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‘आवश्यक वस्तु’ के नाम पर बेची जा रही थी मीट: 6 क्विंटल मीट के साथ सईद बसीर दामाद सहित गिरफ़्तार, 8 महिलाएँ भी शिकंजे में

देश में जारी लॉकडाउन के बीच पुलिस-प्रशासन की लाख कोशिशों के बाद भी समुदाय विशेष के लोग अपनी गंदी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इस बार लखनऊ पुलिस ने सात ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया है, जो पिछले कई दिनों से आवश्यक वस्तु आपूर्ति का पोस्टर लगाकर दुकानों पर मीट सप्लाई कर रहे है। दूसरी ओर लखनऊ पुलिस ने आठ ऐसी महिलाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जो एक मिनी बस में बैठकर मीट फैक्ट्री में काम करने के लिए जा रही थीं।

अमर उजाला की खबर के मुताबिक डीसीपी उत्तरी सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी ने बताया कि इंदिरानगर थाने की टीम सोमवार सुबह छह बजे खुर्रमनगर चौराहे पर गश्त कर रही थी। इस बीच निकले लोडर को पुलिस ने जाँच के लिए रोका। जाँच के बाद पता चला कि लोडर के अंदर मुर्गे का मीट लदा हुआ था। इसके बाद तत्काल पुलिस ने चालक मोहम्मद अकील और परिचालक मोहम्मद अस्जद गाजी को पकड़ पूछताछ शुरू कर दी।

पूछताछ के बाद पुलिस ने बीपीएफ ट्रेडर्स खुर्रमनगर में छापा मारा। पुलिस को यहाँ से भी एक लोडर में मुर्गे का मीट बरामद हुआ। कुल मिलाकर पुलिस ने 6 क्विंटल मीट को बरामद किया। साथ ही तत्काल बीपीएफ ट्रेडर्स के मुख्यालय को सील कर दिया गया, जबकि ट्रेडर्स के मालिक सईद बसीर, उसके दामाद कानपुर के विधनू निवासी सैय्यद कफील अहमद, सुपरवाइजर निमहालुद्दीन उर्फ निहाल, मो. शाहिद और बूचड़ इरशाद रजा को गिरफ्तार कर लिया।

इसके बाद पुलिस ने सभी सातों आरोपितों को जेल भेज दिया। प्रभारी निरीक्षक इंदिरानगर धनंजय पांडेय के मुताबिक मीट की निर्बाध आपूर्ति के लिए कारोबारी सईद बसीर ने फर्जी पास का इंतजाम कर लिया था, जो कि लॉकडाउन के बाद से ही मीट की फर्जी तरीके से आपूर्ति कर रहा था।

वहीं बाराबंकी की एक मीट फैक्ट्री में काम करने जा रही समुदाय विशेष की आठ महिलाओं को लखनऊ पुलिस ने दबोच लिया। इंस्पेक्टर मडियांव विपिन कुमार सिंह के मुताबिक रविवार देर रात पुलिस की एक टीम दरोगा बृजेश कुमार के साथ रोड़ पर गश्त कर रही थी। इस दौरान पुलिस टीम ने एक मिनी बस में समुदाय विशेष की महिलाओं को चढ़ते हुए देखा।

इसके बाद पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि ये सभी महिलाएँ बाराबंकी की एक मीट फैक्ट्री में काम करने के लिए जा रही थीं। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बस चालक और मीट फैक्ट्री के मैनेजर सहित खदरा निवासी आफरीन, नौबस्ता मडियांव निवासी आयशा, हिना, फातिमा, मेसरजहाँ, अजीजनगर निवासी अमीना, डालीगंज निवासी रूही और प्रीति नदर मडियांव निवासी अमीना के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

मेरठ में पुलिस पर पथराव करने वाला निकला कोरोना पॉजीटिव, संपर्क में आने वाले 5 पुलिसकर्मियों को किया गया क्वारंंटाइन

उत्तर प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली जा रही है। उधर मेरठ में पुलिस पर पथराव करने वाले एक युवक को कोरोना पॉजीटिव पाया गया है। इसके बाद मेरठ जिला प्रशासन ने जली कोठी इलाके को हॉटस्पॉट घोषित करके पूरी तरह से सील कर दिया है। वहीं आरोपित के संपर्क में आने वाले पाँच पुलिसकर्मियों को भी क्वारंटाइन कराया गया है। साथ ही जिले के दो थानों को भी जिला प्रशासन ने सेनेटाइज कराया है।

जानकारी के मुताबिक मेरठ में शनिवार को पुलिस प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीम शहर के जली कोठी को सील कराने के लिए पहुँची थी। इस बीच लोगों ने इसका विरोध करते हुए पुलिस पर पथराव करना शुरू का दिया था। इस दौरान हुए पथराव में सिटी मजिस्ट्रेट और एक दरोगा घायल हो गए थे। इस मामले में पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए मस्जिद के मुतवल्ली समेत आठ लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी।

इसके बाद पुलिस ने सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। साथ ही इनके सैंपल जाँच के लिए भेज दिए थे। मंगलवार को आई जाँच रिपोर्ट में सामने आया कि इनमें से ही एक शख्स कोरोना पॉजिटिव मिला है। इसकी जानकारी मिलते ही पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया। मेरठ पुलिस के एडीजी प्रशांत कुमार के मुताबिक आरोपित के संपर्क में आने वाले पाँच पुलिस कर्मियों को तत्काल क्वारंटाईन करा दिया गया है।

इसके बाद पुलिस ने थाना देहली गेट और सदर बाजार के जिस हवालात में इन आरोपितों को बंद किया था, उन्हें पूरी तरह से सैनेटाइज कराया गया है। इसके बाद लगातार स्वास्थ्य विभाग की टीम पीड़ित के संपर्क में आने वाले लोगों की तलाश में जुट गई है। इसी के साथ मेरठ जिले में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 58 हो गई है। साथ ही अब इस मामले के आने के बाद मेरठ में हॉटस्पॉट की संख्या बढ़कर 18 हो गई है।

आपको बता दें कि दिल्ली मरकज से निकले जमातियों को खोजने के लिए लगातार उत्तर प्रदेश की मस्जिदों में छापेमारी की जा रही है। साथ ही योगी सरकार जमातियों से अपील कर रही है कि वह सामने आकर अपनी जाँच कराएँ।

मस्जिद के सामने जुटी भीड़, गूँजा अल्लाह का नाम, अलग-अलग बातें बोल रहे ‘बेस्ट CM’ और बेटे: PK का दिल्ली मॉडल?

महाराष्ट्र के मुंबई स्थित बांद्रा में मंगलवार (अप्रैल 24, 2020) को अचानक से प्रवासी मजदूरों की भारी भीड़ जुट गई। वो सभी वापस अपने घर जाने की बात कर रहे थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही कई राज्यों से बात कर के कहा था कि वो इन राज्यों के मजदूरों का ख्याल रखें, जिसके बाद उन्हें आश्वासन भी मिला था। अब अचानक से मजदूरों का यूँ इकठ्ठा हो जाना संदेह का विषय है क्योंकि महाराष्ट्र में पिछले 21 दिनों के लॉकडाउन में तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। फिर अचानक से ऐसा कैसे हुआ?

ये सबकुछ दिल्ली की तर्ज पर होता दिख रहा है। दिल्ली में अचानक से रातों-रात बसों को लगाया गया और घोषणा की गई कि मजदूरों को यूपी सीमा तक छोड़ा जाएगा और वहाँ से वो अपने घर जा सकते हैं। उनके घरों की बिजली-पानी भी काट दी गई। इसके बाद तुरंत यूपी की कुछ घटनाओं को आधार बना कर आप नेता राघव चड्ढा ने ये आरोप लगाने में देरी नहीं की कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के इशारे पर पुलिस मजदूरों को पीट रही है और उन्हें दोबारा दिल्ली न जाने की हिदायत दे रही है। मुंबई में भी ऐसा ही हुआ।

उद्धव ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र कैबिनेट के सदस्य आदित्य ठाकरे ने ये आरोप लगाने में देरी नहीं की कि लॉकडाउन की अवधि बढ़ाए जाने के कारण ये स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने दावा किया कि लॉकडाउन की घोषणा के समय भी उनके पिता ने पीएम मोदी से दरख्वास्त की थी कि ट्रेनों को 24 घंटे और चलाने की अनुमति दी जाए, ताकि बाहरी मजदूर अपने घर जा सकें। गैर-मराठी लोगों के प्रति ठाकरे परिवार के रवैये का क्या इतिहास रहा है, ये किसी से छिपा नहीं है। सरकार में रहते हुए भी उन्होंने ऐसा ही किया।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने तो पीएम मोदी से पहले ही अपने राज्य में लॉकडाउन की अवधि बढ़ा दी थी। उन्होंने 30 अप्रैल तक के लिए ऐसा किया था। महाराष्ट्र के मजदूरों को इसकी भी ख़बर हुई होगी लेकिन कोई नहीं जुटा। इसके बाद जैसे ही मंगलवार को पीएम मोदी ने घोषणा की, इतनी बड़ी भीड़ जुट गई। कैसे? पिछले 5 दिनों से जो लोग शांत बैठे थे, उनके अचानक सड़कों पर आने के पीछे लोगों को भी बड़ी साज़िश दिख रही है। और हाँ, ये भीड़ बांद्रा मस्जिद के सामने जुटी। अब मीडिया को कहा जाएगा कि वो ये नहीं बताए क्योंकि इससे सेकुलरिज्म की भावनाओं को ठेस पहुँचने की आशंका है।

अचानक से मजदूरों का जुटना, उन पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया जाना और फिर आदित्य का पीएम पर आरोप लगाना- ये सब के पीछे दिल्ली वाला मॉडल दिख रहा है। आनंद विहार में मजदूरों का भीड़ जुटना, लॉकडाउन के बावजूद बसों का चलना और फिर आप नेताओं का मोदी पर आरोप लगाना- यह सब तो हम देख ही चुके हैं। वो भी ये सब तब हो रहा है, जब मुख्यमंत्री ठाकरे ने ख़ुद प्रवासी मजदूरों को हरसंभव मदद देने का आश्वासन दिया था। ठाकरे बताएँगे कि उनके लिए क्या व्यवस्था की गई? अगर व्यवस्था नहीं की गई तो ठाकरे का आश्वासन झूठा निकला। अगर सारी व्यवस्थाओं के बावजूद वो बाहर निकले तो आदित्य ने तुरंत मोदी पर आरोप कैसे लगा दिया?

घोषणा की गई थी कि 10 रुपए में मिलने वाले ‘शिव भोजन स्कीम’ के तहत अब मात्र 5 रुपए में खाना दिया जाएगा। अगर ये योजना चालू थी तो लोग वहाँ से भागने को बेचैन क्यों हुए? इस योजना के 163 सेंटर पूरे राज्य भर में स्थापित किए जाने की जानकारी दी गई थी। यहाँ दो विरोधाभाषी बातें हैं। पहली, आदित्य का ये कहना कि उनके पिता प्रवासी मजदूरों को अपने घर भेजना चाहते थे। दूसरा, उद्धव का ये कहना कि महाराष्ट्र में प्रवासियों की देखभाल की जाएगी और वो जहाँ हैं, वहीं रहें। कौन सही है? पिता या पुत्र? दोनों ही सरकार में शामिल हैं। अब वही आदित्य ठाकरे दोबारा बयान देते हुए कह रहे हैं कि केंद्र इस मामले में राज्य की पूरी मदद कर रहा है ताकि मजदूर अपने-अपने घर जा पाएँl यानी, अपने बयान में विरोधाभाष।

ये भी तो सोचिए कि 24 घंटे और ट्रेनें चलतीं तो फिर लॉकडाउन का मतलब ही क्या रह जाता? लाखों लोग महाराष्ट्र से यूपी-बिहार लौटते और वहाँ समस्याएँ खड़ी हो जातीं, उनके क्वारंटाइन के लिए सरकारें शायद ही व्यवस्था कर पाती। फिर दूसरे कई राज्यों के लोग भी अपने-अपने गृह-प्रदेश में लौटना चाहते। फिर तो लॉकडाउन का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। क्या उद्धव यही चाहते थे कि ट्रेनें चलें और लॉकडाउन के बीच अराजकता का माहौल पैदा हो? महाराष्ट्र और मुंबई में कोरोना को रोकने में नाकाम सिद्ध हुए सीएम ने अपनी ग़लतियों को ढकने के लिए ऐसा किया?

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे ने भाजपा को धोखा देकर ख़ुद सीएम बनने की लालच में कॉन्ग्रेस और एनसीपी का दामन थामा। उस दौरान आरोप लगे थे कि 50-50 वाले फॉर्मूले पर अड़ने के पीछे राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर का दिमाग था। प्रशांत किशोर के साथ उद्धव की बैठकें भी हुई थीं। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल की चुनावी रणनीति भी उन्होंने ही बनाई थी, ये छिपा नहीं है। ऐसे में ये सवाल तो उठेगा कि दिल्ली मॉडल का मुंबई में दोहराया जाना कहीं प्रशांत किशोर के शरारती दिमाग का तो खेल नहीं? भाजपा को बदनाम करने के लिए भाजपा-विरोधी सरकारों का उपयोग करना एक रणनीति हो सकती है।

आज मुंबई की स्थिति ख़राब है और कोरोना आपदा के बीच महाराष्ट्र मिस-मैनेजमेंट का सबसे बड़ा हब बन कर उभर रहा है। अकेले महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के 2455 मामले हैं। केवल मुंबई की ही बात करें तो यहाँ कोरोना के 1540 मरीज हैं, जितने किसी राज्य में भी नहीं हैं। ठाकरे ने बेशक बॉलीवुड से ट्वीट करवा के ये दिखाया कि वो बेस्ट सीएम हैं लेकिन उर्वशी रौतेला ने जैसे ही बताया कि सभी सितारों को बने-बनाए ट्वीट्स दिए गए थे, पूरी साज़िश की पोल खुल गई। ऐसे में कुछ तो होना चाहिए था, जिससे उद्धव सरकार की नाकामी ढके। ये उद्धव ही नहीं बल्कि शरद पवार और कॉन्ग्रेस का भी सवाल जो ठहरा। देश में कोरोना से जितनी मौतें हुई हैं, उनमें से 44% मौतें सिर्फ़ महाराष्ट्र में हुई हैं।

साथ ही क्या इस भीड़ का ताल्लुक किसी मजहब से है, ये देखना इसीलिए ज़रूरी होता है क्योंकि वहाँ पर अल्लाह का नाम लेते हुए बातें की जा रही। एक व्यक्ति भीड़ को कहता दिख रहा है कि ये अल्लाह की तरफ़ से है और वो बार-बार अल्लाह का नाम लेकर समझा रहा है। अगर वो सारे मजदूर हैं तो जाहिर है कि उसमें हर जाति-मजहब के लोग होंगे। अगर ऐसा नहीं है तो फिर मस्जिद के सामने उनका जुटना और अल्लाह का नाम वहाँ पर गूँजने के पीछे कहीं तबलीगी जमात की निजामुद्दीन वाली घटना के दोहराव की साज़िश तो काम नहीं कर रही है? वहाँ समझाया जा रहा है कि मक्का-मदीना बंद है, काबा बंद है और मस्जिदें बंद हैं, इसीलिए वो स्थिति को समझें।

अंततः महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस पूरी घटना पर चिंता जताई। कुछ लोगों का यह भी सवाल है कि अगर ये मजदूर घर जाने के लिए जमा हुए हैं तो इनके हाथों में थैले या बैग वगैरह क्यों नहीं हैं? भीड़ मस्जिद के पास ही क्यों जमा हुई और अल्लाह का नाम लेकर समझाने के पीछे क्या तुक है? महाराष्ट्र में 30 अप्रैल तक का लॉकडाउन पहले से ही घोषित था तो आज हंगामा क्यों हो रहा है? ये तीन बड़े सवाल हैं, जिन्हें पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने भी उठाया है। अब इस पर उद्धव ठाकरे को जवाब तो देना ही पड़ेगा। पुलिस कह रही है कि वहाँ जुटे लोग मोदी के लॉकडाउन से नाख़ुश थे, तो क्या वो महाराष्ट्र सरकार के लॉकडाउन से ख़ुश थे?

‘पत्रकार’ विनोद कापड़ी ने बालरोग डॉक्टर की तस्वीर शेयर कर फैलाया झूठ, खुद आगरा DM ने हकीकत बताते हुए खोली उनकी पोल

संकट की घड़ी में समाज में अफवाहें फैलाकर अराजकता बढ़ाने का काम कैसे किया जाता है इसे वामपंथी मीडिया गिरोह के लोगों से बेहतर कोई नहीं जानता। अब तथाकथित पत्रकार विनोद कापड़ी की हरकत ही देखिए! उन्होंने आज सुबह एक ट्वीट कर दावा किया कि उत्तरप्रदेश के आगरा के जिला अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में डॉक्टर पॉलिथीन के सहारे कोरोना से लड़ रहे हैं। अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने दैनिक जागरण अखबार की एक क्रॉप की हुई कटिंग भी लगाई। मगर, इससे पहले उनका ये प्रोपगेंडा सोशल मीडिया पर फैलता कि डॉक्टरों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण भी नहीं है, कि तभी आगरा के डीएम ने खुद इसपर संज्ञान ले लिया। आगरा जिलाधिकारी ने उसी अखबार में प्रकाशित पूरी खबर को शेयर करते हुए विनोद कापड़ी के झूठ से पर्दा उठाया।

विनोद कापड़ी ने जहाँ पॉलीथीन पहने एक डॉक्टर की फोटो शेयर की और दावा किया कि कोरोना से लड़ने के लिए डॉक्टरों को सिर में ये पहनना पड़ रहा है। वहीं आगरा के जिला मजिस्ट्रेट के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से दावा किया कि आगरा में जिला अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के आदेशानुसार N95 ग्रेड मास्क और दस्ताने प्रदान किए गए हैं और उन्होंने पॉलीथिन नहीं पहना है।

इसके बाद कापड़ी के झूठ को खारिज करते हुए उन्होंने बताया कि जिस अखबार में छपी जिस डॉक्टर की तस्वीर को देखकर उन्होंने ये चिंता जाहिर की है। वो वास्तविकता में बालरोग के डॉक्टर हैं और वे आइसोलेशन वार्ड्स को नहीं देखते। लेकिन फिर भी उन्हें प्रचारित तस्वीर में पॉलीथीन बैग के अलावा एन-95 मास्क पहने भी देखा जा सकता है। इसके अलावा जिलाधिकारी ने ये भी कहा कि बचाव हेतु उपयोग की गई वस्तु (पॉलीथीन), वह उनकी अपनी सूझबूझ है। क्योंकि इस वक्त हर कोई अपने को सुरक्षित रखना चाहता है।

अब हालाँकि, इस स्पष्टीकरण के बाद किसी व्यक्ति से ये गलती अंजाने में होती तो वह उसे मान लेता, लेकिन विनोद कापड़ी अपने इस प्रोपगेंडे पर अड़े रहे। उन्होंने भाजपा आईटी सेल प्रमुख को ‘सीरियल ऑफेंडर’ बताया और पूछा कि एक डॉक्टर पॉलीथीन पहने आपको मंजूर है? इसके बाद कापड़ी ने डीएम को भी यही कुतर्क किया और सार्वजनिक रूप से झूठा साबित होने पर पूछा, “तो डीएम साहब आप कह रहे हैं कि जो आगरा Hotspot है, जिस अस्पताल में कोरोना के रोज़ 10 नए केस आ रहे है, वहाँ का एक डॉक्टर पॉलिथिन पहने- ये आपको स्वीकार है? चाहे वो किसी भी वॉर्ड में हों?”

यहाँ बता दें कि आगरा जिलाधिकारी की ओर से बयान आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने कापड़ी को खूब सुनाया। लोगों ने कापड़ी को अनपढ़ पत्रकार बताया। साथ ही कहा कि उनका ये ट्वीट कोई नहीं देखेगा, लेकिन हर किसी के घर में अखबार पहुँचेगा। इसलिए वे झूठ फैलना बंद करें।

वहीं एक यूजर ने कापड़ी से कहा कि कम से कम फोटोग्राफर का नाम न क्रॉप किए होते विनोद जी। एक तो इतनी मेहनत से लाया पिक्चर और आपने उसकी मेहनत ही क्रॉप कर दी। तो विनोद कापड़ी तुरंच एक्टिव हो गए और जवाब दिया कि उनके पास तस्वीर ऐसी ही आई थी। अगले ट्विट में अख़बार और फ़ोटोग्राफ़र के नाम हैं। वो भी देख लें।

गौरतलब है कि विनोद कापड़ी पहली बार ऐसा प्रोपगेंडा फैलाने के लिए चर्चा में नहीं आए हैं। पिछले साल अभिषेक उपाध्याय नामक पत्रकार ने विनोद कापड़ी को लेकर दावा किया था कि उन्होंने खुद का प्रचार करने व अपनी फिल्म पीहू का प्रमोशन करने के लिए एक नवजात बच्चे को गोद लेने का झूठ बोला। पत्रकार उपाध्याय के मुताबिक, विनोद कापड़ी ने दावा किया कि उन्होंने उस नवजात को खुद बचाया। जबकि वास्तविकता में बच्ची को बरनेल गाँव के लोगों ने कूड़े से उठाकर नागौर के अस्पताल में भर्ती कराया था।

कोरोना खिलाफ भारत ने काफ़ी पहले से की थी तगड़ी तैयारी, UK में स्थिति बदतर: पीटरसन ने विराट को सुनाया अपना अनुभव

भारत सरकार ने फलाँ तारीख को फ्लाइट्स क्यों नहीं बंद की? मोदी तब क्या कर रहे थे, तब चीन में कोरोना आया? लॉकडाउन पहले क्यों नहीं हुआ? ऐसे कई सवाल हैं जो लिबरलों के मुँह पर ही रहते हैं। वो सहूलियत के हिसाब से इसके उलट सवाल भी पूछ सकते हैं। लेकिन, क्रिकेटर केविन पीटरसन के अनुभव को आप जानेंगे तो आपको पता चलेगा कि भारत में कैसे तैयारियाँ काफ़ी पहले शुरू कर दी गई थी। इंग्लैंड के दिग्गज क्रिकेटर ने कहा है कि भारत में यूके के मुकाबले बेहतर तैयारियाँ थीं।

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात करते हुए पीटरसन ने कहा कि जब वो यूके में थे, तब न तो वहाँ सीमा पर किसी भी प्रकार की चेकिंग या मेडिकल टेस्टिंग हो रही थी और न ही कोई पाबन्दी लगाईं जा रही थी। उन्होंने बताया कि वो एक वाइल्ड डाक्यूमेंट्री की शूटिंग के लिए भारत आए थे। जैसे ही वो दिल्ली पहुँचे, उनका तापमान चेक किया गया। दिल्ली में एक होटल में चेक-इन करने से पहले मेडिकल टेस्टिंग वगैरह की गई।

पीटरसन ने जानकारी देते हुए बताया कि जब वो भारत पहुँचे, तब उन्हें पता चला कि यहाँ जो व्यवस्था थी, वो सब यूके में एकदम नहीं हो रहा था। ये बात 2 मार्च की ही है, जब भारत में लॉकडाउन का भी ऐलान नहीं हुआ था और कई देश कोरोना से अछूते थे। उन्होंने बताया कि उनके देश यूके में हालत बहुत ही ख़राब है और आँकड़े लगातार तेज़ी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्राफ का कर्व एकदम ऊपर ही ओर उठता जा रहा है। पीटरसन का ये वीडियो पुराना है लेकिन अब इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है, जब पीएम मोदी ने लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाने का निर्णय लिया है।

वहीं विराट कोहली ने भी संभवतः तबलीगी जमात की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगर कुछ लोगों को छोड़ दें तो कोरोना से निपटने में भारत ने अच्छे तरीके से एक्शन लिया है। कोहली ने कहा कि कुछ ऐसे लोग हैं, जो सरकार के दिशानिर्देशों और क़ानून का सम्मान नहीं करते, जिनके कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, उन सबके अलावा भारत में स्थिति काफ़ी हद तक बहुत ठीक है।

हाल ही में पीटरसन ने ब्रह्मपुत्र नदी के तटवर्ती इलाक़ों से लेकर नॉथ-ईस्ट के जंगलों तक का भ्रमण किया था और भारत के लोगों की ख़ूब प्रशंसा की थी। केविन पीटरसन ने माना था कि भारत के लोग जानवरों से काफ़ी प्यार करते हैं और उनकी ख़ूब देखभाल करते हैं। उन्होंने लिखा था कि वो जितना भी भारत भ्रमण करते हैं, जानवरों की देखभाल को लेकर यहॉं के लोगों के समर्पण से उतना ही अभिभूत हो जाते हैं। उन्होंने लिखा था कि भारत को ऐसे लोगों पर गर्व होना चाहिए, जो निःस्वार्थ भाव से अपने काम में लगे हुए हैं।

पतित वामपंथी चीन की वैश्विक विषाणुता (विषता) का एक मात्र सार्थक समाधान है वैष्णव मार्ग

दुनिया के ऐसे राष्ट्रों, जो विदेशी आक्रमणकारियों एवं औपनिवेशिकता के समर्थक शासन तंत्रों के शिकार रहे हैं, के शास्त्रीय ज्ञान को केवल विनष्ट ही नहीं किया गया है, अपितु विद्रूप भी किया गया है। एशिया महाद्वीप में प्राच्य संस्कृति का मूल केंद्र भारत इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। इस स्थिति का आकलन वर्तमान चीन द्वारा तिब्बती जन-मानस के साथ किए जा रहे अमानवीय एवं निंदनीय आचरण से लगाया जा सकता है। चीन ने तिब्बती जनता के साथ जो व्यवहार किया है और कर रहा है वह सभ्य मानव जाति की सबसे घृणित घटना है। दुर्भाग्य यह है कि दुनिया में मानवाधिकार के रक्षक राष्ट्रों ने आजतक मुखर होकर इसे वैश्विक मंच पर उठाया ही नहीं।

भारतवर्ष तो कम से कम इसे अपना पड़ोसी और सहोदर मानते हुए उन्हें अपने देश में ससम्मान जीवन जीने का सुअवसर प्रदान किया है। चीन दुनिया पर अपना आधिपत्य पतित प्रयासों के माध्यम से कर रहा है। कोरोना विषाणु इसका एक जीता जागता उदाहरण है। आइए, कोरोना संकट से उत्पन्न परिस्थिति में भारतीय संस्कृति के शुक्ल पक्ष का एक सारगर्भित विश्लेषण करते हैं। प्रस्तुत आलेख में आधुनिक समाज में विश्वस्तर पर व्याप्त कोरोना वायरस (विषाणु) की भयावहता का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए यह समझाने का प्रयास किया गया है कि भारतीय जीवन पद्धति का वैष्णव मार्ग ही इस वैश्विक विषता और विषाणुता का एकमात्र सार्थक समाधान है।

आज का कोरोना, प्रकृति का उत्पाद नहीं है, अपितु चीन जैसे कुत्सित देश की साम्राज्यवादी कुवृत्ति का उत्पाद है, जो अचानक विश्व की मानव जाति की हर पल की जीवन जीने की संभावना को ही छीन लिया है। कहाँ दुनिया ‘संपोषणीय विकास’ के प्रतिमान (मॉडल) तैयार कर रही है तथा विश्वस्तर पर ‘समावेशी समाज’ के निर्माण की गति को त्वरण प्रदान करने में पूर्ण मनोयोग से लगी है, वहीं महादानवीय कुप्रवृति वाले चीन ने विश्वविनाश के लिए जैव हथियार ‘कोरोना’ और ‘हन्ता’ जैसे विषाणुओं को प्रयोगशालाओं में तैयार किया है। चीन द्वारा पालित और चीनी महादानवीय प्रवृति के समर्थक राष्ट्र और उनके वैज्ञानिक इससे पूर्व एंथ्रेक्स जैसे जैव विषाणुओं का अपने शत्रु राष्ट्रों के विनाश हेतु समय-समय पर इससे पहले भी दुरूपयोग कर चुके हैं।

अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या ‘जैव विषाणु’ के माध्यम से विश्व को बर्बाद करने का विचार चीन, पाकिस्तान तथा इनके समर्थक मानसिकता वाले देशों में एकाएक आ गया है? अथवा उनकी धार्मिक मान्यताओं में ऐसा करने को ही विकास कहा गया है? यहाँ यह कहना तो उचित नहीं होगा कि किसी भी धर्म में क्रूरता, कपट, क्लेश तथा कष्ट को श्रेयस माना गया है। चीन की वर्तमान राजनीतिक वैचारिकी में तो हिंसा का स्थान है परन्तु इस्लाम में कम से कम सबकी सलामती का ही पैग़ाम है। इसका उत्तर मात्र यही है कि जैव विषाणुओं के उत्पादन के पूर्व से ही मूल रूप से विषता इन राष्ट्रों के शाषकों के मन-मस्तिष्क में ही उपजा है।

विषता और विषाणुता पर यूनेस्को ने बहुत पहले ही कहा था कि युद्ध बाहर से नहीं आते हैं, युद्ध मानव के मन में ही पैदा होते हैं, इसलिए दुनिया को यदि युद्धों से बचाना है तो मानव के मस्तिष्क को ही शिक्षा द्वारा विकसित, संशोधित एवं संवर्धित करना होगा। इसी तथ्य को प्रसिद्ध दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने भी उद्घाटित किया था। विषता और विषाणुता भी दानवीय प्रवृति (संस्कार) वाले क्रूर राज्याध्यक्षों के मन में ही पलते हैं जो समय-समय पर मानव जाति के शांत जीवन को विनाशकारी स्थिति तक पहुँचा देते हैं। वर्तमान कोरोना संकट ऐसी ही मानसिकता की उपज है।

आज के कोरोना संकट पर एक विहंगम दृष्टिपात करने से आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए हैं, जिन पर विचार करना समीचीन होगा। जो राष्ट्र अपने को अति-आधुनिक, स्वच्छ, विकसित, स्वस्थ एवं संपन्न मानते थे तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अधुनातन ज्ञान से सुसज्जित हैं, वही कैसे इस कोरोना त्रासदी से सर्वाधिक ग्रसित हो गए? इतना ही नहीं अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, फ्रांस और जर्मनी तो चीन से भौगोलिक रूप से भी दूर स्थित हैं, परन्तु संक्रमित होने तथा मरने वालों की संख्या इन्हीं विकसित राष्ट्रों में अधिक है। यह अब तक के स्थापित विज्ञान और समाज विज्ञान के ज्ञान के विपरीत प्रतीत हो रहा है। भारत के जन-मानस की अपनी जनसंख्या, रहन-सहन आदि की स्थिति उन देशों की दृष्टि में दयनीय है परन्तु कोरोना को यहाँ पाँव फैलाने में कठिनाई तो हो ही रही है। इसका शोध परक विश्लेषण सामयिक एवं सार्थक होगा।

कोरोना ने तो विश्व मानवता को ऐसी कगार पर खड़ा कर दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचने को विवश हो गया है कि अगले क्षणों में जीवित भी रह पाएगा या नहीं। इतना ही नहीं, अपने परिवार के सदस्यों की कोरोना से होने वाली मृत्यु में निकट से निकट सम्बन्धी भी उस मृत व्यक्ति की ओर देखना भी नहीं चाह रहा है। इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है? क्या इसी वैज्ञानिक प्रगति की कामना की गई थी? दोषी कौन है? क्या इसका निदान तुरंत खोजना सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है? क्या विभिन्न संस्कृतियों की जीवन पद्धति एवं उनके मूल दर्शनों में ही समाधान दिखता है? इन्हीं यक्ष प्रश्नों के उत्तरों को सांकेतिक रूप से इस आलेख में ढूँढने का एक लघु प्रयास किया गया है।

आज के भारत में बुद्धिजीवी उसे कहा जाता है, जो मानव जीवन का दर्शन मार्क्स या माओ के ही आसपास मानते हैं। इतना ही नहीं, यह अति-बौद्धिक वर्ग भारत के सनातन दर्शन और उस पर आधारित संस्कृति की बात को सिरे से ख़ारिज करते हुए इसके (सनातन दर्शन) समर्थकों को बुर्जुवा कहकर उपहास भी करता है। इनके लिए अनुशासित जीवन जीने वाला वर्ग पोंगापंथी लगता है और उन्मुक्त आचरणहीन समाज आधुनिक।

यही मार्क्सवादी और माओवादी दुनिया में हिंसा के पोषक हैं तथा मानवाधिकार के तथाकथित प्रवक्ता। इन्हें कभी भी यह नहीं सोचने की आवश्यकता पड़ी कि वर्तमान भारत में हिन्दू संस्कृति कैसे अनेकानेक आघातों को सहते हुए भी उत्तरोत्तर निखरती ही गई। आज यह वर्ग इतना भी विश्लेषण नहीं कर पाता है कि दुनिया के अन्य देशों के नागरिक क्यों सनातन धर्म एवं संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं? ऐसे तथाकथित हिंसावादी बुद्धिजीवी कोरोना, एंथ्रेक्स, सार्स और हन्ता जैसे विषाणुओं से अधिक घातक और पतित हैं।

वामपंथी अतिवादी बौद्धिक जैव विषाणुओं से अधिक हिंसक हैं, क्योंकि इन्होंने युगों-युगों से ऋषियों, संतों, देवदूतों, पैगम्बरों के सद्-प्रयासों से मानव, पर्यावरण और ब्रम्हांड के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु स्थापित ज्ञान को भी तुच्छ एवं अप्रासंगिक सिद्ध करने का पूरा प्रयास किया है और आज भी कर रहे हैं। इनका एक गिरोह है, जिसकी पहचान अब ठीक से हो चुकी है। यह नरपिपासु वर्ग ही कोरोना जैसे विषाणुओं का आविष्कार करके दुनिया को अभूतपूर्व त्रासदी की स्थिति तक पहुँचा दिया है।

अभी तो एक तरह से पूरा विश्व ‘लॉकडाउन’ की परिस्थिति में पहुँच चुका है, परन्तु इनकी इच्छा तो तब पूरी होगी जब दुनिया ‘लक डाउन (दुर्भाग्य) ‘ की स्थिति में पहुँच जाएगी और मात्र यह मार्क्स और माओवादी बौद्धिक ही बस बचे रह जाएँगे। इनको भारतीय पौराणिक ‘भस्मासुर’ की कथा के परिणाम का बोध नहीं है। भगवान शंकर से आशीर्वाद पाकर जब उन्हीं पर उसने आक्रमण कर दिया तो उन्होंने किसी प्रकार भस्मासुर का संहार किया। भले ही यह कोरोना आज दुनिया के लिए भस्मासुर बना है, परन्तु चीन और चीनी की स्वाद चखने वाले इस बौद्धिक वर्ग का समूल नाश पहले होगा और यदि कोई संस्कृति बच पाएगी तो वह सनातनी संस्कृति और इस पर आधारित वैष्णव जीवन पद्धति।

भारत की सनातन ‘हिन्दू’ जीवन पद्धति का उपहास उड़ाने वालों की आँख पहली बार तब खुली, जब यूनेस्को ने वेदों को दुनिया का प्राचीनतम साहित्य माना। सनातन दर्शन एवं संस्कृति के मूल स्रोत वेद ही हैं। वेदों में ही विश्व को कुटुंब मानने का निर्देश है, तथा जीव और निर्जीव, साकार और विराकार, आस्तिक और नास्तिक के बीच अभेद (अद्वैत) के साथ ही साथ अहिंसा, करुणा, दया, सहअस्तित्व, सहयोग तथा सर्वमयता जैसे उच्च अनुकरणीय आदर्शों का वर्णन मिलता है।

वेदों के बाद के सभी साहित्य वेदों की ही टीका, भास्य, व्याख्या तथा विस्तार आदि के रूप में आए। तात्विक रूप से सनातन दर्शन शाश्वतता के सिद्धांत पर आधारित है , जिसका अर्थ होता है कि ऐसे आदर्श, मूल्य या सिद्धांत जो स्थान (परिस्थिति) और काल के परिवर्तित के होने पर भी अपनी मौलिक प्रासंगिकता यथावत बनाए रखते हैं। सनातन धर्म के बाद के सभी धर्मों में पूर्णतः या अंशतः सनातन धर्म के प्रतिपाद्यों का समावेश मिलता है।

भारत में मौलिक सनातनी दर्शन के बाद बौद्ध, जैन, सिख आदि भारतीय धर्म भी कहीं न कहीं मौलिक रूप से वैदिक मान्यताओं के आसपास ही घूमते हैं। यदि अंतर भी कहीं है तो मानवोचित मूल्यों की सार्वभौमिकता में नहीं, अपितु विधियों में है। यहाँ दार्शनिक मीमांसा को मात्र संकेत रूप में ही बताया जा रहा है।

विश्व में आज व्याप्त विषता/विषाणुता का निदान कहीं न कहीं सनातन संस्कृति के वैष्णव मार्ग में ही निहित है। वैष्णव मार्ग को यदि सूक्ष्म रूप से विश्लेषित किया जाए तो यह निर्विवाद रूप से स्वीकार करना पड़ेगा की समता, सर्वमयता, सहअस्तित्व, सर्वकल्याण, सर्वोदय, समन्वय तथा सम्यकता के व्यापक मानव मूल्यों का सर्वमान्य सार ही वैष्णत्व है। आज की ही नहीं, पिछली शताब्दियों में भी अमानवीय विषता/विषाणुता का निदान वैष्णत्व में ही मिला था।

वैष्णव मार्ग सर्वविनाश के विपरीत सर्वविकास की अवधारणा पर खड़ा हुआ है। ऋषियों, महर्षियों, संतों, साधकों एवं योगियों आदि ने अपने जीवन की सभी निजी आकाँक्षाओं को त्याग कर विश्व कल्याण और इसके दीर्घ काल तक के सातत्य के निमित्त अभिस्ट जीवन पद्धति की खोज की। उन्हीं दिव्य आत्माओं के ज्ञान, संज्ञान और प्रज्ञान के मौलिक निष्कर्ष का परिणाम है वैष्णव मार्ग। इन महान ऋषियों के द्वारा निर्दिष्ट मार्ग पर चलने का निर्देश युद्धिष्ठिर ने यक्ष के उस प्रश्न के उत्तर के रूप में दिया था, जिसमें यक्ष ने पूछा था कि दुनिया में जीने का मार्ग क्या है (क: पंथा), और उत्तर था ‘महाजनों येन गतः स:पंथा’।

महाजन भारत के ऋषि गण थे, जिन्होंने आवश्यकताओं को यथा संभव न्यून करके ‘जियो और जीने दो’ के मार्ग को बताया। महाजन का अर्थ आज के साम्राज्यवादी अथवा एकाधिपत्यवादी नहीं। हमने दुनिया को स्वार्थपरक एवं शोषणयुक्त विकास आधारित मानसिकता के कारण असाध्य, विषता, विषाणुता पैदा करके घोर सर्वविनाश की ओर धकेल दिया है। अब सब एक साथ त्राहिमाम-त्राहिमाम बोल रहे हैं। इस विश्व के सभी राष्ट्र अब भारत के वैष्णव दर्शन की ओर निरीह भाव से देख रहे हैं। कोरोना की विषता का समाधान अब तक जो भी लेशमात्र मिल पाया है, वह वैष्णत्व में ही मिल पाया है।

वैष्णत्व को बिना किसी अकादमिक क्लिष्टता के चक्कर में पड़े, इसे सीधे समझने का प्रयास करते हैं। गुजरात में पंद्रहवीं शताब्दी में एक भक्त कवि हुए, जिनका नाम था नरसी मेहता (उन्हें कवि नरसिंह मेहता या नर्सी भगत भी कहा जाता था)। उनकी एक मूल गुजराती भाषा में रची गई भजन वैष्णव धर्म के अपेक्षित आचरणों को स्पष्ट करती है। यह वास्तव में संपूर्ण वैष्णव वांग्मय का सार है। इसे ही महात्मा गाँधी ने अपनी दैनिक प्रार्थना का अनिवार्य अंग बना लिया था।

शांत चित्त होकर इस पर मनन करने तथा संकल्प के साथ पालन करने से वैष्णत्व और गाँधी चित्त को ठीक से समझा जा सकता है। प्रसंगवश इस भजन का इस आलेख में उल्लेख करना पूर्णतः समीचीन होगा। आज दान से अधिक दानशीलता का प्रदर्शन हो रहा है, स्वाभिमान का स्थान दम्भ ले चुका है, तब ये भजन मनुष्य जाति को वैष्णव सन्देश देती है।

भजन अपने मूल रूप में कुछ इस तरह से है:

‘वैश्णव जन तो तेने कहिये जे
पीड़ परायी जाणे रे

पर-दुख्खे उपकार करे तोये
मन अभिमान ना आणे रे

वैश्णव जन तो तेने कहिये जे…
सकळ लोक मान सहुने वंदे
नींदा न करे केनी रे

वाच काछ मन निश्चळ राखे
धन-धन जननी तेनी रे

वैश्णव जन तो तेने कहिये जे…
सम-द्रिष्टी ने तृष्णा त्यागी
पर-स्त्री जेने मात रे
जिह्वा थकी असत्य ना बोले
पर-धन नव झाली हाथ रे

वैश्णव जन तो तेने कहिये जे…

मोह-माया व्यापे नही जेने
द्रिढ़ वैराग्य जेना मन मान रे

राम नाम सुन ताळी लागी
सकळ तिरथ तेना तन मान रे
वैश्णव जन तो तेने कहिये जे…
वण-लोभी ने कपट-रहित छे
काम-क्रोध निवार्या रे
भणे नरसैय्यो तेनुन दर्शन कर्ता
कुळ एकोतेर तारया रे

वैश्णव जन तो तेने कहिये जे…’

पटना: मस्जिद से पकड़े गए 17 विदेशी तबलीगी जमाती क्वारंटाइन खत्म होने के बाद भेजे गए जेल, वीजा नियमों के उल्लंघन का आरोप

बिहार में विदेश से आए जमातियों के खिलाफ पहली बार बड़ी कार्रवाई देखने को मिली है। राजधानी पटना में मजहबी प्रचार करने आए 17 जमातियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। गृह मंत्रालय के आदेश के बाद यह कार्रवाई की गई। ये सभी जमाती किर्गिस्तान, कजाकिस्तान और मलेशिया से ये टूरिस्ट वीजा पर पटना पहुँचे थे। मंगलवार को वीजा नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में इन्हें जेल भेज दिया गया है।

पुलिस के अनुसार जेल भेजे गए जमातियों का वीजा जून तक वैध था, लेकिन सभी टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे ऐसे में वह मजहबी प्रचार नहीं कर सकते थे। ये सरासर कानून का उल्लंघन है। इन सब के खिलाफ इसी मामले में एफआईआर दर्ज किया गया है। इनमें 10 जमातियों के खिलाफ वीजा उल्लंघन के मामले में दीघा थाने तथा 7 के खिलाफ फुलवारीशरीफ थाने में एफआईआर दर्ज की गई है।

पकड़े गए सभी जमातियों को पटना के एम्स में भर्ती कराया गया था। सभी का तीन बार कराए गए कोरोना जाँच में सभी की रिपोर्ट निगेटिव आने के बावजूद उन्हें 14 दिन तक क्वारंटाइन में रखा गया था। लेकिन अब क्वारंटाइन की अवधि पूरी होने के बाद इन्हें बेउर जेल भेज दिया गया है। इनमें किर्गिस्तान के नौ, मलेशिया के सात और एक कजाकिस्तान का निवासी हैं और ये सभी तबलीगी मरकज से जुड़े हुए हैं।

सभी 17 जमातियों ने पिछले महीने दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज में आयोजित मजहबी कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। 17 जमातियों को दीघा और फुलवारीशरीफ की मस्जिद से पकड़ा गया था। पुलिस के अनुसार टूरिस्ट वीजा पर भारत आए इन विदेशियों ने ना तो पुलिस प्रशासन को अपने आने की सूचना दी और ना ही नियमों के अनुसार फार्म-सी भरा था। जेल अधीक्षक जवाहर लाल प्रभाकर ने बताया कि बेउर जेल भेजे गए सभी जमातियों को स्क्रीनिंग के बाद जेल के अंदर दाखिल कराया गया है और सभी को अन्य कैदियों से अलग वार्ड में रखा जाएगा।

बता दें कि कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को लेकर जब देश में कोरोना से बचने के लिए 22 मार्च को जनता कर्फ्यू घोषित किया गया था। तब पटना के दीघा थानाक्षेत्र स्थित कुर्जी इलाके के एक मस्जिद में जमात के 10 लोग छिपे बैठे थे। ये सभी जमाती किर्गिस्तान से टूरिस्ट वीजा लेकर भारत आए थे। जनता कर्फ्यू की घोषणा के बाद जब गली के अंदर बने मस्जिद में इनके छिपे होने की सूचना मिली तो स्थानीय लोगों ने विरोध करना शुरू किया और पुलिस को इसकी सूचना दी। उसके ठीक अगले दिन यानी 23 मार्च को पटना के ही फुलवारी इलाके मे छिपे 7 विदेशियों को मस्जिद से पकड़ा गया।

उल्लेखनीय है कि गृह मंत्रालय ने पहले ही दिल्ली में निजामुद्दीन तबलीगी जमात के मरकज में शामिल 960 विदेशियों के वीजा ब्लैकलिस्ट करने के साथ ही इन सबका पर्यटक वीजा भी रद्द कर दिया है जिससे कि ये अब कभी भी भारत नहीं आ सकेंगे। इन्हें वीजा सूची के नियमों के उल्लंघन का दोषी माना गया, क्योंकि ये सभी लोग पर्यटक वीजा पर भारत आए थे, लेकिन निजामुद्दीन में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए। बता दें कि पर्यटक वीजा धारक धार्मिक समारोह में शामिल नहीं हो सकते हैं।

बांद्रा में घर जाने की माँग के साथ जमा हुए हज़ारों मजदूर: महाराष्ट्र पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उद्धव चुप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने की घोषणा की है। अब ये 3 मई तक रहेगा। अतः, मेट्रो व ट्रेन्स से लेकर फ्लाइट्स तक भी 3 मई तक बंद ही रहेंगे। इसी बीच देश में कोरोना वायरस का बड़ा हॉटस्पॉट बने मुंबई से एक बड़ी ख़बर आई है।

वहाँ बांद्रा में हज़ारों की संख्या में प्रवासी मजदुर जुट गए,जो अपने घर जाने की माँग कर रहे थे। पुलिस ने उन मजदूरों को तितर-बितर करने के लिए लाठियाँ चटकाई हैं। ये मजदूर माँग कर रहे हैं कि इन्हें वापस इनके घर भेजा जाए, जो दूसरे राज्यों में है।

इस दौरान लोगों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना की, जो तीन दलों की संयुक्त सरकार चला रहे हैं। उद्धव के बारे में जिस तरह से सोशल मीडिया के सेलेब्रिटीज ने कसीदे पढ़े हैं, उसके बाद लोग उन्हें मजाक में ‘यूनेस्को सर्टिफाइड बेस्ट सीएम’ कहने लगे हैं। लोगों ने कहा कि शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा इस तरह से मजदूरों का उत्पीड़न करना सही नहीं है। शांति से समझा-बुझा कर उनके लिए व्यवस्था की जानी चाहिए थी।

महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के 2455 मामले सामने आए हैं, जो देश में सर्वाधिक है। अकेले मुंबई में 1540 कोरोना के मरीज मिले हैं, जितने किसी भी राज्य में नहीं हैं। ऐसे में बॉलीवुड की प्रशंसा के बावजूद उद्धव ठाकरे की नेतृत्व-क्षमता पर प्रश्नचिह्न तो लगा ही हुआ है। अब ,महाराष्ट्र पुलिस द्वारा मजदूरों की पिटाई होने के बाद उनकी आलोचना फिर से शुरू हो गई है। अभी तक महाराष्ट्र सरकार ने इस पर कुछ नहीं कहा है।

लॉकडाउन के बीच चंडीगढ़ में VIP कर रहे प्रशासन से इम्पोर्टेड ब्रेड, मक्खन, शराब के साथ कई अन्य चीजों की माँग

एक तरफ पूरा देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है और दो जून की रोटी के लिए चिंतित है। वहीं दूसरी ओर चंडीगढ़ में कुछ वीआईपी देश में जारी लॉकडाउन के बीच घर बैठे शासन-प्रशासन से ताजा ब्रेड (बस्किन रॉविन्स ब्रांड), आइसक्रीम व ब्रांडेड शराब की माँग कर रहे हैं। इतना ही नहीं विशेष व मँहगे प्रकार यानि कि जैतून जैसे तेल की भी माँग कर रहे हैं। आश्चर्य इस बात का कि ये लोग माँग ही नहीं बल्कि इसके नाम पर गुस्से का इजहार भी कर रहे हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक चंडीगढ़ शहर के वीआईपी रिहायसी इलाके सेक्टर 1 से 11 से चुनकर आए भाजपा पार्षद महेश इंदर सिंह सिद्धू ने बताया कि उन्होंने तीन कार्यकर्ताओं को लोगों की राशन आपूर्ति करने के लिए मैंने तीन पास जारी किए हैं, लेकिन वह अब अजीब तरह की परेशानी से जूझ रहे हैं। उन्होंने आगे बताया कि जब कार्यकर्ता वीआईपी के घरों में राशन लेकर पहुँचते हैं तो उनसे बाजार में स्ट्राबेरी के उपलब्ध न होने का कारण पूछा जाता है।

सिद्धू ने कहा कि मैं भी उन्हें यह समझाने की कोशिश करता हूँ कि ऐसे हालात में इस तरह की माँग पूरी नहीं कर सकते, लेकिन वीआईपी कहते हैं कि उन्हें अपनी डाइटिंग का ख्याल रखना है। इसलिए वह हरी गोभी और काली मिर्च की माँग करते हैं। सिद्धू ने आगे बताया कि, किसी ने मुझे फोन पर शिकायत करते हुए कहा कि उसका परिवार निक बेकर्स ब्रांड की ब्रेड के आलावा दूसरे ब्राँड की ब्रेड नहीं खाता है इसलिए मेरे लिए उसी ब्रांड की ब्रेड का इंतजाम करवाया जाए।

वह आगे कहते हैं कि कुछ वीआईपी लॉकडाउन के नियमों की अनदेखी करते हुए हर रोज टहलने के लिए भी निकलते हैं। इतना ही नहीं सेक्टर 10 में रहने वाले एक वीआईपी ने तो 10 ऐसे लोगों की सूची मेरे हाथ में थमा दी, जिनको कहीं पर भी आने-जाने की अनुमति दी जाए।

आपूर्ति विभाग के कमिश्नर केके यादव ने कहा कि कुछ वीआईपी लोगों द्वारा ऐसे-ऐसे विदेशी सामानों की माँग की जा रही है, जो कि हमारे पास बहुत ही सीमित मात्रा में हैं। उन्होंने आगे बताया कि किसी ने मुझसे जैतून के तेल की माँग की। इस पर मैंने कहा कि हम सामान्य खाने के तेल की ही व्यवस्था कर सकते हैं, लेकिन वीआईपी कहते हैं कि उनका परिवार केवल जैतून के तेल में पकी हुई सब्जियाँ ही खाता है।

कुछ ऐसे ही कॉन्ग्रेस पार्षद देविंदर सिंह बाबला, जो कि सेक्टर 27 और 28 के वीआईपी इलाके से संबंध रखते हैं, का कहना है कि उनके पास सैकड़ों वीआईपी के फोन आते हैं, जो सिर्फ ब्रांडेड सामान की माँग करते हैं। बाबला ने आगे बताया कि वीआईपी लोग सिर्फ जरूरी सामान की ही नहीं बल्कि शराब की भी माँग कर रहे हैं।

प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि ये वीआईपी लोग शिक्षित होने के बावजूद भी मामले को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और ब्रांडेड सामान की माँग को लेकर कई बार अपना आपा भी खो दे रहे हैं। अधिकारी ने कहा कि एक वीआईपी व्यक्ति ने तो मुझ पर मुकदमा कराने की धमकी तक दे डाली थी।

वकील प्रशांत भूषण समेत 3 के खिलाफ मुकदमा दर्ज: रामायण-महाभारत के प्रसारण पर की थी अपमानजनक टिप्पणी

पूरे देश में सभी सीरियल्स के रिकार्ड ध्वस्त कर दूरदर्शन पर नए किर्तिमान गढ़ने वाले रामायण-महाभारत को लेकर की गई अपमानजनक टिप्पणी एक जाने-माने वकील के लिए भारी पड़ गई। मामले में शिकायत मिलते ही गुजरात पुलिस ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, कन्न गोपीनाथन सहित तीन लोगों के खिलाफ में मुकदमा दर्ज किया गया है। दरअसल वकील प्रशांत भूषण ने रामायण-महाभारत के प्रसारण की तुलना अफीम से की थी।

गुजरात की राजकोट पुलिस ने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण द्वारा रामायण-महाभारत को लेकर किए गए विवादास्पद ट्वीट मामले में मुकदमा दर्ज किया है। साथ ही प्रशांत भूषण के ट्वीट का समर्थन करने और लोगों को भड़काने के आरोप में पुलिस ने एश्लीन मैथ्यू और कन्नन गोपीनाथन के खिलाफ में भी मामला दर्ज किया है। 

भारतीय सेना में पूर्व सेनाधिकारी कैप्टन जयदेव जोशी ने शिकायत करने का साथ तर्क दिया था कि अदालतों में गवाही से पहले धार्मिक ग्रन्थों की शपथ दिलाई जाती है। मगर अगर इन ग्रन्थों को अफीम का नशा माना जाएगा तो इस गवाही का अर्थ ही खत्म हो जाएगा। शिकायत के आधार पर ही रविवार शाम को राजकोट शहर के भक्तिनगर पुलिस स्टेशन में यह रिपोर्ट दर्ज की गई। इसके बाद में मामले की  जांच विशेष संचालन समूह (एसओजी) को हस्तांतरित कर दी गई। 

पुलिस इंस्पेक्टर रोहित रावल ने बताया कि गुजरात के राजकोट के मूल निवासी जयदेव भाई जोशी के रूप में पहचाने जाने वाले सेना के एक सेवानिवृत्त कप्तान ने ये शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी शिकायत में, जोशी ने भूषण पर 28 मार्च को किए गए एक ट्वीट में रामायण और महाभारत के साथ अफीम शब्द का उपयोग करने का आरोप लगाया, जिसने कई हिंदू लोगों की भावनाओं को आहत किया है।

हालाँकि, अपने ऊपर लगे आरोपों को वकील प्रशांत भूषण सिरे से खारिज कर दिया, जबकि कन्नन गोपीनाथ ने इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद भी आरोपित कन्नन गोपीनाथन ने कहा कि सरकार के कहने पर गुजरात पुलिस ने मेरे ऊपर यह रिपोर्ट दर्ज की है। साथ ही गृहमंत्री अमित शाह को टैग करते हुए कहा कि आप गिरफ्तार करा सकते हैं, लेकिन हम चुप्पी नहीं साधेंगे, क्योंकि हम डरते नहीं हैं।

दरअसल वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने 28 मार्च को अपने ट्विटर हेंडल से एक ट्वीट करते हुए लिखा था कि जबरन तालाबंदी के कारण करोड़ों लोग भूखे-प्यासे घर से चले जाते हैं, हमारे हृदयहीन मंत्री रामायण और महाभारत की अफीम का सेवन और भोजन करते हैं।

आपको बता दें कि देश में जारी लॉकडाउन के बीच केन्द्र सरकार द्वारा दूरदर्शन पर प्रसारित किए गए रामायण और महाभारत ने टीआरपी में टीवी के इतिहास में पिछले पाँच साल के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।