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‘जूता वाले हाथ से माला लेकर मंदिर गए केजरीवाल, हनुमानजी की मूर्ति को कई बार धोया गया’

आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा है कि अब स्वयं भगवान श्रीराम भी भाजपा को नहीं जीता सकते हैं। उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर ये टिप्पणी की। संजय सिंह ने पूछा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को भाजपा एक अछूत की तरह क्यों देखती है? उन्होंने दावा किया कि पहले मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता था और साथ ही कहा कि भाजपा अभी भी उसी युग में जी रही है। दिल्ली चुनाव में मतदान के दिन तक राम और हनुमान मुद्दा बने हुए हैं। मतदान से 1 दिन पहले केजरीवाल ने कनॉट प्लेस स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की।

दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने केजरीवाल के मंदिर दर्शन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस हाथ से केजरीवाल ने जूते उतारे, उसी हाथ से माला लेकर वो मंदिर के भीतर गए। तिवारी ने पूछा कि केजरीवाल पूजा करने गए थे या फिर मंदिर को अशुद्ध करने गए थे? उन्होंने कहा कि नकली भक्त आते हैं तो यही सब होता है। मनोज तिवारी ने बताया कि उन्होंने ये बात पंडित जी को बताई है, जिसके बाद हनुमान जी की मूर्ति को बहुत बार धोया गया। अरविन्द केजरीवाल ने हाल ही में एक टीवी कार्यक्रम के दौरान भी हनुमान चालीसा पढ़ी थी।

संजय सिंह ने तिवारी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि इससे घटिया और गिरा हुआ कोई बयान हो ही नहीं सकता है। वहीं अरविन्द केजरीवाल ने ट्वीट कर के आरोपों का जवाब देते हुए कहा:

“जब से मैंने एक टीवी चैनल पर हनुमान चालीसा पढ़ा है, भाजपा वाले लगातार मेरा मजाक उड़ा रहे हैं। कल मैं हनुमान मंदिर गया। आज भाजपा नेता कह रहे हैं कि मेरे जाने से मंदिर अशुद्ध हो गया। ये कैसी राजनीति है? भगवान तो सभी के हैं। भगवान सभी को आशीर्वाद दें, भाजपा वालों को भी। सबका भला हो।”

वहीं जूते उतारने वाले हाथ से माला लेकर जाने के आरोपों का जवाब देते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि उनके जूते ऐसे हैं ही नहीं, जिन्हें उतारने के लिए हाथ लगाना पड़ता हो। उन्होंने कहा कि भाजपा वाले झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा हिन्दू-मुस्लमान कर के शाहीन बाग़ को मुद्दा बना रही है।

कन्हैया कुमार ये बि​​हारी हैं सब पबित्तर कर देंगे, मैदान से लेकर वामपं​थी प्रोपेगेंडा की दुकान तक

NRC, NPR और CAA के खिलाफ जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और CPI नेता कन्हैया कुमार इन दिनों जन-गण-मन यात्रा निकाल रहे है। इस यात्रा के तहत वो बिहार के कई जिलों में जाकर लोगों को संबोधित कर चुके हैं। उनकी सभाओं में लोगों की भारी भीड़ तो जुटती है, लेकिन कई जगह पर उनका विरोध भी किया गया है। सुपौल, मधेपुरा और कटिहार में उनके काफिले पर हमला किया गया था। अब दरंभगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के छात्रों ने कन्हैया का अनोखे अंदाज में विरोध किया है।

बिहार के दरभंगा जिले के राज मैदान में 4 फरवरी 2020 को हुई CPI नेता कन्हैया कुमार की सभा के बाद शुक्रवार (फरवरी 7, 2020) को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) के छात्र संघ के सदस्यों ने गंगाजल से धोकर सभा स्थल का शुद्धिकरण किया। अपनी जन-गण-मन यात्रा के माध्यम से कन्हैया पूरे प्रदेश के लोगों के बीच केंद्र सरकार के नीतियों के खिलाफ लोगों को भ्रमित कर रहे हैं।

इसी यात्रा के क्रम में कन्हैया कुमार 4 फरवरी को दरभंगा पहुँचे थे। यहाँ उन्होंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के राज मैदान में छात्रों को मंच से संबोधित किया था। इस कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद LNMU के छात्र संघ के अध्यक्ष ने गंगा जल छिड़क कर शुद्ध किया। ABVP के सभी छात्र-छात्राओं ने पहले मंच पर झाड़ू लगाकर उसे साफ़ किया, फिर मंच को पानी से धोया। इसके बाद सिमरिया से मँगाए गए गंगा जल और फूल छिड़क कर मंच को शुद्ध किया। इस बीच छात्रों द्वारा मंत्रोच्‍चारण भी किया गया। बाद में सभी छात्रों ने कन्हैया के खिलाफ नारेबाजी की और वंदे मातरम का नारा भी लगाया।

दैनिक भास्कर के दरभंगा संस्करण में प्रकाशित खबर

इस बारे में बात करते हुए छात्र संघ के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कन्हैया कुमार को देशद्रोही बताया और कहा कि कन्हैया कुमार पूरे देश में CAA व NRC के मुद्दे पर मासूम जनता को दिग्भ्रमित कर आपसी भाईचारे में दरार डालने का काम कर रहे हैं। छात्र संघ कन्हैया के मनसूबे को कभी कामयाब होने नहीं देगा।

वहीं छात्रसंघ कोषाध्यक्ष नीतीश कुमार सिंह ने कहा कि कन्हैया जेएनयू के बाद पूरे बिहार में भय का माहौल पैदा कर अपनी राजनीति को चमकाना चाहते हैं। महासचिव प्रीति कुमारी ने कहा कि बेगूसराय की जनता ने बता दिया है कि कन्हैया की क्या औकात है। लेकिन, फिर भी वह लगातार देश को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले बेगूसराय में 30 जून को हुए कार्यक्रम के बाद ABVP कार्यकर्ताओं ने बीएसएस कॉलेजिएट स्कूल परिसर में बुद्धि-शुद्धि हवन किया था। साथ ही उन महापुरूषों की प्रतिमा को गंगाजल से शुद्ध किया था, जहाँ कन्हैया कुमार ने माल्यार्पण किया।

गौरतलब है कि बिहार में कन्हैया कुमार को लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यात्रा के दौरान कटिहार में उनके काफिले के ऊपर जूते-चप्पल फेंके गए तो वहीं मधेरपुरा और सुपौल में भी उनके काफिले के ऊपर हमला किया गया। इससे पहले झंझारपुर में CPI नेता कन्‍हैया के काफिले को काला झंडा दिखाया गया था। वहीं अपने कार्यक्रम के लिए शिवहर से सीतामढ़ी जाते समय कुछ लोगों ने उनकी गाड़ी रोककर काले झंडे दिखाए और साथ ही कॉमरेड मुर्दाबाद के नारे लगाए थे।

कन्हैया कुमार पर फेंके गए जूते-चप्पल, 30 घंटे में तीसरी बार हमला: बिहार के लोगों को समझाने निकले हैं CAA और NRC

भूमिहार कन्हैया! मज़हब, जाति को धंधा बना कर दलाली करने वाले वामपंथी लम्पटों के सरगना हो तुम

आप हमें कमअक्ल समझें, लेकिन हम ही बैंड बजाएँगे AAP की: यह ट्वीट आपको बहुत भारी पड़ेगा केजरीवाल

दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने आज सुबह एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने कहा कि जैसे महिलाएँ घर की ज़िम्मेदारी उठाती हैं, वैसे ही मुल्क और दिल्ली की ज़िम्मेदारी भी उनके कंधों पर है। साथ ही केजरीवाल ने यह भी कहा कि महिलाएँ पुरुषों के साथ यह चर्चा अवश्य करें कि वो किसे वोट दें? 

यह ट्वीट ही केजरीवाल की हिप्पोक्रेसी को दिखाता है। एक तरफ जहाँ वो महिलाओं को घर चलाने का सारा श्रेय दे रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ वो महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता पर संदेह भी कर रहे हैं। उनके ट्वीट से साफ झलक रहा है कि वो एक पूर्वग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की तरह हैं, जिन्हें लगता है कि महिलाएँ स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकती हैं।

केजरीवाल ने इस तरह की बातें करके महिलाओं का सरासर अपमान किया है। यहाँ पर सवाल उठता है कि केजरीवाल ने ऐसा क्यों कहा कि वोट देने से पहले पुरुषों से अवश्य चर्चा करें? क्या उनको आज की नारी पर भरोसा नहीं है? क्या वो पढ़ी-लिखी-समझदार नहीं है? क्या वो भला-बुरा देखकर समझ नहीं सकती? क्या महिलाओं में इतनी समझदारी नहीं है कि वो अपनी समझ से वोट दे सकें? क्या वह स्वतंत्र भारत की नागरिक नहीं हैं?

केजरीवाल जी आज महिलाएँ देश विदेश की बड़ी-बड़ी कंपनियों को चला रही हैं, देश चला रही हैं। हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। लेकिन आपके हिसाब से उनको वोट करने की समझ नहीं है, इसलिए वे पुरुषों से चर्चा करके फैसला करें कि किसको वोट दें। इस ट्वीट से केजरीवाल ने यह भी दिखा दिया कि आखिर क्यों उन्होंने महिलाओं के लिए बस सेवा फ्री की? क्योंकि वो महिलाओं को मूर्ख समझते हैं। हालाँकि ये उनकी बहुत बड़ी ग़लती है।

जिस AAP सरकार ने साढ़े चार साल सिर्फ इसी बात का रोना रोया कि उप राज्यपाल उन्हें काम नहीं करने दे रहे, केंद्र सरकार उसे काम नहीं करने दे रही। उसी AAP सरकार ने अंतिम कुछ महीनों धड़ल्ले से चीज़ें मुफ्त की है। शायद केजरीवाल इस भ्रम में हैं कि चुनाव से तीन महीने पहले बस सेवा फ्री करके उन्होंने सभी महिलाओं का वोट हासिल कर लिया है और वो महिलाओं को पुरुषों से चर्चा करने के इसीलिए कह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि महिलाएँ अपने घर के पुरुषों से आम आदमी पार्टी को वोट देने के लिए कहेंगी।

जबकि सच्चाई तो ये है दिल्ली में डीटीसी बसों की हालत बद से बदतर स्थिति में है और उनमें जल्दी कोई सफर नहीं करना चाहता है। AAP सरकार न तो इन बसों का समय पर परिचालन ही सुनिश्चित कर पाई है और न ही इन बसों में उमड़ने वाली भीड़ के लिए ही कोई हल ढूँढ पाई है। और तो और बताया जा रहा है कि केजरीवाल की ये मुफ्त स्कीम 31 मार्च तक के लिए ही है।

यानी कि चुनाव परिणाम आने के साथ ही उनका ये चुनावी जुमला भी उड़नछू हो जाएगा। वो ये स्कीम सिर्फ महिला वोटरों को बरगलाने के लिए लेकर आए। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी के साथ ही दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने केजरीवाल के मुफ्त स्कीम के 31 मार्च तक होने की बात कही है। उन्होंने कहा कि इस स्कीम का सेंक्शन सिर्फ 31 मार्च तक है। इलेक्शन के बाद फ्री बिजली और फ्री पानी की योजनाएँ खत्म। यानी कि ये सब बस एक चुनावी पैंतरे के अलावा और कुछ भी नहीं है। मनोज तिवारी ने केजरीवाल सरकार के सचिवालय से हासिल किए एक सर्कुलर के हवाले से यह दावा किया है।

अपनी राजनीति चमकाने के लिए केजरीवाल ने अभी तक आम आदमी और छात्रों का सहारा लिया था, लेकिन अब वो महिलाओं को मोहरा बनाकर सत्ता हासिल करना चाहते हैं, लेकिन उनकी ये मंशा धरी की धरी रह जाएगी, क्योंकि महिलाओं के लिए सबसे बड़ी बात होती है उनकी सुरक्षा। और जिस तरह से केजरीवाल निर्भया गैंगरेप-मर्डर के दोषियों को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं, उससे उनका महिलाओं की सुरक्षा के प्रति नजरिया साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। उनके नजरिए से स्पष्ट है कि उनके लिए महिला सुरक्षा नहीं बल्कि बिजली-पानी अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसा निर्भया के पिता ने भी एक इंटरव्यू के दौरान कहा था। उन्होंने कहा था कि अगर दिल्ली सुरक्षित नहीं है, तो इसके लिए सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही जिम्मेदार हैं। वो नहीं चाहते कि निर्भया के दोषियों को फाँसी हो।

केजरीवाल जिस तरह से लोगों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि उन्हें दिल्ली की जनता और महिलाओं को इतना बेवकूफ नहीं समझना चाहिए। साथ ही उन्हें यह भी समझने की ज़रूरत है कि चुनाव के ठीक पहले किए गए घोषणाओं का औचित्य जनता भी अच्छी तरह से समझती है।

अलका लम्बा ने AAP कार्यकर्ता को खदेड़ा, खींच कर थप्पड़ मारा लेकिन लगा ही नहीं

दिल्ली विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस भले ही लड़ाई में कमजोर दिख रही हो लेकिन पार्टी नेताओं के तेवर अभी भी कमजोर नहीं हुए हैं। ताज़ा वाकया नार्थ दिल्ली के ‘मजनू का टीला’ का है, जहाँ आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस के बीच की राजनीतिक लड़ाई मारपीट में बदल गई। अलका लम्बा ने न सिर्फ़ केजरीवाल की पार्टी के एक कार्यकर्ता को खदेड़ा बल्कि खींच कर एक चाँटा भी मारा। हालाँकि, वो चाँटा उसे लगा नहीं। अलका लाम्बा कुछ महीनों पहले तक आम आदमी पार्टी में थी लेकिन फिर वो अपनी पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस में चली गईं। लाम्बा ने सोनिया गाँधी से मुलाक़ात भी की थी।

सोशल मीडिया पर अलका लम्बा का AAP कार्यकर्त्ता को चाँटा मारने की कोशिश करते हुए हुए वीडियो भी वायरल हो गया। पुलिसकर्मी AAP कार्यकर्ता को वहाँ से ले गए लेकिन अंत तक अलका लाम्बा उसे वहाँ से खदेड़ती रहीं। उनका आरोप है कि उक्त AAP कार्यकर्ता ने उनके बेटे को लेकर आपत्तिजनक शब्द कहे थे। अलका लम्बा फ़िलहाल दिल्ली के चाँदनी चौक से कॉन्ग्रेस की तरफ से चुनाव लड़ रही हैं। पिछली बार वो इसी क्षेत्र से केजरीवाल की पार्टी से विधायक बनी थीं। अब चाँदनी चौक से उम्मीदवार एक्सचेंज हो गए हैं। अर्थात, पछली बार कॉन्ग्रेस की तरफ से मैदान में उतरे प्रह्लाद साहनी इस बार AAP से मैदान में हैं।

अलका लम्बा का केजरीवाल के प्रति गुस्सा हाल ही में तब देखने को मिला था, जब उन्होंने दिल्ली के सीएम के बारे में कहा था कि उन्होंने लड़ाई-झगड़े में ही 5 साल निकाल दिए। आम आदमी पार्टी के नारे ‘अच्छे बीते 5 साल, लगे रहो केजरीवाल’ को अलका लाम्बा ने मजाक करार दिया था। लाम्बा ने कहा था कि बीते 5 साल लड़ाई-झगडे और कोर्ट-कचहरी में नज़र आने वाले केजरीवाल को अब बस भी करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार तो जामा मस्जिद के पास भूमाफियाओं से ज़मीन भी खाली नहीं करा पाई। अलका लाम्बा ने दावा किया था कि जहाँ मोहल्ला क्लिनिक बनाए गए, वहाँ कूड़े का ढेर लगा हुआ है।

अलका लम्बा द्वारा आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता को थप्पड़ मारने की घटना के बाद AAP नेता संजय सिंह ने कहा है कि पार्टी उनके ख़िलाफ़ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराएगी। वायरल वीडियो में अलका लम्बा और AAP कार्यकर्ताओं के बीच गाली-गलौज होते हुए भी देखा जा सकता है।

बिहार में धर्म परिवर्तन का खेल: नवादा में 15 परिवार के 50 सदस्य बने ईसाई, खौफ में बाकी बचे 3 हिंदू परिवार

बिहार के नवादा जिले से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। यहाँ 15 हिंदू परिवारों के 50 सदस्यों ने धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपना लिया है। नवादा के ताराटाड टोला में अब हिदू धर्म को मानने वाले महज तीन परिवार ही बचे हैं, लेकिन उन पर भी धर्मातरण के लिए दबाव है। बताया जा रहा है कि कभी हिंदू धर्म और देवी-देवताओं में आस्था रखने वाले इन परिवारों ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है।

दरअसल ताराटाड टोला अभी भी नक्सलियों की गिरफ्त में है और धर्म परिवर्तन कराने वाले इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं। बता दें कि इसाई मिशनरी अब नेपाल के कई ठिकानों से भारतीय सीमा क्षेत्र के ग्रामीण इलाके में मजबूती से दस्तक दे रहे हैं। इनका एकमात्र मकसद यही है कि ज्यादा से ज्यादा ईसाई धर्म को मानने वाले लोग बनें।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर

ईसाई मिशनरियों को काफी हद तक कामयाबी भी मिली है। कई जगहों पर चर्च बनाए गए हैं तो कई जगहों पर चर्च बनाए जाने की तैयारी चल रही है। बिहार के नेपाल सीमा से लगे क्षेत्र में फैली गरीबी, बेरोजगारी एवं शिक्षा की रोशनी से कोसों दूर रहने वाले लोगों को ये आसानी से अपने जाल में फँसा लेते हैं। अच्छा रहन-सहन खानपान और अच्छी पढ़ाई का हवाला देकर मिशनकारी गरीबों के बीच पैठ बना रहे हैं। इसी का उदाहरण है नवादा जिले के 15 परिवारों के 50 सदस्यों का ईसाई में परिवर्तित होना।

इसी पंचायत के चटकरी गाँव के रहने वाले प्रदीप ने दैनिक जागरण को बताया कि लोभ-लालच देकर भोले-भाले आदिवासियों को बहकाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “पिछले 6 महीने में मैंने कई बार वरीय अधिकारियों को धर्मांतरण कराए जाने की जानकारी दी, लेकिन मेरी मौखिक शिकायतों पर कोई पहल नहीं हुई।” यहाँ के युवाओं का कहना है कि हिंदू लोगों के ईसाई में परिवर्तित होने की पोल सरस्वती पूजा के दौरान खुली, जब वो लोग चंदा के लिए ताराटांड टोले में गए। वहाँ के निवासियों ने खुद को ईसाई बताते हुए चंदा देने से इनकार कर दिया, जबकि पिछले साल तक वे लोग पूजा में शाामिल रहे हैं।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर

ताराटांड में बचे हुए तीन हिंदू परिवार खौफ में हैं। वो दबी जुबान में तो बात कर रहे हैं, लेकिन साफ तौर पर कुछ भी कहने से डरते हैं। एक ग्रामीण ने बताया कि हर शुक्रवार कुछ लोग ताराटांड आते हैं और ईसाई धर्म अपनाने के लिए लोगों का ब्रेन वॉश करते हैं। चटकरी गाँव के बगल में सेवा सदन होली फैमिली अस्पताल और ज्ञानदीप विद्यालय का संचालन हो रहा है। वहाँ बच्चों को ईसाई धर्म की किताबें पढ़ाई जाती हैं। रामायण-गीता की जगह बाइबल का पाठ किया जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि कुछ महीने पहले तक ताराटांड के लोग दशहरा, दिवाली और होली पर उत्साह-उल्लास में मगन हो जाते थे। अब वे क्रिसमस और गुड फ्राइडे को ही अपना पर्व मानते हैं।

दिल्ली में कई बड़े नेता व जज अंडरवर्ल्ड सरगना छोटा शकील के निशाने पर, कई साथियों को बाँटे हथियार

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने शुक्रवार (फरवरी 7, 2020) को अंडरवर्ल्ड अपराधी छोटा शकील के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया। स्पेशल सेल को गुप्त सूचना मिली है कि छोटा शकील दिल्ली में कुछ नामी नेताओं की हत्या की साज़िश रच रहा है। वो कुछ बड़े नेताओं के साथ-साथ जजों को भी निशाना बनाने की योजना बना रहा है। छोटा शकील ने एक हिट-लिस्ट तैयार की है, जिसमें दिल्ली में रहने वाले नेताओं और जजों के नाम शामिल हैं।इसके लिए उसने उच्च-गुणवत्ता वाले खतरनाक हथियारों का भी इंतजाम किया है।

कुछ व्हाट्सप्प मैसेजों को डिकोड करने के बाद पुलिस ने इस सूचना की पुष्टि की। दिल्ली पुलिस ने बड़े नेताओं और जजों को उन पर मँडरा रहे खतरों से आगाह किया है। सूचना के अनुसार, छोटा शकील ने अपने कई सहयोगियों को हथियार भी बाँटे हैं, ताकि इस वारदात को अंजाम दिया जा सके। हालाँकि, छोटा शकील ने इन मीडिया रिपोर्ट्स को नकार दिया है। दाऊद के मुख्य गुर्गा रहे शकील ने कहा कि वो ऐसी कोई भी साज़िश नहीं रच रहा है। उसने कहा कि वो किसी को भी निशाना बनाने नहीं जा रहा है, ये सब झूठ है।

स्पेशल सेल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कुछ समय से पुष्ट सूत्र जानकारी दे रहे थे कि छोटा शकील ने अपने गुर्गों को टारगेट किलिंग के आदेश दिए हैं। इस सूचना को सेल के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शेयर किया गया। इसके बाद से मैनुअल व तकनीकी सर्विलांस से लगातार कड़ी नजर रखी जा रही है। अंडरवर्ल्ड से संबंध रखने वाले बदमाश पुलिस की रडार पर हैं। सेल को पता चला है कि छोटा शकील के अत्याधुनिक हथियार जुटाने से पुलिस चिंतित है।

अंडरवर्ल्ड से सम्बन्ध रखने वाले दिल्ली-एनसीआर के कई बदमाश पुलिस की नज़र में हैं। सेल के लोदी कॉलोनी स्थित थाने में इंस्पेक्टर विनय पाल की शिकायत पर 27 जनवरी को इस संबंध में एफआईआर दर्ज की गई है। जनवरी महीने की शुरुआत में खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएस से प्रभावित आतंकियों के तमिलनाडु मोड्यूल के आतंकियों को गिरफ्तार भी किया गया था। वो भी दिल्ली में टारगेट किलिंग के लिए ही आए थे।

शिकारा रिव्यू: 90 में इस्लाम ने रौंदा, 2020 में बॉलीवुड कश्मीरी हिंदुओं पर रगड़ रहा नमक

कश्मीर से मूल निवासी पंडितों की बेदखली के 30 साल बाद विधु विनोद चोपड़ा जैसे नामी फिल्म निर्माता की ताजा रिलीज “शिकारा’ बेहद सस्ती, उबाऊ और सतही फिल्म है। कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को ढंग से उभारने में पूरी तरह नाकाम शिकारा में आजादी के बाद हिंदुओं के सबसे बड़े अमानवीय विस्थापन के मूल कारणों पर भी परदा किया गया। रात के अंधेरे में घर से निकालने आए कुछ भटके हुए से नौजवान, जिन्हें एक हाजी साहब एक आवाज देकर भगा देते हैं। समझ के परे है कि चोपड़ा साब को इस वक्त ऐसी फिल्म बनाने की जरूरत अचानक क्यों आन पड़ी?

फिल्म को देखकर ऐसा लगता है जैसे “कश्मीर की कली’ टाइप कोई फिल्म की योजना थी। शूटिंग चल रही थी कि अचानक कुछ सिरफिरे लोगों ने खूबसूरत घाटी का माहौल खराब कर दिया। तो कैमरे बटोरकर फिल्म यूनिट घाटी की बजाए जम्मू के विस्थापितों के शिविरों में आ गई। फिर शूटिंग वहीं चलती रही। 30 साल बाद एक दिन अधबूढ़ा हीरो अपनी मृत पत्नी की राख उसी मकान में लेकर पहुँचता है, जहाँ शादी के बाद वे पहली बार मिले थे। तब तक मकान उजड़ चुका है। कहानी खत्म।

ताज्जुब है कि कश्मीर के कुछ जागरूक मुस्लिम इस बेदम फिल्म पर भी रोक लगाने के लिए चार दिन पहले हाईकोर्ट जा पहुँचे। कल रिलीज होने के बाद अगर उन ईमान के पक्के याचिकाकर्ताओं ने यह फिल्म देखी होगी तो हाईकोर्ट में याचिका पर हुए खर्चे पर अफसोस किया होगा। उन्होंने जरूर अल्लाह का शुक्रिया अदा किया होगा, क्योंकि आखिरी सीन तक इस्लाम खतरे में नजर आया ही नहीं! यह सिनेमा का एक चमत्कारी प्रयोग है कि शोले भी बन जाए और अपने गिरोह के साथ खूंखार गब्बर भी नजर न आए! वीरू और बसंती तांगे में टहलकदमी करते बूढ़े हो गए!

कश्मीर में इस्लामी आतंक और पाँच लाख निर्दोष पंडितों को घरों से निकालने जैसे गंभीर और भारत की आत्मा को छलनी करने वाले विषय पर ऐसी दोयम दर्जे की फिल्म कम से कम विधु विनोद चोपड़ा से कतई अपेक्षित नहीं थी। वो भी 370 का हैलोजन फ्यूज होने के बाद। हर विषय में प्रेम के तत्व को ढूंढना, गाना-बजाना-नाच हिंदी फिल्म उद्योग का एक घिसा-पिटा कारोबारी शिगूफा है। जनवरी 1990 के बाद कश्मीर की कहानी में इस तत्व की कोई गुंजाइश नहीं थी और अगस्त 2019 के बाद तो क्लाइमेक्स उल्टा ही है!

किसी झोला छाप मजनू टाइप डॉक्टर ने ही कहा हो तो प्रेम का तत्व सुबह-शाम की दो गोलियों जैसा दो-एक दृश्य में प्रतीकात्मक हो सकता था। पूरी फिल्म झोला छाप डॉक्टर की दी हुई दवाई की इस पुड़िया पर कैसे बन सकती थी? कश्मीर के नाम पर शिकारा एक बेहद उबाऊ और निराशाजनक फिल्म है। शुरू से आखिर तक। उसमें कश्मीर कहीं नहीं है। पंडितों की पीड़ा नदारद है। 30 साल से बिखरे दर्द का नामोनिशान नहीं है। 70 साल की गाजरघास के दर्शन दूर-दूर तक नहीं हैं। सदियों के घाव तो कहाँ होंगे?

मुझे लगता है यह विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ही नहीं है। शायद उनकी कमाऊ कंपनी ने किसी नौसिखिए डिप्टी डायरेक्टर को ठेके पर देकर फिल्म बनाई है। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि चोपड़ा साहब ने तो इसका शूट किया हुआ कन्टेंट भी यूरोप में अपनी व्यस्त छुटि्टयों के समय फोन पर ही फाइनल किया होगा। सरकारी दफ्तर में दूसरे अहम प्रोजेक्ट की फाइलों में व्यस्त नौकरशाह की तरह सरसरी नजर से ही इस फिल्म की फाइल को ओके कर दिया होगा!

कश्मीर पर 2020 में कोई फिल्म रिलीज हो और उसमें “डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के महान रचयिता चचा नेहरू न हों, जिन्होंने ऐसा इंडिया डिस्कवर करके हमें कश्मीर सहित दिया, पंडित नेहरू के परमप्रिय अब्दुल्ला न हों, शेख-चिल्लियों को दिया 370 का भस्मासुरी वरदान न हो, सरहद पार इस्लामी मुल्क से आता रहा आतंक का धमाकेदार महाप्रसाद न हो, विदेशी मदद पर पलने वाले हिज्बुल-हुर्रियत के परजीवी न हों, बम धमाके न हों, कत्लेआम न हों, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से गूँजी डरावनी धमकियाँ न हों, पंडितों के मातम पर घाटी में सत्ता के मलाईदार मृत्युभोज में बैठे अब्दुल्ला-मुफ्ती-आजाद न हों, भारत के माथे पर पत्थर बरसाने वाले “भटके हुए युवा’ न हों, अफजलों को प्रात:स्मरणीय गुरु तुल्य मानने वाले जेएनयू के आहत विद्यार्थी वंशज न हों और इन सबके प्रति गहरी सहानुभूति रखने वाले सेक्युलर मीडिया के ड्रामाई मैगसेसे मुखमंडल न हों तो कोई फिल्म बनेगी कैसी? वैसी ही प्राणहीन है शिकारा! जबकि अब सब बेनकाब हैं। चोपड़ा ही बताएँगे कि कश्मीर के गुनाहों और गुनहगारों से ऐसा परदा क्यों किया? हटी हुई चिलमन को दूर सरकाया क्यों नहीं?

कश्मीर आखिर है क्या? क्या सिर्फ एक हरी-भरी घाटी, जिसका खुशनुमा परिचय शम्मी कपूर और शर्मिला टेगौर के जरिए दुनिया को हुआ? कश्मीर की दर्दनाक कहानी में क्या है? क्या सिर्फ एक प्रेमी युगल, जिसे 1990 में बेदखल होना पड़ा? फिल्म के मुख्य पात्रों के नाम शिव और शांति हैं। यह गौरतलब है। शिव के कश्मीर की उजड़ी शांति को परदे पर लाने की एक नाकाम कोशिश है शिकारा।

अतीत में कभी शैव मत के अनुयायियों और फिर बौद्ध मत का सक्रिय नॉलेज सेंटर रहा कश्मीर भारत की ज्ञान परंपरा का गर्व करने लायक अध्याय है, जहां बुद्ध के वचनों का दस्तावेजीकरण किया गया और एक समय आदि शंकराचार्य भी वहाँ गए बिना नहीं रहे। फिर सुलतानों के कब्जे हैं। धोखे हैं। बारूद की महक है। खून है। दूर तक फैला अंधेरा है। राख है। धुआँ है। पाकिस्तान है। दहशत है। सेक्युलरिज्म है। गंगा-जमना है। पंडितों पर हुए जुल्म तो सबसे ताजा हैं। सेक्युलर क्लाइमेट में अंतहीन हो रही सियासी कहानी का पटाक्षेप करने के लिए 5 अगस्त 2019 का एक दिन भी इतिहास में दर्ज है। लेकिन शिकारा में यह सब साफ है!

कश्मीर लाल किले के पहले भाषण में रेखांकित “भारत की नियति’ का एक दाग है, जिससे साक्षात्कार नहीं किया गया। वह शानदार शेरवानी में खुँसे गुलाब की सुर्खी में घुला पंडितों का लहू है, जिसकी सिर्फ खुशबू पर ही ध्यान रखा गया। कश्मीर गंगा-जमनी राग का पर्दाफाश करने वाली एक पीड़ाजनक चीत्कार है, जिसे अनसुना किया गया। कश्मीर पंडितों की पीड़ा का एक पड़ाव है, जहाँ ठहरना भी मुनासिब नहीं समझा गया। मुस्लिमपरस्ती के सेक्युलरिज्म का नशा लोकतंत्र के सिर से कभी तो उतरना ही था। एक दिन मौसम बदल गया। हालाँकि बेघर और बेबस पंडितों के दरवाजों पर बदलाव की आहट आना अभी बाकी है!

1990 में पाँच-सात साल के बेदखल बच्चे को आज अपनी आधी उम्र में कश्मीर की कोई स्मृति नहीं होगी। सब सुना ही होगा। ठीक वैसे ही जैसे 1947 में सिंध से बेदखल हुए परिवारों की तीसरी-चौथी पीढ़ी को बटवारे का कोई जख्म याद नहीं है। कश्मीर से निकले लोगों की याददाश्त में काफी-कुछ है। इबादतगाहों से उन्हें अपना घर और औरतें छोड़ने की धमकियाँ लाउड स्पीकरों से दी गईं। घरों में घुसकर औरतों-बच्चों को उठाया गया। बलात्कार हुए। बेरहमी से घेरकर कत्ल करने के बाद लाशें सड़कों-चौराहों पर छोड़ दी गईं। रातों-रात लोग अपने घर, दुकान, खेत, बागीचों को छोड़कर हमेशा के लिए भगा दिए गए। पड़ोसियों ने मरवाया, दोस्तों ने मारा, टीचर को मारने स्टुडेंट आ गए। जन्नत का ख्वाब था, सबने सवाब कमाया। कभी सिंध में, कभी कश्मीर में। शिकारा में कश्मीर के इस रक्तरंजित स्याह पहलू का कोई टुकड़ा तक नहीं है।

विधु विनोद चोपड़ा तो क्या, मुंबई के किसी माई के लाल फिल्म मेकर में दम नहीं है जो इस समस्या को सही और सघन रूप में परदे पर ला पाए। पद्मावती और शिवाजी पर बनने वाली फिल्मों को लेकर भी एक तबके के कान खड़े हो जाते हैं कि पता नहीं क्या दिखाया जाए, कहीं इस्लाम का गलत चित्रण (?) न हो जाए। भारत का असल इतिहास ऐसे धोखेबाज लुटेरों, अवैध कब्जों, नृशंस कारनामों और बेवजह कत्लेआमों से भरा हुआ है कि एक मामूली सा दृश्य भी उस “विशेष प्रकार के वर्ग’ की भावनाएँ आहत कर सकता है, जो सात-आठ सौ साल के इसी हिंसक फैलारे में अलग-अलग कारणों से उपजा है। पूरे उपमहाद्वीप में उसे अपना ही असल इतिहास नहीं पता। जबकि कश्मीर के उपनामों में वह बहुत साफ है-सलीम पंडित, मकबूल बट, लतीफ डार, रहमान मट्‌टू… ये पंडित, भट, धर (डार) और मट्‌टू नाम के आगे क्यों चिपके रह गए? ये किन बदकिस्मत पुरखों की तरफ इशारे हैं?

कश्मीर भारत पर थोपे गए आतंकी राज का एक छोटा सा कोना है। हरे-भरे दरख्त की एक शाख, जिस पर बैठे चंद सियासी परिंदे 70 साल से अपनी गर्दनें घुमा रहे थे और नुकीली चोंचें चमका रहे थे। 5 अगस्त 2019 को सारे मनहूस मुफ्ती, शेखचिल्ली के साहबजादे और साहबजादे के भी शहजादे आराम करने भेज दिए गए। विधु विनोद चोपड़ा अब तो हिम्मत कर सकते थे कि सच को सच की तरह दिखाते। मगर फिल्म फ्लॉप है। पहले दिन के तीसरे शो में कुलजमा बीस दर्शक थे!

सिनेमा से नहीं, संसद से ही उम्मीद है कि वह असल कहानी को अच्छे से आगे बढ़ाए। सारी असलियत सामने लाए। सारे गुनहगारों को ठिकाने लगाए। पंडितों को उनका हक दिलाए। कश्मीर पर कोई क्या कहानी लिखेगा, कोई क्या फिल्म बनाएगा! असली फिल्म और असली फिल्म निर्माता-निर्देशक मुंबई में नहीं, दिल्ली में हैं!

‘कश्मीरी हिन्दुओं पर थूकने का काम करती है शिकारा फिल्म, उल्टे हिन्दुओं को ही कम्युनल कहती है’

छिपाया जा रहा कश्मीरी पंडितों का दर्द?: ‘शिकारा’ के कुछ पोस्टरों में इसे बताया गया ‘लव स्टोरी’

‘कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए मुस्लिम जिम्मेदार नहीं, फ़िल्म पर लगे रोक… वरना पूरे देश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ेगा’

लेखक: विजय मनोहर तिवारी

भारत के कोने-कोने की 8 से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक। 6 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। कई पुरस्कार मिले हैं। भारत में इस्लाम के फैलाव पर 20 साल से रिसर्च। इस साल इसी विषय पर किताब आने वाली है।

तेज बाइक, टोकने पर गाली-गलौज, देख लेने की धमकी… फिर मुस्लिम भीड़ ने की फायरिंग व पथराव: कई जख्मी, हालात तनावपूर्ण

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में दो पक्षों में विवाद हो गया। सिकंदराबाद कोतवाली क्षेत्र के छासियावाड़े में शुक्रवार (फरवरी 7, 2020) को बाइक दौड़ाने को लेकर बवाल हुआ और दो पक्षों में पथराव व फायरिंग भी हुई। इस पथराव और फायरिंग की घटना में एक युवक की आँख में गोली लग गई। उसको स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जबकि पथराव में कई लोग जख्मी हो गए हैं। स्थिति पर काबू पाने के लिए मौके पर भारी पुलिस बल को तैनात किया गया है। बुलंदशहर के एसएसपी संतोष कुमार सिंह ने दोनों समुदाय के बीच विवाद की पुष्टि की और साथ ही बताया कि इसमें 4 नामजद अभियुक्त हैं।

दरअसल शुक्रवार की सुबह सिंकदराबाद कोतवाली क्षेत्र के छसियावाड़े मोहल्ले में दो युवक काफी तेज रफ्तार से बाइक चला कर जा रहे थे। इस बारे में बात करते हुए सैनी समुदाय के सोनू ने बताया कि गद्दी की तरफ से दो युवक 60-65 की स्पीड से बाइक से आ रहे थे। इस पर जब उन्होंने उनको वहाँ पर टोका कि बाइक धीरे चलाओ तो उन्होंने गाली गलौज करना शुरू कर दिया और फिर वह यह कहकर चले गए कि वापस आ रहे हैं।

बताया जा रहा है कि गद्दी से आने वाला युवक मुस्लिम समुदाय का था। जानकारी के मुताबिक कुछ समय बाद मुस्लिम समाज के 50 से अधिक लोग छासियावाड़ा में आए और वहाँ पर खड़े युवकों को पीट दिया। जिसके बाद दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए। दोनों पक्षों से खूब पथराव हुआ। कई राउंड गोलियाँ चली और तोड़फोड़ का भी प्रयास हुआ। सोनू ने बताया कि वो लोग फायरिंग करते हुए ही आए और पथराव भी उन्हीं लोगों ने किए।

बता दें कि छासियावाड़ा मोहल्ले में अधिकतर आबादी सैनी समाज के लोगों की है। पुलिस ने बताया कि सैनी पक्ष की तरफ से पुलिस को शिकायत दे दी गई है। जबकि मुस्लिम पक्ष की तरफ से अभी तक कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। हालाँकि एसपी सिटी अतुल कुमार श्रीवास्तव पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुँचकर मामले को शांत करवा दिया है और आगे की जाँच की जा रही है। पुलिस का मानना है कि यह विवाद केवल बाइक की रफ्तार का नहीं है। बल्‍कि किसी और विवाद का है। जिसकी जाँच हो रही है। जल्‍द ही इसका पता लगा लिया जाएगा।  

बुरे फँसे केजरीवाल: ‘दिल्ली के शोले’ में अमित शाह को गब्बर बताने पर FIR, चुनाव आयोग ने भी थमाया नोटिस

दिल्ली में सत्तारुढ़ और लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिशों में जुटी आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ दो बड़ी खबरें आई हैं। पहला चुनाव आयोग से अरविंद केजरीवाल को एक ट्वीट पर नोटिस तो दूसरा बीजेपी की ओर से पार्टी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की खबर। चुनाव आयोग ने नोटिस जारी कर AAP से 8 फरवरी की शाम 5 बजे तक जवाब देने के लिए कहा है।

आम आदमी पार्टी के खिलाफ शोले फिल्म के स्पूफ वीडियो को लेकर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। वीडियो में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को गब्बर के रूप में दिखाए जाने को लेकर बीजेपी ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से AAP की शिकायत की है। बीजेपी ने अपनी शिकायत में कहा है कि AAP समर्थकों ने भ्रामक रीक्रिएशन के जरिए भाजपा की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है। इस स्पूफ में अमित शाह को फिल्म के खलनायक गब्बर के रूप में दिखाया गया है तो वहीं दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी, विजय गोयल और सांसद गौतम गंभीर को डाकुओं के रूप में चित्रित किया गया है।

बीजेपी की शिकायत के बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने विवादास्पद वीडियो को लेकर एक एफआईआर दर्ज की है। पुलिस ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी की ओर से दी गई शिकायत के आधार पर स्पेशल सेल ने 25 जनवरी को मुकदमा दर्ज किया था।

इसके अलावा केजरीवाल को उनके एक ट्वीट के लिए चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में नोटिस जारी किया गया है। दरअसल अरविंद केजरीवाल ने 2 फरवरी की रात अपने ट्विटर एकाउंट से एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें ये आरोप लगाया गया था कि बाकी पार्टियाँ और मीडिया हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद और CAA-NRC कर रही हैं, जबकि अरविंद केजरीवाल काम के मुद्दों पर बात कर रहे हैं।

इस वीडियो के खिलाफ बीजेपी ने 4 फरवरी को चुनाव आयोग में शिकायत की थी जिसके बाद आज आयोग ने केजरीवाल को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। चुनाव आयोग की नोटिस में जो बात सबसे अहम है वो ये कि खुद चुनाव आयोग ने आरंभिक तौर पर केजरीवाल को आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाया है।

चुनाव आयोग की नोटिस के मुताबिक इस वीडियो में सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने, सामाजिक और धार्मिक समुदायों के बीच मौजूदा मतभेदों को बढ़ाने और वोट हासिल करने के लिए साम्प्रदायिक भावनाओं को उकसाने की क्षमता है। इस नोटिस का जवाब भी केजरीवाल को 8 फरवरी की शाम 5 बजे तक देना है। अगर अरविंद केजरीवाल कोई जवाब नहीं देते हैं तो चुनाव आयोग स्वतः कार्रवाई करेगा।

दिल्ली में 70 सीटों के लिए मतदान शुरू: पल-पल बदलते समीकरण में BJP ने यूँ पलटी बाजी

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दिल्ली में 70 सीटों के लिए मतदान शुरू: पल-पल बदलते समीकरण में BJP ने यूँ पलटी बाजी

दिल्ली चुनाव के लिए सभी सीटों पर मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। कुल 1.47 करोड़ मतदाता अब दिल्ली में आम आदमी पार्टी, भाजपा और कॉन्ग्रेस के भाग्य का फ़ैसला करेंगे। केंद्रीय मंत्री डॉक्टर हर्षवर्द्धन ने कहा है कि ये सत्य और असत्य के बीच की लड़ाई है। वहीं उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का कहना है कि शिक्षा और बच्चों के भविष्य के लिए वोट करें। शाहीन बाग़ में सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं क्योंकि वहाँ 2 महीने से सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव चल रहा है।

सुबह 8 बजे मतदान की प्रक्रिया शुरू हुई, जो शाम 6 बजे तक चलेगी। कुल मिला कर देखें तो सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को भाजपा से कड़ी टक्कर मिल रही है। जहाँ दिसंबर तक केजरीवाल की पार्टी आगे दिख रही थी, वहीं पल-पल बदलते समीकरण के बीच भाजपा ने पूरे खेल को ही बदल कर रख दिया है। केन्दीय गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद भी इस चुनाव की बागडोर अपने हाथों में रखी और घर-घर जाकर पर्चे बाँटे, रोड शो किए और रैलियाँ की।

कच्ची कॉलनियों को पक्का कर के 40 लाख लोगों को फ़ायदा पहुँचाने के फ़ैसले को पीएम मोदी ने अपनी रैलियों के केंद्र में रखा। कपिल मिश्रा, तजिंदर बग्गा, प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के बयान इस दौरान काफ़ी चर्चा में रहे। इन नेताओं के बयानों पर विपक्षी दल भी खेलते रहे। जहाँ पहले केजरीवाल की पार्टी तय कर रही थी कि मुद्दा क्या होगा, बाद में वो हनुमान चालीसा पढ़ कर और मंदिर-मंदिर घूम कर ख़ुद भाजपा की पिच पर खेलने लगे। उनका दावा है कि सब ‘पवित्र शक्तियाँ’ उनकी ही पार्टी के साथ हैं।

यमुना बैंक से भाजपा प्रत्याशी कपिल मिश्रा ने कहा है कि जनता आज वोट डाल कर सर्जिकल स्ट्राइक का हिसाब करेगी। परिवार के साथ वोट डालने पहुँचे मिश्रा ने कहा कि जैसे-जैसे जनता वोट देगी जाएगी, शाहीन बाग़ का तम्बू हटता जाएगा। वहीं अमित शाह ने ट्वीट कर अपील करते हुए कहा कि झूठ और वोट बैंक की राजनीति से अलग एक मजबूत इरादों वाली सरकार बनाएँ। शाहीन बाग़ में भी वोटरों की लम्बी कतार देखने को मिल रही है।केजरीवाल की पार्टी से अमानतुल्लाह ख़ान यहाँ से विधायक हैं, जिनका मुक़ाबला भाजपा के ब्रह्म सिंह बिधुरी से है।

दिल्ली में करीब डेढ़ करोड़ वोटर हैं। 2015 के विधानसभा में करीब 67 फीसदी मतदान हुआ था। यदि इस बार भी ऐसा हुआ तो एक करोड़ के करीब वोट पड़ेंगे। दिल्ली में इस वक्त भाजपा के सदस्यों की संख्या 62 लाख के करीब है। यदि इन सभी ने बीजेपी के लिए वोट डाले तो 11 फरवरी को करिश्मा तय है।

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