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‘अब समय आ गया है कि हनुमान चालीसा का पाठ दिल्ली के विद्यालयों, मदरसों, शैक्षणिक संस्थानों में हो’

दिल्ली विधानसभा चुनावों में बहस का मुद्दा बनी हनुमान चालीसा एक बार फ़िर नए सिरे से चर्चा में आ गई है। इसकी शुरूआत इस बार बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने केजरीवाल को हनुमान जी की कृपा से हुई जीत पर बधाई देते हुए की है। इसे लेकर लोगों ने ट्विटर पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ दी हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की 62 सीटें आने के बाद केजरीवाल फिर से अपनी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहे हैं। इस बीच बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अरविंद केजरीवाल को जीत की बधाई देते हुए ट्वीट किया, “निश्चित ही जो हनुमान जी की शरण में आता है उसे आशीर्वाद मिलता है। अब समय आ गया है कि हनुमान चालीसा का पाठ दिल्ली के सभी विद्यालयों, मदरसों सहित सभी शैक्षणिक संस्थानों में भी जरूरी हो।” कैलास विजयवर्गीय ने केजरीवाल से एक सवाल भी किया कि बजरंगबली की कृपा से अब दिल्लीवासी और बच्चे क्यों वंचित रहें?

गौरतलब है कि 11 फरवरी को आए दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम में आम आदमी पार्टी को 70 से 62 सीटें, बीजेपी को 8 सीटें मिली हैं। वहीं कॉन्ग्रेस दिल्ली में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। इसी के साथ 16 फरवरी को अरविंद केजरीवाल फिर से दिल्ली के मुख्मंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं।

आपको बता दें कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में 5 दिन पूर्व एक समाचार चैनल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों के कहने पर हनुमान चालीसा का पाठ किया था। न्यूज 18 हिंदी चैनल द्वारा आयोजित ‘एजेंडा दिल्ली’ में एंकर ने केजरीवाल से पूछा था कि क्या वह हनुमान मंदिरों का दौरा करते हैं, तो केजरीवाल ने उत्साह से हाँ में जवाब दिया था। इसे लेकर मुस्लिमों ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त की थी।

वहीं इस कार्यक्रम के बाद बीजेपी पार्टी सहित अन्य लोगों ने केजरीवाल को अपने निशाने पर लिया था और कहा था कि, एक तरफ तो केजरीवाल शाहीन बाग को खुलकर अपना समर्थन दे रहे हैं, जहाँ आए दिन देशविरोधी नारे लगाए जा रहे हैं और हिंदुओं को गाली देते हुए बिरयानी बाँटी जा रही है। साथ ही लोगों ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं।

अल्लाह मेहरबान तो PK पहलवान: मिलिए, चुनावी कैंपेन की दुनिया के ‘रामविलास’ से

बिहार की एक पार्टी है। पार्टी क्या, पारिवारिक दल कह लीजिए। लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा। इसके संस्थापक रामविलास पासवान फिलहाल राज्यसभा से सांसद और मोदी कैबिनेट के मंत्री हैं। रामविलास की राजनीति में पहचान मौसम वैज्ञानिक के तौर पर है। सरकार भले बदल जाए सरकार में उनकी हिस्सेदारी नहीं बदलती। हवा का रूख भांपने में उनका कोई सानी नहीं। अब ऐसा लगता है कि यह हुनर पीके यानी प्रशांत किशोर में भी कूट-कूट कर भरी है। बतौर चुनावी रणनीतिकार राजनेताओं से करीबी गढ़ने में माहिर पीके हर बार हवा के साथ होते हैं। इसकी बदौलत अपनी ब्रांडिंग करते हैं और मीडिया को भी दीवाना बना लेते हैं।

11 फरवरी को आम आदमी पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल हुई और अरविन्द केजरीवाल के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ हो गया। इसी दिन प्रशांत किशोर के साथ केजरीवाल की फोटो वायरल हुई। दोनों साथ में टीवी पर चुनाव परिणाम देख रहे थे। दोनों के गले मिलते हुए फोटो वायरल हुए। आधुनिक राजनीति में पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर के पीछे एक बार फिर मीडिया बावला हो गया और उनकी ‘चाणक्य’ वाली छवि के महिमामंडन में जुट गया। क्या सचमुच AAP की जीत प्रशांत किशोर की देन है?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत करीब-करीब तय थी। सवाल था कि क्या एकतरफा लग रहे इस चुनाव को बीजेपी और कॉन्ग्रेस मुकाबले में बदल पाएगी। वोटों की हिस्सेदारी से तो कुछ हद तक भाजपा ऐसा करती दिख रही है। लेकिन, कॉन्ग्रेस के प्रचार के दौरान ही सरेंडर करने का फायदा आप को मिला है यह भी स्पष्ट है। सारे ओपिनियन और एग्जिट पोल्स में भी आप की सत्ता में धमाकेदार वापसी के अनुमान लगाए गए थे।

चुनाव से ठीक पहले केजरीवाल ने ट्वीट कर सूचना दी थी कि प्रशांत किशोर की कम्पनी ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC)’ ने उनके चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी सँभाली है। केजरीवाल की जीत के साथ ही प्रशांत किशोर के लिए ‘अल्लाह मेहरबान…’ वाली कहावत चरितार्थ हुई। दिल्ली की 8 मुस्लिम बहुल सीटों पर केजरीवाल की पार्टी की जीत हुई। इनमें से 4 प्रमुख मुस्लिम बहुल सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों के खाते में गई। मुस्लिमों में गजब का ध्रुवीकरण हुआ। कॉन्ग्रेस के आधे वोटर निकल लिए।

अगर एक भी सर्वे, ओपिनियन पोल अथवा एग्जिट पोल में भाजपा की जीत की भविष्यवाणी जताई गई होती और तब केजरीवाल सत्ता में वापसी करते, तब प्रशांत किशोर के योगदान पर कम से कम चर्चा तो हो ही सकती थी। लेकिन, जहाँ चीजें सपष्ट दिख रही थी, वहाँ प्रशांत किशोर ने एक तरह से फिर से बहती गंगा में हाथ धोकर खुद की जिताऊ रणनीतिकार की गढ़ी हुई छवि और मजबूत कर ली। उन्हें हाल ही में जदयू से निकाल बाहर किया गया है। सीएए पर उनका रुख पार्टी के मुखिया नीतीश कुमार से एकदम भिन्न था। सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

इसके बाद जिस नीतीश कुमार ने पीके को कैबिनेट मंत्री स्तर का दर्जा दिया था, उन्होंने ही उन्हें पार्टी से बाहर करने में देर न लगाई। जदयू ने प्रशांत किशोर का समर्थन करने वाले चन्दन कुमार सिंह को भी निकाल बाहर किया। चन्दन पटना महानगर युवा जदयू के राज्य सचिव थे। सोचने वाली बात है, कोई भी दल किसी ‘राजनीतिक चाणक्य’ को निकाल बाहर क्यों करेगा, जब वो चुटकियों में चुनाव जिताने की क्षमता रखता हो। कम से कम मीडिया तो उन्हें यही तमगा देती है। लेकिन, नीतीश ने ऐसा किया। क्योंकि उन्हें भलीभॉंति पता था कि 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्हें जीत पीके की रणनीतियों के बदौलत नहीं मिली थी।

असल में बिहार के राजनीतिक समीकरण ही कुछ ऐसे हैं कि दो बड़े दल जिधर होते हैं बाजी उसके ही हाथ लगती है। बीजेपी को छोड़ 2014 के आम चुनावों में कमजोर हुई जदयू ने विधानसभा चुनाव से पहले राजद से गठबंधन किया। राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण उसे 30% से भी अधिक जनसंख्या को साधने का जरिया बनाता रहा है। ख़ासकर लालू यादव के सक्रिय रहने से ये चीज और आसान हो जाती है। नीतीश के सोशल इंजीनियरिंग को मिला दें तो महादलितों और कुर्मी वर्ग का भी साथ महागठबंधन को मिल जाता है। ऊपर से नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ वाली छवि। ऐसे में प्रशांत किशोर ने ज्यादा से ज्यादा सीटें टच करने की सलाह लालू और नीतीश दोनों को दी। दोनों ने लगभग हर सीट पर सभाएँ की और महागठबंधन जीत गया।

एक मँझे हुए राजनेता नीतीश कभी भी प्रशांत किशोर को जाने नहीं देते, अगर उनका 2015 की जीत में जरा सा भी योगदान होता। इसी तरह पंजाब में अकाली सरकार के ख़िलाफ़ घोर एंटी-इंकम्बेंसी थी, जिसे कॉन्ग्रेस ने भुनाया। कैप्टेन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की वापसी तय थी। अगर उन्हें सीएम उम्मीदवार न घोषित किया गया होता तो शायद कुछ चर्चा हो भी सकती थी। बीच चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गाँधी को कैप्टेन के सामने झुकना पड़ा और उन्हें चेहरा बनाने को मजबूर होना पड़ा। कॉन्ग्रेस की जीत हुई और प्रशांत किशोर एक बार फिर से लहरिया लूट ले गए।

आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए। प्रशांत किशोर की कम्पनी ने वाईएसआर कॉन्ग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के लिए रणनीति बनाने व प्रचार की कमान सँभाली। लोकसभा और विधानसभा, दोनों में ही चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को बुरी हार का सामना करना पड़ा। यहाँ भी नतीजे आश्चर्यजनक नहीं थे। जगन ने राज्य भर में पदयात्राएँ और सभाएँ महीनों पहले शुरू कर दी थी। नायडू के ख़िलाफ़ एंटी-इंकम्बेंसी थी सो अलग। पीके के जुड़ने से पहले से ही राज्य की सत्ता में जगन के काबिज होने के कयास लगाए जा रहे थे। इस लिहाज से यहॉं भी पीके ने हवा के साथ होकर अपनी ब्रांडिंग की।

इस दौरान पीके को जो सबसे मुश्किल मोर्चा मिला था उस पर वह बुरी तरह नाकाम रहे। 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों के लिए कॉन्ग्रेस ने रणनीति बनाने की जिम्मेदारी उन्हें ही सौंपी थी। कॉन्ग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन भी किया। लेकिन, पीके कॉन्ग्रेस की किस्मत नहीं बदल पाए थे। साफ़ है जहाँ मुकाबला कठिन हो, वहाँ पीके की परफॉरमेंस एकदम शून्य हो जाती है। बाद में इस दाग को धोने के लिए उन्होंने यूपी में हार का ठीकरा पूरी तरह कॉन्ग्रेस के नेताओं पर फोड़ दिया। लेकिन, उसी समय पंजाब में कॉन्ग्रेस की जीत का सेहरा अपने सिर बॉंधने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

असल में 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने जो भी तौर-तरीके आजमाए- सब हिट हो गए। उन्होंने जिसके साथ हाथ मिलाया, वो जननेता बन गया। उन्होंने जो नारा दे दिया, वो चुनाव का ही स्लोगन बन गया। उनके लिए जिन लोगों ने काम किया, वो ‘चाणक्य’ कहला गए। उन्हीं में से एक प्रशांत किशोर भी थे, जो मोदी की लोकप्रियता की नाव चढ़ कर मीडिया के महिमामंडन के कारण उभर कर सामने आए। पीके का मोदी की जीत में क्या योगदान था, ये आज तक किसी को नहीं पता चल पाया। लेकिन हाँ, वो जुड़े हुए थे, तो मीडिया की नज़रों में छा गए।

अब आते हैं कुछ ऐसी ख़बरों पर, जिनकी चर्चा तो हुई लेकिन वो छिप गईं। प्रशांत किशोर को लेकर नीतीश कुमार कह चुके हैं कि उन्होंने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह के कहने पर उन्हें पार्टी में शामिल किया था। उससे पहले ख़बर आई थी कि प्रशांत किशोर ब्यूरोक्रेसी में ‘लेटरल एंट्री’ चाहते हैं और वो मोदी से इसी कारण नाराज़ हुए। वो कहते रहे हैं कि वो पीएमओ के लिए एक विंग बनाना चाहते थे, जिसके लिए वो भर्तियाँ करते। एक ‘Lobbyist’ अपने अलग-अलग लोगों को कुर्सी तक पहुँचा कर विभिन्न प्रकार के काम निकलवा सकता है, ये छिपा नहीं है। नीरा राडिया से लेकर अमर सिंह जैसे लोग ये काम दशकों से करते रहे हैं।

दिल्ली के सियासी गलियारों में चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस के सरेंडर को प्रियंका गॉंधी के साथ पीके के अच्छे संबंधों से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा जोरों पर है कि पीके की सलाह पर ही कॉन्ग्रेस के नेतृत्व ने इस चुनाव को लेकर उत्साह नहीं दिखाया और आप के लिए लड़ाई को आसान बनाने की कोशिश की।

असल में मोदी मैजिक पर सवार होकर आए पीके अब भाजपा विरोधी गैंग में अपनी घुसपैठ मजबूत करने की फिराक में लगे हुए हैं। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जदयू के स्टैंड से विपरीत जाकर उनका आक्रामक रूख अपनाना और दिल्ली के नतीजों के बाद ट्वीट कर यह कहना कि भारत की आत्मा की रक्षा करने के लिए दिल्ली की जनता का धन्यवाद, को उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से जोड़कर ही देखा जा रहा है। अब यह तो वक्त ही बताएगा पीके अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर पाएँगे या फिर ब्रांडिंग की दुनिया के ‘रामविलास’ बनकर ही रह जाएँगे।

पोस्ट डालो, पैसे पाओ: ममता बनर्जी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए प्रशांत किशोर की टीम लेकर आई नई स्कीम

कॉन्ग्रेस की कमान संभालने के लिए पर्दे के पीछे से साजिश रच रहीं हैं प्रियंका गॉंधी: रिपब्लिक TV का दावा

हर दूसरे दिन पिट रहे हैं कन्हैया कुमार, जूता-चप्पल, अंडा, मोबिल, पत्थर… सब बरसा रहे बिहारी

बिहार में जन-गण-मन यात्रा पर निकले जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और CPI नेता कन्हैया कुमार को लगातार भारी विरोध का सामना करना पड़ा रहा है। विरोध भी कुछ इस तरह कि लोग कन्हैया पर अंडे, मोबिल और पत्थर तक फेंक रहे हैं। बीते दो सप्ताह में 7 बार उनके काफिले पर हमला हो चुका है।

जानकारी के मुताबिक मंगलवार को गया ज़िले के इमामगंज क्षेत्र के गाँधी मैदान में CPI की ओर से सीएए के ख़िलाफ़ जनसभा का आयोजन किया गया था। सभा को संबोधित करने जा रहे कन्हैया कुमार के काफ़िले पर विश्रामपुर के पास पथराव किया गया। काफिले पर लोगों ने अंडा, स्याही, जला हुआ मोबिल और पत्थर फेंके। विरोध कर रहे लोगों ने काले झंडे दिखाते हुए कन्हैया मुर्दाबाद के नारे लगाए। पथराव में कन्हैया के काफिले के साथ चल रहे वजीरगंज से कॉन्ग्रेस के विधायक अवधेश प्रसाद सिंह की गाड़ी का शीशा टूट गया।

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दैनिक जागरण के गया संस्करण में 12 फरवरी 2020 को प्रकाशित खबर

इसके पहले सोमवार को जमुई से नवादा आते वक्‍त कन्हैया के काफिले पर हमला किया गया था। इस दौरान लोगों ने नवादा में उनके लिए कौआ कुमार की संज्ञा देते हुए गो बैक के पोस्‍टर दिखाए थे। आपको बता दें कि, पिछले करीब 14 दिनों में कन्‍हैया पर मोतिहारी, सुपौल, कटिहार, सीवान, मधेपुरा, गोपालगंज, जमुई, गया और सारण सहित कई स्थानों पर सात बार हमला हो चुका है। इतना ही नहीं कन्हैया इस यात्रा के दौरान जहाँ कहीं भी गए वहीं उनकों लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा है। कन्हैया का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि वह देशद्रोही हैं, उनसे देश के लिए बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती।

कन्हैया कुमार ये बि​​हारी हैं सब पबित्तर कर देंगे, मैदान से लेकर वामपं​थी प्रोपेगेंडा की दुकान तक

बिग BC का नया चुटकुला: ‘कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी ही नहीं, पूरी सरकार चिंतित है’

लिंगलहरी कन्हैया कुमार के गुंडे चुनावी गाड़ियों में डंडे-ईंट-पत्थर लेकर क्यों चलते हैं?

संख्या नहीं गिनाएँगे, सैकड़ों प्रदर्शनकारी बताएँगे: AltNews ने किया शाहीन बाग़ के सन्नाटे का फर्जी फैक्ट चेक

जगजाहिर है कि दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में चल रहे प्रदर्शन के पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही हैं। भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की मंशा रखने वाले शरजील इमाम की गिरफ़्तारी के बाद चीजें स्पष्ट हो गई हैं। शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों का जोश चुनाव परिणाम आते ही ठंडा पड़ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि आम आदमी पार्टी की भारी जीत से मुस्लिमों का मकसद पूरा हो गया है। ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित एक ख़बर ने भी इस बात की पुष्टि की। भाजपा की हार के साथ ही शाहीन बाग़ वीरान पड़ गया है और वहाँ से प्रदर्शनकारी जाने लगे हैं।

ये बातें फैक्ट-चेक का दावा करने वाली वेबसाइट ‘ऑल्टन्यूज़’ को नागवार गुजरी। ऑपइंडिया ने भी इस ख़बर को चलाया था, जिससे ‘ऑल्ट न्यूज़’ को मिर्ची लग गई। भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने ऑपइंडिया की इस ख़बर को शेयर किया, जिससे प्रतीक सिन्हा का प्रोपेगेंडा पोर्टल तिलमिला उठा। शाहीन बाग़ में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा लगा है, ये साबित करने के लिए उसने बेसिक गणित ज्ञान को भी तिलांजलि दे दी।

उसने ‘द क्विंट’ के एक पत्रकार द्वारा ली गई तस्वीरों से यह साबित करने का प्रयास किया कि शाहीन बाग़ पूरा भरा हुआ है। वहाँ की एक तस्वीर में एक भी व्यक्ति नहीं दिख रहा है। प्रोपेगेंडा पोर्टल ने बताया कि यह तस्वीर 11 फरवरी के सुबह 8 बजे की है, जब प्रदर्शनकारी सो रहे थे और मुस्लिम महिलाएँ आई नहीं थीं। यहाँ सवाल उठता है कि क्या अब सोने को भी विरोध-प्रदर्शन माना जाएगा? क्या कोई व्यक्ति अपने घर में सो जाएगा तो उसे भी विरोध-प्रदर्शन माना जाएगा? ‘ऑल्ट न्यूज़’ ने लिख दिया कि प्रदर्शनकारी सो रहे हैं, इसलिए वहाँ कोई नहीं दिखा।

इसकी तुलना घोड़ा और घास वाली पेंटिंग से की जा सकती है। कहानी के अनुसार, एक पेंटिंग थी जो पूरी खाली थी। एकदम सफ़ेद। चित्रकार उसे घोड़ा और घास की पेंटिंग बताता था। किसी ने पूछ दिया कि चित्र में घास कहाँ है, तो पेंटर ने बताया कि घास तो घोड़ा खा गया। उसे भूख लगी थी तो छोड़ेगा थोड़े? जब पूछा गया कि घोड़ा कहाँ है, तो पेंटर ने जवाब दिया कि घास खा कर घोड़ा बैठा थोड़ी न रहेगा, वो चला गया पेट भर के अपना। यही हाल ‘ऑल्टन्यूज़’ का है। वो सैकड़ों प्रदर्शनकारी और सोते हुए प्रदर्शनकारी के बीच फँसा हुआ है।

‘ऑल्टन्यूज़’ के भ्रामक और प्रपंची फैक्ट-चेक की खुली पोल

‘ऑल्टन्यूज़’ ने दावा किया कि वहाँ सैकड़ों प्रदर्शनकारी मौजूद हैं, जबकि तस्वीरों में ऊँगली पर गिने जाने लायक ही प्रदर्शनकारी दिखते हैं। बाकी समय ‘ऑल्ट न्यूज’ नासा के सॉफ़टवेयर इस्तेमाल करके फोटो लेने की तारीख, समय और फोटोग्राफर का मूड तक बता दिया करता है, लेकिन इस तस्वीर के बारे में यही बता पाया कि प्रदर्शनकारी सो रहे थे। सवाल यह है कि वो वहाँ प्रदर्शन करने गए थे या सोने? क्या वहाँ प्रदर्शन के लिए शिफ्ट नहीं लगा करती थी? वो वहाँ संविधान बचा रहे हैं कि सो रहे हैं?

इस चित्र में आपको कहाँ दिख रहे हैं सैकड़ों प्रदर्शनकारी?

‘ऑल्टन्यूज़’ ने प्रदर्शनकारियों की संख्या की पुष्टि क्यों नहीं की? ये तो वही बात हो गई कि किसी ने पूछा कि आसमान में कितने तारे हैं तो एक हाजिरजवाब व्यक्ति ने बताया कि जितने उसके सिर में बाल हैं, उतने ही। सैकड़ों प्रदर्शनकारी? कितने सौ? 200..300..400..?? अगर इतने हैं तो दिख क्यों नहीं रहे? क्या वो अदृश्य हैं? जिन चार तस्वीरों को दिखा कर, 8 बजे से 12 बजे की तस्वीरें बता कर ऑल्टन्यूज यह क्लेम कर रहा है कि वहाँ सैकड़ों कर्मचारी हैं, उनमें से तीन तस्वीरों में कुल दस लोग भी नहीं दिख रहे और चौथी में संख्या तीस के आस-पास है।

Scroll, AltNews और पत्रकारिता के ‘एलीटिस्ट’ समुदाय विशेष को ब्रिटिश हेराल्ड के अंसिफ अशरफ़ का जवाब

जब AltNews ने 3 वर्षीय बच्ची की निर्मम हत्या के आरोपित ज़ाहिद, असलम के पापों को धोने की कोशिश की

मतगणना के साथ ही खाली हुआ शाहीन बाग, नजर आए इक्के-दुक्के प्रदर्शनकारी

आरिफ ने सीमा को दिया तीन तलाक, फिर मिट्टी तेल छिड़क लगा दी आग

उत्तर प्रदेश के रामपुर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। थाना खेड़ा टांडा निवासी एक युवक ने दहेज की माँग पूरी न करने पर बीबी को पहले तीन तलाक दिया फिर परिजनों की मदद से उसे आग के हवाले कर दिया। 75 फीसदी झुलस चुकी पीड़िता सीमा अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। उसके शौहर आरिफ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। अन्य आरोपितों की तलाश की जा रही है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार घटना रविवार (9 फरवरी 2020) को दहेज़ को लेकर सीमा और आरिफ के बीच झगड़ा हुआ। झगड़े के दौरान ही आरिफ ने तीन तलाक दे सीमा को घर से निकलने को कहा। इसका विरोध करने पर मिट्टी का तेल डाल आग के हवाले कर दिया और मौके से फरार हो गया। सीमा की चीख पुकार सुन आस-पड़ोस के लोग मौके पर पहुँचे और उसे जिला अस्पताल गए ले गए। हालत देख उसे मुरादाबाद के टीएमयू सेंटर रेफर कर दिया गया।

दैनिक जागरण के रामपुर संस्करण में 11 फरवरी 2020 को प्रकाशित खबर

सीमा के परिजनों की तहरीर पर पुलिस ने शौहर आरिफ सहित पाँच के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। इनमें ससुर बन्ने, सास हनीफा, जेठ तालिब और तारिक भी शामिल हैं। अजीमनगर थाना प्रभारी अमरीश कुमार ने बताया कि आरोपित पति आरिफ को सोमवार को खेमपुर बस अड्डे से गिरफ्तार कर लिया गया है। जल्द ही अन्य आरोपित भी गिरफ़्तार कर लिए जाएँगे।

जानकारी के मुताबिक खेड़ा टांडा निवासी नजाकत अली की बेटी सीमा का निकाह दो साल पहले दौंकपुरी टांडा निवासी मोहम्मद आरिफ से हुआ था। सीमा के परिजनों ने निकाह में सात लाख रुपये खर्च किए थे। आरोप है कि ससुराल के लोग उसे कम दहेज लाने का ताना देते थे। वे दहेज में बोलेरो गाड़ी की मॉंग कर रहे थे। मॉंग पूरी नहीं होने पर उसे प्रताड़ित करते थे।

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कॉन्ग्रेस को दुकान बंद कर देनी चाहिए: AAP की जीत पर ख़ुश चिदंबरम को प्रणब मुखर्जी की बेटी ने लताड़ा

दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम क्या आए, कॉन्ग्रेस पार्टी का तो सूपड़ा ही साफ़ हो गया। 70 में से कुल 67 सीटों पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। चाँदनी चौक से अलका लाम्बा 4000 वोटों के लिए भी तरस गईं और उन्हें मात्र 5% वोटों से संतोष करना पड़ा। वहीं गाँधी नगर से लड़ रहे दिल्ली कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली को 21,913 वोट मिले। इन दोनों ही नेताओं को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। आम आदमी पार्टी और भाजपा के मुकाबले में कॉन्ग्रेस कहीं नहीं ठहरी।

पार्टी की बुरी हार के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता ख़ुश नज़र आ रहे हैं। पी चिदंबरम और अधीर रंजन सरीखे नेताओं ने सीएम केजरीवाल की तारीफों के पुल बाँधे। चिदंबरम ने कहा कि आप की जीत हुई, बेवकूफ बनाने तथा फेंकने वालों की हार। उन्होंने केजरीवाल की जीत को ध्रुवीकरण, विभाजनकारी और खतरनाक एजेंडे की हार बताया। बकौल चिदंबरम, दिल्ली की जनता ने 2021 और 2022 में अन्य राज्यों जहाँ चुनाव होंगे, वहाँ के लिए मिसाल पेश की है। उन्होंने दिल्ली की जनता को सलाम किया।

कॉन्ग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता शर्मिष्ठा मुखर्जी को चिदंबरम की ये बातें पसंद नहीं आईं। कॉन्ग्रेस अपनी बुरी हार के बावजूद ख़ुश हो रही है, ये उन्हें नागवार गुजरा। उन्होंने पूर्व केन्दीय गृह मंत्री पी चिदंबरम से पूछ डाला कि क्या भाजपा ने क्षेत्रीय दलों को भाजपा को हराने का ठेका दे दिया है? उन्होंने पूछा कि वो इस सम्बन्ध में जानकारी चाहती हैं। शर्मिष्ठा ने कहा:

“अगर कॉन्ग्रेस ने क्षेत्रीय दलों को भाजपा को हराने का ठेका नहीं दिया है, तो फिर हम आम आदमी पार्टी की जीत पर ख़ुश क्यों हो रहे हैं? हमारी बुरी हार हुई है, उसे लेकर हम चिंतित क्यों नहीं हो रहे हैं? अगर कॉन्ग्रेस ने स्थानीय पार्टियों को भाजपा को हराने का ठेका दे दिया है, फिर हमें अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए। भाजपा विभाजनकारी राजनीति से काम कर रही है, केजरीवाल स्मार्ट पॉलिटिक्स खेल रहे हैं। हम क्या कर रहे हैं? हमारे नेताओं को अपने इको चैम्बरों से बाहर निकलना पड़ेगा। अब आत्ममंथन का समय गया। एक्शन का समय है। “

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा दिल्ली महिला कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष भी हैं। बता दें कि इस चुनाव में कॉन्ग्रेस का वोट शेयर मात्र 4.26% रह गया है। पार्टी के नेता आपस में लड़ते रहे और चुनाव की तैयारी भी नहीं की। कीर्ति झा आज़ाद और सुभाष चोपड़ा जैसों को चेहरा बनाया गया लेकिन वो निष्क्रिय रहे। लेकिन, फिर भी पार्टी नेता ख़ुश हो रहे हैं क्योंकि भाजपा की हार हुई है। भाजपा 38.51% वोट शेयर के साथ अभी भी राज्य में मजबूत पार्टी बनी हुई है।

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AAP विधायक के काफिले पर 4 राउंड फायरिंग, 1 की मौत: मंदिर में दर्शन कर लौट रहे थे नरेश यादव

साउथ-वेस्ट दिल्ली के किशनगढ़ में आम आदमी पार्टी के नव-निर्वाचित विधायक के काफिले पर फायरिंग की गई। इस गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ये हमला AAP विधायक नरेश यादव के काफिले पर मंगलवार (11 फरवरी 2020) की रात हुआ। नरेश यादव लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। महरौली क्षेत्र से उन्होंने इस बार 62301 मत पाकर भाजपा की कुसुम खत्री को मात दी है। जीत के बाद यादव अपने क्षेत्र में स्थित एक मंदिर में पूजा-अर्चना करने गए थे। वहाँ से लौटने के क्रम में उनके काफिले पर हमला हुआ।

एक अन्य व्यक्ति के घायल होने की भी ख़बर है, जो नरेश यादव के साथ ही था। आम आदमी पार्टी ने अपने अधिकारी ट्विटर हैंडल से जानकारी दी कि मंदिर से लौटते समय विधायक नरेश यादव के काफिले पर फायरिंग हुई, जिसमें गोली लगने से एक समर्थक की मौत हो गई। मीडिया में चल रही ख़बरों के अनुसार, अज्ञात लोगों ने विधायक व उनके समर्थकों पर 4 राउंड फायरिंग की। एक घायल को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। AAP नेता संजय सिंह ने बताया कि मृतक का नाम अशोक मान है।

आम आदमी पार्टी ने कहा कि अशोक के रूप में उसने अपने परिवार के एक सदस्य को खो दिया है। अज्ञात अपराधी कार से आए थे। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी कहा जा रहा है कि एक ही अपराधी था, जो पैदल आया था। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर छानबीन की। विधायक यादव ने कहा कि ये घटना दुखद है। उन्होंने कहा कि उन्हें ये तक नहीं पता है कि उन पर हमला क्यों किया गया और इसके पीछे कौन लोग शामिल थे।

विधायक ने बताया कि सबकुछ अचानक से हो गया। उनकी गाड़ी पर भी हमला किया गया। विधायक ने आशा जताई कि पुलिस दोषियों को खोज निकालने में समर्थ होगी। जब गोलीबारी हुई, तब विधायक का काफिला फोर्टिस अस्पताल के नजदीक स्थित रेड लाइट के पास रुका हुआ था।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की है। अरविन्द केजरीवाल फिर से मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे। उनकी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतीं। सीटों के मामले में मुकाबला एकतरफा रहा और भाजपा को मात्र 8 सीटों से संतोष करना पड़ा। वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी का पूरी तरह सूपड़ा साफ़ हो गया।

गोलीबारी की घटना में एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया गया है। पुलिस ने बताया है कि इस घटना का राजनीति से कुछ लेनादेना नहीं है और ये व्यक्तिगत दुश्मनी में हुई वारदात है। इस मामले में आगे की जाँच की जा रही है।

राहुल गाँधी ने मोदी के लिए कहा ‘डंडे मारेंगे’, समुदाय विशेष ने धुनिया बन कॉन्ग्रेस को धुना

गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखा है;
ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी
हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की

कहार की जगह भारतीय सियासत के वोट बैंक (मुस्लिमों) और दुल्हन की जगह कॉन्ग्रेस को रख दें तो ऐसा लगता है कि कभी जो पंक्तियॉं हिन्दुस्तान के नाम लिखी गई थी, वह देश की सबसे पुरानी पार्टी के हाल पर बिल्कुल फिट बैठती है। इस वोट बैंक के लिए कॉन्ग्रेस ने क्या-क्या नहीं किए। शाहबानो से इंसाफ छीन लिया। अयोध्या में जन्मभूमि से राम की मूर्ति हटवानी चाही। गॉंधी की प्रतिमा से किनारा कर कश्मीर को जिहाद की आग में जलने दिया। सियासत में टोपी और चादर का रंग घोला। देश के संसाधनों पर पहला हक उनका बताया। बहुसंख्यकों की भावनाओं को बार-बार लात मारी। काल की गति देखिए उसी वोट बैंक ने दिल्ली में 15 साल तक सरकार चलाने वाली कॉन्ग्रेस को अब की दफन कर दिया।

असल में 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के नतीजों को अगर सीटों के लिहाज से देखेंगे तो कुछ हाथ नहीं आएगा। क्योंकि, 2015 के विधानसभा चुनावों में भी कॉन्ग्रेस 0 थी, आज भी 0 है। लेकिन, जब वोट शेयर के हिसाब से इन नतीजों को समझेंगे तो एहसास होगा कि यह आप के पक्ष में प्रचंड जनादेश नहीं है, जिस तरह इसे प्रचारित किया जा रहा। इसका विकास से कोई लेना-देना नहीं है। न ही यह फ्री बिजली-पानी की राजनीति पर मुहर है। असल में यह ध्रुवीकरण की जीत है। बिना लड़े हथियार डालने की राजनीति का फलाफल है। ध्रुवीकरण से न केवल वोटों में कॉन्ग्रेस की हिस्सेदारी सिमट कर पॉंच फीसदी से कम हो गई है, बल्कि उसके 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत जब्त हो गई।

2015 में भले कॉन्ग्रेस का खाता नहीं खुला था, लेकिन उसे 9.7 फीसदी वोट मिले थे। उस चुनाव में उसके परंपरागत वोटरों का बड़ा तबका आप के साथ चला गया था, जिसकी वजह से 70 में से 67 सीटें आप को मिली। सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहने पर एंटी इंकबेंसी फैक्टर के कारण अमूमन ऐसा होता है। लेकिन, समय के साथ ऐसे वोटर फिर पुरानी पार्टी की ओर लौट जाते हैं। इसका एहसास 2017 के दिल्ली नगर निगम के चुनावों और 2019 के आम चुनावों में हुआ भी था। निगम चुनावों में कॉन्ग्रेस को 21.1 फीसदी वोट मिले थे और वोट शेयर के लिहाज से आप से वह केवल पॉंच फीसदी पीछे रह गई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने करीब 22.5 फीसदी वोट हासिल किए जो आप से करीब साढ़े चार फीसदी ज्यादा थे।

लेकिन, विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। कॉन्ग्रेस इस चुनाव में कहीं नजर नहीं आई। न प्रचार में और नतीजों की तो पूछिए मत। गौर करने की बात यह है कि राजनीति में चुनावी परिदृश्य से गायब होना खुदकुशी मानी जाती है। कुछ जानकार मानते हैं कि मोदी को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने खुद यह चुनाव किया। लेकिन, कॉन्ग्रेस को यह याद रखना चाहिए था कि दिल्ली की सत्ता में आप उसे हराकर आई न कि बीजेपी को। इसलिए यह बीजेपी से अधिक कॉन्ग्रेस की साख का सवाल था। लेकिन, दिवंगत हो चुकी शीला दीक्षित की तस्वीर लगाकर प्रचार करने वाली कॉन्ग्रेस ने प्रदेश में पार्टी का प्रभार उस पीसी चाको के ही हाथों में छोड़ रखा था जो लोकसभा चुनाव के पहले भी पार्टी को आप की पिछलग्गू बनाना चाहते थे। फिर चुनाव के दौरान उसके समर्पण और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी के बयानों ने उसे दफन ही कर दिया। राहुल गॉंधी ने 6 फरवरी की रैली में कहा, “ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे…”

राहुल भूल गए कि कॉन्ग्रेस दिल्ली का विधानसभा चुनाव लड़ रही थी, जहॉं वह आप से मुकाबिल थी। इसका असर यह हुआ कि निगम और आम चुनावों में कॉन्ग्रेस की ओर वोटरों के लौटने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह थम गया। नतीजतन, उसके ज्यादातर उम्मीदवार कुल वैध मतों का छठा भाग भी हासिल नहीं कर पाए जो जमानत बचाने के लिए जरूरी होता है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा की बेटी शिवानी चोपड़ा की कालकाजी सीट से जमानत जब्त हो गई। प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आज़ाद की पत्नी पूनम आजाद भी संगम विहार से जमानत नहीं बचा पाईं। उन्हें केवल 2,604 वोट यानी मात्र 2.23 फीसदी वोट ही मिले।

पॉंच मुस्लिम चेहरों को टिकट देने के बावजूद इस बिरादरी ने भी ‘हाथ’ का साथ देना गॅंवारा नहीं किया। कॉन्ग्रेस के पॉंचों मुस्लिम उम्मीदवार जमानत गॅंवा बैठे। सीलमपुर से मतीन अहमद को 15.61 फीसदी वोट मिले। 2013 के विधानसभा में यहॉं कॉन्ग्रेस कैंडिडेट को 46.52 और 2015 में 21.28 फीसदी वोट मिले थे। ओखला सीट, जिसमें शाहीन बाग आता है कॉन्ग्रेस के परवेज हाशमी महज 2.6 फीसदी वोट ही ला पाए। यहॉं 2013 में कॉन्ग्रेस को 36.34 तो 2015 में 12.08 फीसदी वोट मिले थे। बल्लीमारान से हारून युसूफ 4.73 फीसदी वोट मिले हैं। 2013 में उन्हें 36.18 तो 2015 में 13.80 फीसदी वोट मिले थे। कॉन्ग्रेस के दो अन्य मुस्लिम उम्मीदवारों मुस्तफाबाद से अली मेहदी को 2.89 तो मटियामहल से मिर्जा जावेद को 3.85 प्रतिशत वोट मिले हैं। इन सीटों पर क्रमशः 2013 में 38.24, 27.68 तो 2015 में 31.68 तथा 26.75 फीसदी वोट मिले थे। कुछ इसी तरह चांदनी चौक और बाबरपुर की सीट जहॉं अच्छी-खासी संख्या में मुस्लिम वोटर हैं, कॉन्ग्रेस कैंडिडेट को क्रमश: 5.03 और 3.59 फीसदी वोट ही मिले हैं।

वैसे, मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण का अंदाजा 8 फरवरी को ही लग गया था। दिल्ली के अन्य हिस्सों में मतदान धीमा था लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में सुबह से ही लंबी कतारें लगी थी। सीलमपुर में तो रिकॉर्ड मतदान हुआ। लेकिन, नतीजों ने साफ कर दिया है कि सामान्य मुस्लिमों की नजर में अब कॉन्ग्रेस और उसके नेतृत्व की साख नहीं बची है। यही कारण है कि उन 16 सीटों पर जहॉं 15 से 50 फीसदी मुस्लिम आबादी है 12 आप के पास चली गईं। 4 पर भाजपा जीत गई। उन दर्जनभर सीटों पर जहॉं कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार अपने बलबूते मजबूती से लड़ रहे थे वहॉं भी प्रचार के दौरान साथ दिखने वाले लोगों ने मतदान के दिन कॉन्ग्रेस से किनारा कर लिया। यह मुमकिन केवल कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के सरेंडर से हुआ। इसका ही नतीजा है कि बीजेपी का वोट 2015 के 32.7 फीसदी से बढ़कर 38.51 फीसदी हो गया। इनमें एक बड़ा हिस्सा उन वोटरों का है जिसने 1998, 2003 और 2008 के विधानसभा चुनावों में बड़े उत्साह से कॉन्ग्रेस के लिए वोट किया था।

अब कॉन्ग्रेस के इस आत्मघाती कदम को भाजपा को रोकने के नाम पर जोर-शोर से प्रचारित किया जाएगा। लेकिन, खुदकुशी से पहले कॉन्ग्रेस को याद रखना चाहिए था कि राजनीति में जीत से ज्यादा बड़ा सत्य जमीन पर दिखना है। दिल्ली की राजनीति में कॉन्ग्रेस ने यह जमीन खो दी है। वह उस जगह पर पहुॅंच गई जहॉं से मुख्य लड़ाई में लौटना उसके लिए मुमकिन नहीं दिखता।

इस नियति को कॉन्ग्रेस ने खुद चुना है। उसने अतीत के अपने अनुभवों से नहीं सीखा है। वरना वह समझ सकती थी कि इसी तरह के सरेंडर ने यूपी और बिहार में उसे साफ किया। लेकिन, शीर्ष नेतृत्व की मोदी घृणा ने उसे इतना कुंठित कर रखा है कि अब वह आप की जीत में ही अपने लिए संभावनाएँ तलाश रही है। यही कारण है कि नतीजों के बाद चाको ने कहा, “इस चुनाव में दिल्ली की जनता ने ध्रुवीकरण की राजनीति करने तथा करंट लगाओ और गोली मारने की बात करने वाली बीजेपी को जिस तरह से खारिज किया है और विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह को करारी शिकस्त दी है हम उसका स्वागत करते हैं।”

शायद इसी दिन की कल्पना कर गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखा होगा,
औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की

लेकिन कॉन्ग्रेस चाहे तो प्रेरणा भी गोपालदास ‘नीरज’ के ही लिखे से ले सकती है। उन्होंने यह भी कहा है,
हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो
आ जाएगी जमीन पे छत आसमान की

मी लॉर्ड ने बख्श दिया पर राहुल गाँधी को मन से माफ नहीं कर पाएँगे कॉन्ग्रेसी

कश्मीर पर भूलों का करना था पिंडदान, कॉन्ग्रेस ने खुद का कर लिया

AAP की जीत के बाद भी तुम मुझे क्लीन चिट नहीं दे रहे, बंगाल हारने का डर है?: EVM का पत्र नेताओं को

नमस्कार भाजपा विरोधी नेताओं,

अब अपने परिचय में विशेष क्या बताऊँ? मैं ईवीएम हूँ। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन। मेरे दो यूनिट हैं- कण्ट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट। कण्ट्रोल यूनिट को पोलिंग अधिकारी के पास रखा जाता है, वहीं बैलेट वाली यूनिट को मतदाताओं के लिए रखा जाता है। लेकिन, इन तकनीकी बातों से आपको क्या मतलब? आप तो नेता हैं न। आप तो मानते हैं कि मैं ब्लूटूथ से भी हैक कर ली जाती हूँ। कुछ दिनों बाद आप ये कहेंगे कि मुझे उँगलियों के इशारों से भी नचाया जाता है। मैं हार का ठीकरा हूँ। मैं जीत में गौण हूँ। फिर भी मैं मौन हूँ।

जब हार होती है तो नायक नहीं, खलनायक हूँ मैं। जब जीत होती है, तो मेरी चर्चा ही नहीं होती। मैंने देखा था आम आदमी पार्टी के नेताओं को। दो दिनों तक उनका नाटक देखा, जब मैं ‘स्ट्रांग रूम्स’ में बंद थी। संजय सिंह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के कई तरह के दावे कर रहे थे। कह रहे थे कि मुझमें छेड़छाड़ की गई है। केजरीवाल का एक नेता तो मेरे पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने लगा। उसने कहा कि मैं प्रेग्नेंट हूँ। अगर नार्मल डिलीवरी हुई तो AAP जीतेगी और ऑपरेशन हुआ तो भाजपा।

खैर, अरविन्द केजरीवाल जीत गए। किसी ने नहीं कहा कि मैं अग्निपरीक्षा पास कर गई हूँ। किसी ने नहीं कहा कि मेरे साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। किसी ने नहीं कहा कि मैं निष्पक्ष हूँ। कैसे कहेंगे? वो इतने ‘असुरक्षित’ हैं कि उन्हें अगली बार अपनी हार का डर है, कइयों को अगले कुछ चुनावों में भाजपा की जीत का डर है। ऐसे में, मुझे पवित्रता का सर्टिफिकेट देकर वो भला एक मुद्दे को हवा में क्यों उड़ा दें? मुझे फिर दोष दिया जाएगा। मैं मानसिक रूप से इनके लिए तैयार हूँ। बिहार में, बंगाल में, असम में। कहीं भी ऐसा मौक़ा आ सकता है।

भाजपा नेताओं ने भी हार स्वीकार किया। हारे हुए नेताओं को करना ही चाहिए। मनोज तिवारी और अमित शाह ने मुझ पर ऊँगली नहीं उठाई। क्या आप सब भी ऐसा नहीं कर सकते? दिग्विजय सिंह मुझे रोज भर-भर के गालियाँ देते हैं। प्रशांत भूषण का नाम लूंगी तो कहीं वो सुप्रीम कोर्ट में न चले जाएँ। अरे हाँ, केस तो हुआ ही था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वीवीपैट तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए। मुझे तो वहाँ तक घसीटा गया। जब राफेल फेल हो जाता है, तब मुझ पर ठीकरा फोड़ा जाता है।

नेताओं, दिल्ली विधानसभा में तो एक खिलौने को हैक कर के मुझे हैक करने का दावा किया गया। जब चुनाव आयोग ने मुझे हैक करने की चुनौती दी तो तय समयसीमा तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो सामने आ सके। हाँ, एनसीपी और सीपीएम जैसे दलों ने ज़रूर कोशिश की लेकिन अंत में वो भी बहाने बना कर निकल लिए। मैं वो हूँ, जिसके आसानी से हैक किए जाने की बात की जाती है लेकिन कर कोई नहीं पाता। बेइज्जती का जो डर है। आलम देखिए, जिन्होंने मुझे हैक करने का दावा किया था, आज वही मेरे कारण जीत का जश्न मनाने में मशगूल हैं।

संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, हर जगह बलि का बकरा मुझे ही बनाया जाता है। एक दिन पहले मुझे गालियाँ दी जाती हैं, अगले ही दिन मनपसंद परिणाम आते ही उन बातों को भुला दिया जाता है। इस बार मेरी लाज बच गई। चलिए, दिल्ली चुनाव को वणक्कम।

दिल्ली में क्यों नहीं खिल पाया कमल, क्या सचमुच विकास ही था मुद्दा?: ऑपइंडिया का वीडियो विश्लेषण

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आख़िर कमल क्यों नहीं खिल पाया? 38% से अधिक वोटिंग प्रतिशत रहने के बावजूद भाजपा सत्ता क्यों नहीं ले पाई? इस बारे में ऑपइंडिया के डिप्टी न्यूज़ एडिटर अजीत झा का कहना है कि कुछ महीनों पहले तक चुनाव को एकतरफा माना जा रहा था। उन्होंने बताया कि मनीष सिसोदिया काफ़ी देर तक पीछे चल रहे थे। अगर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया होता तो पटपड़गंज से सिसोदिया और कालकाजी आतिशी मर्लेना को जीतने के लिए इतना संघर्ष न करना होता।

मुफ्त में चीजें देने के बल पर राजनीति हर जगह नहीं चल सकती। ये ट्रेंड दक्षिण भारत से चला लेकिन आज वहीं फेल हो रहा है। ये चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं लड़ा गया, ये स्पष्ट है। फिर मुद्दे क्या थे? चेहरा एक ऐसा ट्रेंड है, जो दिल्ली को प्रभावित करता है। जब चुनाव में कोई बड़ा चेहरा आता है, तो दिल्ली उस पर भरोसा जताती है। शीला दीक्षित और अरविन्द केजरीवाल पर दिल्ली ने लगातार भरोसा जताया। लोकसभा चुनावों में भाजपा के पास मोदी के रूप में बड़ा चेहरा था, तो दिल्ली ने भाजपा को भारी मतों से विजयी बनाया।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों में ध्रुवीकरण हुआ और मुस्लिम बहुल इलाक़ों में भाजपा के ख़िलाफ़ वोट गए और मुस्लिमों ने AAP पर भरोसा जताया। जहाँ तक कॉन्ग्रेस की बात है, उसने अगर 2015 वाला परफॉरमेंस ही बरक़रार रखा होता तो शायद नतीजे कुछ और होते। कॉन्ग्रेस हर जगह भाजपा को रोकने के लिए कोशिश कर रही है, जिस चक्कर में वो चौथे नंबर की पार्टी बनने या राजद जैसे दलों का पिछलग्गू बनने में नहीं हिंचकती।

दिल्ली में क्यों नहीं खिला कमल: अजीत भारती और अजीत झा की चर्चा

शीला दीक्षित के निधन के बाद कॉन्ग्रेस को घाटा हुआ क्योंकि उनके नेतृत्व में पार्टी के वोटर लौट रहे थे। कॉन्ग्रेस लगभग 10 सीटों पर मजबूती से लड़ रही थी लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने पूरी तरह समर्पण कर दिया। दिल्ली के खेल से कॉन्ग्रेस अब बाहर जा चुकी है। कॉन्ग्रेस ने जो भी राजनीति की, वो सोशल मीडिया पर की। पीसी चाको कॉन्ग्रेस के प्रभारी थे, जिनके शीला दीक्षित से मतभेद रहे हैं। सुभाष चोपड़ा को अध्यक्ष बनाया गया और कीर्ति झा आज़ाद को कैम्पेन कमिटी का अध्यक्ष बना दिया गया। दोनों ही लगभग निष्क्रिय रहे।