पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के मुर्शिदाबाद जिले के पदाधिकारी अनारुल हक ने शुक्रवार को अपनी ही पार्टी के विधायक पर बेटों को किडनैप करने की कोशिश का आरोप लगाया। अनारूल हक ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि स्थानीय विधायक ने उस वक्त सुबह उनके 11 वर्षीय और 14 वर्षीय बेटे को किडनैप करने की कोशिश की, जब उन दोनों को मेरा एक कर्मचारी मोटरसाइकिल से स्कूल लेकर जा रहा था। अपहरण की यह कोशिश धुलियां टाउन में हुई जहां पर अनारूल हक का परिवार रहता है।
लाइव हिंदुस्तान में छपी खबर के अनुसार हक ने इस मामले में छह लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने बताया कि किडनैप करने वाले उस वक्त भाग गए, जब बच्चों ने शोर मचाया। हक ने आरोप लगाया कि ये सभी छह लोग शमशेरगंज विधान सभा के तृणमूल विधायक अमीरुल इस्लाम से जुड़े हुए हैं। इस घटना के बाद हक के समर्थकों ने शमशेरगंज पुलिस स्टेशन के पास सड़क को बंद कर विरोध दर्ज कराया।
अमीरुल इस्लाम तृणमूल की यूथ विंग की जिला ईकाई के अध्यक्ष भी हैं। आरोपी विधायक ने कहा – “यह आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है। अनारुल हक हमारी पार्टी को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके पीछे उनका कुछ छिपा हुआ एजेंडा है।”
अनारूल हक जो जिला परिषद के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण विभाग प्रमुख हैं, ने कहा- “मेरे दोनों बच्चों को मेरा एक कर्मचारी बाइक पर स्कूल लेकर जा रहा था। इस्लाम के छह लोग एक कार से आए और डाक बांग्लो इंटरसेक्शन के पास बाइक का रास्ता रोक दिया। उन्होंने मेरे बेटे का अपहरण की कोशिश की और कर्मचारी से कहा कि उन बच्चों को तब वापस किया जाएगा जब वे इस्लाम को दस लाख रुपए की फिरौती देंगे।”
हक ने कहा- “इस्लाम के लोग रफीकुल, नवाज, लतीफ, सैदुल और दो अन्य उस कार में सवार थे। मैंने पुलिस शिकायत दर्ज कराई है।” हक ने हालाँकि शिकायत में विधायक का नाम नहीं लिया है। जब उनसे इस विषय में सवाल किया गया तो उन्होंने इसके उत्तर में कहा – “विधायक मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं थे इसलिए उनका नाम नहीं लिया गया है। लेकिन, मै जानता हूं कि इसका मास्टरमाइंड वही हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने आज AGR मामले में अपना फैसला सुनाते हुए टेलीकॉम कंपनियों को तगड़ा झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भारती एयरटेल और वोडाफोन जैसी कंपनियों को आज शुक्रवार रात 11.59 PM (फरवरी 14, 2020) तक पूरा बकाया चुकाने के सख्त निर्देश दिए हैं।
इसके बाद भारती एयरटेल ने शुक्रवार को दूरसंचार विभाग को 10,000 करोड़ रुपए का बकाया फरवरी 20, 2020 तक देने, और सुप्रीम कोर्ट में AGR मामले की अगली सुनवाई से पहले बाकी बकाया चुकाने की पेशकश की है। सभी 15 इकाइयों पर लाइसेंस शुल्क के रूप में 92,642 करोड़ रुपए और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के रूप में 55,054 करोड़ रुपए बकाया है। यानी, इन टेलीकॉम कंपनियों के ऊपर सरकार के 1.47 लाख करोड़ रुपए बकाया हैं। ये आदेश सर्किल के संचार लेखा नियंत्रक ने जारी किए हैं।
एयरटेल ने दूरसंचार विभाग के सदस्य को भेजे पत्र में कहा है- “माननीय उच्चतम न्यायालय के फैसले और उनके निर्देश के अनुपालन में हम फरवरी 20, 2020 तक भारती समूह की कंपनियों की ओर से 10,000 करोड़ रुपए जमा कर देंगे।” एयरटेल पर सरकार का करीब 35,586 करोड़ रुपए बकाया है, जिसमें लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क शामिल हैं।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर माह में टेलीकॉम ऑपरेटर्स को 1.33 लाख करोड़ रुपए का बकाया चुकाने के लिए जनवरी 23, 2020 तक का समय दिया था, जो कि कब का गुजर चुका है।
#JustIn – After Supreme Court rap, Department of Telecommunications orders Bharti Airtel, Vodafone Idea, and others to clear dues by 11.59 PM tonight. pic.twitter.com/kUypsIK536
टेलिकॉम कंपनियों की ओर से बरती गई लापरवाही पर केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा ने गुस्से में कहा कि अगर कोर्ट के आदेश की अवमानना एक डेस्क ऑफिसर तक कर रहा है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट को बंद कर दीजिए। कोर्ट ने अपने आदेशों की अवमानना पर हैरानी जताते हुए कहा- “आखिर क्या हो रहा है देश में? कोर्ट के आदेशों का पालन क्यों नहीं हो रहा?”
ज्ञात हो कि भारत के टेलीकॉम मार्केट में वोडाफोन, आइडिया, एयरटेल और रिलायंस जियो की 90% हिस्सेदारी है। एयरटेल और वोडाफोन ने अदालत के आदेश को लेकर चिंता जताते हुए कहा था कि इससे उनके सामने संकट पैदा हो जाएगा। कोर्ट के इस फैसले के चलते अब वोडाफोन, आइडिया के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो सकता है। पहले ही वोडाफोन और आइडिया पर 3.9 अरब रुपये का कर्ज है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, उच्चतम न्यायलय ने शुक्रवार (फरवरी 14, 2020) को केस की सुनवाई करते हुए वोडाफोन, आइडिया और भारती एयरटेल को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वो 17 मार्च तक यह राशि नहीं चुकाते हैं तो यह अदालत की अवमानना होगी।
इससे पहले अदालत ने वोडोफोन, आइडिया और एयरटेल समेत टेलीकॉम कंपनियों को सरकार के 920 अरब रुपए चुकाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कंपनियों को नोटिस जारी कर पूछा कि एजीआर बकाए के भुगतान के फैसले को न मानने पर अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वोडाफोन, आइडिया के शेयरों में 19% की बड़ी गिरावट देखने को मिली है। इस साल गत बृहस्पतिवार तक कंपनी की वैल्यूएशन में 27% की कमी आ चुकी है। वहीं, प्रतिस्पर्धी टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो ने जनवरी 31, 2020 तक एजीआर से जुड़े सभी बकाया भुगतान के लिए दूरसंचार विभाग को 195 करोड़ रुपए दिया था।
टेलीकॉम कंपनियों और दूरसंचार विभाग को कारण बताओ नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दूरसंचार विभाग की भी खिंचाई की है। बकाया राशि होल्ड पर रखने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दूरसंचार विभाग के अधिकारियों को लताड़ लगाई। साथ ही टेलीकॉम कंपनियों और दूरसंचार विभाग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में फरवरी 14, 2020 शुक्रवार की रात 11.59 PM से पहले बकाया रकम चुकाने को कहा है। भारती एयरटेल पर 35,586 करोड़ रुपए का बकाया है। वहीं वोडाफोन को 50,000 करोड़ रुपए 23 जनवरी से पहले चुकाना है।
खुफिया विभाग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आतंकी हमले की आशंका जताई है। साथ ही बताया गया है कि इस हमले को किसी भी वीवीआईपी कार्यक्रम में पत्रकार के द्वारा (या पत्रकार के छद्म रूप में) भी अंजाम दिया जा सकता है। इसे लेकर यूपी पुलिस ने अलर्ट जारी कर दिया है। साथ ही गोरखपुर पुलिस ने निर्णय लिया है कि जिले के पत्रकारों के लिए आई कार्ड जारी किए जाएँगे।
खुफिया विभाग ने पुलिस को जानकारी दी है कि सीएम योगी आदित्यनाथ पर गोरखपुर में या गोरखनाथ मंदिर में आतंकी हमला कर सकते हैं। यह आतंकी पत्रकार के वेष में भी हो सकते हैं। इसके बाद यूपी पुलिस गोरखपुर जिले में अलर्ट जारी कर दिया है। साथ ही मामले को गंभीरता से लेते हुए गोरखनाथ मंदिर की सुरक्षा बड़ा दी गई है। उधर गोरखपुर पुलिस ने निर्णय लिया है कि जिले में पत्रकारों के लिए आईकार्ड जारी किए जाएँगे। वहीं पुलिस ने साफ किया है कि किसी भी मीडिया से जुड़े पत्रकार की पहले जाँच के बाद ही आईकार्ड जारी की जाएगी। साथ ही यह आईकार्ड सीएम की कवरेज के लिए मान्य होंगे।
दरअसल माना जा रहा है कि गोरखपुर में पत्रकारों का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुँचना बहुत आसान रहता है, क्योंकि सीएम योगी मंदिर में क्षेत्रीय पत्रकारों के साथ सहजता से मिलते हैं। इसीलिए आतंकी इसी का फायदा उठा सकते हैं। वहीं सीएम योगी गोरखपुर में रहने के दौरान गोरखनाथ मंदिर परिसर में जनता दरबार लगाते हैं। इस दौरान भी योगी आदित्यनाथ स्थानीय लोगों से आसानी से मुलाकात करते हैं। एडीजी जोन दावा शेरप्पा ने बताया कि पत्रकारों को असुविधा न हो और उनकी पहचान भी हो सके, इसके लिए पहचान पत्र बनवाए जा रहे हैं। जल्द ही अधिकृत पत्रकारों को फोटोयुक्त पहचान पत्र मुहैया कराए जाएँगे।
आपको बता दें कि पिछले काफी समय से हिंदूवादी संगठन और हिंदू नेता आतंकियों के निशाने पर हैं। लखनऊ में पहले हुई कमलेश तिवारी की हत्या और फिर हत्या रंजीत बच्चन की हत्या इस बात का सटीक उदाहरण है। वहीं पिछले दिनों आई खबर के मुताबिक संघ प्रमुख मोहन भागवत पर आतंकी हमले की आशंका को लेकर संघ के प्रमुख केन्दों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
छत्तीसगढ़ के कसडोल से कॉन्ग्रेस विधायक शकुंतला साहू और बलोदा बाजार जिले में तैनात ट्रेनी आईपीएस अंकिता शर्मा के बीच होती तीखी बहस से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। यह घटना शुक्रवार शाम की है। पूरा मामला सीमेंट फैक्ट्री में हुए हादसे के बाद विधायक के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान का है।
विधायक शकुंतला साहू और आईपीएस अंकिता शर्मा
मीडिया खबरों के अनुसार बलोदा बाजार जिले स्थित सीमेंट फैक्ट्री में हुए इस हादसे में गत बुधवार को एक मजदूर की मौत हो गई थी। जिसके परिजनों को मुआवजा दिलाने के लिए कॉन्ग्रेस विधायक शकुंतला साहू धरना दे रहीं थीं।
जानकारी के अनुसार प्रदर्शन की सूचना पा ट्रेनी आईपीएस अंकिता शर्मा मौके पर पहुँचीं हुईं थीं, जहाँ प्रशासन की उपस्थिति में मृतक के परिजनों और सीमेंट फैक्ट्री प्रबंधन के बीच हर्जाने पर सहमति हो गई थी। जिसके बाद परिजन अंतिम संस्कार को राजी हो वहाँ से चले गए थे लेकिन कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन जारी रहा, जो शाम होते होते उग्र हो गया।
एएनआई के अनुसार इस पर महिला आईपीएस ने प्रदर्शनकारियों को समझाते हुए, पुलिस वालों को कोई नुकसान न पहुँचाने और शांति पूर्ण प्रदर्शन करने की हिदायत दी थी। इस बात की खबर मिलते ही कॉन्ग्रेस की महिला विधायक शकुंतला साहू वहाँ पहुँच गईं, जिन्होंने आईपीएस अधिकारी को, “ठीक से रहो वर्ना औकात दिखा दूँगी” की धमकी दी।
देश में चल रही तमाम चर्चा से अलग जेएनयू के भूतपूर्व नेता कन्हैया कुमार को आज एक बार फिर जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। दो सप्ताह में बिहार में कन्हैया कुमार के काफिले पर यह 8वीं बार हमला हुआ है।
#Watch | Stones thrown at Left leader Kanhaiya Kumar’s convoy near Arrah in Bihar. This was the eighth such attack in weeks against Kumar, who has been protesting the Citizenship Amendment Act in the state.
शुक्रवार (फरवरी 14, 2020) को एक बार फिर कन्हैया कुमार के काफिले पर हमला हुआ। दरअसल, कन्हैया कुमार बिहार में आरा के रमना मैदान जा रहे थे। इसी दौरान स्थानीय लोगों ने कन्हैया कुमार के काफिले पर हमला कर दिया। हमले में कई वाहन क्षतिग्रस्त भी हो गए।
दरअसल CPI नेता कन्हैया कुमार इन दिनों नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) के खिलाफ ‘जन-गण-मन यात्रा’ पर निकले हुए हैं लेकिन उन्हें लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बिहार के जिस भी जिले में वह अब तक पहुँचे हैं, उनमें से अधिकतर जगहों पर कन्हैया कुमार के काफिले पर हमला बोला गया है।
बिहार के आरा में आज जब उनके काफिले पर हमला हुआ है तो इसमें ईंट-पत्थर इस्तेमाल किया गया जिससे उनकी गाड़ियाँ भी क्षतिग्रस्त हो गई हैं। इससे पहले भी कन्हैया कुमार पर जमुई से नवादा जाते वक़्त उनके काफिले पर अंडे और मोबिल ऑयल फेंके गए थे। कन्हैया कुमार के समर्थकों और स्थानीय लोगों में इस बात पर झड़प भी हुई थी। हालाँकि, कन्हैया कुमार को किसी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ था।
कन्हैया कुमार ने 30 जनवरी को यह ‘जन-गण-मन यात्रा’ शुरू की थी। एक महीने तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान कन्हैया कुमार बिहार के लगभग सभी प्रमुख शहरों में पहुँच रहे हैं। अब तक उनकी यह यात्रा 10 के आसपास शहरों में पहुँची है, जिनमें से आठ में वो अपने काफिले समेत कूटे जा चुके हैं।
भारतीय मीडिया और आतंकवादियों से उनकी संवेदना कोई नई बात नहीं है। अक्सर हम देखते हैं कि मीडिया में बैठे हुए कुछ बुद्धिजीवी आतंकवादियों की प्रोफाइलिंग करते हुए उन्हें इस तरह से पेश करते हैं, ताकि उनके कारनामों पर मानवता की एक परत चढ़ जाए। इससे पहले प्रोपेगेंडा पत्रकार बरखा दत्त को आतंकी बुरहान वाणी की प्रोफाइलिंग करते हुए देखा गया था।
बरखा दत्त की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार हरिंदर बावेजा ने पुलवामा आतंकी हमले के ठीक एक साल पूरे होने पर इस हमले के मुख्य अभियुक्त आदिल अहमद डार के कारनामे पर पर्दा डालने का ‘बौद्धिक’ प्रयास किया है।
हरिंदर बावेजा द्वारा लिखे गए इस लेख का शीर्षक है- “Apathy forced him to opt for violence, says Pulwama bomber’s family” जिसका आशय यह है कि उपेक्षा ने पुलवामा के आतंकी हमलावर को यह कदम उठाने पर मजबूर किया।
शीर्षक से ही स्पष्ट होता है कि इस लेख में पुलवामा आतंकी को क्लीन चिट देने की पूरी कोशिश की गई होगी। लेकिन फिर भी, बिना किसी पूर्वग्रह के इस लेख को पढ़ने से पता चलता है कि यह पूरा लेख और कुछ नहीं बल्कि एक और आतंकवादी को अगला युगपुरुष साबित करने का प्रयास है।
इस लेख में हरिंदर बावेजा ने बताया है कि अहमद डार की माँ से बातचीत में उसे पता चला कि उसे क्रिकेट बहुत पसंद था और वह भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का प्रसंशक था। यह भी बताया गया है कि अहमद डार कभी भी गाड़ी ज्यादा दूर तक नहीं ले जाता था क्योंकि उसके पास लाइसेंस नहीं था।
हैरानी की बात यह है कि इस कॉलम की लेखिका हरिंदर बावेजा के अनुसार फिदायीन आतंकी अहमद डार अगर नियम-कानून का इतना रखवाला था तो फिर वो एक दिन अचानक से विस्फोटकों से भरी हुई गाड़ी लेकर सीआरपीएफ के 40 जवानों से भरी गाड़ी से कैसे टकरा जाता है?
लेख में बताया गया है कि अहमद डार के पिता ने कहा कि वो भारतीय क्रिकेट टीम की जीत पर हमेशा जश्न मनाता था, भले ही हर कोई यही मानता है कि कश्मीरी पाकिस्तान की जीत से खुश होते हैं।
लेकिन अगर यह आतंकी अहमद डार भारतीय क्रिकेट और एमएस धोनी का इतना ही बड़ा समर्थक था, तो उसने उस भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला करने का फैसला आखिर कैसे कर लिया, जिसके साथ डार के प्रिय क्रिकेटर धोनी अपना समय बिताते हैं। एमएस धोनी को 2011 में लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद रैंक मिली थी। लेकिन धोनी के चरित्र और सेना के प्रति उनके प्रेम को फिदायीन आतंकी क्यों नहीं अपना पाया, यह प्रश्न करना शायद हिन्दुस्तान टाइम्स की स्तम्भकार भूल गई।
लेखिका का कहना है कि अहमद डार के पिता ने बताया कि 22 साल का अहमद डार फिर कभी क्रिकेट प्रेमी नहीं रह पाया और उसने गत 14 फरवरी को भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया, इस हमले में जितने सैनिक मारे गए, इतने घाटी के इतिहास में पहले कभी एक ही हमले में नहीं मारे गए थे। लेख में बड़े ही पीड़ादायक शब्दों में बताया गया है कि 40 जवानों को मारने के बाद अहमद डार के शरीर का कुछ भी हिस्सा उसके घर वालों को नहीं मिल पाया।
अहमद डार के पिता के शब्दों को अगर स्तम्भकार हरिंदर बावेजा ने शब्दशः वास्तव में लिखा है तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ये एक दुखी या मायूस नहीं बल्कि एक जिहादी के गौरवान्वित पिता के शब्द थे। क्योंकि लेखिका का कहना है कि अहमद डार के इस विस्फोट से पहले मार्च 2018 में जैश-ए-मोहम्मद में शामिल होने के बारे में उसके घर वालों को मालूम था।
इस लेख में आगे बताया गया है कि कैसे बेहद नाटकीय ढंग से सेना द्वारा कश्मीरी पत्थरबाजों को सजा देने और आतंकी बुरहान वाणी की मौत जैसी घटनाओं ने आदिल डार को धीरे-धीरे बदल दिया था।
इस पूरे लेख में आदिल अहमद डार की भाभी का बयान सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। हिन्दुस्तान टाइम के इस लेख में बताया गया है कि फिदायीन आतंकी आदिल डार के ही परिवार से तीन लोग आतंकी समूहों से जुड़ चुके हैं। जिनमें से एक उसके चाचा का लड़का था, जिसने कि 2016 में ही घर छोड़कर लश्कर-ए-तैयबा ज्वाइन किया था और मारा गया था। दूसरा आदिल का भाई था, जो कि जेल में था और आदिल की मौत के बाद ही बाहर आया था और तीसरा खुद पुलवामा हमले का आतंकी आदिल अहमद डार था।
आदिल की भाभी का कहना है कि उसका पति भी आतंकी संगठन से जुड़ने की बात करता है लेकिन वह यह कहकर उसे मना कर देती है कि उनका बेटा ऐसा करेगा क्योंकि वो आजादी के लिए लड़ रहे हैं और उन्हें यह काम करना ही होगा।
अहमद डार की भाभी का बेटा ‘मंजूर’, अभी मात्र तीन साल का है। इस तरह की आजादी और लड़ने की बातें हाल ही में हम शाहीन बाग़ में चल रहे प्रदर्शन में भी देख चुके हैं। शाहीन बाग़ में एक नवजात बच्चे की मौत पर उसकी माँ का भी कुछ ऐसा ही कहना था। उसकी माँ ने कहा था कि उसका बेटा अल्लाह के लिए मर गया, अल्लाह ने ही उसे भेजा और उसने बुला भी लिया।
इस तरह की ‘आजादी’ के जज्बे का एक ही आशय होता है और वह है जिहाद! इस धार्मिक युद्ध की प्रेरणा के लिए कश्मीर में मौजूद कुछ लोग आज भी कितनी तत्परता से कूदने के लिए तैयार हैं, अहमद डार के परिवार के बयानों से इस बात का जायजा लगाया जा सकता है।
ऐसे में, बरखा दत्त और हिन्दुस्तान टाइम के स्तम्भकाओं द्वारा फिदायीन आतंकियों की जिंदगी को बेहद नाटकीय ढंग से प्रस्तुत कर के सिर्फ जिहाद और धर्म युद्ध जैसे विषयों का महिमामंडन किया जा रहा होता है। मीडिया के कुछ चुनिंदा लोगों की संवेदना आतंकवादियों से निरंतर बनी रहती है।
इसी तरह से लेफ्टिस्ट इकोसिस्टम की ही एक टुकड़ी और प्रोपेगेंडा वेबसाइट दी क्विंट को कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन के लिए आँसू बहाते हुए भी देखा गया था।
सवाल यह उठता है कि यही मीडिया गिरोह उन सुरक्षा बलों के परिवार के साथ इतनी प्रतिबद्धता से क्यों नहीं खड़ी नजर आती है, जिन्हें एक फिदायीन हमले हिन्दू विरोधी धार्मिक नारों को दोहराकर मार दिया गया। यही मीडिया आज तक यह नहीं कह पाई है कि पूरा भारत देश आज भी गजवा-ए-हिन्द का सपना देख रहे धार्मिक जिहादियों और इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर है।
ऐसे में आतंकवादियों की हरकतों को कोसना तो दूर, यह मीडिया के लोग आतंकवादियों के एक ‘आम आदमी’ से आतंकवादी बनने की घटना का बेहद फ़िल्मी तरीके से महिमामंडन करते नजर आते हैं। आतंकवादियों से अलग यह अपना एक अलग किस्म का बौद्धिक जिहाद चला रहे होते हैं, जिनका पहला संघर्ष सामान्य विवेक और तर्क क्षमता से नजर आता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में पिछले दिनों छात्राओं से हुई छेड़छाड़ के मामले में दिल्ली पुलिस ने एक अहम बयान जारी किया है। दिल्ली पुलिस ने मामले में जानकारी देते हुए बताया है कि घटना के बाद से लगातार मीडिया हाउसों और सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया जा रहा था कि गार्गी कॉलेज की छात्राओं के साथ छेड़छाड़ करने वाले लोग भाजपा के गुंडे थे, जोकि हाथों में भगवा झंडे लिए हुए थे, लेकिन अभी तक सामने आई सीसीटीवी फुटेज में इस तरह की कोई तस्वीर सामने नहीं आई है।
इस बात की पुष्टि करते हुए डीसीपी दक्षिण दिल्ली अतुल ठाकुर ने बताया कि अब तक सीसीटीवी फुटेज में भगवा झंडे, या किसी भी तरह के झंडे पकड़े हुए लोग कहीं भी दिखाई नहीं दिए हैं। वहीं अतुल ठाकुर ने आगे कहा कि अभी तक की जाँच से यह पता नहीं चल सका है कि आरोपी किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं या नहीं, लेकिन सभी आरोपित या तो कॉलेज के छात्र हैं या फिर उनके दोस्त हैं।
मीडिया में इस मामले से संबंधित जितनी भी रिपोर्ट्स दिखाई गई, वह सभी एक इंस्टाग्राम हैंडल iawaken.in द्वारा अपलोड किए गए पोस्ट के आधार पर थीं। इसमें कहा गया था, “बीजेपी के गुंडे कैंपस के अंदर भगवा झंडे के साथ जय श्री राम का नारा लगा रहे थे।” इंस्टाग्राम हैंडल से ली गई इस पोस्ट में यह भी कहा गया था कि उन्होंने कॉलेज की लड़कियों के सुरक्षित स्थान को नष्ट कर दिया है, क्योंकि गार्गी कॉलेज एक महिला कॉलेज है, इसलिए यहाँ उनका दबदबा रहा है, लेकिन अब वो छीन लिया गया। वहीं इस पोस्ट का श्रेय @fuckbjp नाम के एक ट्विटर हैंडल को दिया गया था।
जब इस ट्विटर हैंडल की जाँच की गई तो @Fuckbjp नाम का अकाउंट बंद पाया गया। वहीं उक्त इंस्टाग्राम हैंडल से भी इस पोस्ट को हटा दिया गया है। वहीं इस मामले को NDTV के रवीश कुमार जैसे लोग अपना वामपंथी रंग देने में लगे हुए हैं। यह खुद गार्गी कॉलेज की छात्राओं ने स्वीकार किया है कि छात्राओं के साथ उत्पीड़न और बदसलूकी जरूर की गई लेकिन यह कहना एकदम बकवास है कि ऐसा करने से पहले धार्मिक नारे लगाए गए थे।
घटना के विरोध में गार्गी कॉलेज में छात्राओं का धरना प्रदर्शन अभी जारी है। इससे पहले दिल्ली पुलिस 10 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। साथ ही मामले का खुलासा करने के लिए दिल्ली पुलिस की 11 टीमें दिन-रात जाँच में लगी हुई हैं।
DCP South Delhi A Thakur:10 ppl arrested in connection with the case registered in PS Hauz Khas.Over 11 teams working on the case,looking at technical details available&visiting various sites in NCR for identification of suspects.Gargi College authorities spoken to by probe teams
आपको बता दें कि गार्गी कॉलेज में आयोजित तीन दिवसीय वार्षिक फेस्ट का छह फरवरी को अंतिम दिन था। कुछ छात्राओं ने कॉलेज प्रशासन से छेड़छाड़ की शिकायत दी थी। उन्होंने बताया था कि कॉलेज परिसर में दोपहर को जबरन घुसे बाहरी लोगों ने छात्राओं के सामने अश्लील हरकत कर छेड़छाड़ की। इस घटना पर गुस्सा जाहिर करते हुए उन्होंने इसे सुरक्षा में भारी चूक करार दिया था। वहीं इसके बाद घटना को लेकर कॉलेज प्रशासन हरकत में आया और मामले में पुलिस से शिकायत की गई।
गुरुवार (फरवरी 13, 2020) को जेएनयू के साबरमती हॉस्टल के बाहर NSUI की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में पूर्व वित्त मंत्री और कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम के NPR पर दिए गए बयान के बाद पार्टी के बीच बहसबाजी का दौर शुरू हो गया है। चिदंबरम के बयान पर कॉन्ग्रेस नेता संजय निरुपम ने उन्हें टोटल कन्फ्यूज बताया।
दरअसल चिदंबरम ने कहा था कि अगर सभी राज्य के लोग NPR के खिलाफ लामबंद हो जाएँ और राज्य सरकारें फैसला कर लें कि इसको लागू नहीं किया जाएगा, तो यह विफल हो जाएगा। राज्यों के सहयोग के बिना NPR को लागू नहीं किया जा सकता है।
Total confusion! Sri @PChidambaram_IN wants #NPR to be opposed. For that purpose, he gave some tips to #JNU students. In Maharashtra, where we are sharing power with #Shivsena the govt has announced to implement #NPR from 1st May to 15th June. Is leadership in Delhi aware of it ? https://t.co/L74pBRucrg
इस पर संजय निरुपम ने चिदंबरम को आड़े हाथों लेते हुए ट्वीट किया, “टोटल कन्फ्यूजन! पी चिदंबरम चाहते हैं कि NPR का विरोध हो। इसके लिए उन्होंने जेएनयू के छात्रों को कुछ टिप्स दिए हैं। वहीं, महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने एक मई से 15 जून के बीच NPR कराने का ऐलान किया है। महाराष्ट्र की सत्ता में कॉन्ग्रेस पार्टी शिवसेना की साझेदार है। क्या दिल्ली में कॉन्ग्रेस नेतृत्व को इसकी जानकारी है?”
चिदंबरम ने जेएनयू के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि NPR, NRC और CAA तीनों अलग हैं लेकिन तीनो इंटरकनेक्टेड है, संविधान में नागरिकता का प्रावधान है और पूरे विश्व में हर जगह देश के अंदर रहने वाले नागरिकों को नागरिकता का प्रावधान होता है। अगर किसी के पिता, ग्रैंड पेरेंट्स इंडिया में रह चुके हैं तो उनके बच्चे यहीं के नागरिक होते हैं।
इसके साथ ही चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री पर तंज कसते हुए कहा था कि कुछ दिनों में जेएनयू का नाम मोदी यूनिवर्सिटी या फिर अमित शाह यूनिवर्सिटी हो सकता है। उन्होंने कहा कि सिटिजनशिप को टेरिटरी बेस की जगह रिलीजियस बेस पर दिया जा रहा है और कई देशों में धर्म के आधार पर नागरिकता दी जाती है। लेकिन भारत इस आधार पर नहीं बना था।
उन्होंने सवाल किया था कि अगर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान हमारे पड़ोसी हैं, तो क्या भूटान, म्यांमार, चीन, श्रीलंका और नेपाल हमारे पड़ोसी नहीं हैं? अगर अल्पसंख्यकों के रिलिजियस परसिक्यूशन पर ही नागरिकता दे रहे हैं, तो फिर पाकिस्तान के अहमदिया, म्यांमार के रोहिंग्या, तमिल हिंदू-तमिल मुस्लिमों के लोगों के बारे में क्यों नहीं सोच रहे?
मुंबई के तीन ट्रेवल एजेंटों के खिलाफ हज के नाम पर 1.1 करोड़ की ठगी का मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक इन तीनों ने पिछले साल 50 लोगों को हज पर भेजने के नाम पर 1.1 करोड़ रुपए हड़प लिए। इसका खुलासा तब हुआ, जब 7 फरवरी 2020 को बेंगलुरू के आरटी नगर निवासी कारोबारी नूरुल्ला रहीम ने पुलिस से शिकायत की। उन्होंने मुंबई में आसरा एंटरप्राइजेज चलाने वाले अमीद हसन और यूसुफ हसन के साथ ही उसके एक स्टाफ इकबाल के खिलाफ मामला दर्ज कराया है।
शिकायत में नूरुल्ला ने कहा कि उसने और उसके रिश्तेदारों ने हज पर जाने की योजना बनाई थी। इसके लिए जनवरी 2019 में उन्होंने आरोपितों से संपर्क किया था। नूरुल्ला ने बताया कि आरोपित का नंबर उसे ऑनलाइन मिला था।
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “नूरुल्ला को आरोपितों ने कहा कि वे उसे और उसके 49 रिश्तेदारों को हज पर भेज सकते हैं। इसके लिए उन्होंने प्रति व्यक्ति 3.2 लाख रुपए का खर्च बताया। नूरुल्ला ट्रैवल एजेंट की बातों से सहमत हो गया और उसने मुंबई के आसरा एंटरप्राइजेज ऑफिस में कूरियर के माध्यम से 50 पासपोर्ट भेजे। इसके साथ ही उसने फरवरी 2019 में एडवांस के तौर पर उसके बैंक अकाउंट में 6 हजार रुपए भी जमा कराए।”
पुलिस ने आगे बताया कि नूरुल्ला ने दावा किया है कि उसने और उसके रिश्तेदारों ने जनवरी से अगस्त 2019 के बीच कई किश्तों में कुल 1.1 करोड़ रुपए आरोपित के खाते में जमा कराए। नूरुल्ला ने अपनी शिकायत में कहा, “हाल ही में मैंने आरोपित से वीजा और एयर टिकट भेजने के लिए कहा। इस पर अमीद ने कहा कि वीजा और एयर टिकट जल्द ही हमारे पास पहुँच जाएँगे, लेकिन उन्होंने कूरियर के जरिए हमारा पासपोर्ट वापस कर दिया। इसके बाद जब हमने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो हमने पाया कि उनके फोन स्विच ऑफ थे।”
आरटी नगर पुलिस ने तीनों के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने 6 लाख रुपए का भुगतान बैंक ट्रांजेक्शन के माध्यम से किया था, जबकि बाकी की राशि नकद में दिए थे। पुलिस ने शिकायतकर्ता को मामले से संबंधित और भी डॉक्यूमेंट्स उपलब्ध कराने के लिए कहा है। एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम संदिग्धों को पूछताछ के लिए बुलाएँगे और उनके खिलाफ सबूतों के आधार पर कार्रवाई करेंगे। जाँच जारी है।”
स्वयं को निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकारिता कहकर खुद ही अपनी पीठ थपथपाने वाले मुख्यधारा की मीडिया का खोखलापन अक्सर सामने आता रहता है। इस बार मीडिया में यह कारस्तानी कोई और नहीं बल्कि देश के कुछ प्रमुख समाचार चैनल्स कर रहे हैं।
सनसनी के उद्देश्य से किसी भी काल्पनिक घटना को हवा देना कोई लिबरल और कथित निष्पक्ष मीडिया गिरोह से सीख सकता है। ‘प्रोपेगैंडा परमो धर्मः’ को अगर कोई चरितार्थ करता है तो वह हमारे देश की मुख्यधारा की मीडिया ही है।
दरअसल, हाल ही में इंडिया टुडे ने धर्मांतरण से जुड़ी हुई एक ऐसी घटना को प्रकाशित किया था, जिसका ऑपइंडिया दिसंबर में ही फैक्ट चेक कर उसे फर्जी ख़बर साबित कर चुका था। लेकिन भारतीय मीडिया और उसका अतिरेक के प्रति लगाव कोई नई बात नहीं है, खासतौर पर तब, जब यह हिन्दू धर्म के लोगों में जातिगत भेदभाव बढ़ाकर उनमें दरार डालने के उद्देश्य से प्रसारित की जा रही हो।
‘इंडिया टुडे’ के बाद इस फर्जी खबर को अब ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ द्वारा अपने समाचार पत्र में छापा गया है। ख़ास बात यह है कि इस खबर को सिर्फ छाप देने के उद्देश्य से ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ ने बेहद सावधानी से लेकिन मूर्खतापूर्ण तरीके से पेश किया है।
कुछ दिन पहले ही ‘द हिन्दू’ और ‘इंडिया टुडे’ जैसे नामी मीडिया संस्थानों ने कुछ महीने पुरानी फर्जी ख़बर दोबारा प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया है कि तमिलनाडु के कोयम्बटूर में दीवार गिरने से 17 दलितों की मौत के बाद 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है। दिसंबर में धर्मान्तरण की यह फेक ख़बर ख़ूब शेयर हुई थी। उस समय इन समाचार पत्रों द्वारा 3,000 लोगों के मजहबी धर्मान्तरण के आँकड़े दिए जा रहे थे।
‘इंडिया टुडे’ ने संगठन ‘तमिल पुलिगल कच्ची’ के हवाले से लिखा कि 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है और कई अन्य इसी राह पर हैं। साथ ही ये भी लिखा गया कि क्षेत्र के दलितों ने भेदभाव की बात कही है। कुछ दलितों के बयान भी प्रकाशित किए गए हैं।
आज के टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस फर्जी खबर को एक बार फिर से प्रकाशित किया है। TOI ने हेडलाइन में लिखा है- “Outfit claims several Dalits converted to islam” जिसका अर्थ है- “सूत्रों के अनुसार कुछ दलितों ने इस्लाम में धर्मांतरण किया।”
इस हेडलाइन के साथ ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने ‘सूत्रों का दावा’ जैसे अस्वीकरण को जोड़कर पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वो सिर्फ हवा में निशाना लगाने का प्रयास कर रहे हैं। मीडिया अक्सर इस तरह की कारस्तानी सस्ती चर्चा, बहस और लोकप्रियता कमाने के उद्देश्य से किया करती है। इनमें किसी भी चर्चा को हवा देकर प्रासंगिक बने रहने का सबसे आसान तरीका होता है कि खबर के साथ ‘सूत्र’ ‘मीडिया’ ‘रिपोर्ट्स’ जोड़ दिया जाए।
TOI की इस खबर को पूरा पढ़ने पर आप देखते हैं कि ‘हालाँकि, TOI इस दावे की पुष्टि नहीं कर पाया।’ आजकल यह ‘हालाँकि’ ही मुख्यधारा की निष्पक्षता का सबसे बड़ा हथियार बना हुआ है। इसी रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि तमिलनाडू के नाडूर गाँव में, जहाँ कि दीवारी ढह गई थी, किसी ने भी धर्मान्तरण नहीं किया है।
इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि नाडूर के ही लोगों ने कहा है- “हम भगवान पेरुमल में कट्टरता से विश्वास करते हैं और हिंदू धर्म नहीं छोड़ेंगे।”
इस फर्जी और मनगढ़ंत खबर में यह साबित करने की कोशिश की गई थी कि सवर्णों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद ही इन दलितों ने इस्लाम अपनाने और धर्मांतरण का फैसला लिया था। फर्जी रिपोर्ट्स में कहा गया कि तमिलनाडू के नाडूर गाँव के शिवसुब्रमन्यम ने अपने पड़ोस में दलितों का घर न हो, इसलिए बीचों-बीच एक दीवार खड़ी कर दी थी। लेकिन दिसंबर 02, 2019 को बीच की दीवार गिरने की वजह से 17 दलितों की जान चली गई थी।
रिपोर्ट्स इस तरह के दावे भी करती नजर आती है कि धर्मांतरण कर चुके लोग डर के कारण यह बात स्वीकार नहीं करते हैं, इसलिए धर्मान्तरण के दावे वाहियात बताए जा रहे हैं।
रिपोर्टिंग के इस पूरे हास्यास्पद प्रकरण से गुजरने के बाद एक बार सोचिए कि ‘द हिन्दू’ से लेकर ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ जैसे संस्थानों द्वारा इस प्रकार की एकदम मनगढ़ंत खबरों को सनसनी बना देने से पहले इस खबर की एक बार पुष्टि कर पाना कितना मुश्किल था?
जब ऑपइंडिया जैसा एक छोटा सा मीडिया संस्थान इस प्रकरण की तह तक जाकर इसकी वास्तविकता पता कर सकता था, तो फिर बड़े और ‘निष्पक्ष मीडिया’ संस्थानों के विश्वसनीय रिपोर्टर्स ने आखिर इस घटना की प्रमाणिकता सिद्ध करने के बजाए सब कुछ ‘सूत्रों के’ सिर क्यों आरोपित करना ही बेहतर समझा?