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5 लाख गाय, 1.5 लाख बंदर और कुत्ते: सबके खाने की व्यवस्था कर रही योगी सरकार, बनाए 5000 काउ शेल्टर

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश की 23 करोड़ जनसंख्या तक प्रतिदिन दूध पहुँचा कर एक रिकॉर्ड कायम किया है। यूपी में सिर्फ़ इंसानों का ही ध्यान नहीं रखा जा रहा, बल्कि जानवरों के खाने-पीने का बीड़ा भी सरकार ने उठाया है। क़रीब 5 लाख गायों के लिए चारे का इंतजाम किया गया है। इसके अलावा 1.5 लाख कुत्तों के लिए भी भोजन की व्यवस्था की गई है। इतनी ही संख्या में बंदरों के लिए भी रोज भोजन का प्रबंध किया जा रहा है। ये वो जानवर हैं, जिनमें से अधिकतर मंदिरों के श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए भोजन पर आश्रित थे।

डेयरी और एनिमल हसबेंडरी के प्रधान सचिव भुवनेश कुमार ने बताया कि उन्हें ग्रामीण और शहरी इलाक़ों के बीच दूध की आपूर्ति बिना किसी अवरोध के सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। लॉकडाउन के दौरान जानवरों को खिलाने के लिए कई कर्मचारियों व एनजीओ के स्वयंसेवकों को लगाया गया है, जो प्रतिदिन उन्हें विडियो मैसेज भेज कर बताते हैं कि आवारा जानवरों को खिलाने का काम सुचारू रूप से चल रहा है। 5 लाख गायों के रहने की व्यवस्था के लिए 5000 शेल्टर बनाए गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी ‘डेली ब्रीफिंग’ के दौरान इन गायों के बारे में ज़रूर पूछते हैं।

एग्रीकल्चर प्रोडक्शन कमिश्नर के दफ्तर में 24 घंटे चालू रहने वाला कंट्रोल रूम बनाया गया है। यूपी में एक करोड़ किसान और 3 करोड़ दुधारू जानवर हैं। प्रतिदिन 8 करोड़ लीटर दूध के उत्पादन के साथ यूपी इस मामले में देश में सबसे अव्वल राज्य है। ऐसे में अधिकारियों पर जिम्मेदारी है कि दूध बेकार न जाए और इसकी सप्लाई व डिमांड में कोई अवरोध न आए। चूँकि आईएएस जगत में ‘कर्फ्यू कुमार’ के नाम से जाने जाने वाले भुवनेश को अलीगढ़ सहित अन्य जिलों में तनाव के बीच स्थिति के प्रबंधन में दक्षता हासिल है, ऐसी आपदा की घड़ी में उनकी ये क्षमता उनके काम आ रही है।

उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के पहले ही दिन सभी जिलों के अधिकारियों को निर्देश दे दिया गया था कि वो साइकिल या बाइक पर दूध ले जाने वाले लोगों को न रोकें। इसी कारण कहीं से भी दूध की कमी की शिकायतें नहीं आईं और न ही कहीं दूध के बेकार जाने की ख़बर आई। प्राइवेट और सरकारी लोगों को मिला आकर 17,000 लोग रोज दूध की डिलीवरी में लगे हुए हैं। गौशालाओं में सारी व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की जा रही हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री का उससे सीधा इमोशनल जुड़ाव है।

‘दिल्ली में ग़रीबों को दिया जा रहा अधपका, गंदा और कीड़ों वाला खाना’: देखें Video

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कई बार दावा कर चुके हैं कि उनकी सरकार लाखों लोगों को रोज खाना खिला रही है, जिनमें अधिकतर ग़रीब मजदूर हैं। लेकिन, तस्वीरें कुछ और ही हकीकत बयान करती हैं। वेस्ट दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने एक विडियो शेयर किया है, जो केजरीवाल के दावों की पोल खोलता है। उन्होंने आरोप लगाया है कि गरीबों को खिचड़ी के नाम पर उल्टी जैसा दिखने वाला पीला पानी परोसा जा रहा है। वर्मा ने कहा कि ये भोजन कीड़ों से भी भरा हुआ है।

सांसद ने दिल्ली के मुखिया से कहा कि जो खाना उनकी सरकार गरीबों को खिला कर अपनी पीठ थपथपा रही है, वो आम आदमी पार्टी के नेताओं और विधायकों को खा कर देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार कोरोना वायरस संक्रमण के प्रकोप के बीच भी भ्रष्टाचार और निराशा ही परोस रही है, ये कृत्य क्षमा योग्य नहीं है। इससे पहले आरोप लगे थे कि दिल्ली सरकार द्वारा गरीबों को खाना खिलाने में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया जा रहा है। कई तस्वीरें वायरल हुई थीं, जिनमें लोग एक ही जगह पर इकट्ठे बैठ कर खाते नजर आ रहे थे।

कई पीड़ितों ने भी दिल्ली सरकार पर निशाना साधा। संसद वर्मा द्वारा शेयर किए गए विडियो में एक महिला ने कहा कि एक तरफ़ कोरोना वायरस से संक्रमण का प्रकोप है, दूसरी तरफ़ कोई मरने के लिए कीड़ों वाला खाना क्यों खाएगा? महिला ने कहा कि खाना अधपका है, जिससे बच्चों के भी बीमार होने का ख़तरा है। कई अन्य लोगों ने भी इस खाने पर आपत्ति जताई। बता दें कि दिल्ली सरकार कई जगह पर ‘कम्युनिटी किचेन’ के माध्यम से ग़रीबों को भोजन कराने का दावा करती रही है।

इससे पहले दिल्ली सरकार पर आरोप लगे थे कि मजदूरों के घरों का बिजली-पानी काट उन्हें रातोंरात दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर जाकर छोड़ दिया गया था। आनंद विहार इलाक़े में इन मजदूरों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी, जिसके बाद कोरोना वायरस के संक्रमण का ख़तरा बढ़ गया था। बाद में योगी सरकार ने इन मजदूरों के रहने-खाने व आवागमन की व्यवस्था की। इसके बाद आप विधायक राघव चड्ढा ने आरोप लगाया था कि यूपी की योगी सरकार मजदूरों को दिल्ली वापस न जाने की धमकी देते हुए लाठी से पिटवा रही है।

गुजरात: ड्यूटी छोड़ मस्जिद में नमाज पढ़ने चले गए इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर, गिरफ्तारी के बाद निलंबित

कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए लॉकडाउन के दौरान पूरा पुलिस और प्रशासन अमला कायदों को सुनिश्चित करवाने में जुटा है। लेकिन, कुछ के लिए मजहब ही सब कुछ है। गुजरात में ऐसे ही दो पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। दोनों ड्यूटी छोड़कर मस्जिद में नमाज अदा करने चले गए थे। उन्होंने यह हरकत तब की जब डांग जिले में ड्यूटी पर तैनात किए गए थे।

दोनों को मस्जिद में सामूहिक नमाज में भाग लेने के चलते गिरफ्तार किया गया है। उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित भी कर दिया गया है। ये दोनों पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान सामूहिक नमाज पढ़ने मस्जिद गए थे, जिस कारण इन पर तुरंत कार्रवाई की गई।

पुलिस द्वारा जारी बयान में बताया गया है कि इंस्पेक्टर आईबी अजमेरी और सब इंस्पेक्टर एसएस डरैया शुक्रवार को ड्यूटी पर तैनात थे। इसी दौरान दोनों आहवा कलेक्टर कार्यालय के निकट की मस्जिद में मौलवी और अन्य के साथ सामूहिक नमाज पढ़ने चले गए।

यह खबर ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार हर किसी से घर पर रहने की अपील कर रही है ताकि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोका जा सके। लेकिन तबलीगी जमात में शामिल लोगों के कारण पहले ही देश में संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।

हिन्दू %ट कबाड़ रहे हैं, तुम्हारी पीठ पर… छाप दूँगा: जमातियों की ख़बर से बौखलाए ज़ीशान की धमकी

उत्तर प्रदेश के चंदौली के रहने वाले एक युवक ने बताया कि ज़ीशान नाम के एक शख्स से उसे धमकियाँ मिल रही है। पीड़ित हेमंत ने व्हाट्सप्प पर तबलीगी जमात की सच्चाई को उजागर करते हुए कुछ लेख शेयर किए थे। इसके सैयद ज़ीशान को बुरा लगा और उसने गाली-गलौज शुरू कर दी। उसने कहा कि मीडिया और तुम जैसे लोगों ने पूरा कचरा बना कर रख दिया है, जो लगातार इस कोशिश में लगे थे कि कोरोना का आरोप कैसे समुदाय विशेष पर लगाया जाए। साथ ही ज़ीशान ने भद्दी-भद्दी गालियाँ भी दी।

हेमंत ने जिन ख़बरों को शेयर किया था, उनमें से एक में बताया गया था कि यूपी के कन्नौज में लॉकडाउन के बाजवूद कई नमाजी इकट्ठे हो गए। साथ ही घरों की छतों से पुलिस टीम पर पत्थर भी फेंकी गई, जिससे कई जवान हॉस्पिटलाइज हो गए। उन्होंने इस ख़बर को शेयर करते हुए पूछा था कि आखिर उन पुलिसकर्मियों की क्या ग़लती थी? साथ ही उन्होंने जमातियों द्वारा नर्सों के साथ बदसलूकी किए जाने वाली ख़बर भी शेयर की थी। जमात के आतंकी संगठनों के साथ संबंधों का भी पर्दाफाश हुआ है। इस ख़बर को शेयर करने से भी ज़ीशान बौखला गया और उसने मारने-पीटने की धमकी दी।

जब हेमंत ने ज़ीशान को बताया कि ये एक लोकतान्त्रिक देश है और सभी को अपने विचार प्रकट करने का अधिकार है, तो ज़ीशान ने कहा कि ‘%ड मराओ’ और साथ ही धमकी दी कि वो शाम को आएगा और हेमंत के शरीर पर डेमोक्रेटिक राइट का छाप लगा के जाएगा। वो मारने-पीटने की धमकी दे रहा था। साथ ही उसने इन्तजार करने को भी कहा। उसने भद्दे मैसेज करते हुए लिखा:

“अभी थैंक्स मत बोलो। शाम में जब काम हो जाएगा तब बोलना। अपनी पीठ मजबूत करके रखो। चिंता मत करो, तुम्हारी सारी राजनीति मैं निकाल दूँगा। और जितनी %ट तुम्हारी होगी, उतना उखाड़ लेना मेरा। जब बात से समझ न आए तो लात का यूज कर लेना चाहिए। क्योंकि तुम ऐसे नहीं मानोगे।”

साथ ही उसने हेमंत को चुपचाप घर में बैठे की सलाह देते हुए गालियाँ दी। उसने कहा कि मीडिया भी पूरी तरह बिकी हुई है। हेमंत ने ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए बताया कि ज़ीशान और वो साथ में ही पढ़ते थे। मुगलसराय स्थित ‘आइडियल पब्लिक स्कूल’ में वो साथ पढ़ा करते थे। वो स्कूल एक मजहब विशेष के व्यक्ति का ही है, जिसके प्रिंसिपल वगैरह भी मजहब विशेष से ही थे। हेमंत ने बताया कि उस दौरान भी हिन्दू छात्रों को वहाँ काफ़िर कह कर प्रताड़ित किया जाता था।

ज़ीशान ने हेमंत को गाली देकर धमकाया

स्कूल में ज्यादातर दूसरे मजहब के छात्र ही थे और ज़ीशान उनमें से ही एक था, जो आज मारने-पीटने की धमकी दे रहा है और गाली बक रहा है। वो भी सिर्फ़ इसीलिए, क्योंकि हेमंत ने ऑपइंडिया के एक लेख का लिंक शेयर कर दिया, जिसमें तबलीगी जमात के लोगों के बारे में ख़बर थी। बता दें कि दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ मस्जिद में छिपे हजारों जमातियों ने पूरे देश भर में कोरोना फैला दिया है और लगातार सैकड़ों मामले रोज सामने आ रहे हैं। कई जगह उन्हें खोजने गए पुलिस पर हमला भी किया गया।

इन्हें भला इलाज की क्या जरूरत, गोली मार देनी चाहिए: जमात की करतूतों पर राज ठाकरे

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने तबलीगी जमात के लोगों की उद्दंडता पर सख्त कार्यवाही की माँग की है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कोरोना संक्रमण की आशंका के चलते क्वारन्टाइन किए गए लोगों द्वारा नर्सों और दूसरे मेडिकल स्टॉफ के साथ जारी अभद्र व्यवहार पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे लोगों को गोली मार देनी चाहिए।

राज ठाकरे ने ऐसे लोगों को दिए जा रहे उपचार पर सवाल करते हुए कहा, “इस तरह के लोगों का इलाज करने की जरूरत ही क्या है? इन्हें बुरी तरह पीटते हुए विडियो बना कर उसे वायरल कर देना चाहिए। जिससे लोगों में सरकार के प्रति कुछ भरोसा पैदा हो।”

प्रधानमंत्री मोदी के 5 अप्रैल को 9 बजे 9 मिनट के लिए घरों की लाइट बंद कर, दीया/मोमबत्ती/मोबाइल फोन टॉर्च जला, कोरोना के खिलाफ देश की संयुक्त पहल दर्शाने की अपील पर राज ठाकरे ने कहा कि बेहतर होता कि प्रधानमंत्री कोरोना के संदर्भ में देश की वर्तमान स्थिति और कोरोना के खिलाफ लड़ाई में देश कहाँ खड़ा है, इस पर कोई बात कहते।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने कहा, “दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में यह तबलीगी जमात वाली मीटिंग लॉकडाउन के वक्त हुई। जमात के इस जमावड़े से कोरोना से जंग को नुकसान पहुँचा। ऐसे लोगों को तो गोली मारकर खत्म कर देना चाहिए। उन्हें भला इलाज की क्या जरूरत? एक अलग कानून बनाकर उन लोगों का इलाज रोक देना चाहिए। यदि वे सोचते हैं कि उनका धर्म देश से बड़ा है और वे कुछ साजिश कर रहे हैं… वे लोगों पर थूक रहे हैं… वे नर्सों से अभद्रता कर रहे हैं… तो उन्हें सबक सिखाने की जरूरत है।”

राज ठाकरे ने मीडिया से बात करते आगे कहा कि यह समय एक दूसरे पर दोषारोपण का नहीं है। न ही ये समय धर्म की बात करने का है। लेकिन मुस्लिम समुदाय के भीतर मौजूद कुछ सेक्शन जिस तरह की बात कर रहे हैं, वो पिटाई माँगते हैं। ठाकरे ने कहा, “उन्हें याद रखना चाहिए कि लॉकडाउन केवल कुछ दिनों के लिए है और उसके बाद हम उनके पीछे होंगे।” ठाकरे ने उन मौलवियों के भी लापता हो जाने की बात कही जो चुनाव के समय तो अपने लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करते खूब दिखते हैं, किन्तु आज अपने लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने की जगह गायब हो रखे हैं।

लॉकडाउन बढ़ने की आशंका भी राज ठाकरे ने जताई। उन्होंने कहा कि यदि लोगों ने अनुशासित व्यवहार नहीं किया तो लॉकडाउन बढ़ाया जा सकता है जो आर्थिक संकट को बढ़ाने वाला होगा। साथ ही ठाकरे ने डॉक्टरों, पुलिस और पानी, बिजली, अनाज आदि की व्यवस्था में लगे दूसरे सरकारी विभागों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि ये सभी अपने जीवन को संकट में डालकर लोगों की सेवा कर रहे हैं।

दिव्यांगों-मजदूरों के लिए रोजाना भोजन और अस्पतालों में ब्लड डोनेशन के लिए आगे आया ‘सक्षम’

जब पूरा देश और दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है, हर ओर से मदद के हाथ आगे बढ़ रहे हैं। इसी प्रयास में सभी 21 तरह की दिव्यांगता में काम करने वाले अखिल भारतीय संगठन समदृष्टि क्षमता विकास एवं अनुसंधान मंडल (सक्षम) ने भी दिव्यांगों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर जारी 21 दिन के लॉकडाउन के पहले दिन से ही ‘सक्षम’ ने दिव्यांगों की मदद के लिए एक टोल-फ्री हेल्पलाइन सेवा 1800111090 शुरू की। इसके माध्यम से दिल्ली में रहने वाले दिव्यांगों को न सिर्फ भोजन बल्कि मेडिकल हेल्प भी दी जा रही है। इसके साथ ‘सक्षम’ गरीब दिहाड़ी मजूदरों को भी दो समय का भोजन उपलब्ध करा रहा है।

‘सक्षम’ द्वारा 24 मार्च से लगातार विभिन्न क्षेत्रों में दिव्यांगों को दोनों पहर का भोजन उनके निवास स्थान पर उपलब्ध कराया जा रहा है। यह कार्य ‘सक्षम’ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य ललित आनंद के मार्गदर्शन में दिल्ली प्रांत अध्यक्ष सतीश अग्रवाल, सचिव गोपाल कृष्ण और ‘सक्षम’ दिल्ली प्रांत कार्यकारिणी के सहयोग से किया जा रहा है।

प्रतिदिन 523 दिव्यांगों और 1200 से अधिक दिहाड़ी मज़दूर, जरूरतमंदों के छोटे-छोटे समूहों में दोनों समय का भोजन वितरित किया जा रहा है। संगठन मेडिकल हेल्प भी जरूरतमंदों तक पहुँचाने का काम कर रहा है। एम्स अस्पताल से इलाज ले रहे लक्ष्मी नगर निवासी रामानुज शर्मा लॉकडाउन की वजह से रूटीन चेकअप के लिए नहीं जा पा रहे थे। उनकी बीपी और पैरालिसिस की दवाएँ खत्म हो गईं थीं। ऐसे में ‘सक्षम’ के वॉलेंटियर्स ने उन्हें उनके घर पर दवाएँ मुहैया कराईं।

‘सक्षम’ के 20 कार्यकर्ताओं की टीम, संगठन की मोबाइल वैन्स के द्वारा दिल्ली के अलग-अलग कोनों में स्थित होस्टल्स में जाकर वहाँ रहने वालों को जरूरी सेवाएँ पहुँचा रहे हैं। जहाँगीरपुरी, बुराड़ी, संतनगर, अमन विहार, पूठ गाँव, जोंती गाँव, संगम विहार, मालवीय नगर झुग्गी बस्ती, कराला, नजफगढ़, नागलोई, रामा विहार, रजापुर गाँव आदि क्षेत्रों में भोजन वितरित किया जा रहा है।

‘सक्षम’ द्वारा किए जा रहे इस पुनीत कार्य में पंचशील क्लब के अध्यक्ष हिमांशु वैश्य, उपाध्यक्ष रज़्जी राय और दिल्ली लंगर सेवा सोसायटी के सरदार गुरविंदर सिंह ढींगरा (विक्की) द्वारा अहम भूमिका निभाई जा रही है। हिमांशी, हरेन्द्र, पूनम और वरुण पंवार का योगदान भी सराहनीय है। ‘सक्षम’ द्वारा किए जा रहे इस पुनीत कार्य की दिल्ली प्रदेश में सराहना की जा रही है।

ब्लड की कमी को दूर करने के लिए ‘प्राणदा’

सक्षम ने कोरोना महामारी के समय में अपने नए प्रकल्प ‘प्राणदा’ की शुरुआत की। दरअसल कोरोना महामारी फैलने की वज़ह से स्वैच्छिक रक्तदान शिविरों का आयोजन बंद हो गया था। इस वजह से ज्यादातर अस्पतालों के ब्लड बैंकों में खून की कमी होने लगी थी।

दिलशाद गार्डन स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल और AIIMS से जानकारी मिली कि ब्लड बैंकों में खून की कमी की वज़ह से थैलेसीमिया और ऐसे ही रुटीन में खून की जरूरत वाले मरीजों के आगे संकट मंडराने लगा है। इसे देखते हुए दिल्ली प्रांत ने गुरु तेग बहादुर अस्पताल में ब्लड बैंक की हेड डॉक्टर प्रियंका गोगोई से बात की। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन की वजह से डोनेशन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में जो लोग मदद करना चाहते हैं, उन्हें ब्लड बैंक डोनर्स को लॉकडाउन के दौरान ‘मूवमेंट पास’ उपलब्ध कराएगा।

इसी कड़ी में सक्षम की ओर से 3 अप्रैल को 2 यूनिट ब्लड डोनेट करवाया गया। ‘प्राणदा’ के लिए सबसे पहले दो डोनर्स बीटेक कर रहे आकांक्षा गौड़ और आदित्य गौड़ बने। उन्होंने जीटीबी अस्पताल जाकर जरूरतमंदों के लिए ब्लड डोनेट किया। आदित्य ने कहा कि पहली बार ब्लड डोनेट करके अच्छा लग रहा है। वह भी ऐसी आपदा के समय में यह पुण्य काम करके सुकून मिला। आदित्य ने कहा कि वो अब नियमित रूप से ब्लड डोनेट करेंगे।

वहीं, आकांक्षा ने कहा कि यह अलग तरह का अनुभव है। ऐसे में, जब दुनिया घर से निकलने में भी डर रही है, ब्लड डोनेशन के लिए घर से निकलने में गर्व महसूस हो रहा है। आज 4 वॉलेंटियर डोनर्स ने और ब्लड डोनेट किया। आने वाले दिनों में इनकी संख्या बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

क्या कर रही है सरकार?

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग ने लॉकडाउन में दिव्यांग समुदाय को ध्यान में रखते हुए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए। जैसे;

  • क्वारंटाइन या आइसोलेशन में रह रहे दिव्यांगों के लिए ज़रूरी खाना, पानी और दवाइयाँ उनके घर तक पहुँचाई जाएँ।
  • दिव्यांगों के परिजनों या उनके लिए काम करने वाली संस्थाओं को ई-पास उपलब्ध कराए जाएँ।
  • कोविड-19 से जुड़ी हर जानकारी स्थानीय और एक्सेसिबल भाषा (ऑडियो, सांकेतिक भाषा और ब्रेल) में उपलब्ध हो।
  • अस्पताल में काम करने वाले और अन्य आपातकालीन सेवाएँ देने वाले लोगों को दिव्यांगों के प्रति संवेदनशील किया जाए।
  • हर सरकारी और निजी संस्थान में ज़रूरी सेवाएँ देने वाले दिव्यांगजनों को पूरे भुगतान के साथ छुट्टी दी जाए।
  • दुकानों में एक तय अवधि में सिर्फ़ दिव्यांगों और बुजुर्गों को खरीदारी की सुविधा दी जाए।
  • किसी भी तरह की मानसिक परेशानी के लिए ऑनलाइन काउंसलिंग 0804611007।
  • 24 घंटे उपलब्ध हेल्पलाइन 011-23978046, 9013151515 जहाँ एक्सेसिबल तरीके से जानकारी मिल सके।

दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग के सोशल मीडिया हैंडल्स (Disability Affairs, @socialpdws) पर सांकेतिक भाषा, ऑडियो और वीडियो के ज़रिए कोविड-19 से जुड़ी कुछ जानकारियाँ भी समय-समय पर दी जा रही है।

धर्मनिरपेक्ष-महाकाव्यमिदं रामायणं धर्मव्यतिरिक्तं न विद्यते अपितु सर्वश्रेष्ठधर्मण: शिक्षक:

यावत् स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्च महीतले।
तावद् रामायाणी गाथा लोकेषु प्रचरिष्यते।।

नेदं कविगुरोर्दम्भोक्तिरपितु त्रिकालाबाधितदृष्टे: महर्षेर्भूतार्थकथनमिदम्। अन्यूनद्विसहस्रवर्षेभ्यो न केवलं भारते वर्षे अपितु द्वीपान्तरेषु अनेकेष्वियं रामायणकथा मनुष्यहृदयानि आवर्जयति। विश्वेऽस्मिन् लौकिकवाङ्मये न दृश्यते ग्रन्थान्तरं यस्य जनानां चरित्रे चिन्तने च इयान् गभीर: प्रभावोऽनुभूयतेति। युक्तमेव आह विपश्चिन्मैक्डोनल महोदय:-

“Probably no work of world literature, secular in origin, has ever produced so profound an influence on the life and thought of a people as the Ramayana.”

रामायणं जनसामान्यस्य आदिमं काव्यम्। वाल्मीकिपूर्ववर्तिसमग्रमपि साहित्यं धर्मप्रवणत्वाद् धार्मिकम् आध्यात्मिकं चाभवत्। रामायणम् आदिमहाकाव्यं महर्षिवाल्मीकिश्चादिकवि: कवीनां गुरु: तथ्यमेतद् उत्तररामचरिते प्रकृष्टतया उद्धृतम्- “ऋषे! आद्य: कविरसि। आम्नायादन्यत्र नूतनश्छान्दसामवतार:”

धर्मनिरपेक्षमहाकाव्यमिदं धर्मव्यतिरिक्तं न विद्यते अपितु सर्वश्रेष्ठधर्मण: शिक्षक:। रामायणमहाकाव्यं मानवताधर्मं शिक्षयति। रामायणस्य नायको मर्यादापुरुषोत्तमश्रीरामचन्द्र: शबर्या: हस्तेन बदरीफलं भुक्त्वा शिक्षयति यत् नास्ति जगति कोऽपि जन: अस्पृश्य:। सर्वेऽपि मनुष्या: समानताधिकारिण:।

विपुले संस्कृतवाङ्मये रामायणं बीजरूपमहाकाव्यम्। उत्तरवर्तीनां काव्यानाम् उपजीव्य अयं ग्रन्थ:। न केवलं संस्कृतभाषायां अपितु अनेकासु भाषासु रामायाणमाश्रित्य काव्यानि प्रवृत्तानि। वस्ततस्तु रामायणमेव गीतिकाव्यस्य आधारभूतं काव्यं महाकाव्यानां विकासपरम्परायां आदिमं सोपानम्।

वाल्मीकिरेव तादृशो प्रगतिशीलो लोकभावाभिज्ञ: सरसभावानुविद्धो मानवमनोविज्ञानविदग्ध: कविरासीद् यो रामचरितं आश्रित्य लौकिकभावमयं महाकाव्यं रचितवान्। सहजतया एव उपदेशं कृतवान् – रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत्। नवरसरुचिरा इयं कृति: रसानां समावेशाद् जनसामान्यस्य चित्तं आकर्षति। प्रमुखतया करुणरसस्य चाभिव्यक्तौ चरमोत्कर्षत्वं लक्ष्यते। किमधिकं रामायणस्य आविर्भाव: करुणरसादेव-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।


करुणरसप्राधान्यादेव रामायणं जनानां हृत्प्रियं काव्यम्। रामायणं न केवलं रामचरितमेव प्रस्तौति अपितु रामायणे दर्शन-उपनिषद्-स्मृति-नीतिशास्त्र-विज्ञान-मनोविज्ञान-आयुर्वेद-धनुर्वेदानां सार: तत्संबद्धा उपयोगिनो विषयाश्च प्रकीर्णरूपेण परिचर्चां भजन्ते।

रामायणं परमपवित्रं महाकाव्यं भारतीयसाहित्यस्य विश्वजनीनवाङ्मयस्य च कीर्तिस्तंभरूपम्। परमपूता अयोध्यानगरी भगवत्पादन्यासनिर्मला भारतवर्षस्य शोभां वर्धयति। रामायणस्य पवित्रतामनुभूय केचन मनीषिणः मन्यन्ते- “एकैकमक्षरं पुन्सां महापातकनाशनम्”।

रामायणस्य तादृशी लोकप्रियता यथा न केवलमेतद् विदुषामेव विभूषणं अपि तु सामान्यरूपेण सर्वजनानां धनिनां-निर्धनानां विदग्धानामज्ञानाम्, पुरुषाणां स्त्रीणां आबालवृद्धानां कण्ठाभरणतां आपद्यते। भारतीयमहापुरुष-चरित्रचित्रणात् सर्वेषां पूज्येयं कृति:। न केवलं भारते सकलेऽपि विश्वे श्रीरामचन्द्र: आदर्शरूपेण मूर्धास्थानं भजते। आचारसंहितारूपेण इदं सर्वत्र आद्रियते, भक्तानां भवनेषु च प्रतिदिनं पारायाणिक्रियते, अत एव उच्यते त्रिविक्रमभट्टेन-

सदूषणामपि निर्दोषा, सखरापि सुकोमला।
नमस्तस्मै कृता येन, रम्या रामायाणी कथा।।

रामायाणी कथा गङ्गासदृशी जनानां क्लेशकष्टनिवारणी। रामायणस्य पाठेनैव जना: स्वजीवनं वाक्साफाल्यं च मन्यन्ते। महाकवितुलसीदासोऽपि अवधिभाषामाध्यमेन रामचरितस्य लेखनं चकार। तस्य रामचरितस्य पाठ: आवर्षं भक्तगृहेषु श्रोतुं शक्यते। अनेन ज्ञायते यत् रामचन्द्रस्य चरित्रं मनुष्येषु तावद् उन्नतं स्थानं प्राप्तवदस्ति न तावत् अन्यस्य कस्यापि महापुरुषस्य।

न केवल: भगवान् श्रीरामचन्द्र: अपितु मिथिलानरेशस्य पुत्री सीता अपि जनेषु मातृतुल्या आदृता। पतिव्रतेयं सर्वासां स्त्रीणां मध्ये आदर्शरूपा। तस्या: जीवनं स्वच्छशुभ्रहिमसदृक्पवित्रं जन्मस्थानमपि यज्ञभुमिरेव मन्यते । अत एव पवित्रताशिरोमणिं तां जना:”सीता माता” इति सादरं व्यवहरन्ति। अत एव इयं रामायाणी गङ्गा भुवनत्रय पावनीति प्रशस्यते –

वाल्मीकिगिरिसंभूत, रामाम्भोनिधिसंगता।
श्रीमद् रामायाणी गङ्गा, पुनाति भुवनत्रयम्।।

नर्सों के सामने नंगे हुए जमाती: वायर की आरफा खानम का दिल है कि मानता नहीं

प्रोपेगेंडा वेबसाइट द वायर की वरिष्ठ संपादक आरफा खानम शेरवानी को तबलीगी जमात के सदस्यों की नंगई पर यकीन नहीं हो रहा। उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से एमएमजी हॉस्पिटल में नर्सों के सामने जमात के सदस्यों के पतलून उतारने की खबरें झूठी हैं। आरोप लगाने वाली नर्सें प्रोपेगेंडा में शामिल हैं। यह दूसरी बात है कि एडीएम और एसपी के ज्वाइंट इन्वेस्टीगेशन में नर्सों के आरोप सही पाए गए हैं और इस तरह की हरकत करने वाले जमात के 5 सदस्यों पर मुकदमा भी दर्ज किया गया है।

लेकिन, आरफा ने यह मानने से इनकार कर दिया है कि तबलीगी जमात वाले महिलाओं के साथ बदसलूकी या उनका शोषण कर सकते हैं। उसने ट्वीट कर रहा है, “वे नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाले लोग हैं, जो मजहब/समाज की सेवा के लिए दुनियादारी, यहॉं तक कि अपने परिवार से भी दूर रहते हैं।” आगे आरफा ने जोर देकर कहा है कि प्रोपेगेंडा अब बंद होना चाहिए।

आरफा ने चिर-परिचित विक्टिम कार्ड से भी तबलीगी जमात के करतूतों पर पर्दा डालने की कोशिश की है। उसके मुताबिक तबलीगी जमात को जिस तरह मीडिया निशाना बना रहा है वह सही नहीं है। इसके बहाने पूरे समुदाय को नीचा दिखाया जा रहा है। उसने कहा, “खुदा न करे लेकिन जमात के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की वजह से यदि मुस्लिमों पर हमला होता है तो मीडिया का प्रोपेगेंडा और अधिकारियों की चुप्पी इसके लिए जिम्मेदार होगी।”

आरफा भले तबलीगी जमात के सदस्यों की बदसलूकी पर यकीन न करें लेकिन सच्चाई यही है कि नर्सों ने इसकी शिकायत की थी। नर्सों ने उनके आपत्तिजनक व्यवहार की लिखित शिकायत की है। नर्सों ने शिकायत में कहा है कि वार्ड में जमात के सदस्य नंगा होकर घूमते हैं। उन पर फब्तियॉं कसते हैं। अश्लील गाने सुनते हैं। दवा लेने से इनकार करते हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि जमाती सफाई कर्मचारियों से बीड़ी-सिगरेट भी मॉंगते हैं और उनको परेशान करते हैं। उनसे एक-दूसरे से दूर रहने को कहा जाता है तो वे साथ में बैठकर बात करते हैं।

नर्सों की लिखित शिकायत

एएमजी अस्पताल के सीएमओ ने पुलिस से की गई शिकायत में भी यही बातें कही है। उन्होंने शिकायत में कहा है कि इस तरह की स्थिति के कारण हॉस्पिटल में उनका इलाज करना संभव नहीं हो पा रहा है। पुलिस से उन्होंने उचित कार्यवाही करने की गुहार लगाई थी ताकि उपचार में परेशानी न हो।

एमएमजी अस्पताल के सीएमओ द्वारा की गई शिकायत

जॉंच में ये आरोप सही पाए गए हैं। एडीएम और एसपी ने जॉंच के दौरान पाया कि जमात के लोग हॉस्पिटल में न तो दवा खा रहे थे और न ही अपने बिस्तर पर रह रहे थे। वो नर्सों को देख कर अश्लील गाने भी गए रहे थे। वो स्टाफ से बीड़ी-सिगरेट और पान मसाले की माँग कर रहे थे। जाँच के दौरान नर्सों ने अधिकारियों को बताया कि जमाती उनकी तरफ देख कर अश्लील इशारे कर रहे थे और हँस रहे थे। उन्हें समझाने की कोशिश भी की गई लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद सीएमओ से शिकायत की गई।

आरफा जिन लोगों का बचाव कर रही हैं उनकी करतूतें केवल एक अस्पताल तक ही सीमित नहीं है। यूपी के अलग-अलग जिलों से जमातियों द्वारा हॉस्पिटल में बदतमीजी किए जाने की ख़बरें आ रही हैं। बिजनौर में 8 इंडोनेशियाई जमातियों ने अंडा-करी और बिरयानी की माँग की थी। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों के साथ भी अभद्रता की थी। बस्ती और आगरा में भी बिरयानी माँग कर हॉस्पिटल कर्मचारियों को परेशान किया। मुरादाबाद में जमातियों ने दाल-रोटी खाने से इनकार कर दिया। दिल्ली के एलएनजेपी हॉस्पिटल और हैदराबाद के गॉंधी हॉस्पिटल में इनके उपद्रव के बाद पुलिस की तैनाती करनी पड़ी। इनलोगों ने सड़कों पर, अस्पतालों में, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों पर थूक कर संक्रमण तक फैलाने की कोशिश की है। देश में जो नए मामले सामने आए हैं उनमें आधे से अधिक तबलीगी जमात के निजामुद्दीन स्थित मरकज से जुड़े हैं।

ऐसे में आरफा की प्रतिक्रिया से साफ है कि उम्माह के आगे उनके लिए कुछ भी मायने नहीं रखता। महिलाओं का सम्मान भी नहीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नारी अधिकारों की कथित पैरोकार वामपंथी और मीडिया गिरोह के दूसरे सदस्य महिलाओं के इस उत्पीड़न और तबलीगी जमात की करतूतों का किस तरह बचाव करते हैं।

प्रार्थना में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं: और शशि थरूर जी… Covid-19 की लड़ाई राम भरोसे नहीं छोड़ी गई है

प्रकाश मानव सभ्यता की पहली सभ्य खोज और आशा की अंतिम किरण है। मोदी जी ने पाँच अप्रैल को शाम नौ बजे इसी प्रकाश से सामाजिक समरसता को ज्योतित करने का आह्वान किया है। इसे सुनकर बहुत-से लोग बहुत खुश हुए और बहुतों को ये रास नहीं आया। शायद उन्हें ये कम वैज्ञानिक लगा।

दरअसल बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक सोच के दावेदार जब छोटे-छोटे निजी आग्रहों से ग्रस्त हो जाते हैं तो सबसे पहले वो अपनी सामान्य समझ (Common Sense) को खो देते हैं। समस्या की प्रकृति को समझना और उसका विवेकपूर्ण विश्लेषण करना सभी वैज्ञानिक अनुसंधानों के प्रारम्भिक चरणों में से एक है, किन्तु शायद हमें इन्हें प्रयोगशाला में ही बंद कर ताला लगा देना होता है, उनका वहाँ से बाहर आना और बाक़ी जगहों पर लागू होना शायद मना है।

बड़ा वैज्ञानिक दकियानूसीपन है? प्रधानमंत्री ने कहा कि जब सभी एक साथ घरों की बालकनियों से दीपक जलाएँगे तो उनको लगेगा कि वो अकेले नहीं हैं, सबका हौसला बढ़ेगा, निराशा कुछ कम हो जाएगी। निश्चित रूप से किसी भी सकारात्मक सामूहिक गतिविधि का ऐसा परिणाम होता ही है, सभी पर्वों-त्यौहारों का यही मकसद है। लेकिन कुछ अति वैज्ञानिक विचारकों को उम्मीद थी कि दीपक में से अलग-अलग स्कीमें निकलेंगी या योजनाओं की फुलझड़ियाँ फूटेंगी। यानी जब LEO Satellite प्रक्षेपित की जाती है तो आप उससे GEO के परिणामों की उम्मीद करते हैं।

ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। शशि थरूर जैसे अति-शिक्षित व्यक्ति ट्वीट कर आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री ने Covid-19 की लड़ाई को राम भरोसे छोड़ दिया है। आदरणीय शशि थरूर जी! मोदी जी ने घर में खाली बैठे लोगों को मोमबत्तियाँ जलाकर एकता प्रकट करने के लिए प्रेरित किया है, डॉक्टर्स या सुरक्षाकर्मियों को नहीं। वो अपना काम करते रहेंगे। रही राम भरोसे की बात, तो जब हम कठिन लड़ाइयाँ लड़ते हैं, विशेषरूप से ऐसी लड़ाइयाँ जिनके परिणाम के बारे में हम सुनिश्चित नहीं हैं, तब हम अपना प्रयास नहीं छोड़ देते बल्कि छोड़ते हैं सिर्फ फल की कामना को। अब चाहे इसे राम भरोसे छोड़ना कहें या नैतिकतापूर्ण समझदारी।

नैतिकतापूर्ण इसलिए क्योंकि कम उम्मीद होने पर भी व्यक्ति उसे अपना कर्त्तव्य मानकर करता रहता है। भारतीय दर्शन की सबसे प्रसिद्ध सूक्ति है- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ सभी वैज्ञानिक परीक्षण इसी जुझारूपन का परिणाम हैं। जब एक वैज्ञानिक किसी फल की अथवा सफलता-असफलता की परवाह न करता हुआ अपने प्रयोगों में लगा रहता है तब वो गीता के इसी आदर्श का पालन कर रहा होता है।

कुछ लोग इस फैसले पर ऐसे हैरान हैं मानो सरकार ताली और थाली के अलावा कुछ कर ही नहीं रही हो। बहुत-से ऐसे कदम हैं, जो सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए उठा रही है। यहाँ उनका जिक्र करने का तुक नहीं है, आप स्वयं उनकी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। निजामुद्दीन मरकज की दुर्घटना को छोड़ दें तो भारत इस दिशा में सही प्रगति कर रहा था।

जाहिर है कि हमारे देश में कोरोना के इलाज़ को ताबीज पहनने जैसे टोने-टोटकों के भरोसे नहीं छोड़ा गया है, अपितु व्यावहारिक स्तर पर ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। भारत के चिकित्सक रोगियों का इलाज़ और चिकित्सा विज्ञानी औषधियों का अनुसंधान अद्यतनीन वैज्ञानिक विधियों से ही कर रहे हैं। लेकिन वो भी इंसान हैं और दिन-रात की परवाह किए बिना अपने काम पर लगे हैं। उनके इंसानी सामर्थ्य की सीमाओं को और भी विस्तृत करने के लिए यानी उनका उत्साहवर्द्धन करने के लिए इस तरह के कदम उठाए जाते हैं।

जो लोग घरों में अकेलापन और भय महसूस कर रहे हैं, उनके सूनेपन को दूर करने के लिए ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं। मोदी एक राजनेता हैं। लोकतंत्र में राजनेता जननेता होता है, तो स्पष्ट है कि जनता के मनोबल को ऊँचा रखना उनका मुख्य काम है, चाहे वो ताली से हो, थाली से हो या मोमबत्ती से। काश विज्ञान की दुहाई देने वालों में ज़रा भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता।

जनभावनाओं की अवहेलना करके बड़े-बड़े राजनेता अपनी राजनैतिक जमीन खो चुके हैं क्या इसे जारी रखकर अब वो अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता को भी दाँव पर लगाना चाहते हैं? वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी जन-मन का भरपूर ख़याल रखते हैं और उनके मन की बात करने की कोशिश करते हैं। क्या आप जानते हैं किसी के मन की बात पहचानने को क्या कहते हैं? मन:पाखण्ड? नहीं, ऐसा कोई शब्द नहीं होता। इसे मनोविज्ञान कहते हैं। मतलब ये भी एक विज्ञान है।

जहाँ तक दिया-बाती, प्रार्थनाओं और दुआओं का प्रश्न है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो यही कहता है कि सब काम पुरुषार्थ से ही होते हैं। प्रार्थना तो पुरुषार्थ को बल और प्रेरणा देती है। ये पुरुषार्थी व्यक्ति के मनोबल को ऊँचा रखने में सहायता प्रदान करती है और हम जानते हैं कि सहायता मुख्य क्रिया नहीं होती, चाहे कितनी भी आवश्यक क्यों ना हो, वो तो सहायक क्रिया ही है।

इसलिए प्रार्थना पुरुषार्थ का स्थगन नहीं है और यही वजह है कि प्रार्थना में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं है। Covid-19 को रोकने के सभी प्रयास हमारी शुभकामनाओं से बल पाएँगे और हमें निर्धारित निर्देशों का पालन करने की प्रेरणा देंगे। दवा हमारे शरीर की और दुआ हमारे मन की इम्यूनिटी को बढ़ाती है।

इस प्रसंग में ऋग्वेद की एक ऋचा बहुत ही अनुकूल है- ‘इच्छन्ति देवा: सुन्वंतं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति’, जिसे हम आम भाषा में कहते हैं- ‘ईश्वर भी उसी की सहायता करता है, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। इसलिए लॉकडाउन और अन्य सभी निर्देशों का पालन करना हमारा कर्त्तव्य है, जिसे पूरी तरह से निभाना है। प्रार्थना की भूमिका इतनी है कि ये आपको कठिन समय में निराश होने से बचाती है, सामान्य स्थितियों में अकर्मण्य होने से रोकती है, खुशी-खुशी अपने कर्त्तव्य के पालन के लिए उत्साह देती है।

सबसे बड़ी बात ये है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना अपनी इस भूमिका को सौ प्रतिशत निभाती है, आजमा कर देखिए आपको आश्चर्य तो होगा लेकिन इस आश्चर्य में प्रबल प्रेरणा छुपी होगी, जो आपके काम आएगी।

प्रधानमंत्री ने सभी धर्मगुरुओं से अपने अनुयायियों को समझाने और उन्हें परामर्श देने की अपील की है। साम्प्रदायिक उन्माद में जिस तरह तबलीगी जमात ने कोरोना का आतंक फैलाया है, ऐसे में ये अपील बहुत मायने रखती है। आशा है सभी धर्मगुरु अपना कर्त्तव्य सक्रियता से निभाएँगे लेकिन मैं आपके साथ कुछ ऐसी प्रार्थनाएँ साझा करना चाहती हूँ, जो पूर्णत: पंथनिरपेक्ष हैं, जिनमें किसी मत-पंथ के लोगों के लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए हितकामना की गई है।

ये प्रार्थनाएँ विश्व साहित्य के आदिग्रंथ वेदों में उद्धृत हैं। वेद अथाह ज्ञान की राशि हैं किन्तु आइए हम आज की परिस्थिति में जरूरी कुछ प्रार्थनाओं पर गौर करें। निरंतर उत्साह और जिजीविषापूर्वक परिश्रम करने की कामना से युक्त ऋग्वेद का यह मंत्र देखें- ‘मा भेम मा श्रमिष्म’ अर्थात् हम किसी भी परिस्थिति में डरें नहीं, थकें नहीं।

सभी के स्वस्थ एवं निरोगी होने की शुभकामना लिए यजुर्वेद की प्रार्थना का एक स्वर सुनिए- ‘विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्’ अर्थात् इस गाँव में सब पुष्ट और निरोग रहें। हम वेद के इन शब्दों से प्रेरणा लेकर अपने-अपने परिवेश के स्वस्थ वातावरण के लिए कामना करते हुए उसके लिए प्रयास कर सकते हैं।

इन्द्रियों के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के साथ कम से कम सौ वर्ष और उससे भी अधिक आयु की प्रार्थना से ओतप्रोत एक वेदमंत्र- ‘पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शतं शृणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शातात्।’

एक और बहुत ही समावेशी प्रार्थना, मानो इंसान की सभी यथासंभव खुराफातों का शिकार होने वाली वस्तुओं का परिगणन कराती हुई सर्वत्र शान्ति की कामना करती है – ‘द्यौ: शान्तिरंतरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वं शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि।’

इसका भावानुवाद कुछ इस तरह से है-

“शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में , जल में स्थल में और गगन में
अंतरिक्ष में अग्नि पवन में, औषधि वनस्पति वन-उपवन में
और जगत के हो कण-कण में, शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में।

अंत में ऋग्वेद की सबसे अंतिम वो ऋचाएँ, जो पाँच अप्रैल के इस आयोजन की प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा की गई व्याख्या को संबल देती हैं। यानी एकत्व, सामंजस्य और संगठन की प्रार्थना- ‘संगच्छद्ध्वं सम्वदद्ध्वं सं वो मनांसि जानताम्।’

हे प्रभो! व्यापक संकट की इस घड़ी में हमें मिलकर चलने, मिलकर बोलने और मिलकर सोचने की शक्ति प्रदान कीजिए।

क्योंकि एक छोटे से अवयव-संस्थान शरीर में भी अगर सामंजस्य समाप्त हो जाए तो व्यक्ति रोगी हो जाता है, राष्ट्र और मानवता तो एक बड़ी इकाई है। इसमें यदि समरसता ख़त्म हो गई तो आशा की किरण जाती रहेगी। वैश्विक आपदा के इस अंधकारमय वातावरण में आशाओं, विश्वासों और समभावों के दीपक ही विजय के प्रकाशस्तंभ बन सकते हैं।

‘लॉकडाउन लगाना मोदी सरकार का साहसिक फैसला, वरना तेजी से फैलती महामारी, भुगतने पड़ते गंभीर परिणाम’

मोदी सरकार द्वारा कोरोना के खिलाफ जंग लड़ने के लिए देश में लागू किए गए 21 दिनों के लॉकडाउन के फैसले पर भले ही विपक्षी पार्टियाँ तरह-तरह के सवाल खड़े कर रही हों, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के विशेष दूत डॉक्टर डेविड नाबरो ने सरकार के इस कदम की सराहना की है। साथ ही डॉक्टर डेविड ने कहा है कि सरकार का यह कदम दूरगामी सोच का परिणाम है, जो कि कोरोना के खिलाफ जंग लड़ने में सहायक सिद्ध होगा।

हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक WHO के विशेष दूत डॉक्टर डेविड नाबरो ने कहा कि भारत में लॉकडाउन को उस समय पूरी तरह से लागू कर दिया गया था, जब भारत में बहुत कम कोरोना के मामले सामने आए थे। इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि निश्चित तौर पर यह भारत सरकार का दूरगामी फैसला था। यही कारण है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में यह महामारी तेजी से नहीं फैल सकी। वहीं समय से इस कठोर फैसले को लेने के कारण देशवासियों को इसके खतरे का ठीक से पता चल जाएगा।

डॉक्टर डेविड ने आगे कहा कि सरकार का यह एक साहसिक फैसला है। इससे महामारी को स्थानीय स्तर पर रोकने में काफी मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर देश में इसे देरी से लागू किया होता तो शायद भारत जैसे देश में को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते। तीन हफ्ते का लॉकडाउन भारत की बिल्कुल सही रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने अमेरिका जैसे देश की ओर इशारा करते हुए कहा कि कुछ देशों में लॉकडाउन का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।

आपको बता दें कि चीन से निकले कोरोना वायरस के भारत में पहुँचने से पहले ही मोदी सरकार ने इसके बचाव के लिए तमाम तरह की तैयारियाँ कर लीं थी। इतना ही नहीं, देश में हुई कुछ मौत के बाद सरकार ने देशवासियों से एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू का आह्वान करके लोगों के मन को भी टटोल लिया था और इसके बाद 24 मार्च को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में 21दिनों के लिए पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया था।

सरकार के इस फैसले का आम लोगों ने तो खूब सराहा, लेकिन विपक्षी दलों ने इसकी अपने-अपने तरीके से आलोचना भी की थी। हालांकि देश में लॉकडाउन घोषित होने के बाद गरीब-मजदूरों को तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए इस सभी समस्याओं को राज्य सरकारों के साथ मिलकर समय रहते ही निपटा लिया। एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से 5 अप्रैल को रात 9 बजे घर सभी लाइटें बंद करके 9 मिनट दीपक, मोमबत्ती जलाने की अपील की है।