इस बात की पुष्टि की और बताया कि सभी पॉजिटिव मिले केसों को क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया है। साथ ही उन्होंने बताया फील्ड में काम कर रहे 171 लोगों का कोरोना टेस्ट लिया गया था, जिसमें फोटोग्राफर्स, कैमरामैन और रिपोर्टर्स शामिल थे। अधिकांश मामलों में कोई लक्षण देखने को नहीं मिले हैं। बाकी अन्य लोगों की टेस्ट रिपोर्ट अभी आनी बाकी है।

आपको बताते चलते हैं कि, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के द्वारा बीएमसी को मीडियाकर्मियों के लिए विशेष स्क्रीनिंग शिविर टीवी पत्रकारों के एसोसिएशन, मंत्रालय और अन्य रिपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुरोध के बाद आयोजित किया था।

16 व 17 अप्रैल को यह शिविर मुंबई प्रेस क्लब के पास लगाया गया था, जिसमें पत्रकारों और छायाकारों (फोटो जर्नलिस्ट) सहित 171 मीडियाकर्मियों की स्क्रीनिंग की गई थी।

टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनोद जगदाले ने इस आँकड़े को और भी ऊपर जाने की आशंका जताई है।

वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने भी इस महामारी को लेकर बताया कि 1553 नए मामले पिछले 24 घंटों में देशभर से दर्ज किए गए हैं। और पिछले 24 घण्टे मे 36 लोगों की मौत हो चुकी है। इस महामारी के कुल अब तक 17265 मामले सामने आ चुके हैं।

‘ऊँ’ के सामने सोफिया हयात ने दिया न्यूड पोज, जाहिर की कामेच्छा: हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाने पर दर्ज हुई FIR

इंस्टाग्राम पर धार्मिक रीति-रिवाजों और हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने वाली पूर्व बिग बॉस की प्रतिभागी सोफिया हयात अपनी एक विवादित फोटो के कारण दोबारा चर्चा में आ गई है। इस बार उनपर हिंदुओं के धार्मिक चिह्न ‘ऊँ’ के आगे अश्लीलता से फोटो खिंचाने का आरोप लगा। बता दें सोफिया ने अपने इंस्टाग्राम पर कई फोटोज शेयर की हैं। जिसमें वे शरीर पर मात्र एक दुपट्टा लिए हुए हैं और ऊँ की पेंटिग के सामने पोज दे रही हैं।

साभार:सोफिया हयात का इंस्टाग्राम अकाउंट

इसे देखकर सोशल मीडिया यूजर्स उनसे इस इस पोस्ट पर कमेंट करते हुए माफी माँगने के लिए कह रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया पर ही कुछ पोस्ट ऐसे भी देखने को मिल रही हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि सोफिया के खिलाफ शिकायत कर दी गई है।

अब हालाँकि, इससे पहली भी वे अपनी ऐसी हरकतों के कारण सोशल मीडिया पर कई आलोचनाओं का सामना कर चुकी हैं। लेकिन इस बार यूजर्स उन्हें इस तरह देखकर बहुत भड़क गए। दरअसल, सोफिया ने इस फोटो के कैप्शन में पहले अल्बर्ट आइंस्टाइन की कही बात को मेंशन किया था और फिर आध्यात्म के नाम पर ‘ऊँ’ व भगवान शिव के बारे में भी लिखा। जोकि सोशल मीडिया यूजर्स को रास नहीं आया।

सोफिया हयात का वो पोस्ट जिसे देखकर भड़के यूजर्स

उन्होंने इसके कैप्शन में लिखा है- “ओम ब्रह्माण्ड से आने वाली पहली कामुक ध्वनि है। यह परम आनंद और प्यार की अभिव्यक्ति है!!! यह शिव की शक्ति है! मैंने अपनी पवित्र कामेच्छा वापस ओम को सौंप दी है, क्योंकि इसे ओम ने ही दिया है।”

इसके अलावा एक दूसरे पोस्ट में सोफिया ने काली माँ की आपत्तिजनक तस्वीर साझा की है। जिसे देखकर भी सोशल मीडिया यूजर्स काफी नाराज हैं। एक यूजर तो ये सब देखकर इतना भड़का है कि उसने सोफिया के खिलाफ साइबर सेल में शिकायत दर्ज करवा दी है। साथ ही शिकायत करने वाले यूज़र ने ट्विटर पर कम्प्लेंट की एक कॉपी के साथ ये जानकारी दी है।

अपने ट्वीट में सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “अपने इंस्टाग्राम पर हिंन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने के लिए, सोफिया हयात के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी है। मैं उम्मीद करता हूँ कि सरकार ऐसे लोगों और एकाउंट्स के खिलाफ सख्त एक्शन लेगी।”

गौरतलब है कि हयात अपने इंस्टाग्राम पर कई तरह की तस्वीरें और वीडियोज शेयर करती रहती हैं। इनमें से अधिकतर धर्म व मजहब के नाम पर होतीं हैं। मगर इस बार विशेषत: उन्होंने हिंदू धर्म को लेकर टिप्पणी और उसके साथ टॉपलेस तस्वीर शेयर की। जिसके बाद लोगों ने उन्हें पहले सलाह दी और हिंदू भावनाओं को आहत करने पर एक्शन लेने की चेतावनी दी।

कोरोना जैसे संकटों को लाइलाज बना सकती है बेहिसाब जनसंख्या

कोरोना संकट ने आज एक बार फिर थॉमस माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत को प्रासंगिक बना दिया है। सन् 1798 में इस ब्रिटिश अर्थशास्त्री ने अपने बहुचर्चित लेख ‘एन एस्से ऑन द प्रिन्सिपल ऑफ़ पॉपुलेशन’ में प्रतिपादित किया था कि ‘प्रकृति अपने संसाधनों के अनुसार अकाल, आपदा, महामारी, युद्ध आदि के द्वारा जनसंख्या को नियंत्रित करती रहती है।’ ऐसा करना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि ‘जनसंख्या वृद्धि गुणात्मक (x) रूप में होती है, जबकि संसाधनों में वृद्धि धनात्मक (+) रूप में’ ही हो पाती है। इस बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या की असीमित भौतिक आवश्यकताएँ प्रकृति को कुरूप बनाकर क्रुद्ध करती हैं।

एक ओर, विश्व के अनेक अविकसित और अल्प-विकसित देशों में बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या आज भी एक बड़ी चुनौती है। वहीं दूसरी ओर, जिन विकसित देशों ने जनसंख्या को नियंत्रित कर लिया है, वहाँ उपभोक्तावाद चरम पर होने के कारण उनकी भौतिक आवश्यकताएँ और प्राकृतिक दोहन अनियंत्रित और असीमित है। परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस असह्य दबाव को संतुलित करने के लिए जनसंख्या को नियंत्रित करने के साथ-साथ उपभोग को भी सीमित करने की आवश्यकता है।

जनसंख्या और संसाधनों के असंतुलन के कारण बाढ़, भूकंप, चक्रवात आदि प्राकृतिक आपदाएँ; प्लेग, स्वाइन फ्लू, कोरोना संक्रमण जैसी महामारियाँ और तमाम छोटे-बड़े युद्धों आदि की निरंतरता बनी रहती है। इनमें लाखों-करोड़ों लोग असमय काल-कवलित होते रहते हैं। अंध-उपभोग और अति-संग्रह से भी समाज में अपराध और अनैतिकता बढ़ती है और मनुष्यता क्रमशः क्षतिग्रस्त होती है।

तेजी से बढ़ती जनसंख्या भारत के लिए एक समस्या

भारत देश में भी तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। आज भारत की जनसंख्या 130 करोड़ से भी अधिक है। भारत जनसंख्या की दृष्टि से चीन के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर है। एक अनुमान के अनुसार 2030 तक भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा।

उल्लेखनीय यह भी है कि भारत का जनसंख्या घनत्व चीन से लगभग तीन गुना अधिक है। यह तथ्य सर्वाधिक विचारणीय और चिंताजनक है। इस समस्या से निपटने के लिए इधर के कुछ वर्षों में कई संसद सदस्य निजी विधेयक लेकर आए हैं। उनमें भाजपा के राकेश सिन्हा एवं अजय भट्ट, शिवसेना के अनिल देसाई और कॉन्ग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी आदि प्रमुख हैं।

इन सभी निजी विधेयकों की केन्द्रीय चिंता सुरसा के मुँह की तरह लगातार बढ़ती जा रही जनसंख्या को नियंत्रित करना है। हालाँकि, दुःखद सच्चाई यह है कि इतनी बड़ी और भयावह समस्या होने के बावजूद इससे निपटने के लिए लाए गए इन विधेयकों में से कोई भी पास होकर कानून नहीं बन सका है।

ऐसा न हो पाने की कई राजनीतिक वजहें हैं। यह सीधे-सीधे वोट बैंक की राजनीति से जुड़ा हुआ मामला है। जिनकी जितनी अधिक जनसंख्या, उनके उतने अधिक वोट और उनकी उतनी ही अधिक सुनवाई… लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनसंख्या निर्णायक दबाव-समूह होती है। जनसंख्या नियंत्रण विधेयक को मुस्लिम और दलित-पिछड़ा एवं गरीब विरोधी कहकर दुष्प्रचार किया जाता है। इन समुदायों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल तो उसका विरोध करते ही हैं, अन्य राजनीतिक दल भी वोटों के संभावित नुकसान की आशंका के कारण निर्णायक पहल करने से बचते हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि समस्त भारतवासी इस विकराल बन चुकी समस्या के बारे में सोचें और उसके समाधान की दिशा में सक्रिय हों।  

सीमित संसाधनों पर बढ़ती जनसंख्या का दवाब

भारत जैसे विकासशील देश में संसाधन और सुविधाएँ सीमित हैं। इन सीमित संसाधनों पर बढ़ती हुई जनसंख्या का बेहिसाब दबाव है। इसी कारण हमारे देश में भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि आधारभूत आवश्यकताओं के लिए जबर्दस्त मारामारी है। सरकारी विद्यालयों-अस्पतालों से लेकर नामी-गिरामी निजी विद्यालयों-अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, हवाई अड्डों, होटल-रेस्टोरेंटों, पर्यटन-स्थलों, सड़कों, बाजारों, थानों-न्यायालयों, सरकारी कार्यालयों आदि जगहों पर बेहिसाब भीड़ रहती है। प्रत्येक स्थान पर लम्बी-लम्बी लाइनें रोजमर्रा का दृश्य है। छोटी-छोटी सुविधाओं और जरूरतों के लिए लम्बी प्रतीक्षा स्थायी जीवन-स्थिति है।

कुछ परंपरागत अर्थशास्त्री इसे अर्थव्यवस्था की गतिशीलता और विकास का सूचक मानते और बताते हैं। परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि जनसंख्या और मानव संसाधन में अंतर होता है। कमाने वाले हाथों और खाने वाले मुँह में पारस्परिक अनुपात होना आवश्यक है। वर्तमान युग तो मशीन और तकनीक का है। इस कलयुग में तो कमाने वाले हाथों को सोचने वाले मस्तिष्क ने काफी हद तक प्रतिस्थापित कर दिया है।

गौरतलब है कि जनसंख्या को मानव संसाधन बनाने के लिए आधारभूत ढाँचे, साधन-संसाधन और सुविधाओं की आवश्यकता होती है। अनिवार्य पौष्टिक आहार, पेयजल, समुचित स्वास्थ्य, स्तरीय शिक्षा और कौशल विकास की व्यवस्थाओं/सुविधाओं द्वारा ही जनसंख्या को मानव संसाधन बनाया जा सकता है।

भारत जैसे विकासशील देश की तो खैर बिसात ही क्या पर किसी विकसित देश में भी ये संसाधन और सुविधाएँ असीमित नहीं हो सकती हैं। कृषि भूमि और उसकी उत्पादन क्षमता, अन्यान्य प्राकृतिक संसाधन; यहाँ तक कि शुद्ध जल और वायु भी असीमित नहीं हैं। साधन-सुविधाओं के अभाव और बढ़ते अपराध के अंतर्संबंध को भी नज़रन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या, अशिक्षा, गरीबी, अस्वास्थ्य, पर्यावरण असंतुलन व प्राकृतिक क्षरण के दुश्चक्र (VICIOUS CYCLE) से हम सब अनभिज्ञ नहीं हैं।

इन सभी सुविधाओं के अभाव और संसाधनों पर निरंतर बढ़ते दबाव ने न सिर्फ मानव-स्वभाव और चरित्र को विकृत किया है, बल्कि प्रकृति के स्वरूप को भी बदरंग और विध्वसंक बना डाला है। प्रकृति मनुष्य की सबसे निकटस्थ मित्र और सहचरी होती है, किन्तु अत्यधिक दोहन और शोषण ने उसे शत्रु और संहारक बना दिया है। इसलिए लगातार प्राकृतिक आपदाएँ आती रहती हैं। मानव द्वारा प्रकृति के अति-दोहन से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन इन आपदाओं का आदिस्रोत है।

जनसंख्या की असमानता आर्थिक-शैक्षणिक तथा धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक परिस्थिति पर भी निर्भर

भारत में जनसंख्या का अत्यंत असमान वितरण है। जनसंख्या की यह असमानता न सिर्फ आर्थिक-शैक्षणिक स्तर बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक परिस्थिति पर भी निर्भर करती है। उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर या प्रजनन क्षमता दर पूर्वी भारत और उत्तर भारत से काफी कम है। हिंदी प्रदेशों की स्थिति इस मामले में सर्वाधिक चिंताजनक है। यह अकारण या अस्वाभाविक नहीं है कि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे जिन राज्यों की आर्थिक विकास गति और साक्षरता दर कम है, उनकी जनसंख्या वृद्धि दर बहुत अधिक है। जबकि केरल और गुजरात जैसे राज्यों का मामला इनसे ठीक उलट है।

परिणामस्वरूप देश में जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा है। भारत में प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र है। प्रत्येक 25 वर्ष में पिछली जनगणना की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाता है। ऐसी स्थिति में जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में पहल की है, उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा और संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। यह आशंका सिर्फ राज्यों की ही नहीं है, बल्कि तमाम धार्मिक और जातीय समुदायों का भी यही डर है। उनका यह डर और चिंता वाजिब ही है। भारत सरकार को इस दिशा में निर्णायक पहल करते हुए जल्दी-से जल्दी जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाना चाहिए ताकि ऐसी आशंकाओं की समाप्ति के साथ-साथ समावेशी और संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सके।

जनसंख्या का अपेक्षाकृत समान वितरण और जनसांख्यिकीय संतुलन राष्ट्रीय शान्ति और समृद्धि की आधारभूत शर्त है। ‘हम दो हमारे दो’ जैसे जागरूकता कार्यक्रम मात्र इस समस्या का समाधान नहीं हैं। ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका तो है किन्तु वही पर्याप्त नहीं है और जनसंख्या नियंत्रण कानून का स्थानापन्न नहीं है।

इन जागरूकता कार्यक्रमों की नई भूमिका इस क़ानून के पक्ष में माहौल बनाने की हो सकती है। निहित स्वार्थों द्वारा इसे जातीय और साम्प्रदायिक रंग दिए जाने की कोशिशों के प्रति भी लोगों को सजग और सावधान किया जा सकता है। साथ ही, तमाम देशवासियों को बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या से उनके जीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों से भी अवगत कराया जा सकता है। यह एक सर्वस्वीकृत तथ्य है कि एक सीमा से ज्यादा बढ़ जाने पर जनसंख्या अमीरों से कहीं अधिक गरीबों के जीवन-स्तर को प्रभावित करती है। भारत देश उस सीमा को पार कर चुका है।

संजय गाँधी का 5 सूत्रीय कार्यक्रम और राज्यों द्वारा जनसंख्या पर उठाए गए कदम

आपातकाल के दौरान संजय गाँधी ने जो 5 सूत्रीय कार्यक्रम लागू किया था, उसमें जनसंख्या नियंत्रण भी एक था। हालाँकि, उस वक्त इस क़ानून की आड़ में लोगों के साथ अत्यधिक अमानवीय व्यवहार और जोर-जबर्दस्ती की गई थी। उसके बाद भी कई बार जनसंख्या नियंत्रण क़ानून बनाने की छुट-पुट कोशिशें हुईं, किन्तु उनमें गंभीरता और इच्छाशक्ति का अभाव था। इसलिए इस दिशा में आजतक कुछ भी ठोस नहीं हो सका है। बिहार, राजस्थान और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों ने पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए दो से अधिक संतान वाले दंपतियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने जैसी छोटी-मोटी पहल तो की है, पर समस्या की व्यापकता और विकरालता के अनुपात में ये कोशिशें ऊंट के मुँह में जीरे से अधिक नहीं हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून बनाकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। इस क़ानून में दंडात्मक और प्रोत्साहनात्मक- दोनों तरह के प्रावधान करने की आवश्यकता है। जिस दिन यह कानून पारित हो उसके 9 महीने बाद दो से अधिक संतानों वाले दंपतियों को सरकार से मिलने वाली विभिन्न सुविधाओं और लाभकारी योजनाओं के लिए अपात्र मानते हुए वंचित किया जाना चाहिए।

ग्राम-पंचायत से लेकर संसद और पंच से प्रधानमंत्री तक; प्रत्येक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाए। तीसरा बच्चा होते ही पिता को और चौथा बच्चा होते ही माँ को मताधिकार से वंचित किया जाए ताकि परिवार के वोट बढ़ाकर अपना महत्व बढ़ाने की प्रवृत्ति को रोका जा सके। नौकरी और प्रोन्नति से भी ऐसे लोगों को वंचित किया जाए। दो से अधिक बच्चे वाले दंपतियों को न सिर्फ विभिन्न कर छूटों से वंचित किया जाए बल्कि संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाने के लिए उनके ऊपर अच्छा-खासा जनसंख्या अधिभार भी लगाया जाए। इसी प्रकार सिर्फ एक संतान या फिर दो कन्याओं को जन्म देने वाले दंपतियों को अतिरिक्त कर छूट आदि सुविधाएँ दी जाएँ।

ऐसे नौकरी-पेशा लोगों को वन्ध्याकरण/नसबंदी कराने पर दो वेतनवृद्धियों (INCREMENTS) का लाभ दिया जाए। इस प्रकार “दंड और प्रोत्साहन आधारित क़ानून” बनाकर और उसे जमीनी स्तर पर लागू करके ही हम भारत को एक विकसित देश बना सकते हैं। भारत का विश्वशक्ति बनने का सपना सीधे तौर पर जनसंख्या नियंत्रण कानून से जुड़ा है।

अन्य विकासशील देशों ने समझा जनसंख्या और विकास के अंतर्संबंध को

जनसंख्या और विकास का सीधा सम्बन्ध होता है। न सिर्फ चीन जैसे विकसित देश ने बल्कि बांग्लादेश जैसे विकासशील देश ने भी जनसंख्या और विकास के अंतर्संबंध को समझा है। इसलिए चीन ने 1979 में जनसंख्या नीति लागू की और वहाँ शहरी दम्पति के लिए एक संतान और ग्रामीण दम्पति के लिए दो संतान का नियम सख्ती से लागू किया गया।

परिणामस्वरूप उन्होंने अगले 25-30 वर्ष में ही जनसंख्या पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया। इस बीच चीन ने जबर्दस्त आर्थिक विकास करते हुए खुद को अमेरिका के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बना लिया है। चीन ने यह सब इस क़ानून और वहाँ के नागरिकों के संकल्प और सहयोग से संभव किया। अभी हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश भी जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान जैसे देशों ने दिखाया है कि भौगोलिक क्षेत्रफल और अन्यान्य संसाधनों-सुविधाओं और जनसंख्या में आनुपातिक संतुलन स्थापित करके ही राज्य अपने नागरिकों को स्वास्थ्य,शिक्षा,आवास,रोजगार और सामजिक सुरक्षा आदि सुविधाएँ प्रदान कर सकता है।

कल्याणकारी राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को उपरोक्त आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करे। ये सुविधाएँ प्राप्त होने से ही नागरिकों की मानवीय गरिमा भी बहाल हो सकेगी। मानव जीवन का महत्व और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए जनसंख्या नियंत्रण किया जाना आधारभूत और अनिवार्य शर्त है। भारत को जनसंख्या-विस्फोट होने से पहले ही इसे ‘डीफ्यूज’ कर देना चाहिए।

अगर हम ऐसा करने में असफल होते हैं तो न सिर्फ कोरोना संकट से भी बड़ी आपदाएँ झेलनी पड़ेंगी बल्कि उनसे निपटने में भी भारत को भारी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। आज कोरोना संकट के परिणामस्वरूप सरकारों और नागरिक समाज द्वारा किए जा रहे असीम राहत-कार्य के बावजूद मीडिया में भय, भूख और संताप के भयावह दृश्यों की भरमार है। इसका सबसे बड़ा कारण बेहिसाब जनसंख्या है।

अगर हम ‘लॉकडाउन’ जैसे अत्यंत प्रभावी उपायों के बावजूद इस महामारी के फैलाव को रोक पाने में असफल होते हैं, तो देश की भारी जनसंख्या के अनुपात में स्वास्थ्य-सुविधाओं और साधनों की भारी कमी मानव-जीवन की क्षति को कई गुना बढ़ा डालेगी।

भूख के कारण कोबरा मार कर खा रहे अरुणाचल के लोग: NDTV ने फैलाया फेक न्यूज़ तो केंद्रीय मंत्री ने लताड़ा

एनडीटीवी और प्रपंच एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। कोरोना संक्रमण की आपदा के बीच भी मीडिया संस्थान अपना काम बखूबी कर रहा है, केंद्र सरकार और भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए अजीबोगरीब खबरें ढूँढने में उसने पूरा दमखम लगा दिया है। इसी तरह एनडीटीवी ने ये भी ख़बर चलाई कि अरुणाचल प्रदेश में लॉकडाउन के कारण स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि ग़रीबों को भोजन के लिए कोबरा मार कर खाना पड़ रहा है। साथ ही कुछ शिकारियों का एक वीडियो भी शेयर किया।

इन शिकारियों ने किंग कोबरा साँप को मारा था और उसके साथ उन्होंने तस्वीरें क्लिक करवाई थीं। बस इसी के सहारे एनडीटीवी ने इसे भूख से जोड़ दिया और फिर लॉकडाउन को भी इस ख़बर में खींच कर एक अच्छा मसाला तैयार कर दिया। ये कोबरा 12 फ़ीट लम्बा था। एनडीटीवी ने दावा किया कि ये लोग कोबरा को पका कर खाएँगे और इसके लिए सारी व्यवस्थाएँ भी कर ली गई हैं। बकौल प्रपंची मीडिया वेबसाइट, वीडियो में ये लोग ये कहते दिख रहे हैं कि उन्होंने कई दिनों से मीट नहीं खाया।

एनडीटीवी ने किंग कोबरा के शिकारियों को लेकर फैलाया भ्रम

इसके बाद केंद्रीय मंत्री और नार्थ-ईस्ट भारत के लोकप्रिय नेता किरण रिजिजू ने एनडीटीवी के इस दावे की जम कर धज्जियाँ उड़ा दीं। उन्होंने बताया कि न सिर्फ़ वो बल्कि राज्य सरकार भी जानवरों के शिकार और उनकी हत्या को लेकर एकदम सख्त है। उन्होंने जानकारी दी कि राज्य में पर्याप्त मात्रा में अनाज उपलब्ध है, इसीलिए भोजन की कमी के चलते कोबरा को मार कर खाने वाली बात एकदम बेवकूफाना है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि अरुणाचल प्रदेश में कोई भी व्यक्ति खाने के लिए कोबरा का शिकार नहीं करता।

एनडीटीवी को लताड़ते हुए किरण रिजिजू ने सलाह दी कि वो ऐसे लेख लिखने से पहले कम से कम उसकी पुष्टि तो कर ले। जबकि, एनडीटीवी की इस ख़बर में भी अंदर लिखा है कि अरुणाचल प्रदेश सरकार ने कहा है कि राज्य के सभी जगहों पर अनाज का अगले 3 महीनों का स्टॉक पड़ा हुआ है, इसीलिए इसकी कमी होने वाली बात ग़लत है। किंग कोबरा को वैसे भी ‘प्रोटेक्टेड रेप्टाइल’ की श्रेणी में रखा गया है, जिसका शिकार मना है। बावजूद इसके एनडीटीवी ने इसे भूख और लॉकडाउन से जोड़ कर एक झूठी ख़बर तैयार कर दी।

भगोड़े विजय माल्या को भारत लाने का रास्ता साफ, ब्रिटिश हाई कोर्ट ने खारिज की प्रत्यर्पण के खिलाफ दायर याचिका

भारत से फरार विजय माल्या को ब्रिटेन की अदालत से बड़ा झटका लगा है। उसे प्रत्यर्पण के केस में हार मिली है। ऐसे में अब विजय माल्या के भारत लाने का रास्ता साफ हो गया है। भगोड़े शराब कोरोबारी विजय माल्या ने भारत के हवाले किए जाने के आदेश के खिलाफ ब्रिटेन के हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसे अदालत ने सोमवार (अप्रैल 20, 2020) को ठुकरा दिया

लंदन के रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस के न्यायाधीश स्टीफन इरविन और न्यायाधीश एलिजाबेथ लांग की दो सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में माल्या की अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि माल्या के खिलाफ भारत में कई बड़े और गंभीर आरोप लगे हैं। बीते दिनों प्रत्यर्पण के आदेश को चुनौती देने वाली माल्या की याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की पीठ इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि भगोड़े शराब कारोबारी के खिलाफ बेईमानी के पुख्ता सुबूत हैं।

माल्या के खिलाफ भारत में धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग का केस चल रहा है। माल्‍या 9000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में वांछित आरोपित है। पूर्व किंगफ‍िशर एयरलाइंस के प्रमुख 64 वर्षीय माल्‍या ने इस साल फरवरी में खुद को भारत प्रत्‍यर्पित किए जाने के खिलाफ इंग्लैंड और वेल्स की हाई कोर्ट में उक्‍त याचिका दाखिल की थी। 

विजय माल्या केस टाइमलाइन:

  • 2 मार्च, 2016 को विजय माल्या लंदन पहुंचा।
  • 21 फरवरी 2017 को होम सेक्रेटरी ने माल्या के प्रत्यर्पण के लिए अर्जी दी।
  • 18 अप्रैल, 2017 को विजय माल्या को लंदन में गिरफ्तार किया गया है। उसे उसी दिन बेल भी दे दी गई।
  • 24 अप्रैल 2017 को उसका भारतीय पासपोर्ट निरस्त कर दिया गया।
  • 2 मई 2017 को उसने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया।
  • 13 जून 2017 वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट में केस मैनेजमेंट और प्रत्यर्पण की सुनवाई शुरू हुई।
  • 10 दिसंबर 2018 को मुख्य मजिस्ट्रेट एम्मा अर्बुथनोट प्रत्यर्पण की मंजूरी देती हैं और गृह सचिव को फाइल भेजती हैं।
  •  3 फरवरी 2019 को गृह सचिव ने भारत को प्रत्यर्पण का आदेश दिया।
  • 5 अप्रैल 2019 को इंग्लैंड और वेल्स के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश डेविड ने अपील करने के लिए कागजात पर अनुमति देने से इनकार कर दिया।
  • 2 जुलाई, 2019- एक मौखिक सुनवाई में, जस्टिस लेगट और जस्टिस पॉपप्वेल ने इस आधार पर अपील करने की अनुमति दी कि आर्बुथनॉट ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की थी कि भारत ने माल्या के खिलाफ एक प्रथम दृष्टया मामला कायम किया था।
  • 11 से 13 मई, 2020 को जस्टिस इरविन और जस्टिस लैंग ने अपील सुनी।
  • 20 अप्रैल, 2020 को अपील खारिज, अंतिम निर्णय के लिए गृह सचिव के पास गया मामला।

गौरतलब है कि साल की शुरुआत में ही मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) की विशेष अदालत ने आज भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और कई अन्य बैंकों को भगौड़े विजय माल्या की जब्त संपत्ति को बेचकर कर्ज वसूली करने की इजाजत दी थी।

पश्चिम बंगाल: हल्दिया में दवाओं की कमी, सप्लाई चेन बाधित, आजीविका प्रभावित: रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रतिबंधों की वजह से राज्य के कुछ हॉटस्पॉट (माइक्रोस्पॉट) दवा की कमी से जूझ रहा है। ममता बनर्जी सरकार के प्रतिबंध की वजह से कुछ इलाकों में आवश्यक दवाएँ भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। ताजा आँकड़ों की बात करें तो अभी तक राज्य में 339 लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं, जबकि 12 लोगों की जान चली गई है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में तीन रेड जोन जिलों की पहचान की है, जिनका नाम है- हावड़ा, उत्तर 24 परगना, और कोलकाता। वे 30 अप्रैल तक पूरी तरह से लॉकडाउन में रहेंगे। रेड जोन क्षेत्रों को माइक्रोस्पॉट के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यहाँ पर सख्त प्रतिबंध लागू किए जाएँगे। ऐसे जगहों पर बाहरी लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित है। यहाँ पर केवल अधिकृत व्यक्तियों द्वारा एक खास समय में आवश्यक सामानों की आपूर्ति करवाई जा सकती है।

लॉकडाउन की अवधि में विस्तार ने माइक्रोस्पॉट में दुकानदारों की असुविधा को बढ़ा दिया है। प्रतिबंधों के कारण वे किसानों से माल प्राप्त करने में असमर्थ हैं। अजय साहू नाम के एक स्थानीय दुकानदार ने कहा, “हम पुलिस को लाइसेंस दिखाते हैं और उनसे अनुरोध करते हैं कि वे बाजार में सामान की अनुमति दें, लेकिन वे अनुमति नहीं देते हैं। हमें माल और अन्य उपज का आयात करना मुश्किल लगता है। अगर यह बाजार में आता है, तो हम उत्पादों को किसी तरह बेच पाएँगे।”

पश्चिम बंगाल में हल्दिया शहर में एक तेलंगाना निवासी के 24 मार्च को आने के बाद से कोरोना संक्रमण फैल गया। यह आदमी निजामुद्दीन के मरकज में आयोजित मजहबी सभा में भाग लेने के बाद हल्दिया आया था। यह यहाँ पर हल्दिया डॉक में काम करता था। शहर में चीनी वायरस के कई मामलों का पता चलने के बाद कई क्षेत्रों को अब ‘माइक्रोस्पॉट्स’ के रूप में चिह्नित किया गया है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में लॉकडाउन के दौरान लोगों से प्रशासन के साथ सहयोग करने के आग्रह करने के अलावा SDPO (हल्दिया) तन्मय मुखर्जी ने क्षेत्र में आवश्यक दवाओं की भारी कमी को स्वीकार किया। एक स्थानीय निवासी बिशन सिंह ने अपनी दास्तान साझा करते हुए कहा, “हमें ब्लड प्रेशर की दवा नहीं मिल रही है। इस क्षेत्र में पुलिस बहुत सख्त है। सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं है। मैं सरकार से मदद करने का अनुरोध करता हूँ क्योंकि मेरे पिता बुजुर्ग हैं और कई बीमारियों से पीड़ित हैं। मैं एक निजी कंपनी में काम करता हूँ। मुझे इस बात का भी भरोसा नहीं है कि मुझे मेरा अगला वेतन मिलेगा या नहीं।”

इसके अलावा, हॉटस्पॉट्स के भीतर सीमित आवाजाही के कारण, किराने की दुकानों की आपूर्ति में कमी है। सप्लाई चेन टूटने से स्थानीय निवासियों की शिकायतों में इजाफा हुआ है। पुलिस और सरकार द्वारा बार-बार सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के अपील करने के बावजूद इसके उल्लंघन की वजह से कोरोना महामारी में इजाफा हुआ है।