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केजरीवाल ने फिर बघारी शेखी, कहा- भाजपा का कोई नेता दिल्ली का सीएम बनने लायक नहीं

गुरुवार को दिल्ली चुनाव प्रचार के अंतिम दिन अपने एक इंटरव्यू में केजरीवाल ने फिर एक बार ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू’ बनते नजर आए। पीटीआई को दिए अपने इंटरव्यू में केजरीवाल ने कहा, “दिल्ली की जनता जानना चाहती है कि भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है। कहीं भाजपा संबित पात्रा या अनुराग ठाकुर को तो अपना मुख्यमंत्री नहीं बना देगी।”

केजरीवाल ने भाजपा पर चुनावों को ध्रुवीकृत करने का आरोप लगाया और कहा कि चुनाव परिणाम बताएँगे कि उसे इस संदर्भ में कितनी सफलता हाथ लगी। केजरीवाल ने अपने इंटरव्यू में AAP वोटर्स को अच्छी शिक्षा, मॉडर्न सड़कें, अच्छी चिकित्सा व्यवस्था तथा 24 घंटे बिजली का तलबगार घोषित किया।

शाहीन बाग़ के कारण आम दिल्ली वासियों को हो रहीं मुश्किलों के लिए उन्होंने भाजपा सरकार तथा गृह मंत्री अमित शाह को दोषी ठहराया। गृहमन्त्री को कटघरे में खड़ा करते हुए केजरीवाल ने सवाल उठाया, “किसने रोक रखा है अमित शाह को शाहीन बाग़ प्रोटेस्ट के कारण बंद हुई सड़क को खुलवाने से? आखिर अमित शाह को इस ब्लॉकेड से क्या फायदा है? क्यों वो दिल्ली की जनता को चुनावी फायदों के लिए बेवजह परेशान कर रहे?”

भाजपा पर अपने हमले तेज करते हुए केजरीवाल ने उस पर अवैध कालोनियों की अनदेखी का आरोप लगाया और कहा कि ये सिर्फ जनता को गुमराह करने में लगे हैं।दिल्ली की जनता से वादा करते हुए उन्होंने कहा कि यदि वे चुनावों बाद पुनः वापसी करते हैं तो न सिर्फ पुरानी मुफ्त सुविधाओं वाली स्कीमों को जारी रखा जायेगा बल्कि जरूरत पड़ने पर नई स्कीमें भी शुरू की जाएंगीं।

शाहीन बाग़ की तल्ख़ हकीकत: विरोध का असली मकसद देश में अस्थिरता का माहौल पैदा कर सरकार गिराना

शाहीन बाग़ को CAA और अदृश्य NRC के खिलाफ प्रतिरोध का अड्डा बनाकर स्थापित करने की सुनियोजित कोशिश की गई। इसे स्वतःस्फूर्त स्थापित और संचालित होने के रूप में कुछ खास चुने हुए मीडिया संस्थानों द्वारा प्रचारित किया गया। पूरे देश में खासतौर से मुस्लिम समुदाय के भीड़ को उकसा कर कुछ वामपंथी और मुस्लिम महत्वाकांक्षी नेताओं या बनने की इच्छा रखने वालों द्वारा मीडिया गिरोह के रूप में ऐसे ही कई शाहीन बाग बनाने की अपील की गई।

शाहीन बाग के मास्टरमाइंड शरजील इमाम की शुरुआती प्लानिंग और जक्का जाम या देश भर में शांति भंग करने के मॉडल के आधार पर कई शाहीन बाग़ दिल्ली के मुस्तफाबाद, खूँरेजी, लखनऊ के घंटाघर सहित अलग-अलग जगहों पर बनाए गए। लेकिन क्यों? क्या सिर्फ CAA और NRC का विरोध करने के लिए? अगर आप भी अभी तक यही सोच और समझ रहे हैं तो आप भी उसी भ्रम और झूठ के शिकार हैं, जिसे सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया गया। पिछले कई दिनों तक ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने (पहचान छुपाकर, सामान्य नागरिक बन कर गए थे) शाहीन बाग में क्या और कैसे हो रहा है, इस पर मेहनत की। पता लगाया कि जो लोग विरोध प्रदर्शन के मोहरे हैं वो कौन हैं? जो प्रोटेस्टर के नाम पर मीडिया गिरोह के चेहरे हैं वो कौन हैं? जो वक्ता हैं वो कौन हैं? और जो परदे के पीछे हैं वो कौन? जो पता चला वो चौंकाने वाला है कि किस तरह से वहाँ सब कुछ पूरी तरह से व्यवस्थित है, जिसे अगर बीजेपी और देश विरोधी शाहीन बाग़ मॉडल कहा जाए तो ज़्यादा सही होगा।

चालिए शाहीन बाग के इस पूरे प्रदर्शन मॉडल और इसके उद्देश्यों की गहराई में उतरते हैं। ऑपइंडिया के रिपोर्टरों की विस्तृत पड़ताल की बदौलत उन सभी पक्षों से आपको परिचित कराता हूँ, जिन पर बहुत कम बात हुई है या जिस पर शाहीन बाग में चर्चा करना भी आज के दौर में आपको मुसीबत में डाल सकता है।

काल्पनिक डर

आपको याद होगा कि कैसे CAA और NRC को मिलाकर देखने की बात करते हुए वामपंथी, विपक्षी नेताओं और राष्ट्र विरोधी एक्टिविस्टों (जिनकी सबसे बड़ी चिंता किसी एक पार्टी की मजबूती है) ने CAA लागू होने के बाद इस डर से कि कहीं इस कानून के तहत नागरिकता पाने वाले तीन देशों- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश और 6 धर्मों (हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, ईसाई) के अल्पसंख्यक जिनमें एक रिपोर्ट के अनुसार 70% से अधिक दलित हैं, बीजेपी के मजबूत वोटर बन गए तो उसका बड़ा लाभ इस पार्टी को मिलेगा। इस कानून के तहत मुस्लिम समुदाय को छोड़ दिया गया लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें नागरिकता देने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। बस इस कानून के तहत इसे शामिल नहीं किया गया। चूँकि, ये तीनों देश खासतौर से मुस्लिमों के लिए ही हैं और इस्लाम इनका राष्ट्रीय मज़हब है। अगर मुस्लिम को शामिल कर लें तो किसी कानून की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। यहीं से डर का माहौल बनाकर पहले से ही ‘डरे हुए मुस्लिमों’ के बीच मीडिया और वामपंथी गिरोह के माध्यम से फैलाया गया कि इस कानून में अगर NRC को भी मिला दें तो मुस्लिमों की नागरिकता ही छीन जाएगी।

इस डर को जायज ठहराने के लिए कई कहानियाँ गढ़ी गईं। उनमें से सबसे प्रबल था कि कागज नहीं दिखाना है! कौन सा कागज? तो कभी कहा गया कि आजादी के पहले का तो कभी 1971 के पहले का तो कभी ये भी कह दिया गया चार पीढ़ी पहले का दिखाना होगा। ऐसे कई झूठ और भ्रामक सूचनाओं से लैस शाहीन बाग के प्रोटेस्टर अपने अंदर मीडिया गिरोह द्वारा तरह-तरह से बैठाए डर, जो कई कल्पनाओं में तमाम झूठ मिलकर गढ़ा गया है, उसके जीवंत पुतले मिलेंगे। ये तमाम झूठ वहाँ बैठे प्रोटेस्टर के अंदर NDTV तथा लिबरल गिरोह के कुछ अन्य मीडिया चैनलों द्वारा खासतौर से ऐसे विरोध-प्रदर्शनों के आसान शिकार मुस्लिम महिला-पुरुषों और वंचित तबके के बीच भरा गया। जो आपको वहाँ बात करते हुए साफ नजर आएगा।

झूठ को गाढ़ा करने के लिए मंच के पास लगाया गया एक भ्रामक पोस्टर जिसे अब हटा दिया गया है

उन्हें बताया गया है कि ये सरकार मुस्लिम विरोधी है, जानबूझकर पहले CAA ले आई। जब आसाम में हिन्दू NRC के अंदर फँस गए फिर पूरे देश में NRC लाएगी तो मुस्लिमों को नागरिकता से ही ख़ारिज कर दिया जाएगा। लेकिन आगे ये नहीं बताते कि ख़ारिज करके आखिर कहाँ भेजेंगे? कौन सा देश उन्हें अपनाएगा? तो इसके लिए ये तर्क इसी मीडिया और वामपंथी गिरोह ने फैलाया कि जो नागरिकता से ख़ारिज हो जाएँगे उन्हें डिटेंशन कैम्पों में रखा जाएगा। उसकी तुलना बाकायदा हिटलर के कंसंट्रेशन कैम्पों से की गई। लेकिन आगे न ऐसे डरे हुए लोगों ने ये सवाल पूछा कि क्या 25 करोड़ से ज़्यादा लोगों को रखने के लिए कोई भी सरकार सब कुछ ठप्प कर कैंप क्यों बनाएगी? आखिर क्यों ऐसा करेगी? इसके पीछे मुस्लिम विरोधी छवि को उभारा गया क्योंकि सच बताने से यहाँ वे सभी फँसेंगे जो अभी तक झूठ बोल रहे हैं और भ्रम फैला रहे हैं।

भ्रामक पोस्टर और डिटेंशन कैंप का डर जो मुख्य सेल्फी पॉइंट भी है

खास तरह की मीडिया का ही प्रवेश

‘मुस्लिमों को देश से बाहर कर दिया जाएगा’ शाहीन बाग में ऐसे कई वक्ता मंच से इस काल्पनिक डर को अपने लच्छेदार भाषणों से हर रोज मजबूती प्रदान करते हैं। जो इस स्थापित नैरेटिव से अलग बोलेगा उसका प्रवेश ही वहाँ प्रतिबंधित है फिर चाहे वो कोई स्पीकर हो या मीडिया का ही क्यों न हो? वहाँ आसानी से प्रवेश की अनुमति है तो उन्हीं को जो लगातार देश में अस्थिरता को हवा देने का काम कर रहे हैं।

सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया शाहीन बाग का ‘वीजा’ ही माँगते रह गए

आपने इसका सबूत NDTV, India TV, वायर, Quint, बीबीसी की रिपोर्टिंग में देखा होगा, जो डर को कायम रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन्हें सच्चाई नहीं पता पर वो सच इनके एजेंडे को शूट नहीं कर रहा है। शाहीन बाग में मौजूद ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने बताया कि इनके लिए बाकायदा वहाँ प्लानिंग की जाती है, नकाब और बुर्के में कुछ खास प्रोटेस्टर प्लेस किए जाते हैं ताकि फेक नैरेटिव के हिसाब से ही बातें बाहर आएँ।

NDTV और India Today का विशेष स्वागत

कई ऐसे मीडिया संस्थान जिन पर इसी गिरोह के ‘मठाधीश’ रवीश कुमार ‘गोदी मीडिया’ का टैग दिया है, उनका शाहीन बाग में प्रवेश भी वर्जित है। बहुत बाद में कुछ को सशर्त अनुमति मिली भी तो लाइव करने का दबाव बनाया गया पर चूँकि वो रैंडम प्रदर्शनकारियों से सवाल कर रहे थे तो बने-बनाए फेक नैरेटिव की हवा निकल रही थी। जिस वजह से कई बार ऑपइंडिया रिपोर्टर के सामने ही पहले न्यूज़ नेशन और बाद में इंडिया टीवी के रिपोर्टरों के साथ बदसलूकी की गई।

इंडिया टीवी के लाइव प्रोग्राम को रुकवाते और रिपोर्टरों को परेशान करते प्रोटेस्टर

शाहीन बाग की जमीनी हकीकत

चलिए अब आपको ऑपइंडिया के रिपोर्टरों ने वहाँ जो देखा और महसूस किया उस पर और विस्तार से बताते हैं। दिल्ली-नॉएडा हाइवे जाम किए शाहीन बाग के इस चक्का जाम मॉडल में दोनों तरफ धरना स्थल से थोड़ी दूरी पर बैरिकेडिंग की गई है, जिसके पार कोई नहीं जा सकता, स्कूल बस या एम्बुलेंस तो छोड़िए इसके पार पुलिस को भी जाने की अनुमति नहीं है। जब तक कोई विशेष विवाद न हो।

बैरिकेडिंग के बाहर तैनात पुलिस और शाहीन बाग ‘गणराज्य ‘ की सीमा

पुलिस वहाँ है जरूर पर बैरिकेडिंग के पहले ही। यहाँ तक कि तमाम वामपंथियों द्वारा फैलाए गए इस प्रपंच कि कागज नहीं दिखाएँगे लेकिन एक छोटे से प्रदर्शन स्थल की सुरक्षा के नाम पर आपको तगड़ी सुरक्षा जाँच से गुजरना होगा, बाकायदा आपकी तलाशी ली जाएगी, बैग चेक होंगे, पूछताछ होगी और शक होने या अतिरिक्त सुरक्षा के नाम पर आपसे कागज परिचय पत्र भी माँगा जाएगा। लेकिन शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि जब बात देश की सुरक्षा की हो तो किसी भी तरह का कागज न माँगा जाए वैसे उनसे अभी तक माँगा भी नहीं गया है।

सुरक्षा जाँच के लिए हर प्रवेश द्वार पर तगड़ा चेक पॉइंट है

कल तो मीडिया के लिए भी एक विशेष ‘वीजा’ जारी किया गया, जिसमें उसकी पूरी डिटेल और उद्देश्य के साथ निर्धारित समय भी लिखा हुआ है।

जारी किया गया परमिट

भड़काऊ भाषण और गलत बयानी का अड्डा

वहाँ मंच से जितने भी वक्ता अपना भाषण देंगे सभी के भाषणों में झूठ और गलत तथ्यों की भरमार होगी ताकि जो फेक नैरेटिव खड़ा किया गया है, उसका भ्रम बरक़रार रहे। बोलने को मंच से कोई भी बोल सकता है लेकिन उसे एजेंडे के तहत ही बोलना होगा और एजेंडा क्या है? जितना ज़्यादा आप मोदी-शाह या बीजेपी के विरोध में बोल सकें उतना अच्छा, भाषण में सत्ता से नफ़रत या उसे उखाड़ फेंकने या देश ने सत्ता को नकार दिया है, शाहीन बाग ने सत्ता को ख़ारिज कर दिया है जैसी जितनी भी बहकी-बहकी बातें होंगी। तालियों की गड़गड़ाहट उतनी ही सुनने को मिलेगी।

मंच से खुद को बहादुर शाह जफ़र का वंशज बताने वाले, बीच में सेकुलरिज्म मेंटेन करने के लिए एक ईसाई प्रचारक और एक सिख भाई

कुछ उदाहरण देता हूँ, सबके अलग-अलग नाम लेकर बताऊँ तो काफी लम्बा हो जाएगा फिर भी अधिकांश का लब्बोलुआब ये रहेगा, “पूरे देश में मुस्लिमों की लिंचिंग की जा रही है। मुस्लिमों को देश से निकालने की साजिश हो रही है। उनकी नागरिकता छीनने के लिए ये कानून लाया गया। वहाँ बार-बार जुनैद, रोहित बेमुला, अख़लाक़ जैसे कुछ नाम लेकर ये याद दिलाया जाता रहेगा कि कैसे सरकार मुस्लिमों और वंचितों के खिलाफ काम कर रही है।”

थोड़ा और डिटेल में ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने बताया कि पिछले दिनों के अगर कुछ नामों का जिक्र किया जाए तो कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी वहाँ सॉलिडेरिटी के नाम पर भ्रामक और भड़काऊ बयान दिए। बहुत कुछ है जो मीडिया रिस्ट्रिक्शन के कारण बाहर आसानी से उपलब्ध नहीं है। पिछले दिनों खुद को बहादुर शाह जफ़र का वंशज बताने वाले एक शख्स ने तो ये भी कह दिया, “अब गजवा-ए-हिन्द का वक़्त आ चुका है। आर-पार की लड़ाई का समय है, मुस्लिम चुप नहीं बैठेगा।”

डर को और कायम रखने के लिए ये भी कहने से नहीं चुके जनाब बहादुर शाह जफ़र के तथाकथित वंशज, “मोदी सरकार रजिस्टरों से मुस्लिमों के नामों के पन्ने फाड़ रही है। अगर कभी कोई कागज बनवाने भी गया तो उसे रजिस्टर में अपना नाम ही नहीं मिलेगा।” जबकि ये बात कोरी बकवास है। बोलने वाला चाहे उमर खालिद हो या शुरूआती दिनों में शरजील इमाम, सभी के बातों में जहर साफ नजर आया और वह छिपा हुआ एजेंडा भी कि NRC या CAA तो बस बहाना है। असली मकसद कुछ और ही है।

भीड़ में मौजूद जिससे भी आप बात करेंगे आपको एक ही तरह की अर्धसत्य और भ्रामक बातें सुनने को मिलेंगी। अपनी तरफ से समझाने की आपने भूल की तो शाहीन बाग में आप मुसीबत में पड़ सकते हैं। जैसे जलाल, फकरूद्दीन और कई ऐसे लोग जिनसे नाम ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने मूल मुद्दे को समझने के बहाने से पूछ लिया, भाई जान विरोध किस बात का है? CAA तो प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है? बाहर भ्रम बहुत ज़्यादा है आप बताइए कि बात क्या है? तो जलाल ने छूटते ही कहा था, “मोदी और शाह दोनों मिलकर मुस्लिमों को देश से निकालना चाहते हैं। हम इन्हें ही निकाल देंगे अब हमारी लड़ाई ही इन्हें सत्ता से हटाना है।”

कई तो वही सुनी-सुनाई बात की रट लगाए थे कि हम संविधान बचाने के लिए लड़ रहे हैं। संविधान खतरे में आ गया है? कुछ ने आईडिया ऑफ़ इंडिया भी दे मारा कि वही खतरे में आ गया है। रिपोर्टर ने पूछा कैसे? तो यही सुनने को मिला आप NDTV नहीं देखते क्या उसमें बताया गया था कि देश में संविधान खतरे में आ गया है। एक ने तो बिन माँगे सलाह ही दे दी कि ‘गोदी मीडिया’ मत देखिए सिर्फ NDTV में हमारी (मुस्लिमों) बात वैसे ही आती है जैसे हम यहाँ बोल रहे हैं। हमें क्या और कैसे करना है ये भी हमें वहीं से पता चल जाता है।

नैरेटिव गाढ़ा करने के लिए हर तरफ पोस्टर ही पोस्टर

कुल मिलाकर अगर वहाँ मौजूद आम प्रदर्शनकारियों की बात करें तो वो उसी काल्पनिक डर से हलकान दिखे, जो उनके अंदर वामपंथी-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और मीडिया गिरोह द्वारा फैलाया, सुनाया गया है। शाहीन बाग में रचे-बसे झूठ या नैरेटिव के खिलाफ वहाँ कोई भी अपने विचार नहीं रख सकता। वहाँ मौजूद रहकर या तो आपको भीड़ का हिस्सा बनना होगा या मूक दर्शक, जो देख और समझ तो सब सकता है पर प्रचलित नैरेटिव के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकता। अगर किसी ने ऐसी गुस्ताखी करने की कोशिश की तो आपको घेरे कर या आपके आस-पास की भीड़ आपको बीजेपी या आरएसएस का एजेंट साबित कर आपके विचारों या जो सत्य आप बताना चाहते हैं उसे एक झटके में ख़ारिज कर देगी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो शाहीन बाग़ आपको कूप मण्डूकता का केंद्र नजर आएगा, जहाँ जैसे पूरे कुंएँ में ही भाँग पड़ी हो और सब एक से मतवाले नजर आएँगे।

मंच, बैकस्टेज, स्वास्थ्य केंद्र, लाइब्रेरी, पोस्टर मेकिंग, इंस्टॉलेशन

मंच जहाँ से पिछले 50 से अधिक दिनों से भड़काऊ बयानबाजी इस दम पर की जा रही है कि ये शाहीन बाग का मंच और यहाँ बैठे चंद भटके और पॉलिटिकली मोटिवेटेड लोग संसद और देश के चुने हुए प्रतिनिधियों से बढ़कर हैं। बीच-बीच में आजादी के नारों के बीच आपको ये दलील पुरजोर और अक्सर सुनाई देगी कि हम यहाँ से कहीं नहीं जाएँगे। अब शाहीन बाग़ ने फैसला कर दिया है मोदी-शाह को यहाँ आना होगा और लिखित में यह बताना होगा कि NRC, (अब इस एजेंडे में एनपीआर भी जोड़ दिया गया है) कभी नहीं आएगा और CAA वापस लेना होगा, तभी वे सड़क से उठेंगे।

इसी शाहीन बाग़ के घोषणा पत्र के आधार पर देश के कई जगहों से आपने यह भी सुना होगा कि अब विरोध CAA का है ही नहीं सरकार को, मोदी और अमित शाह को जाना होगा। अगली सरकार वही आएगी, जिसे मुस्लिम चाहेगा। उसे ये कानून देश में कभी न लाने का वादा करना होगा क्योंकि देश का मुस्लिम काफी डर गया है।

क्यों? पूछने की गुंजाईश वहाँ है ही नहीं। कोई पत्रकार भी शाहीन बाग़ के ‘अराजक गणराज्य’ में ये हिमाकत नहीं कर सकता। वहाँ के नियम इतने सख्त हैं कि शुरू से कुछ खास विचारधारा के लोगों और मीडिया की इंट्री ही वहाँ संभव रखी गई है। और बाकायदा नैरेटिव के हिसाब से उनके शो या रिकॉर्डिंग में वो सभी इंतजाम किए जाते हैं जिससे उनका उनका फेक नैरेटिव फैलता रहे। बाकी किसी को अनुमति लेकर भी रिकॉर्डिंग या सवाल पूछने की अनुमति नहीं, ऐसा करने पर आपको घूरती हुई भीड़ की निगाहें छलनी कर देंगी। चोरी से रिकॉर्डिंग करने की कोशिश की तो भीड़ आपको घेरकर लिंचिंग जैसा माहौल बना देगा। आपको हर हाल में वीडियो डिलीट करने के बाद ही मुक्ति मिलेगी। कल गुंजा कपूर के साथ जो हुआ वो तो बस एक छोटा सा नमूना था।

कुछ और मीडिया संस्थानों को बाद में सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया काण्ड के बाद प्रवेश की अनुमति मिली भी तो इस शर्त के साथ कि ये मीडिया संस्थान (जो इस पूरे प्रकरण का दोनों पक्ष जनता के सामने रखना चाहते हैं) इन्हें सिर्फ लाइव दिखाना होगा और ये कोई कठिन सवाल नहीं पूछ सकते। या ऐसा कुछ भी नहीं, जिससे उनका पूरा तंत्र एक्सपोज़ होता नजर आए। ऐसा अगर व्यवस्थापकों को होता दिखा तो दोनों बार चाहे ज़ी न्यूज़ और न्यूज़ नेशन का प्रकरण हो तब या बाद में दो बार इंडिया टीवी के रिपोर्टर को घेरकर उस पर माफ़ी माँगने तक का दबाव बनाया गया। और उनके लाइव रिपोर्टिंग को भी गलत लोगों से काउंटर सवाल करने के कारण बीच में रोक दिया गया। यहाँ तक कि बंद करो के खूब शोर के साथ ही पत्रकारों और कैमरामैनों को परेशान किया गया।

मंच से उन्मादी भाषण देता वक्ता

मंच और टेंट की ठीक-ठाक व्यवस्था है। यहाँ तक की खाने-पीने के लिए बीच के दिनों में लंगर के रूप में खाना बाँटा गया। जब पुलिस ने इसे बंद करा दिया और उसे लेकर विवाद हुआ तो खाने के तौर पर चिकेन बिरयानी और पैकेज्ड वॉटर को हमारे रिपोर्टरों ने कई दिनों तक नोटिस किया।

चिकन बिरयानी और पैक्ड वॉटर का वितरण

चूँकि, एक खास मीडिया के द्वारा शाहीन बाग़ को स्वतः पैदा हुआ आंदोलन करार देने की पूरजोर कोशिश हुई लेकिन ऐसा है नहीं। वहाँ की चाक-चौबंद व्यवस्था देखकर, मंच, टेंट, खाना, चाय, मंच के पीछे ही स्थित दवाखाना, बस स्टॉप का स्वरूप बिगाड़कर उसे लाइब्रेरी का रूप दे देना – इसे देखकर स्वतः वाला नैरेटिव कोरी बकवास है। शरजील इमाम द्वारा सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुस्लिमों की भीड़ इकट्ठी करके आसाम को भारत से अलग कर देने के भाषण के रूप में अपने मंसूबों को जाहिर करने के बाद पोस्टर के रूप में ऐसे कई मैप दिखाई दिए, जिसमें आसाम भारत से कटा हुआ था। पूरी लाइब्रेरी पोस्टरों से वैसे पटी-पड़ी है जैसा नजारा आपको अक्सर जामिया और JNU में देखने को मिलता है।

नैरेटिव के हिसाब से पोस्टर बनाते बच्चे और शाहीन बाग की अस्थाई लाइब्रेरी

इसके आलावा अगर अन्य इंस्टॉलेशन की बात करें तो आपको सबसे बाहर की तरह एक तरह से एक घोषणा पत्र ही दिख जाएगा कि हम भारत के लोग CAA, NRC और NPR नहीं मानते। उसके बाद एक और इंस्टॉलेशन चर्चा का केंद्र था जिसका एक हिस्सा पिछले कई दिनों से हटा दिया गया है। उसमें इंडिया गेट की प्रतिलिपि पर CAA-NRC प्रदर्शनों के दौरान दंगाइयों द्वारा मारे गए या दूसरे शब्दों में कहें तो वामपंथी अफवाह तंत्र का शिकार होकर अपनी जान गँवाने वाले ‘दंगाइयों’ के नाम उन्हें ‘शहीद का मर्तबा’ देते हुए इंडिया गेट के उस रेप्लिका पर लिखा था। ठीक उसके बगल में ही एक जला हुआ, खंडित इंडिया गेट की अधूरी रेप्लिका थी, जिसे जलते हुए भारत के रूप में दर्शाया गया था। जिसकी जिम्मेदारी शासन की थी लेकिन कौन इस देश को जलाने में शामिल थे इस पर चुप्पी थी।

इंडिया गेट की रेप्लिका और खंडित इंडिया गेट, बाद में इंडिया गेट को हटा दिया गया है

आजादी के नारे और छोटे बच्चे

शाहीन बाग के प्रदर्शन स्थल पर दोपहर तक आम दिनों में उतनी भीड़ नहीं दिखती लेकिन शाम और रात होते-होते भीड़ बढ़ती जाती है। कई दिनों तो ये संख्या 10 हजार के पार भी नजर आई। आम तौर शाम और रात में ठीक-ठाक भीड़ रहती है। मंच पर भड़काऊ भाषण और मंच के बाहर इंस्टॉलेशन एरिया में आज़ादी के नारे बच्चों के द्वारा भी लगाए जाते हैं। ये एक तरह से उन बच्चों की ट्रेनिंग ही है पर इसे दूसरे रूप में देखा जाए बच्चों ने जो जहर मंच और वहाँ के वक्ताओं से बटोरा होता है, वही वे घेरा बनाकर बाँट रहे होते हैं।

यहाँ तक कि कई बच्चे मोदी और शाह को ख़त्म करने की बात करते भी नजर आए और लोग ऐसी बातों पर भी उसका मजा लेते नजर आए। उन्हें देखकर आप उनकी अबोधता भी समझ सकते हैं कि जिस जहर और नफ़रत का बीज अनजाने में ही आज बच्चों में बो दिया गया है। वही आगे जाकर एक दिन विषबेल बनेगा और यही बच्चे खुद को आपराधिक गतिविधियों में संलग्न करेंगे। लेकिन इसके जिम्मेदार आज के लोग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होंगे क्योंकि आज अपनी राजनीति के चक्कर में वो हर कुर्बानी देने को तैयार हैं। उनके लिए सरकार के खिलाफ फेक नैरेटिव बनाए रखने के लिए हर कीमत छोटी है।

शाहीन बाग का असली मकसद

पूरे घटना क्रम और वहाँ मौजूद खासतौर से वामपंथी और मुस्लिम प्रदर्शनकारियों से जब ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने घुल-मिलकर जानना चाहा तो कई चौकाने वाले बयान नजर आए जैसे कुछ इसी बात पर अटके थे कि हिन्दू और दूसरे धर्म के लोग शरणार्थी और मुस्लिम इस सरकार के लिए घुसपैठिया हो गया है? आखिर CAA में मुस्लिमों को क्यों नहीं शामिल किया गया? जब तक मुस्लिमों भी शामिल नहीं किया जाएगा तब तक प्रदर्शन चलेगा? कुछ हम जानते हैं कि CAA हमारे लिए नहीं है लेकिन अगर उसमें NRC मिला दें तो सब गड़बड़ हो जा रहा है और अमित शाह कह चुका है। वो पीछे नहीं हटेगा।

कुछ तो इसी धुन में दिखे कि अब मुस्लिमों के साथ सेक्युलर हिन्दू भी आ गए हैं जो चाहते हैं कि ऐसी सरकार आए जो मुस्लिमों के अनुसार काम करे। हम अमित शाह को हिन्दू राष्ट्र नहीं बनाने देंगे। तभी हमारे रिपोर्टर ने एक प्रदर्शनकारी से पूछ लिया कि भाई जान समझ नहीं आ रहा है कि कैसे हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा? इस पर जवाब यही कि हम टीवी में देखे थे कि मोदी और अमित शाह हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। अब इसके बाद हमारे रिपोर्टर ने अपनी समझ का प्रयोग करते हुए वहाँ से खिसक लेना ही बेहतर समझा कि सब कौन सा चैनल देख रहे हैं। और डोज कहाँ से आ रहा है। जहाँ एक तरफा रिपोर्टिंग को ही सच के रूप में परोसा जाता है और दूसरे को अश्पृश्य घोषित कर उससे दूर रहने की सलाह हर रोज दी जाती है।

एक थोड़े ज़्यादा पढ़े लिखे प्रोटेस्टर से जब पूछा गया तो वह बोले हम तो बस यहाँ का नाटक देखने आ जाते हैं कि कैसे दिल्ली में शिक्षा की बात करने वाले लोग इन जाहिलों को उनकी जहालत से निकालने की कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं। एक ग्रुप में खड़े कुछ लोगों ने तो ये साफ कह दिया, “अब ये प्रोटेस्ट CAA-NRC के विरूद्ध नहीं है। ये एक मौका है बीजेपी और आरएसएस के नेताओं को ये दिखा देने का कि मुस्लिम कितना संगठित है। अब वो दिन दूर नहीं जब सब जगह हमारे लोग होंगे या हम जिसे चाहेंगे, जो हमारे लिए काम करेगा उसी की सरकार बनेगी, हम सरकार बनाएँगे भी और गिराएँगे भी।”

कुल मिलाकर, ऐसी कई बातें हैं जो इस पूरे विरोध-प्रदर्शन के पीछे की सुनियोजित साजिश की तरफ इशारा करती है कि किस तरह से कुछ खार खाए अस्थिरता के समर्थक और समस्याओं पर पहले वाले वामपंथी गिरोह के लोग तीन तलाक, आर्टिकल-370 और राम मंदिर के फैसले से बौखलाए मुस्लिमों की भीड़ का उपयोग करते हुए तब अस्थिरता का माहौल पैदा करना चाहा जब उन्हें लगा कि अगर CAA लागू हो गया और उसके बाद NRC भी आ गया तो बीजेपी की सत्ता इतनी मजबूत हो जाएगी कि आने वाले समय में उसे चुनावी गणित में हराना मुश्किल हो जाएगा।

अशिक्षित या कम पढ़ी-लिखी मुस्लिम जमात के मोहरों की तरह प्रयोग कर हर तरफ से ख़ारिज और धकियाये जा रहे वामपंथी और कॉन्ग्रेसी गुट ने, विपक्षी और आम आदमी पार्टी की मिली-भगत से इस अराजकता को हवा देने की कोशिश की। जिससे पैदा हुए हलचल से डरकर बीजेपी CAA कानून वापस ले ले। चूँकि, वैसा कुछ नजर नहीं आ रहा है इसलिए अभी भी किसी भी हद तक जाने के लिए भ्रम का माहौल बनाए रखा गया है। काम से काम दिल्ली विधानसभा चुनावों तक और सबसे कम पढ़ी-लिखी मुस्लिमों की भीड़ मोहरों के रूप में चंद खिलाडियों की कठपुतली बनकर नाच रही है। जिसका जल्द ही भंडाफोड़ होना तय है।

एसिड फैक्ट्री में गैस लीक होने से 7 लोगों की मौत, मालिक इजहारुल फरार

उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले के चंदनपुर गाँव की एक एसिड फैक्ट्री में आज (फरवरी 6, 2020) सुबह गैस लीक होने के कारण 7 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में 3 पुरुष, 1 महिला व 3 बच्चे थे। इनमें 5 लोग एक ही परिवार से थे।

जानकारी के मुताबिक इस फैक्ट्री में रंगाई के लिए केमिकल का इस्तेमाल होता था। इसके बगल में एक केमिकल फैक्ट्री भी थी। जहाँ एक टैंकर से फैक्ट्री के बगल में कुछ केमिकल बहाया गया था और उसी केमिकल के हवा के संपर्क में आने के कारण जहरीली गैस बनी। जिसकी चपेट में आने के कारण 7 लोग और 5 कुत्तों समेत मवेशियों की जान चली गई। हालाँकि, काफी मशक्क्त के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की टीमें जाँच के लिए अंदर पहुँच गईं हैं। लेकिन इलाके में केमिकल की गंध फैलने से लोग दहशत में आ गए हैं।

जिलाधिकारी अखिलेश तिवारी के मुताबिक इस घटना के बाद फैक्ट्री मालिक की तलाश की जा रही है। मालिक का नाम इजहारुल है। साथ ही इस बात की जाँच की जा रही है कि इस फैक्ट्री को चलाने के लिए लाइसेंस था या नहीं, ये अवैध है या वैध।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस अधीक्षक एलआर कुमार ने बताया कि केमिकल के हवा के संपर्क में आने के कारण जहरीली गैस बनी। जिसके कारण गार्ड के पूरे परिवार समेत 7 लोगों की जान गई। इस मामले में आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। मृतकों की पहचान कानपुर निवासी अतीक (50), पत्नी सायरा (40), बेटी आयशा (12), बेटा अफरोज (8), फैशल (18 माह) के रूप में हुई। इसके अलावा दो अन्य मृतकों की पहचान पहलवान और मामा के रूप में हुई।

नीतीश कुमारी और सुशील कुमारी ने शादी कर ली है, पिताजी होते तो गर्दा मचा देते: तेज प्रताप के विवादित बोल

बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव ने राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को लेकर विवादित टिप्पणी की है। तेज प्रताप की ये टिप्पणी उनके अपने ही दल के नेताओं को रास नहीं आई। तेजप्रताप ने दावा किया कि नीतीश कुमार का नाम नीतीश ‘कुमारी’ है और इसी तरह डिप्टी सीएम का नाम भी सुशील ‘कुमारी’ मोदी है। इतना ही नहीं, वो एक क़दम और आगे बढ़ गए और दावा कर डाला कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी आपस में शादी भी कर चुके हैं।

राजद सुप्रीमो लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप ने इस दौरान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय को भी निशाने पर लिया। तेज प्रताप ने कहा कि मगल पांडेय स्वास्थ्य मंत्री बने हैं, तब से सबकुछ अमंगल ही हो रहा है, इसीलिए वो ‘अमंगल’ पांडेय हैं। तेज प्रताप ने सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में आयोजित कार्यक्रम में ये बातें कही। बिहार में कई जगहों पर राजद ऐसे विरोध प्रदर्शन आयोजित कर रही है, जहाँ सीएए और एनआरसी का विरोध किया जा रहा है। तेज प्रताप ऐसी ही एक कार्यक्रम को सम्बोधित करने पहुँचे थे। उन्होंने कहा:

“अगर आज मेरे पिता लालू यादव जी जेल से बाहर होते तो पूरे बिहार में गर्दा मचा देते हैं। ये लोग उन्हीं से डरते हैं। जदयू वाले हमें छोड़कर भागे हैं, अब कभी लौटकर भी आएँगे तो हम इन्हें वापस नहीं लेंगे। नीतीश जी तो संघ और भाजपा के सामने एकदम झुक गए हैं।”

तेज प्रताप ने अपने भाषण के दौरान बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड और उसके मुखिया नीतीश कुमार को निशाने पर रखा। उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि राजनीति में ऐसी भाषा के लिए कोई जगह नहीं है और मर्यादा में रह कर ही बोलना चाहिए। पूर्व सांसद सिंह ने तेज प्रताप के बयान से नाराज़गी जताई। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वो भी विरोध में टिप्पणी करते हैं लेकिन मर्यादा में रहते हैं। उन्होंने कहा कि तेज प्रताप युवा और समझदार हैं, इसीलिए उन्हें मर्यादा का ख्याल करना चाहिए।

तेज प्रताप ने नीतीश कुमार और सुशील मोदी पर की विवादित टिप्पणी

तेज प्रताप यादव ने अपने भाषण के दौरान सीएए और एनआरसी को काला कानून बताया। उनके बयान पर रघुवंश की नाराज़गी से राजद की फूट एक बार फिर से सामने आ गई है। हाल ही में लालू यादव और रघुवंश सिंह की मुलाक़ात हुई थी, जिसके बाद उनके तेवर थोड़े ढीले पड़े थे। वहीं तेज प्रताप के बयान पर जदयू नेता अजय आलोक ने कहा कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। वे मानसिक रूप से अस्वस्थ आदमी हैं। उन्हें पटना की जगह राँची में होना चाहिए था। इस तरह की बात तो कोई पागल आदमी ही करेगा।

‘अल्लाह की कसम मुझे छोड़ दो’ कौशांबी गैंगरेप मामले में आदिल, नाजिक सहित 3 को उम्रकैद

उत्तर प्रदेश के कौशांबी में नाबालिग के साथ गैंगरेप कर वीडियो वायरल करने वाले 3 दरिंदों को उनकी हैवानियत के लिए मात्र 5 महीनों के अंदर ही सजा सुना दी गई। बच्ची की लाख मिन्नतों के बाद भी उस पर दया न खाने वाले तीनों दोषियों को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई। विशेष न्यायाधीश पाक्सो एक्ट अनुपम कुमार ने यह निर्णय सुनाते हुए प्रत्येक दोषी पर एक लाख 83 हजार रुपए का अर्थदंड भी लगाया। साथ ही तीनों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया।

गौरतलब है कि पिछले साल 22 सितंबर को उत्तर प्रदेश के कौशांबी ज़िले के अकिल थाना क्षेत्र से एक 15 वर्षीय दलित नाबालिग के साथ गैंगरेप कर उसका अश्लील वीडियो बनाने की घटना सामने आई थी।

जहाँ सराय अकिल कोतवाली इलाक़े के गाँव में दलित लड़की 21 सितंबर की दोपहर क़रीब डेढ़ बजे घोसिया स्थित पुराने टेलीफोन एक्सचेंज के पास घास छीलने गई थी। इसी दौरान घोसिया गाँव के नाजिक पुत्र उबैर उल्ला, आदिल उर्फ़ छोटू पुत्र इस्माइल और एक अज्ञात युवक ने लड़की को घेर लिया।

इन तीनों ने लड़की को काबू में किया और उसे पकड़ कर झाड़ियों में ले गए और उसके साथ दुष्कर्म किया। इस दौरान लड़की बार-बार दया की भीख माँगती रही, लेकिन दोषी ने उसकी एक न सुनी और पूरे घटनाक्रम का वीडियो बना लिया।

वायरल वीडियो में साफ सुनाई पड़ रहा था कि पीड़िता दलित नाबालिग लड़की उन दरिंदों को “भैया आप मुझे जानते हो, अल्लाह के लिए छोड़ दो” कह-कहकर गिड़गिड़ा रही थी। मगर फिर भी दरिंदों को रहम नहीं आया। वह रोती, चीखती, चिल्लाती रही और आदिल, नजिक जैसे दरिंदे उसकी चीख को फिल्माते रहे।

कुछ देर बाद दलित नाबालिग लड़की की चीख-पुकार सुनकर खेतों में काम कर रहे लोग घटनास्थल पर पहुँचे और नाजिक नामक युवक को पकड़ लिया। उसकी जमकर पिटाई की। लेकिन आदिल और अज्ञात युवक मौक़े से भागने में क़ामयाब रहे। बाद में पुलिस ने मजार से आदिल को भी धर दबोचा और तीसरे की भी पिपरी से गिरफ्तारी हुई। फिर इन पर कार्रवाई चली।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार विवेचना के बाद आरोप पत्र न्यायालय में पेश किया गया। मुकदमे का विचारण विशेष न्यायाधीश पाक्सो कोर्ट में चला। शासकीय अधिवक्ता तीरथ सिंह की ओर से कुल 14 गवाह अदालत में पेश कराए गए। उभय पक्षों के तर्कों को सुनने और पत्रावली में मौजूद साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद न्यायाधीश अनुपम कुमार ने बुधवार को तीनों आरोपितों पर दोष सिद्ध होने पर उम्रकैद और अर्थदंड की सजा सुनाई। इतना ही नहीं, अदालत ने यह निर्णय भी लिया कि अभियुक्तों से वसूले जाने वाले अर्थदंड का तीसरा हिस्सा पीड़िता को दिया जाए।

अल्लाह की कसम मुझे छोड़ दो, भैया आप तो मुझे जानते हो… फिर भी आदिल, नाजिक ने रेप कर बनाया वीडियो

मजार में छिपा था दलित नाबालिग से रेप करने वाला मोहम्मद आदिल, पुलिस ने मुठभेड़ के बाद धर-दबोचा

शाहीन बाग में नवजात की मौत से दुखी ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ विजेता 10 साल की बच्ची ने लिखा CJI को पत्र

दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में करीब डेढ़ महीने से धरना-प्रदर्शन चल रहा है। इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान ही गत जनवरी 30, 2020 की रात 4 महीने की एक नवजात बच्ची की मृत्यु हो गई थी। नवजात की मृत्यु के बाद देशभर में शाहीन बाग़ में विरोध के लिए बच्चों का इस्तेमाल करने वालों की काफी निंदा की गई।

विरोध प्रदर्शन के लिए बच्चों के इस्तेमाल करने और नवजात की मृत्यु से नाराज ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ जीतने वाली 10 साल की जेन गुणारत्न सदावर्ते ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को एक पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से जेन ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि इस तरह के धरना-प्रदर्शन में बच्चों को शामिल ना होने दिया जाए। इसके साथ ही, उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से दिशानिर्देश जारी करने का भी अनुरोध किया गया है।

ज्ञात हो कि जेन गुणारत्न सदावर्ते एक बहादुर बच्ची है जिसने इसी साल ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ जीता है। जेन को मुंबई के क्रिस्टल टॉवर में लगी आग से 17 लोगों की जान बचाने के लिए ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ जीतने वाली जेन गुणारत्न ने 4 महीने के बच्चे की मौत से दुखी होकर जस्टिस एसए बोबडे को 5 पन्नों के पत्र में लिखा- “इस घटना ने मुझे एक नागरिक के रूप में हिलाकर रख दिया है। अनुच्छेद 21 के तहत 4 महीने के बच्चे के जीवन को अधिकार का उल्लंघन किया गया, जो अपनी माँ के साथ हर दिन शाहीन बाग में प्रदर्शन के लिए गया था। इस चिट्‌ठी को याचिका भी माना जा सकता है। ऐसे में बच्चों और नवजात को धरना-प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने के लिए अधिकारियों को निर्देश जारी किए जा सकते हैं।’

अपने पत्र में जेन ने लिखा है कि पुलिस भी बच्चे को प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने में नाकाम रही, जबकि यह उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक था। पत्र के जरिए जेन ने पुलिस से बच्चे की मौत के कारणों की जाँच करने की माँग की है। इसके साथ ही दस साल की बच्ची ने ने लापरवाही बरतने के लिए मृतक नवजात बच्चे के माता-पिता आरिफ व नाजिया, दिल्ली पुलिस और शाहीन बाग के आयोजकों को दोषी ठहराने की भी माँग की है।

इस बारे में जेन गुणारत्न के माता-पिता का कहना है कि उनकी बेटी शाहीन बाग का विरोध नहीं कर रही, बल्कि उसने बच्चों के दर्द को उजागर किया है, क्योंकि वे अपना दर्द नहीं जता सकते। जेन के माता-पिता ने कहा कि बच्चों का इस्तेमाल करना यातना और क्रूरता है।

7 दिन में गोरी, 15 दिनों में छरहरी: क्रीम बेचने वालों पर लगाम जरूरी और खुद की मानसिकता पर भी!

वैश्विक स्तर पर लड़कियों के लिए सुंदरता के पैमाने तय हैं- गोरा चेहरा, लंबी हाइट, गुलाबी होंठ, पतली कमर, पैनी नाक, काले बाल आदि। अब, जो लड़कियाँ प्राकृतिक रूप से इन मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें सौंदर्य जगत या फिर समाज में वैसी जगह नहीं मिलती, जैसी इन खूबियों से लबरेज लड़कियों को। अब हो सकता है कुछ लोग मेरी इस इस बात पर अपनी आपत्ति जताएँ। आधुनिक समाज की उलाहना दें। मुझे उन ब्लैक मॉडल्स के बारे में बताएँ, जिनकी फीस बाकी विश्व की सभी मॉडलों से ज्यादा है। या जिन्हें इंस्टाग्राम पर लाखों की तादाद में लोग फॉलो करते हैं। लेकिन, मैं फिर भी कहूँगी कि वैश्विक स्तर पर लड़कियों के लिए सुंदरता का पैमाना न केवल तय है बल्कि तटस्थ है। जिसकी जकड़ हमारे समाज के कण-कण में है… और यहाँ मैं केवल कुछ गिने-चुने उदाहरणों से गुमराह नहीं होने वाली। जिन्हें पेश करके ये साबित करने की जरूरत पड़े कि दुनिया काले रंग की लड़कियों की सुंदरता को तवज्जो देने लगी है…

बार-बार यहाँ लड़की शब्द का प्रयोग इसलिए क्योंकि लड़कों के लिए एक लंबे समय तक डार्क कॉम्प्लेक्शन अच्छी पर्सनेलिटी का कारक रहा। जिसे बाजारवाद ने बाद में विज्ञापनों के जरिए मटियामेट कर दिया। मगर, लड़कियों के लिए सुंदरता के लिए तय किए गए पैमाने बाजार ने सुनिश्चित नहीं किए। इन्हें गढ़ने वाला समाज है। इन्हें बढ़ावा देने वाला समाज है। जिसे समझते-परखते हुए बाजार ने सिर्फ़ फेयरनेस आदि का झूठा कॉन्सेप्ट लाया। उसने अपने विस्तार के लिए सिर्फ़ हमारी उस नब्ज को पकड़ा, जिसकी पीड़ा न होने के बावजूद हमने उसे जाहिर की, क्योंकि समाज ने हमसे ऐसा करवाया। बाजार ने तो बदले में हमें सिर्फ़ विकल्प दिए। जो बाद में देखते ही देखते हमारी जरूरत बन गए और जिसे बाद में बड़ी ट्यूब से लेकर छोटे शैशे के रूप में हम तक पहुँचाया जाने लगा।

आज बाजार में लाखों ऐसे प्रोडक्ट मौजूद हैं, जो दावा करते हैं कि वो आपकी कायापलट कर देंगे और आपको उस समाज में तारीफ के काबिल बनाएँगे, जिसके लिए गोरा रंग लंबी हाइट पतली कमर खूबसूरती बयां करने के गुण हैं। हालाँकि, आज इन्हीं विज्ञापनों के बहकावे से बचाने के लिए सरकार ने Drugs and Magic Remedies (Objectionable Advertisements) Act, 1954 में संशोधन करने का विचार किया है। जिसमें उन्होंने विज्ञापनों के जरिए बरगलाने वालों के लिए जुर्माना राशि और सजा तय की है। इसमें उपभोक्ताओं को पहली बार मिसलीडिंग ऐड दिखाते हुए पकड़े जाने पर 10 लाख रुपए का जुर्माना और 2 साल तक के जेल की सजा है। जबिक इसके बाद पकड़े जाने पर 50 लाख रुपए का जुर्माना और 5 साल तक की जेल की की सजा का प्रावधान है।

यहाँ नैतिकता के आधार पर सरकार का ये कदम बहुत सरहानीय है। वे ब्यूटी प्रोड्क्स में इस्तेमाल होने वाले ड्रग्स आदि से अपने देश के नागरिकों को संरक्षित करना चाहती है। झूठे बहकावों से जनता को बचाना चाहती है। और इतने सब के लिए अगर वह इससे भी कड़े कदम उठाने पर विचार करती है, तो उस पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता। क्योंकि, ये बात सब मानते हैं कि इंसान को आभासी दुनिया की बनावटी सुंदरता से ज्यादा व्यावहारिक दुनिया की प्राकृतिक सौंदर्यता दिखाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

मगर, यहाँ इस बात पर विचार करिए कि क्या आधुनिकता के इस दौर में जहाँ सूचना क्रांति से लेकर नारियों द्वारा अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली कहानियों का विस्फोट है, वहाँ हमारी सरकार को आखिर क्यों हमें बाजार के प्रलोभ से सुरक्षित करने के लिए ऐसे बिल लाने पर सोचना पड़ रहा है? क्या हम इतने मूढ़ और लाचार हो चुके हैं कि अब भी समाज द्वारा निर्मित भ्रांतियाँ-कुरीतियाँ हमें भीतर तक जकड़े हुए है और हम सब जानते-समझते हुए उससे उभरना नहीं चाहते।

आज मैं अन्य देशों में स्थापित हो रहे उदाहरणों को देखकर खुश नहीं होना चाहती। क्योंकि मैं पहले अपने आस-पास, अपने समाज, और विविधताओं से भरे अपने देश के बारे में बात करना चाहती हूँ, जहाँ के लोगों की सोच आधुनिक होने के बावजूद भी इस मामले में समय के साथ अधिक रूढ़ हो रही है। जिसकी जकड़ इतनी बुरी है कि अगर सरकार अपने प्रयासों से बाजार के फर्जी दावों पर नियंत्रण भी कस दे, तो भी हमारी भीतर से चाह यही होगी कि किसी तरह, कहीं से बाजार हमें वो वस्तुएँ मुहैया करवा दे, जिनके जरिए हम खुद को निखार-सँवार पाएँ।

इसे आज के परिपेक्ष्य में उदाहरण सहित समझिए। बॉलीवुड की जानी-मानी अदाकारा कंगना रनौत और टॉलीवुड की उभरती सितारा साईं पल्लवी दो ऐसी लड़कियों के नाम हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए के फेयरनेस क्रीम के विज्ञापनों को करने से साफ मना कर दिया। ऐसा सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि उनका मानना था कि इससे समाज में गलत संदेश जाएगा। लोग उन्हें इस फेयरनेस कैंपेन का हिस्सा मानेंगे, जिसमें आज अधिकतर लोग शुमार हैं। हालाँकि, फिल्मी जगत से जुड़ी हिरोइनों द्वारा उठाया गया ये कदम वाकई प्रशंसा के लायक है। लेकिन फिर भी, दुख इस बात का है कि सोशल मीडिया पर इनके इस कदम के लिए ताऱीफों के कसीदें पढ़ने वाली लड़कियाँ खुद इसकी जकड़ से बाहर नहीं हैं। वे तथाकथित नारीवादी महिलाएँ भी इस सोच से ऊपर नहीं है, जो हर समय नैचुरल सेल्फी अभियान चलाकर एक दूसरे को चैलेंज करती हैं कि दूसरी महिला या उनकी सहेली बिना मेकअप के अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर डाले। सोचिए, वे उस सोच के कितनी अधीन हो चुकी हैं कि उनके लिए अपनी वास्तविक छवि एक चैलेंज का विषय है।

व्यावहारिक तौर पर अगर इस मुद्दे के संबंध में सोशल मीडिया का अध्य्यन किया जाए तो मालूम होगा कि फेसबुक से लेकर ट्विटर और इंस्टाग्राम से लेकर स्नैपचैट गोरा दिखने के लिए फिल्टर का प्रयोग होता है। कैमरे के एंगल से छोटी हाइट को सामान्य हाइट में बदला जाता है। ताकि सुंदरता के पैमानों पर अपनी तस्वीर को खरा उतारा जा सके। तो सोचिए, वास्तविकता में खुद को बदलने के लिए कितने प्रयास किए जाते होंगे। मानिए या मत मानिए, कॉलेज-ट्यूशन से लेकर शादी-ब्याह तक के बीच एक लड़की के मन में ब्यूटी प्रोडक्ट्स को लेकर चुनाव चलता ही रहता है कि आखिर वो किस तरह समाज के बनाए पैमानों पर निखर पाएगी और कैसे अन्य लड़कियों की तरह खुद को सुंदर बना पाएगी…

सुंदरता के लोभ में आज हमारा समाज उस बीमार मानसिकता का अनुयायी हो गया है, जिस पर यदि थूक भी दिया जाए, तो वे इसे अपमान नहीं समझेगा, बल्कि उसे साफ करने के लिए बाजार में विकल्प ढूँढेगा। इसलिए विचार कीजिए कि सरकार जनता को सुरक्षित रखने के लिए कब तक कानूनों में संशोधन करके बाजार पर शिकंजा कस पाएगी? कब तक उन्हें नुकसानदायक प्रोडक्स बेचने से रोक पाएगी?

बेटी की तरह की थी बीमार सुषमा स्वराज की देखभाल, ग्रेटर कैलाश से BJP प्रत्याशी हैं शिखा राय

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने शिखा राय को मैदान में उतारा है। भारत की विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल ने शिखा राय का समर्थन किया है। स्वराज कौशल ने एक ट्वीट के माध्यम से बताया कि शिखा ने सुषमा स्वराज के अंतिम दिनों में उनकी देखभाल की थी। शिखा ने जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में 2011 में गणतंत्र दिवस के दिन झंडा फहराया था। स्वराज कौशल ने अपील की हैं कि लोग शिखा को वोट दें।

स्वराज कौशल ने शिखा का एक वीडियो भी शेयर किया। ये वीडियो तब का है, जब भाजपा ने उन्हें ग्रेटर कैलाश विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी घोषित किया था। शिखा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी को धन्यवाद दिया था। शिखा ने इसे एक जिम्मेदारी बताते हुए कहा था कि वो अपने क्षेत्र की जनता के साथ मिल कर न सिर्फ़ चुनाव जीतेंगी बल्कि विधानसभा में भी क्षेत्र की बात को प्रमुखता से रखेंगी।

शिखा का मानना है कि केंद्र, दिल्ली और एमसीडी- तीनों में भाजपा सत्ता में हो तो तेज़ी से विकास होगा। स्वराज कौशल ने बताया कि शिखा को श्रीनगर में झंडा फहराने के बाद पुलिस कस्टडी में प्रताड़ित भी किया गया था। उन्होंने जानकारी दी कि सुषमा स्वराज ने शिखा राय को लगभग 25 वर्षों तक अपने मार्गदर्शन में रखा। साथ ही उन्होंने बताया कि सुषमा स्वराज जब बीमार पड़ीं तो शिखा ने भी उनका एक बेटी की तरह दिन-रात देखभाल किया। शिखा राय ने कहा कि वो आज राजनीति में जो कुछ भी हैं, वो सिर्फ़ सुषमा स्वराज के कारण ही हैं।

जहाँ तक ग्रेटर कैलाश विधानसभा की बात है, यहाँ से फ़िलहाल आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज विधायक हैं। सौरभ भारद्वाज इस बार भी यहाँ से दाँव आजमा रहे हैं। उनका मुक़ाबला 30 सालों से भाजपा से जुड़ी रहीं शिखा राय से होगा, जो लम्बे समय तक एमसीडी की निगम पार्षद रही हैं। कॉन्ग्रेस ने सुखबीर सिंह को मैदान में उतारा है।

शरजील इमाम के बैंक खातों से मिले विदेशी फंडिंग के संकेत, क्राइम ब्रांच ने शुरू की जाँच

भारत से असम को काटकर अलग करने की बात कर देशद्रोह के मामले में फँसे शरजील इमाम के बैंक खाते में विदेशों से फंडिंग होने के संकेत मिले हैं। हालाँकि, अभी तक की पड़ताल में यह बात साफ नहीं हो पाई है कि यह फडिंग कौन कर रहा था। मगर, पुलिस हर पहलू पर जाँच कर सच्चाई का पता लगाने में प्रयासरत है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस केस में बुधवार (फरवरी 5, 2020) को जामिया के तीन छात्रों से पूछताछ की गई। जिन्हें शरजील के फोन से मिले सबूतों के आधार पर नोटिस देकर जाँच में शामिल होने के लिए कहा गया था। इन छात्रों की पहचान शाहनवाज, सनाउल्लाह और सिद्धार्थ के रूप में हुई है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर

ये छात्र कल सुबह चाणक्यपुरी स्थित क्राइम ब्राँच ऑफिस में पहुँचे। उनसे करीब 5 घंटे तक बारी-बारी से सवाल-जवाब किए गए। इन छात्रों ने पुलिस को जानकारी दी कि शरजील के कहने पर ही उन्होंने जामिया और एनएफसी एरिया में सीएए और एनआरसी को लेकर पर्चे बाँटे थे।

जानकारी के अनुसार पूछताछ में इन छात्रों ने खुलासा किया कि शरजील ने भड़काऊ और कट्टरपंथी भाषा वाले 3 तरह के 5 हजार पोस्टर छपवाए थे। ये पोस्टर मुस्लिम बहुल एरिया में मस्जिद के आसपास तक पहुँचाए गए थे। क्राइम ब्रांच शरजील इमाम की आवाज के नमूने भी जल्द एफएसएल जाँच के लिए भेजने की तैयारी कर रहा है।

गौरतलब है कि शरजील के बैंक अकॉउंट पर पड़ताल शुरू करने से पहले फोन की जाँच के दौरान दिल्ली पुलिस को कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली थीं। जिनके आधार पर पुलिस ने शरजील का साथ देने वाले 15 और लोगों की पहचान की थी। इनमें से ही कुछ को पुलिस ने नोटिस भी भेजा था, जबकि बाकी अन्य लोगों से भी सामान्य पूछताछ चल रही थी। इन 15 चिह्नित लोगों में कुछ जामिया और कुछ एएमयू के छात्र भी शामिल थे। इसके अलावा इस सूची में कुछ शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों के भी नाम थे।

इन खुलासों के बाद ही फंडिंग संबंधित जानकारी जुटाने के लिए शरजील के बैंक अकाउंट को भी खंगाला गया। इसके अलावा इस बात की भी जाँच हुई कि शरजील इमाम के साथ कौन-कौन लोग भड़काऊ भाषण में और विवादित पोस्टर छपवाने में शामिल थे।

शरजील के फोन से चौंकाने वाले खुलासे, जामिया और एएमयू के छात्रों सहित 15 पर कसा शिकंजा

शमीम ने रेखा और उसकी बेटी को गला घोंटकर मार डाला, शव को टंकी डाल कर था फरार, ससुराल से हुआ गिरफ्तार

झारखंड के राँची के अरगोड़ा थाना क्षेत्र के पिपराटोली में रेखा तिग्गा नामक महिला और उसकी बेटी प्रियांशी तिग्गा की हत्या मामले में पुलिस ने शमीम अंसारी को गिरफ्तार किया। अंसारी को पिठोरिया थाना क्षेत्र के कोकदोरो स्थित उसके ससुराल से उठाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शमीम से पूछताछ में उसने अपना जुर्म स्वीकार लिया। उसने बताया कि वह शादीशुदा है और ये बात रेखा भी जानती थी। मगर इसके बावजूद वो शमीम पर अपने साथ रहने के लिए दबाव बनाती थी। जिसके कारण दोनों के बीच अक्सर विवाद होता था।

रातू थाना क्षेत्र के हुरहुरी गाँव के रहने वाले शमीम के मुताबिक रेखा के पति की मौत हो चुकी थी, जिसके बाद उसे पैसे भी मिले थे। लेकिन शमीम जब भी उससे पैसे माँगता था तो वह उसे मना कर देती थी। जिससे शमीम को दिक्कत होती। ऐसे में 21 अगस्त 2019 की रात रेखा को अपनी बेटी के साथ कमरे में सोता देख, उसने दोनों को मारने का फैसला किया।

पहले उसने रेखा का गला घोंटकर उसकी हत्या की। बाद में जब बच्ची ये सब देखकर रोने लगी, तो उसने उसे भी मार दिया। इसके बाद सबूत मिटाने के लिए उसने दोनों के शव को टंकी में डाल दिया और फिर शव को जल्दी सड़ाने के लिए टंकी में सोडा-नमक भी डाल दिया। अगले दिन उसने मकान मालिक को दोनों माँ-बेटी के गायब होने की जानकारी दी और उन्हें तलाश करने के नाम पर वहाँ से भाग गया।

बाद में टंकी से बरामद हुए कपड़े और चप्पल के आधार पर दोनों की पहचान हुई। जिसके बाद मृतका के भाई ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करवाई और शमीम पर हत्या को अंजाम देने की शंका जाहिर की। मृतका के भाई ने बताया कि उसकी बहन रेखा तिग्गी अपने पति की मौत के बाद शमीम के साथ रहने लगी थी। वो पेशे से रेजा थी और शमीम राजमिस्त्री था। प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार 2 सितंबर को पुलिस ने अपनी जाँच में आवासीय परिसर में निर्मित वाटर हार्वेस्टिंग के लिए बनाई गई टंकी से सड़ी-गली अवस्था में बरामद किया था।