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प्रोफेसरों व वामपंथी छात्रों ने मिल कर किया प्रताड़ित: JNU के छात्र मनीष ने बताया कैसे ‘मीडिया’ भी है साज़िश में शामिल

ऑपइंडिया ने कुछ ऐसे छात्रों से बातचीत की, जिन्हें जेएनयू में जनवरी 5, 2020 के दिन हुई हिंसा के दौरान वामपंथियों ने निशाना बनाया। इन छात्रों में एक मनीष जांगिड़ भी हैं, जिनका हाथ टूट गया। उनके हाथ पर प्लास्टर अभी भी देखा जा सकता है। वो अलग बात है कि जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आइशी घोष के पूरे सिर में लगी हुई मरहम-पट्टी अब बस एक स्टीच तक सिमित हो गई है। मनीष एबीवीपी के छात्र नेता हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि जेएनयू में नवंबर 28, 2019 को हॉस्टल फी बढ़ाने के ख़िलाफ़ छात्रों ने आंदोलन शुरू किया।

उन्होंने बताया कि एबीवीपी ने भी आम छात्रों के उस आंदोलन को समर्थन दिया, जो एबीवीपी को रास नहीं आया। उन्होंने कहा कि जब आम छात्रों को वामपंथियों की सच्चाई का पता चलने लगा, तो उन्होंने हॉस्टल वार्डन्स के घरों पर हमला शुरू कर दिया। उनके परिवारों को परेशान किया गया। बकौल मनीष, एक गर्भवती महिला के घर को भी निशाना बनाया गया और उनके घर में शीशे के बोतल फेंके गए। वो महिला वार्डन थी। कुल 500 वामपंथी छात्रों ने मिल कर ये सब किया। मनीष ने आगे बताया कि इसी तरह 8-9 नवंबर को डीन वंदना मिश्रा जब क्लास लेने गईं, तब उन्हें 30 घंटे तक बंधक बना कर रखा गया। उनके कपड़े फाड़े गए और उन पर दबाव बनाया गया कि वो इस्तीफा दें और यूनिवर्सिटी छोड़ कर जाएँ।

मनीष ने मुख्यधारा की मीडिया के एक बड़े वर्ग से नाराज़गी जताते हुए कहा कि उन्होंने पूरे मुद्दे को कवर करने में पक्षपात किया। उन्होंने वामपंथियों के आंदोलन के आपत्तिजनक नारों, जैसे- “भगवा जलेगा” और “हिंदुत्व की कब्र खुदेगी” पर आपत्ति जताई। मनीष ने याद दिलाया कि कैसे स्वामी विवेकानंद की उस प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ की गई, जिसका अभी अनावरण भी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि फी हाइक को लेकर हुए आंदोलन को सीएए विरोधी आंदोलन में बदल दिया गया और बाद में परीक्षाओं का बहिष्कार किया जाने लगा।

मनीष ने कुछ प्रोफेसरों के बारे में भी बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि उन प्रोफेसरों ने वामपंथियों का साथ देते हुए बाकी छात्रों को डराया-धमकाया और उन्हें पढ़ाना बंद कर दिया। इन प्रोफेसरों ने परीक्षाओं और असाइनमेंट्स लेने बंद कर दिए। जब ऑनलाइन परीक्षा का प्रावधान आया, तब उन स्कूलों में परीक्षाएँ सही से नहीं हो पाईं, जहाँ वामपंथी शिक्षकों की तादाद ज़्यादा थी। मनीष ने इसी तरह आगे बताया कि नए सेमेस्टर के रजिस्ट्रेशन में भी व्यवधान डाला गया। उन्होंने बताया कि कम्युनिकेशन सेंटर में वामपंथी छात्र नेता गीता कुमारी और अपेक्षा प्रियदर्शनी सहित अन्य वामपंथी छात्रों ने सर्वर रूम को तोड़ डाला।

वामपंथी छात्रों ने आख़िर इंटरनेट बंद क्यों किया? मनीष ने इसका जवाब देते हुए बताया कि सर्वर रूम में ही वो सारी सीसीटीवी फुटेज थी, जिनसे वामपंथियों की पोल खुल सकती थी कि उन्होंने कैसे तोड़फोड़ मचाई व गुंडागर्दी की। इसीलिए, उन्होंने सर्वर रूम को ही क्षतिग्रस्त कर दिया। अर्थात, जम्मू कश्मीर में ‘फ्री इंटरनेट’ की माँग करने वालों को जेएनयू में इंटरनेट रास नहीं आया। इन छात्रों में जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आईसी घोष भी शामिल थीं। इसके बाद वामपंथियों ने ‘पीस मार्च’ के नाम पर 500 छात्रों का हुजूम जुटाया और सर्वर रूम में फिर तोड़फोड़ मचाई।

मनीष ने बताया कि रजिस्ट्रेशन करने गए अन्य छात्रों पर लाठी-डंडे और पत्थर से हमला कर दिया गया। उन्होंने बताया कि वामपंथी भीड़ ने रजिस्ट्रेशन करने गए छात्रों पर हमला कर दिया लेकिन वहाँ गार्ड्स के हस्तक्षेप के बाद मामला सुलझ गया। उन्होंने बताया कि पेरियार हॉस्टल में, साबरमती और माही-मांडवी में हमले किए गए। इन तीनों हॉस्टलों को इसीलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वहाँ एबीवीपी के छात्र अच्छी संख्या में हैं। मनीष ने उस दिन को याद करते हुए बताया कि जम्मू कश्मीर के उपद्रवियों के तर्ज पर नकाबपोश लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। मनीष ने बताया कि वो अपने साथियों के साथ एक कमरे में छिप गए।

मनीष ने भीड़ का नेतृत्व करने वाले सतीश चंद्र यादव का नाम लिया, जो जेएनयू छात्र संघ में जनरल सेक्रेटरी हैं। मनीष ने बताया कि भीड़ ने आईशी, सुचेता सहित अन्य छात्रों ने डंडे से उन पर हमला कर दिया और भागने के क्रम में उनकी इतनी पिटाई की गई कि वो बेहोश हो गए। बकौल मनीष, जब उनको होश आया तो उन्हें लोग एम्स में लेकर गए। वहाँ जेएनयू के कुछ प्रॉफेसर और वामपंथी नेता वृंदा करात पहले से ही मौजूद थें, जो इलाज के कार्य में बाधा डाल रहे थे। मनीष ने बताया कि उनके साथ शिवम चौरसिया और उज्जवल का सिर फूट गया। इसी तरह उनके साथी शेषमणि साहू भी काफ़ी घायल हो गए थे।

इसके बाद प्रियंका गाँधी और कमलनाथ सहित कॉन्ग्रेस के कई नेता वहाँ पहुँचे। कई वकीलों ने भी अपने आप को जेएनयू का पूर्व-छात्र बताते हुए ट्रामा सेंटर में घुस गए। मनीष ने बताया कि जब उन्होंने वामपंथियों के उत्पात की बात प्रियंका को बताई तो उन्होंने मुँह फेर लिया और चली गईं। मनीष ने बताया कि जहाँ एक तरफ़ घायल छात्रों को प्रियंका ने नज़रअंदाज़ किया, वामपंथी छात्रों को घायल बताते हुए मरहम-पट्टी के साथ हॉस्पिटल बेड पर सुला दिया गया। इनमें एक सूरी नामक छात्र भी है, जो इस घटना के बाद केरल गया और वहाँ उसका फूल-मालाओं से स्वागत हुआ। इसी तरह जिन वामपंथी छात्रों को खरोंच तक नहीं आई थी, उन्हें घायल बता कर लिटा दिया गया।

मनीष ने बताया कि योगेंद्र यादव, डी राजा और सीताराम येचुरी सहित कई नेता तुरंत पहुँच गए। मनीष ने कहा कि मीडिया का एक वर्ग भी उपद्रवियों से मिला हुआ था। उन्होंने सवाल दागा कि आख़िर इतने वामपंथी नेता जेएनयू में तुरंत कैसे पहुँच गए? मनीष ने कहा कि जामिया के कई छात्रों ने जेएनयू में डेरा डाला था और नकाबपोश गुंडों में अधिकतर जेएनयू के थे। मनीष व उनके साथियों ने जामिया के छात्रों की कैम्पस में संदिग्ध उपस्थिति को लेकर प्रशासन से शिकायत भी दर्ज कराई थी।

राहुल कँवल के बारे में मनीष ने बताया कि वो आईशी घोष सहित 33 छात्रों के घायल होने की बात करते हैं लेकिन उन्हें बस आइशी का नाम ही मालूम होता है। मनीष ने आरोप लगाया कि आईशी की मेडिकल रिपोर्ट में धाँधली हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि गीता कुमारी का नाम आया, तब मीडिया वालों ने उनके बारे में ये नहीं बताय कि वो जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष रह चुकी हैं और वामपंथी नेता हैं, उन्हें आम छात्र बना कर पेश किया गया। मनीष ने दिल्ली पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र करते हुए कहा कि पुलिस ने आइसा, एसएफआई, डीएफएस और एआईएसएफ को पूरी साज़िश का रणनीतिकार बताया।

जिस छात्र के हवाले से एबीवीपी को दोषी ठहराया जा रहा है, उसका स्टिंग करने वालों का आम आदमी पार्टी से कनेक्शन निकल कर सामने आ रहा है। ऐसे में मनीष ने अंदेशा जताया कि इस पूरी साज़िश के पीछे आगामी दिल्ली चुनाव कहीं न कहीं केंद्र में है। उन्होंने अवस्थी को लेकर राहुल कँवल के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठन पर आरोप लगाने वाले कँवल के एकमात्र उद्देश्य ये है कि दिल्ली पुलिस को लेकर ग़लतफ़हमी फैला सकें। मनीष ने आरोप लगाया कि ‘इंडिया टुडे’ ने उनसे बातचीत की लेकिन सोशल मीडिया में हर जगह से उस वीडियो को हटा दिया गया।

मनीष ने आरोप लगाया कि राहुल कँवल और उनका चैनल पहले सब सेट करता है कि किसे क्या बोलना है, फिर कैमरे से शूट कर के टीवी पर दिखाया जाता है। मनीष ने इतिहास की याद दिलाते हुए कहा कि 1983 में किस तरह वामपंथी संगठनों ने तत्कालीन वीसी और एक हॉस्टल वार्डन के घर में घुस कर आतंक मचाया गया। मनीष ने कहा कि उस समय एबीवीपी का कोई अस्तित्व नहीं था और जेएनयू में पक्ष से लेकर विपक्ष तक वामपंथियों का ही दबदबा था। उन्होंने याद दिलाया कि उस घटना के बाद जेएनयू को 1 वर्ष के लिए बंद कर दिया गया था।

मनीष ने बताया कि वामपंथी जेएनयू में वही कर रहे हैं, जैसा उन्होंने चीन और इजरायल में अपना अस्तित्व बचाने के लिए हिंसा की। मनीष ने कहा कि उनके नाम पर परचा बाँट कर कहा गया कि एबीवीपी वालों का बॉयकॉट किया जाए। मनीष ने कहा कि जब तक जेएनयू में एबीवीपी के कार्यकर्ता मौजूद हैं, वो जेएनयू को बदनाम नहीं होने देंगे।

इनकी टूटी हड्डियाँ भी देखो रवीश! अजीत भारती का वीडियो | Stop propaganda on JNU

रवीश कुमार का मुख्य लक्ष्य जेएनयू की हिंसा और उसकी जाँच है और इसमें भी कैसे इनकी जाँच, ऑल्ट न्यूज वाले की जाँच और तीन-चार टूटपूँजिया पोर्टल की जाँच पुलिस की जाँच से बेहतर है। शुरू में रवीश जी कह रहे थे कि पुलिस केस क्यों नहीं दर्ज कर रही, पुलिस दोषियों को पकड़ क्यों नहीं कर रही है? और जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा है तो रवीश जी ने लंबे-लंबे प्रपंची पोस्ट लिखे हैं।

एबीवीपी के बच्चों के हाथ तोड़े गए, कलाई तोड़ी गई, ऊँगलियाँ तोड़ी गई, सर पर 6-6 टाँके हैं, गर्दन पर रॉड से मारा गया और एक बच्चे को इतना मारा गया कि वो वहीं पर बेहोश हो गया। उसे याद नहीं था कि बेहोश होने के बाद उसे कौन उठाकर ले गया। जिन मीडिया वालों के पास करोड़ों का इंफ्रास्ट्रक्चर है, वो इन बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं। जो बच्चे अपनी आवाज पहुँचाने के लिए ऑपइंडिया जैसी छोटी संस्थान के पास आ रहे हैं, क्या एनडीटीवी की टीम उन बच्चों तक नहीं पहुँच सकती? 

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें

FACT CHECK: क्या CAA के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही है पुलिस? जानें इन तस्वीरों का सच

नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर जहाँ एक तरफ़ खुल कर हिन्दू विरोधी अजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ वामपंथियों की मंडली दुष्प्रचार व अफवाह फैलाने में भी लगी हुई है। इसी क्रम में कुछ फोटो वायरल हो रहे हैं, जिनमें कुछ पुलिसवालों को सीएए विरोधी तख्तियाँ लेकर सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते हुए देखा जा सकता है। इन तस्वीरों में पुलिसकर्मी “नो सीएए, नो एनआरसी”, “वी अपोज एनआरसी एन्ड सीएए”, “मासूमों पर लाठीचार्ज अब हमसे न हो पाएगा” और “नो एनआरसी, नो कैब” लिखी तख्तियाँ लेकर धरना देते हुए दिख रहे हैं।

इन तस्वीरों को फेसबुक और ट्विटर पर हज़ारों बार शेयर किया गया। दरअसल, इन तस्वीरों को फोटोशॉप किया गया है। तख्तियों में लिखी गई बातों को एडिट कर के पूरी तरह बदल दिया गया है। ये फोटो तब का है, जब वकीलों और दिल्ली पुलिस के बीच संघर्ष भड़क गया था। वकीलों ने दिल्ली पुलिस पर हमला कर दिया था और उन पर पत्थरबाजी की थी। यहाँ तक कि इस फोटोशॉप्ड तस्वीर को फ़िल्म निर्माता अपर्णा सेन ने भी शेयर किया:

इस फोटो को ‘द वीक’ ने नवंबर 5, 2019 को शेयर किया गया था। ख़बर थी कि वकीलों द्वारा की गई हिंसा के ख़िलाफ़ पुलिसकर्मियों के प्रदर्शन पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट तलब की है। इस तरह से नवंबर 2019 की ख़बर को जनवरी 2020 में बदल कर पेश किया जा रहा है। असली तस्वीर में तख्तियों पर लिखा हुआ है- “Policemen are also humans” और एक वकील के फोटो साथ “Arrest Him” भी लिखा हुआ है। असली तस्वीर को यहाँ देखें:

असली फोटो: वकीलों के ख़िलाफ़ धरना देती पुलिस

उस समय दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पार्किंग को लेकर दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच विवाद हो गया था, जिसमें बाद में हिंसक संघर्ष के रूप ले लिया था। उसके बाद वकीलों ने पुलिसकर्मियों को पीटना शुरू कर दिया था। इसीलिए, ये सीएए विरोधी पोस्ट की फोटो नहीं है।

CM पद से इस्तीफा दे देंगे उद्धव ठाकरे: महाराष्ट्र गठबंधन में बढ़ती कलह के बीच कॉन्ग्रेस नेता का बयान

क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे राज्य की सत्ताधारी गठबंधन में चल रही कलह से परेशान होकर CM पद से इस्तीफा देने की सोच रहे हैं? ये किसी विपक्षी नेता ने नहीं बल्कि उनकी ही सहयोगी पार्टी के नेता ने दावा किया है। कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद यशवंत राव गडाख ने कहा है कि अगर शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस गठबंधन के नेता इस तरह लड़ते रहे तो उद्धव मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने इस दौरान अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा। यशवंतराव ने कहा कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी के नेतागण बँगलों और विभागों के आवंटन में लगातार बाधा डाल रहे हैं।

ख़ुद शिवसेना नेताओं ने भी स्वीकारा है कि गठबंधन में मंत्रियों को विभाग आवंटन के मुद्दे पर खींचतान चल रही है। महाराष्ट्र में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में 36 नए मंत्री बनाए गए थे, जिसके बाद से ही तीनों दलों में कई नेताओं के नाराज़ होने का दौर जारी है। ऑपइंडिया ने एक ख़बर में बताया था कि कॉन्ग्रेस के अधिकतर विधायक ग्रामीण इलाक़ों से जीत कर आए हैं। ऐसे में, पार्टी को सहकारिता, कृषि और ग्रामीण सम्बन्धी एक भी विभाग न मिलना पार्टी नेताओं के बीच नाराज़गी की वजह बन रही है।

कुछ दिनों पहले पुणे के कॉन्ग्रेस नेताओं ने अपनी ही पार्टी के दफ्तर में जम कर तोड़फोड़ मचाई थी। वहीं शिवसेना के नाराज़ विधायकों की संख्या भी एक दर्जन के क़रीब बताई जा रही है। कई मंत्री इसीलिए भी परेशान हैं कि उन्हें मलाईदार मंत्रालय नहीं दिए गए। रामदास कदम, रवींद्र वायकर, शिवसेना नेता दिवाकर रावते और दीपक केसरकर पिछली राजग सरकार में मंत्री थे और इस बार उन्हें किनारे कर दिया गया है।

सारे मलाईदार मंत्रालय शरद पवार की पार्टी के पास चले गए हैं, ऐसे में कॉन्ग्रेस और शिवसेना नेताओं में नाराज़गी का कारण स्पष्ट है। कुछ विधायक मंत्रिमंडल विस्तार में परिवारवाद को बढ़ावा दिए जाने के कारण भी नाराज़ हैं। इन्हीं कारणों से कॉन्ग्रेस नेता यशवंतराव ने कहा कि उद्धव ठाकरे क्रोधित होकर इस्तीफा दे सकते हैं।

दिल्ली में सरकारी जमीनों पर बनी ‘अवैध’ मस्जिदों का टूटना निश्चित: BJP सांसद का दावा

पश्चिमी दिल्ली से भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा ने एक बार फिर दिल्ली में सरकारी जमीन पर बनी मस्जिदों के टूटने की बात की है। उन्होंने प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए ये मुद्दा उठाया।

उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दावा किया कि सरकारी जमीन पर बनी मस्जिदों का टूटना निश्चित है। इसके अलवा उन्होंने कहा अगर दिल्ली में भाजपा सत्ता में आती है तो गरीबों को सिर्फ एक रुपए प्रति माह में बिजली और पानी दिया जाएगा। साथ ही उन्‍होंने बताया, “200 यूनिट प्रति माह की बाध्यता नहीं रहेगी, जरूरत के अनुसार बिजली मिलेगी। अमीरों को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।”

गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है जब प्रवेश वर्मा ने ‘अवैध’ मस्जिदों से जुड़े मुद्दे को सार्वजनिक तौर पर उठाया। इससे पहले वे इस संबंध में 18 जून को दिल्ली के उपराज्यपाल को पत्र लिख चुके हैं। उस पत्र में उन्होंने आरोप लगाया था कि देश की राजधानी में कई मस्जिदों का निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध रूप से किया गया है।

भाजपा सांसद ने उस दौरान माँग की थी कि ऐसी मस्जिदों को सरकारी जमीन से हटाया जाए। हालाँकि, दिल्ली माइनॉरिटी कमिशन (डीएमसी) ने दावा किया था कि प्रवेश वर्मा के आरोप में कोई सच्‍चाई नहीं है।

बता दें, साल 2019 के जून महीने में आधिकारिक रूप से ये मामला उठाने के बाद प्रवेश वर्मा ने धमकियाँ तक मिलीं। जिसके मद्देनजर उन्हें जून 20, 2019 को पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को चिट्ठी लिखकर जानकारी देनी पड़ी कि उन्हें फोन पर एसएमएस भेजकर और सोशल मीडिया के जरिए जान से मारने की धमकियाँ दी गई।

उन्होंने उस समय इस मामले की जाँच कर आरोपितों का पता लगाने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की माँग की थी। साथ ही सरकारी जमीनों पर लगातार हो रहे अतिक्रमण को लेकर उपराज्यपाल अनिल बैजल से जुलाई में मुलाकात की थी।

उपराज्यपाल से मुलाकात के दौरान 54 ऐसी सरकारी जमीनों की लिस्ट उपराज्यपाल को सौंपी गई थी, जिन पर अवैध रूप से मजार, मस्जिद और कब्रिस्तान बनाए गए। जिसके बाद उपराज्यपाल ने आश्वासन दिया था कि इन सभी जगहों की पड़ताल की जाएगी और अगर ऐसा कुछ पाया जाएगा तो उन कब्जों को हटाया जाएगा।

अवैध कब्जे वाली जगह (लिस्ट-1)
लिस्ट-2

काशी विश्वनाथ मंदिर में फिलहाल कोई ड्रेस कोड नहीं लागू: प्रशासन ने किया खंडन

सोमवार (जनवरी 13, 2020) को ख़बर आई थी कि काशी विश्वनाथ मंदिर में स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड लागू किया गया है। कई बड़े संस्थानों ने इस ख़बर को चलाया था। अब, वाराणसी के कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने इस ख़बर को नकार दिया है। सभी मीडिया संस्थानों को वीडियो के माध्यम से सम्बोधित करते हुए अग्रवाल ने कहा कि एक औपचारिक बैठक के दौरान ऐसा सुझाव दिया गया था लेकिन इसे लागू नहीं किया गया है। कमिश्नर अग्रवाल ने कहा कि मीडिया में चल रही ख़बरें ग़लत हैं और वो उनका खंडन करते हैं।

मीडिया ने ख़बरें चलाई थीं कि पुरुषों के लिए कुर्ता-धोती और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है, अगर वो स्पर्श दर्शन करना चाहते हैं। सच्चाई ये है कि अधिकारियों के साथ हुई बैठक में सुबह 4-11 बजे तक होने वाली स्पर्श दर्शन में ऐसा ड्रेस कोड लागू करने का प्रस्ताव दिया गया था। अभी तक ये प्रस्ताव लागू नहीं किया गया है और न ही ऐसा कोई नियम बना है। इस बैठक में वाराणसी के डीएम कौशल राज शर्मा शामिल थे। वो मंदिर न्यास के सीईओ भी हैं।

काशी विद्वत परिषद के रामनारायण द्विवेदी ने ऑपइंडिया को बताया कि परिषद की बैठक में ये प्रस्ताव रखा गया था कि सुबह की आरती और दर्शन के समय जो लोग शिवलिंग का स्पर्श दर्शन करना चाहते हैं या फिर स्पर्श कर के पूजन करना चाहते हैं, उनके लिए ड्रेस कोड तय किए जाएँ। प्रस्ताव के अनुसार, स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड तय करने पर चर्चा हुई है। लेकिन सामान्य दर्शन के लिए साड़ी या धोती-कुर्ते जैसे ड्रेस कोड तय करने की बात नहीं हुई।

इस बैठक में काशी विद्वत परिषद के प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रोफेसर रामचंद्र पांडेय, प्रोफेसर रामकिशोर, प्रोफेसर दिनेश गर्ग और प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी शामिल थे। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के धर्मार्थ मंत्री नीलकंठ त्रिपाठी और न्यास के सीईओ भी शामिल थे। प्रोफ़ेसर रामनारायण द्विवेदी ने ऑपइंडिया को बताया कि परिषद का काम सुझाव देना है और मंदिर प्रशासन नियम को लागू करता है।

फ़र्ज़ी स्टिंग वाली ‘इंडिया टुडे’ के झूठ का वजन भारी हो गया है, सवालों से कब तक भागते फिरेंगे कँवल?

‘इंडिया टुडे’ अपनी पत्रकार तनुश्री पांडेय के साथ ‘खड़ा’ है। 2016 में जेएनयू छात्र संगठन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुका सन्नी धीमन वाकर कहता है कि पांडेय ‘गोदी मीडिया’ को बेनकाब करने के लिए खड़ी हैं। लेकिन, ऑपइंडिया आपको बता चुका है कि किस तरह तनुश्री वामपंथी छात्र नेता साकेत मून के सर्वर रूम तोड़ने के बयान के साथ खड़ी दिखती हैं। वही साकेत मून, जिसने अफवाह फैलाई थी कि जेएनयू में सीआरपीएफ को तैनात कर दिया गया है, 8500 छात्रों को गिरफ़्तार किया गया है। उधर राहुल कँवल अपने फ़र्ज़ी स्टिंग ऑपरेशन के साथ खड़े हैं, जिसका न सिर है और न पाँव।

‘इंडिया टुडे’ ने तनुश्री और वामपंथी छात्र नेताओं के बीच हुई कानाफूसी को एक ‘सामान्य प्रक्रिया’ बताया है। अगर ऐसा है तो शायद चैनल की हर स्टोरी पर संदेह किया जाना चाहिए क्योंकि सामने वाले को कोचिंग देकर और उसके साथ पूरी सेटिंग कर के ख़बर बनाने को उसने अपने लिए एक समान्य प्रक्रिया कहा है। स्टिंग भी ऐसा, जिसमें एक 19-20 साल के छात्र को अपने सीनियर को निर्देशित करने की बात बता कर, उसे ABVP का घोषित करने की पूरी कवायद की गई। जो थोड़ी देर में ही फेल हो गया।

अपनी पीठ थपथपाते हुए ‘इंडिया टुडे’ ने अपने कथित इन्वेस्टीगेशन को ‘पाथ ब्रेकिंग’ करार दिया है। जब ऑपइंडिया ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि ‘वो लोग’ किसी दूसरे पब्लिकेशन को बयान नहीं देते। बाद में इन्हीं कँवल ने दावा किया कि कई चैनलों के पत्रकारों से उनकी बात हुई है और उन सभी ने उन्हें बधाइयाँ दी हैं। बात भी नहीं करते हैं, निष्पक्षता का दावा भी करते हैं और बधाइयाँ भी लेते हैं। सवालों का जवाब टालना तो भला कोई उनसे सीखे।

ऑपइंडिया को सूत्रों से यहाँ तक पता चला है कि जेएनयू की हिंसा में जामिया के छात्रों के भी हाथ हैं। जामिया वाला नाटक फेल हो गया, लदीदा-फरज़ाना की ब्रांडिंग के पीछे की साज़िश बेनकाब हो गई, जेएनयू हॉस्टल फी वाला आंदोलन निष्फल हो गया और सीएए पर सरकार ने डट कर अफवाहों को काटा। क्या इससे बौखलाए वामपंथियों ने जेएनयू में हिंसा की साज़िश रची?

‘इंडिया टुडे’ ने कहा है कि उसकी छवि ख़राब करने के लिए तनुश्री वाली वीडियो का सहारा लिया जा रहा है। अगर ऐसा है तो कोई ऑडियो या वीडियो क्लिप जारी कर के चैनल को हमारे सारे सवालों के जवाब दे देने चाहिए। क्या खुसुर-पुसुर हो रहा था? एबीवीपी की छवि ख़राब करने के लिए फ़र्ज़ी स्टिंग करने वालों को अब अपनी छवि की पड़ी है। एबीवीपी के छात्रों की पिटाई की गई। महिला छात्रों तक को नहीं बख्शा गया। नेत्रहीन छात्र को भी मारा-पीटा गया।

जेएनयू छात्र संगठन की वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोश, पूर्व अध्यक्ष गीता के नकाबपोशों के साथ वीडियो वायरल हुए। लठैत कॉमरेड चुनचुन पत्थरबाजी करता देखा गया। प्रमाण को परदे के पीछे ले जाने के लिए फालतू के फ़र्ज़ी खुलासे किए जा रहे हैं और ऊपर से चैनल अपने ही मुँह मियाँ मिट्ठू भी बन रहा है।

जब जेएनयू छात्र संघ का कार्यकर्ता अक्षत ही एबीवीपी का नहीं है तो फिर उसी को आधार बना कर स्टिंग करने और कथित खुलासा करने वाले ‘इंडिया टुडे’ को माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए क्या? जेएनयू हॉस्टल फी बढ़ोतरी को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन में अक्षत की फोटो निकाल कर इसे एबीवीपी की रैली बताया गया। हिंसा वाले दिन दोपहर 3 बजे जब वेलेंटिना ब्रह्मा को मारा जा रहा था, तब यही अक्षत वामपंथी गुंडों के साथ देखा जाता है। सबकुछ प्रमाण के साथ प्रत्यक्ष हो चुका है लेकिन कँवल को रवीश वाली थेथरई का बुख़ार कई गुना ज़्यादा इंटेंसिटी के साथ चढ़ गया है।

दावे कीजिए लेकिन सवालों के जवाब भी दीजिए। दूसरे पब्लिकेशंस से सवाल न लेने का दावा करना और उनसे ही फिर बधाई मिलने का प्रचार करना, ऐसे दोहरे रवैये के सामने तो पुराने वामपंथी भी चित हो जाएँ। तभी कुछ लोग अब आपको ‘कॉमरेड राहुल कँवल’ कह रहे हैं।

हिंसा के 28 दिन बाद जामिया की VC ने दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ दिया बयान, छात्रों ने कहा- हमें यकीन नहीं

जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में 15 दिसंबर को सुरक्षा के लिहाज से कैंपस में दाखिल हुई पुलिस की कार्रवाई को लेकर छात्रों ने आज यानी सोमवार को कुलपति नज़मा अख्तर के दफ्तर का घेराव किया। छात्रों ने दफ्तर के बाहर नारेबाजी करते हुए कैम्पस में पुलिस कार्रवाई को लेकर एफआईआर दर्ज करवाने की माँग की। जिसके बाद कुलपति अख्तर ने घटना के 28 दिन बाद मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि हमारे कैम्पस में पुलिस बिना पूछे दाखिल हुई थी, और उन्होंने मासूम छात्रों को पीटा था।

नजमा अख्तर के अनुसार पुलिस उनकी एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है, इसलिए उन्होंने इस संबंध में सरकार से शिकायत की है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट्स के अनुसार नजमा अख्तर ने छात्रों से बात करते हुए भरोसा दिलाया कि जरूरत पड़ी तो वह हाईकोर्ट भी जाएँगे। लेकिन बावजूद इसके छात्रों ने प्रदर्शन जारी रखा। उन्होंने कहा कि हमें कुलपति की बातों पर भरोसा नहीं है।

गौरतलब है कि जामिया छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर दिल्ली पुलिस के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने के आरोप लगाए हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों द्वारा कार्रवाई की माँग की जा रही है। साथ ही छात्रों ने पुलिस के खिलाफ केस दर्ज नहीं होने तक परीक्षा में नहीं बैठने का फैसला किया है। ऐसे में छात्रों की नाराजगी देखते हुए नजमा अख्तर सोमवार को उनसे मिलने पहुँचे और उन्हें न्याय का भरोसा दिलाया।

उन्होंने छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए कहा, “हमने सरकार को अपनी आपत्तियाँ भेजी हैं, अब हम कोर्ट भी जाएँगे। एक पत्रकार ने मेरा आधा-अधूरा इंटरव्यू दिखाया, मैं कहती हूँ कि वो मेरा पूरा इंटरव्यू दिखाए। मैं आप सभी से निवेदन करती हूँ कि आप अपने शब्द मेरे मुँह में नहीं डालें। जो मुझे बोलना है वो मैं बोलूँगी। दिल्ली पुलिस हमारे कैंपस में हमसे पूछे बगैर आई थी। उन्होंने हमारे मासूम बच्चों को पीटा था। हम न्याय की दिशा में हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।”

इसके बाद नजमा अख्तर ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ FIR दर्ज कराने वाले सवाल पर छात्रों को आश्वासन दिया। उन्होंने कहा, “आप मुझसे तारीख मत पूछिए, मैंने आपसे कह दिया तो ये होकर रहेगा। हम कोशिश ही कर सकते हैं और कोशिश ही कर रहे हैं। आप लोग थोड़ा टाइम दीजिए। आप लोग परीक्षाओं को FIR से नहीं जोड़ सकते हैं। हम कोर्ट जाएँगे और कोर्ट की तारीखें हम तय नहीं कर सकते हैं। आप लोगों की ही माँग पर यूनिवर्सिटी को खोला गया।”

बता दें, बातचीत के दौरान छात्रों ने चीफ प्रॉक्टर पर गंभीर आरोप लगाए। छात्रों ने कहा कि चीफ प्रॉक्टर ने प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए कहा कि एक बार फिर इन्हें पीटा जाए। लेकिन चीफ प्रॉक्टर ने छात्रों के आरोपों का खंडन किया।

‘हिंदू शब्द से ही देश में कुछ लोगों को एलर्जी, जो बिल्‍कुल सही नहीं, ऐसे लोगों की हम कोई सहायता नहीं कर सकते’

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने रविवार (जनवरी 12, 2019) को कहा कि भारत में कुछ लोगों को हिन्दू शब्द से ही एक अलग तरह की एलर्जी है और लोगों के बीच मतभेद खड़ी करने वाली इस दीवार को गिराने की जरूरत है। नायडू रविवार को स्वामी विवेकानंद जयंती के मौके पर आयोजित ‘श्री रामकृष्ण विजयम’ के शताब्दी समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने किसी का नाम लिए बगैर कहा कि देश में कुछ लोगों को हिन्दू शब्द से चिढ़ है।

उन्होंने कहा कि यद्यपि यह ठीक नहीं है, लेकिन हम उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते हैं। उनके पास अपने विचार रखने का अधिकार है, लेकिन वे सही नहीं हैं। नायडू ने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक रूप से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए है। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब दूसरे धर्मों का अपमान या तुष्टीकरण करना नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष संस्कृति भारतीय लोकाचार का एक हिस्सा है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि लंबे समय तक भारत ने कई प्रताड़ित लोगों को आश्रय दिया है और कई को शरण दी है। उन्होंने कहा कि हिंदू एकमात्र धर्म है जो कहता है कि सभी धर्म सही हैं। यह इसकी महानता और इसकी खूबसूरती है। नायडू ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने भी यह कहा था कि वह ऐसे राष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं जिसने धरती के सभी देशों के प्रताड़ित एवं शरणार्थियों को शरण दी है।

वेंकैया नायडू ने नागरिकता कानून के विरोध का स्पष्ट तौर पर संदर्भ देते हुए कहा कि अब भी हम प्रताड़ित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं भले ही कुछ लोग इसे विवादित बनाने की कोशिश कर रहे हों। उन्होंने कहा कि यह हमारी संस्कृति, हमारी धरोहर है। हमारे पूर्वजों ने हमें यही बताया है। 

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से विरोध किए जाने के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कहा, ‘‘हम उन लोगों को स्वीकारने के लिए तैयार हैं, जो प्रताड़ना के शिकार हैं, लेकिन कुछ लोग इसे विवादास्पद बनाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम सर्वधर्म सद्भावना का अनुसरण करते हैं, जो हमारे खून में है और हमारी तहजीब का हिस्सा है। हम सभी को हिंदू धर्म से जुड़ी अवधारणाओं, उपदेशों और परंपराओं को एक सही परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए।’’

120 केले खिला कर 7 अफ़ग़ानी तस्करों को करवाई टट्टी: निकले ₹10 करोड़ के 177 हेरोइन कैप्सूल

दिल्ली एयरपोर्ट पर अफ़ग़ानिस्तान के 7 तस्करों को गिरफ़्तार किया गया है। इन अफ़ग़ान नागरिकों से हेरोइन के 177 कैप्सूल मिले हैं। दरअसल, आइजीआइ एयरपोर्ट पर धर-दबोचे गए ये तस्कर बड़ी चालाकी से हेरोइन की तस्करी करते थे। ये सभी हेरोइन के कैप्सूलों को एक ख़ास तेल और शहद के साथ निगल जाया करते थे। इसके बाद वो दिल्ली में जिस होटल में रुकते थे, वहाँ जाकर मल के साथ इन कैप्सूलों को बाहर निकाल लेते थे। अर्थात, मुँह से निगले गए कैप्सूलों को गुदाद्वार से बाहर निकाल कर उसकी सप्लाई की जाती थी।

दिल्ली पुलिस को इन तस्करों द्वारा निगले गए कैप्सूलों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। अधिकारियों ने बताया कि हिरासत में लिए गए सातों तस्करों को 120 केले खिलाए गए, तब जाकर पिछले कुछ दिनों में उनके पेट से ये कैप्सूल बाहर निकले। पुलिस ने पहले ही उनके शरीर की एक्सरे जाँच कर ली थी, जिसके बाद पता चला था कि उन्होंने ड्रग्स को अपने पेट में छिपा कर रखा हुआ है। ‘नारकोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो’ ने सभी ड्रग्स को जब्त कर लिया है।

ये पूरी प्रक्रिया एक दिन में पूरी नहीं हुई, इसमें कई दिन लगे। इन सातों के अलावा दिल्ली में रह रहे दो अन्य अफ़ग़ान नागरिकों को भी गिरफ़्तार किया गया। ये दोनों हेरोइन के कैप्सूलों की खेप को तस्करों से प्राप्त कर के उसे भारतीय बाजार में बेचते थे। ये दोनों ‘रिसीवर’ थे और एयरपोर्ट से गिरफ़्तार किए गए सातों ‘कैरियर’ थे। इस तरह से हेरोइन तस्करी के मामले में कुल 9 अफ़ग़ान नागरिकों को गिरफ़्तार किया गया है।

सातों ‘कैरियर’ तस्कर अफ़ग़ानिस्तान और दिल्ली के बीच अपनी हवाई यात्रा के दौरान फ्लाइट में कुछ भी खाते-पीते नहीं थे। कुछ दिनों पहले पुलिस को गुप्त सूचना मिली, जिसके बाद ये कार्रवाई की गई। गिरफ़्तार तस्करों के नाम यूसुफजई रहमतुल्लाह, फैज़ मुहम्मद नबीज़ादा हबीबुल्ला, अहमदी अब्दुल वदूद, फज़ल अहमद, नूरजई कबीर और तुर्कमान अब्दुल हामिद शामिल हैं। वजन के हिसाब से देखें तो फैज़ ने सबसे ज्यादा 304 ग्राम के 38 कैप्सूल निगल रखे थे जबकि तुर्कमान ने सबसे कम 142 ग्राम के 18 कैप्सूल निगल रखे थे। यूसुफजई ने 215 ग्राम के 28 कैप्सूल, हबीबुल्लाह और अहमदी ने 225 ग्राम के 15, कबीर ने 250 ग्राम के 26 और फज़ल ने 262 ग्राम के 37 कैप्सूल निगल रखे थे।

इन सारे कैप्सूलों को जब्त कर लिया गया है। सबसे बड़ी बात कि किसी भी आरोपित के सामानों की जाँच के दौरान उनमें कुछ भी ऐसा नहीं मिला, जिससे पुलिस या एयरपोर्ट के जाँचकर्ताओं को शक हो सकता था। हालाँकि, उनकी गतिविधियाँ संदिग्ध लग रही थीं। एनसीबी के जोनल डायरेक्टर केपीएस मल्होत्रा ने बताया कि उनके पेट से निकाले गए सभी पदार्थ विदेशी हैं। हायतुल्लाह और मसूद मुहम्मद दोनों रिसीवरों के नाम हैं। सात आरोपितों को पूरे एक सप्ताह हॉस्पिटल में रखा गया था।

एनसीबी नेक्रो-टेरर नेटवर्क के ख़िलाफ़ बड़ा अभियान चला रही है। इसे आतंकवाद के अंतर्गत इसीलिए रखा गया है क्योंकि इसके अधिकतर सरगना विदेशी इस्लामिक मुल्क़ों में बैठे आतंकी हैं। सभी गिरफ़्तार 9 लोग कंधार में बैठे तालिबानी आतंकी सरगना के लिए कार्य कर रहे थे, ऐसी आशंका जताई गई है। जब्त किए गए ड्रग्स की क़ीमत 10 करोड़ रुपए आँकी गई है। इसे अफ़ग़ानिस्तान से भारत लाने के लिए एक ‘कैरियर’ को प्रति ट्रिप 50,000 से 1.5 लाख रुपए तक मिलते हैं।

ये सभी अफ़ग़ान तस्कर नाइजीरियाई तस्करों के साथ मिल कर काम करते हैं। अफ्रीकन ‘रिसीवर’ इन ड्रग्स के बदले जो रुपए देते हैं, उनका इस्तेमाल भारतीय उपमहाद्वीप में आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए किया जाता है। एनसीबी ने जाँच के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित की है।