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कश्मीर में भेजने के लिए अफगानिस्तान में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा था पाकिस्तान, मार गिराए गए

पूरी दुनिया कोरोना जैसी महामारी से जूझ रही है। पाकिस्तान भी इससे अछूता नहीं। बावजूद भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने की वह लगातार साजिशें रच रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कश्मीर में दहशतगर्दी फैलाने के लिए वह जैश के आतंकियों को अफगानिस्तान में ट्रेनिंग दे रहा था। साथ ही वह कोरोना संक्रमितों की घुसपैठ कराने की भी फिराक में है। इस बीच, किश्तवाड़ में दो आतंकी शुक्रवार को मुठभेड़ में मार गिराए गए।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में तालिबान के लड़ाके जैश ए मोहम्मद के आंतकियों को ट्रेनिंग दे रहे थे। इस बारे में भारतीय खुफिया एजेंसियों को जानकारी हाथ लगी है। जिसमें अफगानिस्तान के नांगरहार प्रांत के मुहम्मद डेरा इलाके में एक ट्रेनिंग कैंप का पता चला है। इस इलाके में अफगानी फोर्सेज़ और तालिबान के बीच सीधी गोलीबारी हुई थी। 13 और 14 अप्रैल की रात हुई मुठभेड़ में अफगानी सेना के 4 जवान मारे गए। कैंप की तलाशी के दौरान सुरक्षाकर्मियों ने देखा कि वहाँ तालिबान के केवल 5 लड़ाके ही ढेर थे। मारे गए अन्य 10 आतंकियों की पहचान जैश के सदस्य के तौर पर हुई है। इन आतंकियों को कश्मीर में गड़बड़ी फैलाने के मकसद से ट्रेनिंग दी जा रही थी। जैश के एक आतंकी को जिंदा पकड़ने में भी कामयाबी मिली है।

खुफिया सूत्रों के अनुसार मुफ्ती रऊफ असगर के बेटे वली अजहर ने भी अफगानिस्तान के इसी कैंप में ट्रेनिंग ली थी। इस कैंप का मुखिया हरकत उल मुजाहिदीन का आतंकी मुफ्ती असगर कश्मीरी बताया जाता है। इन कैंपों को चलाने में बड़ा रोल अब्दुल्ला नाम के एक आतंकी का है। अब्दुल्ला को कश्मीर में आतंकी घुसपैठ का स्पेशलिस्ट माना जाता है।

वहीं, दैनिक जागरण के अनुसार अब पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ कश्मीर में कोरोना आतंक फैलाने की साजिश रच रहे हैं। इसका खुलासा गुलाम कश्मीर में आतंकी बनने गए एक युवक द्वारा परिजनों को किए गए कॉल को इंटरसेप्ट करने से हुआ। यह जानकारी हाथ लगने के बाद एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों ने घुसपैठरोधी तंत्र की समीक्षा कर उसे और चाक चौबंद कर दिया। सुरक्षाबलों को निर्देश दिया गया है कि वह सरहद पर पकड़े जाने या मारे जाने वाले घुसपैठियों के शवों को कब्जे में लेते हुए पूरा एहतियात बरतें।

गौरतलब है कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में 25 मार्च को गुरुद्वारे पर आतंकी हमला हुआ था। इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी ली थी। हमले का मास्टरमाइंड इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रोविंस (ISKP) का सरगना मौलवी अब्दुल्ला उर्फ़ असलम फ़ारूक़ी था। वह फिलहाल गिरफ्त में है। इस हमले को अंजाम देने वाला फिदायीन केरल का ही एक दुकानदार मोहम्मद साजिद था। वह चार साल पहले चौदह लोगों के साथ ISIS ज्वाइन करने निकला था। वह केरल के कासरगोड का रहने वाला था और 2015 में अफगानिस्तान जाकर इस्लामिक स्टेट का आतंकी बन गया था।

27 लोगों की जान लेने वाले इस हमले के बाद कुछ मीडिया रिपोर्ट में खुफिया सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि ये आतंकी पहले भारतीयों को मारने के लिए काबुल स्थित इंडियन एंबेसी को निशाना बनाने आए थे। लेकिन वहाँ सुरक्षा के कड़े इंतजाम देखकर गुरुद्वारे को निशाना बनाया। रिपोर्टों के अनुसार सुरक्षा एजेंसियों ने इस तरह के हमले को लेकर आगाह कर रखा था। इसमें कहा गया था कि अफगानिस्तान से भारत को बाहर ​निकालने के मकसद से आतंकी साजिशें रची जा रही है। इन इनपुट के आधार पर एंबेसी की सुरक्षा के इंतजाम सख्त कर दिए गए थे। इसके कारण आतंकी अपने मूल उद्देश्य को अंजाम नहीं दे पाए।

सुबह 3 बजे बैठी अदालत, 5:15 पर जेल भेजे 17 पत्थरबाज: मुरादाबाद में मेडिकल टीम पर हुआ था हमला

शायद यह अपनी तरह का पहला मामला है। अल सुबह तीन बजे मजिस्ट्रेट के घर अदालत बैठी। सुनवाई के बाद सवा पॉंच बजते-बजते 17 पत्थरबाज न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिए गए। मामला मुरादाबाद में मेडिकल और पुलिस टीम पर हुए हमले से जुड़ा है।

इस मामले में प्रदेश की योगी सरकार और यूपी पुलिस ने जिस तत्परता से काम किया है उसकी भी भरपूर सराहना हो रही है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार थाने पर लोग न उमड़े इसके लिए विशेष सावधानी बरती गई। प्रशासनिक अमला पूरी रात हरकत में रहा। डीएम और एसएसपी भी सुबह के छह बजे सोने गए।

हमले के बाद सीएम योगी ने दोषियों पर एनएसए के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए थे। मुरादाबाद पुलिस ने भी तत्काल कार्रवाई करते हुए सभी आरोपियों को गुरुवार सुबह तीन बजे कोर्ट में पेश कर दिया। हालात देखते हुए मजिस्ट्रेट ने घर में अदालत लगी।

अमर उजाला में प्रकाशित खबर

सुनवाई के बाद सभी 17 आरोपितयों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। जेल भेजे गए आरोपितों में 10 पुरुष जबकि 7 महिलाएँ हैं। आरोपितों को जेल तक पहुँचाने के लिए पुलिस-प्रशासन के अधिकारी पूरी रात नहीं सोए, क्योंकि थाना नागफनी से कुछ कदम की दूरी पर ही यह घटना हुई थी। आशंका थी कि सुबह होने पर स्थानीय लोग थाने का घेराव कर सकते हैं।

पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार करते ही उन्हें तत्काल कोर्ट में पुेश करने की गुजारिश की। डीएम राकेश कुमार और एसएसपी अमित पाठक पूरी घटना के साथ इलाके पर पैनी नज़र बनाए हुए थे। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स की भी तैनाती की गई थी।

अमर उजाला की खबर के मुताबिक जिला प्रशासन ने पूरी सावधानी बरतते हुए सभी 17 आरोपितों को जेल में क्वारंटाइन किया है। सभी आरोपित नवाबपुर इलाके से हैं, जिसे जिला प्रशासन पहले ही कोरोना संक्रमण का हॉटस्पॉट घोषित कर चुका है। जेल अधीक्षक उमेश सिंह ने बताया कि इन सभी को जेल में ही अलग रखा गया है।

गौरतलब है कि मुरादाबाद के थाना नागफनी के मुहल्ला नवाबपुरा में बुधवार को चिकित्सकीय और पुलिस टीम पर उस समय जमकर पथराव किया गया जब मेडिकल टीम यहाँ के लोगों को क्वारंटाइन करने पहुँची थी। इसी मुहल्ले के एक व्यक्ति की कोरोना से मौत होने के बाद उसके संपर्क के लोगों को क्वारंटाइन किया जाना था। इस पथराव में एक डॉक्टर, फार्मेसिस्ट समेत छह स्वास्थ्य कर्मी घायल हो गए और पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं थी।

घटना के बाद सोशल मीडिया में भी आरोपितों के खिलाफ आक्रोश दिखाई पड़ा था उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना को लेकर सख्त रवैया अपनाते हुए कहा था कि दोषियों के खिलाफ रासुका (NSA) लगाने और नुकसान की भरपाई आरोपितों की संपत्ति से करने का आदेश जारी किया था।

मुरादाबाद के हमलावरों पर चुप्पी साधने वाली RJ सायमा ‘इंसानियत’ के नाम पर रंगोली के खिलाफ माँग रहीं FIR

पूरा विश्व इस समय उस दौर से गुजर रहा है जब हर किसी को अपने धर्म और मजहब से ऊपर उठकर कोरोना से जंग जीतने की चाह है। आज इजराइल हो या फिर अमेरिका, ब्राजील हो या दुबई, भारत हो या पाकिस्तान हर देश सिर्फ़ इसी जद्दोजहद में है कि किस तरह कोरोना को हराया जाए और देश के नागरिकों को बचाया जाए। मगर, इस बीच कुछ अराजक तत्व ऐसे हैं जो हर देश में स्वास्थ्यकर्मियों को उनका काम करने से रोक रहे हैं। भारत के संदर्भ में इन्हें तबलीगी जमात से जुड़े लोगों की हरकतों से जोड़कर देखा जा सकता है। इसके अलावा एक वर्ग और भी है जो सोशल मीडिया पर मानवता की बात जरूर कर रहा है लेकिन धर्म और मजहब को देखकर, इसलिए वो भी किसी उपद्रवी से कम नहीं है।

पाकिस्तान में तो इस काम के लिए पूरा प्रशासन और वहाँ की बहुसंख्यक आबादी को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। लेकिन भारत में इसके लिए मीडिया गिरोह एक मात्र जिम्मेदार है। जिसकी सूची में एक नाम RJ सायमा का भी है। जो इन दिनों ट्विटर पर मानवता की दुहाइयाँ दे रही हैं। मगर, स्वास्थ्यकर्मियों की दुर्दशा पर मूक बनी बैठी हैं। पिछले 24 घंटे की यदि बात करें तो सोशल मीडिया पर इंसानियत का पताका लहराने वाली RJ सायमा ट्विटर पर अपने सैंकड़ों फॉलोवर्स को ये बता रही हैं कि आज के दौर में झूठ बोलना सामान्य हो गया हैं। फेक न्यूज ही असली खबर हो गई है। कट्टरता ही पूण्य बन गया है और ईमानदारी एक बुराई हो गई है। अब सोचिए, इन दिनों ऐसा क्या हो रहा है, जो आरजे सायमा को इन शब्दों की नई परिभाषाएँ बतानी पड़ रही हैं। 

तो बता दें, इन दिनों तबलीगी जमात के लोग देश में कोरोना हॉट्सपॉट बनने और अपने दुर्व्यवहार के कारण खबरों में हैं। जिनकी संलिप्ता के कारण हर न्यूज मीडिया संस्थान उन्हें कवर कर रहा है, उनकी मंशा पर सवाल उठा रहा हैं?

उदाहरण देखिए। पिछले दिनों मुरादाबाद में एक घटना हुई। बेहद शर्मनाक! यहाँ कोरोना जाँच के लिए एक इलाके में गई मेडिकल टीम पर समुदाय विशेष की भीड़ ने हमला कर दिया और डॉक्टर को इतना पीटा कि वे बुरी तरह लहुलुहान हो गए। हमले के बाद आई तस्वीरें हृदयविदारक हैं। इससे पहले दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भी तबलीगी जमात से जुड़े लोगों ने दो डॉक्टरों को अपना निशाना बनाया था। जहाँ पहले महिला डॉक्टर पर फबब्तियाँ कसी गई थी और बाद एक पुरूष डॉक्टर के आवाज उठाने पर उनपर हमला हुआ था। इसी तरह हरियाणा में आशाकर्मियों पर समुदाय विशेष की भीड़ ने हमला किया था। साथ ही राँची, हैदराबाद, मुजफ्फरपुर जैसी अनेकों जगहों से ऐसे मामले सामने आए थे।

मुरादाबाद में कट्टरपंथियों द्वारा किए गए हमले में घायल डॉ और आरोपितों को ले जाती पुलिस

इन सभी मामलों को देखते हुए देश भर के लोगों ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया दी। हर किसी ने अपना गुस्सा जाहिर किया। लेकिन मजाल RJ सायमा ने इनमें से किसी भी मुद्दे पर कोई भी बात की हो। वो अपने ट्विटर पर लगातार ऐसी चीजें शेयर करती रहीं, जिनका इन घटनाओं से कोई भी सरोकार नहीं था। मगर, जब मुरादाबाद की घटना घटी, तो रंगोली चंदेल जैसे लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। नतीजतन उन्होंने खून से लथपथ डॉक्टर की तस्वीर देखकर आवाज उठाई, अपना आक्रोश दिखाया। लेकिन, तब तबलीगी जमात की हरकतों को मात्र गलती बताने वाली सायमा ने इसपर एफआईआर की माँग को अपना समर्थन दे दिया।

RJ सायमा ने विनोद कापड़ी का ट्वीट रीट्वीट किया और माँग की कि नरसंहार की वकालत करने वाली रंगोली चंदेल का ट्विटर अकॉउंट सस्पेंड होना काफी नहीं है। इसलिए ऐसे व्यक्ति पर एफआईआर दर्ज कर सख्त कार्रवाई करने की भी बात होनी चाहिए।

इसके बाद सायमा ने राहुल गाँधी की इमेज बिल्डिंग करने के लिए उनकी सराहना की, उन्हें सुलझा हुआ नेता दिखाया। साथ ही रोहिणी सिंह का ट्वीट रीट्वीट किया। जिसमें लिखा था मु###नों और लिबरल लोगों को मारने की बात कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में नहीं आता। ये हिंसा भड़काना होता है। ये हेट स्पीच हैं। इसके लिए रंगोली को अरेस्ट किया जाना चाहिए। ये हैरानी की बात है कि अब तक रंगोली के ख़िलाफ़ शिकायत क्यों नहीं दर्ज हुई।

अब हालाँकि, यहाँ तक सायमा सिर्फ़ रीट्वीट करके काम चला रही थीं। लेकिन थोड़ी देर बाद जब उन्हें यूजर समझाने लगे कि वे गलत लोगों के ख़िलाफ़ आवाज उठाएँ और राजनीति में न फँसे। तो उन्होंने ट्वीट किया कि, “मैं हैरान हूँ, इंसानियत और इंसाफ़ की बात करो तो वो कहते हैं कि ‘आप politics में मत पड़ो।” यहाँ सोचिए! सायमा कौन सी इंसानियत की बात कर रही हैं? सायमा कौन से इंसाफ के बारे में बात कर रही हैं? क्या इंसानियत और इंसाफ ये नहीं है कि वे देश भर में स्वास्थ्यकर्मियों पर हो रहे हमलों की निंदा भर ही कर दें या फिर जो लोग उनपर हिंसक हो रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की माँग कर दें, ताकि कोरोना योद्धाओं को हिम्मत मिले।

लेकिन नहीं, आरजे सायमा को इस समय सबसे जरूरी काम लग रहा है वो ये कि आखिर कैसे जमातियों के अपराधों को एक गलती में बदला जाए और कैसे ये कि साबित किया जाए कि कोरोना संक्रमण के पीछे जमाती जिम्मेदार नहीं है। वे चाहती हैं कि लोग इस समय राहुल गाँधी का सुलझापन जाने, न कि ये जानें कि आखिर उस हमलावर भीड़ की क्या सोच थी जिसने डॉक्टर को अपना निशाना बनाया। आखिर क्यों उन्होंने पूरी मेडिकल टीम पर हमला कर दिया। वो चाहती हैं कि वे समाज को रंगोली का आक्रामक रवैया दिखाएँ और उसे कट्टर चेहरा बताएँ, लेकिन ये नहीं चाहतीं कि असल में जो कट्टरपंथी है, जो दुर्व्यवहार कर रहे जमाती कोरोना वाहक हैं वो इस समाज में उजागर हों।

वो चाहती हैं प्रेम-शांति-इंसानियत के नाम पर लोग जमातियों के ख़िलाफ़ अपनी प्रतिक्रिया देना बंद कर दें और उनकी हरकतों को मात्र नादानी मानें। जैसे कि वो मानती हैं। लोग हर जगह हो रही घटनाओं को नजरअंदाज कर दें और कुछ अपवादों को देखकर तसल्ली कर लें कि अभी भी कुछ ऐसे मजहबी हैं जो कोरोना संकट में लोगों की मदद कर रहे हैं। प्रशासन की बात मान रहे हैं। हर नियम का पालन कर रहे हैं।

नोट: मालूम हो कि ऐसा नहीं कि RJ सायमा स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों को कोरना योद्धा मानने से इंकार कर रही हैं। लेकिन परेशानी बस यही है कि जब समुदाय विशेष उनपर हमला करता है तो वे अपने इन योद्धाओं के लिए न आवाज उठाती हैं और न इंसाफ माँगती हैं। वे सिर्फ़ मामले को डायवर्ट करने में लग जाती हैं और अपराधियों के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की बात नहीं करती बल्कि जो अपराधियों की हरकत पर प्रतिक्रिया देते हैं, उन्हें समाज में खतरा बताती हैं।

हेलीकॉप्टर से पैसे गिराएगी सरकार, UPSC परीक्षा रद्द: कोरोना काल में रीजनल चैनलों का कमाल

कोरोना वायरस संक्रमण और लॉकडाउन के चलते बहुत सी भर्ती व प्रवेश परीक्षाएँ स्थगित हो गई हैं। बहुत सी परीक्षाएँ ऐसी भी हैं जिनकी तिथि में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अनिश्चितता के इस माहौल के बीच सोशल मीडिया पर इन भर्ती परीक्षाओं के रद्द होने, स्थगित होने की फर्जी खबरें फैल रही हैं। 

ताजा मामला देश की प्रतिष्ठित यूपीएससी (UPSC) परीक्षा का है। हर साल 8 से 9 लाख युवा इस परीक्षा में बैठते हैं। एक मराठी टीवी चैनल ने दावा किया है कि यूपीएससी  की ओर से आयोजित होने वाली परीक्षा कोरोना वायरस के चलते रद्द हो गई है। अभ्यर्थियों को गुमराह होने से बचाने के लिए प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) फैक्टचेट के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से इस संबंध में ट्वीट किया गया है, जिसमें इस खबर को फर्जी बताया गया है। PIB ने कहा है, एक मराठी टीवी चैनल ने ऐसा दावा किया कि यूपीएससी की परीक्षा कोरोना वायरस के कारण रद्द हो गई है। यह दावा बिलकुल झूठ है। यूपीएससी ने कहा है कि परीक्षा तिथि में किसी भी तरह के बदलाव की सूचना वेबसाइट पर दी जाएगी।”

PIB ने मराठी चैनल के दावे का खंडन करते हुए ट्विटर पर लिखा कि चैनल द्वारा दिखाई जा रही खबर फेक है। अगर किसी तरह की रिशिड्यूलिंग होगी तो वेबसाइट पर उसकी सूचना दी जाएगी।

बता दें कि 15 अप्रैल को पीआईबी की प्रेस रिलीज में कहा गया था कि संघ लोक सेवा आयोग ने एक स्पेशल मीटिंग कर तमाम परीक्षाओं के बारे में जानकारी दी है। इसमें कहा गया था कि सिविल सर्विस परीक्षा 2019 के होने वाले इंटरव्यू की तारीख पर 3 मई के बाद फैसला लिया जाएगा, जबकि 2020 की सिविल सर्विस प्रारंभिक परीक्षा सहित और भी तमाम परीक्षाओं की तारीखों की घोषणा पहले ही की जा चुकी है। अगर इसमें कोई परिवर्तन होता है तो उसे आयोग की वेबसाइट पर जारी किया जाएगा।

साथ ही इसमें ये भी कहा गया था कि यूपीएससी चेयरमैन और मेंबर्स ने एक साल तक अपनी बेसिक सैलरी का 30 फीसदी पीएम केयर्स फंड में देंगे, जबकि आयोग के दूसरे स्टाफ ने एक दिन की सैलरी देने का फैसला किया था।

इसी तरह एक दक्षिण भारतीय न्यूज चैनल ने दावा किया कि कोरोना वायरस महामारी संकट के बीच सरकार सभी शहरों में हेलीकॉप्टर के जरिए पैसे गिराएगी। इस खबर के प्रसारित होने के बाद यह मैसेज सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा। 

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने इस खबर का खंडन किया है। कहा है कि सरकार ऐसी कोई भी चीज नहीं करने जा रही है।

क्या है हेलीकॉप्टर मनी?

‘हेलीकॉप्टर मनी’ की चर्चा पिछले कुछ दिनों से हो रही है। दरअसल यह टर्म अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन का दिया हुआ है। इसका मतलब होता है कि रिजर्व बैंक रुपए प्रिंट करे और सीधा सरकार को दे दे। सरकार इसके बाद इसे जनता में बाँट दे, जिससे लोगों की बेसिक जरूरतें पूरी हो सकें। इसको ‘हेलीकॉप्टर मनी’ कहा जाता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि सरकार हेलीकॉप्टर के जरिए पैसे शहरों में गिराती है। पैसे लोगों के खाते में आते हैं। इसको ‘हेलीकॉप्टर मनी’ नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि यह पैसे लोगों के पास ऐसे ही पहुँचते हैं, जैसे आसमान से गिरे हों। अर्थव्यवस्था को गहरी मंदी से बाहर निकालने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। 

‘मुल्लों’ की पत्थरबाजी पर किया ट्वीट तो बुजुर्ग ‘कॉमेडियन’ अतुल खत्री ने रंगोली चंदेल को बताया चांडाल

खुद को स्टैंड-आप कॉमेडियन बताने वाले अतुल खत्री ने एक बार फिर अभिनेत्री कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया है। उसने गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) को रंगोली के लिए ‘चांडाल’ शब्द का इस्तेमाल किया। इस तरह उसने जातिवाद का जहर घोलने का काम किया है।

अतुल खत्री का ट्वीट

खत्री के ट्वीट से ऐसा लगता है कि वे रंगोली के मौलवियों के खिलाफ कथित टिप्पणी से काफी परेशान हो गए थे, इसलिए अपनी नफरत का प्रदर्शन करते हुए उसने कुब्रा सैत नामक एक अभिनेत्री के ट्वीट पर कमेंट किया। कुब्रा सैत ने अपने ट्वीट में कहा था कि उन्होंने रंगोली को ब्लॉक कर दिया है। साथ ही उसने रंगोली चंदेल के खिलाफ मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से ‘आवश्यक कार्रवाई’ की माँग की। 

इसी ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए खत्री ने रंगोली के खिलाफ जातिवाद का जहर उगलते हुए ‘चांडाल’ कहा। बता दें कि चांडाल ऐसा वर्ग है, जिसे सामान्यत: अछूत माना जाता है। इन्हें श्मशान पाल और श्मशान कर्मी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। ये लाशों का अंतिम संस्कार भी करते हैं। चांडाल को देश के कम से कम 6 राज्यों में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है।

बुजुर्ग कॉमेडियन अतुल खत्री की यह शर्मनाक टिप्पणी रंगोली द्वारा किए गए ट्वीट के बाद आया। दरअसल रंगोली ने इन दिनों डॉक्टरों, नर्सों और पुलिस पर हो रहे हमलों को लेकर एक ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने लिखा, “एक जमाती की कोरोना से मौत हो गई, जब पुलिस और डॉक्टर उसके परिवार को चेक करने गए तो उन्होंने उन पर (पुलिस और डॉक्टर) हमला किया और उन्हें मारा। धर्मनिरपेक्ष मीडिया और इन मुल्लाओं को एक पंक्ति में खड़ा कर गोली मार देनी चाहिए। इतिहास में वे हमें नाजी कह सकते हैं, किसे चिंता है, जिदंगी फेक इमेज से ज्यादा जरूरी है।”

एसिड सर्वाइवर रही रंगोली द्वारा पत्थरबाजी पर आक्रोश जाहिर करने के बाद उन्हें काफी ट्रोल किया गया। अतुल खत्री की तरह ही इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उन्हें गालियाँ दीं और कहा कि वो एसिड अटैक की हकदार थी। कुछ ने उन पर एक और एसिड अटैक की कामना की।

अतुल खत्री के खिलाफ कार्रवाई की माँग

ट्विटर पर कई लोगों ने SC/ST की भावनाओं को आहत करने के लिए खत्री के खिलाफ कार्रवाई की माँग की और साथ ही जातिवादी गालियों के लिए उनकी निंदा की।

दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (DICCI) के सलाहकार गुरु प्रकाश ने भी खत्री द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा की निंदा की और इसे ‘बेहद अपमानजनक’ बताया। उल्लेखनीय है कि अतुल खत्री इससे पहले भी रंगोली चंदेल के लिए ‘चांडाल’ शब्द का प्रयोग कर चुके हैं। दरअसल ‘छपाक’ फिल्म के प्रमोशन के समय खत्री ने ट्विटर यूज़र और भाजपा समर्थक अंकित जैन को यह कहकर अपनी कुत्सित सोच का खुला प्रदर्शन किया था कि ABVP कार्यकर्ताओं को ‘रंगोली चांडाल’ से सहानुभूति मिलेगी।

‘यह व्यवस्था का मजाक है’: कर्नाटक के पूर्व CM कुमारस्वामी के बेटे की शादी में लॉकडाउन की उड़ी धज्जियाँ

देशव्यापी लॉकडाउन में तमाम बंदिशों के बीच कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल सेक्युलर के नेता एचडी कुमारस्वामी के बेटे निखिल कुमारस्वामी शुक्रवार को शादी के बंधन में बँध गए। निखिल ने राज्य के पूर्व आवास मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता एम कृष्णप्पा की भतीजी रेवती से शादी की। ये शादी कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से करीब 28 किमी दूर रामनगर स्थित फॉर्महाउस में हुई। 

कुमारस्वामी के बेटे की शादी समारोह की जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं उससे साफ है कि इस दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के कायदों का ख्याल नहीं रखा गया। इस संबंध में राज्य के उपमुख्यमंत्री ए. नारायण ने कहा, “मैंने रामनगर के डिप्टी कमिश्नर से रिपोर्ट मॉंगी है। मैं पुलिस अधीक्षक से बात करूॅंगा। कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। यह व्यवस्था का मजाक है।”

कर्नाटक में ‘बड़ी शादियों’ का प्रचलन है। समारोह कई दिनों तक चलता है। लेकिन, राज्य के दो राजनीतिक परिवारों ने इस तरह का आयोजन ऐसे वक्त में किया है जब देश कोरोना महामारी की चपेट में हैं। संक्रमण पर काबू पाने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन है। लोगों के जुटान और समारोहों पर रोक है। इस स्थिति में लोगों को अपनी शादी तक रद्द करनी पड़ी है। लेकिन, मुख्यमंत्री रह चुके एक शख्स ने अपने बेटे की ही शादी में इसका ख्याल नहीं रखा।

लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिग का ख्याल नहीं

एक ओर जहाँ पूरे देश में सार्वजनिक स्थान पर 4 लोगों के इकट्ठा होने पर भी पाबंदी लगी हुई है। वहीं इस शादी में एक जगह 60 से 70 लोगों के इकट्ठा होने की खबर है। बताया जा रहा है कि इस समारोह में सभी परंपराओं का पालन किया गया और सभी रीति-रिवाज निभाए गए। मगर किसी ने भी वहाँ न मास्क पहने न ग्लव्स। इसके अतिरिक्त शादी में सोशल डिस्टेंसिंग का भी पालन नहीं हुआ।

उल्लेखनीय है कि शादी से पहले कुमारस्वामी ने कहा था,”अगर कार्यक्रम घर पर आयोजित किया जाता है तो सोशल डिस्‍टेंसिंग का पालन करना मुश्किल होगा। यही कारण है कि हम अपने फार्महाउस में कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं। मैं अपने कार्यकर्ताओं-शुभचिंतकों से इस कार्यक्रम में भाग नहीं लेने का अनुरोध करता हूँ।” 

कुमारस्वामी के बेटे की शादी पर क्या बोले डिप्टी सीएम

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री ए. नारायण ने इस शादी पर कहा कि कुमारस्वामी ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि दिशा-निर्देशों का पालन किया जाएगा। वे जनप्रतिनिधि हैं। लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में हैं। उन्हें दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। वे कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे। रामनगर से विधायक हैं। इसलिए दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए था। कोई बहाना नहीं होना चाहिए। वह यह नहीं कह सकते कि लोग बिना निमंत्रण के आए।

राजस्थान: कर्फ्यू के बीच टोंक के कसाई मोहल्ले में लाठी-डंडे और तलवार से पुलिस पर हमला

कोरोना वॉरियर्स पर हमले की घटनाएँ रुकने का नाम नहीं ले रही है। अब राजस्थान में पुलिस टीम पर हमला किया गया है। राज्य के टोंक शहर में कोरोना प्रभावित अल्पसंख्यक इलाकों में गश्त करने गई पुलिस पर हमला किया गया। लाठी-डंडे और तलवार से निशाना बनाया गया। तीन पुलिसकर्मी जख्मी हैं। उन्हें टोंक के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

घटना की जानकारी देते हुए एडिशनल एसपी विपिन शर्मा ने कहा, “कसाई मोहल्ला में हमला किया गया। हम कुछ लोगों को पूछताछ और जाँच के लिए अपने साथ लेकर आए हैं। फिलहाल जाँच जारी है।” जिस इलाके में हमला किया गया, वहाँ कर्फ्यू लगा हुआ है। पुलिस कर्फ्यू का पालन कराने में जुटी थी। इसी दौरान करीब आधा दर्जन लोगों ने कर्फ्यू तोड़ने की कोशिश की। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने जब इन्हें रोका लाठी-डंडों और तलवार से हमला कर दिया। घटना सुबह 8 बजे की बताई जा रही है।

इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में मेडिकल टीम पर हमला किया गया था। हमला उस वक्त हुआ था, जब मेडिकल टीम कोरोना से जान गॅंवाने वाले एक शख्स के परिजनों को क्वारंटाइन करने पहुँची थी। इलाके के लोगों ने मेडिकल टीम को घेर लिया और पथराव किया था। इस घटना में डॉक्टर समेत कई स्वास्थ्यकर्मी घायल हुए थे। पुलिस ने 17 लोगों को गिरफ्तार किया था।

जाँच दल के साथ पत्थरबाजी की घटना में चोटिल डॉ. एससी अग्रवाल ने कहा था, “हम मुरादाबाद के नवाबपुरा में एक COVID-19 पॉजिटिव मरीज के 4 परिवार वालों को लेने गए थे। जैसे ही हमने उन्हें एम्बुलेंस में बिठाया, कुछ लोगों ने हमें घेर लिया और विवाद शुरू हो गया। लोगों ने हम पर हमला कर दिया।”

उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी पुलिस को निशाना बनाया गया था। मस्जिद के इमाम समेत 4 लोगों ने अधिकारियों की टीम पर हमला किया था। दरअसल यहाँ कुछ जमाती आए थे। वे दारीवाली मस्जिद में ठहरे थे। उसमें से एक की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। इसके बाद अधिकारी पुलिस बल के साथ मस्जिद सील करने गए थे। तभी लोगों ने इसका विरोध किया और टीम पर पथराव कर दिया था।

पंजाब, बिहार में भी हो चुका है पुलिस पर हमला

कोरोना वॉरियर्स पर हमले करीब-करीब हर प्रदेश में हुआ है। पंजाब के पटियाला जिले में निहंगों ने कर्फ्यू पास माँगने पर हमला कर दिया था। हमले में एएसआई हरजीत सिंह की कलाई कटकर अलग हो गई थी, जबकि थाना सदर इंचार्ज बिक्कर सिंह और एक अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गया था। इसके बाद एक कमांडो ऑपरेशन चलाकर सभी आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह मध्य प्रदेश के इंदौर में मेडिकल टीम और बिहार के मधुबनी में पुलिस को निशाना बनाया गया था।

फारूकी मुनव्वर ने गोधरा में जलाकर मारे गए कारसेवकों का उड़ाया मजाक, राम-सीता के नाम भी परोस चुका है अश्लीलता

हिंदू देवी-देवताओं पर फूहड़ मजाक करने वाला स्टैंडअप कॉमेडियन फारूकी मुनव्वर एक फिर से विवादों में है। इस बार उसने गोधरा में जलाकर मार डाले गए 59 कारसेवकों का मजाक उड़ाया है। गोधरा कांड के लिए उसने अमित शाह और आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया है। संज्ञान में यह वीडियो आने के बाद राष्ट्रीय सेवा संघ (RSS) ने जल्द से जल्द उस पर कानूनी एक्शन लेने की बात कही है। लेकिन सवाल अब भी यही है कि आखिर क्या समाज उस गर्त की ओर आगे बढ़ गया है जहाँ हँसने-हँसाने के लिए गोधरा नरसंहार को विषय सामग्री के तौर पर चुनना पड़े?

वीडियो में फारूकी मुनव्वर कहता है कि एक बार वो टीवी पर बर्निंग ट्रेन देख रहा था और अचानक उसके पापा ने आकर टीवी बंद कर दिया। जब उसने पूछा क्या हुआ, तो उन्होंने कहा कि ये सब बकवास मत देखा करो। उसके मुताबिक जब उसने अपने पिता से पूछा कि आखिर ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा कि ये गोधरा का वीडियो है और ये चैनल न्यूज चैनल है। अब यहाँ तक की बात में किसी को भी लगेगा कि कोई अंजान व्यक्ति जिसे गोधरा कांड के बारे न पता हो वो उसे बर्निंग ट्रेन कहकर बुला ही सकता है। इसमें क्या बड़ी गलती? लेकिन वीडियो में इसके बाद फारूकी की बात सुनिए। फारूकी अपने दर्शकों को हँसाने के लिए कहता है कि मुझे उस समय लगा कोई फिल्म चल रही है, जिसके निर्देशक अमित शाह और प्रोड्यूसर आरएसएस है… मुझे कुछ नहीं पता था। मैं तो बस मूवी देख रहा था।

ऑडियंस में बैठे लोगों को भले ही ये विषय ताली बजाने और ठहाके मारकर हँसने की बात लगी, मगर सोशल मीडिया पर लोगों ने फारूकी को पकड़ लिया। ट्विटर पर सोनम महाजन ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “देखिए, मुनव्वर फारूखी किस प्रकार गोधरा कांड में मरने वाले 59 मृत कारसेवकों का मजाक उड़ा रहा है और उसका दोषी भी अमित शाह व आरएसएस को बता रहा है। अगर बंगलुरू में कोई इनके ख़िलाफ एक्शन लेने के लिए तैयार है तो मुझे एफआईआर कॉपी का मसौदा तैयार करने और हर समर्थन देने में खुशी होगी।”

गौरतलब है कि इससे पहले फारूकी ने राम-सीता के नाम पर मजाक उड़ाया था। इसको लेकर उस पर एफआईआर भी दर्ज हुई थी। बॉलीवुड के एक गाने का जिक्र करते हुए फारूकी कहा था, “मेरा पिया घर आया ओ राम जी। राम जी डोंट गिव अ फ़*** अबाउट पिया। यह सुन राम जी कहते हैं मैं खुद चौदह साल से घर नहीं गया। अगर सीता ने सुन लिया, वो तो शक करेगी। सीता को तो माधुरी पे पहले से ही शक है। वो गाना है तेरा करूँ गिन-गिन इंतजार। उसे लग रहा है वनवास गिन रही है 14 पर आकर रुक गई।”

बता दें, फारूकी मुनव्वर के इस कॉमेडी के नाम पर बनाए गए बिना सर-पैर के चुटकुलों पर ट्विटर ही नहीं, बल्कि उसके यूट्यूब चैनल पर भी आपत्ति जताई गई है। दर्शकों का कहना है कि हिंदुत्व पर चुटकुले बनाना आसान है, लेकिन उसे अल्लाह या पैगम्बर पर भी चुटकुले बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

गोधरा कांड: कारसेवकों को जलाने की साजिश

यहाँ बता दें, गोधरा में 7 फरवरी 2002 की सुबह साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस-6 को जला दिया गया था। इस घटना में 59 कारसेवकों की मृत्यु हो गई थी। ये कारसेवक अयोध्या से विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित पूर्णाहुति महायज्ञ में भाग लेकर वापस लौट रहे थे। 27 फरवरी की सुबह ट्रेन 7:43 बजे गोधरा पहुँची। जैसे ही ट्रेन गोधरा स्टेशन से रवाना होने लगी उसकी चेन खींच दी गई। ट्रेन पर 1000-2000 लोगों की भीड़ ने हमला किया। भीड़ ने पहले पत्थरबाजी की फिर पेट्रोल डालकर उसमें आग लगा दी। इसमें 27 महिलाओं, 22 पुरुषों और 10 बच्चों की जलने से मृत्यु हो गई। जाँच रिपोर्ट के अनुसार गोधरा दुर्घटना एक षड्यंत्र था। मुख्य षड्यंत्रकारी गोधरा का मौलवी हुसैन हाजी इब्राहिम उमर और ननू मियाँ थे। इन्होंने सिग्नल फालिया एरिया के मुस्लिमों को भड़का कर इस षड्यंत्र को अंजाम दिया था। ट्रेन को जलाने के लिए रज्जाक कुरकुर के गेस्ट हाउस पर 140 लीटर पेट्रोल भी एकत्रित किया गया था। 

लोहरदगा में छिपे हैं रोहिंग्या: खुलासा करने वाले DSP का कॉन्ग्रेस-जेएमएम सरकार ने किया तबादला

पिछले दिनों झारखंड के लोहरदगा में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों के छिपी होने की बात सामने आई थी। इस संबंध में रिपोर्ट देने वाले विशेष शाखा (खुफिया विभाग) के डीएसपी जितेंद्र कुमार का तबादला कर दिया गया है। उनकी जगह इमदाद अंसारी लेंगे। उन्हें लातेहार से यहॉं भेजा गया है।

जितेंद्र, इमदाद सहित कुल चार डीएसपी का तबादला हुआ है। लेकिन, जितेंद्र कुमार को पलामू भेजे जाने के पीछे राजनीतिक वजहें बताई जा रही है। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार उन्होंने एडीजी (विशेष शाखा) को सौंपी रिपोर्ट में लोहरदगा के विभिन्न इलाकों के 13 लोगों पर रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। इस रिपोर्ट से पूरे प्रदेश में हलचल मची थी।

लोहरदगा की एड-हॉक अंजुमन इस्लामिया ने राज्य के डीजीपी को पत्र लिखकर इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। 11 अप्रैल को लिखे पत्र में रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कार्रवाई की मॉंग की गई थी। अंजुमन इस्लामिया के कंवेनर हाजी शकील अहमद की तरफ से लिखे पत्र में कहा गया था कि आजादी के बाद से ही लोहरदगा जिला में बांग्लादेश, पाकिस्तान या रोहिंग्याओं का कोई वजूद नहीं है। विशेष शाखा की रिपोर्ट में जिस स्थान का जिक्र है, वहाँ भी ऐसे नागरिक नहीं हैं। रिपार्ट में जिन व्यक्तियों को संरक्षक बताया गया है, वे समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं। एक साजिश के तहत उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई है।

एड-हॉक अंजुमन इस्लामिया की ओर से डीजीपी से की गई शिकायत

पत्र में दैनिक जागरण में 11 अप्रैल को प्रकाशित एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अवैध रूप से छिपकर रह रहे म्यांमार के रोहिंग्याओं की झारखंड के भी कई हिस्सों में उपस्थिति और सक्रियता के प्रमाण मिले हैं। पिछले दिनों तबलीगी जमात की तलाश में हुई छापेमारी के दौरान धनबाद के बैंक मोड़ इलाके से तीन रोहिंग्याओं को भी पकड़ा गया था, वहीं लोहरदगा में भी कई रोहिंग्या के छिपकर रहने की खबर मिली थी।

इसके साथ ही लोहरदगा के ऐसे 13 लोगों का नाम व पता के सामने आने का भी जिक्र किया गया है, जिनके ऊपर रोहिंग्या व बांग्लादेशी घुसपैठियों को छिपाने का आरोप है। लोहरदगा के जिन मुहल्लों में बांग्लादेशी व रोहिंग्याओं के रहने की सूचना पुलिस तक पहुँची है, उनमें ईदगाह मुहल्ला, राहत नगर, इस्लाम नगर, जूरिया, सेन्हा के चितरी, कुड़ू के जीमा व बगडु के हिसरी आदि गाँव के नाम शामिल हैं। 

11 अप्रैल 2020 को दैनिक जागरण के लोहरदगा संस्करण में प्रकाशित खबर जिसका जिक्र इस्लामिया के पत्र में है

गौरतलब है कि झारखंड में जब से कॉन्ग्रेस-झामुमो गठबंधन की सरकार बनी है उस पर राज्य में तुष्टिकरण के आरोप लग रहे हैं। लोहरदगा में ही इस साल 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में निकाले गए जुलूस पर कट्टरपंथियों द्वारा हमला किया गया था। जिसमें नीरज प्रजापति की मौत हो गई थी। नीरज प्रजापति के सर पर लोहे की रॉड से हमला किया गया था। सीएए के समर्थन में रैली निकाल रहे लोगों पर पूर्व-नियोजित तरीके हमला किया गया था। कट्टरपंथियों ने अपने घरों की छतों से ईंट-पत्थर फेंककर हमला किया था।

नीरज प्रजापति की पत्नी ने सीएम हेमंत सोरेन से मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन व्यस्त सीएम ने उन्हें मुआवजे का कोई आश्वासन नहीं दिया और प्रशासन ने नीरज की शव यात्रा में सिर्फ 35 लोग को जाने की अनुमति दी थी। साथ ही शमशान जाने के रास्ते को भी बदल दिया था, क्योंकि रास्ते में एक मस्जिद थी।  

सरकार ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया तो ऑपइंडिया के प्रयासों के बाद जनता ने अब तक लगभग 32.5 लाख रुपए का सहयोग किया है। इसमें से 11.4 लाख रुपए क्राउडकैश के जरिए जुटाए गए, जबकि बाकी धनराशि लोगों ने दिवंगत नीरज की पत्नी के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर किया।

मलेशिया जा रहे 28 रोहिंग्‍या की भूख से मौत

बांग्लादेश छोड़ मलेशिया जा रहे कम से कम 28 रोहिंग्‍याओं की समुद्र में भूख से तड़प-तड़प कर मौत हो गई। बांग्‍लादेश के कोस्‍ट गार्ड ने बताया कि रोहिंग्‍याओं का जहाज मलेशिया नहीं पहुँच पाया। इसकी वजह से ये लोग कई हफ्ते तक समुद्र में भटकते रहे। उन्‍होंने बताया कि 396 लोगों को बचा लिया गया है। इसमें से बड़ी संख्‍या में ऐसे लोग थे, जिन्‍हें कई हफ्तों से खाना नहीं मिला था।

जानकारी के मुताबिक 400 से अधिक रोहिंग्याओं ने जनवरी में मलेशिया के लिए समुद्र के रास्ते यात्रा शुरू की थी, लेकिन कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर प्रतिबंधों के कारण मलेशिया द्वारा प्रवेश से इनकार करने के बाद वे समुद्र में फँसे थे। सभी रोहिंग्या बांग्लादेश में कॉक्स बाजार, चटगाँव में स्थित उखिया-टेकनाफ शरणार्थी शिविरों के थे। कोस्‍टगार्ड ने बताया कि कुल 396 लोगों को बचाया गया है। बताया जा रहा है कि बचाए गए लोगों में ज्‍यादातर महिलाएँ और बच्‍चे हैं। इनमें से कई लोगों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उनकी सिर्फ हड्ड‍ियाँ दिखाई दे रही थीं। कई ऐसे भी थे जो खड़े नहीं हो पा रहे थे। 

‘मुस्लिमों ने किया फेमस, वरना गोलगप्पे बेचते’: बबीता फोगाट पर भड़का ‘बकलोल’ पत्रकार

मीडिया गिरोह में वैसे तो कई लोग हैं जिन्होंने सोशल मीडिया पर केवल अनर्गल बातें कर अपनी पहचान बनाई है। इनमें भी प्रशांत कनौजिया का अलग लेवल है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर आर्मी चीफ तक पर भ्रामक खबर फैला चर्चा में आया कनौजिया अब कुश्ती चैंपियन बबीता फोगाट के खिलाफ प्रोपेगेंडाबाजी में लगा है।

बबीता की गलती सिर्फ़ इतनी है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर तबलीगी जमात के लोगों को, जो इस समय देश में तेजी से कोरोना संक्रमण फैलने के लिए विशेषत: जिम्मेदार हैं, उन्हें जाहिल कह दिया। बस, इसी बात पर कनौजिया भड़क गया और ऊल जलूल बातें करने लगा।

बबीता फोगाट ने ट्वीट किया, “कोरोना वायरस भारत की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी समस्या है। जाहिल जमाती अभी भी पहले नंबर पर बना हुआ है।” अब देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए हम समझ सकते हैं कि बबीता ने यहाँ ‘जाहिल जमाती’ किन लोगों के लिए प्रयोग किया। उन्होंने उन जमातियों को जाहिल बोला, जो देश की स्थिति को जानते-समझते हुए भी छिपे बैठे हैं। अस्पताल में महिला स्वास्थ्यकर्मियों पर फब्तियाँ कस रहे हैं, उन्हें अश्लील इशारे कर रहे हैं, नंगे घूम रहे हैं। बबीता ने अपने ट्वीट में कहीं पर भी मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन प्रशांत कनौजिया ने यहाँ अपनी चालाकी से तुरंत बबीता के एक ट्वीट को हिंदू-मुस्लिम में बदल दिया और बबीता के निजी जीवन पर भी टिप्पणी करने से नहीं बाज आया।

एक पत्रकार जो खुद सोशल मीडिया पर स्टंट कर विवादित पत्रकारों की सूची में शामिल हुआ है, वो बबीता फोगाट यानी एक नेशनल चैंपियन को कहता है कि उन्हें एक मुस्लिम ने फ़िल्म बनाकर फेमस कर दिया। वरना इस देश में क्रिकेट छोड़ अन्य खिलाड़ी कई साल बाद गोलगप्पे बेचते नज़र आए हैं। यहाँ मुस्लिम शब्द प्रशांत ने शायद आमिर खान के लिए इस्तेमाल किया और बबीता को ये जताया कि बिना आमिर खान के उनका जीवन अंधकार में चला जाता। फिर भी वह आज मुस्लिमों के लिए नफरत फैला रही हैं?

अब पहला सवाल तो ये कि बबीता ने मुस्लिमों को लेकर क्या टिप्पणी की? उन्होंने किसी को लेकर क्या नफरत फैलाई? उन्होंने तो केवल उस तबके को लेकर अपना आक्रोश दिखाया, जिसकी बदसलूकियों से इन दिनों हर राज्य की सरकार परेशान है। जो अब भी जान-बूझकर जगह-जगह छिपे बैठे हैं और सरकार की अपील के बाद भी जाँच के लिए बहार नहीं आ रहा।  

दूसरी बात ये कि प्रशांत को जानने की जरूरत है कि फोगाट बहनें आमिर खान के पास अपनी जीवनी लेकर नहीं गईं थी कि वे उनपर फिल्म बनाएँ। बल्कि आमिर खुद आए थे उस परिवार के पास, जिसने वाकई कुँठित समाज में बदलाव की नींव रखी। प्रशांत को जानने की जरूरत है कि बबीता फोगाट और उनकी बहन के ऊपर आमिर ने फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि वे खुद समाज में उन्हें प्रेरणा के रूप में देख रहे थे। कनौजिया की तरह गोलगप्पे बेचते नहीं! जानकारी तो ये भी है कि इस फिल्म ने 2200 करोड़ रुपए का कारोबार किया, मगर फोगाट परिवार को सिर्फ़ 80 लाख रुपए मिले। अब बताइए एहसान फोगाट बहनों के ऊपर हुआ या फिर फिल्म बनाने वालों के ऊपर, या फिर उस समाज के ऊपर जहाँ इस फिल्म के आते ही कई लड़कियों में आगे बढ़ने का उत्साह दिखा, उमंग दिखी।

अब मामला इसके बाद यही शांत नहीं हुआ। जाहिर है, इतनी मेहनत के बाद कोई ऐसे सवाल उठाए तो दिल दुखता है, वो भी तब जब आपने कुछ गलत न कहा हो। बबीता फोगाट ने प्रशांत को कहा कि एक फिल्म तुम्हारे जैसों के ऊपर भी बनानी चाहिए। उस फिल्म का नाम रखना चाहिए पत्थरबाजों की गैंग।

इसके बाद कनौजिया ने लिखा, “तुम जो ये शब्द लिख पा रही हो उसके पीछे भी सावित्री-फातिमा है। जब उन दोनों ने पहला महिलाओं का स्कूल खोला था जब आरएसएस-भाजपा के पूर्वज उनपर पत्थर फेंकते थे। बाकी दादरी वालों ने ठीक नहीं किया।” गौरतलब है कि बीते साल हरियाणा में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बबीता भाजपा की तरफ से दादरी से मैदान में उतरीं थी।

अब जिन्होंने दंगल देखी है वे इस बात को समझ पाएँगे कि जिस इलाके से बबीता और गीता आती हैं, वहाँ पर कई नायिकाओं के उदाहरण जीवंत होते हुए भी समाज पिछड़ा हुआ और लड़कियाों के मामले में तो मानो मृत था। नतीजतन उन्हें भी पहले लीक से हटकर चलने पर समाज के ताने सुनने पड़े। लेकिन कुछ दिनों बाद दोनों बहनें खुद एक उदाहरण बनकर उभरीं, जिनके जीवन का संघर्ष बाकी किसी नायिका से कम नहीं थीं। हम मानते हैं कि सावित्री-फातिमा के योगदान के बिना आज स्त्री शिक्षा का कोई आधार नहीं है। मगर, बबीता और उनके परिवार के संघर्षों को खारिज करना, वो भी अपना एजेंडा चलाने के लिए केवल मूढ़ होने का का प्रमाण है।

प्रशांत कनौजिया इसके बाद बबीता के पक्ष में बोलने वालों को भी जवाब देता है। फिर धीरे-धीरे वीर सावरकर की बात बीच में ले आते हैं और पूछते हैं उसने कौन सा तीर मारा था? सवाल है कि उन्होंने अगर देश के लिए कुछ नहीं किया था तो फिर इंदिरा गाँधी ने उनका उल्लेख वीर सपूत कहकर अपने पत्र में क्यों किया था? क्या हर चीज के ज्ञाता सिर्फ प्रशांत कनौजिया हो चले हैं? बाकी किसी की प्रतिक्रिया का कोई महत्व नहीं है? बाकी किसी के योगदान का कोई मोल नहीं है।

कनौजिया, इसके बाद फिर एक जवाब में बबीता की मिल्खा सिंह और पान सिंह तोमर के साथ तुलना करता है और कहता है कि सबने देश का मान बढ़ाया। मगर बबीता समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ बोलकर सिर्फ़ जहर उगलकर पार्टी से मेडल चाहती हैं। खुद सोचिए! बबीता के एक पार्टी मात्र से जुड़ जाने से कनौजिया उनकी प्रतिक्रिया पर कितने हमलावर हो गए? क्या ये प्रतिक्रिया स्वभाविकता के साथ उस समय भी बाहर आती अगर बबीता एक ‘जाहिल हिंदू’ या ‘जाहिल श्रद्धालु’ कहती? शायद नहीं। क्योंकि तब कनौजिया को बबीता अपने करीबियों की तरह महसूस होतीं। और उनका समर्पण, उनकी काबिलियत, उनकी सोच समाज के लिए मानक होती।

आज बबीता फोगाट पर प्रशांत कनौजिया द्वारा हमलावर होने पर कई मीडिया गिरोह इस खबर को कवर कर रहे हैं। कारंवाँ भी इस क्रम में एक नाम हैं। जो अपनी खबरों से ये नैरे़टिव बना रहा है कि समुदाय विशेष देश के हित के कामों में लगा हुआ है, मगर बबीता फोगाट जैसे लोग उनके ख़िलाफ़ नफरत फैला रहे हैं। पर इस बात को कोई नहीं समझ रहा कि देश आज भी उन मुस्लिमों की कद्र करता है, उनके सेवाभाव को सलाम कर रहा है जो मजहब से उठकर मानवता के प्रति खुद को समर्पित कर चुके हैं। गाली सिर्फ़ उन्हें पड़ रही है, गुस्सा सिर्फ़ उनपर उतारा जा रहा है, जो सब जानते-समझते हुए, समाज के लिए खतरा बने हैं। प्रशांत कनौजिया जैसे लोग इन्हीं का बचाव कर अपने प्रोपेगेंडा की रोटियॉं सेंकते हैं। ज्ञात हो कि बबीता ने अपने ट्वीट में किसी एक समुदाय को नहीं टारगेट किया था उन्होंने वही शब्द इस्तेमाल किया था जिसका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।

बता दें, 2 अप्रैल को एक अन्य ट्वीट पर भी बबीता को घेरा गया था, तब भी उन्होंने यही जवाब दिया था कि “डॉक्टर, पुलिस, नर्स जो इस संकट के समय देश की ढाल बनकर खड़े हैं उन पर हमला करने वालों को और क्या संज्ञा दूँ। इसमें मेरा किसी धर्म, जाति विशेष के खिलाफ लिखने का कोई मकसद नहीं है। मैंने इस ट्वीट में सिर्फ कोरोना सेनानियों पर हमलावरों के खिलाफ लिखा है और आगे भी लिखती रहूँगी”