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मदरसे में पढ़ने वाली 12 साल की बच्ची से रेप करता था मौलाना, प्रेगनेंट हुई तो खुल गया राज

झारखंड के रांची में मदरसे में पढ़ने वाली 12 साल की एक बच्ची से रेप का मामला सामने आया है। आरोपित मौलाना शाहिद है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शाहिद ने बच्ची से कई बार रेप किया। जब वह गर्भवती हो गई तो उसका जबरन गर्भपात करा दिया गया। जिस मदरसे में यह घटना हुई है वहॉं 100 से अधिक बच्चियॉं तालीम ले रही थीं थे। मामला सामने आने के बाद लोग अपनी बच्चियों को वापस घर ले जा रहे हैं। पुलिस ने आरोपित मौलाना को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

घटना रांची के मांडरा थाना क्षेत्र की है। आरोपित शाहिद अपने घर में ही मदरसा चलाता था। बच्ची के मुताबिक बकरीद की नमाज के बाद मौलाना उसे कमरे में ले गया और रेप किया। इसके बाद वह लगातार उसके साथ रेप करता रहा। मुॅंह खोलने पर उसने बच्ची को जान से मारने की धमकी दी। पिछले दिनों पीड़िता की तबीयत अचानक खराब हुई तो मौलाना ने उसे उसके घर भेज दिया।

परिजन जब बच्ची को अस्पताल ले गए तो डॉक्टरों ने उसे गर्भवती बताया। इस बात को सुन परिजनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। बच्ची से पूछताछ के बाद पता चला कि मौलाना उसके साथ पिछले काफी समय से दुष्कर्म कर रहा है। इसके बाद मौलाना ने बच्ची के परिजनों से 85 हजार रुपए में सौदा कर जबरन गर्भपात करवा दिया और मामले को दबाने की कोशिश की। इस मामले के लेकर गॉंव में पंचायत हुई। पंचायत में कोई समाधान नहीं निकला तो परिजनों ने आरोपित के ख़िलाफ मामला दर्ज करवाया।

परिजनों द्वारा आरोपित के खिलाफ थाने में की गई शिकायत के बाद पुलिस ने पीड़िता को मेडिकल जाँच के लिए अस्पताल भेज दिया और आरोपित मौलवी शाहिद के खिलाफ में मुकदमा दर्ज कर लिया। इसके बाद थाना पुलिस ने आगे की कार्रवाई करते हुए बीते दिनों दुष्कर्म के आरोपित मौलवी शाहिद अंसारी को गिरफ्तार कर लिया, जहाँ से उसे मंगलवार को पुलिस ने जेल भेज दिया गया।

भास्कर में प्रकाशित खबर के मुताबिक मदरसा में 100 बच्चियाँ पढ़ती हैं, लेकिन जैसे ही परिजनों को मौलाना के करतूतों के बारे में पता चला है उसके बाद अधिकांश परिजन मदरसे से अपनी बच्चियों को अपने साथ ले जा चुके हैं। वहीं थाना प्रभारी राणा जंग बहादुर सिंह ने बताया कि शाहिद पर पोस्को एक्ट के आलावा धारा 376, 313 और गर्भपात कराने का भी मुकदमा दर्ज किया गया है। वहीं पुलिस यह पता लगाने में जुटी हुई है कि आरोपित ने दूसरी किसी बच्ची के साथ तो ऐसा नहीं किया। आरोपित मौलाना 3 बच्चों का बाप है।

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दिल्ली हिंसा: अपनी दुकान में बैठा था 19 साल का विवेक, दंगाइयों ने सिर में ड्रिल मशीन से कर दी छेद

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा के शिकार हुए लोगों की झकझोर देने वाली कहानियॉं सामने आ रही है। दंगाइयों ने 19 साल के एक हिंदू लड़के पर हमला किया और उसके सिर में ड्रिल मशीन से छेद कर दी।

सीएनएन-न्यूज़ 18 की रिपोर्टर पायल मेहता के अनुसार, लड़के का नाम विवेक है। उस पर मंगलवार को हमला किया गया। हिंसक भीड़ ने ड्रिल मशीन उसके सिर में घुसा दी। इसके बाद उसकी सर्जरी जीटीबी अस्पताल में हुई। अब विवेक की हालत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। बता दें, विवेक पर हिंसक भीड़ ने उस समय हमला किया जब वो अपनी दुकान के भीतर था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टर ने बताया कि लड़के की सर्जरी कल रात की गई है। फिलहाल यह बताना मुश्किल है कि उसे ठीक होने में कितना वक्त लगेगा। न्यूज 18 पत्रकार पायल मेहता ने विवेक को लेकर ये जानकारी अपने ट्वीट के जरिए शेयर की। उन्होंने बताया कि लड़के की हालत अभी स्थिर है, उसने खाना खाया है और बात भी कर रहा है।

गौरतलब है कि इस घटना से पहले कल एक अन्य विडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही थी। विडियो में देखा गया था कि 2-3 लोग एक हिंदू के शव को मुस्लिमों की भीड़ से दूर लेकर जा रहे हैं। लेकिन मुस्लिमों की भीड़ अचानक से गली के बाहर आकर अल्लाहु अकबर और नारा-ए-तकबीर का नारा लगाने लगती है। सोशल मीडिया से पता लगा था कि मृतक युवक का नाम विनोद है।

इसके बाद इसी मामले से संबंधित एक और विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। वीडियो में ब्रह्मपुरी इलाके के आसपास रहने वाले एक शख्स को कहते सुना जा सकता है कि मुस्लिमों ने विनोद का शव भेजा है और संदेश दिया है कि हिंदू के शव उन्हें इसी तरह पूरी रात मिलेंगे।

बता दें, उत्तर पूर्वी दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाकों में भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में अब तक 20 लोगों की जान जा चुकी है। 250 से ज्यादा लोग घायल हैं। सुरक्षाबल के जवान प्रभावित क्षेत्रों में दंगाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर हालात सामान्य करने की कोशिश में लगे हैं। उपद्रवी लगातार जान-माल को नुकसान पहुँचा रहे है।

नोट: सोशल मीडिया में कई तरह के विडियो और तस्वीरें पोस्ट हो रहे हैं। ऑपइंडिया इनकी पुष्टि नहीं करता। इस मुश्किल वक्त में धैर्य बनाएँ रखें और प्रशासन को हालात पर काबू पाने में सहयोग करें।

बालाकोट में 189 साल पहले भी हुआ था एक ऑपरेशन, तब हूरों के चक्कर में मारे गए थे 300 जेहादी

भारतीय वायुसेना द्वारा पिछले साल बालाकोट स्थित आतंकी ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद बालाकोट के नाम से हर व्यक्ति परिचित हो गया। इस घटना से पहले शायद ही किसी आम व्यक्ति ने बालाकोट के बारे में जानने में दिलचस्पी जताई होगी। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि 2019 का एयरस्ट्राइक बालाकोट में आतंकियों के सफाए का पहला ऑपरेशन नहीं था। करीब 189 साल पहले भी महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने बालाकोट की जमीन से 300 मुजाहिदीनों का सफाया किया था।

दरअसल, बालाकोट आज से नहीं बल्कि पिछले क़रीब 200 सालों से आतंकवाद का केंद्र रहा है। यहीं से जिहादियों की शुरूआत हुई थी जिसकी नींव सैयद अहमद शाह बरेलवी द्वारा रखी गई थी। स्वयं को इमाम घोषित कर बरेलवी ने जिहादियों की ऐसी फौज़ तैयार की थी, जो भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी हुकूमत कायम करना चाहते थे।

पाकिस्तानी लेखिका आयशा जलाल ने सैयद का जिक्र अपनी किताब पार्टिसंस ऑफ अल्लाह (Partisans of Allah) में भी किया है। सैयद बरेलवी का लक्ष्य भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी हुकूमत को स्थापित करना था। इसलिए उसने महाराजा रणजीत सिंह की सेना के ख़िलाफ़ जिहादियों को बड़ी तादाद में एकत्रित किया। बरेलवी ने अपनी जिहादी नीतियों से महाराजा को तंग कर रखा था जिसके कारण ही महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पुत्र के नेतृत्व में पेशावर पर कब्जा करके उसे अपने राज्य से जोड़ा था।

पाकिस्तानी लेखक अजीज अहमद के अनुसार वर्तमान रायबरेली (यूपी) के रहने वाले सैयद अहमद शाह (1786-1831) ने ही बालाकोट को जिहाद का जन्मस्थली बनाया। जिहाद की शुरुआत के लिए बालाकोट का चुनाव बरेलवी द्वारा इसलिए भी किया गया था, क्योंकि उसका मानना था कि यह जगह पहाड़ों से घिरी हुई है और दूसरा इसके एक ओर नदी है जिसके कारण किसी का भी यहाँ पर पहुँचना बेहद मुश्किल होगा।

सैयद बरेलवी जानता था कि देश में अग्रेज़ों की हुकूमत से लड़ पाना उसके लिए तत्कालीन परिस्थितियों में मुश्किल था, इसलिए उसने उनके ख़िलाफ़ किसी प्रकार के जिहाद की घोषणा नहीं की। साथ ही अंग्रेज भी सैयद की इन खतरनाक गतिविधियों को जानने के बाद चुप थे क्योंकि उनका मानना था कि सैयद और उसके द्वारा तैयार किए जा रहे जिहादी लड़ाके सिख राज्य को कमजोर कर देंगे, जिससे की अंग्रेज़ों को ही फायदा पहुँचेगा। नतीजतन 1824 से 1831 तक जिहादी बालाकोट में सक्रिय रहे।

दरअसल, सैयद अहमद शाह ने राजा रणजीत सिंह द्वारा अज़ान और गौतस्करी पर प्रतिबंध लगाने की बात सुनकर जिहाद की घोषणा कर दी थी। जिस समय पर बरेलवी बालाकोट पहुँचा उस समय उसके साथ 600 जिहादी थे और पेशावर के हज़ारों पठानों द्वारा भी उसे समर्थन दिया जा रहा था।

स्वभाव से कट्टर विचारधारा वाले सैयद के बारे में एलेक्सेंडर गार्डनर ने बताया था कि उसने मात्र 30-40 रुपए के लिए अपने साथी को मौत के घाट उतार दिया था ।

सैयद से तंग आकर महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने बालाकोट की एक पहाड़ी के पास डेरा डाल लिया। जिसके बाद सैयद ने वहाँ धान के खेतों में पानी अधिक मात्रा में डलवा दिया ताकि जब वह हमला करने आएँ तो उनकी गति धीमी पड़ जाए।

दोनों पक्ष एक दूसरे पर हमला करने के लिए कई दिनों तक इंतज़ार करते रहे और एक दिन एक अज़ीबोगरीब घटना हुई जिसने सिख सेना को मुजाहिदीनों को मार गिराने का मौक़ा दे दिया। दरअसल, 6 मई 1831 के दिन एक जिहादी अपना दिमागी संतुलन खो बैठा और उसे अपने सामने हूरें दिखाई देने लगीं। वो एकदम से चिल्लाते हुए भागा कि उसे हूर बुला रही है और जाकर उन्हीं धान के खेतों में फँस गया जिसे सिख सेना के लिए जाल की तरह बिछाया गया था। मौक़े को परखते हुए सिखों की सेना ने उसे अपनी बंदूक का निशाना बनाकर मार गिराया। उन मुजाहिदीनों में हूरों के पास पहुँचने वाला चिराग अली पहला नाम था।

इसके बाद सिख सेना ने सभी मुजाहिदीनों को ढेर करना शुरू कर दिया। उस दौरान भी इस युद्ध में क़रीब 300 से ज्यादा जिहादियों को सिखों की सेना ने हूरों के क़रीब पहुँचाया था जिनकी कब्रें आज भी वहाँ पर मौजूद हैं। 189 साल बाद उसी जगह भारतीय वायुसेना ने वही घटना बीते साल दोहराई। अंतर केवल इतना था कि जिहादियों की जगह पर जैश-ए-मुहम्मद के 300 आतंकियों का सफाया हुआ और सिख सेना की जगह IAF ने विजय की पताका हवा में फहराई थी।

जरा सोचिए! जिहाद की शुरूआत करने वाले सैयद को भले ही महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने मार गिराया हो। लेकिन आज के समय में आतंकवाद का लगातार बढ़ना कहीं न कहीं उसके द्वारा तैयार किए जिहादियों के प्रचार-प्रसार का ही नतीजा है। आए दिन न जाने कितने आतंकियों को मार गिराए जाने की खबरें हमें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं लेकिन बावजूद इसके आतंक खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। बालाकोट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए ही शायद आतंकी संगठन जैश ने अपने आतंकियों के लिए यहाँ पर प्रशिक्षण केंद्र खोला था। ये केंद्र आम जनता की पहुँच से दूर पहाड़ों पर था। इसे पिछले साल की 26 फरवरी को वायु सेना के जवानों ने पुलवामा का बदला लेने की नीयत से तहस-नहस कर दिया और शूरता के नए आयाम दर्ज किए।

आज पूर्व वायुसेना ने बालाकोट एयरस्ट्राइक के एक साल होने इस मौक़े पर कहा कि इस ऑपरेशन के जरिए वह पाकिस्तान को संदेश देना चाहती थी कि हम ‘घुसकर मारेंगे’ चाहे आप कहीं भी हों।

दंगाइयों ने दंगाइयों को मारा, मुआवजा देने का सवाल ही नहीं: CAA विरोधी हिंसा पर CM योगी सख्त

CAA के ख़िलाफ आए दिन सड़कों पर उतर कर हिंसा करने वालों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रुख अख्तियार दिखाया है। विधानसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में उन्होंने कहा कि यूपी में मारे गए 21 दंगाइयों में से किसी की भी मौत पुलिस की गोली लगने से नहीं हुई है। इसलिए मारे गए दंगाइयों के परिजनों को मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक समाजवादी पार्टी के विधायक राकेश प्रताप सिंह द्वारा विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य के खिलाफ सड़कों पर उपद्रव करने वाले लोगों को राहत देने के लिए राज्य सरकार का ऐसा कोई प्रावधान नहीं हैं, जिससे पिछले 6 महीने में दंगे में मरने वाले लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जा सके। उन्होंने आगे कहा कि मुआवजा देने का कोई सवाल ही नहीं है। 

सीएम योगी आदित्यनाथ ने यह भी बताया कि पिछले महीनों में सीएए के ख़िलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों में दंगाइयों की पत्थरबाजी से 400 पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि 61 पुलिसवालों को गोलियाँ लगी। 19-20 दिसंबर को सीएए के ख़िलाफ हुए राज्य में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान भीड़ की हिंसा में 21 लोग मारे गए थे। लेकिन इनमें से किसी की भी मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई है। सीएम योगी ने पिछले हफ्ते कहा था कि दंगाइयों की मौत दंगाइयों के हाथों ही हुई है।

इससे पहले भी योगी ने दंगाइयों से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने बात की थी। हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए दंगाइयों की संपत्ति जब्त करने की बात कही थी। इतना ही नहीं इसे अमल में लाने और दंगाइयों को सबक सिखाने के लिए यूपी सरकार ने करीब 498 लोगों की संपत्तियों को जब्त करने के लिए चिन्हित किया था। गौरतलब है कि बुलंदशहर के मुस्लिमों ने जिला मजिस्ट्रेट को 6 लाख रुपए का भुगतान किया था।

दरअसल सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह ने विधानसभा में पिछले 6 महीने में दंगे से जुड़ी घटनाओं में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर सवाल किया था। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या सरकार पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने के लिए कोई प्रावधान बनाएगी।

अगर कोई मरने के लिए आ ही रहा है तो वह जिंदा कैसे हो जाएगा: CAA विरोधी हिंसा पर CM योगी

दंगाइयों पर काबू पाने के लिए दिल्ली पुलिस को खुली छूट, PM मोदी को हालात से अवगत कराएँगे डोवाल

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 18 हो गई है। घायलों की संख्या 250 पार है। प्रभावित इलाकों में हालात अब भी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हालाँकि, एएनआई द्वारा आज सुबह जारी की गई हिंसा प्रभावित इलाकों की तस्वीरें, कुछ राहत देने वाली हैं।

इन तस्वीरों में सुरक्षाबल की तैनाती से हालात काबू में दिख रहे हैं। वहीं जाफराबाद में सीएए के ख़िलाफ़ चल रहा विरोध-प्रदर्शन खत्म हो गया है। इसके अलावा एनएसए डोवाल के देर रात दौरे के बाद उपद्रवियों के ख़िलाफ़ सुरक्षाबल को सख्त एक्शन लेने के भी निर्देश हैं।

इस पूरे मामले की कमान अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजील डोवाल को दे दी गई है। उन्होंने इससे पहले कल रात में हिंसा प्रभावित इलाकों का जायजा लिया था। आला अधिकारियों से बात की थी। उन्हें सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए थे। इस दौरान पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक और स्पेशल सीपी एसएन श्रीवास्तव भी उनके साथ मौजूद थे।

आज एनएसए डोवाल इसी संबंध में प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट सहयोगियों को हालात से अवगत कराएँगे।

बता दें, मीडिया से बातचीत में एनएसए ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय राजधानी में अराजकता नहीं भड़कने दी जाएगी और पर्याप्त संख्या में पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को खुली छूट है।

वहीं, चांदबाग के एडिशनल डीसीपी डीके गुप्ता का भी बयान आया है। उन्होंने बताया है कि चांद बाग में 4 शव और 20 घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अब वे उन्हें हाइकोर्ट के आदेशानुसार दूसरे अस्पताल में भर्ती करेंगे। सभी पीड़ितों को दूसरे अस्पतालों में भी भर्ती करवाया जाएगा, ताकि उन्हें उचित उपचार मिले।

बालाकोट एयरस्ट्राइक के 1 साल: ‘हमने उन्हें बता दिया, कहीं भी रहो घुसकर मारेंगे’

बालाकोट एयरस्ट्राइक को आज (फरवरी 26, 2020) पूरे एक साल हो चुके हैं। पुलवामा हमले के 12 दिन बाद पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी कैंपों पर भारत द्वारा की गई ये कार्रवाई पाकिस्तान के लिए एक ऐसा सबक थी जिसे सोचकर आज भी पड़ोसी मुल्क की हालत खराब है। पुलवामा हमले के ठीक 12 दिन बाद भारतीय वायुसेना ने 12 मिराज विमान भेजकर बालाकोट को तबाह कर दिया था। इस हमले में 350 से ज्यादा आतंकी मारे गए थे।

इसी दिन को याद करते हुए बुधवार को पूर्व एयरफोर्स चीफ बीएस धनोआ ने कहा कि आज एक साल बीत गए हैं और हम इसे संतुष्टि के साथ देखते हैं। उनके अनुसार उन्होंने इस स्ट्राइक के बाद काफी कुछ सीखा, बालाकोट ऑपरेशन के बाद कई चीजें लागू की गई। उन्होंने आगे कहा कि हम संदेश देना चाहते थे कि हम ‘घुसकर मारेंगे’ चाहे आप कहीं भी हों। अन्यथा, हम उनपर अपने क्षेत्र से भी हमला कर सकते थे। 

पूर्व वायुसेना ने इस मौक़े पर कहा कि बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारतीय चुनावों के दौरान कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ, क्योंकि वे (पाकिस्तान) डर चुके थे। उन्हें डर था कि हम दोबारा उसी तरीके से या उससे भी जोरदार तरीके से जवाब देंगे।

पूर्व वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने आगे कहा कि मूल रूप से यह हमारे ऑपरेशन करने के तरीके में एक बदलाव है। दूसरे पक्ष ने कभी नहीं माना कि हम पाकिस्तान के अंदर एक आतंकी प्रशिक्षण शिविर को तबाह करने के लिए एयरस्ट्राइक कर सकते हैं जिसे हमने सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

गौरतलब है कि आज से ठीक एक साल पहले भारत ने पाकिस्तान से पुलवामा हमले में शहीद हुए 40 जवानों की शहादत का बदला 26 फरवरी 2019 के दिन तड़के 3.30 बजे बालाकोट में एयरस्ट्राइक कर लिया था। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के बालाकोट पर 26 फरवरी को 2019 को एयर स्ट्राइक कर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया था। इसमें कई आतंकी मारे गए। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने बालाकोट में घुसकर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया था।

दिल्ली दंगों में अब तक 17 मौतें: NSA ने सँभाला मोर्चा, एक्शन में हिज्बुल का सफाया करने वाला IPS भी

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 3 दिन की भीषण हिंसा के बाद कल (फरवरी 25,2020) देर रात एनएसए अजित डोवाल ने मोर्चा सँभाला। उन्होंने देर रात हिंसा प्रभावित इलाकों का जायजा लिया। पुलिस के आला अधिकारियों से बात की। गृह मंत्री अमित शाह ने भी दिल्ली की स्थिति को देखते हुए 24 घंटे के भीतर तीसरी बैठक रात में बुलाई और हिंसा रोकने के लिए अहम फैसले लिए। हाई कोर्ट ने हिंसा में घायलों को उचित इलाज मुहैया कराने के लिए देर रात एक अपील पर सुनवाई की। पुलिस को आदेश दिया कि सुरक्षा के बीच घायलों को जीटीबी या किसी अन्य बड़े हॉस्पिटल में शिफ्ट किया जाए।

गौरतलब है कि भारी तनाव के बीच कल रात भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोवाल ने सीलमपुर में स्थिति का जायजा लिया और पुलिस के कई आला अफसरों के साथ बैठक की। डोवाल रात करीब साढ़े 11 बजे सीलमपुर डीसीपी ऑफिस पहुँचे और साढ़े 12 बजे तक बैठक के बाद करीब 8 किलोमीटर का सफर करते हुए तनावपूर्ण इलाकों में गए। उन्होंने भजनपुरा, यमुना विहार और मौजपुर समेत कई इलाकों का जायजा लिया। उनके साथ इस दौरान पुलिस कमिश्‍नर अमूल्‍य पटनायक भी मौजूद रहे।  

गृह मंत्री अमित शाह भी इस हिंसा को जल्द से जल्द रोकने के लिए एक्शन में आ गए। दिल्ली के बिगड़ी स्थिति को देखते हुए अमित शाह ने 24 घंटे के भीतर कल रात एक बार फिर तीसरी बैठक की। उन्होंने स्थिति को देखते हुए अपना त्रिवेंद्रम दौरे को भी रद्द कर दिया। साथ ही सीआरपीएफ के डीजी ट्रेनिंग IPS एसएन श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से दिल्ली पुलिस में विशेष आयुक्त (कानून और व्यवस्था) के रूप में नियुक्त किया। एसएन श्रीवास्तव को घाटी में हिज्बुल के सफाए के लिए जाना जाता है।

हिंसा के बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने कहा कि उपद्रवियों को बख्शा नहीं जाएगा, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पर्याप्त पुलिस बल, सीएपीएफ और वरिष्ठ अधिकारी उत्तर पूर्वी दिल्ली में तैनात हैं। कुछ इलाकों में धारा 144 लागू है। राष्ट्रीय राजधानी में होने के कारण दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कड़ी कर दी है। दंगाइयों को गोली मारने के आदेश हैं।

इस हिंसा में अब तक 17 लोगों की मौत होने की खबर हैं, जबकि 250 से ज्यादा लोगों के घायल होने की सूचना है, घायल लोगों में 56 से अधिक पुलिस के जवान हैं। इसके अतिरिक्त बाबरपुर, मौजपुर, जाफराबाद, करावल नगर इलाकों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं। क्षतिग्रस्त इलाकों में भारी संख्या में पुलिस की तैनाती की गई है। हिंसा को रोकने के लिए अर्धसैनिक बलों की मदद और शांति बहाली के लिए स्थानीय शांति समितियों की मदद ली जा रही है। जाफराबाद में सीएए के विरोध प्रदर्शनस्थल को खाली करवा दिया गया है। सभी मेट्रो की सेवाएँ शुरू हो गई हैं।

हिंसा प्रभावित इलाकों में गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस के साथ-साथ सीमा सशस्त्र बल (एसएसबी) और भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान भी तैनात किए हैं। रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के भी जवान हर घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं।

वीर सावरकर: वह लेखक, जिसकी किताब बेच बंदूकें खरीदते थे आज़ादी के परवाने

न ही भाजपा-संघ वाले स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में बात करते थकते हैं और न ही कॉन्ग्रेस वाले हिन्दू महासभा के नेता रहे विनायक दामोदर सावरकर में नुक्स निकालते। इन दोनों राजनीतिक ध्रुवों के बीच जो खो जाता है, वह है लेखक, इतिहासकार, विचारक सावरकर- जिसने शायद एक व्यक्ति या नेता से आगे जाकर भारत में ब्रिटिश शासन की जड़ें खोद दीं। जिसने दशकों बाद पहली बार भारत-भूमि को याद दिलाया कि 1857 में महज कुछ दिशाहीन, अनुशासन-विहीन सैनिकों की हिंसा नहीं, स्वतंत्रता का पहला संग्राम हुआ था। जिसके ‘मास्टर-प्लान’ पर काम करते हुए बारीन्द्र घोष, शचीन्द्रनाथ सान्याल, रासबिहारी बोस आदि ने अपनी उम्र झुलसा दी और बिस्मिल, बाघा जतीन, राजेन्द्र लाहिड़ी आदि अनगिनत वीरों ने प्राणोत्सर्ग किया। जिसकी प्रेरणा से अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद कॉन्ग्रेस में हाशिये पर धकेल दिए गए सुभाष चन्द्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज के ‘नेताजी’ बनने नजरबंदी से भाग निकले। जिसकी किताबें इतनी लोकप्रिय थीं कि भगत सिंह उसकी प्रतियाँ बेचकर बंदूकें खरीदने का पैसा जुटा सकते थे!

‘1857 दोहरा कर ही मिलेगी आज़ादी’

1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों ने जो क्रूरता और निर्ममता दिखाई थी, वह अनायास या अकारण ही नहीं थी। पूरी ब्रिटिश शासन व्यवस्था ब्रिटिश सेना के संरक्षण पर टिकी थी और ब्रिटिश सेना (चाहे वह ईस्ट इंडिया कम्पनी की हो या बाद में ब्रिटिश क्राउन की) में केवल मुट्ठी-भर अंग्रेज अफ़सर होते थे- भारतीयों को विदेशियों का गुलाम बना कर रखने वाली असली ताकत भारतीय सैनिक ही थे; उन राजाओं की सेनाओं के, जिनकी कम्पनी बहादुर या ब्रिटेन के राजपरिवार के साथ संधि हुई थी, या सीधे ब्रिटेन की गुलामी में पड़े हुए भू-भाग की ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिक। अतः 1857 को क्रूरता से कुचलना अंग्रेजों के लिए ज़रूरी था, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक किसी सैनिक के दिमाग में अपने गोरे मालिकों पर बंदूक तानने की जुर्रत न आए। इसीलिए उन्होंने न केवल लोमहर्षक निर्ममता के साथ इस संग्राम को कुचला (किवदंतियाँ हैं कि मंगल पाण्डे के घर वालों की पहचान करने में नाकाम रहने पर उन्होंने कानपुर से बैरकपुर तक के हर गाँव के हर पाण्डे उपनाम वाले बच्चे-बूढ़े-औरत को गाँवों के पेड़ों से फाँसी पर लटका दिया था), बल्कि इतिहास में इसे अधिक महत्व न देते हुए महज़ एक अनुशासनहीन विद्रोह के रूप में दिखाया। वह सावरकर ही थे जिन्होंने पहले मराठी और फिर अंग्रेजी में प्रकाशित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’/The Indian War of Independence के ज़रिए इस लड़ाई के असली रूप को जनचेतना में पुनर्जीवित किया।

1909 में प्रकाशित इस किताब में उन्होंने न केवल इस विद्रोह की राजनीतिक चेतना को रेखांकित किया बल्कि इसके राष्ट्रीय स्वरूप के पक्ष में भी तर्क रखे। यही नहीं, उन्होंने यह भी अनुमानित कर लिया था कि अगर भारत को ब्रिटिश शासन के चंगुल से मुक्त होना है तो अंततः यही रास्ता फिर से पकड़ना होगा। ब्रिटिश सेना को पुनः राष्ट्रवादी, देशभक्त सैनिकों से भरना होगा जो वर्षों तक चुपचाप सेना में अपनी पैठ बनाएँ, प्रभुत्व स्थापित करें, अन्य सैनिकों की निष्ठा विदेशी शासन से इस देश की जनता की ओर मोड़ें। अंत में जब संख्याबल आदि सभी प्रकार से मजबूत हो जाएँ तो अपने नेता के इशारे पर, सही समय पर विद्रोह कर दें। महत्वपूर्ण रणनीतिक संसाधनों, हथियारों, रसद, आपूर्ति मार्गों आदि पर कब्ज़ा कर अंग्रेजों की व्यवस्था को घुटने पर ले आएँ।

सारे जहाँ में प्रतिबंधित

बौखलाए अंग्रेजों ने किताब और सावरकर पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। लंदन के सभी प्रकाशकों को इस किताब के अंग्रेजी अनुवाद/संस्करण के प्रकाशन के खिलाफ़ आगाह कर दिया गया। फ़्रांस ने भी अंग्रेज़ी दबाव में घुटने टेक दिए। अंततः किताब का अंग्रेज़ी संस्करण हॉलैंड (अब नीदरलैंड) में प्रकाशित हुआ- वह भी इसलिए कि ‘काली’ और ‘भूरी’ दुनिया को गुलाम बनाने में इंग्लैण्ड और हॉलैंड में ऐतिहासिक दौड़ मची थी। दोनों एक-दूसरे के औपनिवेशिक शासन को कमजोर करना चाहते थे। इस किताब को भारत में बाँटे जाने के लिए ब्रिटिश साहित्य के पन्नों में छिपा कर, या उसकी जिल्द चढ़ाकर लाया जाता था।

पीटर होपकिर्क अपनी किताब On Secret Service East of Constantinople में लिखते हैं कि इसके बाद अंग्रेजों ने सावरकर की किताब को ब्रिटिश लाइब्रेरी की सूची तक में जगह नहीं दी, ताकि भारतीय छात्रों को इसके बारे में पता न चल जाए। इसी किताब में वह यह भी बताते हैं कि सावरकर की किताब को ‘तस्करी’ कर भारत में लाने के लिए चार्ल्स डिकेंस का मशहूर उपन्यास ‘पिकविक पेपर्स’ काफ़ी इस्तेमाल हुआ है।

भगत सिंह

भगत सिंह ने न केवल सावरकर के साहित्य का खुद गहन अध्ययन किया (उनकी जेल डायरियों और लेखन में सावरकर से अधिक उद्धृत केवल एक लेखक हैं), बल्कि कई इतिहासकारों की राय है कि वे अपने क्रांतिकारी संगठन में भी सावरकर के अध्ययन को प्रोत्साहित करते थे। यही नहीं, सावरकर की ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ और इसके अंग्रेजी संस्करण की आमजन के बीच भारी माँग और प्रतिबंध के चलते आपूर्ति में किल्लत को देखते हुए भगत सिंह के इसकी व्यवसायिक पैमाने पर तस्करी करने के भी उद्धरण इतिहास में मिलते हैं। इस किताब को ऊँचे दामों पर बेचकर उनका संगठन अंग्रेजों के खिलाफ़ क्रांति के लिए हथियार खरीदने का धन उगाहता था। इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित करवाने में भगत सिंह की भूमिका का ज़िक्र विक्रम सम्पत द्वारा लिखित सावरकर की जीवनी में है। यही नहीं, भगत सिंह ने सावरकर की केवल इस किताब ही नहीं, ‘हिन्दू पदपादशाही’ का भी ज़िक्र अपने लेखन में किया है।

सावरकर भी भगत सिंह का काफी सम्मान करते थे। इसकी एक बानगी यह है कि सावरकर की मृत्यु के उपरांत 1970 में प्रकाशित उनकी जीवनी ‘आत्माहुति’ का विमोचन भगत सिंह की माता माताजी विद्यावती देवी के हाथों हुआ। इस समारोह में उनके छोटे भाई भी शरीक हुए थे।

आज यह कतई ज़रूरी नहीं है कि जो कुछ सावरकर ने लिखा है, वह सही ही हो। बहुत कुछ ऐसा भी हो सकता है जो उस समय भले सही रहा हो, लेकिन आज प्रासंगिक न हो। सावरकर के जीवनकाल में ही ‘हिंदुत्व’ और हिंदूवादी राजनीति की उनसे अलग परिभाषाएँ रहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के हिन्दू महासभा छोड़ने के पीछे एक महती कारण पाकिस्तान को लेकर उनमें और सावरकर में पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने (डॉ. मुखर्जी का मत) बनाम पुनः एक दिन अखण्ड हिंदुस्तान की सावरकर की परिकल्पना का गंभीर मतभेद था। ‘हिंदुत्व’ शब्द सावरकर के पहले भी था और सरसंघचालक मोहन भागवत ने यह कई बार साफ़ किया है कि आज का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोलवलकर-सावरकर से आगे बढ़ चुका है। ऐसे में यदि सावरकर को यदि जीवित रखना है तो उनके प्रशंसकों, उनके अनुयायियों को उन्हें दोबारा पढ़ना होगा, उन्हें दोबारा ‘खोजना’ होगा।

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मस्जिद पर भगवा ध्वज: राणा अयूब ने गिरफ़्तारी के डर से डिलीट किया वीडियो, फिर से किया ट्वीट

ख़ुद को पत्रकार बताने वाली राणा अयूब ने एक वीडियो शेयर कर के दिल्ली में चल रही हिंसा रूपी आग में प्रपंची घी डालने का प्रयास किया। आम तौर पर एक जिम्मेदार पत्रकार ऐसे वीडियो आदि के सही होने पर भी शेयर नहीं करते क्योंकि हिंसा भड़कने के आसार होते हैं। लेकिन राणा अयूब से ऐसी उम्मीद मूर्खता है। वीडियो के आने पर कई लोगों ने बताया कि ये पुरानी है, और उस पर केस की धमकी दी, तो उन्होंने उस वीडियो को तुरंत अपने ट्विटर प्रोफाइल से हटा दिया और डिलीट कर दिया। अफवाह फैलाने, झूठे वीडियो शेयर करने और लोगों को भड़काने के लिए झूठ बोलना लिबरल पत्रकारों के गिरोह का पुराना पेशा रहा है। जब पोल खुल जाती है तो वो चुपके से अपना ट्वीट डिलीट कर देते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि तब तक काफ़ी लोग उसे पढ़ने या देख चुके होते हैं।

कुछ ऐसा ही राणा अयूब ने भी किया। उन्होंने एक ऐसा वीडियो शेयर किया, जिसमें प्रतीत हो रहा है कि मस्जिद को जलाया जा रहा है। अयूब ने इस वीडियो को दिल्ली का बता कर पेश किया। इसके बाद गिरोह विशेष के अन्य लोगों ने भी राणा अयूब का साथ देते हुए कहा कि ये दिल्ली के अशोक नगर का वीडियो है। वीडियो देखने पर ऐसा लग रहा है कि कुछ लोग मस्जिद के ऊपर चढ़कर उसपर लगे स्पीकर नीचे फेंक रहे हैं और उस पर कोई झंडा फहरा रहे हैं। राणा अयूब ने वीडियो ट्वीट किया, डिलीट किया और फिर दोबारा ट्वीट किया।

कुछ लोगों का दावा है कि ये वीडियो पुराना है। लेकिन, राणा अयूब ने वीडियो को डिलीट करने के बाद उसे फिर से पोस्ट कर दिया। अगर वो सही था तो डिलीट क्यों किया और अगर अब वो पुष्टि करने का दावा कर रही हैं तो पहले बिना पुष्टि के क्यों ट्वीट किया? राणा अयूब को हाल ही में एक अवॉर्ड भी मिला है। उनको ‘साहसी पत्रकार’ का 2020 McGill मैडल मिला है। अयूब दावा करती हैं कि उन्हें ये अवॉर्ड इसीलिए मिला है क्योंकि वो सच्चाई का युद्ध लड़ रही हैं। अगर ऐसा होता तो उन्हें झूठा वीडियो शेयर नहीं करना पड़ता।

राणा अयूब ने शेयर किया पुराना वीडियो, गिरफ़्तारी के डर से किया डिलीट, फिर वापस किया ट्वीट

उधर प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन ने भी अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित इस ख़बर को शेयर किया। वरदराजन और ‘द वायर’ ने दावा किया कि मस्जिद के स्पीकरों को नीचे फेंक कर उस पर हनुमानजी का झंडा फहरा दिया गया।

‘द वायर’ ने शेयर किया फेक न्यूज़, मुसलमानो को भड़काया

उधर एक अन्य प्रोपेगंडा पोर्टल ‘स्क्रॉल’ भी पीछे नहीं रहा और उसने भी ते ख़बर चलाई। ‘स्क्रॉल’ ने दावा किया कि लोगों ने ‘जय श्री राम’ और ‘हिन्दुओं का हिंदुस्तान’ नारा लगाते हुए मस्जिद को जला डाला और उसके ऊपर हनुमान का ध्वज फहरा दिया। ‘स्क्रॉल’ ने सेफ खेलने के लिए इस ख़बर को ‘द वायर’ के हवाले से बना दिया और राणा अयूब द्वारा ट्वीट डिलीट करने के साथ ही दोनों की भद्द पिट गई। हालाँकि, राणा अयूब ने फिर से वीडियो ट्वीट कर दिया, जिसके बाद दोनों ने राहत की साँस ली होगी।

‘स्क्रॉल’ ने शेयर की फर्जी ख़बर: ‘द वायर’ के हवाले से फैलाया झूठ

दिल्ली में लिबरल गिरोह लगातार हिंसा भड़काने वालों के समर्थन में हुआ है। सोशल मीडिया पर लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे कपिल मिश्रा ने ही सब कराया हो। हालाँकि, मोहम्मद शाहरुख़ को लेकर सब ने चुप्पी साध रखी है। वही शाहरुख़, जिसे पुलिस ने अब गिरफ़्तार कर लिया है और जो सोमवार (फरवरी 24, 2020) को दिन भर फायरिंग करता हुआ घूम रहा था। इसी तरह मस्जिद को हिन्दुओं द्वारा जलाने का वीडियो ट्वीट किया गया, ताकि माहौल और खराब हो। उनकी पूरी कोशिश है कि दिल्ली में इतनी हिंसा हो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि धूमिल हो।

IPS श्रीवास्तव दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर नियुक्त; दंगाइयों को देखते ही गोली मरने के आदेश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा से पूर्व रविवार शाम से दिल्ली में भड़के दंगों के बाद दिल्ली में हालात तनावपूर्ण हैं। इसी बीच IPS एसएन श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से दिल्ली पुलिस का स्पेशल कमिश्नर (कानून और व्यवस्था) नियुक्त किया गया है।

बताया जा रहा है कि आईपीएस एसएन श्रीवास्तव जम्मू-कश्मीर में एडीजी पश्चिम क्षेत्र (सीआरपीएफ) रह चुके हैं और गृह युद्ध जैसी स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। दिल्ली में भड़की हिंसा में अब तक कुल 10 लोगों की मौत हो चुकी है। उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में धारा 144 लागू है और अतिरिक्त पुलिसबलों की तैनाती की गई है।

अर्धसैनिक बल के जवानों की मदद ली जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि पुलिसकर्मी सौहार्द बहाल करने के लिए स्थानीय शांति समितियों की मदद ले रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि असामाजिक तत्वों से मौके पर ही कड़ाई से निपटा जा रहा है। अभी तक इस संबंध में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।

इसी बीच मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। दिल्ली में सोमवार (फरवरी 24, 2020) को दिन भर दंगाइयों का तांडव चला और आज मंगलवार को भी यही क्रम जारी रहा। जफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, गोकुलपुरी, करावल नगर, भजनपुरा सौर घोड़ा से लेकर चाँदबाग़ तक, अताताइयों ने किसी भी जगह को शांत नहीं रहने दिया। जम कर आगजनी की गई।

दंगों में हिन्दुओं के घरों को जलाने की ख़बरें आई हैं। लेकिन, सबसे ज्यादा दुखद रहा हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल का बलिदान होना। दंगाइयों ने एक भरे-पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। सीएए विरोध के नाम पर हिंसा करने वाले इन लोगों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि उन्होंने इस देश को कितनी बड़ी क्षति पहुँचाई है।