कॉन्ग्रेस के एक नेता हैं दिग्विजय सिंह। दो-दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन राज्य में पार्टी की ऐसी कब्र खोदी कि उसे गिरते-पड़ते सत्ता में लौटने में 15 साल लग गए। एक जमाने में वे राहुल गॉंधी के राजनीतिक गुरु भी माने जाते थे। राजनीति की पिच पर राहुल गॉंधी का प्रदर्शन कितना शानदार रहा है यह बताने की जरूरत नहीं है!
इन प्रदर्शनों से सीख लेते हुए कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने धीरे-धीरे दिग्विजय सिंह को किनारे लगा दिया। लेकिन, दिग्गी राजा ने भी ठान लिया है कि महाराष्ट्र और झारखंड में सत्ता बॉंट पार्टी ने भले कुछ दिनों के लिए जिंदा रहने की दवा का जुगाड़ कर लिया है पर वे उसे दफन करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। इसी क्रम में दिग्विजय सिंह ने आरएसएस को लेकर एक विवादित ट्वीट किया। इससे पार्टी के साथ अपनी भी भद पिटवाई है।
बुधवार (8 जनवरी, 2020) को दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “संघ की कार्यशैली- online नकाब पहनकर आते हैं, गाली देकर जाते हैं। offline नकाब पहनकर आते हैं, लाठी मारकर जाते हैं।” उनका यह ट्वीट जेएनयू में बीते दिनों हुई हिंसा से जोड़ कर देखा जा रहा है।
संघ की कार्यशैली
“Online नकाब पहनकर आते हैं गाली देकर जाते हैं Offline नकाब पहनकर आते हैं लाठी मारकर जाते हैं”
इस ट्वीट के जवाब में यूजर्स ने दिग्विजय सिंह को हिंदू आतंकवाद वाले बयान से लेकर अमृता राय से शादी तक तमाम घटनाएँ याद दिला दी। कुछ यूजर्स ने उन्हें संघ की कार्यशैली के बारे में बताया। कई ने उन्हें चोरी-छिपे दूसरी शादी करने की याद दिलाई। संतोष सैनी नाम के यूजर ने लिखा, “दिग्विजय सिंह की कार्यशैली- online अमृता को पटाते हैं, offline अश्लील फ़ोटो वायरल होने पर 68 की उम्र में विवाहित हो जाते हैं।
दिग्विजय की कार्यशैली “online अमृता को पटाते है Offline अश्लील फोटो वायरल होने पर 68 की उम्र में विवाहित हो जाते है?
एक यूजर्स ने उनको कॉंन्ग्रेस की कार्यशैली बताते हुए एक फ़ोटो पोस्ट किया जिसमें दिग्विजय सिंह ‘RSS ki sazish 26/11? नाम की पुस्तक की विमोचन करते हुए नज़र आ रहे हैं।
भगवा आतंकवाद की थ्योरी गढ़ने वाले दिग्विजय सिंह विवादित टिप्पणियों को लेकर खासे मशहूर रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने कहा था कि भाजपा के लोग आईएसआई के लिए जासूसी करते हैं। उन्होंने भगवा पहनकर बलात्कार किए जाने की बात भी कही थी। उन पर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार को अस्थिर करने के भी आरोप लग चुके हैं। कुछ महीने पहले कमलनाथ सरकार के कैबिनेट मंत्री उमंग सिंघार ने यह कहकर सूबे की राजनीति में भूचाल ला दिया था कि दिग्विजय सिंह पर्दे के पीछे से सरकार को चला रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने गुरुवार को कहा कि देशभर में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर होने वाली हिंसा जब रुकेगी तब इस क़ानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की जाएगी। CJI ने यह टिप्पणी तब की जब उनकी अगुवाई वाली पीठ के सामने एडवोकेट विनती ढांडा की याचिका का उल्लेख किया गया। इस पीठ में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल हैं। पीठ ने कहा, “बहुत हिंसा हुई है, राष्ट्र कठिन समय के दौर से गुज़र रहा है… शांति लाने का प्रयास होना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के जवाब में हिन्दू नैरेटिव बनाने, हिन्दू प्रतीकों का अपमान करने और हिन्दूफोबिया से ग्रसित पार्ट टाइम जर्नलिस्ट सबा नक़वी ने ट्विटर पर अपना ज्ञान बघारते हुए लिखा, “मुझे नहीं लगता कि लोगों को सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद रखनी चाहिए। इस कानून के हक़ में फैसला आने पर भी लोगों को CAA पर राजनीतिक और नैतिक लड़ाई जारी रखनी चाहिए।”
I don’t think people should have hopes pinned on #SupremeCourt. They should fight #CAA politically and morally even if court rules in favour of centre’s right to frame such a law. https://t.co/a7Tt0joAZY
पुनीत कौर ढांडा द्वारा दायर याचिका में CAA के बारे में समाचार-पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और विज्ञापन के अन्य माध्यमों से बड़े पैमाने पर प्रचार करने के लिए एक दिशा-निर्देश की माँग की गई है। स्पष्ट किया है कि यह भारत के संविधान की भावना के ख़िलाफ़ नहीं है और किसी भी अर्थ में भारत के नागरिकों के ख़िलाफ़ नहीं है। याचिका में चुनाव आयोग को निर्देश देने की माँग की गई है कि वह अधिनियम के नाम पर देश में गलत अफवाहें और हिंसा फैलाने वाले राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ पहचान करे और कड़ी कार्रवाई करे। इस याचिका में राज्य सरकारों को अपने-अपने राज्यों में आक्रामक तरीके से CAA को लागू करने का निर्देश देने की भी माँग की गई है।
18 दिसंबर को शीर्ष अदालत ने CAA की वैधता को चुनौती देने वाली लगभग 60 याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने केंद्र से जनवरी के दूसरे सप्ताह तक अपना जवाब देने को कहा था। गौरतलब है कि CAA के विरोध के नाम पर राजधानी दिल्ली सहित देश के कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए हैं। इस दौरान आगजनी और पत्थरबाजी हुई। यूपी, असम और कर्नाटक में हिंसा के दौरान कई लोगों की मौत भी हो गई।
20 जुलाई 2018: पॉक्सो कोर्ट ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह की मृत बच्ची का शव तलाशने के लिए खुदाई का आदेश दिया।
23 जुलाई 2018: कोर्ट के आदेश पर बालिका गृह परिसर में खुदाई हुई। 5 घंटे तक दो-दो जगहों पर खुदाई के बावजूद कुछ नहीं मिला।
03 अक्टूबर 2018: सिकंदरपुर श्मशान घाट में ब्रजेश ठाकुर के दो कर्मचारियों की निशानदेही पर सीबीआई ने खुदाई करवाई। 6 घंटे खुदाई चली। खोपड़ी, हाथ की हड्डी के साथ ही शव के अवशेष मिले।
08 जनवरी 2020: सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया शेल्टर होम में किसी भी लड़की की हत्या नहीं की गई है। सभी गायब 35 लड़कियों को जिंदा बरामद किया गया है। जो हड्डियॉं बरामद की गई थीं वो बच्चियों की नहीं है। जॉंच में पाया गया है कि ये हड्डियॉं वयस्कों की हैं।
कुछ सवाल
मुजफ्फरपुर बालिका गृह की पीड़ित बच्चियों ने अपने बयान में जिस तोंद वाले अंकल का जिक्र किया था, वह कौन हैं? उनकी क्या भूमिका थी?
बच्चियों ने अपने जिन साथियों को मार कर गाड़ देने की बात कही थी, वे कहॉं दफन हैं? मुख्य आरोपित ब्रजेश ठाकुर के ड्राइवर विजय तिवारी और बालिका गृह के सफाई कर्मचारी कृष्णा राम ने भी हत्या कर शव गाड़े जाने की पुष्टि की थी।
गुत्थी और उलझी
पूरे देश को झकझोर देने वाले बिहार के शेल्टर होम में यौन शोषण के मामलों की जॉंच सीबीआई को इस उम्मीद से सौंपी गई थी कि वह सबूतों के साथ सारे सवालों का जवाब देगी। दोषियों को कठघरे में खड़ा करेगी। लेकिन, सीबीआई की जॉंच रिपोर्ट ही कठघरे में खड़ी हो गई है। गुत्थी और उलझ गई है।
सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल होने से पहले सीबीआई ने खुद 11 बच्चियों के गायब होने की बात कही थी। अब वह कह रही है कि 35 बच्चियॉं सकुशल बरामद कर ली गई हैं। आखिर, 24 और बच्चियॉं कहाँ से आईं, इसका जवाब सीबीआई की रिपोर्ट से नहीं मिलता।
इस मामले की याचिकाकर्ता निवेदिता झा ने ऑपइंडिया को बताया कि सीबीआई की रिपोर्ट बेदह संदेहास्पद है। साफ है कि रसूखदारों के बचाने के लिए जॉंच के नाम पर लीपापोती की गई है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सत्ताधारी दल के कई नेताओं यहॉं तक कि उस समय समाज कल्याण विभाग की मंत्री रहीं मंजू वर्मा का भी नाम आया था। उल्लेखनीय है कि जब यह मामला सामने आया था तो मंजू वर्मा के पति चंदेश्वर वर्मा पर मुजफ्फरपुर मामले में गिरफ्तार बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन की पत्नी ने अक्सर बालिका गृह में जाते रहने का आरोप लगाया था। यह भी कहा गया था कि बच्चियों ने अपने बयान में जिस तोंद वाले नेता जी की बात कही है, वह वर्मा ही हैं। सीबीआई अपने जॉंच में इस तथ्य से भी पर्दा उठाने में नाकाम रही है।
बकौल निवेदिता झा सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में सबूत नहीं मिलने की बात कही है। लेकिन, अपनी जॉंच में उसने पीड़ित बच्चियों के बयान को आधार नहीं बनाया है। उसने यह भी नहीं बताया है कि शवों के जिन दो अवशेषों को वह वयस्कों का बता रही है वह किनके हैं। इनका मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले से कोई संबंध है या नहीं?
सीबीआई ने शीर्ष अदालत में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में बताया है कि उसने सभी 17 मामलों की जॉंच पूरी कर ली है। 13 मामलों में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। चार मामलों में सबूत नहीं मिल पाए हैं। जॉंच एजेंसी ने बताया है कि बच्चों का उत्पीड़न रोकने में सरकारी अधिकारी नाकाम रहे। कुल 71 अधिकारियों के खिलाफ एजेंसी ने कार्रवाई करने की सिफारिश बिहार सरकार से की है। इनमें 25 डीएम हैं। साथ ही 52 एनजीओ और निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। उन एनजीओ पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को भी कहा गया है जिनके नाम रिपोर्ट में दर्ज हैं।
निवेदिता झा के अनुसार इस मामले में भी सीबीआई ने बेहद सफाई से काम किया है। अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। विभागीय कार्रवाई के नाम पर ज्यादा से ज्यादा ये अधिकारी सस्पेंड किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि आपराधिक मामले तय नहीं कर जॉंच एजेंसी ने सबके बच निकलने का रास्ता छोड़ दिया है।
विशेष अदालत में दाखिल दस्तावेजों में सीबीआई ने बताया है कि मुजफ्फरपुर बालिका गृह में नशीली दवा देकर बच्चियों का यौन शोषण किया जाता था। दुष्कर्म के अलावा उनके साथ मारपीट की बात भी जाँच एजेंसी ने कही है। ये ऐसे तथ्य हैं जो टिस की रिपोर्ट से पूरी दुनिया के सामने सार्वजनिक हो गए थे। लेकिन, जो दो सबसे बड़े सवाल थे, उसका जवाब सीबीआई नहीं दे पाई है। बालिका गृह से गायब दाे किशोरियॉं आखिर कहॉं गईं? जिन दो बच्चियों की हत्या की बात उनके साथियों ने कही थी, उनके शव ब्रजेश ठाकुर एंड कंपनी ने कहॉं ठिकाने लगाया?
जैसा कि निवेदिता झा कहती हैं, “इनके जवाब अब शायद ही मिल पाएँ। लेकिन, हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।” यह भी दिलचस्प है कि चिल्ड्रेन होम, शॉर्ट स्टे होम, सेवा कुटीर, स्पेशल एडॉप्शन एजेंसी, ऑब्जर्वेशन होम वगैरह का सोशल ऑडिट पहली बार किसी बाहरी एजेंसी से करवाने का फैसला उसी नीतीश सरकार ने किया था, जिस पर इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा सवाल खड़े होते हैं।
सीबीआई की जॉंच से वह अंदेशा सही साबित होता दिख रहा है जो मुजफ्फरपुर मामले पर लोकसभा में कार्यस्थगन प्रस्ताव लाने के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस सांसद रंजीता रंजन ने कहा था। उन्होंने आरोप लगाया था, “सरकार छोटी मछलियों पर कार्रवाई कर रही है। सबूतों को नष्ट किया जा रहा है।” लेकिन यह भी सच है कि उस समय मामले की सीबीआई से जॉंच करवाने पर जोर भी ज्यादा विपक्ष का ही था।
JNU में पिछले दो महीने से छिड़े आंदोलन ने बीते दिनों हिंसक रूप ले लिया था जिसके बाद से वहाँ का माहौल बिलकुल बदल गया है। हालाँकि 5 जनवरी 2020 को हुई हिंसा पर वामपंथी और अज्ञात हिंसक छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है और हिंसा सहित सर्वर रूम को डैमेज करने की जाँच जारी है। कल ही कुलपति ने अपने बयान इस जाँच और उस दिन हुई हिंसा से सम्बंधित JNU में आगे क्या हो रहा है साझा किया था।
JNU VC @mamidala90 took me to the server room which was vandalised by students who were protesting against Uni’s hostel fee hike. There’s no condoning Sunday’s violence, but forcibly stopping students from registering for the winter session is plain wrong. Let students study. pic.twitter.com/f7IJgeY4Bh
इस सबसे अलग अगर वहाँ के उन छात्रों की बात करें जो केवल पढ़ना चाहते हैं जिनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। जो रजिस्ट्रेशन करा कर पढ़ना चाहते हैं। कई बहुत ही गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं। उन्हें भी लगातार वहाँ के वामपंथी छात्रों द्वारा उन्हें परेशान किया जा रहा है। उन्हें रजिस्ट्रेशन करने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। यहाँ तक कि लगातार आम छात्रों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे वामपंथी छात्रों की बात मान लें और रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया रोकने और व्यवस्था बिगाड़ने में सहयोग दें।
JNU में किस तरह से आम छात्रों को प्रताड़ित किया जा रहा है इसकी झलक वहाँ के एक छात्र विकास सिंह गौतम ने ट्विटर पर भी साझा किया, “मैंने यह सोचकर जेएनयू में प्रवेश लिया कि मैं यहाँ बहस और चर्चा के माहौल में रहूँगा। लेकिन मुझे यहाँ बिल्कुल अलग संस्कृति देखने को मिली है। यहाँ के लोग अपने विचार आपके ऊपर थोपने से बेहतर कुछ और नहीं जानते। मैं इसे अब हिंसा की संस्कृति ही कहूँगा।”
I took admission into JNU thinking that , I’ll get to be in an environment of debate and discussion. But I’ve got to see a totally different culture here. People here don’t know anything better than imposing their views on you. I’ll rather call it a culture of violence now.
गौतम ने बताया, “जेएनयू के सभी सामाजिक, छात्रावास और शैक्षणिक व्हाट्सअप ग्रुपों से मेरा बहिष्कार किया जा रहा है। फिलॉसॉफी के ग्रुप से भी मुझे बाहर कर दिया गया है। मेरे खिलाफ इस तरह का भेदभाव इसलिए किया जा रहा है क्योंकि मैंने इस शैक्षणिक सत्र के लिए पंजीकरण करने की कोशिश की थी। वामपंथियों द्वारा दलितों को दबाने का यह सिर्फ एक उदाहरण है।”
यह केवल एक स्टूडेंट की व्यथा नहीं है। वहाँ के कई आम छात्र जो पढ़ना चाहते हैं। जो रजिस्ट्रेशन कराना चाहते हैं ऐसे सभी छात्रों को उनके अधिकारों से रोकने के लिए वामपंथी छात्रों द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उनके साथ गालीगलौज से लेकर उनके साथ छात्रावास और मेस में भेदभाव किया जा रहा है। जो भी छात्र वामपंथियों के एजेंडे में शामिल नहीं है या उनका साथ नहीं दे रहा है, उस पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। ये सारी बातें ऑपइंडिया से बात करते हुए वहाँ के कई छात्रों ने बताई।
ऐसे ही एक छात्र अलोक झा जो वहाँ शोध कर रहे हैं ने ऑपइंडिया को वहाँ के तेजी से बदलते माहौल के बारे में विस्तार से बताया।
अलोक झा ने कहा, “मैं पहले लेफ्ट के संघर्षो को देखकर यह सोचता था कि कितने संघर्षशील हैं ये लोग। हमेशा छात्रहितों के लिए डटे रहते हैं। लेकिन अफ़सोस कभी भी इन लोगों के संघर्ष का कोई परिणाम आते नहीं देखा। मुद्दा चाहे कोई भी हो हंगामा, पब्लिसिटी और राजनीति मुख्य एजेंडा रहा। चाहे सीट कट का मुद्दा हो, AC रीडिंग रूम का मुद्दा हो या फीस वृद्धि का मुद्दा हो, हर बार इन लोगों ने मीडिया में आकर अपना पब्लिसिटी बटोरकर प्रोटेस्ट बंद कर दिया। या केवल व्यवस्था बिगाड़ने में व्यस्त रहे। हमेशा हमारे कुछ दोस्त कहते थे। ये आंदोलन के नाम पर ढोंग के सिवाय और कुछ नहीं करते है, कभी विश्वास नहीं किया। परन्तु आज मैंने इन वामपंथी लोगों के सारे ढोंग को देख लिया कि किस तरह ये आम छात्र को बेवकूफ बनाते हैं। और उनका अपनी राजनीतिक और वैचारिक महत्वाकांक्षा के लिए इस्तेमाल करते हैं।”
किस तरह से छात्रों पर दबाव बनाते हुए उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा उन सभी तरीकों पर ऑपइंडिया ने वहाँ के कई और आम छात्रों से बात की। कई लोगों ने वामपंथी छात्रों के आतंक और उनके द्वारा किए जा रहे भेदभाव की चर्चा तो की लेकिन अपने नाम का उल्लेख करने से मना कर दिया, “अभी यहीं कई साल और पढ़ना है ये लोग यहाँ शांति से रहने नहीं देंगे। हमें मेस में प्रताड़ित किया जा रहा है यहाँ तक की वामपंथी विचारधारा के कई प्रोफ़ेसर भी हम पर तंज कसते हैं। मजाक उड़ाते हैं। यहाँ तक कि हिंसा की घटना वाले दिन के बाद से चुन-चुन कर उन छात्रों को वामपंथी छात्र निशाना बना रहे हैं जिन पर इन्हें ABVP का सपोर्टर होने का शक है या जो इनके आंदोलन या विरोध प्रदर्शन में साथ न देकर यहाँ पढ़ना चाहते हैं।”
अलोक झा ने तो कहा कि मैं नहीं डरता किसी से जो सत्य है वह कह रहा हूँ। उनको और उनके जैसे कई अन्य छात्रों को भी वामपंथी छात्र परेशान कर रहे हैं। उन्होंने हमसे बात करते हुए बताया, “मैं साबरमती हॉस्टल में रहता हूँ। हॉस्टल के सभी निवासियों का एक व्हाट्सअप ग्रुप था। जिसके द्वारा हॉस्टल से जुड़ी सूचनाएँ छात्रों को मिलती थी। सभी रेजिडेंट इस ग्रुप में थे। 5 जनवरी के घटना के बाद देख रहा था कि ये वामपंथी विचारधारा के छात्र कितने नीचे गिरे हुए हैं और इसकी बुद्धि कितनी तुच्छ है कि अब आम छात्रों को ही आपस में उलझाना चाहते हैं। उनके बीच फूट डाल रहे हैं। चुन-चुन कर उन छात्रों को वामपंथी छात्र निशाना बना रहे हैं जो या तो पढ़ना चाहते हैं, जो किसी के भी साथ नहीं हैं, जो रजिस्ट्रेशन करा लिए हैं या कराना चाहते हैं। या वामपंथी छात्रों को शक है कि ये छात्र-छात्राएँ ABVP से सहानुभूति रखते हैं।”
जब ऑपइंडिया ने अलोक झा से जानना चाहा कि आपको क्यों हॉस्टल के ग्रुप से बाहर निकाला गया तो उन्होंने बताया, “मैं किसी पार्टी विशेष से ताल्लुक नहीं रखता हूँ। हाँ ABVP के प्रति सहानुभूति अवश्य है। क्योंकि मेरी दृष्टि में विद्यार्थी परिषद एक ऐसी पार्टी है जिनकी ईश्वर में निष्ठा है। मैं आस्तिक हूँ ईश्वर में दृढ़ विश्वास रखता हूँ। इस दृष्टि से विद्यार्थी परिषद की विचारधारा मेरे विचार से अवश्य मेल खाती है। अतः आप हमें उनसे सहानुभूति रखने वाला कह सकते हैं। परन्तु मैंने कभी ABVP के समर्थन कोई पोस्ट नहीं किया। कभी ABVP के पक्ष में मेस में वाद-विवाद नहीं किया। ABVP के रैलियों में नहीं गया। मेरी यात्रा हॉस्टल से लाइब्रेरी और हॉस्टल से सेंटर तक ही सीमित थी। जिस समय इनलोगों को, हॉस्टल में जो भय का माहौल है उसे शांत करना चाहिए था। उस समय ये लोग इस प्रकार की नौटंकी कर रहे है कि छात्र आपस में लड़ जाएँ तथा भय का माहौल बढ़े और ये लोग इस हिंसा के बल पर पब्लिसिटी बटोर लें।”
उन्होंने ऑपइंडिया को कई स्क्रीनशॉट भी भेजा, “आप यह स्क्रीन शार्ट देखिए कि किस प्रकार मुझे और मेरे जैसे और भी सामान्य स्टूडेंट्स को चिह्नित करके कहा जा रहा है कि ये ‘ABVP Goons’ हैं, इन्हें बाहर निकालो। मैं नक्सल और goons पर नहीं जाऊँगा क्योंकि राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप होते रहते है। लेकिन इस प्रकार आम छात्रों को चिन्हित करके क्या चाहते हो भाई? सभी जेएनयू छोड़कर चले जाएँ और आप जेएनयू को केरल बना दें?
ऐसे काई छात्रों ने हमसे बात करते हुए बताया कि यहाँ के छात्रों को देशविरोधी ताकतों या जो अमन-शांति नहीं चाहते, जिनका बात बे बात आंदोलन और विरोध प्रदर्शन ही मकसद हो चुका है। जो यहाँ के वामपंथी प्रोफेसरों का शय पाकर इस पूरे JNU को वामपंथ का अभेद गढ़ बनाने का सपना पाले हैं, वो अब पूरा नहीं होने वाला। हम छात्रों को अब आपका सेलेक्टिव विरोध-प्रदर्शन समझ आ रहा है। यहाँ के वामपंथी छात्रों को समाधान से कोई मतलब नहीं है जैसे ही समस्या का समाधान नजदीक आता है ये नई समस्या खड़ी कर उसका राजनीतिकरण करना शुरू कर देतें हैं। और ये सिलसिला सालों चलता रहता है। और आपके इस राजनीति का शिकार होते हैं यहाँ के आम गरीब छात्र जिनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है जो केवल पढ़ना चाहते हैं। अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।
JNU के एक किसान परिवार से आने वाले बेहद निम्न आर्थिक स्थिति के छात्र ने बताया, “यहाँ विचारधारा थोपने का काम होता है, हेल्दी डिबेट की कोई बात ही नहीं बची है। सभी को वामपंथी विचार को ही अपना विचार बनाने के लिए दबाव बनाया जाता है। आप उनसे अलग रहेंगे तो वामपंथी छात्र और यहाँ के कई वामपंथी प्रोफ़ेसर आपका यहाँ रहना मुश्किल कर देंगे।”
JNU के सामान्य छात्रों ने यह भी कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में एक ही विचार का वर्चस्व गलत है ये कहीं से भी लोकतांत्रिक नहीं है। और वामपंथी विचारधारा के लोग केवल अपने विचार और वर्चस्व को ही यहाँ लोकतंत्र की तरह पेश करते हैं। और कहीं न कहीं जब पूरे विश्व में इनकी विचारधारा ख़ारिज हो रही है तो यह JNU को ही एक बार फिर वामपंथ का गढ़ बनाना चाहते हैं जो सालों से इन्हें दरकता नजर आ रहा है।
अलोक झा ने तो साफ़ कहा कि यह बात सिर्फ मैं नहीं बल्कि मेरे जैसे कई आम छात्रों का कहना है कि जब तक जेएनयू का अस्तित्व है यहाँ पढ़ने वाले छात्र हैं तब तक वामपंथियों का ये ख्वाब पूरा होने वाला नहीं है। उन्होंने अपील भी की, “अरे लेफ्ट वाले भाई थोड़ी सी भी तुम्हारी सकारात्मक सोच होती तो तुम समाधान की बात करते। इस तरह से छात्रों को प्रताड़ित कर, उनके बीच ग़लतफ़हमी पैदा कर, और उनके साथ अस्पृश्यता का व्यवहार कर आप लोग जो कर रहे हो, अच्छा ही किया। आम छात्रों ने एक बार फिर वामपंथ का दोहरा चरित्र देख लिया।”
Jawaharlal Nehru University Vice Chancellor M. Jagadesh Kumar: I would like to ask all those great personalities coming to support agitators, what about thousands of students&teachers who are deprived of their rights of doing research and teaching? Why can’t you stand with them? pic.twitter.com/aQcV1l7c7r
बता दें कि कुलपति ने भी वहाँ के आम छात्रों के अधिकारों की मीडिया में कोई चर्चा नहीं होने पर खुद ही सवाल किया कि क्या जो विरोध कर रहे हैं उन्हीं का लोकतान्त्रिक अधिकार है? जो छात्र और प्रोफ़ेसर पढ़ना, पढ़ाना और रिसर्च करना चाहते हैं उनका कोई अधिकार नहीं है? आखिर उनका क्या कसूर है? मीडिया में इस पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है?
MJ Kumar, Vice-Chancellor, JNU: Today after making JNU communication&info systems functional, number of students who have paid fees for winter semester registration rose to 3552. Registration date extended to 12 Jan. University will help every JNU student who wants to register. pic.twitter.com/BI5hrxwqQV
इसके आलावा उन्होंने 3500 से अधिक छात्रों के रजिस्ट्रेशन कराने की जानकारी दी। यह आँकड़ा संभवतः तब का है जब वामपंथी नकाबपोशों द्वारा सर्वर डैमेज नहीं किया गया था। दोबारा से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद यह संख्या और बढ़ गई होगी। ये वह आँकड़ा भी है जो पढ़ना चाहते हैं जिन्हें वामपंथी छात्रों द्वारा हिंसा की हद तक प्रताड़ित किया जा रहा है। ऐसे छात्रों को टारगेट कर उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्हें छात्रों द्वारा विभिन्न क्रियाक्रलापों के लिए बनाए व्हाट्सअप समूहों से निकाला जा रहा। आखिर मीडिया और देश के जागरूक नागरिकों को क्या उनके अधिकारों की चिंता नहीं होनी चाहिए?
मेघालय में संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों द्वारा एक सीमा चौकी को निशाना बनाए जाने की खबर आई है। बताया जा रहा है कि इन संदिग्धों ने बीएसएफ के 2 जवानों पर हमला किया और उनसे उनके हथियार छीन लिए। इस दौरान इन्होंने एक जवान को घायल भी कर दिया।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, हमले की सूचना देते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “पड़ोसी देश का एक समूह मेघालय के एक व्यक्ति के घर में घुस गया और रुपए, मोबाइल फोन और बंदूक लूट कर फरार हो गया। घर के मुखिया इस वारदात में घायल हो गए।”
गौरतलब है कि इस घटना पर पश्चिम जयंतिया हिल्स के पुलिस अधीक्षक लकादर सियेम ने बताया कि यह घटना देर रात करीब साढ़े 12 हुई अमदोह और रोंगतिला में हुई। ये इलाका भारत-बांग्लादेश सीमा से 5 किलोमीटर दूर है।
उन्होंने बताया, “10-15 बांग्लादेशी नागरिकों के एक समूह ने कथित तौर पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के 2 कर्मियों को रोंगतिला सीमा चौकी (बीओपी) के निकट घेर लिया, उनके हथियार छीन लिए और उनमें से एक को घायल कर दिया।”
पुलिस अधीक्षक ने मामले में आगे की सूचना देते हुए बताया कि जवानों से छीने गए हथियार उन्होंने जंगल के पास से बरामद किए हैं। वहीं, दोनों बीएसएफ जवान को दौकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया है। इस हमले को मेघालय के शिक्षा मंत्री लंखमेन रेम्बुई ने निंदाजनक बताया है।
बता दें कि बांग्लादेशियों द्वारा सेना के जवानों को निशाना बनाने का ये पहला मामला नहीं है। इससे पहले पश्चिम बंगाल से भी कई बार जवानों पर हमला करने की खबरें आई हैं। पिछले साल जुलाई में हुई घटना में तो एक बांग्लादेशियों ने जवान के हाथ पर बम फोड़ दिया था, जिससे अनीसुर रहमान नामक बीएसएफ जवान का हाथ कोहनी से फटकर ही नीचे गिर गया था।
इंडिया टुडे मीडिया समूह की छत्र-छाया में डिजीटल प्लेटफॉर्म पर नाम कमाने वाले ‘दी लल्लनटॉप’ के संपादक सौरभ द्विवेदी की एक छोटी सी चूक से उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता वाले मुखौटे की कल बखिया उधड़ गई। दरअसल, सोशल मीडिया पर कल सौरभ द्विवेदी को भाजपा समर्थकों को नीचा दिखाने के लिए ड्यूरेक्स कंडोम के विज्ञापन के साथ आपत्तिजनक टिप्पणी शेयर करते पकड़ा गया।
स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं कि सौरभ द्विवेदी के ट्वीट में ड्यूरेक्स कंडोम के विज्ञापन के साथ एडिटिंग करके लिखा है- ” ये उन लोगों के लिए है जो अब भी भाजपा को समर्थन दे रहे हैं। कृपया इसका इस्तेमाल करें। हम आप जैसे और लोग इस दुनिया में नहीं चाहते।” जिसे शेयर करते हुए वह अपने फॉलोवर्स से पूछते हैं ” HASHTAG चलाना चाहिए कि नहीं मित्रों।”
सौरभ द्विवेदी के ट्वीट की स्क्रीनशॉट
हालाँकि, भाजपा और भाजपा समर्थकों को अपमानित करने के लिए अतिउत्साह में डाले गए इस ट्वीट पर सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें फौरन आड़े हाथों ले लिया। जिसके कारण थोड़ी ही देर में सौरभ ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। लेकिन, उनके ट्वीट का स्क्रीनशॉट ट्विटर पर इस बीच तेजी से वायरल होने लगा और लोग जोर-शोर से दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी को उसकी पत्रकारिता और विचारधारा के लिए सवालों के घेरे में घेरने लगे।
भाजपा के प्रति खुलेआम नफरत पेश करने पर कई लोगों ने इस स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए इंडिया टुडे समूह और अरुण पुरी को टैग किया। साथ ही दी लल्लनटॉप को पॉलिटिकल प्रॉपगेंडा वेबसाइट घोषित करने की माँग उठाई।
Request @IndiaToday & @aroonpurie to declare ‘Lallan Top’ as a political propaganda website. This is language of a mere troll, not of an editor. Day in and Day out, India Today group is losing their credibility because of many such incidences. pic.twitter.com/QCKQ2NgRBK
इतने सबके बाद, यूजर्स की प्रतिक्रिया देख सौरभ द्विवेदी ने सोशल मीडिया पर अपनी गलती के लिए आज माफी माँगी। लेकिन माफी में भी वे अपनी हरकत को जस्टिफाई करते दिखे। उन्होंने खुद माना कि जो तस्वीर शेयर की वो किसी एक राजनीतिक पार्टी को लेकर थी। लेकिन उसमें एक व्यंग्य संदेश था और उसे गलत तरीके से लिया गया। अपने ट्वीट में उन्होंने अपने संस्थान को बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी हरकत करना दी लल्लनटॉप की संपादकीय नीति नहीं है। इसलिए वे इसके लिए माफी माँगते हैं।
I tweeted a pic yesterday carrying an image and a sarcastic message about one political party. The content and tone of the tweet was unequivocally wrong.
गौरतलब है कि आज भाजपा के प्रति लोगों में सरेआम जहर फैलाने का करने वाले सौरभ द्विवेदी के पिता (रविकांत द्विवेदी) खुद भाजपा के टिकट पर विधायकी का चुनाव लड़कर दो बार हार चुके हैं।
अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के शूटर मोस्टवांटेड गैंगस्टर एजाज लकड़ावाला को पटना पुलिस की मदद से मुंबई पुलिस ने पटना एयरपोर्ट के पास जक्कनपुर थानाक्षेत्र से गिरफ़्तार किया। उसके साथ दो अन्य लोग भी गिरफ़्तार किए गए हैं। गिरफ़्तार करने के बाद क्राइम ब्रांच की टीम उसे वापस मुंबई ले गई। फ़िलहाल, 21 जनवरी तक वो पुलिस हिरासत में रहेगा। उसके ख़िलाफ़ मुंबई में कुल 27 मामले दर्ज हैं। बताया जाता है की एजाज नेपाल के रास्ते पटना पहुँचा था और तभी पुलिस ने उसे धर दबोचा।
भगोड़े एजाज की गिरफ़्तारी के बाद मुंबई पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर (क्राइम) संतोष रस्तोगी ने बताया, “उसकी बेटी हमारी हिरासत में थी। उसने हमें बहुत सी जानकारी दी। इसके आधार पर हमने पता लगाया तो हमारे सूत्रों ने हमें उसके पटना आने के बारे में बताया। इस सूचना पर हमारी टीम ने काम किया और उसे बिहार के जक्कनपुर थाना क्षेत्र से गिरफ़्तार कर लिया।”
Joint CP Crime, Santosh Rastogi on arrest of gangster Ejaz Lakadwala: His daughter was in our custody. She gave a lot of information to us. Our sources also told us about his arrival in Patna,he was arrested in Jattanpur police station limits https://t.co/KHVuAUwTDvpic.twitter.com/jiHsBznV2Y
एजाज लकड़ावाला महाराष्ट्र पुलिस का मोस्ट वॉन्टेड अपराधी है। किसी ज़माने में वह छोटा राजन गैंग का सदस्य था। लकड़ावाला पर हत्या, हत्या के प्रयास और दंगे के 20 से अधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार, एजाज मई 2003 में कनाडा चला गया था, जब दाऊद के गुर्गे ने उस पर हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया था। इसके बाद राजन का गिरोह अलग हो गया और एजाज ने अपना ख़ुद का एक गिरोह बना लिया था। मार्च 2019 में, एंटी-एक्सटॉर्शन सेल ने खार स्थित बिल्डर को धमकाने और 50 लाख रुपए लेने के आरोप में एजाज लकड़ावाला (53), एजाज के चचेरे भाई को गिरफ़्तार किया था। एजाज पर इस अपराध के तहत भी मुक़दमा दर्ज किया गया था।
पुलिस से बचने के लिए लकड़ावाला पिछले कई वर्षों से कभी अमेरिका, कभी मलेशिया, कभी ब्रिटेन तो कभी नेपाल में भागता-फिरता रहा। भगोड़े गैंगस्टर की बेटी सोनिया लकड़ावाला उर्फ़ सोनिया शेख को 28 दिसंबर को फ़र्ज़ी पासपोर्ट के साथ गिरफ़्तार किया गया था।
एक अधिकारी ने बताया था कि सोनिया लकड़ावाला देर रात (27 दिसंबर) को नेपाल जाने वाली एक उड़ान में अपनी बेटी के साथ सवार होने वाली थी, तभी पुलिस ने उसे हिरासत में लिया था। बेटी की हिरासत के बाद यह ख़ुलासा हुआ था कि लकड़ावाला पटना में ही रह रहा था। लेकिन, वो पटना में कहाँ रह रहा था इसका ख़ुलासा फिलहाल पुलिस ने नहीं किया। बेटी की गिरफ़्तारी लकड़ावाला की गिरफ़्तारी का कारण बन गई।
इन सबमें ग़ौर करने वाली बात यह है कि भगोड़ा लकडावाला आख़िर पटना में क्या कर रहा था। इससे पहले भी बिहार में कई अपराधियों और आतंकवादियों की गिरफ़्तारियाँ हो चुकी हुई है। वर्ष 2000 के बाद ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनके तार बिहार से जुड़े नज़र आए।
वर्ष 2000 में बिहार के सीतामढ़ी ज़िले से आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के दो आतंकी मक़बूल और जहीर को गिरफ़्तार किया गया।
वर्ष 2006 में बिहार के मधुबनी ज़िले के बासोपट्टी बाज़ार से मोहम्मद कमाल को मुंबई के लोकल ट्रेन धमाके में उसकी संलिप्तता के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था।
वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश के रामपुर में CRPF कैंप पर हुए हमले मामले में बिहार के मधुबनी ज़िले के सकरी के गँधवारी गाँव से सबाऊद्दीन को गिरफ़्ताार किया गया था।
वर्ष 2009-10 में दिल्ली में हुए ब्लास्ट मामले में मधुबनी के बासोपट्टी के बलकटवा से मदनी को गिरफ़्तार किया गया था।
वर्ष 2011 में नवंबर के महीने में 26 तारीख़ को दिल्ली पुलिस ने मधुबनी के सिंघानिया चौक व सकरी के दरबार टोला से अफज़ल व गुल अहमद जमाली को गिरफ़्तार किया था।
वर्ष 2011 में ही दरभंगा ज़िले के केवटी अंतर्गत बाढ़ समैला के कतील सिद्दिकी उर्फ़ साजन को 19 नवंबर को दिल्ली में गिरफ़्तार किया था।
वर्ष 2012 में 21 फरवरी को साइकिल मिस्त्री कफील अहमद को गिरफ़्तार किया गया था, जिसके बारे में यह पता चला था कि वो इंडियन मुज़ाहिदीन का मेंटर था।
वर्ष 2013 में 21 जनवरी को दरभंगा के चकजोहरा मोहल्ला से मोहम्मद दानिश अंसारी गिरफ़्तार किया गया। उस पर आतंकी साजिश रचने का आरोप था। वह इंडियन मुज़ाहिदीन के सरगना यासीन भटकल के गुर्गे था।
2013 में अगस्त के महीने में इंडियन मुज़ाहिद्दीन के आतंकवादी यासीन भटकल व अब्दुल असगर उर्फ़ हट्टी को बिहार के पूर्वी चंपारण से लगे नेपाल की सीमा से गिरफ़्तार किया गया।
वर्ष 2019 में अगस्त के महीने में बिहार के गया से कोलकाता एटीएस ने बांग्लादेश के आतंकी संगठन जमात-उल-मुज़ाहिद्दीन के एक सदस्य को गिरफ़्तार किया गया था। वह पश्चिम बंगाल के वर्दमान विस्फ़ोट का आरोपित था।
इतनी गिरफ़्तारियों से यह सवाल उठने लगा है कि आतंकियों के लिए बिहार सेफ़-ज़ोन तो नहीं बनता जा रहा?
रिलीज से पहले विवादों में घिरी छपाक फ़िल्म के निर्देशक मेघना गुलजार को दिल्ली के पटियाला कोर्ट ने निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि फ़िल्म में एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल के वकील अर्पणा भट्ट को क्रेडिट दिया जाए, क्योंकि अर्पणा महिलाओं के प्रति हो रहे यौन और शारीरिक हिंसा के ख़िलाफ लड़ाई लड़ रही हैं।
फ़िल्म रिलीज होने के ठीक एक दिन पहले पटियाला कोर्ट ने आदेश ज़ारी किया है। आदेश के अनुसार फिल्म की एडिटिंग करनी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म में एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल की वकील रहीं अर्पणा भट्ट को क्रेडिट देना होगा। दरअसल कोर्ट ने वकील अर्पणा भट्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश ज़ारी किया है। वकील अर्पणा के पक्ष में आए फैसले में कोर्ट ने कहा कि फ़िल्म रिलीज के समय फ़िल्म निर्माताओं को अर्पणा की पहचान करवानी चाहिए।
#BREAKING: Delhi Court orders #Chhapaak Director Meghna Gulzar to give due credit to Lawyer Aparna Bhat in the movie credits saying: ‘Aparna Bhat continues to fight cases of sexual and physical violence against women’. Good decision of the court. https://t.co/qLrsGR2xpopic.twitter.com/1kx2kzlOBa
इससे पहले लक्ष्मी अग्रवाल की वकील अपर्णा भट्ट ने फेसबुक पर लिखा था कि वह क्यों नाराज़ हैं? उन्होंने कारण बताया था कि फ़िल्म छपाक के मेकर्स ने उन्हें अपनी फ़िल्म में कोई क्रेडिट नहीं दिया है। उन्होंने ये भी कहा कि वे इस मामले में क़ानून की मदद लेंगी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वे दीपिका पादुकोण और बाकी लोगों के बराबरी की नहीं हैं लेकिन इस मामले में वे चुप नहीं बैठेंगी।
इसके बाद उन्होंने दिल्ली के पटियाला कोर्ट में डाली याचिका में कहा था कि उन्होंने एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल का केस वर्षों तक लड़ा, लेकिन इस फ़िल्म में मुझे क्रेडिट नहीं दिया गया है। उन्होंने कोर्ट से फ़िल्म पर रोक लगाने की भी माँग की थी। उनका कहना था कि उन्होंने फ़िल्म छपाक की स्क्रिप्ट में भी काफी मदद की थी। जिस पर फ़िल्म के निर्माता ने उन्हें भरोसा दिया था कि उन्हें क्रेडिट दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। छपाक में अपर्णा को क्रेडिट नहीं दिया गया।
Lawyer Aparna Bhatt files plea in Delhi’s Patiala House Court seeking stay on film #Chhapaak. Bhatt in her plea has claimed that she was the lawyer for acid attack victim Laxmi for many years and yet she has not been given credit in the film. pic.twitter.com/RuTkzYJnJg
लक्ष्मी की वकील अर्पणा भट्ट ने फेसबुक पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा था कि “छपाक देखने के बाद की घटनाओं से मैं काफ़ी परेशान हूं। मुझे अपनी पहचान को बचाने और अपनी ईमानदारी को बचाए रखने के लिए कानूनी कार्रवाई करने को मजबूर किया गया। एक समय मैंने पटियाला हाउस में लक्ष्मी का प्रतिनिधित्व किया था… कल कोई मेरी प्रतिनिधित्व करेगा… जीवन की अज़ीब बिडम्बना है।
अर्पणा भट्ट द्वारा फेसबुर पर लिखा पोस्ट का स्क्रीनशॉट
महिला वकील ने एक पोस्ट में लिखा, “मैं अपने सभी दोस्तों को धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मेरे योगदान को सराहा और टीम छपाक द्वारा ‘थैंक यू’ न कह पाने को चुनौती दी! मेरी शक्ति बॉलिवुड के इन ताकतवर निर्माताओं के बराबर नहीं है, लेकिन चुप रहने से अन्याय को और बढ़ावा मिलेगा। मैंने इस मामले को अगले स्तर पर ले जाने का फ़ैसला किया है। परिणाम का सामना करने के लिए तैयार हूँ।”
अर्पणा भट्ट द्वारा फेसबुर पर लिखा पोस्ट का स्क्रीनशॉट
इससे पहले, 11 दिसंबर को अपर्णा भट ने फ़िल्म ‘छपाक’ के निर्माण के लिए ख़ुशी ज़ाहिर की थी। इसके लिए भी उन्होंने फेसबुक का सहारा लिया था। उन्होंने लिखा था कि इस केस के ज़रिए बीते 8 वर्षों के दौरान क़ानून में कई तरह के सकारात्मक बदलाव किए गए। इस दौरान, न्यूनतम मुआवज़ा (एसिड अटैक की पीड़िता के लिए) बढ़ा गया, निजी अस्पतालों में मुफ़्त इलाज सुनिश्चित हो गया और अंतत:, एसिड की बिक्री को भी नियंत्रित कर दिया गया। उन्होंने तब इस बात को लेकर ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि बॉलीवुड में इस विषय पर फ़िल्म बनेगी। हालाँकि, फ़िल्म देखने के बाद, उन्होंने अपनी राय बदल दी है।
अर्पणा भट्ट द्वारा फेसबुर पर लिखा पोस्ट का स्क्रीनशॉट
बता दें कि फ़िल्म छपाक के चर्चे हर तरफ़ हो रहे हैं। इसकी वजह है दीपिका पादुकोण का दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) जाकर विरोध प्रदर्शन में भाग लेना। सोशल मीडिया पर जहाँ कुछ लोग दीपिका की तारीफ़ कर रहे हैं तो वहीं कुछ छपाक को बॉयकॉट करने की बात भी कर रहे हैं। फ़िल्म छपाक की बात करें तो ये दिल्ली की एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी से प्रेरित है। फ़िल्म में दीपिका पादुकोण संग विक्रांत मैसी, अंकित बिष्ट संग अन्य एक्टर्स हैं। मेघना गुलज़ार के निर्देशन में बनी फ़िल्म छपाक, 10 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ होनी है। दीपिका की यह फ़िल्म एसिड अटैक की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन और उनके संघर्ष की कहानी पर आधारित है।
अप्रैल 2003 की एक रात सोनाली मुखर्जी धनबाद में अपने घर की छत पर सोई थी। अँधेरे में तीन लोग आए। सोनाली की आँख खुली तो तेजाब की बारिश हो रही थी। एनसीसी कैडेट और कॉलेज टॉपर रही इस लड़की पर तेजाब उन तीन लोगों ने फेंका था, जिनकी छेड़खानी का उन्होंने विरोध किया था। हमले से सोनाली का चेहरा मांस का ठूंठ भर रह गया। देखने की क्षमता प्रभावित हुई। सदमे से दादा मर गए। माँ अवसाद में चली गई। इलाज कराने में पिता की जमीन बिक गई। एक वक्त ऐसा भी आया कि टूट चुकी सोनाली ने इच्छामृत्यु की इजाजत तक मॉंगी। कुछ समाजिक योगदान, थोड़े-बहुत सरकारी मदद और सबसे बढ़कर जिजीविषा जिसकी वजह से आज सोनाली खुशहाल जिंदगी जी रही है। पति-बच्चे सब कुछ तो हैं अब उसके पास। यह कैसे हुआ? इसे सोनाली के शब्दों में ही जानें, “जब मुझ पर एसिड अटैक हुआ तो सोनाली के चेहरे को तो उन्होंने ख़त्म कर दिया लेकिन मेरे अंदर की सोनाली को मैने ख़त्म नहीं होने दिया।”
फिल्म छपाक की कहानी जिस लक्ष्मी अग्रवाल पर आधारित है उन पर तो दिल्ली में सरेबाजार एसिड अटैक हुआ था। हमलावर 32 साल का नईम खान था। वह इस बात से खुन्नस खाए बैठा था कि 15 साल की लक्ष्मी ने शादी का उसका प्रस्ताव कैसे ठुकरा दिया। हमले से पहले वह 10 महीने तक लक्ष्मी का पीछा करता रहा। जिजीविषा की बदौलत ही लक्ष्मी एक दिन फैशन तक का चेहरा बन गईं।
मुंबई की अनमोल की मॉं पर तो उसके पिता ने ही एसिड फेंक दिया था। बकौल अनमोल वह एक बेटी के पैदा होने से खुश नहीं थे। जिस दोपहर उनके पिता ने एसिड फेंका अनमोल को मॉं दूध पिला रही थी। मॉं ने अनमोल को तो किसी तरह बचा लिया, लेकिन खुद को नहीं बचा पाई। 2017 में यूपी की राजधानी लखनऊ में एक गैंगरेप पीड़िता पर जब एसिड फेंका गया तो उस पर किया गया इस तरह का 5वॉं हमला था।
दास्तानों की फेहरिस्त लंबी है और सिलसिला है कि टूट नहीं रहा। एसिड अटैक को लेकर जो जागरूकता और कानूनी सख्ती दिख भी रही है वह पीड़िताओं की लड़ाई के कारण ही मुमकिन हो पाया है।
साभार: Loksabha
बीते 13 दिसंबर 2019 को लोकसभा में महिलाओं पर तेजाब हमले को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने पटल पर कुछ आँकड़े रखे थे। इसके मुताबिक 2015-17 के बीच महिलाओं पर तेजाब फेंकने की 448 घटनाएँ हुई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार उससे पहले 2014 में ऐसी 137 घटनाएँ हुई थी। यानी, हर दूसरे या तीसरे दिन देश में कोई न कोई महिला तेजाब से नहलाई जा रही है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में इस तरह की घटनाएँ सबसे ज्यादा हो रही। एनसीआरबी के आँकड़े बताते हैं देश की राजधानी दिल्ली में 2014.17 के बीच महिलाओं पर 43 एसिड अटैक हुए।
साभार: Loksabha
एक अभिनेत्री के पब्लिसिटी स्टंट पर फिदा हो आप छपाक देखें या उसकी कारस्तानी से आहत हो शो की बुकिंग रद्द करें, यह आपकी मर्जी है। लेकिन, ऐसी घटनाओं रोकना, पीड़िताओं के साथ खड़े होना एक समाज के तौर पर हमारी मर्जी का सवाल नहीं है। हमें ऐसी घटनाओं को रोकना ही होगा। इससे लड़ना ही होगा। ताकि कल को कोई सोनाली फिर से टूटकर इच्छामृत्यु की इजाजत नहीं मॉंगे। ताकि फिर कल को किसी लक्ष्मी अग्रवाल को अपने बच्चों को पालने के लिए संघर्ष न करना पड़े।
बिहार विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है। मगर, राज्य में सियासी घमासान शुरू हो चुका है। एक ओर राजद-जदयू के बीच पोस्टर वॉर छिड़ा हुआ है। वहीं इसी बीच, भाजपा के विधान परिषद सदस्य संजय पासवान का बड़ा बयान आया है। संजय पासवान ने कहा है कि बिहार की जनता किसी भाजपा नेता को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है। उनका कहना है कि राज्य में बीजेपी किसी भी राज्य से और यहाँ के अन्य दलों में से सबसे मजबूत और सक्रिय पार्टी है।
संजय पासवान ने हालाँकि यह चौंकाने वाला बयान देते समय भाजपा नेता ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर आखिरी फैसला प्रधानमंत्री मोदी और उनके नेता सुशील मोदी ही लेंगे। लेकिन उनका मानना है कि अब पार्टी अकेले चुनाव जीतने में सक्षम है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भाजपा की ओर से संजय पासवान ने सुशील मोदी और नित्यानंद राय के नाम पर अपनी सहमति दिखाई। उन्होंने कहा है कि बिहार में मुख्यमंत्री सामाजिक न्याय की धारा का चाहिए। सवर्ण समाज खुद भी मान रहा है कि उनके समाज से मुख्यमंत्री बनने वाला नहीं है, इसलिए सुशील मोदी जी, नित्यानंद राय जी इसके लिए सक्षम हैं। नीतीश कुमार जी भी सामाजिक न्याय के बैकग्राउंड से आते हैं, इसलिए हमलोग उनको मानते हैं। लेकिन अब वो काफी समय तक रहे हैं, अब बिहार के लोगों का मन है कि बीजेपी से सीएम बनें।
बिहार: बीजेपी MLC संजय पासवान का बड़ा बयान- सुशील मोदी-नित्यानंद राय बन सकते हैं CMhttps://t.co/ZEJ9dGyV1g
गौरतलब है कि संजय पासवान के इस बयान से खलबली मच गई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि बिहार में जेडीयू-बीजेपी-एलजेपी गठबंधन की सरकार है, जिसकी कमान जेडीयू नेता नीतीश कुमार संभाल रहे हैं। आरजेडी प्रमुख लालू यादव के जेल जाने के बाद बिहार की वर्तमान राजनीति के नीतीश कुमार सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा हैं।
इतना ही नहीं, पिछले विधानसभा चुनाव के बाद 278 दिन तक आरजेडी पार्टी के साथ सरकार का कार्यकाल छोड़ दें, तो नीतीश ही 2005 से लगातार बिहार के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और बीजेपी के साथ गठबंधन में हमेशा अहम भूमिका में रहे हैं।
इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं गृहमंत्री अमित शाह एक चैनल को इंटरव्यू देते हुए पहले बता चुके हैं कि बिहार में गठबंधन का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे। इसे लेकर कोई संशय नहीं होना चाहिए।