Home Blog Page 5185

स्वपन दासगुप्ता SFI और TMC के उपद्रवी छात्रों की घेराबंदी से 7 घंटे बाद हुए मुक्त, विजयवर्गीय ने ममता को दी चेतावनी

कोलकाता में विश्व भारती विश्वविद्यालय में बंधक बनाए गए भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार स्वपन दासगुप्ता और विश्वविद्यालय के कुलपति क़रीब छ: घंटे बाद वामपंथी छात्रों की घेराबंदी से मुक्त हुए। विश्वविद्यालय के सूत्रों के अनुसार, छात्रों का धरना समाप्त होने के बाद रात क़रीब दस बजे बीजेपी नेता और कुलपति बाहर आ सके। बता दें कि बुधवार (8 जनवरी) नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर आधारित एक व्याख्यान के तहत ‘सीएए 2019: समझ और व्याख्या’ विषय पर बोलना था। इस दौरान भाजपा नेता स्वपन दासगुप्ता का घेराव करते हुए कुलपति समेत क़रीब 70 लोगों को विश्वविद्यालय के एक कमरे में बंद कर दिया गया था।

इस पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा, “इस देश के अंदर जहालत नहीं है, ऐसा नहीं है कि लोग पढ़ें-लिखे नहीं हैं। सरकार को समझाने और पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। लोग CAA और NRC का मतलब अच्छी तरह से समझते हैं।” इसके आगे उन्होंने कहा कि CAA लागू होने के क्या नतीजे होंने हैं यह बात देश के लोगों को मालूम है। उन्होंने इशारे-इशारे में केंद्र सरकार और स्वपन दासगुप्ता समेत अन्य लोगों को 6 घंटे बंधक बनाए जाने को लेकर कहा, “अगर आप लोगों को गुमराह करने की कोशिश करेंगे, तो आपको लोगों का जवाब सुनना पड़ेगा।”  

दरअसल, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्व भारती विश्वविद्यालय में बुधवार (8 जनवरी) को नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर एक परिचर्चा सत्र को संबोधित करने स्वपन दासगुप्ता गए थे। इस दौरान छात्रों ने नारे लगाकर उनके व्याख्यान को बाधित कर दिया। आरोप है कि इस दौरान वहाँ वामपंथी और तृणमूल के छात्र संगठन के लोगों ने मिलकर उन्हें अंदर ही घेर लिया और बाहर नहीं निकलने नहीं दिया। वे विश्वविद्यालय के कुलपति के कमरे में क़ैद थे। रात आठ बजे जब यह मामला सुर्ख़ियों में आया तब हंगामा मच गया। भाजपा नेता दासगुप्ता के अलावा, विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति विद्युत चक्रवर्ती और कई अन्य लोगों को भी छात्रों ने बंधक बना लिया था।

भाजपा के प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने वीडियो जारी कर ममता सरकार को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी थी। उन्होंने कहा था कि दासगुप्ता का घेराव करने वालों में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI) और TMC के गुंडे शामिल थे। इसके अलावा, SFI के एक नेता ने कहा था कि नक्सली छात्रसंघ के सदस्य भी शामिल थे। बता दें कि दासगुप्ता के व्याख्यान कार्यक्रम की जगह SFI, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) छात्रसंघ के विरोध के कारण पहले से ही बदल दी गई थी, बावजूद इसके उन्हें छात्रों ने बंधक बना लिया।

बंधक बनाए जाने के बाद भाजपा नेता स्वपन दासगुप्ता ने ट्वीट कर बताया था, “विश्व भारती, शांतिनिकेतन में एक कमरे के अंदर लगभग 70 लोग बंद हैं, विश्वविद्यालय द्वारा CAA पर आधिकारिक व्याख्यान में भाग लेने आए थे। यहाँ हमारे साथ विश्वविद्यालय के वीसी भी शामिल हैं। टकराव के बाद बाहर से भीड़ के चिल्लाने की आवाज़ आ रही है।”

प्रियंका-कॉन्ग्रेस आग बुझाने का काम करती हैं और ये आग लगाने का, मोदी-शाह दंगों के एक्सपर्ट: राशिद अल्वी

JNU हिंसा में वामपंथी हुए बेनकाब! एक मोबाइल नंबर, एक व्हॉट्सअप ग्रुप और कई स्क्रीनशॉट से पर्दाफाश

‘रजिस्ट्रेशन कराने गईं छात्राओं के प्राइवेट पार्ट पर हमला, बाथरूम ले जाकर दुर्व्यवहार’ – JNU मामले में गंभीर आरोप

कॉन्ग्रेस और लेफ्ट गंदी राजनीति कर रहे, मैं उनके साथ नहीं: CAA-NRC पर ममता बनर्जी ने विपक्ष को मारी ‘लात’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 13 जनवरी को दिल्ली में होने वाली विपक्षी पार्टियों की बैठक का बहिष्कार कर दिया है। उन्होंने गुरुवार (जनवरी 8, 2020) को आरोप लगाया है कि कॉन्ग्रेस और वामदल पश्चिम बंगाल में गंदी राजनीति कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह अब अकेले नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगी।

गौरतलब है कि इससे पहले दक्षिण परगना में हुई एक सभा में ममता बनर्जी ने भारत बंद बुलाए जाने के लिए लेफ्ट पार्टियों पर सीधा हमला बोला था। उन्होंने लेफ्ट पर निशाना साधते हुए कहा था कि वामपंथ की कोई विचारधारा नहीं है। वे केवल बंद बुलाकर और बसों में बम फेंककर सस्ता प्रचार करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री के मुताबिक लेफ्ट द्वारा राज्य में की गई हिंसा सब ‘दादागिरी’ में आती है न कि आंदोलन में। इससे तो बेहतर है कि उनकी राजनीतिक मौत हो जाए।

बुधवार को कॉन्ग्रेस और वामपंथियों की राजनीति की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, “वामपंथी पार्टियों की कोई विचारधारा नहीं हैं। रेलवे पटरियों पर बम बिछाना गुंडागर्दी में आता है। आंदोलन के नाम पर रास्ते में चलने वालों को मारा जा रहा है और उन पर पथराव हो रहा है। ये दादागिरी है, न कि आंदोलन। मैं इस भारतबंद की निंदा करती हूँ।”

इसके अलावा उन्होंने दावा किया कि लेफ्ट पार्टियों द्वारा बुलाए बंद को खारिज कर दिया गया है। क्योंकि वे बंद का आह्वान करके और बसों में बम फेंककर सस्ता प्रचार करना चाहते हैं, इस प्रचार को हासिल करने के बजाय राजनीतिक मौत बेहतर है।

बता दें कि लेफ्ट पर हमलावर होते हुए बंगाल मुख्यमंत्री केरल की माकपा की तारीफ़ कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि केरल में माकपा की सरकार है और वह बंगाल में वामपंथियों से बहुत बेहतर है क्योंकि कम से कम वे अपनी विचारधारा में विश्वास करते हैं। वामियों के पास मानवता का मूल्य मात्र शेष नहीं बचा है। कहीं ट्रेन के नीचे बम रख दिया गया, कहीं पत्थर फेंके जा रहे हैं, कहीं ट्रेनें तो कहीं बसें रोकी जा रही हैं तो कहीं बाइक सवारों के साथ मारपीट की गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि यह दादागिरी नहीं तो और क्या है? क्या इसे आंदोलन कहा जा सकता है?

इसके बाद उन्होंने सिंगूर आंदोलन की बात उठाई और कहा, “मैंने 26 दिनों तक आंदोलन किया था, लेकिन एक बस तक में किसी ने हाथ नहीं लगाया। आंदोलन एक दिन का नहीं, बल्कि निरंतर चलता है। आंदोलन करना कठिन होता है क्योंकि इसके लिए रास्ते पर पड़े रहना पड़ता है।”

लेफ्ट की हिंसा ‘दादागिरी’ है न कि आंदोलन, खत्म हो जाऊँगी लेकिन वामपंथियों की तरह नहीं करूँगी: ममता बनर्जी

ममता बनर्जी को झटका: कलकत्ता हाईकोर्ट ने CAA-NRC संबंधी विज्ञापनों को हटाने के दिए निर्देश

‘मुस्लिम टोपी’ पहन भाजपा कार्यकर्ता तोड़फोड़ कर समुदाय विशेष को बदनाम कर रहे: ममता बनर्जी

ठाकुरबाड़ी में जब हाे ‘हर-हर माेदी’ फिर CAA-NRC से क्यूँ न तड़पे ममता दीदी!

‘आपके संघर्ष, आपकी लड़ाई सब बेकार अगर हिन्दुओं से घृणा न करें’ – रंगोली चंदेल ने खोली गिरोह की गाँठें

5 साल में 54 सर्जरी। चेहरे पर एसिड अटैक के बाद रह गया दाग। जलने की पीड़ा। एक आँख खराब। एक स्तन को नुकसान। और भी बहुत कुछ… जाहिर है, रंगोली चंदेल जैसी एसिड अटैक सर्वाइवर बन कर जीना आसान नहीं है। लेकिन, यकीन मानिए उससे भी ज्यादा कठिन है अतुल खत्री हो जाना। अतुल खत्री- एक बुजुर्ग कॉमेडियन। एक संवेदनहीन इंसान। मौक़ापरस्त शख्सियत। मोदी सरकार की नीतियों का कड़ा विरोधी। और अंत में कुत्सित बुद्धि।

आज सोशल मीडिया पर एक तबके के बीच ‘छपाक’ इन दिनों सुर्खियों में है। वो भी दीपिका के जेएनयू जाने को लेकर नहीं, बल्कि लक्ष्मी अग्रवाल की पूरी कहानी को पर्दे पर उतरता देखने के लिए। ताकि एसिड अटैक का शिकार हुए लोगों के दर्द को समाज के बीच गंभीर विषय बनाकर उतारा जा सके। लेकिन जब देश में एसिड अटैक पर बातचीत का माहौल बन रहा है तो उसी समय खुद को लेखक और कॉमेडियन कहने वाले अतुल खत्री ने रंगोली चंदेल यानी एक एसिड पीड़िता को ‘चांडाल’ कहकर मजाक उड़ाया है।

अब रंगोली की गलती क्या थी? सिर्फ़ इतनी कि मौक़े दर मौक़े वो अक्सर देश से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं। हिंदुओं के ख़िलाफ़ निराधार नहीं बोलतीं। मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं करतीं। और, वैचारिक रूप से, राजनैतिक तौर पर उन्हें जो गलत लगता है, उस पर बेबाकी से अपनी राय रखती हैं। हालाँकि आपको लगेगा कि ये सब तो लोकतांत्रिक देश के हरेक नागरिक के अधिकार हैं। लेकिन, नहीं! अतुल खत्री के लिए इन सभी गुणों से परिपक्व व्यक्ति उनके घटिया व्यंग्यों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली संदर्भ सामग्री है।

जेएनयू में हिंसा हुई। लेफ्ट ने एबीवीपी पर इल्जाम लगाया। एबीवीपी ने लेफ्ट पर। किसने क्या किया? कौन-कहाँ शामिल था? इसकी पुष्टि कहीं नहीं हुई। लेकिन अतुल खत्री जैसे लोगों ने अपनी विचारधारा के अनुरुप घोषित कर दिया कि हमला एबीवीपी ने किया। इसी गैंग ने एबीवीपी का नया नामकरण भी कर दिया- अखिल भारतीय विलेन परिषद! मतलब हद है टुच्चई की।

अब जब धीरे-धीरे बात खुली, पूरे मामले में लेफ्ट के हाथ का खुलासा हो रहा है और दुनिया को मालूम चल रहा है कि वामपंथी बर्बरता का शिकार हुए पीड़ितों में एबीवीपी के कार्यकर्ता शामिल हैं। तो अतुल खत्री ने अपने एक ट्वीट में पहले दीपिका के जेएनयू जाने पर उनका बचाव करते हैं। फिर दूसरे ट्वीट में कहते हैं कि अब एबीवीपी को दीपिका के बजाय रंगोली की सहानुभूनिति मिलेगी। अब चूँकि यहाँ रंगोली हमेशा ऐसे मुद्दों पर खुलकर बोलती हैं, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है कि वे अपनी सहानुभूति किसके साथ शेयर करेंगी। और यह भी स्पष्ट है कि अतुल इस पर क्या राय रखेंगे। इस गिरोह के लोगों का पैटर्न फिक्स है- स्वरा भास्कर लेफ्ट को सपोर्ट करे तो सही है, समर्थन देना है। लेकिन कंगना या उनकी बहन किसी घटना के दूसरे पहलू को सपोर्ट करें तो उनका मखौल उड़ाना है, मान-मर्दन करना है।

अतुल खत्री नैरेटिव और प्रोपेगेंडा सेट करने के अव्वल खिलाड़ी हैं। उनसे कुछ पूछा जाए तो सटिक जवाब के बजाय वो मुद्दे को घुमाना बखूबी जानते हैं। दीपिका पादुकोण-JNU मामले में भी यही हुआ। दीपिका के JNU प्रकरण पर ट्वीट करते हुए किसी ने उनसे एबीवीपी के छात्रों से न मिलने की बात उठाई। लेकिन इसका जवाब दिया अतुल ने। गिरोह ऐसे ही काम करता है। ट्वीट का जवाब देते हुए अतुल ने रंगोली को चांडाल (सरनेम चंदेल है, लेकिन अतुल ने जानबूझकर चांडाल लिखा) कहा और लिखा कि एबीवीपी को रंगोली चांडाल अपनी सहानुभूति देंगी।

एक एसिड अटैक सर्वाइवर का रील कैरेक्टर निभाने वाली दीपिका के समर्थन में एक रियल लाइफ एसिड सर्वाइवर रंगोली चंदेल के बारे में ऐसी टिप्पणी करना कहाँ तक उचित था और कौन सी घृणित मानसिकता को दर्शाता है खुद सोचिए… अगर वाकई लक्ष्मी का किरदार निभाने वाली दीपिका के लिए आपके मन में सम्मान का भाव है, तो असलियत में उस दर्द से उभरी रंगोली चंदेल के विचारों के प्रति क्यों नहीं? क्योंकि वास्तविकता में आपको एसिड/अटैक/दर्द/महिला आदि से कुछ भी लेना-देना नहीं। आपको तो बस अपनी दुकान चलानी है – हिंदुओं से घृणी की, मोदी-BJP से नफरत की, वामपंथी प्रोपेगेंडे की।

खैर, अतुल खत्री को उनके इस ट्वीट के लिए सोशल मीडिया पर लोगों ने जमकर लताड़ा। उन्हें सलाह दी गई कि उनकी दो बेटियाँ हैं। ऐसे शब्द किसी लड़की के लिए इस्तेमाल मत करिए क्योंकि कर्म पीड़िताओं की तरह दयावान नहीं होता, वो बदला जरूर लेता है।

अतुल खत्री के ट्वीट पर यूजर्स की टिप्पणी

एक यूजर ने रंगोली के विचारों के लिए उन्हें दीपिका से सौ गुणा बेहतर बताया। लोगों ने उन्हें कॉमेडियन के नाम पर कलंक, गंदा दिमाग, भाजपा से नफरत करने वाला तक बताया और साथ ही पूछा कि आखिर उनकी खुद की क्या औकात है, जो एबीवीपी और रंगोली का नाम लेकर औकात की बात कर रहे हैं।

इसी दौरान AN OPEN LETTER नाम के ट्विटर से भी इस घटिया ट्वीट का जवाब आया। जिसमें उन्होंने लिखा- रंगोली चंदेल एक वास्तविक एसिड अटैक सर्वाइवर है। जबकि दीपिका सिर्फ़ एक सर्वाइवर का किरदार निभा रही है और छात्रों के सामने पीआर स्टंट कर रही है। ऐसे में अतुल खतरी जैसे लोग सिर्फ़ एक को बचाने के लिए दूसरे का नाम ही बदलकर उसका अपमान कर रहे हैं।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर अतुल खत्री के ट्वीट को देखकर उन्हें खूब ट्रोल किया गया। लेकिन बेवजह ऐसे अपना नाम किसी संदर्भ के साथ बिगड़ता देख रंगोली भी भावुक हो गईं। उन्होंने AN OPEN LETTER के ट्वीट पर जवाब देते हुए कहा – “यदि हम हिंदुओं से घृणा नहीं करते हैं, अपनी सरकार को या सुरक्षा बलों को खलनायक नहीं बताते, तो हमारे संघर्ष, हमारी राय, और आवाज को खारिज कर दिया जाता है। यहाँ आपको सराहा तभी जाएगा, जब आप देश के भविष्य के बारे में निराशावादी हों, पाकिस्तान से और उसके आतंकियों से प्यार करें… इसलिए क्षमा करें मुझे ऐसे प्यार की जरूरत नहीं।”

अब जाहिर है कि अपने लिए बेवजह टिप्पणी सुनना किसी को नहीं पंसद आएगा। और वो भी तब जब कोई वर्चुअल स्पेस का प्राणी आपके संघर्षों को जानते-समझते हुए उसे खारिज कर दे और किसी की छवि निर्मित करने के लिए किसी को चांडाल तक बुला डाले। वो भी सिर्फ़ लोगों के बीच सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि आपका संघर्ष, आपका दर्द, आपका सफर भले ही किसी अन्य की तरह मिलता-जुलता है, लेकिन विचार उनसे अलग हैं, बेबाक हैं और सरकार के पक्ष में हैं।

नहीं रिलीज़ होगी Chhapaak? जिस लड़की पर बनी फिल्म, उसी की वकील ने दायर की याचिका

Chhapaak का समर्थन महज़ दिखावा, ‘चंदेल’ को ‘चांडाल’ लिख कंगना की बहन का उड़ाया मज़ाक

बॉलीवुड की रीत पुरानी: ‘उन्हें’ रखो सिर-माथे पर, हिंदुओं की भावना ठेंगे पर

डियर दीपिका! नकली पलकों पर भाप की बूंदे टिका कर नौटंकी करना बंद करो

JNU में दीपिका पादुकोण का जाना प्रचार की पैंतरेबाजी, पाकिस्तान ने थपथपाई पीठ

नहीं रिलीज़ होगी Chhapaak? जिस लड़की पर बनी फिल्म, उसी की वकील ने दायर की याचिका

दीपिका पादुकोण की फ़िल्म छपाक अपनी रिलीज़ से पहले ही विवादों में घिरती जा रही है। इस फ़िल्म को लेकर सोशल मीडिया पर पहले से ही काफी हंगामा चल रहा है और अब एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की वकील अपर्णा भट्ट भी फ़िल्म निर्माताओं से नाराज़ दिख रही हैं। इसलिए उन्होंने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने की माँग की है।

अपनी इस याचिका में अपर्णा भट्ट ने कहा है कि उन्होंने एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल का केस वर्षों तक लड़ा, लेकिन इस फ़िल्म में मुझे क्रेडिट नहीं दिया गया है। अपर्णा का कहना है कि उन्होंने फ़िल्म छपाक की स्क्रिप्ट में भी काफी मदद की थी। उन्होंने कहा कि फ़िल्म के निर्माता ने उन्हें भरोसा दिया था कि उन्हें क्रेडिट दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। छपाक में अपर्णा को क्रेडिट नहीं दिया गया।

फेसबुक पर लक्ष्मी की वकील अपर्णा भट्ट ने लिखा था कि कैसे वे इस बात से नाराज़ हैं कि फ़िल्म छपाक के मेकर्स ने उन्हें अपनी फ़िल्म में कोई क्रेडिट नहीं दिया है। उन्होंने ये भी कहा कि वे इस मामले में क़ानून की मदद लेंगी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वे दीपिका पादुकोण और बाकी लोगों के बराबरी की नहीं हैं लेकिन इस मामले में वे चुप नहीं बैठेंगी।

लक्ष्मी अग्रवाल की वकील अपर्णा भट्ट ने फ़ेसबुक पर लिखा, “छपाक देखने के बाद की घटनाओं से काफ़ी परेशान हूँ। मुझे अपनी पहचान को बचाने और अपनी ईमानदारी को बनाए रखने के लिए क़ानूनी कार्रवाई करने को मजबूर किया गया। एक समय मैंने पटियाला हाउस कोर्ट में लक्ष्मी का प्रतिनिधित्व किया था… कल कोई मेरा प्रतिनिधित्व करेगा… जीवन की अजीब विडंबना है।” उन्होंने आगे दीपिका और फ़िल्म के निर्माताओं के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने के बारे में लिखा है।

अपर्णा भट्ट ने फेसबुक पर लिखा

महिला वकील ने एक पोस्ट में लिखा, “मैं अपने सभी दोस्तों को धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मेरे योगदान को सराहा और टीम छपाक द्वारा ‘थैंक यू’ न कह पाने को चुनौती दी! मेरी शक्ति बॉलिवुड के इन ताकतवर निर्माताओं के बराबर नहीं है, लेकिन चुप रहने से अन्याय को और बढ़ावा मिलेगा। मैंने इस मामले को अगले स्तर पर ले जाने का फ़ैसला किया है। परिणाम का सामना करने के लिए तैयार हूँ।”

अपर्णा भट्ट की फेसबुक पोस्ट

इससे पहले, 11 दिसंबर को अपर्णा भट ने फ़िल्म ‘छपाक’ के निर्माण के लिए ख़ुशी ज़ाहिर की थी। इसके लिए भी उन्होंने फेसबुक का सहारा लिया था। उन्होंने लिखा था कि इस केस के ज़रिए बीते 8 वर्षों के दौरान क़ानून में कई तरह के सकारात्मक बदलाव किए गए। इस दौरान, न्यूनतम मुआवज़ा (एसिड अटैक की पीड़िता के लिए) बढ़ा गया, निजी अस्पतालों में मुफ़्त इलाज सुनिश्चित हो गया और अंतत:, एसिड की बिक्री को भी नियंत्रित कर दिया गया। उन्होंने तब इस बात को लेकर ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि बॉलीवुड में इस विषय पर फ़िल्म बनेगी। हालाँकि, फ़िल्म देखने के बाद, उन्होंने अपनी राय बदल दी है।

अपर्णा भट्ट का फेसबुक पर लिखा पुराना पोस्ट

बता दें कि फ़िल्म छपाक के चर्चे हर तरफ़ हो रहे हैं। इसकी वजह है दीपिका पादुकोण का दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) जाकर विरोध प्रदर्शन में भाग लेना। सोशल मीडिया पर जहाँ कुछ लोग दीपिका की तारीफ़ कर रहे हैं तो वहीं कुछ छपाक को बॉयकॉट करने की बात भी कर रहे हैं।

फ़िल्म छपाक की बात करें तो ये दिल्ली की एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी से प्रेरित है। फ़िल्म में दीपिका पादुकोण संग विक्रांत मैसी, अंकित बिष्ट संग अन्य एक्टर्स हैं। मेघना गुलज़ार के निर्देशन में बनी फ़िल्म छपाक, 10 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ होनी है। दीपिका की यह फ़िल्म एसिड अटैक की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन और उनके संघर्ष की कहानी पर आधारित है।

JNU में दीपिका पादुकोण का जाना प्रचार की पैंतरेबाजी, पाकिस्तान ने थपथपाई पीठ

डियर दीपिका! नकली पलकों पर भाप की बूंदे टिका कर नौटंकी करना बंद करो

दीपिका पादुकोण को मिला पाकिस्तानी सेना का समर्थन, बताया सच्चाई के लिए खड़ी बहादुर महिला


Chhapaak का समर्थन महज़ दिखावा, ‘चंदेल’ को ‘चांडाल’ लिख कंगना की बहन का उड़ाया मज़ाक

भारतीय कॉमेडी की एक अजीब धारणा यह बन गई है कि अधिकतर कॉमेडियन्स को यह लगता है कि उन्हें इसलिए नापसंद किया जाता है क्योंकि वे पीएम मोदी का मज़ाक उड़ाते हैं। वहीं, जो लोग पीएम मोदी का मज़ाक उड़ाए जाने वाली कॉमेडी से नाख़ुश होते हैं उन्हें ‘भक्त’ करार दिया जाता है। ऐसे में यह सलाह देना ज़रूरी बन जाता है कि कॉमेडियन्स को पीएम मोदी का मखौल उड़ाने की बजाए अपनी कॉमेडी के स्तर को सुधारना चाहिए। लेकिन, वो ऐसा नहीं करते बल्कि कॉमेडी के नाम पर अपनी कुत्सित सोच को उजागर करते रहते हैं।

ऐसा ही कुछ एक बुज़ुर्ग कॉमेडियन अतुल खत्री ने किया। अपनी कॉमेडी के चक्कर में, उन्होंने एक तरफ़ तो एक एसिड अटैक सर्वाइवर का मज़ाक उड़ाया और वहीं दूसरी तरफ़ वो एक और एसिड अटैक सर्वाइवर के जीवन पर आधारित फ़िल्म बनाने का समर्थन करते हैं।

अतुल खत्री का ट्वीट जिसमें रंगोली चंदेल का मज़ाक उड़ाया गया

कॉमेडियन अतुल खत्री ने ट्विटर यूज़र और भाजपा समर्थक अंकित जैन को यह कहकर अपनी कुत्सित सोच का खुला प्रदर्शन किया कि ABVP कार्यकर्ताओं को ‘रंगोली चांडाल’ से सहानुभूति मिलेगी। उनकी इतनी ही औकात है। यह जवाब बुज़ुर्ग कॉमेडियन ने अंकित जैन के उस सवाल पर किया, जहाँ उन्होंने दीपिका पादुकोण को लेकर लिखा था कि अगर वो सच में छात्रों के साथ हुई हिंसा के ख़िलाफ़ थीं, तो उन्हें ABVP के उन छात्रों से भी मुलाक़ात करनी चाहिए थी, जो JNU हिंसा में घायल हुए थे।

एक बात और ग़ौर करने वाली है कि बुज़ुर्ग खत्री बॉलीवुड अभिनेता कंगना रनौत की बहन ‘रंगोली चंदेल’ को ‘रंगोली चांडाल’ के रूप में संदर्भित कर रहे थे। उनकी यह सोच एसिड अटैक की पीड़िताओं के प्रति उनकी झूठी हमदर्दी का खुला प्रदर्शन करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि रंगोली ख़ुद भी एसिड अटैक की शिकार हो चुकी हैं। इसके अलावा, चांडाल शब्द लिखकर उन्होंने जातिवाद का ज़हर भी घोलने का काम किया है। एक तरफ़ एसिड अटैक सर्वाइवर का मज़ाक उड़ाया और दूसरी तरफ़ एक जातिगत शब्द का इस्तेमाल किया, जो निंदनीय है।

दरअसल, दीपिका पादुकोण मंगलवार शाम को अपनी आगामी फिल्म छपाक के प्रचार के लिए JNU में थीं। बता दें कि यह फ़िल्म एक एसिड अटैक सर्वाइवर के जीवन पर आधारित है।

दीपिका पादुकोण ने फ़िल्म में एसिड अटैक सर्वाइवर का महज़ किरदार निभाया जबकि रंगोली चंदेल पर हक़ीक़त में तेज़ाब से हमला हुआ था। उन्होंने वास्तव में उस दर्दनाक पीड़ा को सहा है। यह सब उन्हें इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था जो उनसे शादी करना चाहता था। एसिड अटैक के बाद उन्हें 54 सर्जरी करवानी पड़ी। बावजूद इसके, डॉक्टर्स उनके कान का पुनर्निर्माण नहीं कर सके।

इस दौरान रंगोली चंदेल ने अपनी एक आँख भी खो दी थी और उनके एक स्तन को बहुत नुकसान पहुँचा था, जिसकी वजह से उन्हें अपने नवजात बच्चे को स्तनपान कराते समय कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। अपनी पीड़ा को बयाँ करते हुए उन्होंने पिछले साल अक्टूबर में ट्वीट किया था, “अब भी मैं अपनी गर्दन को नहीं खींच पा रही हूँ, कभी-कभी त्वचा में खुजली इतनी भयंकर होती है कि ऐसा लगता है जैसे मैं मर गई हूँ… भारत में चौंकाने वाले एसिड अटैक सर्वाइवर्स की संख्या बहुत अधिक है, अपराधी कुछ ही हफ़्तों में ज़मानत पर बाहर आ गए, उन्हें इस तरह आज़ाद घूमते देखना बहुत पीड़ादायक होता है।”

कॉमेडियन अतुल खत्री ने एसिड अटैक सर्वाइवर्स पर आधारित फ़िल्म का समर्थन करते हुए रंगोली चंदेल का मज़ाक उड़ाया, जो बेहद शर्मनाक है।

JNU में वामपंथी छात्रों का समर्थन करने पहुँचीं दीपिका पादुकोण, मुंबई का फ़िल्मी गैंग भी सड़क पर

JNU में दीपिका पादुकोण का जाना प्रचार की पैंतरेबाजी, पाकिस्तान ने थपथपाई पीठ

डियर दीपिका! नकली पलकों पर भाप की बूंदे टिका कर नौटंकी करना बंद करो

दीपिका पादुकोण को मिला पाकिस्तानी सेना का समर्थन, बताया सच्चाई के लिए खड़ी बहादुर महिला

महिला IPS असलम खान ने की पुलवामा के आतंकी ‘जैसी बात’, खुलेआम गौमूत्र पर कसा तंज

हिंदू धर्म में गौ के पूजनीय होने के कारण उसके दूध, गोबर, मूत्र को हर कर्मकांड में बेहद पवित्र माना जाता है। ऐसे में वामपंथी और कट्टरपंथी अक्सर हिंदू धर्म को नीचा दिखाने के लिए इसे घृणा और उपहास की नजरों से देखते हैं। अक्सर गाय के गोबर और गौमूत्र को लेकर इनकी उलटी-सीधी बयानबाजी सामने आती रहती है। इसी क्रम में पुलवामा हमले के आतंंकी को भी गौमूत्र का नाम लेकर हिंदुओं को निशाना बनाते देखा गया था। लेकिन, इस बार गौमूत्र पर तंज वामपंथियों, कट्टरपंथियो और आतंकियों से हटकर एक आईपीएस महिला अधिकारी ने कसा है। अधिकारी का नाम असलम खान है।

दरअसल, जेएनयू में वामपंथियों द्वारा रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को रोकने के कारण भड़की हिंसा पर दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर सिंह बग्गा ने ट्विटर पर लेफ्ट विचारधारा के प्रति अपना गुस्सा निकाला। उन्होंने अपने ट्वीट में वामपंथियो को कैंसर कई बार लिखा। जिसके बाद लोगों ने इस ट्वीट पर अलग-अलग प्रतिक्रिया दी। किसी ने बग्गा को उनके ट्वीट के लिए ट्रोल किया, तो किसी ने उनका समर्थन। लेकिन इसी दौरान महिला IPS अधिकारी असलम खान ने लिखा, “क्या हम उन्हें गौ मूत्र से ठीक नहीं कर सकते?”

हालाँकि, ये बात सच है कि आयुर्वेद में गौ-मूत्र को एक कारगर औषधि के रूप में देखा जाता है और ये भी कहा जाता है कि इससे कैंसर जैसी कई घातक बीमारियों से बचा सकता है। लेकिन बग्गा के ट्वीट पर असलम खान ने ‘गौमूत्र’ हिंदू धर्म की मान्यता को अपमानित करने के लिहाज से किया। जिसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें आड़े हाथों ले लिया।

सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा असलम को पुलवामा के उस फिदायीन हमलावर आदिल डार की याद दिलाई गई, जिसने ‘गौमूत्र पीने वाले’ कहकर हिंदुओं को मुख्यत: निशाना बनाया था। जिसने अपने आखिरी वीडियो में कहा था, “गौमूत्र पीने वाले भद्दे लोग उनके आक्रमणों का सामना नहीं कर पाएँगे।”

असलम खान ने जो ट्विट किया, इसके बाद उन्हें उनके पद और सोच के लिए धिक्कारा गया। कई लोगों ने तुरंत उन्हें हिंदू धर्म का अपमान करने के लिए पद से हटाने की माँग की। वहीं किसी ने कहा, “ऐसे लोग जनता को प्रोटेक्ट करेंगे? हमें हैरानी नहीं करनी चाहिए अगर यही अधिकारी कल को जिहादियों को भारत में घुसने का पास दे या फिर खुद ही को फिदायीन हमलावरों की तरह उड़ा ले।”

बता दें कि असलम के कमेंट में गौमूत्र पर टिप्पणी देखकर कुछ ने उनके समर्थन में हिंदुओं और हिंदुत्व को निशाना बनाने के लिए ये भी कहा कि प्रशासन में उनके जैसे अन्य अधिकारी भी होने चाहिए।

वहीं, असलम के एक शुभचिंतक ने उन्हें उनकी टिप्पणी पर राय दी कि उन्हें बतौर अधिकारी सार्वजनिक तौर पर गाय पर या फिर किसी धर्म पर ऐसी टिप्पणी कभी नहीं करनी चाहिए। यूजर के मुताबिक वो और असलम एक साथ इस पर मिलकर हँस सकते हैं, लेकिन सार्वजिनक तौर पर ऐसी टिप्पणियों का विरोध करना चाहिए।

फैक्ट चेक: गौमूत्र पीते हैं, दलित से करते हैं भेदभाव… इसलिए मैंने हिंदू धर्म छोड़ कर अपनाया इस्लाम

दलित और गोमूत्र से घृणा करने वाला द वायर का हिन्दूफोबिक मीडिया ट्रोल इसलिए अपराधी नहीं हो सकता

नमाज के लिए जेल में जगह चाहिए हत्यारे पूर्व सांसद शहाबुद्दीन को, कॉन्ग्रेसी नेता वकील की SC में याचिका

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि उसे एकांतवास में क्यों रखा गया है और उसे क्या हमेशा एकांतवास में ही रखा जाएगा? इस याचिका में मूलभूत सुविधाओं का भी हवाला दिया गया, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि उसे जेल में नमाज़ पढ़ने के स्थान आदि जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया नहीं कराई गई हैं। इस मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को कहा कि शहाबुद्दीन की याचिका पर ग़ौर करें। साथ ही बेंच ने यह मामला दो सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

इससे पहले, शहाबुद्दीन की तरफ से सीनियर वकील सलमान खुर्शीद ने बेंच से कहा था कि उनके मुवक्किल को जेल के अंदर टहलने की अनुमति दी जानी चाहिए। वहीं, कोर्ट ने यह भी साफ़ तौर पर कहा कि उससे (शहाबुद्दीन) किसी को ख़तरा है या उस पर ख़तरा है, ये तय करना कोर्ट का काम नहीं है।

दरअसल, शहाबुद्दीन ने एक ऐसी ही याचिका पिछले साल 30 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट में भी दायर की थी। इसमें RJD के पूर्व सांसद ने कहा था कि तिहाड़ जेल में उसके साथ किए जा रहे बर्ताव से वो ख़ुश नहीं है। उसने याचिका में इस बात का भी उल्लेख किया था कि उसे अकेले काल-कोठरी में बंद कर दिया गया है, जहाँ उससे कोई बात तक नहीं करता। साथ ही उसने अपनी सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए थे।

RJD प्रमुख लालू यादव के क़रीबी माने जाने वाले शहाबुद्दीन को 2017 में एसिड अटैक केस में उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। शहाबुद्दीन अभी पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के मामले में भी आरोपित है। सीवान के दिवंगत पत्रकार राजदेव रंजन की पत्नी आशा रंजन और चंद्रशेखर प्रसाद की याचिका पर बिहार में तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे शहाबुद्दीन को सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी, 2018 को सीवान जेल से दिल्ली की तिहाड़ जेल में ट्रांसफर करने का आदेश दिया था। फ़िलहाल, शहाबुद्दीन पर 45 आपराधिक मामले चल रहे हैं।

ख़बर के अनुसार, बिहार के खौफ़नाक तेजाबकांड की याद लोगों के ज़ेहन में आज भी वैसी ही है, जैसी वर्ष 2004 में थी। यही वो खौफ़नाक वारदात थी, जिसने एक हँसते-खेलते परिवार को ख़त्म कर दिया था। इसी खौफ़नाक हत्या की वारदात को अंजाम देने से जुड़ा है शहाबुद्दीन का नाम, जो उस समय सुर्ख़ियों में बना रहता था। इसी तेज़ाबकांड के चलते शहाबुद्दीन को जेल जाना पड़ा और और सुप्रीम कोर्ट ने उसकी उम्र क़ैद की सज़ा को बरक़रार रखा।

बिहार के सीवान ज़िले में चंद्रशेखर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू अपनी पत्नी, बेटी और चार बेटों के साथ गुज़र-बसर कर रहे थे। उनकी दो दुकानें मेन बाज़ार में थी, इनमें से एक दुकान पर उनका बेटा सतीश और दूसरी दुकान पर उनका दूसरा बेटा गिरीश बैठता था। 16 अगस्त को कुछ लोग चंदा बाबू से रंगदारी माँग रहे थे, जो उन्होंने देने से मना कर दिया।

रंगदारी को लेकर हुए विवाद में चंदा बाबू की दुकानें लूट ली गईं। उनके तीनों बेटों को एक जगह लाया गया। उनके एक बेटे राजीव को रस्सी से बाँध दिया गया और सतीश और गिरीश के ऊपर तेज़ाब से भरी बाल्टी उड़ेल दी गई। बड़े भाई राजीव की आँखों के सामने उसके दोनों भाई तेज़ाब से जलकर मर गए। उसके बाद दोनों की लाश टुकड़े-टुकड़े कर बोरे में भरकर फेंक दिए गए। इसके बाद घटना के चश्मदीद गवाह राजीव की छह जून 2004 को गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 30 अक्टूबर को शहाबुद्दीन और तीन अन्य को 2004 के दोहरे हत्याकांड में दोषी ठहराने और उनकी सज़ा के फ़ैसले को बरक़रार रखा था। इस हत्याकांड में शहाबुद्दीन के ख़िलाफ़ IPC की धारा-302 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया था लेकिन, गिरफ़्तारी नहीं हुई थी। मगर वर्ष 2005 में बिहार की राजनीति में सत्ता बदली और शहाबुद्दीन पर शिकंजा कस गया। उसी साल शहाबुद्दीन को दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया था। तभी से शहाबुद्दीन को कड़ी निगरानी के बीच जेल में रखा गया। वीडियों कॉफ्रेंसिंग के माध्यम से ही अदालत में उसकी सुनवाई होती थी।

कॉल डिटेल और मोबाइल लोकेशन से धरे गए 3 नकाबपोश! JNU हिंसा में क्राइम ब्रांच कर सकती है खुलासा

दिल्ली पुलिस जल्द ही जेएनयू हिंसा के बाद उपद्रवियों की वायरल तस्वीर में सामने आए तीन आरोपितों की पहचान का खुलासा कर सकती है। क्राइम ब्रांच को तीनों नकाबपोशों से जुड़ी जानकारी मिली है। इन 3 आरोपितों में एक महिला और दो पुरुष हैं। तस्वीर में इनके मुँह पर कपड़ा और हाथ में लाठी साफ देखी जा सकती है। हिंसा वाले दिन इलाके में चालू फोन नंबर और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स के आधार पर इनकी पहचान की गई है। बताया जा रहा है कि सूचना मिलने के बाद अपनी जाँच में पुलिस ने इन तीनों छात्रों के नंबरों की लोकेशन हिंसा वाले दिन इलाके में चालू 800 नंबरों में शामिल पाई है।

बता दें कि पुलिस जेएनयू मामले में अपनी जाँच में उन अंदरूनी लोगों (मतलब ऐसे लोग, जिन्होंने कैंपस के अंदर की जानकारी बाहरी असामाजिक तत्वों तक पहुँचाई) के बारे में भी पता लगाने की कोशिश कर रही है, जिन्होंने उपद्रवियों को हॉस्टल में दिशा-निर्देश दिए। ऐसा इसलिए क्योंकि पुलिस की पड़ताल में कई छात्रों और हॉस्टल स्टॉफ ने खुलासा किया है कि हमलावरों को पहले से पता था कि उन्हें किस पर हमला बोलना है। वे बिना दरवाजा खटखटाए कमरों में घुस रहे थे और बेरहमी से मारपीट कर रहे थे।

उपद्रवियों की फुटेज और मास्क के बावजूद नजर आ रहे आधे चेहरे को देखकर अंदाजा लगाया गया है कि सभी उत्पाती 30 की उम्र से नीचे के और कॉलेज छात्र थे। अब पुलिस इन छात्रों की पहचान पता करने के लिए कुछ अन्य सीसीटीवी फुटेज, तस्वीरें और मोबाइल फुटेज एकत्रित करने में जुटी है, ताकि मालूम पड़ सके कि इससे पहले यूनिवर्सिटी के बाहर वैसे कपड़े किन छात्रों को पहने देखा गया।

घटना वाले दिन सामने आई वीडियोज की प्रमाणिकता जाँच के लिए उन्हें फॉरेंसिक लैब भी भेजा जा रहा है। साथ ही लोगों से अपील की जा रही है कि यदि उनके पास हिंसा की कोई अन्य वी़डियो है तो वह उसे पुलिस के साथ साझा करें। यहाँ बता दें कि रविवार की शाम जेएनयू के पेरियार और साबरमती हॉस्टल्स में 100-150 लोगों ने तोड़फोड़ मचाई थी। जिन सुरक्षाकर्मियों ने इन लोगों को हॉस्टल में घुसते देखा था उनसे इस संबंध में पड़ताल जारी हैं। पुलिस का कहना है कि हिंसा के दौरान वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मियों से घटनाक्रम के बारे में पूछा जाएगा और साथ ही ये भी पता लगाया जाएगा कि हमलावर कहाँ से आए। इसके अतिरिक्त हिंसा के दौरान परिसर में घुसने वाले वाहनों पर भी पुलिस की जाँच जारी है।

जानकारी के मुताबिक, उपद्रवियों को हमला करने से रोकने वाले सुरक्षाकर्मियों के बयानों को पुलिस ने बतौर चश्मदीद रिकॉर्ड किया है। जिन्होंने बताया है कि पेरियार हॉस्टर और साबरमती टी प्वॉइंट में हमला करने से पहले कंट्रोल पैनेल से ही लाइटें बंद कर दी गईं थीं।

बता दें कि अपनी जाँच के लिए क्राइम ब्रांच ने पेरियार और साबरमती हॉस्टल्स के करीब छात्रों, वार्डन, समेत हॉस्टल स्टाफ के 150 लोगों से बात की है। साथ ही उपद्रवियों की तस्वीरें उन्हें दिखाकर उनसे उनकी शिनाख्त करने के लिए कहा गया है। इसके अलावा रविवार की शाम पीसीआर को फोन करने वाले छात्रों को भी चश्मदीदों की सूची में रखा गया है।

JNU में वामपंथी छात्रों का समर्थन करने पहुँचीं दीपिका पादुकोण, मुंबई का फ़िल्मी गैंग भी सड़क पर

JNU प्रेसिडेंट आइशी घोष सहित 19 के खिलाफ FIR: मारपीट और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप

JNU हिंसा के दो चेहरे: जानिए कौन हैं नकाबपोशों का नेतृत्व करने वाली आइशी घोष और गीता कुमारी

सिंह चला गया लेकिन ‘माँ’ को सिंहगढ़ दे गया: बेटे की शादी छोड़ छत्रपति के लिए युद्ध करने वाले तानाजी

उमराठे के सूबेदार अपने बेटे की शादी की तैयारी में लगे हुए थे। आसपास के लोग और सूबे की जनता उत्साहित थी। पूरा परिवार उत्साहित था और माहौल ख़ुशनुमा था। तभी एक संदेशवाहक वहाँ पहुँचा। सन्देश था कि महाराज ने 12,000 लोगों के साथ आपको बुलाया है। आपको राजगढ़ पहुँचना है, जितनी जल्दी हो सके। बेटे की शादी को टाल दिया गया। सूबेदार ने तुरंत 12,000 लोगों को जुटाया और युद्ध के लिए निकल पड़े। हँसिया और लाठियों से लैस सेना लेकर चल पड़े राजगढ़। भारत के इतिहास में देश और मातृभूमि के प्रति ऐसा समर्पण दिखाने वाले काफ़ी कम लोग रहे हैं। यही सूबेदार थे- तानाजी। वही तानाजी, जिन्होंने छत्रपति शिवाजी के आदेश के अनुसरण के लिए अपने बेटे की शादी को टाल दिया।

दरअसल, शिवाजी जब सोच रहे थे कि सिंहगढ़ के किले को कैसे जीता जाए, तब उन्हें अपने पुराने विश्वस्त तानाजी का ख़्याल आया। तानाजी के नाम मन में आते ही उन्होंने तुरंत बुलावा दे भेजा। और तानाजी, देश के लिए बिना कुछ सोचे-समझे निकल पड़े, छत्रपति का जो आदेश था। जब वो अपनी सेना लेकर राजगढ़ जा रहे थे, तब रास्ते में ताम्बट पक्षी भी उनके ऊपर से उड़ रहा था। लोगों ने इसे एक अपशकुन माना। उनके चाचा शेलार ने उन्हें आगाह किया कि इस पक्षी का दिखना सही नहीं है और ये एक अपशकुन की निशानी है। हालाँकि, तानाजी ने हँसते हुए उनकी बात को टाल दिया।

जब हज़ारों सैनिकों का जत्था राजगढ़ पहुँचा तो वहाँ के लोगों को लगा कि मुग़ल फ़ौज़ आ गई। ख़ुद महारानी जीजाबाई को भी ऐसा ही लगा और उन्होंने शिवाजी से कहा कि युद्ध की तैयारी करनी चाहिए। हालाँकि, शिवाजी ने जैसे ही अपना ध्वज देखा, उन्होंने भाँप लिया कि तानाजी पहुँच गए हैं। तानाजी ने आते ही शिवाजी से शिकायत करने के अंदाज़ में कहा कि उन्हें अपने बेटे की शादी टाल कर यहाँ आना पड़ा, ऐसी भी क्या बात हो गई अचानक से। छत्रपति ने जीजाबाई की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये मेरा बुलावा नहीं था, महारानी का था। तानाजी उनके पुराने दोस्त थे, कभी-कभी छत्रपति को कठोर बातें भी कह दिया करते थे।

महारानी जीजाबाई ने तो सबसे पहले भवानी का आशीर्वाद लिया। उन्होंने माता को धन्यवाद दिया, जिनकी कृपा से तानाजी वहाँ पर पहुँचे। जीजाबाई ने प्यार से तानाजी को आशीर्वाद दिया और उन्हें अपने बच्चे की तरह पुचकारा। तानाजी हतप्रभ रह गए। उन्होंने तुरंत अपनी पगड़ी निकाल कर जीजाबाई के क़दमों में रख दिया और कहा कि माँ, आपको जो भी चाहिए वो बोलो क्योंकि आपका ये बेटा उसे लाकर देगा। जीजाबाई ने कहा कि उन्हें बस सिंहगढ़ पर विजय चाहिए। जीजाबाई ने तानाजी को अपना दूसरा बेटा और शिवाजी का छोटा भाई तक बता दिया। तानाजी भावुक हो उठे।

अजय देवगन अभिनीत फ़िल्म ‘तानाजी’ का ट्रेलर

महारानी जीजाबाई एक माँ थीं और उन्हें लगता था कि कहीं सिंहगढ़ में युद्ध के चक्कर में उनके बच्चे, तानाजी और उनकी सेना, कहीं भूखे न रह जाएँ। उन्होंने रास्ते के लिए भोजन दिया, जिसमें से वो सभी खाते। कहते हैं, जब वो खाते थे तो ख़ुद माँ भवानी उन्हें परोसने हेतु आती थीं। जीजाबाई ने हथियार और कपड़े देकर तानाजी और पूरी सेना को सिंहगढ़ के लिए विदा किया। तानाजी भी पक्के रणनीतिकार थे। उन्होंने गाँव के किसी धनवान व्यक्ति जैसी वेशभूषा बनाई और घने जंगलों से होते हुए दुश्मन के इलाक़े में पहुँचे। वहाँ कोली समुदाय के कुछ लोगों ने उन्हें बँधक बना लिया।

तानाजी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वो जंगल में एक शेर के आक्रमण से बच कर वहाँ शरण लेने आए हैं। कुछ ही देर बाद उन्होंने अपने साथ लाई सुपारी की खेप व अन्य वस्तुओं से उन लोगों का दिल जीत लिया। उन्होंने कोलियों को बताया कि वो छत्रपति शिवाजी की सेना के योद्धा हैं और उनसे किले के बारे में जानकारियाँ माँगीं। कोलियों का दिल जीतने के लिए उन्होंने उनमें आभूषण भी बाँटे। कोलियों ने उन्हें सब कुछ बताया। सिंहगढ़ वहाँ से 6 मील की दूरी पर था। सिंहगढ़ को जीतना इतना आसान नहीं था।

सिंहगढ़ की रखवाली करता था- उदयभान। वो ख़ुद एक बड़ा लड़ाका था। उसके अलावा 1800 पठान लगातार निगरानी में लगे रहते थे। अरबों की एक सेना भी वहाँ मौजूद रहती थी। ऐसे में, सिंहगढ़ को जीतना कोई आसान कार्य नहीं था। एचएस सरदेसाई अपनी पुस्तक ‘Shivaji, the Great Maratha‘ में लिखते हैं कि उदयभान भोजन में गाय और भेंड़ का माँस खाता था। उसकी 18 बीवियाँ थीं। उसके हाथी का नाम चन्द्रावली था, जो युद्ध के दौरान दुश्मन को रौंदने में हिंचकता भी नहीं था। उदयभान का सेनापति था सीदी हिल्लाल, जो उदयभान की तरह ही गायों और भेंड़ों का माँस खाया करता था। उसकी 9 बीवियाँ थीं। उदयभान के 12 बेटे भी थे, जो अपने पिता से ज़्यादा ताक़तवर थे।

कोलियों ने तानाजी को कुछ रणनीति भी बताई, जिसके बाद तानाजी ने उन्हें वापस लौटने पर इनाम देने का वादा किया। उसी रात तानाजी और उनकी सेना ‘कल्याण गेट’ पर पहुँची, जहाँ से उन्होंने अपने कुछ विश्वस्त सिपाहियों को अंदर जाने को कहा। कुछ ही देर बाद तानाजी के भाई सूर्या हज़ारों सैनिकों के साथ अंदर घुस गए। युद्ध हुआ और तानाजी की विजय हुई। तुरंत ही किले पर से आक्रांताओं का झंडा उखाड़ फेंका गया और वहाँ शिवाजी का भगवा ध्वज लहराने लगा। मराठा साम्राज्य के अधिपति छत्रपति शिवाजी का भगवा महाध्वज। पाँच तोपों की सालामी में साथ घोषित किया गया कि शिवाजी ने सिंहगढ़ के किले को जीत लिया है।

लेकिन मराठा साम्राज्य ने इस युद्ध की क़ीमत चुकाई थी। वो क़ीमत थी- तानाजी की जान। तानाजी अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करने के बाद ज़िंदा नहीं बचे। उन्होंने वीरगति प्राप्त की। लेकिन हाँ, एक माँ को किया हुआ वादा उन्होंने निभाया। शिवाजी ने अपने पुराने दोस्त और एक विश्वस्त योद्धा की मृत्यु का समाचार सुनते ही कहा- “सिंहगढ़ तो आ गया लेकिन सिंह चला गया।” तानाजी के भाई सूर्याजी को उस किले का स्वामी बनाया गया। सूर्याजी ने बाद में अपनी वीरता का प्रदर्शन कर के पुरंदर के किले को भी जीत लिया।

तानाजी, जिन्होंने अपनी माँ की इच्छा पूरी करने के लिए अपनी जान दे दी। लेकिन हाँ, मरते-मरते वो अपनी माँ से किया वादा निभा गए। माँ और मातृभूमि के लिए ऐसे समर्पण को प्रदर्शित कर वो वीरगति को प्राप्त हुए। ये कहानी हर भारतवासी के हृदय में होनी चाहिए।

Uber ड्राइवर आफ़ताब ने शिवाजी को दी माँ की गाली, यात्री के मना करने पर बौखलाया

इतिहास से छेड़छाड़, पुनः लिखने की जरुरत: शिवाजी, ज्ञानेश्वर, लक्ष्मीबाई, शंकराचार्य… के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं

भारत एक हिन्दू राष्ट्र और इससे कोई समझौता नहीं, हनुमान और शिवाजी RSS के आदर्श: भागवत

गीता और आइशी के बाद अब देखिए कॉमरेड चुनचुन का वीडियो, डंडा लेकर कर रहा था पत्थरबाजी

कॉमरेड चुनचुन- ये वो नाम है, जो वामपंथी छात्र संगठन आइसा से जुड़ा हुआ है। एक हाथ में डंडा और दूसरे हाथ में पत्थर- यही इसका रूप है। हाथ में डंडा लिए पत्थरबाजी करते वामपंथी छात्र नेता चुनचुन कुमार को पेरियार हॉस्टल के बाहर देखा गया। उसके साथ अन्य वामपंथी गुंडे भी थे। वो सभी मिल कर लगातार हिंसा कर रहे थे। कॉमरेड चुनचुन की ये हरकत कैमरे में क़ैद हो गई और जेएनयू में हिंसा कौन फैला रहा था, इसकी तस्वीर भी साफ़ हो गई। इससे पहले और भी कई वामपंथी छात्रों के ऐसे कई वीडियो वायरल हो चुके हैं।

हमनें गीता कुमारी के एक वीडियो के बारे में बताया था। गीता जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष रही हैं। अभी भी वो वामपंथी छात्र नेता हैं। वो नकाबपोश गुंडों के साथ हमले की साज़िश रचते देखी गईं। वीडियो में एक शख्स उन्हें समझाता दिखाई दे रहा है लेकिन वो गुंडों के साथ व्यस्त हैं। इसी तरह छात्र संघ की वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष का भी वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि आइशी नकाबपोश गुंडों को हॉस्टल में घुसा रही है। इन्हीं वामपंथी गुंडों ने आतंक मचाया। फिलहाल आप कॉमरेड चुनचुन के वीडियो को देखिए:

जेएनयू हिंसा को लेकर एक अजीब बात ये है कि जिन वामपंथी गुंडों ने एबीवीपी के छात्रों को चुन-चुन कर पीटा, वही वामपंथी बाद में ख़ुद को पीड़ित भी दिखाने लगे। लगातार पोल खुलने के बावजूद बॉलीवुड सेलेब्रिटीज और विपक्षी नेताओं के समर्थन से ये वामपंथी ख़ुद को निर्दोष बता कर उलटा एबीवीपी पर ही आरोप लगाते रहे। यहाँ तक कि अभिनेत्री दीपिका पादुकोण भी उनके समर्थन में JNU पहुँचीं। अनुराग कश्यप और जावेद अख़्तर सरीखों ने हिंसक वामपंथियों को बचाने के लिए सोशल मीडिया में अभियान चलाया।

एक के बाद एक लगातार सामने आ रहे वीडियो में वामपंथियों की पोल खुल रही है। इन्होने दंगे किए, पत्थरबाजी की, छात्रों की पिटाई की और जेएनयू की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। बावजूद इसके इन्हें बॉलीवुड के लोगों का समर्थन लगातार मिल रहा है। सरकार और पुलिस को ही उलटा निशाना बनाया जा रहा है। एबीवीपी के कई पीड़ित छात्र हॉस्पिटलों में भर्ती हैं लेकिन सेलेब्रिटीज में से किसी ने भी उनकी परवाह नहीं की। एक कॉमरेड चुनचुन का वीडियो आने के बाद नए सिरे से उनकी पोल खुलती दिख रही है।