कोरोना वायरस के प्रसार के साथ ही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) की माँग दुनिया भर में बढ़ती जा रही है। इसकी आपूर्ति के लिए दुनिया के अधिकतर देश भारत की तरफ देख रहे हैं। भारत भी अपनी जरूरतों को देखते हुए और इसे पूरा करने के बाद दुनिया के अधिकतर देशों की मदद कर रहा है। भारत ने 55 देशों में मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन भेजने का फैसला किया है।
भारत की ओर से जिन 55 देशों को मलेरिया की दवा कोरोना संक्रमण के लिए भेजी जा रही है, उनमें प्रमुख रूप से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, अफगानिस्तान, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका, म्यांमार, सेशेल्स, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, डोमिनिकन गणराज्य, युगांडा, मिस्र, आर्मेनिया, सेनेगल, अल्जीरिया, जमैका, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, यूक्रेन, नीदरलैंड, स्लोवेनिया, उरुग्वे, इक्वाडोर समेत अन्य देश शामिल हैं।
बताया जा रहा है कि 55 देशों के आवेदनों को तीन चरणों में मँजूरी दी गई है। पहले दो चरणों के लिए जिन देशों का चयन किया गया है, उन्हें इसकी खेप भी पहुँचा दी गई है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को छोड़ कर अन्य सभी देशों को HCQ की खेप भेजी जा चुकी है। अभी भारत में इन दवाओं का निर्माण सीमित स्तर पर हो रहा है, इसलिए माँग के मुकाबले आपूर्ति कम की जा रही है। जैसे-जैसे निर्माण तेज होगा, वैसे-वैसे आपूर्ति भी बढ़ाई जाएगी।
इससे पहले भारत ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी लेकिन बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करने के बाद अमेरिका समेत दूसरे देशों को भी भारत ने मानवीय आधार पर HCQ की आपूर्ति शुरू की। अमेरिका को भारत 36,00000 टेबलेट भेज चुका है। इसी के साथ 15 से ज्यादा देशों को ये दवा अब तक भेजी जा चुकी है।
इनमें अमेरिका और ब्रिटेन से लेकर रूस, दक्षिण अफ्रीका समेत यूरोप लैटिन अमेरिका, अरब और अफ्रीकी देश शामिल हैं। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा मलेरिया के अलावा आर्थराइटिस और ल्यूपस जैसी बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होती है। हाल में अमेरिका, चीन व दक्षिण कोरिया समेत कई देशों में इस दवा से ही कोरोना वायरस संक्रमण का इलाज हुआ है। इसके बाद से ही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की माँग विदेशों में बढ़ गई है।
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा उत्पादक
भारत दुनिया में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा उत्पादक है। यही वजह है कि अब विदेशों से ही इस दवा की अचानक माँग बढ़ गई है। हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी साफ कर चुके हैं कि भारत की जरूरत को देखते हुए ही अन्य देशों को इस दवा की सप्लाई की जाएगी।
कोरोना वायरस से निपटने के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को काफी उपयोगी माना जा रहा है। यही कारण है कि अमेरिका व ब्राजील के राष्ट्रपति और इजराइल के पीएम ने पीएम मोदी की प्रशंसा की। ब्राजील के राष्ट्रपति ने पीएम मेादी की तुलना हनुमान भगवान से की, जिन्होंने कष्ट के समय लोगों को संजीवनी उपलब्ध कराई।
बॉलीवुड के कलाकार एजाज खान लगातार हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों पर जहर उगलने के कारण चर्चा में बने रहते हैं। कई बार वो अपने बयानों के चलते जेल भी हो आए हैं। अब एक बार फिर से एजाज चर्चा में आ गए हैं। उनकी एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही है। इसमें गालीबाज एजाज खान ने अर्नब गोस्वामी, रजत शर्मा और सुधीर चौधरी को कोरोना वायरस होने की दुआ माँगी है।
गत बुधवार रात 12:30 बजे एजाज खान ने फेसुबक लाइव किया था। जिसमें उन्होंने समुदाय विशेष को लेकर कई बातें कही। लाइव में उन्होंने कहा कि चींटी मर गई, मुस्लिम जिम्मेदार..हाथी मर गया मुस्लिम जिम्मेदार है। दिल्ली में भूकंप आया सारे मुस्लिम जमीन के नीचे घुसे और हिले तो भूकंप आ गया… यानी हर बात के लिए मुस्लिम को ही जिम्मेदार माना जाता है।
— ट्विटर मिनिस्टर Reetu (@Ritu_Victoriaa) April 16, 2020
एजाज खान ने ना सिर्फ पीएम मोदी को मुस्लिमों के खिलाफ पूर्वग्रह से ग्रसित होने का आरोपित बताया बल्कि रजत शर्मा, सुधीर चौधरी, अर्नब गोस्वामी जैसे पत्रकारों को गाली देते हुए कहा कि उनको, उनके परिवार को और उनकी पूरी टीम को कोरोना वायरस हो जाए।
निराश और आक्रोशित एजाज ने उनका लाइव वीडियो देख रही जनता से भी प्रश्न पूछते हुए कहा- “लेकिन कभी सोचा है कि आखिर ये कौन है जो ये साजिश कर रहे हैं?” वीडियो में एजाज ने इन सब चीज़ों के लिए एक राजनीतिक पार्टी को जिम्मेदार बताया है।
एजाज खान ने वीडियो में यह भी कहा कि ये एक साजिश है जिससे कोरोना से ध्यान हटाने के लिए सभी लोगो का ध्यान सांप्रदायिकता जैसे गंभीर मुद्दे की ओर जाए। वीडियो के अंत में उन्होंने दुआ माँगते हुए कहा कि ऐसे लोग जो देश में ऐसा कर रहे हैं, उन सबको ही कोरोना हो जाए।
अपने इस वीडियो में एजाज खान ने महाराष्ट्र सरकार की जमकर तारीफ की है। उन्होंने अपने इस वीडियो में बांद्रा स्टेशन पर जमा हुई भीड़ के इकट्ठे होने के पीछे भी राजनीति का हाथ बताते हुए कहा कि मजहब विशेष को ग्रुप पर ये मैसेज भेजे गए कि ट्रेनें चलेंगी। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे का काम इन लोगों से देखा नहीं जा रहा। एजाज ने कहा कि जो लोग इस देश में हिंदू-मुस्लिम कर रहे हैं कोरोना उन्हें ही जगाने के लिए आया है।
एजाज का जैसे ही यह वीडियो सामने आया, लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया पर फूटने लगा और अब कई लोग एजाज खान को अरेस्ट करने की माँग कर रहे हैं। ट्विटर पर #अरेस्ट एजाज खान नंबर 1 ट्रेंड बना रहा।
एजाज खान के ट्वीट को लेकर भी बवाल
वहीं एजाज खान के लिए उनका किया गया एक और ट्वीट भी अब मुसीबत बन गया है। जिसको लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुंबई पुलिस से मामले पर संज्ञान लेने को कहा है। एजाज खान ने अपने इस ट्वीट में लिखा है – “आज मैंने अपने कुत्ते का नाम भक्त रख दिया, मुझे मालूम है ये मेरे कुत्ते को पता चला तो मुझसे नाराज़ हो जाएगा लेकिन मैं इसे तो समझा सकता हूँ मगर तुम्हें कोई नही समझा सकता क्यूँकि तुम्हें ग़ुलामी और तलवे चाटने की आदत हो गयी है। भक्त छू..”
एजाज के इस ट्वीट पर कई लोगों ने यूपी पुलिस को टैग करते हुए कार्रवाई करने की माँग की जिसके बाद यूपी पुलिस ने एजाज के इस ट्वीट पर संज्ञान लेने का मुंबई पुलिस से अनुरोध किया है।
बेसहारा और जरूरतमंद लोगों का ध्यान रखने की जिम्मेदारी लिए आरएसएस की सेवा इकाई सेवा भारती संगठन तत्परता से जुड़ा हुआ है। आज ही सेवा भारती संगठन ने पश्चिम दिल्ली की एक चर्च में 250 भूखे लोगों को राशन उपलब्ध करवाया है।
पश्चिम दिल्ली के हस्तसाल नगर में जोमी चर्च (Zomi Church) से जुड़े 50 परिवारों के लगभग ढाई सौ सदस्य राशन और खाद्य सामग्री से परेशान थे। इस चर्च में ज्यादातर लोग नार्थ-ईस्ट के लोग, खासकर मिजोरम के निवासी हैं और कई वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं। जानकारी मिलने पर सेवा भारती संगठन के कार्यकर्ता इस चर्च के जरूरतमंद लोगों के पास पहुँचे और उन्होंने राशन तथा अन्या चीजें उपलब्ध करवाईं।
उल्लेखनीय है कि सेवा भारती संगठन बंद के दौरान जरूरतमंद लोगों को आर्थिक मदद भी उपलब्ध करवा रही है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े इस संगठन ने कोरोना वॉरियर्स के लिए सहयोग राशि देने का ऐलान किया है।
संगठन ने कहा कि सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी और पत्रकार ऐसी विपरीत परिस्थितियों में अपना दायित्व निभा रहे हैं और समाज की मदद करने के लिए अपनी जान खतरे में डाल रहे हैं। ऐसे में संगठन ने फैसला लिया कि अगर गैर सरकारी सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी (अनुबंधित) या कोई पत्रकार कोविड-19 से प्रभावित हैं तो उनकी मदद की जाएगी।
साथ ही, फैसला लिया गया कि अगर उनका इलाज चल रहा है तो उन्हें 25,000 रुपए की मदद दी जाएगी और अगर दुर्भाग्यवश ऐसे किसी कोरोना वॉरियर की मौत हो जाती है तो उनके परिवार को संगठन की तरफ से एक लाख रुपए की मदद दी जाएगी।
सेवा भारती द्वारा की जा रही मदद से सम्बंधित वीडियो को आप इस लिंक पर देख सकते हैं –
देश भर में 2.1 लाख स्वयंसेवक काम में लगे हुए हैं, जो ‘सेवा भारती’ के बैनर तले कार्यरत हैं। संगठन ने भारत में कुल 1200 संस्थाओं के साथ संपर्क साधा है और उन सभी के साथ मिल-जुलकर काम कर रही है। इन 1200 संस्थाओं के साथ मिल कर ये सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई इलाक़ा छूट न जाए। श्रवण ने बताया कि 26 लाख लोगों तक उनकी सीधी पहुँच है, जिन्हें भोजन कराया जा रहा है। ऐसे कई लोग हैं जिनके भोजन की पूरी जिम्मेदारी संगठन ने ही उठाई है।
राहुल गाँधी की वाह-वाही कराने के लिए कॉन्ग्रेस का आईटी सेल नित नए प्रयोग करता रहता है। ऐसे में कई बार उसका झूठ पकड़ा जाता है। लेकिन बावजूद इसके वो बाज नहीं आता। अब इसी क्रम में एक बार फिर कोरोना महामारी के बीच उन्होंने ये कारनामा किया है। दरअसल, बुधवार को कॉन्ग्रेस आईटी सेल ने राहुल गाँधी को शुभकामनाएँ देते हुए एक ट्वीट किया और ट्वीट में बताया गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने वायनाड में कोरोना वायरस रोकने के प्रयासों व तरीकों की प्रशंसा की है।
इसके बाद राहुल गाँधी ने भी इस मौक़े पर अपनी तारीफ अपने मुँह से करने का मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने खुद भी इस खबर को आगे बढ़ाया और लिखा यहाँ 16 दिन से कोई नया मामला नहीं है। इसलिए वे सभी अधिकारियों के कड़े प्रयासों व प्रतिबद्धता को सराहते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें गर्व महसूस हो रहा है कि उनके क्षेत्र की तारीफ स्वास्थ्य मंत्रालय ने की। जिसे पढ़कर राहुल गाँधी के फॉलोवर्स फूले नहीं समाए। उन्होेंने भी इस आधार पर अपने युवा नेता की तारीफों के पुलिंदे बाँधने शुरू कर दिए और कहने लगे कि न नरेंद्र मोदी के वाराणसी में न स्मृति के अमेठी में ऐसा कमाल हुआ है। बल्कि राहुल गाँधी ने अपने नेतृत्व में ये कर दिखाया है।
ट्वीटर पर राहुल गाँधी के समर्थकों द्वारा किए गए ट्वीट्स के भरमार को देखकर यकीन होता है कि राहुल गाँधी के फॉलोवर उन्हीं की तरह हैं। जो बिना तथ्यों की जाँच परख किए समाज में झूठ फैलाने में लग जाते हैं और अपने नेता की छवि निर्माण करने की होड़ में ये भी नहीं जानते हैं कि जिस जानकारी को वो फैला रहे हैं वो सच है या नहीं।
That’s because .@RahulGandhi ji not only prepared in #Wayanad but also cautioned to prepare for #CoronavirusOutbreak . If corrective precautions would have been taken in February things would have been far much better,At the same time we need to follow all GOVT protocols
इसलिए, सभी भ्रमों को दूर करते हुए आपको बता दें, कि जिस वायनाड को लेकर राहुल गाँधी व उनके समर्थक इतनी उत्साहित हो रहे हैं। उसकी हकीकत वास्तविकता में बहुत ज्यादा अलग है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वायनाड में कोरोना वायरस को रोकने हेतु प्रयासों की कोई प्रशंसा नहीं की है। बल्कि अतिश्योक्ति देखिए कॉन्ग्रेस पूर्व अध्यक्ष ने जिस मंत्रालय के नाम पर झूठ फैलाया है उसी मंत्रालय ने नई सूची में वायनाड को हॉट्सपॉट चिह्नित किया है।
जी हाँ, स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, वायनाड उन राज्यों में से है जिन्हें कोरोना वायरस के हॉट्सपॉट में क्लस्टर सूची में रखा गया है। जो कि रेड जोन से सिर्फ एक पायदान नीचे की श्रेणी है। अब रही बात इसकी की जब वायनाड के हालत कोरोना मामले में बहुत सुधरे हुए नहीं है तो राहुल गाँधी किन आधारों पर मिया मिठ्ठू बने?
तो जानकारी दे दें कि केरल में 7 जिले हैं जिनमें से 6 जिले पूरी तरह कोरोना के हॉट्सपॉट हैं यानी रेड जोन जबकि वायनाड अकेला ऐसा जिला है जो हॉस्टपॉट का क्लस्टर है। बाकी सब ऐसे इलाके हैं जहाँ कोरोना तेजी से फैला। शायद इसी उपलब्धि को राहुल गाँधी अपनी तारीफ समझ बैठे और सोशल मीडिया पर आभार व्यक्त करने लगे। लेकिन बता दें, राहुल गाँधी के दावों के उलट मंत्रालय ने अभी भी जिले को रेड जोन में रखा है और उसने व्हॉइट जोन में नहीं डाला। जिले से अब तक कोरोना के तीन मामले आए हैं, जिनमें से 2 ठीक हो चुके हैं। लेकिन फिर भी सुरक्षा के लिहाज से सरकार ने इसे रेड जोन में रखा हैं। इसलिए राहुल गाँधी के दावे बिलकुल गलत हैं।
प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए कुख्यात सबा नकवी ने हाल ही में एक वीडियो के जरिए मुस्लिमों के बचाव में हिन्दुओं के खिलाफ जमकर जहर उगला है और हिन्दुओं की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है।
सबा नकवी ने इस वायरल वीडियो के माध्यम से हिन्दुओं पर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप लगाया है और बेहद चालाकी से मुस्लिमों के करनामों पर पर्दा डालने का प्रयास किया है। यही नहीं उन्होंने सावधानी से विक्टिम कार्ड भी खेला है।
The bigoted Hindu supremacists, the communalists are not buying vegetable from Muslims. How sick are you? All the medicine you take come from a Muslim manufacturer.
इस वीडियो में सबा नकवी ने तमाम मुस्लिम समुदाय के लोगों के कुकृत्यों को छुपाने के लिए कुछ ‘अच्छे मुस्लिमों’ का जिक्र करते हुए सभी हिन्दुओं को असहिष्णु बताया है। और ऐसा करते हुए उन्होंने हिन्दू धर्म के लोगों का समाज के प्रति योगदान का कहीं भी किसी प्रकार का जिक्र नहीं किया है।
इस वायरल वीडियो में सबा नकवी कहते हुए देखी जा सकती हैं कि ‘हम लोगों से आप और क्या चाहते हैं?’ इसमें ‘हम’ शब्द का प्रयोग मुस्लिमों के लिए किया गया है। हालाँकि, सबा नकवी को हिन्दुओं को बुरा बताने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि इन्हीं विषयों पर हिन्दुओं का पक्ष रख कर तथ्य सामने रखे जाएँ तो सबसे पहले ‘विक्टिम कार्ड’ का रोना वही रोएँगी।
‘क्या हमें चले जाना चाहिए’ यह सवाल सबा नकवी अपने इस वीडियो में पूछती नजर आती हैं, जिसका उत्तर न दिया जाए तो बेहतर है क्योंकि यह फिर से सबा नकवी के लिए असहिष्णुता का प्रश्न पैदा कर सकता है।
कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनकी उम्मीद हिन्दू धर्म के लोग मुस्लिमों से करते हैं और यह इतनी भी ‘आसमानी माँग’ नहीं हैं कि मुस्लिम समुदाय उन्हें पूरा कर पाने में असमर्थ हो।
1 – उनका साथ मत दो, जो डॉक्टर्स पर थूकते हैं या उनका यौन उत्पीड़न करते हैं
निजामुद्दीन मरकज में शामिल लोगों को जब क्वारंटाइन करने के लिए अस्पताल ले जाया गया तो उन्होंने डॉक्टर्स पर थूकने, अश्लील इशारे करने से लेकर तमाम तरह की बदसलूकियाँ कीं। फिर भी मुस्लिम समुदाय के चुनिन्दा ‘अच्छे मुस्लिमों’ ने उन्हें ऐसा करने से नहीं रोका। वो अस्पताल में महिला स्वास्थ्यकर्मियों के सामने नंगे होकर घूमते रहे।
यहाँ तक की अस्पताल के बिस्तर पर एक जमाती ने शौच तक कर डाली। यदि मुस्लिम और उनके साथी ऐसे बदतमीज मुस्लिमों का बचाव करना छोड़ दें तो बड़ी मेहरबानी होती। क्योंकि वह भी उन्हीं के समुदाय से हैं जिनका जिक्र सबा नकवी अपने वीडियो में करती हैं।
2 – टिकटोक पर फेक न्यूज़ फैलाना और कोरोना को अल्लाह की NRC बताना बंद कर दें
सबा नकवी जैसे प्रोपेगैंडा पत्रकारों के संचार और समाचार के प्रमुख स्रोत टिकटोक पर हर प्रकार के मजहबी वीडियो शेयर किए जाते हैं। टिकटोक के जरिए ‘काफिरों’ को तमाम तरह के सन्देश दिए गए जिनमें बताया गया कि नमाजियों का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता या फिर अल्लाह और इस्लाम ही कोरोना का इलाज हैं।
हदें तो तब पार हुईं जब कोरोना वायरस को अल्लाह की NRC बताया गया। ऐसा करने वाले भी सबा नकवी के ही समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। मुस्लिमों को उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहिए।
3 – स्वास्थ्यकर्मियों-डॉक्टर्स से नाजायज माँग करनी बंद करें, उन पर पत्थरबाजी ना करें
क्वारंटाइन में तबलीगी जमात के लोगों ने जो भी उपद्रव मचाया है उनमें सबसे ज्यादा ‘वाहवाही’ उनकी बिरियानी, अंडा-करी और 25-25 रोटियों की माँग ने बटोरी है। यही नहीं, जहाँ कहीं भी डॉक्टर्स की टीम जाँच के लिए गई वहाँ उन पर थूका गया, पत्थर फेंके गए और सैकड़ों मुस्लिमों ने इकट्ठे होकर अल्लाह-हो-अकबर के नारे लगाते हुए उन्हें घेर लिया। यदि मुस्लिम इस तरह की हरकतों पर भी लगाम लगा सकें तो यह देश पर निश्चित ही बड़ा उपकार होगा।
4 – मजहब को देशहित पर हावी न होने दें
कोरोना वायरस के हावी होते ही भारत में भी फ़ौरन लॉकडाउन का ऐलान किया गया। लेकिन सरकार की अपील को सिर्फ मजहबी कारणों से ठुकराते हुए मुसलमान देखे गए। उन्होंने ना सिर्फ सामूहिक नमाज में हिस्सा लिया बल्कि सार्वजनिक उपक्रमों में भी उसी तरह शामिल रहे मानो इसका उपाय सोशल डिस्टेंस ना होकर वाकई में वही हो जैसा कि 15-16 साल के मुस्लिम युवा टिकटोक पर बताते रहे हैं।
5 – इस्लामिक आतंकियों के कारनामों के सामने आने पर विक्टिम कार्ड ना खेलें
जब भी कोई आतंकी घटना सामने आती है या फिदायीन हमला होता है उसमें आश्चर्यजनक रूप से एक ‘विशेष-स्रोत‘ के लोगों का नाम होता है। उस पर सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह होता है कि सबा नकवी जैसे लोग ही तब यह कहकर नकारते हुए देखे जाते हैं कि नहीं, इस आतंकवाद का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है।
यहाँ तक कि इन खबरों पर बात करने वालों को इस्लामोफोबिया से ग्रसित बता दिया जाता है। जबकि मीडिया सिर्फ इस्लामिक आतंकवादियों या अपराधियों द्वारा किए गए कारनामों का ही जिक्र कर रहे होते हैं। अतः यह भी निवेदन है कि मुस्लिमों को ऐसी मासूम शिकायतें नहीं करनी चाहिए।
6 – नरसंहार करने वालों का महिमामंडन करना बंद करें
यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि भारत देश के इतिहास को मुस्लिम आक्रान्ताओं ने ‘बुत परस्तों’ के रक्त से सींचा है। फिर भी हर उस मुस्लिम आक्रान्ता का महिमामंडन अक्सर किया जाता है जिसने चाहे हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया हो, वह चाहे बलपूर्वक हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने वाला औरंगजेब हो, जहाँगीर हो, खिलजी हो या फिर टीपू सुल्तान हो, मुस्लिम समुदाय ने हर समय इन आक्रान्ताओं को अपना आदर्श बनाकर पेश किया है।
और इन आतताइयों के समर्थन के पीछे कारण सिर्फ उनका मुस्लिम होना रहा है, यानी शुद्ध मजहबी कारण। यदि हो सके तो हिन्दुओं के व्यापक नरसंहार के लिए जिम्मेदार इन मुस्लिम आक्रंताओ का गुणगान भी मुस्लिम समुदाय को बंद करना चाहिए। इसमें किसी भी तरह की गंगा-जमुनी तहजीब नहीं छुपी हुई है।
7 – उम्माह को सामाजिक सौहार्द से ऊपर रखना बंद करना होगा
सोशल मीडिया पर मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने मध्य पूर्व स्थित इस्लामिक देशों में रहने वाले हिंदुओं के खिलाफ एक नियत अभियान चलाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर हिंदुओं द्वारा तबलीगी जमात और इस्लामी आतंकवादियों के खिलाफ की गई टिप्पणियों के स्क्रीनशॉटों को कैप्चर किया और उन्हें नौकरी या उनके संस्थान से निकालने की सिफारिश के साथ स्थानीय अधिकारियों को भेजा।
ध्यान देने की बात यह है कि इस तरह हिन्दुओं को चुनकर निशाना बनाने की हरकतों से भारत में मुसलमानों का भला नहीं होता है और हमारे देश में सांप्रदायिक संबंधों को भी बहुत नुकसान पहुँचता है। अगर मुसलमान ऐसी हरकतों को रोक सकते हैं, तो यह बहुत अच्छा होगा।
8 – मस्जिदें बनाने के लिए तोड़े गए मंदिरों को हिन्दुओं को लौटा दें
यह एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है कि मस्जिदों के निर्माण के लिए इस्लामिक आक्रान्ताओं ने असंख्य हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया था। कई जगहों पर तो मंदिरों के निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री का उपयोग मस्जिद के निर्माण में किया गया था। सदियों के प्रयास और दशकों बाद भारतीय न्यायालयों में समय बिताने के बाद हिंदुओं ने राम जन्मभूमि को पुनः प्राप्त किया है।
इस से सीख लेकर मुसलमानों को काशी-मथुरा सहित शेष मंदिरों को अब हिन्दुओं को वापस सौंप देने के बारे में सोचना चाहिए। यह निश्चित तौर पर सामाजिक सद्भावना का ही एक प्रतीक होगा और यह हिंदू-मुस्लिम संबंधों के मिशाल की तौर पर सदियों तक याद भी रखा जाएगा। शायद इससे ज्यादा कहने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती है।
इसी विषय पर, एक हिन्दू अगर सबा नक़वी के तर्कों के हिसाब से चलेगा तो कैसा लगेगा, यह जानने के लिए ये वीडियो देखें:
देश के 30 फीसदी कोरोना संक्रमण मामले तबलीगी जमात को समर्पित हैं जिसके चलते पूरे देश में डेढ़ हज़ार से ज़्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं। यह एक ऐसी संस्था है जिसके बारे में लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन यह जमात का प्रभाव ही है कि सबसे ज़्यादा कोरोना संक्रमण मामलों का कारण होने के बावजूद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तबलीगी जमात का नाम नहीं लेने का फैसला किया है।
क्यों, आखिर है क्या इस तबलीगी जमात की असलियत? ऐसा क्या प्रभाव है इसका? क्यों तबलीगी जमातियों द्वारा लगातार गैरकानूनी और गलत हरकत करने के बावजूद क्यों इतने सारे लोग इसके बचाव में उतर आए हैं। जब हमने इसके बारे में पड़ताल की, तथ्यों की खोजबीन की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए-
तबलीगी जमात एक इस्लामिक मिशनरी आन्दोलन है जो विश्व भर के लोगों को कट्टर इस्लाम अपनाने को प्रेरित करता है। इसे 20वीं शताब्दी का सबसे प्रभावी धार्मिक आन्दोलन माना जाता है। प्यू रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व के लगभग 200 देशों में इस जमात के सवा करोड़ से लेकर 8 करोड़ तक समर्थक हैं।
इसे 1926 में भारत के मेवात क्षेत्र में मोहम्मद इलियास अल-कंधलावी ने शुरू किया था। दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्थित वो इमारत जहाँ से ढाई हज़ार जमातियों को निकाला गया था, दरअसल तबलीगी जमात का मुख्यालय है।
जमाती छ: सिद्धान्तों पर काम करते हैं – कलीमा, सालाह, इल्मो ज़िक्र, इकारामे मुस्लिम, इकलासे नीयत और दावत-ओ-तब्लीग।
इनमें से छठे सिद्धान्त, दावत-ओ-तब्लीग का अंग्रेजी में मतलब है प्रोसेलिटाइजेशन (proselytization) यानि धर्मान्तरण या धर्म परिवर्तन। जी हाँ, तबलीगी जमात का एक महत्वपूर्ण उसूल है ज़्यादा से ज़्यादा गैर इस्लामिक लोगों को इस्लाम में लाना।
अमेरिका और ब्रिटेन समेत अन्य कई देशों की खुफिया संस्थाएँ और पत्रकारों की जाँच रिपोर्ट्स के अनुसार जमात के लोग बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन में लगे हुए हैं।
जमात के समूह के कई लोगों को आतंकवाद फैलाने के लिए भी सजा मिल चुकी हैं। (9 सितम्बर, 2008 को गार्डियन डॉट कॉम)
अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया संस्थाएँ तबलीगी जमात को ‘कट्टरपंथ का द्वार’ कहती हैं। चूँकि इस संगठन का कोई संविधान या कोई औपचारिक पंजीकरण नहीं है, इसके बारे में लोग ज़्यादा नहीं जानते हैं और इसके सदस्यों और उनकी संख्या के बारे में कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
तबलीगी जमात एक अनौपचारिक संगठनात्मक संरचना का पालन करती है। इसके सदस्य मीडिया से अपनी दूरी बनाए रखते हैं। जमात अपनी गतिविधियों और सदस्यता के बारे में विवरण प्रकाशित करने से बचता है। यही वजह है कि यह लोगों की निगाह में आने से बचा रहता है।
गैर-मुस्लिम क्षेत्रों में तबलीगी जमात आंदोलन की पैठ 1970 के दशक में शुरू हुई और इसी के साथ सऊदी वहाबियों और दक्षिण एशियाई देवबंदियों के बीच संबंधों की की भी शुरूआत हुई। हैरानी की बात यह है कि अन्य सभी तरह के इस्लामिक स्कूलों को खारिज करने वाले बहावी भी तबलीगी जमात की प्रशंसा करते हैं।
हालाँकि तबलीगी जमात की वित्तीय गतिविधियाँ गोपनीय रहती हैं, लेकिन विश्व मुस्लिम लीग जैसे सऊदी संगठनों द्वारा तब्लिगी जमात को लाभ दिए जाने की खबरें हैं। 1978 में विश्व मुस्लिम लीग ने ड्यूसबेरी में तबलीगी मस्जिद के निर्माण पर सब्सिडी दी, जो तब से पूरे यूरोप में तब्लिगी जमात का मुख्यालय बन गया है।
जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के बार्कले केन्द्र द्वारा प्रकाशित एक लेख के अनुसार तबलीगी जमात वैश्विक सुन्नी इस्लामिक मिशनरी संस्था है जिसका उद्देश्य खिलाफत आन्दोलन चलाना है।
जमात ने 1946 में अपनी गतिविधियों का विस्तार करना शुरू किया। दो दशकों के भीतर यह दक्षिण पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका, यूरोप, और उत्तरी अमेरिका तक पहुँच गया।
2007 तक, तबलिगी जमात के सदस्य ब्रिटेन की 1,350 मस्जिदों में से 600 पर काबिज थे।
एक अनुमान के अनुसार अमेरिका में तबलीगी जमात के करीब 50,000 सदस्य सक्रिय हैं।
तबलीगी जमात का अमीर, जमात के परामर्श परिषद शूरा और यहां के बुज़ुर्गों द्वारा ताउम्र के लिए नियुक्त किया जाता है।
खूरौज यानि धर्मान्तरण यात्रा जमात के लोगों के लिए अत्यन्त आवश्यक मानी जाती है। जमाती महीने में 120 दिन यानि तीन महीने बाहरी देशों की यात्रा करके अपने धर्म का प्रचार करते हैं।
इनका प्रचार का तरीका ज़मीनी स्तर पर लोगों को जोड़ने का है। यह बड़े राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों की बजाय गरीब, पिछड़े, भटके लोगों के बीच इस्लाम का प्रचार करते हैं। हालाँकि इनके लोग वैश्विक स्तर की राजनीतिक संस्थाओं में भी हैं।
इनकी ताकत है इनका अराजनैतिक रुख जिसके कारण यह कभी चर्चा औऱ खबरों में नहीं आते।
इसी वजह से यह अयूब खान (1960 के दशक) और इंदिरा गांधी (1975-77) की सरकारों के दौरान बच गए जबकि अन्य सामाजिक राजनीतिक इस्लामी समूहों को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।
इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ इस्लाम एंड क्रिश्चियनिटी के निदेशक डॉ पैट्रिक सुखदेव के अनुसार तबलीघी जमात ब्रिटेन में एक गुप्त समाज के रूप में संचालित होती है। इसकी बैठकें बंद दरवाजों के पीछे आयोजित की जाती हैं। कोई नहीं जानता कि उनमें कौन शामिल होता है, इसमें कितना पैसा है। यह लोग खुद के बारे में कोई बात नहीं करते। यहाँ तक हिसाब खिताब के खाते तक नहीं हैं।
पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के पिता भी एक प्रमुख तबलीगी सदस्य और फाइनेंसर थे। इन्होंने तबलिगी सदस्यों को प्रमुख राजनीतिक पद लेने में मदद की। उदाहरण के लिए 1998 में तबलीगी समर्थक मुहम्मद रफीक तरार पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने और 1990 में तब्लीग से ही जुड़े लेफ्टिनेंट जनरल जावेद नासिर आईएसआई के महानिदेशक बने।
तबलीगी जमात को अलकायदा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे जेहादी संगठनों के लिए उपजाऊ भर्ती जमीन माना जाता है। अमेरिकी अधिकारी एलेक्स एलेक्सीव के अनुसार, लगभग 80% प्रतिशत इस्लामी चरमपंथी तब्लीग से सम्बन्धित रहे हैं।
फ्रांसीसी खुफिया अधिकारी इसे कट्टरपंथ का द्वार (एंटीचैंबर) कहते हैं।
बहुत से पाकिस्तानी क्रिकेटर्स जैसे शाहिद अफरीदी, सईद अनवर, इंजमाम-उल-हक़, मुश्ताक अहमद समेत पाकिस्तानी आईएसआई के पूर्व प्रमुख और पाकिस्तानी आर्मी जनरल मोहम्मद अहमद भी तबलीगी जमात के सदस्य हैं।
वैश्विक आतंकवाद और तबलीगी जमात
9/11 के हमले के बाद तबलीगी जमात अमेरिकन एफबीआई और ब्रिटिश इन्टैलीजेन्स की निगाहों में आया।
तबलीगी सदस्यों पर लगातार आंतकवाद का आरोप लगाया जाता रहा है। पेरिस में अमेरिकी दूतावास उड़ाने की साजिश रचने वाला अल कायदा का सदस्य हो या स्पेन में जनवरी 2008 में बमबारी की साजिश में हो, नागरिकों पर हमले हों या 7/7 लंदन बम विस्फोट का मामला हो या फिर ग्लासगो हवाई अड्डे पर हमले की साजिश हो, इनसे जुड़े आतंकवादियों के तार कहीं ना कहीं अप्रत्यक्ष रूप से तबलीगी जमात से जुड़ते रहे हैं।
स्पेन की पुलिस ने 19 जनवरी 2005 को बार्सिलोना में अपार्टमेंट इमारतों, एक मस्जिद और एक प्रार्थना हॉल पर छापों के दौरान बम बनाने की सामग्री जब्त की और 14 लोगों को गिरफ्तार किया था जो शहर में बमबारी करने की योजना बना रहे थे। यह सभी तबलीगी जमात से जुड़े थे।
भारत का कफील अहमद जो कि ग्लासगो एयरपोर्ट पर असफल अटैक के लिए गिरफ्तार किया गया था, वो भी तबलीगी जमात से जुड़ा था।
7/7 के लंदन बॉम्बर्स में से दो शहजाद तन्वीर और मोहम्मद सिद्दीक खान भी ड्यूसबरी स्थित तबलीगी मस्जिद में जाते थे।
साल 2012 में प्रकाशित इस्लाम ऑन दी मूव- नाम की किताब में मलेशिया के पॉलिटिकल साइन्टिस्ट फारिश नूर ने दावा किया है कि लश्कर-ए-तयैबा के एक सदस्य हमीर मोहम्मद ने तबलीगी सदस्य के तौर पर पाकिस्तान का वीज़ा लेने की कोशिश की थी। इसी तरह सोमालिया के मोहम्मद सुलेमान ने भी इसी तरह पाकिस्तान में प्रवेश लेने की कोशिश की थी।
अबू ज़ुबैर अल हैली, जो कि बोस्निया हर्जेगोविना में अल कायदा की मुज़ाहिदीन बटालियन का कमान्डर था, भी एक तबलीगी के रूप में पाकिस्तान आया था। जबकि सऊदी निवासी अब्दुल बुखारी जो कि जिसकी बहुत सारे देशों को तलाश थी, भी खुद को तबलीगी बताते हुए दिल्ली के निज़ामुद्दीन के तबलीगी मरकज़ में शामिल हो गया था। (मिन्ट रिपोर्ट- 2013)
पूर्वी लंदन की अधिकतर मस्जिदें तबलीगी जमात के नियंत्रण में हैं। टाइम्स के क्राइम और सिक्योरिटी एडीटर शॉन ओ नील इसे अतिरूढ़िवादी लोगों की जमात कहते हैं। 1989 में लंदन में तबलीगी जमात की क्वीन्स रोड स्थित एक मस्जिद का संचालन उग्रवादी समूह- अल मुहाजिरों के लीडर, उमर बखरी मोहम्मद के हाथ में था जिस पर बाद में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। (द गार्डियन रिपोर्ट- 9 सितम्बर, 2008)
वैश्विक उग्रवाद और जिहादवाद में तबलीगी जमात की भूमिका
तब्लीग को चरमपंथी प्रचारक संस्था मानते हुए उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है।
अमेरिकी विदेश नीति परिषद की रिपोर्ट के अनुसार यह जिहादी समूहों का एक निष्क्रिय समर्थक है। इनकी पूरे संसार की इस्लामीकरण करने के प्रति अटूट प्रतिबद्धता है। इनका लक्ष्य योजनाबद्ध तरीके से दुनिया पर विजय प्राप्त करना है।
फ्रेन्च अधिकारी भी यह दावा कर चुके हैं कि लगभग 80 फीसदी रेडिकल इस्लामिस्ट्स जिनसे वो मिले कहीं ना कहीं, तबलीगी जमात से जुड़े हुए थे।
तबलिगी जमात इस्लामी चरमपंथ की प्रेरक ताकत है और दुनिया भर में आतंकवादी कारणों के लिए एक प्रमुख भर्ती एजेंसी है। अधिकांश युवा चरमपंथियों के लिए, तबलीगी जमात में शामिल होना उग्रवाद की राह पर पहला कदम है ।
यही नहीं शिया विरोधी सांप्रदायिक समूहों, कश्मीरी उग्रवादियों और तालिबान से बने कट्टरपंथी देवबंदी गठजोड़ के बीच भी अप्रत्यक्ष संबंध पाए गए हैं।
उपरोक्त सभी जानकारियाँ विश्वसनीय वेबसाइट्स की न्यूज़ रिपोर्ट्स आर्काइवस से ली गई हैं। संबन्धित लिंक-
प्रधानमन्त्री मोदी जी ने अपने संबोधन में कहा था- ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ अर्थात् इस राष्ट्र यानी देश के हित में हम सब आलस्य और प्रमाद को छोड़कर सजग बनें। ‘वयं’ शब्द संस्कृत व्याकरण के हिसाब से उत्तम पुरुष के बहुवचन का प्रयोग है, जिसका मतलब होता है ‘हम सब’। वक्ता का अभिप्राय जिस इकाई से है उसके अन्दर आने वाले सभी लोग उस ‘हम सब’ का हिस्सा हैं।
यहाँ ‘वयं’ शब्द की परिधि राष्ट्र से तय होती है, जिसका मतलब हुआ इस देश के अंतर्गत आने वाले सभी लोग- शासक, प्रशासक, नागरिक, सुरक्षाकर्मी, चिकित्सक, रोगी, सफाईकर्मी, सभी व्यवसाय, सभी सम्प्रदाय, भारत संघ के सभी राज्य या आप कह सकते हैं कि जिस प्रसंग में इस वैदिक सूक्ति का प्रयोग किया गया है उससे सम्बंधित हर वो पुर्जा जिसे इस संकट में जागरूक और सावधान रहना है वो ‘वयं’ शब्द का अर्थ है। कुल मिलाकर वयं = We the People of India।
इन सब पुर्जों में से अधिकांश ठीक काम कर रहे हैं। लेकिन एक-दो पुर्जों में काफी समस्या है। उन्होंने इस ‘वयं’ में भी एक और ‘वयं’ का वहम पैदा कर लिया है। इससे पूरे राष्ट्र के एक इकाई के रूप में किए जा रहे प्रयासों पर पानी फिर जाता है। बांद्रा जैसी संकुल जगह पर हजारों लोग इकट्ठे होकर जब राष्ट्र के प्रयासों को गरियाते हैं तो इसे शायद ‘जा गरियाम’ तो कह सकते हैं, मगर ‘जागृयाम’ नहीं। जागृयाम का अर्थ है जागरूक होना।
मुरादाबाद की शर्मनाक घटना इंसानियत के दायरे से बिल्कुल बाहर की चीज़ है और उससे भी अधिक शर्मनाक है ऐसी चीजों पर की जाने वाली राजनीति। ऐसी घटनाएं देश में कई स्थानों पर घट चुकी हैं, जिसकी वजह से अनेक जीवन खतरे में हैं। जीवन शब्द संस्कृत की मूल धातु ‘जीव प्राणने’ से बनता है, इस तरह जीवन का अर्थ हुआ श्वास लेना।
कोरोना व्यक्ति की श्वास को बंद कर देता है, जिसका मतलब है रोगी का जीवन ख़त्म हो जाना। डॉक्टर्स का धर्म यही है कि वो हमारी यानी इंसान की श्वास को ठीक से चलने दें। जब वो अपने इस मानव धर्म का पालन करने आते हैं तो कुछ दानवधर्मा जिनका वास्तविक धर्म जियो और जीने दो की बजाय मरो और मारो है, उन पर पत्थर फेंकने लगते हैं।
हममें से कुछ को ताज्जुब होता है कि इतने पत्थर आते कहां से हैं? दरअसल उनका भण्डारण ऐसी जगह पर किया गया है कि वहां से जितने और जब चाहे पत्थर पैदा कर लो। ये उनके दिमागों में भरे हुए हैं।
बहुत-से लोगों को लगता है कि ये बच्चों की नादानी है, कुछ भटके हुए बच्चे हैं, चलो मान लेते हैं कि ऐसा ही है। लेकिन अगर आपके बच्चे की नादानी नागवार गुजरे तो क्या आप उसे रोकेंगे नहीं? जिन्हें सचमुच ये लगता है कि ये उनके बच्चे हैं उन्हें उनके प्रति अपना अभिभावकत्व तो निभाना ही चाहिए। जो अभिभावक अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से नहीं रोकते उनको अक्सर दूसरों की गालियाँ सुननी पड़ती हैं।
ये दुनिया का रिवाज़ है। जिनके बच्चे उनके वश में नहीं होते उनका किसी को तो इलाज करना ही पडेगा। ऐसे में जब कानून अपना काम करता है या लोग उनकी आलोचना करते हैं तो आपको विरोध का कोई अधिकार नहीं है।
एक और बात, अगर आप कहीं सर्कस देखने जाएँ जहां आप आराम से बैठकर करतबों का मज़ा ले रहे हों वहां अचानक जोकर्स आकर आप पर पत्थर फेंकने लगें, आपकी आँख-नाक से खून बहाने लगे तो आपको कैसा लगेगा? क्या आप उन्हें ये सोचकर माफ़ कर देंगे कि चलो ये तो जोकर हैं, इनका क्या बुरा मानना? हरगिज़ नहीं। अत: हे सलमान भ्रात:! आप इन्हें जोकर कहकर जोकर्स का अपमान न करें। जोकर का काम है लोगों को हँसाना और खुश करना, उन्हें जख्मी करना या जान से मारना नहीं।
अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से राष्ट्रीय हितों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया था, किन्तु कुछ लोगों की एक और समस्या है। वो राष्ट्र और राष्ट्रवाद शब्द से ही नफ़रत करते हैं। उनकी दृष्टि में राष्ट्रवाद एक विभाजनकारी वस्तु है, जबकि वास्तविकता ये है कि राष्ट्र शब्द चाहे देश का द्योतक हो या राज्यसत्ता का दोनों ही अर्थों में जाति-वर्ग से परे सभी नागरिकों का समावेशी है।
राष्ट्रवाद जिस राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का आग्रही है वो जब सबके लिए और सबके द्वारा है तो फिर विभाजन कैसा? राष्ट्र मतलब एक संप्रभु राज्य। असली समस्या अक्सर चीजों के राजनैतिक दुरूपयोग से पैदा होती है। राजनीतिकरण की स्थिति में राष्ट्रवाद तो छोडिए धर्मनिरपेक्षता जैसी निरापद और संवैधानिक चीज़ भी संकुचित हो जाती है। स्वार्थी मंशा और महत्वाकांक्षा को बाहर निकाल दें तो राष्ट्रवाद एक उत्तम अस्तित्व बोधक चीज़ है।
राष्ट्र शब्द का एक और अर्थ है- कोई राष्ट्रीय या सार्वजनिक संकट। तब ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ का एक और अर्थ होगा- राष्ट्रीय संकट की इस वेला में हम सब जागरूक बनें। कोरोना के इस संकट में सबसे बड़ी जागरूकता यही है कि सामाजिक दूरी बनाए रखें। कुछ राष्ट्र विरोधी और मानवता विरोधी तत्वों के बहकावे में आकर बड़ी संख्या में एकत्रित होने का पागलपन न करें। Isane और इंसान के बीच के फर्क को समझें।
आपने अक्सर कुछ लोगों को चिड़चिड़ा कर कहते सुना होगा कि ये मच्छर हमेशा कान पर आकर ही क्यों बोलते हैं। बोलते तो हर जगह हैं लेकिन सुनाई सिर्फ कानों को देता है। और जब कान को सुनाई दे जाता है तो कान अपने आप को मच्छर से बचा भी लेता है। पाँव को सुनाई नहीं देता तो वो कोई बचाव भी नहीं करता और मच्छर उसे काट लेता है। बस ऐसा ही कोरोना के बारे में है, जो इसके खतरे पर गौर करेंगे वो बच जाएंगे, जो इसकी गंभीरता को नहीं समझेंगे वो बचाव नहीं करेंगे और कोरोना उन्हें काट लेगा।
कोरोना काल में हमारी लापरवाहियाँ राष्ट्र के उन जागरूक सिपाहियों की जिम्मेदारियों को कितना बढ़ा देती हैं जो अपने परिवार और घर से दूर रहकर अस्पतालों में कोरोना का और सड़कों पर हमारी लापरवाहियों और बीमार मानसिकताओं का इलाज कर रहे हैं। गाँवों में एक कहावत है- ‘अंधे की मक्खी राम उड़ावै’।
बस ये वही राम हैं जो कहीं डॉक्टर्स के रूप में तो कहीं सुरक्षाकर्मियों के रूप में खुली आँख वाले अंधों की मक्खियाँ उड़ाने में दिन-रात लगे हुए हैं। ये वास्तव में ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ की भावना के सच्चे निदर्शन हैं। इसलिए जब वो आपकी मक्खियाँ उडाएं तो उनके साथ बुरा बर्ताव न करें, उन पर पत्थर न फेंकें बल्कि धन्यवाद करें अन्यथा जो शास्त्र जागरूक बनाने की सलाह देते हैं या जो संविधान कर्तव्यों की प्रेरणा देता है वही उसके उल्लंघन पर कुछ दूसरे उपचार भी सुझाता है।
कहीं ऐसा न हो कि राष्ट्र के नाम अगले संबोधन में मोदी जी किसी ऐसी सूक्ति का पाठ कर दें- ‘दण्ड: शास्ति प्रजा: सर्वा:’ अर्थात् दंड सारी प्रजा को अनुशासित रखता है। इस ‘सर्वा:’ में उन सबका भी ग्रहण हो जाता है जिन्होंने खुद को खुदा समझकर ‘वयं’ से बाहर मान रखा था। अंधे की मक्खी राम उडावै ये तो ठीक है लेकिन जो अंधे होने का नाटक कर रहे हैं उनकी मक्खियाँ तो डंडे से ही उडानी होंगी।
अंतत: यही आशा और ईश्वर से प्रार्थना कि राष्ट्रीय एकता के संकल्पों का नाभिकीय संलयन देश में जागरूकता की अपार ऊर्जा पैदा करे।
देशव्यापी बन्द के बीच कर्नाटक सरकार ने रमजान के दौरान मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली 5 बार की सामूहिक नमाज पर रोक लगा दी है। नमाज प्रतिबंध पर राज्य अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, वक्फ और हज विभाग ने कहा है कि नमाज अदा करने के लिए मस्जिदों के कर्मचारियों द्वारा किसी भी सार्वजनिक स्थान का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल, देशव्यापी बन्द के बीच ही 23 अप्रैल-23 मई तक रमजान (Ramadan) आने वाला है। इसी वजह से कर्नाटक सरकार ने यह बड़ा फैसला लिया है। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा रमजान के दौरान दावत-ए-सहरी और इफ्तार पार्टी पर भी पूरी तरह से सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। इसके अलावा अजान भी कम आवाज में होगी और लाउडस्पीकर पर भी रोक लगाई गई है।
हाल ही में केंद्र सरकार ने भी 24 अप्रैल से शुरू हो रहे रमजान के महीने के लिए लोगों से अपील की है कि लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों एवं सोशल डिस्टेंन्सिंग का पूरी ईमानदारी से पालन करें। साथ ही इस दौरान अपने-अपने घरों पर ही नमाज पढ़ें और नमाज प्रतिबंध आदि का पालन करें।
No arrangements of Dawat-e-Sahri or Iftar shall be organized during #Ramzan, in view of #COVID19 pandemic: Karnataka Minority Welfare, Waqf & Hajj Department https://t.co/PIXS7y9yOP
कर्नाटक सरकार की यह रोक मस्जिद के अलावा दरगाह और इमामबाड़ों में सामूहिक आयोजनों पर भी लागू है। आदेश में कहा गया है कि धीमी आवाज में अजान दी जा सकेगी। मस्जिद परिसर में मोहल्लों में वितरण के लिए किसी खाद्य सामग्री को तैयार नहीं किया जाएगा। इसके अलावा मस्जिद और दरगाह के आसपास कोई खाने की दुकान लगाने की भी इजाजत नहीं होगी। ऐसा न करने पर या सरकारी आदेश का उल्लंघन करने वाले के खिलाफ वक्फ ऐक्ट 1995 के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पिछले 12 घंटे के अंदर 34 नए केस आए हैं। अब तक प्रदेश में 313 लोगों के अंदर संक्रमण की पुष्टि हुई है। इसमें से 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 82 लोग डिस्चार्ज हो चुके हैं।
यह भी देखा गया है कि देशभर में लोगों ने सामूहिक नमाज पढ़ने के लिए कई बार लॉकडाउन के नियमों का उलंघन किया है। जिस कारण आने वाला रमजान का महीना चिंता का विषय बन गया है।
देश में मजहबी उन्माद फैलाने वाले कट्टरपंथियों और तथाकथित सेकुलरों के कारण बॉलीवुड अदाकारा कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल का ट्विटर अकॉउंट सस्पेंड कर दिया गया है। रंगोली की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि उन्होंने कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच डॉक्टरों, नर्सों और पुलिसकर्मियों पर हमला करने वाले कट्टरपंथियों पर अपना आक्रोश व्यक्त किया था।
मुरादाबाद में हुई घटना के बाद कंगना के बहिन रंगोली ने ट्वीट किया, “एक जमाती की कोरोना से मौत हो गई, जब पुलिस और डॉक्टर उसके परिवार को चेक करने गए तो उन्होंने उनपर (पुलिस और डॉक्टर) हमला किया और उन्हें मारा। धर्मनिरपेक्ष मीडिया और इन मुल्लाओं को एक पंक्ति में खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए। इतिहास में वे हमें नाजी कह सकते हैं, किसे चिंता है, जिदंगी फेक इमेज से ज्यादा जरूरी है।”
गौरतलब है कि बीतें दिनों ऐसी कई घटनाएँ हुई जब स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों पर एक खास समुदाय की भीड़ ने मौक़ा मिलते ही हमला किया। इन घटनाओं को देख ऐसा आक्रोश किसी के लिए भी आम बात है। लेकिन सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ लोगों को ये प्रतिक्रिया पसंद नहीं आई। उन्होंने रंगोली के ऊपर नफ़रत और हिंसा को उकसाने का आरोप लगा दिया और इस ट्वीट की शिकायत करते हुए पुलिस को टैग कर दिया। इस बीच रंगोली के ख़िलाफ़ सख्त कार्यवाही की माँग हुई और थोड़ी देर में ट्विटर ने भी उनके अकाउंट को सस्पेंड कर दिया।
अब हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कंगना की बहिन रंगोली ने किस घटना को लेकर यह ट्वीट किया था। लेकिन बीते दिनों की घटनाओं को देखें तो अभी कल ही मुरादाबाद में कोरोना की जाँच करने गए सुरक्षाकर्मियों पर एक मुस्लिम भीड़ ने लाठी-डंडे से हमला कर पथराव किया था। स्थिति ऐसी हो गई थी कि जब पुलिस उन्हें बचाने गई, तो उन पर भी बेरहमी से हमला किया गया। बाद में इस मामले में कार्यवाही करते हुए बुधवार को 13 महिलाओं सहित 25 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया।
बता दें पिछले महीने दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज़ में हजारों जमातियों ने मजहबी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। मरकज़ अब कोरोना वायरस का हॉटस्पॉट बन चुका है। आए दिन मरकज़ में मौजूद रहे लोगों की संक्रमित होने की खबर सामने आ रही है। नर्सों के साथ अश्लील हरकतें करने, डॉक्टरो और पुलिसकर्मियों पर थूकने सहित कई शिकायतें संक्रमित जमातियों के खिलाफ आए हैं। क्वारंटाइन सेंटर में शौच करने पर भी इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। जो लोग इनकी करतूतों का समर्थन करते हैं, उन्हें ट्विटर अपने प्लेटफॉर्म पर बने रहने की आजादी देता है। रंगोली जैसे लोग जो इनके ख़िलाफ़ आवाज उठाते हैं उन्हें चुप कराने के लिए अकाउंट सस्पेंड कर दिया जाता है।
तबलीगी जमात की मेहरबानी से देशवासी अब तीन मई तक अपने घरों में बंद रहने के लिए मजबूर हैं लेकिन औपनिवेशिक दासता का अवशिष्ट BBC और एक ‘स्रोत-विशेष’ यही मानकर चल रहे हैं कि वो कोरोना वायरस के प्रभाव से अक्षुण हैं और रहेंगे। शायद यही वजह है कि वास्तविकता से मुँह मोड़कर प्रोपेगैंडा वायरस और कोरोना वायरस के ये दोनों प्रमुख स्रोत तत्परता से अपने दैनिक क्रियाकलाप में लगे हुए हैं।
बीबीसी की एक रिपोर्ट का शीर्षक है- “मैं ब्राह्मण आदमी हूँ, मेरा तबलीगी जमात के लोगों से क्या लेना-देना?”
इस ‘लेख’ में बीबीसी ने यह साबित करने का कुटिल प्रयास किया है कि तबलीगी जमात ही कोरोना वायरस का स्रोत नहीं है और बेहद धूर्तता से एक लाइन को इस लेख के बीच में डालकर यह भी लिखा है कि “हालाँकि, वह (जिस ‘ब्राह्मण’ का हेडलाइन में जिक्र किया गया है) निजामुद्द्दीन रेलवे स्टेशन से जरूर गुजरा था।
ऐसे लेख लिखकर बीबीसी तबलीगी जमात को क्लीन चिट देने का एक निरर्थक प्रयास तो करता ही है, साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि वह ब्राह्मणवाद और हिन्दुफोबिया से सर से पैरों तक ग्रसित है। बीबीसी जैसे घातक मीडिया गिरोहों का मूल उद्देश्य पत्रकारिता करना या फिर सत्य को उजागर करना नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ उलजुलूल आँकड़ों की बात करते हुए पाठक को गुमराह करना होता है।
बीबीसी की इस रिपोर्ट की शुरुआत होती है अदालत के आदेश से जिसमें निज़ामुद्दीन के तबलीगी जमात मरकज़ से छत्तीसगढ़ लौटे 159 लोगों की सूची के आधार पर अदालत ने 52 लोगों का पता लगाने का आदेश जारी किया है। बीबीसी का कहना है कि उसने अपने ‘सूत्रों’ के माध्यम से पता किया है कि उसमें से 108 ग़ैर-मुस्लिम हैं। यहीं पर बीबीसी के लिए अपनी रिपोर्ट में ब्राह्मण के नाम पर खेलना प्राथमिकता हो गया था।
बीबीसी की इस रिपोर्ट के एक हिस्से में लिखा है-
“इस सूची में शामिल बिलासपुर के रहने वाले श्रीकुमार पांडे (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी से कहा, ‘मैं ब्राह्रण आदमी हूँ। मेरा भला तबलीगी जमात के लोगों से क्या लेना-देना? मैं मार्च में दिल्ली ज़रुर गया था लेकिन तबलीगी जमात के मरकज़ में तो जाने का सवाल ही नहीं पैदा होगा। हाँ, मैंने बिलासपुर के लिये जो ट्रेन ली, वो ज़रुर निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन से पकड़ी थी। दिल्ली से लौटने के बाद से ही पुलिस और स्वास्थ्य विभाग वालों ने जाँच पड़ताल करने के बाद मुझे घर में ही रहने की हिदायत दी है।”
जरा सा ध्यान देने पर ही स्पष्ट हो जाता है कि इसी एक बयान में बीबीसी पहले स्वयं अपनी इस रिपोर्ट के शीर्षक के अनुसार चलते हुए देखा जाता है और बाद में स्वयं ही अपने शीर्षक के विरोध में खड़ा नजर आता है। क्या बीबीसी इतना मासूम है कि वह कोरोना वायरस के संक्रमण के माध्यम से अभी तक अनजान है? क्योंकि यदि ऐसा न होता तो बीबीसी की इस रिपोर्ट का औचित्य ही समाप्त हो जाता है।
यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि तबलीगी जमात भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी COVID-19 वायरस के कुल संक्रमण का कम से कम साठ प्रतिशत हिस्से में अकेले भागीदारी करते हुए सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा है।
यह बात अवश्य है कि यदि हम अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लें सिर्फ तभी हमें यह आँकड़े गलत नजर आ सकते हैं और बीबीसी की तरह अपने प्रोपेगैंडा पर अडिग रह सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन आँकड़ों को इस्लामोफोबिक बताने वाले बीबीसी जैसे प्रोपेगैंडा के स्रोत ने तबलीगी जमात की भरपाई करने के लिए किसी ‘ब्राह्मण’ का बयान शीर्षक बनाने का फैसल लिया है।
बीबीसी को वास्तविक निराशा उन लोगों से हाथ लग रही है, जिनके बचाव में वह दिन-रात जुटा हुआ है। हर दिन कम से कम पाँच ख़बरें ऐसी हैं, जिनमें तबलीगी जमात या फिर ‘विशेष-स्रोत’ के लोग इस संक्रमण को बढ़ाने के प्रयास से लेकर सामाजिक अस्थिरता में हिस्सा लेते हुए देखे गए हैं। कल उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में डॉक्टर की टीम पर हुआ हमला इसी का एक छोटा सा उदाहरण है।
मीडिया के गिरोह विशेष से लेकर समाज के समुदाय विशेष की एकजुटता देखिए कि इमाम को क्वारंटाइन करने गए दल पर सिर्फ मुस्लिम पुरुषों ने ही नहीं बल्कि महिलाओं ने भी अपनी तरफ से जमकर भागीदारी करते हुए छतों से पत्थर और ईंटें बरसाईं।
कहीं पर कॉन्स्टेबल इमरान और मोहम्मद पंकज खान पुलिस की गाड़ी से तबलीगी जमातियों को सरहद पार कराते हुए पकड़े जाते हैं तो यहाँ मीडिया में बीबीसी जैसी टुकड़ियाँ उन्हें क्लीन-चिट देते हुए नजर आते हैं।
दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज से निकले हुए तबलीगी जमात के लोगों ने देश-विदेश में अपनी ‘गहरी छाप’ छोड़ी है। मुस्लिम ही लोगों पर थूक रहे हैं, जाँच करने गए स्वास्थ्यकर्मियों पर पत्थर बरसा रहे हैं, ‘अल्लाह-हो-अकबर‘ कहकर पुलिस के सामने खड़े होकर उन्हें चुनौती देते नजर आ रहे हैं। ऐसे में बीबीसी अपनी एक ऐसी रिपोर्ट लेकर सामने आता है, जिसमें उनका कोई ‘गुप्त सूत्र’ कहता है कि वह तबलीगी जमात के मरकज से नहीं लौटा लेकिन फिर भी वह कोरोना वायरस से संक्रमित हुआ।
पहला सवाल बीबीसी को स्वयं से यह पूछना चाहिए कि इस मरकज से निकले हुए लोग आखिर किन-किन जगहों पर नहीं गए होंगे? वह हर रेलवे स्टेशन, मेट्रो, सब्जी-मंडी, बाजार गए होंगे जहाँ वह कितने ही ऐसे लोगों के संपर्क में जाने-अनजाने आए होंगे जिन्हें उन्होंने यह संक्रमण दिया होगा। ऐसे में यदि बीबीसी का कोई गुप्त सूत्र नाम न बताने की शर्त पर यह कहता भी है कि उसका तबलीगी जमात से क्या लेना-देना! तो फिर बीबीसी को किसी विधि से यह भी साबित करने में सक्षम होना चाहिए कि उस ‘गुप्त सूत्र’ को यह वायरस किसी मुस्लिम ने नहीं दिया होगा
और फिर इन्हें शंका की दृष्टि से क्यों न देखा जाए जब इनके मौलवी से लेकर टिकटोक पर हिन्दुओं के खिलाफ वीडियो बना रहे मुस्लिम युवा कोरना को अल्लाह का अजाब बताता है? बीबीसी इस तरह से 15-20 साल के उन टिकटोक जिहादियों से भिन्न नहीं है, जो समाज को यह संदेश देते नजर आए कि कोरोना वायरस नमाजियों को नहीं हो सकता या फिर यह काफिरों के लिए अल्लाह की NRC है।
ब्राह्मण और और हिन्दू धर्म के प्रति घृणा से सनी हुई बीबीसी की यह रिपोर्ट कहीं भी यह साबित करती है कि उसका पहला लक्ष्य कोरोना वायरस नहीं बल्कि हिन्दू धर्म हैं, क्योंकि अगर ऐसा नहीं है तो फिर हर ऐसे मौके पर, जब सारा देश एकजुट नजर आता है, बीबीसी उस समस्या को ‘ब्राह्मणवाद, जाति-धर्म’ के आधार पर वर्गीकृत करता हुआ ही नजर आता है और ऐसे में जब समस्या की यह गेंद उन्हीं की दुलारी कौम में गिरती नजर आने लगती है, तब औपनिवेशिक दासता की प्रतीक यह बीबीसी नामक विष्ठा एक बार फिर उसकी भरपाई के लिए मूल विषय त्यागकर ‘ब्राह्मण-हिन्दुओं’ को कोसने लगती है।
बीबीसी पर नियमित रूप से छपने वाले शीर्षक और कार्टून्स निश्चित तौर पर हिंदुत्व-विरोधी या फिर केंद्र की दक्षिणपंथी सरकार-विरोधी होते हैं। यह बात अलग है कि वामपंथी मीडिया के कार्टून्स और शीर्षक वास्तविक तथ्यों के साथ अक्सर ही न्याय नहीं कर पाते हैं, यह उनकी प्राथमिकता में शायद ही होता है। पहला उद्देश्य होता है विरोध और आपत्ति दर्ज करना।
फिलहाल तो बीबीसी को यही करना चाहिए कि पहले जहाँ यह महज अपने आकाओं के खाने और सोने या विदेश प्रवास की खबर देकर ही अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखता था, उसे ऐसी ही किसी जानकारी में व्यस्त रहना चाहिए और अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर कम से कम भारत में होने वाले घटनाक्रमों पर ज्ञान बाँटना बंद कर देना चाहिए क्योंकि यदि बीबीसी भारत में अपनी गतिविधियों पर लगाम लगता है तो यह भी भारत देश की व्यवस्था में उनका एक योगदान ही माना जाएगा। दूसरी बात यह कि भारत को अपनी समस्या के समाधान या उनकी मान्यता के लिए बीबीसी जैसे विदेशी प्रपंची समूहों की भी आवश्यकता भी नहीं है।
यदि वह अपने गुप्त सूत्रों के हवाले से तैयार की गई ऐसी रिपोर्ट लोगों के सामने रखना बंद कर दे तो देशवासियों को शायद ही कोई फर्क पड़ेगा हालाँकि, बीबीसी के अपने राजस्व को लेकर जरुर अन्य आयाम तलाशने होंगे।