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‘ईमानदार मुख्यमंत्री बेटा मेरे जीवन की इकलौती कमाई’ – योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट ने तब कही थी यह बात

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट ने एम्स में इलाज के दौरान सोमवार (अप्रैल 20, 2020) को 10 बजकर 40 मिनट पर आखिरी साँस ली। सीएम योगी को जब पिता के मौत की सूचना मिली तो वह कोरोना महामारी से निपटने के लिए मीटिंग कर रहे थे। पिता के निधन की सूचना के बाद भी मुख्यमंत्री करीब 45 मिनट तक बैठक करते रहे

आनंद सिंह बिष्ट के निधन के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित किताब ‘The Monk Who Became Chief Minister’ लिखने वाले शांतनु गुप्ता ने उनके साथ बिताए गए कुछ खूबसूरत लम्हों को साझा किया है। वो कहते हैं, “जब मैं अप्रैल 2017 में योगी आदित्यनाथ की जीवनी लिखने के लिए रिसर्च कर रहा था, तो इस दौरान मुझे योगी आदित्यनाथ के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ समय बिताने का सौभाग्य मिला। वे बातचीत इतने सरल, निष्कपट और स्वाभाविक थे कि वो अभी भी मेरे जेहन में ताजा हैं।”

आगे उन्होंने कहा, “अब, जब आनंद जी नहीं रहे, तो मैं उनमें से कुछ वार्तालापों को पाठकों के साथ फिर से जीना और साझा करना चाहता हूँ। यहाँ मैं आनंद जी और उनकी पत्नी सावित्री देवी जी के साथ अपनी बातचीत के कुछ अंश अपनी पुस्तक – ‘The Monk Who Became Chief Minister’ से साझा कर रहा हूँ। इन वार्तालापों के माध्यम से हम आज के योगी के कई लक्षणों और आदतों की झलक देख सकते हैं।”

योगी आदित्यनाथ के बारे में क्या सोचते थे उनके माता-पिता?

शांतनु ने कहा, “मुझसे बात करते हुए आनंद सिंह बिष्ट जी ने बताया कि अजय हमेशा से ही विनम्र और मिलनसार थे। वे काफी कम कम उम्र से ही अखबार पढ़ने के शौकीन थे। बिष्ट जी ने कहा कि यद्यपि वे लगातार पर्यटन पर थे और अक्सर घर से दूर रहते थे, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर काफी दिया। वो अक्सर सरप्राइज विजिट करके बच्चों की पढ़ाई और उनके मेहनत का निरीक्षण करते थे। उन्होंने कहा कि शायद यही वजह है कि आज पंचूर नाम के एक छोटे से गाँव के अजय, उत्तर प्रदेश के 21 वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बन गए हैं। यहाँ पर ध्यान देना दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद, योगी और उनके मंत्रियों ने विभिन्न सरकारी सेवाओं के वितरण की ‘औचक जाँच’ की है।”

आनंद बिष्ट एक गौरवान्वित पिता थे जिन्होंने महसूस किया कि यूपी जैसे राज्य को चलाना हर किसी के वश की बात नहीं है और केवल योगी ही इसे नियंत्रित कर सकते हैं क्योंकि उनमें बचपन से ही निर्णय लेने की अच्छी क्षमता है। आनंद बिष्ट ने मुझे यह भी बताया कि सांसद के रूप में योगी ने हमेशा लोगों के लिए काम किया था और उनका काम किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार से मुक्त था। इसलिए लोग उनसे प्यार करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यूपी का मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों ने उनके बेटे (योगी आदित्यनाथ) के लिए अपनी सिफारिशें भेजनी शुरू कर दीं। उन्होंने कहा कि वह ऐसे लोगों के साथ विनम्रता से पेश आते हैं और उन्हें चाय पर बुलाते हैं। इसके बाद उन्हें काफी विनम्रता से उन्हें बताते हैं कि उनकी कोई सिफारिश नहीं की जाएगी।

आगे शांतनु ने कहा, “योगी आदित्यनाथ की माँ सावित्री देवी जी ने भी मुझे बताया था कि अजय अच्छे छात्र थे और उन्होंने कभी भी खराब संगति नहीं रखी। उन्होंने कहा कि वह एक साधारण लड़का था। उन्हें कभी इस बात का अहसास नहीं था कि वो इतने बड़े पद पर पहुँच जाएँगे। वो कहती हैं कि उन्हें याद है कि वो उनके कितने करीब थे, क्योंकि उनके पिता की अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग होती रहती थी और वह सख्त भी थे, इसलिए सभी बच्चे उनसे थोड़ा डरते थे।”

अपनी आदतों के बारे में बात करते हुए सावित्री देवी जी ने कहा कि उनके घर में हर कोई हमेशा जल्दी उठता था। यहाँ तक ​​कि लगभग 80 वर्ष (2017 में) की आयु में वह सुबह 4 बजे उठकर घर के सारो कामों को पूरा करती थी और फिर खेतों में जाकर छोटे कृषि फार्मों की देखरेख करती थी। 85 साल (2017 में) की उम्र में अजय के पिता भी हर दिन सुबह 4 बजे उठते थे और पूरे घर और आसपास के परिसर की सफाई करते थे। सावित्री देवी जी ने कहा कि बचपन से ही अजय गायों के शौकीन थे। बिष्ट परिवार के पास घर पर गायें थीं और उन्हें चरने के लिए ले जाना स्कूल के बाद अजय की दिनचर्या का हिस्सा था। पंचूर में उनके घर के आसपास के पेड़ों की ओर इशारा करते हुए, सावित्री देवी जी ने मुझे बताया कि अजय ने इनमें से कई पौधे लगाए थे, जब वह छोटा था।

योगी आदित्यनाथ के पिता से क्यों डरते थे उनके दोस्त

बातचीत के दौरान आनंद बिष्ट ने बताया कि वह एक फॉरेस्ट रेंजर थे और उन्होंने अपने पूरे जीवन में खाकी पोशाक पहनी है। उनकी वर्दी में कंधों पर तीन स्टार थे, जो पुलिस की वर्दी की तरह दिखते थे। और इसके अलावा, उनकी वर्दी में एक UPF (Uttar Pradesh Forest) बैज भी था, जो काफी हद तक UPP (Uttar Pradesh Police) बैज के समान था। और यह कभी-कभी अजय के दोस्तों को डराता था क्योंकि वो गलती से उन्हें पुलिस वाले समझ लेते थे। उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब अजय के सीएम बनने के बाद, उनके साथ पूरा समय खाकी पहने बंदूकधारी, असली पुलिसकर्मी, सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत मौजूद रहते हैं।

कोटद्वार में स्नातक करने के बाद अजय ने 1992 में पंडित ललित मोहन शर्मा गवर्नमेंट पीजी कॉलेज, ऋषिकेश से गणित में मास्टर ऑफ साइंस (MSc) में दाखिला लिया। जब वे एमएससी प्रथम वर्ष में थे, तब उन्होंने गोरखपुर जाकर महंत अवैद्यनाथ से मिलना शुरू किया। एक दो बार मिलने के बाद अजय ने गोरखनाथ मठ में महंत अवैद्यनाथ के पूर्णकालिक शिष्य बनने का फैसला किया। नवंबर 1993 में, अजय ने अपने गाँव, अपने माता-पिता, अपने दोस्तों और अपनी पढ़ाई को छोड़ दिया और परिवार में किसी को भी बताए बिना वह गोरखपुर चले गए। 15 फरवरी, 1994 को अजय का उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ द्वारा नाथ पंथ योगी के रूप में अभिषेक किया गया था।

जब योगी आदित्यनाथ के माता-पिता को उनके संन्यास के बारे में पता चला

कुछ महीने बाद ही अजय के माता-पिता को उनके संन्यास के बारे में अखबार से पता चला। तब तक उनके माता-पिता को लग रहा था कि वह नौकरी की तलाश में गोरखपुर गए हैं। अजय के महंत बनने की बात पता चलने के बाद अजय के माता-पिता अगली ट्रेन से गोरखपुर पहुँचे और मठ में आनंद सिंह बिष्ट, अजय को संन्यासी की पोशाक में देखकर चौंक गए। महंत अवैद्यनाथ उस समय शहर से बाहर थे। अजय ने अपने माता-पिता को शांत कराया और फिर उन्हें अपने गुरु से फोन पर बात करवाई। महंत अवैद्यनाथ ने अजय के पिता से कहा कि उनके बेटे अजय अब योगी आदित्यनाथ हैं।

महंत अवैद्यनाथ ने आनंद सिंह बिष्ट से अनुरोध किया कि उनके चार बेटों में से एक ने उनके साथ राष्ट्र निर्माण और मजबूत राष्ट्रवाद के लिए आने का फैसला किया है। उन्होंने अजय के पिता से उन्हें देश की सेवा करने की अनुमति देने के लिए आग्रह किया। कुछ समय तक विरोध करने के बाद उनके माता-पिता ने इसकी अनुमति दे दी। 

कुछ महीनों के बाद योगी आदित्यनाथ संन्यासी परंपरा के तहत अपनी माँ से भिक्षा लेने के लिए उत्तराखंड के पंचूर गाँव में वापस आए। उसके बाद से अजय के माता-पिता गोरखनाथ मठ के योगी आदित्यनाथ से दो-दो बार मुलाकात कर चुके हैं। अब वे उन्हें अन्य लोगों की तरह ‘महाराज जी’ कहकर बुलाते हैं। उनके प्रोटोकॉल और उनकी भूमिका की गरिमा का सम्मान करते हैं। योगी आदित्यनाथ अपने गृहनगर उत्तराखंड में केवल परिवार के कुछ महत्वपूर्ण फंक्शन के लिए ही गए हैं। योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर मठ के प्रशासन के तहत, उत्तराखंड में अपने गाँव के पास, महायोगी गुरु गोरखनाथ महाविद्यालय की स्थापना की है।

ईमानदार मुख्यमंत्री बेटा मेरे जीवन की इकलौती कमाई

शांतनु कहते हैं, “अजय के माता-पिता के साथ चर्चा के दौरान मैंने उल्लेख किया कि उत्तराखंड की पहाड़ियों ने गोविंद बल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया है और अब इस घर ने उत्तर प्रदेश के लिए चौथे मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को मौका दिया है। इस पर सावित्री सविता देवी ने गर्व से पुरानी बातें याद करती हुई कहती हैं कि अजय हमेशा लोगों की सेवा करना चाहते थे और अब वह ठीक यही कर रहे हैं। गीली लेकिन दृढ़ आँखों के साथ, आनंद जी ने कहा कि उन्होंने जीवन में बहुत कुछ नहीं कमाया है। उन्होंने जो कमाया है वह एक ईमानदार मुख्यमंत्री बेटा। उन्होंने कहा कि अजय के माता-पिता के रूप में उनका जीवन धन्य है और आज उन्हें उस भिक्षु पर गर्व है जो इतने बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन गया है। आनंद सिंह बिष्ट जी को मेरा अभिवादन!”

बता दें कि सीएम योगी आदित्यनाथ अंतिम बार अपने पिता के दर्शन भी नहीं कर सके। अपने व्यक्तिगत जीवन के ऊपर अपने कर्तव्य को रखते हुए योगी आदित्यनाथ ने फैसला किया है कि वह लॉकडाउन के नियमों का पालन करेंगे और अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने अपने पिता के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा, “पूज्य पिताजी के कैलाशवासी होने पर मुझे भारी दुःख एवं शोक है। वह मेरे पूर्वाश्रम के जन्मदाता हैं। जीवन में ईमानदारी, कठोर परिश्रम एवं नि:स्वार्थ भाव से लोक मंगल के लिए समर्पित भाव के साथ कार्य करने का संस्कार बचपन में उन्होंने मुझे दिया।”

महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ न करें कोई नकारात्मक टिप्पणी: IMA ने डॉक्टरों को दी हिदायत

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की महाराष्ट्र इकाई ने राज्य में डॉक्टरों को सूचित किया है कि व्हाट्सएप ग्रुपों में राज्य सरकार के फैसलों के खिलाफ कोई ‘अपमानजनक’ टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि वो व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज भेज सकते हैं, अपनी प्रतिक्रियाएँ दे सकते हैं, मगर इसकी भाषा ‘गैर-अपमानजनक’ होनी चाहिए।

दरअसल, एक पत्र सामने आया है, जिसमें IMA की महाराष्ट्र इकाई के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अविनाश भोंडवे और राज्य सचिव डॉ पंकज बंदरकर के दस्तखत हैं। इसमें डॉक्टरों से कहा गया है कि उन्हें महराष्ट्र साइबर सेल से ‘सूचना’ मिली थी कि व्हाट्सएप ग्रुपों में कुछ डॉक्टर महाराष्ट्र सरकार और उनके अधिकारियों के खिलाफ टिप्पणी कर रहे हैं।

ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह एक आधिकारिक पत्र है जो IMA की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष ने अपने व्हाट्सएप ग्रुपों में पोस्ट किया है। पत्र में कहा गया, “मुझे यकीन है, हम IMA के सदस्य समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं और हम ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। हम कोरोना वायरस की महामारी को नियंत्रित करने के लिए अपना अभियान जारी रखेंगे।” पत्र को संगठन के सभी पदाधिकारियों को संबोधित किया गया था और उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप पर सरकार की आलोचना के खिलाफ एहतियात बरतने के लिए कहा गया था।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले ही मुंबई के कस्तूरबा अस्पताल के कर्मचारी ने वीडियो बनाकर अस्पताल के अंदर PPE (Personal Protection Equipment) की कमी को उजागर करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। स्टाफ यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि PPE किट की कमी है, इसके बावजूद भी वो लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। उन्हें भी इस संक्रमण का खतरा है। आखिर वो भी तो इंसान ही हैं। मगर स्टाफ को PPE किट की बात को उजागर करना भारी पड़ गया।

कोरोना संकट से निपटने में नाकाम महाराष्ट्र सरकार

बता दें कि वुहान कोरोनावायरस संकट से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार की काफी आलोचना हो रही है। आरोप लगाए गए हैं कि राज्य सरकार अपने प्रदेश में लॉकडाउन लागू कराने में बुरी तरह विफल रही है। हाल ही में, बांद्रा में एक मस्जिद के पास अफवाहों की वजह से प्रवासी मजदूरों का एक विशाल जमावड़ा इकट्ठा हुआ था, जो गलत सूचनाओं के कारण इकठ्ठा हुआ था। परिवार और स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार अभी तक राज्य में कोरोना संक्रमण के कुल 4203 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 507 डिस्चार्ज हो गए हैं और 223 लोगों की मौत हो चुकी है।

पालघर में मारे गए साधु तो हिन्दू थे ही नहीं: ‘The Wire’ ने शुरू किया लिंचिंग पर प्रपंच फैलाने का गन्दा खेल

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग को लेकर झूठ फैलाया है। इस प्रोपेगंडा पोर्टल को अमेरिकी सिद्धार्ध वरदराजन द्वारा चलाया जाता है। वैसे तो उसका फेक न्यूज़ फैलाने का पुराना इतिहास रहा है लेकिन इस बार तो उसने हद ही कर दी। पालघर में साधुओं की हत्या के बाद उसने उन साधुओं की पहचान पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया और उनके हिन्दू होने पर भी शक जताया। और इसके दुर्भावना की हद यह है कि द वायर ने महाराष्ट्र के पालघर में जूना अखाड़े से जुड़े दो साधुओं की जघन्य मॉब लिंचिंग को लेकर भी अपना प्रोपेगेंडा नहीं छोड़ा है। ‘द वायर’ इसे लेकर भी घृणित प्रोपेगंडा फैला रहा है। जबकि ये विदित है कि ये साधु दशनामी थे और वो जूना अखाड़ा से जुड़े हुए हैं।

उसने दावा कर दिया कि ये साधु हिन्दू ही नहीं थे। प्रोपेगंडा पोर्टल ने दावा किया कि सोशल मीडिया ने उन्हें ऐसे ही साधु समझ लिया। जूना अखाड़ा के साधु हिन्दू नहीं हैं, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है? ‘द वायर’ ने दावा किया कि ये दोनों साधु घुमन्तु प्रजाति के थे, जिसका आधार वाराणसी में है। यानी, उसने अखाड़े की पहचान छिपाने की कोशिश की, जो हिन्दू साधुओं का है।

The Wire doubt Hindu identity of two Juna Akhara sadhus, victims of Palghar lynching
द वायर में प्रकाशित लेख

द वायर ने यहाँ छुपाने का प्रयास किया है कि जूना अखाड़ा एक अन्वेषण हिंदू तपस्वी व्यवस्था है और किसी भी परिस्थिति में इसके बारे में कोई गलत व्याख्या नहीं की जा सकती है, जब तक कि कोई इसके प्रति दुर्भावना से प्रेरित न हो।

‘द वायर’ ने पहले तो जूना अखाड़ा को लेकर बात की थी लेकिन अगली ही रिपोर्ट में वो साधुओं को हिन्दू ही नहीं बताने लगा। अपने ही लेखों में इस तरह के विरोधाभास ‘द वायर’ जैसे मीडिया संस्थान ही रख सकते हैं। फ़रवरी 2019 में आज़मगढ़ के कन्हैया प्रभु नंदगिरि को महामंडलेश्वर बनाया गया था, जो दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

‘द वायर’ ने अखाड़ा को ब्राह्मणवाद के प्रभाव वाला भी बता दिया था लेकिन उसे शायद ये पता नहीं कि वहाँ सभी जाति-संप्रदाय के साधु हैं। या फिर ये भी हो सकता है कि उसे सब पता हो लेकिन जनता को भ्रमित करने के लिए वो झूठ बोल रहा है। जब कुम्भ के समय दलित को महामंडलेश्वर बनाया गया था, तब ‘द वायर’ जैसे प्रपंची पोर्टलों ने इसे चुनाव से पहले दलित वोटों को लुभाने वाला उपक्रम भी करार दिया था। अब आप सोचिए, कि क्या ब्राह्मणवाद पर चलने वाला अखाड़ा दलित को महामंडलेश्वर बना देगा? ऐसा तो नहीं हो सकता।

लाशों पर प्रपंच फैलाने में लगा ‘द वायर’

बता दें कि गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) को हुई इस घटना का वीडियो 3 दिन बाद रविवार को वायरल हुआ, जिसके बाद लोगों को सच्चाई पता चली थी। पालघर मॉब लिंचिंग का ये वीडियो दिल दहला देने वाला है। उस वीडियो को देख कर कोई भी काँप उठे। इस वीडियो में दिख रहे एक संदिग्ध व्यक्ति की पहचान को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने जानकारी माँगी थी। पता चला है कि वो शरद पवार की पार्टी का आदमी है। उसका नाम काशीनाथ चौधरी बताया गया। लेकिन, मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस पर चुप है।

नोट: यह अंग्रेजी में इस मूल लेख का अनुवाद है।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मो शाहिद समेत 30 गिरफ्तार: खुद गए मरकज, विदेशी जमातियों को भी छिपाया

उत्तर प्रदेश में सरकार और पुलिस विभाग के बार-बार कहने के बावजूद तबलीगी जमात के लोग अब भी कई जिलों में पकड़े जा रहे हैं। ताजा मामला प्रयागराज का आया है। यहाँ पुलिस ने सोमवार (अप्रैल 20, 2020) को देर रात छापेमारी करके 30 लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें से 19 लोग जमाती हैं, जिनमें 16 विदेशी (7 इंडोनेशिया और 9 थाईलैंड) के भी हैं। पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा है, उनमें एक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी शामिल हैं।

राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद पर आरोप है कि उन्होंने विदेशी जमातियों को शरण दिलाने और चोरी से छिपकर रहने में मदद की थी। जिसके कारण पुलिस ने उन्हें भी महामारी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया। वहीं विदेशियों की गिरफ्तारी फॉरेनर्स एक्ट के तहत हुई। साथ ही जमातियों के साथ इनके 12 मददगार लोगों को भी गिरफ्तार किया गया। कुल मिलाकर तीन थाना क्षेत्रों से 30 लोगों की गिरफ्तारी हुई है।

पुलिस का कहना है कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज के तबलीगी जमात में शामिल होने के बाद कई जमाती प्रयागराज आए थे। इनमें वे जमाती भी थे, जो थाईलैंड और इंडोनेशिया के नागरिक थे और टूरिस्ट वीजा पर दिल्ली आए और फिर वहाँ से प्रयागराज आ गए। मगर, प्रदेश सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद कि जो भी जमाती राज्य में हैं वे सामने आ जाएँ, ये जमाती सामने नहीं आए। अब इनकी गिरफ्तारी करेली, शाहगंज और शिवकुटी इलाके से हुई।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इलाहाबाद के प्रोफेसर के बारे में पुलिस को खुफिया सूत्रों ने जानकारी दी थी कि शिवकुटी के रसूलाबाद में रहने वाले राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शाहिद दिल्ली के मरकज में हुई तबलीगी जमात में शामिल होने गए थे। वहाँ से आने के बाद वह गुपचुप शहर आ गए लेकिन पुलिस या प्रशासन को इसकी सूचना नहीं दी।

इस सूचना के आधार पर पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए प्रोफेसर शाहिद को पकड़ा। बाद में उनके परिवार को क्वारंटाइन किया गया और फिर पड़ताल के बाद अन्य 19 जमातियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बताया कि 19 जमातियों में से 16 इंडोनेशिया और थाइलैंड के रहने वाले हैं।

एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज ने इस संबंध में बताया कि पकड़े गए आरोपितों में इंडोनेशिया के 7, थाईलैंड के 9, केरल और पश्चिम बंगाल का एक-एक जमाती शामिल है। उन्होंने बताया कि शाहगंज की अब्दुल्ला मस्जिद और करेली की हेरा मस्जिद से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिन्होंने इन जमातियों को संरक्षण दिया। सभी आरोपियों को क्वारंटाइन किया गया है। वहाँ अतिरिक्त पुलिस फोर्स लगाई गई है।

बता दें कि इससे पहले योगी सरकार के मंत्री बृजेश पाठक ने कहा था कि जो लोग कोरोना को छुपा रहे हैं और फैला रहे हैं, उन पर अटेम्पट टु मर्डर का केस दर्ज होना चाहिए। इसके अलावा योगी सरकार ने सख्त आदेश देते हुए कहा था कि पुलिस दो दिन में सभी जमातियों को ढूँढे। उन्होंने कहा था कि अगर दो दिन में जमाती नहीं मिले, तो थानेदारों को खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

शराब तस्करी में कॉन्ग्रेस नेता गिरफ्तार, essential सर्विस वाली गाड़ी से हरियाणा से दिल्ली ला रहा था दारू

राजस्थान के टोंक में भड़काऊ पोस्ट शेयर करने के आरोप में कॉन्ग्रेस पदाधिकारी के गिरफ्तार होने के बाद अब महाराष्ट्र के एक कॉन्ग्रेस नेता को भी पुलिस ने हरियाणा से गिरफ्तार किया है। अधिकारी की पहचान श्रवण राव के रूप में हुई है। श्रवण पर हरियाणा में शराब तस्करी का आरोप लगा है। भाजपा नेता संबित पात्रा ने इसकी जानकारी अपने ट्विटर पर दी है। 

संबित पात्रा ने ट्वीट कर श्रवण की गिरफ्तारी के बारे में बताते हुए लिखा कि एक ओर भाजपा, RSS और स्वयं सेवी संगठन जरूरतमंदो के लिए कार्यरत हैं, वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस के नेशनल सेक्रेट्री (इंचार्ज महाराष्ट्र) और आपदा प्रबंधन के अध्यक्ष श्रवण राव को कल हरियाणा से दिल्ली जाते वक्त शराब तस्करी में गिरफ़्तार किया गया। उनकी गाड़ी पर essential सर्विस (कोरोना महामारी को देखते हुए आवश्यक वस्तुओं या सेवाकार्य में लगे लोगों के लिए) का पास भी लगा हुआ है।

संबित पात्रा ने अपने ट्वीट पर इस जानकारी के साथ एफआईआर की कॉपी भी शेयर की। जिसमें इस बात का उल्लेख था कि सब इंस्पेक्टर को एक मुखबिर ने बताया कि करीब 9 बजकर 10 मिनट के करीब एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो गुड़गाँव की तरफ से दिल्ली की तरफ जाएगी। मुखबिर ने पुलिस को बताया कि इस स्कॉर्पियो में दो लड़के बैठे हैं, जो हरियाणा से सस्ती और अवैध शराब लाकर दिल्ली में बेचते हैं। ये लड़के आज भी शराब लेकर जाएँगे, अगर ऐसे में पहले से रेडी रहा जाए तो इन्हें पकड़ा जा सकता है।

संबित पात्रा द्वारा शेयर की गई एफआईआर

सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर तैनात रही। थोड़ी देर में उन्होंने उसी नंबर वाली गाड़ी को सामने से आते देखा। मुखबीर ने भी इशारा करके बता दिया कि इसी गाड़ी में शराब है। जिसके बाद उन्होंने गाड़ी को रुकवाया। गाड़ी से दो युवक निकले। एक रामगाड़ू श्रवण और दूसरा बस्वराज शिल्ले। जब पुलिस ने गाड़ी की तलाशी ली तो इनकी गाड़ी से 12 बोतल शराब मिली। इसके बाद इन दोनों को गिरफ्त में लेकर गाड़ी में मिली अवैध शराब को और गाड़ी को जब्त किया गया।

गौरतलब है कि संबित पात्रा सहित सोशल मीडिया पर भी कई लोगों का कहना है कि एक ओर जहाँ आरएसएस इस महामारी के बीच जरूरतमंद लोगों की सेवा में जुटी हुई है। वहीं कॉन्ग्रेस के लोग शराब तस्करी जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

बता दें कि ये पहला मामला नहीं है, जब कानून के उल्लंघन के आरोप में किसी कॉन्ग्रेस नेता या अधिकारी को गिरफ्तार किया गया हो। इससे पहले राजस्थान के टोंक में पुलिसकर्मियों पर हमले वाली घटना पर सफाई देने और आरएसएस पर हमले को वाजिब ठहराने के आरोप में पुलिस ने कॉन्ग्रेस पदाधिकारी को गिरफ्तार किया था। जिसका कहना था कि अगर स्थानीयों को मालूम होता कि वाकई वे लोग (पुलिसकर्मी) बजरंग दल या आरएसएस के नहीं हैं, तो उन पर हमला कभी नहीं होता। रायपुर में भी शराब तस्करी को लेकर एक कॉन्ग्रेस नेता पकड़े गए

मरीजों से डर नहीं लगता, खाना देखकर दुख होता है: दिल्ली की नर्सों ने जारी किया वीडियो, केजरीवाल सरकार पर सवाल

कोरोना संक्रमण से मरीजों की जान बचाने का बीड़ा उठाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों में इन दिनों सभी को भगवान नजर आ रहे हैं। मगर क्या हो अगर ये स्वास्थ्यकर्मी ही अस्पतालों में इलाज करने से मना कर दें? या फिर संक्रमित मरीजों के पास आने से इंकार कर दें?

हालाँकि, किसी भी स्वास्थ्यकर्मियों के द्वारा बेवजह इस तरह का रवैया अभी तक किसी भी जगह से बहुत कम देखने को मिला है। मगर, ये जिम्मेदारी तो सरकार की है कि उनकी इस प्रतिबद्धता के बदले उन्हें हर सुविधा मुहैया कराई जाए और उनके स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जाए। लेकिन दिल्ली सरकार को देखकर लगता है कि वो मरीजों को डॉक्टरों-नर्सों के सहारे और डॉक्टर-नर्सों को भगवान के सहारे छोड़ चुके हैं।

जी हाँ, अभी हाल ही में दिल्ली के अस्पतालों से कुछ ऐसे मामले आए हैं। जिन्होंने दिल्ली सरकार पर सवाल खड़ा कर दिया है। बीते दिनों जीटीबी अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने एक वीडियो के जरिए अपनी परेशानी बताई। उन्होंने वीडियो में बताया कि वे जीटीबी अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर के तौर पर तैनात हैं और उनकी ड्यूटी पिछले कई दिनों और महीने से कोरोना मरीजों के बीच लगी हुई है।

उनका कहना है कि वे अपना घर छोड़-छोड़कर यहाँ ड्यूटी निभा रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका दुख नहीं होता। बल्कि दुख उन्हें खाना देखकर होता है। उनकी शिकायत है कि उन्हें खाना अच्छा नहीं मिल रहा। अगर खाना ठीक से नहीं खाएँगे तो इम्यूनिटी कैसे आएगी और कैसे वो ड्यूटी कर पाएँगे।

वे कहते हैं कि महामारी के बीच उन्हें मरीजों से डर नहीं लगता, उन्हें डर खाना देखकर लगता है। वे कहते हैं कि खाना देखते ही उन्हें बहुत दुख होता है कि वो कर्मचारी हैं और उन्हें क्या खाना मिल रहा है। वीडियो देखें तो मालूम चलता है कि इन कर्मचारियों को सुबह में सिर्फ़ 2 ब्रेड और 2 केले दिए जाते हैं। जिससे उनका पेट नहीं भरता।

जीटीबी में तैनात स्वास्थ्यकर्मी कहते हैं कि पिछले चार दिनों से उन्हें ठंडा खाना मिल रहा है। वे खाने को वीडियो में दिखाते हैं और कहते हैं कि उन्हें सिर्फ़ खाने के नाम पर दाल चावल दिया जा रहा है। उनके मुताबिक उन्हें हर टाइम चाहे लंच हो, डिनर हो या कुछ भी हो, उन्हें यही खाना दिया जाता है।

बता दें कि दिल्ली सरकार की लापरवाही को दर्शाती इस वीडियो को सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी इसे शेयर किया है। उन्होंने इस मामले को उजागर करते हुए लिखा है कि दिल्ली में खाना बाँटने का एक और झूठ का पर्दाफाश हुआ है। उन्होंने इसे शेयर करते हुए लिखा कि स्वास्थ्यकर्मी अब भूखे पेट काम करने को मजबूर हैं। क्योंकि दिल्ली सरकार उन्हें खराब खाना दे रही हैं। उनका दावा है कि सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों और नर्सों तक को इस समय खाना नहीं मिल रहा। लेकिन विज्ञापन के पैसों के दबाव में दिल्ली का मीडिया ये वीडियो नहीं दिखाएगा।

उल्लेखनीय है कि इस घटना ससे पहले एलएनजेपी अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने भी शिकायत की थी। एक स्वास्थ्यकर्मी ने कहा था कि अस्पताल प्रशासन को उनकी कोई परवाह नहीं हैं। वे लगातार उन्हें बिन सुरक्षा उपकरणों के काम करने को मजबूर कर रहे हैं। न ही उन्हें खाना मिल रहा है और न ही सुविधाएँ। इसके अलावा एक डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि कोविड-19 में वे अपनी ड्यूटी पूरा करने के लिए घर नहीं जा रहे हैं, लेकिन यहाँ उन्हें भोजन भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने बताया था कि सुविधाओं के अभाव में उनके सहकर्मी ड्यूटी के दौरान बेहोश हो चुके हैं।

चीन को छोड़ भारत आएँगी 1000 कंपनियाँ, कोरोना इफेक्ट के कारण सरकार से चल रही बात

कोरोना वायरस की वजह से दुनिया भर की इकॉनमी रेंगती हुई नजर आ रही है। लेकिन इस माहौल में भी भारत के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, चीन में सक्रिय करीब 1000 कंपनियाँ अब भारत में मौके की तलाश कर रही हैं।

जानकारी के मुताबिक कोरोना वायरस के कारण चीन में विदेशी कंपनियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस माहौल में लगभग 1000 विदेशी कंपनियाँ भारत में एंट्री की सोच रही हैं। इनमें से करीब 300 कंपनियाँ भारत में फैक्ट्री लगाने को पूरी तरह से मूड बना चुकी हैं। इस संबंध में सरकार के अधिकारियों से बातचीत भी चल रही है।

केंद्र सरकार के एक अधिकारी ने इसकी जानकारी दी। अधिकारी के मुताबिक, “वर्तमान में लगभग 1000 कंपनियाँ विभिन्न स्तरों जैसे इन्वेस्टमेंट प्रमोशन सेल, सेंट्रल गवर्नमेंट डिपार्टमेंट्स और राज्य सरकारों के साथ बातचीत कर रही हैं। इन कंपनियों में से हमने 300 कंपनियों को लक्षित किया है।” अधिकारी का कहना है कि कोरोना वायरस के नियंत्रण में आने के बाद स्थिति हमारे लिए बेहतर होगी और भारत वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरेगा।

उन्होंने कहा, “हम इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि एक बार जब कोरोना वायरस महामारी नियंत्रण में आ जाती है, हमारे लिए कई फलदायक चीजें सामने आएँगी और भारत वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग गंतव्य के रूप में उभरेगा। जापान, अमेरिका तथा दक्षिण कोरिया जैसे कई देश चीन पर हद से ज्यादा निर्भर हैं और यह साफ दिख रहा रहा है।”

बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, लक्षित 300 कंपनियाँ मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल डिवाइसेज, टेक्सटाइल्स और सिंथेटिक फैब्रिक्स के क्षेत्र में सक्रिय हैं और अब भारत में आना चाहती हैं। अगर सरकार की ओर से पॉजिटिव रिस्पॉन्स रहा तो यह चीन के लिए बड़ा झटका होगा। इसके साथ ही चीन के हाथों से मैन्युफैक्चरिंग हब का तमगा छिन जाने का खतरा मंडराने लगेगा।

चीन को चुकानी पड़ सकती है भारी कीमत

बता दें कि चीन एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब रहा है, मगर अब वुहान कोरोना वायरस महामारी पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

कुछ समय के लिए यह स्पष्ट है कि चीन, जो एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए दुनिया का विनिर्माण केंद्र रहा है, को वुहान कोरोनावायरस महामारी पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बताया जा रहा है कि वुहान कोरोना वायरस वास्तव में एक बॉयोवेपन हो सकता है जो चीन की एक लैब से गलती से लीक हो गया था। इसके साथ ही इन प्रयोगशालाओं में अपर्याप्त सुरक्षा प्रोटोकॉल भी सवालों के घेरे में आ गए हैं।

चीन के खिलाफ उठती आवाजें

अमेरिका ने कोरोना वायरस का जिम्मेदार सीधे तौर पर चीन को बताया है। दरअसल, हाल में जिस तरह के खुलासे सामने आए हैं कि चीन ने कोरोना वायरस के संक्रमण की भयावहता को छिपाने की कोशिश की और इसकी उत्पत्ति को लोगों के सामने नहीं आने दिया। इससे पहले शनिवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर चीन ने यह जानबूझकर किया है तो उसे इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसके बाद से ही डोनाल्ड ट्रम्प संयुक्त राज्य अमेरिका में विनिर्माण के लिए बुला रहे हैं।

इसी तरह कोरोना वायरस के वैश्विक महामारी में चीन की भूमिका और उसके रवैये के बाद जापान सरकार ने चीन में काम कर रही अपनी कंपनियों को वहाँ से शिफ्ट करने के लिए कहा है। 

जर्मनी ने चीन को वैश्‍विक महामारी फैलाने का आरोप लगाते हुए 130 बिलियन पाउंड का बिल भेजा है। जर्मनी के सबसे बड़े टैबलॉयड न्यूजपेपर ‘बिल्ड’ में एक संपादकीय छपा, जिसमें 130 बिलियन पाउंड का अनुमानित नुकसान बताया गया है। इस लिस्ट में 27 मिलियन यूरो का नुकसान पर्यटन को हुआ है, 7.2 मिलियन यूरो का नुकसान फिल्म इंडस्ट्री को हुआ, एक मिलियन यूरो का नुकसान जर्मन एयरलाइंस लुफ्तहांसा, 50 बिलियन यूरो का नुकसान जर्मनी के छोटे उद्यमियों को हुआ। बिल्ड के अनुसार कुल 1784 यूरो का नुकसान प्रति व्यक्ति को हुआ है और देश की जीडीपी 4.2 फीसदी गिर गई, ऐसे में इन तमाम नुकसान के लिए चीन जिम्मेदार है।

कोरोना महामारी से निपटने में चीन के प्रयासों पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी सवाल उठाए हैं। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि कुछ ऐसी चीजें घटित हुई हैं जिनके बारे में हमें पता नहीं है। 

मैक्रों से जब पूछा गया कि चीन की अधिनायकवादी प्रतिक्रिया (सब कुछ नियंत्रण में) से पश्चिमी देशों के लोकतंत्र की कमजोरी का पता नहीं चलता है तो उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ की सरकारों से उन लोगों की तुलना नहीं की जा सकती है, जहाँ पर सच को दबाया जाता है। हम नहीं जानते, लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ ऐसी चीजें घटित हुई हैं, जिनके बारे में हमें नहीं पता है।”

आलिम इरफान के कहने पर वाजिद ने फावड़े से काट डाला 2 साल की बेटी को, बताया – उससे आती थी GF की याद

पूरे देश में फैले कोरोना के खतरे के बीच उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से दिल दहलाने वाली खबर आई है। यहाँ एक पिता ने आलिम (मजहब विशेष में वो जो काले जादू के दम पर सब कुछ ठीक कर देने का भ्रम फैलाता है) के कहने पर अपनी 2 साल की मासूम बेटी की हत्या कर दी। मृतक बच्ची की माँ की शिकायत पर रविवार (अप्रैल 19, 2020) रात इस मामले में केस दर्ज किया गया। अब दोनों आरोपित – बच्ची का पिता और आलिम पुलिस की गिरफ्त में है। पुलिस ने बच्ची के शव को पास के खेतों से बरामद कर लिया है और उसे पोस्टमॉर्टम के लिए भी भेज दिया है।

इलाके के सीओ राम मोहन शर्मा ने बताया कि रविवार को करीब 10 बजे वाजिद ने अपनी 2 वर्षीय बिटिया तरन्नमुम को मौत के घाट उतारा। इस बीच घर के सभी लोग सो रहे थे। इसके बाद उसने बच्ची का गला तेजधार वाले हथियार से काटा और बाद में उसके शव को पास के खेतों में दफना आया।

पुलिस के अनुसार, रात के 11 बजे बच्ची की माँ रेहाना ककरौली पुलिस थाने में बच्ची की हत्या होने की खबर लेकर पहुँची। पुलिस ने फौरन इस संबंध में वाजिद को गिरफ्तार किया और खेत जाकर शव बरामद किया। हालाँकि इस बीच आलिम वहाँ से भागने में सफल रहा। मगर, बाद में उसकी भी गिरफ्तारी हुई।

जानकारी के मुताबिक पूरा मामला खाईखेड़ा गाँव का है। जहाँ के जंगल में ईंट भट्टे का काम करने वाले वाजिद ने आलिम के कहने पर 2 साल की मासूम तरन्नुम को फावड़े से काटकर मार डाला और बाद में उसका शव जाकर गड्ढे में गाड़ आया।

बच्ची की माँ रिहाना ने वाजिद के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कराते हुए बताया कि वह अपने पति वाजिद व 5 बच्चों के साथ गाँव खाईखेड़ा के जंगल में ईंट पत्थर का काम करती है और वहीं पर वे सब झोपड़ी बनाकर रहते हैं। उसके मुताबिक, रविवार रात जब उसके घर में सभी सोए थे, तब अचानक उसकी बीच रात आँख खुली तो उसे वाजिद व दो साल की बेटी तरन्नुम चारपाई पर नहीं मिले।

काफी देर बाद जब वाजिद घर लौटा तो रेहाना ने उससे बच्ची के बारे में पूछा। इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने बताया कि बराबर के भट्ठे पर काम करने वाले आलिम इरफान के कहने पर उसने तरन्नुम की हत्या कर दी है। शव को गड्ढा खोदकर दबा दिया है। 

गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में वाजिद ने पुलिस को बताया कि उसके परिवार में कई महीनों से विवाद चल रहा था। जब उसने इस संबंध में अपने साथ काम करने वाले आलिम इरफान को बताया तो उसने सलाह दी कि सुख शांति बनाने के लिए वह अपनी छोटी बेटी की कुर्बानी दे दे। इससे सब ठीक जाएगा।

मगर, बाद में वाजिद अपने बयान से पलट गया और कहा कि इरफान ने केवल उसे ‘हवन’ कराने की सलाह दी थी। उसने बाद में कहा कि उसने अपनी दो साल की बेटी को इसलिए मारा क्योंकि बेटी को देखकर उसको अपनी पुरानी प्रेमिका की याद आती थी।

यहाँ बता दें कि पुलिस का कहना है कि वाजिद लगातार पूछताछ में अपने बयान बदल रहा है। पुलिस का कहना है कि हो सकता है कि वाजिद के भीतर कोई कुँठा हो। जिसके कारण उसने अपनी बेटी की हत्या की। फिलहाल के लिए पुलिस ने वाजिद और आलिम इरफान के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और लगातार आरोपितों से पूछताछ कर हत्या के पीछे का कारण पता लगाने की कोशिश की जा रही है।

पालघर साधु लिंचिंग: हिंदुओं को ‘आतंकी’ कहने वाले अनुराग और लिबरल गैंग अब पढ़ा रहे इंसानियत का पाठ

पालघर में साधुओं पर नरभक्षियों की तरह प्रहार करने वाली भीड़ के ख़िलाफ़ गुस्सा रह-रहकर उमड़ता है। समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर समाज किस तरफ जा रहा है। एक ओर तो मौलाना साद को डिफेंड करने के लिए फेक न्यूज तक चलाने से किसी को कोई गुरेज नहीं होता, मगर दूसरी ओर साधुओं की हत्या कर दी जाती है और उनके पक्ष में बोलने से सब सेकुलरवादी परहेज करने लगते हैं। 

इस दौरान जो खुद को सोशल मीडिया पर बैलेंस होकर पेश करना चाहते हैं, वो इस घटना पर कम्यूनल एंगल न ढूँढने की गुहार लगाते हैं और जो कट्टरपंथी पहले से ही अपने चेहरे से सेक्युलर मुखौटे को उतारकर फेंक चुके हैं, वो या तो इस घटना पर चुप रहते हैं या फिर इसे एक अतिवाद के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया मात्र बताते हैं।

अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर जैसे लोग बॉलीवुड के कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हें सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर भाग लेते देखा गया। इन्होंने इस बीच न बिलकुल एकतरफा होकर एक निराधार माँग को वाजिब ठहराने के लिए लड़ाई लड़ी। बल्कि समाज में ऐसे दर्शाया कि देश का बहुसंख्यक अब अल्पसंख्यकों पर हावी हो गया है। अनुराग कश्यप ने तो उस दौरान गृहमंत्री के लिए यहाँ तक कहा कि इतिहास थूकेगा इस जानवर पर।  

मगर, जब महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं पर हमला हुआ तो, वही अनुराग कश्यप के सुर पूरी घटना पर बदल गए और वे आक्रोश दिखाने वाले लोगों को समझाते नजर आए कि इस खबर में हिंदू मुस्लिम एंगल न ढूँढा जाए बल्कि उस माहौल को दोष दिया जाए जिसके कारण ये घटना घटी।

अब ये लिखने की बात नहीं है कि अनुराग कश्यप जैसे लोग इन घटनाओं के पीछे किसे जिम्मेदार मानते हैं। वे साल 2014 बाद से देश के माहौल को क्यों साम्प्रदायिक बताते हैं। मगर ये जरूर गौर करने की बात है कि जिस भीड़ ने साधुओं पर हमला किया उनमें से एक नाम शोएब भी कहा जा रहा है। जिसके अपराध को छिपाने के लिए शायद आज अनुराग कश्यप एक अलग नैरेटिव गढ़ रहे हैं और जो लोग वीडियो में शोएब के होने की बात को खुलकर बोल रहे। उनके ख़िलाफ़ एक्शन लेने की माँग कर रहे हैं। 

यहाँ ऐसा नहीं है कि सेकुलर-सेकुलर का खेल खेलते अनुराग कश्यप ने हमेशा इस लीक को फॉलो किया हो और हमेशा हिंदू-मुस्लिम का एंगल उभारने पर लोगों को टोका हो। साल 2017 का उनका ट्वीट बताता है कि किस तरह वे हिंदुओं को अतिवादी और आतंकवादी तक कहते नजर आए थे।

उस दौरान शायद उन्हें यही लगता होगा कि उनके गैंग द्वारा समाज में फैलाया जहर अंतिम सत्य होगा और जिन लोगों को वो बचाने निकलेंगे वो हमेशा आस्तीन में रहकर डसने का काम करेंगे। न कभी इनकी सच्चाई सामने आएगी और न कभी उनके पूरे अजेंडा को कोई तोड़ पाएगा।

मगर आज जब धीरे-धीरे इन लोगों का प्रोपगेंडा दम तोड़ने लगा है और खुलेआम साधुओं को मारने की खबरें मीडिया में आने लगी है, तो ये भाषाई स्तर का खेल खेलकर नया तिलिस्म रचने की फिराक में हैं और लोगों को इंसानियत का पाठ पढ़ा रहे हैं क्योंकि इस बार मरने वालों में भगवा वेशधारी साधू हैं।

गौर रखिए कि स्वरा भास्कर जो समुदाय विशेष से संबंधित हर मुद्दे पर भावुक हो उठती हैं। उनकी आवाज में भारीपन दिखने लगता है, वे समय निकालकर प्रदर्शन में शाामिल होती हैं, वो इस खबर पर पूरी तरह मूक बनी बैठी हैं। उन्हें शायद मालूम भी नहीं है कि पालघर में साधुओं को उनके पोसे नरभक्षियों ने नोच लिया है।

इसके अलावा उनके गिरोह के लोग जो इस घटना पर मुँह खोल रहे हैं, वो अपने कड़ी निंदा में पालघर घटना को मात्र एक घटना की तरह पेश कर रहे है। उनके लिए मारे गए साधू मात्र आम व्यक्ति है, जिनको एक भीड़ ने लिंच कर दिया है। इन लोगों के पास न ही साधुओं को साधू कहने का समय है और न ही मॉब की हकीकत पर कुछ बोलने का। इन्हें न शिवसेना की नाकामयाबी पर बोलना है और न एनसीपी पर जिसके सदस्य खुद इस घटना के दौरान वहाँ मौजूद थे

गौरतलब है कि बॉलीवुड का पूरा ये धड़ा केवल सोशल मीडिया के जरिए अपने इस अजेंडे को नहीं चलाता। इसके लिए इन्हें मीडिया गिरोह के लोगों का समर्थन प्राप्त होता है। हम कह सकते हैं कि समाज में फर्जी न्यूज फैलाने और बहुसंख्यकों के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की प्रक्रिया में ये दो क्षेत्रों के बुद्धिजीवी एक दूसरे के परिपूरक होते हैं। इसलिए इसे भी समझिए जिस समय बॉलीवुड में अनुराग समेत कई लोग या तो इसपर चुप थे या फिर खुद को बैलेंस कर रहे थे उस समय किस तरह मीडिया गिरोह के लोग इस घटना पर चुप्पी साधकर मखौल उड़ा रहे थे।

गौर करिए जब कल ये खबर चारों ओर फैल चुकी थी उस समय मीडिया गिरोह के दिग्गज सोशल मीडिया पर क्या शेयर कर रहे थे। सिद्धार्थ वरदराजन, मीडिया गिरोह के वरिष्ठ पत्रकार और झूठ बनाने की फैक्ट्री ‘द लायर’ के मालिक, जिस समय ये घटना चारों ओर फैल चुकी थी उस समय वर्धराजन तबलीगी जमात से लेकर होशियारपुर के मुस्लिमों की परेशानी उजागर करने में लगे थे। 

उनके ख़िलाफ़ हो रहे शोषण का मुद्दा उठा रहे थे। यूपी पुलिस के ख़िलाफ बोल रहे थे। लेकिन एक बार भी उन्होंने इस घटना पर बोलना उचित नहीं समझा। हाँ आज जरूर उन्होंने इस मामले पर ट्वीट किया। मगर अपने अजेंडे के अनुसार खबर को एंगल देकर, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा लीडर इस खबर को साम्प्रदायिक रंग दे रहे हैं।

इसी प्रकार राणा अयूब भी इस घटना के सुर्खियों में आने के बाद भी चुप्पी साधे बैठी रहीं। उन्होंने अपनी टाइमलाइन पर कश्मीर का मुद्दा उठाया। न्यूज़ीलैंड की सबसे प्रभावी लीडर के बारे में बताया। रमजान की खुशबू को महसूस किया। साथ ही मुस्लिमों के ख़िलाफ़ फैलाई जा रही नफरत के ख़िलाफ़ नैतिकता पर सवाल उठाया। मगर मजाल इस ‘जागरूक पत्रकार’ ने इस मुद्दे पर एक बार भी कोई बात की हो। इनके अलावा एक आरजे फहाद भी है जो इस घटना पर बोलते हैं लेकिन इसके पीछे मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग को कारण बताते हैं।

रेडियो मिर्ची RJ फहाद ने साधुओं की हत्या को दिया साम्प्रदायिक रंग, कहा- मुस्लिमों की लिंचिंग मुख्य कारण

महाराष्ट्र के पालघर मे हुई साधुओं की हत्या ने सभी का दिल दहला दिया हैं। जहाँ एक तरफ लोग इस पर सख्त क़ानूनी कार्यवाही चाहते है। वहीं कुछ लोग इसे सांप्रदायिकता का रंग देने मे चूक नही रहे। रेडियो मिर्ची आरजे फहाद जो रेडियो मिर्ची यूएई पर ‘पुरानी जीन्स’ होस्ट करते हैं, उन्होंने महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की लिंचिंग को सांप्रदायिक रंग देने के लिए ट्विटर का सहारा लिया।

आरजे फहाद ने आरोप लगाया कि पहले अगर मुस्लिमों की लिंचिंग पर निंदा होती, तो 16 अप्रैल की रात हो सकता है पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा लिंचिंग नहीं की जाती। खुद को “नेहरूवादी” मानने वाले, आरजे फहाद ने दोहराया की भीड़ को उकसाकर साधुओं को पीटा जाना और पुलिस का मूक खड़े हो तमाशा देखना। सिर्फ़ मुस्लिमो की लिंचिंग की वजह से ये हुआ है।

विडंबना यह है कि बर्बर घटना को सांप्रदायिक रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस घटना का कोई सांप्रदायिक रुप नहीं था। क्योंकि महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने दावा किया कि पीड़ित और अपराधी दोनों एक ही धर्म के थे।

रेडियो मिर्ची के आरजे और उनकी इस्लामिक विचारधारा

रेडियो मिर्ची आरजे फहाद इस्लामवादी विचारधारा को प्रदर्शित करने वाले एकमात्र व्यक्ति नहीं हैं। उनकी सहयोगी, आरजे सायमा ने भी कोरोनोवायरस प्रकोप के बीच तब्लीगी जमात के सदस्यों के खिलाफ दुर्व्यवहार के आरोपों का बचाव किया है। उन्होंने नर्सों के साथ छेड़छाड़ और डॉक्टरों पर हुई पत्थरबाजी को ‘फेक न्यूज़’ कहकर इन आरोपों को पहले ही सिरे से खारिज कर दिया था। इससे पहले, सायमा ने कैब विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर भीड़ जुटाने के लिए लोगों को उकसाया था। उसने दिल्ली में एंटी-सीएए हिंसा को भी सही ठहराया था। क्योंकि उस वक़्त सभी मुस्लिम चुप थे जब अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जब जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाया गया।

एक और पूर्व रेडियो मिर्ची वीपी आकाश बनर्जी फर्जी वीडियो फैलाते हुए पकड़ा गया था