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मुझे खुशी है कि भारत का बँटवारा हुआ, नहीं होता तो कई डायरेक्ट एक्शन डेज देखने पड़ते: कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने भारत के विभाजन पर खुशी जाहिर की और कहा कि उन्हें खुशी है कि भारत-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ। उन्होंने रविवार (फरवरी 9, 2020) को एक कार्यक्रम में कहा, “मुझे खुशी है कि भारत का बँटवारा हुआ। ऐसा नहीं होता तो मुस्लिम लीग देश को चलने नहीं देती।”

बता दें कि नटवर सिंह ने रविवार को राज्यसभा सांसद एमजे अकबर की नई किताब ‘गाँधी हिंदुइज्म: द स्ट्रगल अगेंस्ट जिन्नाह इस्लाम’ की लॉन्चिंग के कार्यक्रम में शिरकत की थी। इसी दौरान उन्होंने भारत के बँटवारे के इतिहास को याद किया और ये बातें कहीं। एमजे अकबर के इस किताब का लोकार्पण पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निवास स्थान पर किया गया था।

नटवर सिंह ने कहा, “मुझे खुशी है कि भारत का बँटवारा हुआ क्योंकि अगर भारत का बँटवारा नहीं होता तो हमें कई ‘डायरेक्ट एक्शन डेज’ देखने पड़ते। ऐसी पहली कार्रवाई हमने जिन्ना के जीवित रहते 16 अगस्त (1946) को देखी थी, उस समय कोलकाता (तब कलकत्ता) में हजारों हिंदुओं को मार दिया गया था। इसके बाद की प्रतिक्रिया में बिहार में हजारों मुस्लिमों को मार दिया गया।” उन्होंने कहा, “बँटवारे के पीछे का एक सीधा सा कारण है कि मुस्लिम लीग देश को सही ढंग से चलने नहीं देती।”

मुस्लिम लीग के बारे में अपनी राय के पक्ष में नटवर सिंह ने दो सितंबर 1946 में गठित भारत की अंतरिम सरकार का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि किस तरह से मुस्लिम लीग ने शुरुआत में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में शामिल होने से इनकार कर दिया था। बाद में वह केवल प्रस्तावों को खारिज करने के लिए इसका हिस्सा बनी। 

उन्होंने आगे कहा, “इसलिए व्यापक स्तर पर आप यह कल्पना कीजिए कि अगर भारत का बँटवारा नहीं होता तो मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार का कामकाज बहुत ही मुश्किल कर देती। उस समय एक हफ्ते में ही सरकार की स्थिति कमजोर हो जाती।”

कार्यक्रम में मौजूद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि गाँधी जी ने बयान दिया था कि वह 15 अगस्त को पाकिस्तान जाना चाहेंगे, यह उस बड़े दर्द का सांकेतिक प्रकटीकरण था, जो वह उस समय महसूस कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘यह महज बँटवारा नहीं था लेकिन गाँधी जी ने बँटवारे के बाद की इस स्थिति को महसूस किया कि रिश्ते (भारत और पाकिस्तान के बीच) ऐसे होंगे, जो संभवत: दोनों देशों को दर्द और दुख देंगे, जो सही साबित हुआ।”

क्या है ‘डायरेक्ट एक्शन डेज’ ?

बता दें कि उस समय मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने अलग देश की माँग की थी, जिसके तहत उन्होंने सीधी कार्रवाई (हिंदुओं को टारगेट कर हिंसा करना) करनी शुरू कर दी थी। इस दौरान 16 अगस्त 1946 को कोलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे, जिसमें हजारों लोगों ने अपनी जान गँवा दी। इस घटना को ही ‘डायरेक्ट एक्शन डेज’ या ‘कलकत्ता नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है।

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एक फिल्म बनी, पोस्टर छपे, लोगों में जिज्ञासा जगी, एक आशा बलवती हुई कि किसी ने तो अनकही कहानी (शब्दशः ‘अनटोल्ड स्टोरी’) कहने की हिम्मत की। तीस साल पूरे हुए उस नरसंहार के जिसे कश्मीरी पंडितों का पलायन बता कर सामान्य कर दिया जाता है। इस नरसंहार की बीस नृशंस कहानियों को मैंने पहले भी आप तक पहुँचाया है, और मैं चाहूँगा कि आप उन्हें फिर से एक बार दोहरा लें।

कश्मीर के हिन्दू नरसंहार की 20 नृशंस कहानियाँ जो हर हिन्दू को याद होनी चाहिए

इन्हें जानना नहीं, याद करना आवश्यक है। हमारे देश में एक विलक्षण प्रवृत्ति रही है अपने ऊपर हुए अत्याचारों और अन्यायों के दौर को ही नहीं, अत्याचारियों और आतंकियों को भी भुला देने का। ऐसा नहीं है कि हमें याद था और हम भूल गए। नहीं, ये कहानियाँ हम तक पहुँचने ही नहीं दी गईं। किसी ने ये बताया ही नहीं कि जिस नरसंहार को ‘पलायन’ कह कल सामान्यीकृत किया जाता है, उसमें हुआ क्या था?

हमें इंटरनेट के दौर में भी उन कहानियों के बाहर आने की प्रतीक्षा करनी पड़ी। 2010 वाले दशक में तो इंटरनेट आ चुका था, 2015-16 तक तो हमारे हाथों में 4G आ गया था, फिर भी हम तक वो कहानियाँ क्यों नहीं आईं! क्योंकि हम एनिवर्सरी का, सालगिरह की प्रतीक्षा करते हैं या फिर हमारे इंतजार का कारण हमारी सामूहिक विस्मृति है, जिसे तारीखों का भान सिर्फ वर्तमान को जी लेने भर के लिए ही रहता है।

हम भूल जाते हैं कि इतिहास भी कभी वर्तमान था, और आज का वर्तमान भी किसी के लिए इतिहास होगा। स्कूलों में जब आतंकवादी मुगलों को शहंशाह और आलमगीर जैसे विशेषणों के साथ पढ़ाया गया, महान भारतीय चक्रवर्ती सम्राटों को अनुच्छेदों में समेट कर बलात्करियों और मूर्तिभंजक मुगलों के समक्ष बौना कर दिया गया, तो कश्मीरी हिन्दुओं का रक्तिम वर्तमान, जिस घाव के ऊपर अभी भी पपड़ी सूखी नहीं है, नाखून धँसाने से रिसने लगती है, उसे कैसे बताया जाता!

वो भी इस दौर में जहाँ कश्मीर को डल झील की जमी हुई बर्फ पर क्रिकेट खेलते बच्चों की सालाना तस्वीर में ही निपटा दिया जाता है। हमें तो बताया ही नहीं जाता कि फ़ेरन के नीचे की काँगड़ी में बारूद किसने रखा! हमें तो उस त्रासदी को ‘कश्मीरी पंडितों के पलायन के इतने साल’ जैसे वाक्यांशों में समेटने लायक ही जानकारी दी जाती रही है।

ये तो बताया ही नहीं गया कि मंदिरों पर लाउडस्पीकर लगा कर नमाज क्यों पढ़ रहे थे वो लोग? ये तो कहा ही नहीं गया कि उन्हीं लाउडस्पीकरों से ‘हमें कश्मीरी हिन्दू औरतें और लड़कियाँ चाहिए’ की भी आवाज़ें आ रही थीं! आठ लाख लोगों को घर छोड़ कर निकलना पड़ा क्योंकि उनके मंदिरों में एके सैंतालीस नहीं बाँटे गए, न ही मंगलवार को पत्थरबाजी की, महिलाओं के बलात्कार की, पुरुषों की हत्या की, पड़ोसियों को आतंकियों के हवाले करने का प्रशिक्षण दिया गया था।

कश्मीरी हिन्दू बस चार सौ सालों के इस्लामी शासन में शिव, शारदा और बौद्ध दर्शन के मुख्य केन्द्रों से बलात्कारी और हिंसक कट्टरपंथियों के ठिकाने में बदल दिए गए। तो क्या 1990 का नरसंहार और पलायन पहला था? एक पूरा इलाका इस्लामी ही नहीं बना, बल्कि समुदाय विशेष की जनसंख्या 96% हो गई। ऐसा सिर्फ अपने बच्चे पैदा करने से नहीं होता, बल्कि दूसरों के कत्ल, उनकी आस्था पर चोट और हिंसा से संभव होता है। वो इतिहास तो हम तक अभी भी नहीं पहुँचा है। हमें तो उस दौर के पन्ने दिखाए भी नहीं गए हैं।

बॉलीवुड के धूर्त लोग

तीस साल जब बीते, तब कहीं-कहीं चर्चा शुरू हुई। श्रद्धांजलि सभाएँ, सालाना ‘कश्मीरी पंडितों के पलायन के तीस साल’ वाले कॉपी-पेस्ट लेख और श्वेत-श्याम तस्वीरें, कुछ भाषण, कुछ बयान आदि आए और चले गए। लेकिन इसके साथ एक बात और हुई। एक पोस्टर आया जिसमें विधु विनोद चोपड़ा ने ‘कश्मीरी पंडितों के पलायन की अनकही कहानी’ पर फ़िल्म बनाने की बात की।

अपने ही घर से बेघर कश्मीरी हिन्दुओं ने सोचा कि चलो किसी को तो सुधि आई, किसी ने तो इतना सोचा। लेकिन कुछ लोग विधु विनोद चोपड़ा को लेकर सशंकित थे। ट्रेलर आया तो चोपड़ा जी की करतूत का थोड़ा भेद खुला। उसके बाद जैसे-जैसे प्रमोशन होने लगा, फिर शाहीन बाग उसमें जुड़ने लगा, फिर निर्देशक और लेख आदि जैसे-जैसे पोलिटिकली करेक्ट बातें करने लगे, सारा खेल समझ में आने लगा कि इसमें क्या हुआ होगा।

फिर भी, लोगों ने इंतजार करना बेहतर समझा। हालाँकि, रवीश कुमार जैसे प्रपंचियों ने ‘मैंने सबको सॉरी कहा’ कह कर मानवता की अप्रतिम मिसाल बन कर सामने आने की कोशिश की, और विधु विनोद चोपड़ा सहित, कई लोग जो इस फिल्म से जुड़े थे, सेकुलर बनने के रोग से ग्रस्त हुए। बातें कही जाने लगीं कि हमें नफरत नहीं फैलाना चाहिए, एक दूसरे को सॉरी बोल कर आगे बढ़ना चाहिए, दो बिछड़े दोस्तों की तरह मिलना चाहिए…

मतलब? हिन्दू किस बात के लिए कट्टरपंथियों को सॉरी बोले? क्या वो इसलिए सॉरी बोले कि उसकी एक बेटी का रेप हुआ, दूसरी को बचा कर भाग आया? क्या पति के खून से सने चावल खाने को मजबूर बीके गंजू की पत्नी को सॉरी बोलना चाहिए कि आतंकियों से बचने के लिए वो चावल के कनस्तर में छुप रही थी, उन्हें खोजने में समस्या हुई होगी! क्या भूषण लाल रैना के परिवार वाले (अगर ज़िंदा हैं कहीं तो) कट्टरपंथियों से माफी माँगे कि जब उनके सर में रॉड घुसाने के बाद, उन्हें नग्न कर के, पेड़ में कीलों से ठोका जा रहा था तब उन्होंने अपने बेजान हाथों से उन्हें दूसरी कील नहीं थमाई?

ये जो सेकुलरिज्म है, जहाँ हमें इतिहास को जीभ से चाट कर प्लेट को साफ करने की तरह बताने की कोशिश की जा रही है, वो सर्वथा गलत है, एक पाप है जो हम अपने साथ कर रहे हैं। कश्मीर का समुदाय विशेष और वो तमाम लोग जो इस पर चुप रहते हैं, किसी भी तरह की माफी के लायक नहीं हैं। हर भारतीय हिन्दू को, और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को कश्मीर याद रहना चाहिए।

क्या हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहारों के लिए नाज़ी सैनिकों को माफ कर दिया विश्व ने? या आज भी अगर वो 94 साल का व्हीलचेयर से बँधा रैनहोल्ड हैनिंग भी हो, जो उसी ऑश्विट्ज़ मृत्यु शिविर का गार्ड था जहाँ 1,70,000 लोगों की हत्या की गई थी, उसे भी खोज कर न्यायिक प्रक्रिया से गुजार कर एक राष्ट्र उस अपराध को स्वीकार रहा है जो किसी और ने उसी सत्ता की कुर्सी पर आसीन हो कर किया था?

उन्हें माफ कैसे कर दिया जाए जिन्होंने गिरिजा टिक्कू का सामूहिक बलात्कार किया, और जीवित अवस्था में ही बढ़ई की आरी से उसे चीर दिया? और क्यों माफ कर दें? क्योंकि वो ख़ास मजहब से हैं? क्योंकि यह समुदाय इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हो कर भी अल्पसंख्यकों का दर्जा लिए पीड़ित होने का स्वाँग रचता है? क्योंकि ये लोग जहाँ भी हैं, उसने वहाँ के दूसरे समुदायों ने निशाना बना रखा है?

कश्मीर के कट्टरपंथियों ने वहाँ ख़िलाफ़त खड़ा किया हुआ था, और आज भी है। यही क्रूर सत्य है। इन दरिंदों को माफ़ करना उन तमाम मृत शरीरों को आरी से काटने जैसा है, उनके गालों को चाकू से छीलने जैसा है, नग्नावस्था में पेड़ पर कील से ठोकने जैसा है, जिनकी आत्मा शायद आज भी न्याय के लिए भटक रही होगी। इन दरिंदों को माफ़ कैसे कर दें! जिन कहानियों को सुन कर हृदय काँप उठता है, उनके हत्यारों की ‘सॉरी’ सुन कर ‘मूव ऑन’ कैसे कर जाएँ?

विधु विनोद चोपड़ा हमारे बॉलीवुड के निर्देशक हैं। उनको पैसा कमाना है। कश्मीरी हिन्दुओं की व्यथा के नाम पर प्रमोशन भी करना है, और वैलेंटाइन वीक में प्रेमी युगलों को बर्फ और वादी में सिमटते देहों का प्रेम भी दिखाना है। उन्हें यह भी दिखाना है कि कैसे हिन्दू का वो बच्चा रेडिकलाइज्ड है जो कहता है ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’, और उन ‘शांतिप्रियों’ को सेकुलर भी कहना है जिन्होंने मंदिरों को मस्जिद बना दिया… इतनी मेहनत की है चोपड़ा साहब ने, बधाई तो देना ही चाहिए!

पॉपुलर कल्चर में नरसंहार को प्रेम कहानी बनाने की चाह

विधु विनोद चोपड़ा की पिछली फ़िल्म ‘संजू’ थी, जिसमें संजय दत्त की ‘माँ कसम सच्ची कहानी’ बताई गई थी। बायोपिक कह कर दर्शकों के सामने एक निर्दोष इन्सान की कहानी परोसी गई, अच्छी चली फिल्म। अब किसी को उस समय के अखबारों की कवरेज, कोर्ट के केस, पुलिस का पक्ष आदि जानने की आवश्यकता नहीं, फिल्म देख लीजिए और इतिहास समझ जाइए क्योंकि ये तो बायोपिक है।

उसी तरह, यह भी एक बायोपिक है, लेकिन यहाँ किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं बेची जा रही, बल्कि एक समूह की है। चोपड़ा साहब कर्ता-धर्ता हैं तो आशानुरूप सच्चाई को फ़ेरन में छुपा कर, शिकारे के ऊपर बने कमरे में छुपा दिया गया और झील दिखा कर, संगीत बजा कर, कह दिया गया कि सब प्रेम है, कश्मीर में तो बस प्रेम ही था, वो तो हिन्दुओं को पता नहीं क्या सूझी कि एक रात भाग गए… मुझे लगता है इस्लामोफोबिक हैं सारे कश्मीरी हिन्दू!

ऐसा कर पाना कि इतिहास को पूरी तरह से मरोड़ कर दिखाने के बाद, उन्हीं लोगों को नीचा दिखाना जिन पर अत्याचार हुए, एक अलग स्तर का कौशल माँगता है। विधु जी में वो कौशल है, राहुल पंडिता में वो कौशल है! आश्चर्य की बात यह है कि इस त्रासदी में भी प्रेम खोज लेना, और उसे ऐसे दिखा देना कि थोड़े-बहुत दंगे भी हो गए, लाउडस्पीकर पर ऐलान भी हो गया, जलते घर भी दिखा दिए, फिर ‘कम ऑन बेबी, डॉन्ट बी मीन’ कर देना, टैलेंट तो माँगता है भाई!

पोस्टर पर लिखा है ‘द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीरी पंडित्स’। इसके एक-एक शब्द को ध्यान से समझिए। यह ‘एन अनटोल्ड स्टोरी’ नहीं है, जिसका मतलब होता है ‘एक अनकही कहानी’, बल्कि ‘द अनटोल्ड स्टोरी’ है, जिसका मतलब है ‘वो अनकही कहानी’। यहाँ ‘एक’ कहानी होती तो, समझ में आता कि किसी एक जोड़े की कहानी हो सकती है, लेकिन जब ‘द’ नामक आर्टिकल का प्रयोग होता है तो वो इस संदर्भ में एक पूरे घटनाक्रम, एक सामूहिक परिस्थिति, एक सार्वजिनक कहानी की बात करता है।

‘अनटोल्ड’ का अर्थ होता है ‘अनकही’, जिसे कहा नहीं गया हो। इस पोस्टर और फिल्म के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि वह कहानी जिसके बारे में सब जानते तो हैं, लेकिन उसे विस्तार से, एक नए माध्यम से, समुचित ट्रीटमेंट के साथ कभी प्रस्तुत नहीं किया गया हो। आप ऐसी कहानी कहने का दावा कर रहे हैं जो सबको जाननी चाहिए, लेकिन कोई जानता नहीं। कश्मीरी पंडितों के संदर्भ में, वो कहानी प्रेम की हो ही नहीं सकती, त्रासदी थी वो, त्रासदी है वो, और जितनी कोशिशें कर लो, त्रासदी ही रहेगी।

और, ये कहानी है किसकी? ‘ऑफ़ कश्मीरी पंडित्स’। यह भी एक अद्भुत बात है कि जिन लोगों को कश्मीर से भगाया गया, उन्हें सिर्फ और सिर्फ उनके धर्म के कारण भगाया गया, उन्हें भी एक जातीय नाम में बाँध कर सीमित किया जाता रहा है। क्या कश्मीरी हिन्दुओं को उनकी जाति के कारण मारा गया, बलात्कार किया गया? क्या उनके मंदिर जातियों के लिए बने थे, जिन्हें तोड़ा गया? फिर उनके इस नरसंहार और पलायन में ‘पंडित’ होने का प्रमुखता क्यों दी जाती है?

वामपंथियों का यह खेल बहुत पुराना है। अवचेतन स्तर पर यह हिन्दू समाज को बाँटने की निंजा तकनीक है। यहाँ ‘पंडित’ लगाते ही उनके साथ हुए इस नृशंसता की लिए स्वानुभूति जातिगत हो जाएगी, सीमित हो जाएगी, बँट जाएगी। ब्राह्मणों का नाम आते ही यहाँ सवर्ण-बनाम-दलित वाली चर्चा में इसे हेय दृष्टि से देखा जाएगा, और लोगों से कहा जाएगा कि जो हुआ, सही हुआ क्योंकि वो तो ब्राह्मण थे, जिन्होंने पाँच हजार सालों तक तुम्हें घोड़े में बाँध कर घसीटा है। हालाँकि, पाँच हजार साल तो छोड़िए, मुगल आतंकवादियों और अंग्रेज लुटेरों के आने के पहले जातिगत भेदभाव का एक जिक्र कोई दिखा दे मुझे!

शब्द बहुत मनन-चिंतन के बाद चुने जाते हैं। वामपंथी आपकी त्रासदी पर हमेशा ही हँसेंगे, और उसके लिए वो शब्द, कहानी और फिल्म गढ़े लेंगे। हिन्दू को पंडित बता कर समेट लिया जाएगा, नरसंहार की सामूहिक त्रासदी पर वैयक्तिक प्रेम कहानी को भारी बना दिया जाएगा। दो मुस्लिम अदाकारों से कश्मीरी हिन्दुओं का किरदार निभाता दिखाया जाएगा जैसे ये कोई अहसान किया जा रहा हो कि वो समुदाय विशेष से हैं फिर भी देखो हिन्दू बन रहे हैं! सही बात है, विश्व शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दे दिया जाए इन्हें क्योंकि अहसान तो है ही कि… ख़ैर, रहने दीजिए!

कश्मीरी हिन्दुओं की चेतना पर प्रहार

यह एक सामान्य घटना नहीं है। जब बलात्कारी बाबर और आतंकवादी औरंगजेब जैसों के नाम पर सड़कें और इमारतें अभी भी इस राष्ट्र की राजधानी की शोभा बढ़ा रही हैं, तो फिर कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार करने वालों को भारत रत्न भी दिया जा सकता है। कश्मीर के तो वो रत्न होंगे ही। जिन लोगों ने तीस हज़ार से ज़्यादा मंदिर तोड़े, हजारों गाँवों को जलाया, लाखों हिन्दुओं को काटा, मतपरिवर्तन कराया, उनकी बच्चियों को हरम में डाला, हिन्दू शासकों की राजकुमारियों को मुस्लिमों को उपहार में बँटवाया, जब हम उनका गुणगान कर सकते हैं, तो कश्मीरी मुस्लिम तो उनके सामने बहुत छोटे हैं!

इसके लिए तो वाक़ई एक फिल्म काफी होती अगर इस पर चर्चा शुरू न होती, और दिव्या राजदान जैसे लोग भरे थिएटर में निर्देशक और लेखक को जलील न करते। फिल्म इतनी बर्बाद बनी है कि सारे वामपंथी और आतंकियों के हिमायती मिल कर भी शायद लागत भी वसूल न पाएँ। रविवार को हर जगह खाली थिएटर इस बात का सबूत देते हैं कि लोगों में जागरूकता बढ़ी है। और ये जागरूकता उन लोगों में बढ़ी है जो नाम देख कर सिनेमा देखते थे, और ऐसे निर्देशकों को अरबपति बनाते रहे जिन्होंने हमेशा अजेंडा ढकेला है, सिनेमा नहीं बनाया।

इस गिरोह को प्रस्तर पर पटकनी देना आवश्यक है। इन्होंने वर्तमान में तो हमेशा ही अजेंडा बेचा है, लेकिन कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार में ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’ घुसेड़ देना बताता है कि ये इतिहास का पुनर्लेखन करने की मंशा रखते हैं। बीस साल पहले ऐसा करते, तो संभव भी था। संभव वैसे ही हो जाता जैसे बॉलीवुड के कारण हर साधु को प्रथमदृष्ट्या बहुरूपिया मान लिया जाता है, हर बनिया सूदखोर हो जाता है, हर ब्राह्मण व्यभिचारी दिखने लगता है, जबकि हर अब्दुल का बाप ‘मेरा एक और भी बेटा होता तो’ वाला भावुक संवाद बोलता है, और अनाथों को पालने का जिम्मा उठाता मिलता है।

नज़र घुमा कर देखिए कि कितने प्रतिशत साधु किसी को ठगते नजर आते हैं? कितने प्रतिशत ब्राह्मण व्यभिचार या अन्य कुकर्मों में संलिप्त दिखते हैं! कितने प्रतिशत लाला किसी के माँ के कंगन लेने को आतुर रहता है? लेकिन एक ही तरह के पात्र, एक ही तरह के गलत काम करते, कई फिल्मों में आपको दिखेंगे। फिर हर ब्राह्मण शक के दायरे में आ जाता है, और हम धीरे-धीरे पूरी जाति से ही घृणा करने लगते हैं। टोलियाँ बन जाती हैं, झंडे का रंग बदल जाता है, और समाज टूटने लगता है।

वही हाल यहाँ कश्मीरी हिन्दुओं का बनाने की कोशिश हुई है। कल को कोई डायरेक्टर उठेगा और कश्मीर घाटी में किसी असलम और सलमा को हिन्दुओं से प्रताड़ित होता दिखाएगा, फिर हम मान लेंगे कि ज़रूर हिन्दुओं ने ही कुछ किया होगा, ये तो बेचारे किसी तरह बकरी पाल कर गुजर-बसर कर रहे थे। कुछ लोग सवाल पूछने लगे हैं कि ‘कुछ तो किया होगा यार, पागल थोड़े ही थे कि एक रात उठे और भगा दिया?’

फिर आप वहीं से सोचना शुरू करते हैं। आप इस्लामी उम्माह और ख़िलाफ़त के संदर्भ को भुला देते हैं, आपको यह भी याद नहीं रहता कि रोहिंग्याओं ने म्यांमार में बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया। आप यह भूल जाते हैं कि जिन यूरोपीय देशों ने इस समुदाय को शरण दी, वहाँ के हर शहर में आतंकी घटनाएँ निरंतर होती रही हैं। आप यह भूल जाते हैं कि ‘शांतिप्रियों’ को शरण देते ही स्वीडन विश्व में बलात्कार के मामले में सबसे ऊपर चला जाता है! आप यह भूल जाते हैं कि शांतिप्रिय देशों में ऐसे लोगों के कैम्प और कई इलाके जहाँ इन ‘शांतिप्रियों’ को वर्चस्व है ‘नो गो ज़ोन’ बन चुके हैं।

इसलिए, कोई आपसे यह कह देगा कि ‘यार, कुछ तो किया होगा न, ऐसे ही थोड़े कोई भगा देगा किसी को’, तो उसे खींच कर ऐसा तमाचा मारिए कि उसका मस्तिष्क झंकृत हो उठे और वो सोचे कि यह प्रश्न कितना वाहियात था। हमें, जानने की आवश्यकता है कि वो कहानियाँ कौन-सी हैं, जो आज तक गायब हैं। आठ लाख लोगों को पलायन सिर्फ तीस साल पहले हुआ है, हर व्यक्ति के पास एक कहानी होगी।

ऐसे लोगों को खोजिए, और पूछिए उनसे कि उनका गुनाह क्या था। उनसे समझिए कि समुदाय विशेष की बस्ती में हिन्दू होने के क्या मायने हैं। जानने की हर संभव कोशिश कीजिए कि आपका पड़ोसी किसी आतंकवादी को आपका पता क्यों बता देगा। इस सोच को जाँचिए जो अपने दोस्त से मिलने का समय माँगता है, घर जाता है, लालचौक को जाती मेटाडोर में बैठता है, रास्ते में उसी दोस्त की छाती में गोली मारता है, शरीर को घसीटता है, और सबके देखने के लिए सड़क पर छोड़ देता है।

फिर आपको पता चलेगा कि ये जीवन नहीं है, युद्ध है इनके लिए जिसमें ये तब तक लड़ते रहेंगे, जब तक जीत न जाएँ। दस साल, बीस साल, पचास साल, सौ साल, हजार साल… चार सौ साल में कश्मीर से हिन्दू कैसे खाली हो गए कि पाँच सौंवे साल में, लोकतंत्र होते हुए भी, सरकार और सेना आठ लाख लोगों के पलायन को रोक न सकी?

सोचिए इस पर, वरना प्रेम कहानी के चुम्मे में वन्धामा की 23 लाशों की विद्रूपता छुपा दी जाएगी। शिकारे पर बैठी नायिका की काली जुल्फों में सिगरेट से पूरे शरीर को जलाने के बाद, सर्वानंद कौल और उनके पुत्र की आँखें निकाल लेने की इस्लामी कलाकृति गायब कर दी जाएगी। हताश नायक की अनवरत हिलती पुतलियों में जीवित अवस्था में पीएन कौल की चमड़ी उतार कर मरने के लिए छोड़ देने की घटना भुला दी जाएगी। बर्फ की वादियों में घुटनों में गोली खाए अशोक कुमार काज़ी के बाल उखाड़ने पर निकली चीख और नवीन सप्रू के शरीर में जानबूझकर मुख्य अंगों में गोली न मार कर उनकी तड़प को देखने वाले लोगों की हँसी गुम कर दी जाएगी।

इस फ़िल्म को मत देखिए, इसकी मंशा को समझिए कि वो आपको क्या दिखाना नहीं चाहते। खोजिए, पढ़िए, जानिए, और समझिए कि हिन्दुओं के साथ क्या हुआ था, और क्या हो रहा है।

शिकारा रिव्यू: 90 में इस्लाम ने रौंदा, 2020 में बॉलीवुड कश्मीरी हिंदुओं पर रगड़ रहा नमक

‘कश्मीरी हिन्दुओं पर थूकने का काम करती है शिकारा फिल्म, उल्टे हिन्दुओं को ही कम्युनल कहती है’

छिपाया जा रहा कश्मीरी पंडितों का दर्द?: ‘शिकारा’ के कुछ पोस्टरों में इसे बताया गया ‘लव स्टोरी’

शाहीन बाग में फ्री लंगर का AIMIM कनेक्शन: AAP, कॉन्ग्रेस, PFI के बाद अब ओवैसी का भी साथ

दिल्ली के शाहीन बाग में CAA-NRC के खिलाफ पिछले लगभग 2 महीने से विरोध प्रदर्शन हो रहा है। यहाँ प्रदर्शन के नाम पर हिंदू विरोधी, देश विरोधी और आजादी के नारे लगाए जा रहे हैं। अब तक इस प्रदर्शन को आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस और PFI के समर्थन करने की बात सामने आई थी, लेकिन अब हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के भी इसमें शामिल होने की बात सामने आई है। AIMIM के दिल्ली महासचिव पर अपना फ्लैट बेचकर शाहीन बाग में खाने-पीने का इंतजाम करने का आरोप है, जिसे मीडिया गिरोह ने ‘मुस्लिम-सिख एकता’ की चासनी में डूबो कर बेचा।

ट्विटर पर goyalsanjeev नाम के यूजर ने लिखा कि दिल्ली में AIMIM की एक रैली में मुस्लिमों को उकसाते हुए कहा गया था, “क्या मुस्लिमों के साथ भी हो सकता है 1984?” उन्होंने आगे लिखा कि इसके बाद इसमें कोई हैरानी कि बाद नहीं है कि वो शाहीन बाग प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं और खाना उपलब्ध करा रहे हैं।

दरअसल इन दिनों एक खबर पूरी मीडिया में घूम रही है कि डीएस बिंद्रा ने शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को लंगर खिलाने के लिए अपना फ्लैट तक बेच दिया। इसके लिए इन्हें काफी तारीफें भी मिल रही हैं। आपको बता दें कि ये डीएस बिंद्रा AIMIM के दिल्ली महासचिव हैं और बताया जा रहा है कि उन्होंने जो फ्लैट बेचा है, वो बिंद्रा ने AIMIM के पैसे से खरीदा था। जिसे बेचकर अब वो लंगर के पैसे जुटाने का नाटक कर रहे हैं।

एक यूजर ने लिखा कि एडवोकेट डी एस बिंद्रा AIMIM के अधिकारी हैं और उन्होंने ये काम खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए नहीं बल्कि अपने राजनीतिक प्रोपेगेंडा को भुनाने के लिए किया है। उन्होंने अपना फ्लैट बेचकर शाहीन बाग को फंडिग दी है।

इससे पहले भी इस प्रदर्शन ने कई सवाल पैदा किए। प्रदर्शन के लिए फंडिंग कौन कर रहा है? प्रदर्शनकारियों के खाने-पीने का इंतजाम कहाँ से हो रहा है? उनका खर्च कौन उठा रहा है? जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं, उससे यह भी सवाल पैदा हुआ है कि यह किसकी साजिश है? प्रदर्शनकारी किनके हाथों की कठपुतली हैं?

इसी दौरान एक वीडियो सामने आया था जिसमें आसिम तूफानी नाम के एक प्रदर्शनकारी से जब रिपोर्टर ने पूछा कि आखिर इस प्रदर्शन के लिए पैसा कहाँ से आ रहा है? तो आसिफ ने जवाब दिया कि उसे ये सब मालूम नहीं है। लेकिन, उनके लिए ये सब अल्लाह कर रहे हैं और उन्हें मिलने वाली सब सुविधा कुदरती मदद है। वे अल्लाह के बंदे हैं और उन्हें इंसान ने पैदा नहीं किया। सब ऊपर वाले ने किया।

हालाँकि इससे पहले भी ED ने शाहीन बाग में PFI के फंडिंग देने की बात कही थी, जिसमें कई दिग्गज कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम शामिल थे। कॉन्ग्रेस के नेता मुकेश शर्मा ने खुद कबूला था कि शाहीन बाग के ‘प्रदर्शनकारियों’ को उनका समर्थन हासिल है। उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, “मैं गाँव का रहने वाला हूँ। मैं जब मदद करता हूँ तो मर्दानगी से करता हूँ। मैंने तो शाहीन बाग वालों की भी मदद कर रखी है। शाहीन बाग बाले मुझे रोज फोन करते हैं।” 

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी कहा था कि राहुल गाँधी, केजरीवाल खामोश हैं, लेकिन उनके लोग खूब बोल रहे हैं। मनीष सिसोदिया बोलते हैं हम शाहीन बाग के साथ हैं। कॉन्ग्रेस के दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर वहाँ जाकर क्या-क्या बोले हैं वो आप जानते हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस पर अल्पसंख्यकों के दिमाग में जहर घोलने का आरोप लगाया था।

वहीं  केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने शाहीन बाग पर कहा था कि शाहीन बाग में आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस, जो 2019 लोकसभा का चुनाव नही जीत पाईं, वो देश को तोड़ने की बातों का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया ने शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों को समर्थन दिया है। वहाँ देश विरोधी व संविधान विरोधी नारे लग रहे हैं। देश को बाँटने की बात की जा रही है। ये राजनीतिक दल 2019 के चुनाव में मिली हार को पचा नहीं पा रहे हैं। शाहीन बाग में अमानतुल्लाह खान के पोस्टर और पेम्फ्लेट्स बाँटते हुए देखे गए थे।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के शाहीन बाग में ‘जिन्ना वली आज़ादी ’के नारे लगाए गए थे। ये नारे शाहीन बाग के विरोधियों की मंशा की तरफ इशारा किया था, जो कि देश तोड़ना चाहते हैं। अब इसमें AAP, PFI और कॉन्ग्रेस के शामिल होने के साथ ही AIMIM का हाथ भी सामने आ गया है।

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‘इस्लाम कबूल नहीं, डर कर किया था निकाह’ – नाबालिग हिन्दू लड़की के लिए कट्टरपंथियों ने माँगी मौत की सजा

हिन्दू नाबालिग लड़की महक कुमारी ने कोर्ट में दिए गए अपने पूर्व के बयान को दबाव तथा भय का परिणाम बताया है। लेकिन बजाय उसे सुरक्षा प्रदान करने के, उसके बयान से मुकर जाने पर पाकिस्तान के इस्लामी कट्टरपंथियों ने उसे खुलेआम धमकियाँ देना शुरू कर दिया है।

नाबालिग महक कुमारी ने कट्टरपंथियों पर जबरन इस्लाम कबूल करवाने का आरोप लगाते हुए इस्लाम छोड़ने की बात कही। इस पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने उस पर इस्लाम को बेइज्जत करने का आरोप लगाते हुए उसके लिए मौत की सजा की माँग की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान के स्थानीय चैनल से बात करते हुए एक मौलवी ने कहा कि उन सभी के लिए जिन्होंने अपने मजहब को छोड़ दूसरा मजहब कबूला है, हम सजा की माँग करेंगे। मौलवी ने मीडिया से बातचीत में आगे कहा कि वे सेशन कोर्ट की जाँच और प्रक्रियाओं को ख़ारिज करते हुए, मामले को हाईकोर्ट लेकर जा चुके हैं। तथा, जरूरत पड़ने पर इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तथा शरीयत की अदालत तक भी लेकर जाएँगे यदि “मामले का निपटारा उनके मन मुताबिक नहीं हुआ तो।”

महक ने पहले के अपने कोर्ट को दिए बयान में स्वेच्छा से बिना किसी दबाव इस्लाम कबूल करने और अली रजा नामक मुस्लिम के साथ निकाह करने की बात कही थी। हालाँकि नाबालिग हिन्दू लड़की महक कुमारी के धर्मांतरण पर पाकिस्तान की माइनॉरिटी हिन्दू कम्युनिटी ने आए दिन होते इस तरह के जबरन धर्मांतरण, जहाँ हिन्दू लड़कियों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है, के पीछे प्रशासनिक अधिकारियों और मौलवियों की मिली भगत होने का आरोप लगाया था।

महक के कोर्ट में दिए गए बयान को उसके माँ बाप ने भी यह कहते अस्वीकार कर दिया था, “जब पाकिस्तान में नाबालिग को मताधिकार नहीं दिया जाता, जब नाबालिग को ड्राइविंग लाइसेंस नहीं दिया जाता, फिर कैसे एक नाबालिग को बिना उसके परिवार की रजामंदी के बिना धर्म बदल किसी मुस्लिम आदमी से शादी करने की इजाजत हो सकती है?”

याद रहे कि पिछली 15 जनवरी को पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के जैकबाबाद से महक कुमारी का अपहरण कर लिया गया था। जिसका बाद में इस्लाम में धर्मांतरण कर एक, मुस्लिम आदमी से निकाह पढ़वा दिया।

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मस्जिद के स्पीकर्स से होंगे बिजली बिल, सरकारी संदेशों की घोषणा: योगी सरकार का फैसला मंदिरों पर भी

अक्सर मंदिर-मस्जिदों के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल धार्मिक कार्यक्रमों में ही होते देखा जाता है। लेकिन अब सरकार चाहती है कि इनका इस्तेमाल आम जनता के लिए और तरीकों से भी किया जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मंदिरों और मस्जिदों से अब धार्मिक संदेशों के अलावा सरकारी विज्ञापन भी सुनाई देंगे।

यह योजना पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) ने बनाई है। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों, जिसमें मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़, गौतम बुद्धनगर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, रामपुर और बिजनौर हैं, में यह योजना लागू की जाएगी।

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में बिजली के बकाया भुगतानों और नई योजनाओं को बताने के लिए मंदिर और मस्जिद में लगे लाउड स्पीकर्स का उपयोग किया जाएगा। विभाग चाहता है कि किसानों के लिए आसान किस्तों में ट्यूबवेल योजना के अलावा चल रही अन्य स्कीमों के बारे में जानकारी देने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए।

रिपोर्ट्स के अनुसार, निगम के प्रबंध निदेशक अरविंद मल्लप्पा बंगारी ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में बिजली बिलों के भुगतान के लिए मंदिर और मस्जिदों से अपील की जाएगी। उन्होंने कहा कि लाउड स्पीकर्स का प्रयोग करने से इसका संदेश लोगों के बीच तेजी से पहुँचेगा, जिससे योजना का लाभ सभी लोग आसानी से उठा सकते हैं। उन्होंने बताया कि आसान किस्त योजना के तहत लोगों से बिजली बिलों की वसूली के लिए गाँव-गाँव में कैंप लगाए जाएँगे और लोगों को प्रेरित किया जाएगा।

पुलवामा में आतंकियों ने गोली मारकर की हत्या, अफजल गुरू की फाँसी की बरसी पर दी गई थी ‘धमकी’

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा से अभी-अभी खबर आई है। पुलवामा के त्राल इलाके में आतंकियों ने एक आम कश्मीरी की गोली मारकर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि मृतक नबी मीर पेशे से ठेकेदार थे।

गौरतलब है कि आज अफजल गुरू की फाँसी की बरसी के चलते घाटी में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) ने बंद का ऐलान किया है। यह बंद 9 फरवरी और 11 फरवरी को बुलाया गया है। 11 फरवरी को नेशनल लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक मकबूल भट्ट की भी बरसी है, जिसके चलते 11 फरवरी को इस बंद का ऐलान किया गया है। मकबूल भट्ट को 1984 में फाँसी पर लटकाया गया था।

इसके बाद रविवार फरवरी 09, 2020 सुबह ही पुलिस ने कश्मीर में हिंसा भड़काने और कानून-व्यवस्था को बाधित करने की कोशिशों के आरोप में प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के खिलाफ मामला दर्ज किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा, ”पुलिस ने घाटी में हिंसा भड़काने और कानून-व्यवस्था को बाधित करने के जेकेएलएफ के प्रयासों को संज्ञान में लिया है।’’

पुलिस ने यह भी बताया था कि प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन जेकेएलएफ से सम्बंधित संगठनों ने घाटी में आने वाले दिनों में हिंसा की घोषणा करते हुए पर्चे बाँटे हैं और वे एक गैरकानूनी संगठन के संदेशों और गतिविधियों का प्रचार कर रहे हैं।

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‘ग़ालिब की गली’ में पड़े सबसे ज्यादा वोट: EC ने की AAP की शिकायत दूर, कहा- 62.9% हुआ मतदान

दिल्ली विधानसभा चुनाव खत्म होने के अगले दिन आम आदमी पार्टी ने EVM और चुनाव आयोग को लेकर बवाल जारी रखा। एग्जिट पोल में आम आदमी पार्टी के हिस्से में सबसे ज्यादा सीट आने के बावजूद भी आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल और उनकी पूरी टीम चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती देखी गई है।

आख़िरकार चुनाव आयोग ने इस सम्बन्ध में रविवार देर शाम एक प्रेस वार्ता के माध्यम से स्पष्ट किया कि दिल्ली में कुल 62.59% मतदान हुए। मतदान के अंतिम आँकड़े जारी करते हुए दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रणबीर सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देर रात तक हुई वोटिंग के कारण आँकड़े जारी करने में देरी हुई है।

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रणबीर सिंह ने कहा कि दिल्ली विधानसभा की कुल 70 सीटों के लिए शनिवार को वोट डाले गए थे। उन्होंने बताया कि चुनाव के अंतिम आँकड़ों के मुताबिक 62.59% मतदान हुआ है, जो कि पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में लगभग 2% अधिक है। वर्ष 2015 में विधानसभा चुनाव में 67.47% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था।

बल्लीमारान विधानसभा क्षेत्र में हुआ सबसे ज्यादा मतदान

रणबीर सिंह ने कहा कि सबसे अधिक मतदान दिल्ली के बल्लीमारान विधानसभा क्षेत्र में हुआ है। बल्लीमारान में 71.6% मतदान दर्ज किया गया, जबकि सबसे कम मतदान दिल्ली छावनी में 45.4% हुआ है। दिल्ली में मतदान के बाद शनिवार को आए एग्जिट पोल के नतीजों में AAP को आसानी से जीत मिलती दिखाई दे रही है।

हालाँकि, भाजपा दिल्ली के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने दावा किया है कि भाजपा दिल्ली में 48 सीट ले कर सरकार बनाएगी। इसके बाद से ही आम आदमी पार्टी EVM और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर संदेह जताती देखी गई है, भले ही अरविन्द केजरीवाल के लिए यह कोई नई बात नहीं है।

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2 बीवियों वाले महमूद ने ऑफिस के अंदर पीछे से पकड़ महिला साथी का करना चाहा रेप, CCTV के कारण गया जेल

बिहार के बांका जिले के बौंसी प्रखंड मुख्यालय में कार्यरत प्रधान लिपिक महमूद आलम को डाटा ऑपरेटर का कार्य कर रही महिला कर्मचारी के साथ दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। घटना शनिवार (फरवरी 8, 2020) की है। महिला कंप्यूटर ऑपरेटर ने बताया कि शुक्रवार (फरवरी 7, 2020) शाम को जब वह ऑफिस का काम खत्म करने के बाद निकलने वाली थी, तभी शराब के नशे में धुत्त प्रखंड के प्रधान लिपिक महमूद आलम ने उसे गलत नीयत से पीछे से पकड़ लिया और उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया।

पीड़िता ने बताया कि वह किसी तरह से वहाँ से भागकर थाना पहुँची और इसकी जानकारी दी। पुलिस अधीक्षक अरविंद गुप्ता ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि इस सिलसिले में पीड़िता ने बौंसी थाने में प्रखंड कार्यालय के प्रधान लिपिक मोहम्मद आलम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। सत्यापन में मामला सही पाए जाने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आलम को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।

जानकारी के मुताबिक जब ट्रेनी आईएएस और थानाध्यक्ष राजेश कुमार यादव ने इस बाबत महमूद आलम से पूछा तो उसने सिरे से इनकार कर दिया और कहा कि वह पीड़िता के कमरे में ही नहीं गया था। हालाँकि उसका यह झूठ सीसीटीवी खँगालने के साथ ही उजागर हो गया। सीसीटीवी फुटेज में पाया गया कि घटना वाले दिन वह लगातार चार बार उसके कमरे में गया था। शाम में जब पीड़िता घटना के बाद उसे धक्का देकर तेजी से निकल रही थी, उस वक्त भी वह उसके पीछे ही था।

बता दें कि आरोपित महमूद आलम ने दो-दो निकाह किया है। उसकी पहली बीवी गाँव में रहती है, जबकि दूसरी बीवी नसीमा खातून उसके साथ रहती है। नसीमा खातून ने अपने पहले शौहर की मौत के बाद महमूद के साथ निकाह किया था। 3 साल पूर्व एक बेटा भी हुआ था, लेकिन 24 घंटे के बाद ही उसकी मौत हो गई थी। जबकि, पहली बीवी से उसका 13 साल का एक बेटा है, जिसका नाम मोहम्मद फैजान है।

दुष्कर्म के आरोप के अलावा महमूद आलम पर भ्रष्टाचार का भी आरोप है। महमूद की साल 2012 में उर्दू टाइपिस्ट के रूप में जॉइनिंग हुई थी। इसके एक साल बाद ही उसका प्रमोशन हो गया था। साल 2013 में इसे प्रधान लिपिक बना दिया गया था। इन 8 सालों यानी कि 2012 से लेकर 2020 के बीच महमूद पर कई बार भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और महिला कर्मचारी के साथ दुष्कर्म के प्रयास का मामला सामने आया है। दबे स्वर में ब्लॉक के कर्मचारी के साथ ही स्थानीय लोगों का कहना है कि महमूद आलम ने प्रधानमंत्री आवास योजना की आड़ में भी कई लोगों से मोटी रकम वसूला है। मगर सबूत के अभाव में वह हर बार बच गया। हालाँकि इस बार दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से नहीं बच सका।

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हिन्दुओं! उपकार मानो कि शाहीन बाग़ ने एक शव यात्रा के लिए रास्ता दिया है, वो चाहते तो…

दिल्ली में विधानसभा चुनाव भी लगभग समाप्त हो चुके हैं, अब सिर्फ इसके नतीजे आने बाकी हैं। इस बीच, करीब दो महीने बाद भी शाहीन बाग़ उसी जज्बे के साथ खड़ा नजर आ रहा है। कम से कम सोशल मीडिया पर तो यही चर्चा है। आज ही शाहीन बाग़ की एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है। इस वीडियो में कुछ हिन्दुओं द्वारा शाहीन बाग़ से एक शव यात्रा ले जाया जा रहा है और कुछ लोग वहाँ पर सड़क बंद करने के लिए लगाई हुई बैरिकेडिंग को खोलकर शवयात्रा को जाने के लिए कहते हुए देखे जा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो फ़ौरन एक विशेष समूह द्वारा दिखाया जाने लगा। दिलचस्प बात यह है कि इस वीडियो को शेयर करने वाले वही लोग हैं, जिन्हें शायद ही अभी तक यह पता हो कि कुछ CAA विरोधियों ने झारखंड में कुछ ही दिन पहले नीरज प्रजापति की सिर्फ इस कारण से हत्या कर दी थी, क्योंकि वो CAA का समर्थन करते थे।

शव यात्रा के लिए रास्ता देने वाला यह वीडियो शेयर करते हुए बताया जा रहा है कि शाहीन बाग़ में CAA विरोध प्रदर्शनकारियों ने हिन्दुओं की शव यात्रा के लिए बैरकेडिंग खोली। उनका कहना है कि यह वीडियो उन देश द्रोहियों को दिखाया जाना चाहिए, जो ‘शाहीन बागियों’ को देश द्रोही बताते हैं।

शव यात्रा को रास्ता देने का यह संदेश वही लोग दे रहे हैं, जो यदा-कदा आज भी नेहरुवादी सभ्यता से चली आ रही ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब और किसी कथित ‘सेक्युलर राष्ट्र’ की भावनाओं को जीवित होने के प्रमाण देते रहते हैं। यहाँ पर यह बात याद रखने लायक है कि यही ‘यदा-कदा’ तब आता है, जब एक हजार में से कोई एक ऐसी घटना में देश के ‘सेक्यूलरों’ का योगदान दिखाने वाली कोई घटना सामने आती है। वरना जो सिर्फ कट्टरपंथी सोच और किसी ‘किताब’ के प्रभाव में आज भी हलाला और तीन तलाक जैसे बुनियादी विषयों से बाहर नहीं निकलना चाहते, उनका सेक्युलर राष्ट्र के प्रति क्या नजरिया होगा, यह सिर्फ आत्म चिंतन की ही बात है।

लेकिन मुझे शव यात्रा के लिए बैरकेडिंग खोलकर इंसानियत का संदेश देने वाली बात में गंगा-जमुनी जैसी दोमुही बात भी नजर नहीं आती। यह तो स्पष्ट तौर पर एक स्वामी अपने गुलामों को संदेश देते हुए कह रहा है- ‘देखो, वह इंसानियत का मसीहा हिन्दुओं की शव यात्रा के लिए आज बैरिकेडिंग खोल रहा है, और इसके लिए हिन्दुओं को शाहीन बाग़ की इस उदार भीड़ का कृतज्ञ होना चाहिए।’

उपनिवेशवाद के समय में इस तरह की ही इंसानियत ब्रिटिशर्स भारतीयों पर ‘यदा-कदा’ कर दिया करते थे। उत्तरखंड के इतिहास में नजर दौडाएँ तो अंग्रेज ‘कुली-बेगार’ जैसी प्रथाओं को कुछ इसी तरह से सृजन कर लेते थे। लोगों को समझाया जाता था कि उन्हें ‘लॉर्ड फलाना’ की बग्गी को अपने कन्धों पर ढोने का स्वर्णिम अवसर मिल रहा है। इसलिए उसे इस उपकार के बदले लगान देना चाहिए। ग्रामीण लोगों को इसके लिए लालच दिया जाता था कि इसी बहाने उन्हें उस सड़क पर चलने का सौभाग्य भी प्राप्त होगा, जहाँ लार्ड फलाना शाम को टहला करते हैं।

बेशक, शव यात्रा को रास्ता देने वाली यह भीड़ एक उदार भीड़ की तरह नजर आ रही है, जबकि वास्तव में यह उदार है नहीं। क्योंकि यह भीड़ तो एक दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट गुंजा कपूर को सिर्फ इसलिए इस्लाम अपनाने की सलाह देते देखी गई क्योंकि वह शाहीन बाग़ नाम के एक स्वतंत्र पृथक राष्ट्र में उन्हीं के जैसे लिबास पहनकर चली गई थी।

यही शाहीन बाग़ की भीड़ हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक चिन्हों को गाली देती देखी गई। क्या हिन्दुओं की आस्था को ठेस लगाने के लिए गाय पर चुटकुले बनाने से लेकर हिन्दुओं की कब्र खोदने की धमकी देने वाला यह शाहीन बाग़, एक शव यात्रा के लिए बैरिकेड खोलकर इंसानियत का उदाहरण बन सकता है?

सवाल यह है कि बैरिकेडिंग खोलकर हिन्दुओं को एक शव यात्रा के लिए रास्ता देने का एहसान करने वाले ये लोग अगर ऐसा कर के इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे हैं तो फिर झारखंड में इसी नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में रैली कर रहे नीरज प्रजापति को लोहे की रॉड से मार देने वाली मुस्लिम भीड़ किस बात का सन्देश देती है? आज तक किसी सेक्युलर विचारक को यह कहते नहीं सुना गया है कि हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ने वाले और उन्हें अपवित्र करने वाले मुस्लिमों की भीड़ ने इस्लामिक जिहाद और मजहबी कट्टरता का संदेश दिया है।

जब हिन्दुओं के काफिलों पर पत्थरबाजी की जाती है, जब काँवड़ों पर हमले किए जाते हैं, जब किसी इंसान को सिर्फ इस कारण नौकरी से निकलवा दिया जाता है, क्योंकि वो उस नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थक था, जिसका कि यही शाहीन बाग़ विरोधी!

लेकिन नीरज प्रजापति की मृत आत्मा आज भी यह समझ पाने में अक्षम ही होगी कि इस्लामी नारे लगाते हुए उन्हें जान से मार देने वाले लोगों की इंसानियत और एक शव यात्रा के लिए रास्ता देने वालों के बीच शाहीन बाग़ की इस इंसानियत को किस तरह से पृथक करे।

शाहीन बाग़ की नाकामयाबी का यह कितना बड़ा सन्देश है कि करीब दो महीने से, हर आम नागरिक की रोजाना दिनचर्या में खलबली मचाकर, देश की राजधानी के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा जमाकर, देश को एक इस्लामिक राज्य बनाने का स्वप्न देख रहे ये उपद्रवी लोग, रोजाना हिन्दुओं से आजादी, जिन्ना वाली आजादी, फ़क़ हिन्दू और इस्लामिक नारे लगाने के बाद आज यह कहते देखे जा रहे हैं कि शव यात्रा को रास्ता देने से देशवासियों को कुछ सीखना चाहिए।

यदि हिन्दुओं की शव यात्रा के लिए रास्ता देने से हिन्दुओं को शाहीन बाग का उपकार मानना चाहिए तो फिर ऐसे संदेशों से हमें शायद शुक्र मनाना चाहिए कि CAA विरोधियों ने अभी तक यह नहीं कहा कि विरोध प्रदर्शन के लिए एक बड़े एरिया का स्वामित्व लेकर चंद आजादी के चितेरों ने कट्टर हिन्दुओं को अपनी कट्टर धार्मिक प्रणाली की खातिर, हिंसा भड़काने के उद्देश्य से शाहीन बाग़ के ही रास्ते को चुना, फिर भी आज़ादी के नारे गुनगुनाते हुए इन शांतिप्रिय लोगों ने बैरिकेड नहीं, बल्कि देश के हर CAA-विरोधी के दिल का दरवाजा खोलकर यह दिखा दिया है कि इस शाहीन बाग़ का दिल आखिर कितना बड़ा है।

बंद करो शाहीन बाग़ प्रदर्शन: ठंडे पड़े दारुल उलूम देवबंद के तेवर, विदेशी फंडिंग की खुल रही है पोल

शाहीन बाग़ में भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ वाले पोस्टर: नक्शों में उत्तर-पूर्व को देश से कटा हुआ दिखाया

जहाँ जाना है जाओ, लेकिन सड़क खाली करो: शाहीन बाग में CAA-विरोधियों के खिलाफ प्रदर्शन

मत प्रतिशत का खुलासा न होने पर सदमे में केजरीवाल एंड पार्टी, जताई दाल में काला होने की आशंका

अरविंद केजरीवाल थोड़े से निराश चल रहे हैं। एग्जिट पोल में दिख रही बढ़त के बावजूद उनकी यह निराशा ट्वविटर पर दिख रही है। रविवार (9 फरवरी) को केजरीवाल ने कहा कि वोटिंग के एक दिन बाद भी चुनाव आयोग का मत प्रतिशत से जुड़े अंतिम आँकड़ों को जारी न करना, अचम्भित करने वाला है।

रिपोर्ट्स के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा अंतिम बार शनिवार रात को मत-प्रतिशत संबंधी आँकड़े जारी किए गए थे, जिसमें वोटिंग प्रतिशत 61.46% बताया गया था। आपको बता दें कि दिल्ली में मतदान शाम 6 बजे समाप्त हो गया था।

मीडिया से बातचीत में केजरीवाल की पार्टी के बड़े नेता संजय सिंह ने कहा कि देश में यह पहली बार हो रहा है कि चुनाव आयोग मतदान संबंधी अंतिम आँकड़े जारी करने को तैयार नहीं है। आँकड़े जारी होने पर हुई देरी के कारण घबराए-बौखलाए संजय सिंह ने कहा कि सभी इस बात का इन्तजार कर रहे हैं कि कितना मत प्रतिशत हुआ, यह कहीं कुछ पकने की आशंका को बल दे रहा है। वर्ना छोटी सी दिल्ली के 70 विधानसभाओं के मत प्रतिशत की आधिकारिक घोषणा वोटिंग खत्म होने के 24 घंटे बाद भी क्यों नहीं की जा रही?

ध्यातव्य है कि केजरीवाल के आज के ट्वीट और संजय सिंह की हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले भी आदमी पार्टी ने ईवीएम को लेकर रोना शुरू कर दिया था। सारे एग्जिट पोल्स में अपनी सरकार बनने की भविष्यवाणियों के बाद भी केजरीवाल एंड पार्टी शायद जमीनी हकीकत से वाकिफ है और इसीलिए प्रतिकूल चुनाव परिणामों के लिए ईवीएम को दोषी ठहराने की कोशिशों में जुट गई है। केजरीवाल की पार्टी ने शक जताया था कि भाजपा ईवीएम में गड़बड़ी करके चुनाव परिणाम में बदलाव कर सकती है।

वोटिंग के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास पर हुई पार्टी नेताओं की बैठक में तय हुआ है कि AAP के कार्यकर्ता मतगणना तक हर बूथ के ईवीएम पर नजरें बनाए रखेंगे। इस बैठक में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, गोपाल राय और प्रशांत किशोर समेत कई बड़े नेता उपस्थित थे।

इस बैठक के बाद भी संजय सिंह ने आरोप लगाया था कि बाबरपुर में वोटिंग संपन्न होने के काफी समय बाद तक ईवीएम को जमा नहीं कराया गया, वह अधिकारियों के पास ही थे। उन्होंने इसी तरह की घटना विश्वास नगर में भी होने की बात कही थी।

एग्जिट पोल में बढ़त के बाद भी AAP और कॉन्ग्रेस का EVM राग चालू: संजय सिंह, गोपाल राय ने जताई चिंता

32.25% वोटरों की राय को किया गया नज़र-अंदाज़: दिल्ली Exit Polls में बड़ी गड़बड़ी?

जब जश्न मनाने की AAP की तैयारियाँ धरी रह गई… इसलिए Exit Polls को झुठला सकती है BJP