अफ्रीकी देश नाइजर में हथियारों से लैस हमलावरों ने गुरुवार (जनवरी 9, 2020) को एक सैन्य शिविर पर हमला किया। हमले में 25 लोगों की मौत हुई और 63 आतंकवादी मारे गए। खबर की पुष्टि खुद वहाँ के रक्षा मंत्रालय ने की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल सुलेमानी गाजोबी ने टेलीविजन पर कहा कि यह हमला माली की सीमा से लगे काफी संवेदनशील क्षेत्र में हुआ।
उन्होंने बताया कि हमलावर गाड़ियों और मोटरसाइकिल पर आए थे। यह हमला पश्चिमी तिलाबेरी के चिनेगोदार क्षेत्र में हुआ जो बुर्किना फासो की सीमा से भी लगा है। प्रवक्ता ने बताया कि नाइजर वायु सेना और सहयोगियों की मदद से जवाबी कार्रवाई की गई और हमलावरों को सीमा से बाहर खदेड़ दिया गया।
यहाँ बता दें कि अफ्रीका देश के अनुसार सहयोगी का मतलब अक्सर अमेरिकी ड्रोन या फिर फ्रांस के विमान या ड्रोन होते हैं। उन्होंने बताया कि मित्र पक्ष के 25 लोगों की मौत हुई और छह घायल हुए। वहीं 63 आतंकवादी मारे गए।
गौरतलब है कि अभी कुछ समय पहले अफ्रीकी देश बुर्किना फासो के अरबिंदा शहर में भी एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। जिसमें 35 लोगों की मौत हुई थी। लेकिन सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में 80 आतंकवादी भी मारे गए थे।
As many as 35 civilians were killed after terrorists attacked a town in northern Burkina Faso on Tuesday, country’s President Roch Marc Kabore said, adding that the ensuing clashes with security forces left 80 terrorists dead
जेएनयू में 5 जनवरी को छात्रों के साथ हुई हिंसा के विरोध में कई जगह प्रदर्शन हुए हैं। कई नेता इस दौरान अपनी राजनीति साधने के लिए घायल छात्रों का समर्थन करने की आड़ में केंद्र सरकार को घेर रहे हैं। इसी सूची में एक नाम प्रियंका गाँधी का भी है। प्रियंका गाँधी लगातार जेएनयू में घायल छात्रों की दुर्दशा के पीछे एबीवीपी और भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। हालाँकि ये बात अलग है कि एबीवीपी के छात्र भी इस हमले में बुरी तरह घायल हुए हैं। उन पर भी बर्बरता हुई है। उन्हें भी वामपंथियों ने दौड़ा-दौड़ाकर मारा है। लेकिन, शायद प्रियंका का इस पक्ष से कोई सरोकार नहीं है। उनकी संवेदना सिर्फ़ वामपंथियों, कट्टरपंथियों और कॉन्ग्रेसियों के सिर-माथे फूटे देख जागती है। उनके आँसू सिर्फ़ उन लोगों के लिए गिरते हैं जो भाजपा सरकार के पक्ष में नहीं होता।
इसकी पुष्टि करते हुए सोशल मीडिया पर इंडिया टीवी के पत्रकार सुशांत सिन्हा ने एक वीडियो अपलोड की है। वीडियो उनके अपने शो की है। इसमें एबीवीपी के राज्य सचिव सिद्धार्थ यादव भी बतौर पैनेलिस्ट मौजूद थे। सुशांत के शो में यादव ने उस दिन हमले के बाद एम्स पहुँचीं प्रियंका गाँधी की पोल-पट्टी खोल दी।
उन्होंने बताया कि रविवार की रात वे भी एम्स में थे। उनके साथ 11 एबीवीपी के कार्यकर्ता भी वहाँ मौजूद थे। उन्होंने खुद देखा कि प्रियंका गाँधी कुछ डॉक्टर्स की भीड़ लेकर अस्पताल में आईं। उन्हें देखकर विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता शिवम चौरसिया ने उनके पास जाकर कहा कि वे उन्हें एसएफआई और AISA के लोगों ने मारा है। लेकिन जैसे ही प्रियंका गाँधी ने सुना कि घायल युवक एबीवीपी का है, उन्होंने उससे मुँह मोड़ लिया और फौरन उनके गार्ड ने शिवम को पीछे किया। इसके बाद वो बिना कुछ कहे मुड़कर चलीं गईं।
इसके बाद सिद्धार्थ ने अपने फोन से नेशनल टीवी पर इस वीडियो को दिखाया। वीडियो में वही सब था, जिसका खुलासा सिद्धार्थ ने किया था। कार्यक्रम के दौरान हुए इस खुलासे को लेकर सुशांत सिन्हा ने ट्विटर पर वीडियो पोस्ट की है। उन्होंने लिखा है, “ये वीडियो देखकर एक ही सवाल मन में आता है कि कोई इतना निर्मोही कैसे हो सकता है? प्रियंका गाँधी जी,आपने एक चोटिल छात्र से अस्पताल में मुँह सिर्फ इसलिए मोड़ लिया, क्योंकि वो ABVP का था। आपके सुरक्षा गार्ड्स ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया, क्योंकि उसकी विचारधारा अलग है।शर्मनाक।”
ये वीडियो देखकर एक ही सवाल मन में आता है कि कोई इतना निर्मोही कैसे हो सकता है? @priyankagandhi जी,आपने एक चोटिल छात्र से अस्पताल में मुंह सिर्फ इसलिए मोड़ लिया क्योंकि वो ABVP का था। आपके सुरक्षा गार्ड्स ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया क्योंकि उसकी विचारधारा अलग है।शर्मनाक।#JNUpic.twitter.com/ZWcYGE5rvR
सिद्धार्थ यादव ने भी इस वीडियो को ट्विटर पर शेयर किया है। उन्होंने लिखा है, “ये वो वीडियो है जिसे मैंने एम्स में अपने फोन से रिकॉर्ड किया। मैं हैरान था कि प्रियंका गाँधी इस तरह कैसे मुँह मोड़ सकती हैं। मैं वो दिन नहीं भूल सकता और न ही वो पल।”
गौरतलब है कि प्रियंका गाँधी अक्सर यूपी में हुई हिंसा को लेकर सरकार पर हमलावर रहती हैं। दंगाइयों को पीड़ित बताकर उनका पक्ष सुनने की बात कहती हैंं। पुलिस कार्रवाई में घायलों के प्रति संवेदना प्रकट करती हैं। इसके अलावा भी वो वह सब कुछ करती हैं जिससे केंद्र सरकार बर्बर दिखे। लेकिन वास्तविकता क्या है, ये इस वीडियो में साफ है। जिसे देखकर पता चलता है कि प्रियंका के लिए राजनीति से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
जरूरी नहीं कि छपाक के बारे में जानने के लिए कोई बड़ी-मोटी किताबें पढ़ी जाएँ। बिहार के लोग छपाक का मतलब अच्छी तरह जानते हैं। यहाँ एक ऐसा दौर था जिसे जंगलराज कहा जाता है। सिवान में एक अपराधी शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी। बिहार से सभी लोग पलायन तो नहीं करते, या कर पाते, कुछ लोग यहीं रहते भी हैं। चंद्रशेखर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू अपनी पत्नी और बच्चों के साथ इसी सिवान में गुज़र-बसर कर रहे थे। शहर के मुख्य बाजार में उनकी दो दुकानें थी। अगस्त 2004 में उनसे शहाबुद्दीन के गुंडों ने रंगदारी मांगी और उन्होंने मना कर दिया।
राजद के नेता को रंगदारी देने से इनकार! चन्दा बाबू की दुकानें लूट ली गई और उनके बेटों को उठा लिया गया। दो भाइयों सतीश और गिरीश रौशन को अगस्त 2004 में बेरहमी से तेज़ाब से नहला कर मौत के घाट उतार दिया गया था। जब राजद का सांसद, शहाबुद्दीन दो भाइयों को तेज़ाब से नहलाकर मार रहा था तो चंदा बाबू का एक बेटा राजेश वहीं बाँध कर रखा गया था। इन दोनों भाइयों की हत्या के चश्मदीद गवाह रहे तीसरे भाई राजेश रौशन को भी बाद में गोलियों से उड़ा दिया गया था। अगर आप सोच रहे हैं तेज़ाब से नहलाकर क़त्ल करने के लिए शहाबुद्दीन गिरफ़्तार हुआ होगा, तो ऐसा नहीं है।
बाद में जब सरकार बदली तब कहीं जाकर उसे गिरफ़्तार किया गया। सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से वो ‘ए टाइप‘ मुजरिम है, यानि जिसके सुधारने की कोई संभावना ना हो, वैसा अपराधी। उसके गिरफ़्तार होने के बाद भी जेल में ‘दरबार‘ लगाने की घटनाएँ आम रहीं। छापे मारकर जेल से यदा कदा मोबाइल ज़ब्त करवाए जाते रहे। जब तेज़ाब काण्ड के चश्मदीद गवाह, चंदा बाबू के तीसरे बेटे की हत्या हुई थी तब भी शहाबुद्दीन ने इसे जेल से ही अंजाम दिया था। फ़रवरी 2012 में सिवान से ही मुन्ना खान नाम का एक अपराधी गिरफ़्तार हो गया।
ये शहाबुद्दीन का पुराना गुर्गा था। इस पर चंद्रशेखर उर्फ़ कॉमरेड चंदू को सरे बाजार गोलियों से भून डालने का आरोप था। जेएनयू के छात्र नेता रहे कॉमरेड चंदू की हत्या शहाबुद्दीन के ही आदेश पर हुई थी। गुंडे शाहबुद्दीन ‘छपाक’ की हैसियत का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि सितम्बर 2016 में जब शाहबुद्दीन ‘छपाक’ को ज़मानत मिली, तो जेल से निकले उसके काफ़िले में 4 मंत्री, 30 सरकारी गठबंधन के विधायक, कुल 1300 गाड़ियों का काफ़िला था। उस दौर में सुशासन बाबू ख़ुद को ’32 दाँतों के बीच जीभ’ बताते थे। क़रीब-क़रीब इसी दौर में राजदेव रंजन की हत्या हुई थी।
कहने को राजदेव रंजन को पत्रकार बताया जाता है, लेकिन पद के हिसाब से देखें तो वो काफी ऊँचे ओहदे पर थे। सरेआम हुई उनकी हत्या के बाद तथाकथित ‘निष्पक्ष और निर्भीक’ कहलाने वाले पत्रकार भी लम्बे समय तक शाहबुद्दीन ‘छपाक’ के विरोध में कुछ नहीं लिख पाए। हाँ, इस हत्या के विरोध में अख़बार का मुख्य पन्ना ज़रूर ब्लैक एंड व्हाइट कर दिया गया था (सिर्फ़ उस अख़बार का जहाँ राजदेव रंजन नौकरी करते थे)। जब आप ‘छपाक’ की बात करेंगे तो भला शहाबुद्दीन ‘छपाक’ का नाम बिहार के लोगों को कैसे याद नहीं आएगा?
इस मामले को याद करने का एक दूसरा कारण भी है। कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद वकील भी हैं। उन्होंने अपने मुवक्किल शहाबुद्दीन ‘छपाक’ की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि उसे एकांतवास में क्यों रखा गया है और उसे क्या हमेशा एकांतवास में ही रखा जाएगा? ‘नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए शहाबुद्दीन ‘छपाक’ को जेल में नमाज़ पढ़ने की जगह देने की माँग भी की गई है! इससे पहले इस आशय की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में भी दायर की गई थी। बाकी फ़िल्म ‘छपाक’ और उससे जुड़े हंगामे का शोर ज़्यादा है। देखिएगा, कहीं नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह शहाबुद्दीन ‘छपाक’ के एसिड अटैक भुला ना दिए जाएँ।
पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देने की फिराक में है। इसके लिए उसने रोहिंग्याोंओं का दस्ता तैयार किया है। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस बाबत सेना और अर्ध सैनिक बलों को अलर्ट किया है।
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, भारत पर हमले के लिए आईएसआई करीब 40 रोहिंग्याओं को बांग्लादेश में ट्रेनिंग दे रही है। इसमें बांग्लादेशी आंतकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (जेएमबी) आईएसआई की मदद कर रहा है। खुफिया एजेंसी की जानकारी के बाद सीमा पर तैनात सुरक्षाबलों को अलर्ट किया गया है।
खुफिया एजेंसियों ने कहा, “पाकिस्तान पड़ोसी बांग्लादेश की सीमा से भारत के खिलाफ बड़ा षड्यंत्र रच रहा है। बांग्लादेशी आतंकी संगठन जेएमबी को आईएसआई धन मुहैया करा रही है। आईएसआई बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में रहने वाले 40 रोहिंग्याओं को आतंकी ट्रेनिंग दे रही है।”
एजेंसी ने बताया है कि जेएमबी को धन सऊदी अरब और मलेशिया के जरिए मुहैया कराया जा रहा है और पहली किस्त के रूप में जेएमबी को एक करोड़ टका उपलब्ध कराए गए हैं। खुफिया एजेंसियों ने इसकी सूचना राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के साथ भी शेयर किया है।
दरअसल, पाकिस्तान एलओसी पर भारतीय सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के चलते आतंकियों की घाटी में घुसपैठ कराने में नाकाम रहा। ऐसे में उसने भारत में हमलों को अंजाम देने के लिए बांग्लादेश को चुना है। इसी कड़ी अब भारत में आतंकी हमला करने के लिए पाकिस्तान रोहिंग्याओं को तैयार कर रहा है।
पिछले साल एनआइए प्रमुख वाईसी मोदी ने कहा था कि जेएमबी पूरे भारत में अपना जाल फैलाना चाह रहा है। इसको लेकर 125 संदिग्धों की सूची विभिन्न राज्यों के साथ साझा की गई है। इनके जमात-उल-मुजाहिदीन के नेृतत्व से करीबी रिश्ते हैं।
एनआईए चीफ मोदी के मुताबिक, जेएमबी ने झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में अपनी गतिविधियाँ तेज की हैं। इस आतंकी संगठन ने 2014 से 2018 यानी 4 साल के भीतर अकेले बेंगलुरु में 20-22 ठिकाने बनाए और इसे दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों तक फैलाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि जेएमबी ने कर्नाटक सीमा पर कृष्णागिरी की पहाड़ियों में रॉकेट लॉन्चर तक टेस्ट किए हैं। जेएमबी ने भारत में 2007 में अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं। शुरुआत में पश्चिम बंगाल और असम को अपना ठिकाना बनाया और फिर देश के अन्य राज्यों में पहुँचा।
साल 2018 में एक बार फिर मध्यप्रदेश बलात्कार मामलों में देश में पहले नंबर पर रहा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा बुधवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 में देश में कुल 33,356 रेप की घटनाएँ हुईं। इनमें से 5,433 घटनाएँ यानी लगभग 16 प्रतिशत घटनाएँ मध्यप्रदेश में घटीं। शर्मनाक बात ये है कि इन आँकड़ों में 54 ऐसे मामले हैं जिनमें पीड़िता की उम्र 6 साल से कम उम्र की रही।
गौरतलब है कि साल 2016 और साल 2017 में भी मध्यप्रदेश ही इस सूची में पहले पायदान पर था। वर्ष 2016 में प्रदेश में जहाँ बलात्कार की 4, 882 घटनाएँ हुईं थी। वहीं साल 2017 में 5, 562 घटनाएँ सामने आई थी।
एनसीआरबी की रिपोर्ट के अ्नुसार साल 2018 में प्रदेश में बलात्कार का शिकार होने वाली लड़कियों में 2,841 लड़कियाँ ऐसी थीं, जिनकी उम्र 18 साल से कम थी। इनमें से 6 साल से कम उम्र की 54 बच्चियाँ थीं और 6 से 12 साल की 142 बच्चियाँ, 12 से 16 की उम्र की 1,143 बालिकाएँ और 16 से 18 साल की 1,502 लड़कियाँ शामिल है।
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार मामलों में दूसरे नंबर पर राजस्थान है। यहाँ साल 2018 में बलात्कार की 4,335 घटनाएँ दर्ज की गई। तीसरे नंबर पर उत्तरप्रदेश है जहाँ रेप की 3,946 घटनाएँ सामने आई। महाराष्ट्र में ये आँकड़े 2,142 दर्ज किए गए और छत्तीसगढ़ में 2,091।
मध्यप्रदेश अभियोजन विभाग के आँकड़ों के अनुसार बच्चियों के साथ बलात्कार के 18 मामलों में अदालत ने साल 2018 में दोषियों को मौत की सजा मुकर्रर की। बता दें कि मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था की मुजूदा हालात को देखते हुए इन आँकड़ों में सुधार की उम्मीद नहीं दिखती।
वीसी को हटाने के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के छात्रों के एक धड़े ने गुरुवार को प्रदर्शन किया। जेएनयू कैंपस से लेकर मंडी हाउस और जंतर-मंतर तक मार्च निकाला गया। प्रदर्शनकारी छात्र राष्ट्रपति भवन की ओर जाना चाहते थे। लेकिन, पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।
इस दौरान एक हैरान करने वाला वाकया हुआ। एक प्रदर्शनकारी युवती ने विजय चौक पर आईपीएस अधिकारी इंगित प्रताप सिंह के अँगूठे पर दाँत से काट लिया। सिंह दक्षिणी-पश्चिमी दिल्ली के एडिशनल डीसीपी हैं। प्रदर्शन का आह्वान JNU छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने किया था।
प्रदर्शनकारी युवती की हरकत पर ट्वीट करते हुए अभिनेता रणवीर शौरी ने लिखा है, “काट के लेंगे आज़ादी!” हालॉंकि, दॉंत काटने वाली युवती की पहचान नहीं हो पाई है। डीसीपी ने किसी तरह उससे अपना हाथ छुड़ाया। दॉंत काटने से उनके हाथ पर हल्के घाव हो गए। बाद में उपचार के लिए उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
ख़बर के अनुसार, 2011 बैच के अधिकारी इंगित प्रताप सिंह एक पुरुष प्रदर्शनकारी को खींचने की कोशिश कर रहे थे, तभी उस महिला ने अपने मित्र को बचाने की कोशिश में आईपीएस अधिकारी का अँगूठा काट लिया। वहीं, पुलिस ने शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। इसके अलावा, कुछ छात्रों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस में सड़क किनारे खड़े होकर कुलपति के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की। इसके चलते जनपथ पर जाम लग गया और आवागमन भी प्रभावित हुआ।
बता दें कि JNU के छात्रों और अध्यापकों के एक धड़े ने कुलपति एम जगदीश कुमार को पद से हटाने की माँग के बीच गुरुवार को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उन्हें हटाने से इनकार किया। मंत्रालय का कहना था कि कुलपति को हटाना समाधान नहीं है और सरकार का ध्यान परिसर में उठे मुद्दे का निपटारा करने पर है। वही, मंत्रालय ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि छात्रों और प्रशासन के साथ बैठक के दौरान तय ‘फॉर्मूले’ को लागू करने की भी ज़रूरत है। कुलपति समेत यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को छात्रों के दावे पर बातचीत करने के लिए शुक्रवार (10 जनवरी) को मंत्रालय बुलाया गया है। छात्रों ने दावा किया है कि मानव संसाधन मंत्रालय के हस्तक्षेप के दौरान तय संशोधित शुल्क को लागू नहीं किया गया है।
ग़ौरतलब है कि JNU में पिछले दो महीने से चल रहा विवाद ने रविवार को हिंसक हो गया था। शुक्रवार और शनिवार (3, 4 जनवरी) को छात्रों ने JNU परिसर में हंगामा किया था। इस दौरान छात्रों ने सर्वर रूम ठप कर लोगों को बँधक बनाया और सरकारी सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाया। इसके बाद पाँच जनवरी की रात कुछ नक़ाबपोश गुंडोंं ने हाथों में रॉड और डंडे लेकर छात्रों को पीटा और तोड़फोड़ की।
एबीवीपी के छात्रों के रूम का गेट तोड़ कर उन पर हमला किया गया। किसी की गर्दन में चोटें आई हैं तो किसी का हाथ टूट गया है। जब कैम्पस में पुलिस पहुँची तो पुलिस के ख़िलाफ़ भी ‘गो बैक’ के नारे लगाए गए। छात्रों को घेर-घेर कर पीटा गया। एबीवीपी की एक छात्रा शाम्भवी की वेशभूषा में एक वामपंथी छात्रा ने हमले किए ताकि इसमें संगठन का नाम बदनाम हो। बाद में पता चला शाम्भवी ख़ुद घायल हुई हैं और वामपंथी गुंडों की पोल खुल गई। इस हिंसा पर वामपंथी और अज्ञात हिंसक छात्रों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है। इसमें JNU छात्र संग की आइशी घोष भी शामिल हैं।
समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। गैर जमानती वारंट जारी करने के बाद भी कोर्ट में हाजिर नहीं होने पर रामपुर एडीजे-6 की अदालत ने बुधवार (जनवरी 8, 2019) को आजम खान के खिलाफ मुनादी का नोटिस जारी करने के आदेश दिए थे। गुरुवार (जनवरी 9, 2019) को कोर्ट के आदेशों की पालना करते हुए रामपुर में गंज थाना पुलिस ने मुनादी कराते हुए उनके घर के बाहर धारा-82 के तहत नोटिस चस्पां किए।
इसके साथ ही शहर में दर्ज मुकदमे, कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए आजम खान की संपत्ति कुर्की की मुनादी की गई। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 24 जनवरी तय की है। इससे पहले कोर्ट ने आजम खान के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था, लेकिन उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
बता दें कि यह मामला आजम के बेटे अब्दुल्ला आजम के फर्जी जन्म प्रमाणपत्र से संबंधित है। मामले की सुनवाई की तारीखों पर लगातार गैरहाजिर रहने के कारण एडीजी-6 की अदालत ने सांसद आजम खान, उनकी पत्नी विधायक तंजीन फातमा और बेटे अब्दुल्ला के खिलाफ 18 दिसंबर को धारा 82 के तहत कुर्की नोटिस देने का आदेश दिया था। गंज पुलिस स्टेशन के एसएचओ रामवीर सिंह ने बताया कि इस मामले में एक चार्जशीट भी दायर की गई है। अदालत ने तीन मामलों में आजम खान, उनकी पत्नी तंजीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला को भगोड़ा घोषित किया है।
रामपुर जिला अदालत में सरकार के अतिरिक्त वकील राम अवतार सैनी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अदालत द्वारा जारी किए गए समन का जवाब न देने को लेकर आजम खान को दो मामलों में नोटिस जारी किए गए हैं। अदालत में लंबित दो मामलों में आजम के पड़ोसी द्वारा दर्ज की गई एक FIR और हालिया चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन शामिल है।
उन्होंने बताया कि पहला मामला पड़ोसी आरिफ रजा खान के घर मे घुसकर मारपीट करने का है। आरिफ ने आजम खान के खिलाफ आईपीसी की धारा 323, धारा 504 और धारा 506 के तहत मामला दर्ज करवाया था। इस मामले में कोर्ट ने कई बार आजम खान को कोर्ट में पेश होने को कहा, लेकिन लगातार गैर हाजिर रहने के कारण कोर्ट ने अब धारा 82 की कार्यवाही की है। गुरुवार को आजम खान के घर अब कोर्ट का नोटिस चस्पां किया गया है। अगर अब भी आजम खान निर्धारित तारीख पर कोर्ट नहीं पहुँचे तो फिर कोर्ट धारा-83 की कार्यवाही करेगा। धारा-83 की कार्यवाही घर की कुर्की होगी।
वहीं, दूसरा मुकदमा चुनाव के दौरान आजम खान के पोलिंग स्टेशन के अंदर वाहन ले जाने को लेकर है। इस केस में भी सांसद आजम खान को कोर्ट में पेश होने के लिए बुलाया गया, लेकिन नहीं आने पर उनके खिलाफ धारा-82 की कार्यवाही की गई है।
इसी तरह आदर्श आचार संहिता के एक अन्य मामले में आजम खान के खिलाफ गैर- जमानती वारंट जारी किया गया था। उन पर चुनावी रैली में भड़काऊ भाषण देने का आरोप है। चुनाव के दौरान दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था कि किसी को भी किसी पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों से डरने की जरूरत नहीं है और साथ ही उन्होंने आपत्तिजनक भाषा का भी इस्तेमाल किया है। इसके अलावा आजम के बेटे अब्दुल्ला खान के खिलाफ बीजेपी उम्मीदवार जयाप्रदा के खिलाफ आपत्तिजनक भाषण देने के लिए जमानती वारंट जारी किया गया है।
जब जेएनयू की वेबसाइट को दो दिन तक प्रदर्शनकारी मास्क पहने छात्रों द्वारा हैक किया गया था (एक को छोड़कर, जो शायद दूसरे कन्हैया कुमार होने की महत्वाकांक्षा पाले बिना नकाब के लीड कर रही थी) तब मीडिया कहाँ थी? जब खिड़कियाँ तोड़ी गई थीं, जब जेएनयू के केंद्रीय सर्वर को नुकसान पहुँचाया गया, लाखों रुपए के ऑप्टिक फाइबर तारों को काट दिया गया था और नष्ट कर दिया गया था, और वहाँ के स्टाफ को इन्हीं मास्क पहने छात्रों के समूह द्वारा संचार और सूचना सेवा केंद्र (सीआईएस) से बाहर निकाल दिया गया था ताकि रजिस्ट्रेशन कराने के इच्छुक छात्रों के पंजीकरण की प्रक्रिया को बाधित किया जा सके। यह वह जघन्य अपराध है जो मैंने शायद ही कभी किसी छात्र समुदाय को करते सुना था। मेरे लिए यह अविश्वसनीय है कि हमारे कुछ छात्र आतंकियों जैसे अपना चेहरा छिपा रहे हैं और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के सार्वजनिक गुणों को नष्ट कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि मीडिया ने इसे सिरे से ख़ारिज कर चुनिंदा रूप से और बेहद संक्षेप में प्रस्तुत किया। विडंबना यह है कि जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन (जेएनयूटीए) निंदा करने के बजाय बर्बरता के इस कृत्य के बारे में रहस्यमय चुप्पी साधे रहा। उसके बाद भी हममें से कुछ लोग यह जानकर हैरान थे कि कैंपस के अंदर किसी भी पुलिस को नहीं बुलाया गया था और उन छात्रों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है जिन्होंने यह अपराध किया है। केवल आंतरिक सुरक्षा ने किसी तरह से ब्लॉकेज को साफ कर दिया और यह भी हमने सुना कि गेट पर पहरा दे रहे छात्रों को भी नकाबपोशों द्वारा पीटा गया। हमने सुना (और चित्रों को देखा) कि केंद्रीय सर्वर इतना क्षतिग्रस्त है कि यह अभी भी उसे रिस्टोर करने का काम जारी है और पंजीकरण 6 जनवरी तक शुरू नहीं किया जा सका था।
हमें पता चला है कि JNUSU ने उन छात्रों के हमले की कड़ी निंदा की है जो सीआईएस की रखवाली कर रहे थे। उत्सुकता से मैंने एक आंदोलनकारी छात्र से पूछा, जिसे मैंने पढ़ाया था, “आप लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में बात करते हैं और आपने कुछ छात्रों के हमले की निंदा की है, लेकिन आप बर्बरता के इस कृत्य की निंदा नहीं कर रहे हैं? जो सर्वर रूम में किया गया। उन्होंने जवाब दिया “यह कुछ शरारती छात्रों द्वारा किया गया था, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।” मैंने पूछा कि आप हमले की निंदा क्यों करते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि वे नकाबपोश कुछ दंड के पात्र हैं? जवाब स्पष्ट रूप से हवा में उड़ा दिया गया।
ऐसी कई बातों का कोई जवाब नहीं है। कोई जवाब नहीं कि छात्र अपनी जीत का जश्न क्यों नहीं मना रहे हैं जब इन दो महीनों के लॉकअप ने वास्तव में बीपीएल स्टूडेंट के लिए छात्रावास के किराए को 600/300 और 150/300 तक कम कर दिया है। प्रदर्शनकारी छात्र इस लॉक डाउन को अभी भी जारी क्यों रखना चाहते हैं? उनमें से कुछ कह रहे हैं कि वे सभी के लिए पूरी वृद्धि वापस चाहते हैं। कुछ कहते हैं कि हमारे पास कुछ और एजेंडे हैं जिन्हें पूरा करना है। कुछ को कुछ संदेह है। इन सभी में, हमारे कुछ छात्र गोपनीय रूप से हमसे शेयर कर रहे हैं कि वे इस आंदोलन से हटना चाहते हैं क्योंकि उन्हें इनके कुछ छिपे हुए एजेंडों और निहित स्वार्थों पर संदेह है।
ऊपर दिए गए फेसबुक लिंक की प्राइवेसी सेटिंग चेंज कर दी गई है। इसलिए नीचे लिंक का स्क्रीनशॉट लगाया गया है।
हम असहाय, मूक दर्शक, जिन्हें पिछले दो महीनों से हमारे अपने कार्यालय के कमरे से बाहर निकाल दिया गया है, और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं, अवसाद से गुजर रहे हैं, सभी बाधाओं से लड़ रहे हैं और छात्रों की सुविधा के लिए कठोर सर्दियों में सड़कों पर या पार्किंग में बैठे हैं। अन्य महत्वपूर्ण शैक्षणिक गतिविधियों और सभी बिखरे हुए आशाओं के खिलाफ उम्मीद है कि शायद आने वाले दिनों में जल्द ही सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी, जब हम अपने स्वयं के कमरे में, कार्यालय में वापस आ जाएँगे, जहाँ हम फिर से अपने स्वयं के विचारों में खो सकते हैं, बिना किसी हस्तक्षेप के। यहाँ तक कि तमाम प्रोफेसरों और शोध छात्रों को इन प्रदर्शनकारी छात्रों से विनती करनी पड़ती है कि हमें कुछ महत्वपूर्ण सामान, किताबें या हार्डडिस्क लेने के लिए पाँच मिनट के लिए अपने कमरे में जाने दें, उस पर भी ये प्रदर्शनकारी छात्र इंकार कर देते हैं या सप्ताहांत में आने के लिए कहते हैं। प्रदर्शनकारी छात्र जो हमारे स्कूल भवन के सभी गेटों को अवरुद्ध कर बैठे हैं। एक शिक्षक के लोकतांत्रिक स्पेस, उसके अधिकार, उसका कार्यालय पर कब्ज़ा जमाए बैठे इन छात्रों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए इन दिनों में कोई मंच नहीं है, क्योंकि यह अब हमारे JNUTA के लिए चिंता का विषय नहीं है। लेकिन हम अक्सर जेएनयू में ‘लोकतांत्रिक स्पेस’ के बारे में बात करते हैं, बहस करते हैं।
जेएनयू प्रशासन ने पहली जनवरी से 5 जनवरी तक इस शीतकालीन सत्र के लिए पंजीकरण की घोषणा की थी और उन छात्रों के लिए विकल्प उपलब्ध कराया था, जिन्होंने तीन बार परीक्षा छोड़ दी है। उन्हें अनंतिम पंजीकरण और सभी के लिए पंजीकरण ऑनलाइन कर दिया था। पहले दो दिनों में पंजीकरण धीमी गति से हो रहा था, जो हमेशा होता है क्योंकि छात्रों को अलग-अलग स्थानों से मंजूरी लेनी होती है। ऐसा लगता था कि कई लोग पंजीकरण के लिए इच्छुक थे। अधिकांश छात्र पूरे दो महीने के आंदोलन से हताश हो गए थे, कई ऐसे पोस्टग्रेजुएट छात्र हैं जिनका भविष्य अनिश्चित हैं और प्रतिस्पर्धी एग्जाम के लिए खुद को तैयार करना है, उनमें से कई 9बी पीएचडी के छात्र हैं, जिन्हें इस जून तक अपनी थीसिस जमा करनी है, कई एमफिल चौथे सेमेस्टर के छात्र हैं, जिन्हें आगामी जून में डेज़र्टेशन जमा करना है। अब छात्र इन आंदोलनों और उनके मोटिव को समझ जाने के कारण पंजीकरण के पक्ष में लामबद्ध हो रहे हैं।
अभी तक जो भी हो रहा था कमोबेश निर्विरोध चल रहा था। आम छात्रों और शिक्षकों कभी समर्थन था। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। अब आम छात्र पीछे हट रहे हैं उनका समर्थन खिसक रहा है लेकिन आंदोलन वापस नहीं लिया जा सकता है। पंजीकरण प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है, ताकि कोई भी पंजीकरण न कर सके। अब यह संघर्ष का मूल कारण बन सकता है।
जिस दिन JNU में हिंसा की घटना हुई थी उस दिन JNU की इकॉनमी की प्रोफ़ेसर इन्द्राणी रॉय चौधरी वहाँ मौजूद थी उन्होंने कहा कि “मैं उस दिन सुबह 10:00 बजे से डीन कार्यालय में थी। और पंजीकरण के बहिष्कार के नारे लगाने वाले छात्रों के उन्माद देखकर मुझे गहरा आघात लगा, हमें 5 मिनट के भीतर जगह छोड़ने के लिए धमकी दी गई नहीं तो वे हमें घंटों के लिए बंद कर देंगे। कुछ छात्र पहले से ही पंजीकरण के लिए वहाँ मौजूद थे, लेकिन सर्वर अभी भी रिस्टोर नहीं हुआ था। 11:00 बजे के आसपास, JNUSU के लगभग 20-25 आक्रामक छात्र उस भवन में प्रवेश करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से इनमें कई लड़कियाँ थी जो रजिस्ट्रेशन के लिए आए छात्रों को धमकी दे रही थी, चिल्ला रहीं थी, कार्यालय के कर्मचारियों और पंजीकरण के लिए इंतजार कर रहे छात्रों को गाली दे रही थीं। स्कूल के गेट को अवरुद्ध कर दिया गया था। हमारे केंद्र के पीएचडी छात्रों में से चार (सुमन, शंटू, शुभोमॉय और अरूप) पंजीकरण के लिए वहाँ गए थे और वे हमारी रखवाली कर रहे थे। उस दौरान दोनों पक्षों के छात्र उन घटनाओं का वीडियो बना रहे थे। चार-पाँच छात्राओं ने शुभोमय से मोबाइल छीन लिया और उसे बाहर फेंक दिया, फिर उन्होंने उनमें से प्रत्येक को गालियाँ देना शुरू कर दिया, उन्हें कॉलर पकड़कर बाहर खींचने और थप्पड़ मारने के बाद गाली देकर घसीटना-मारना शुरू कर दिया। वीडियो बना रहे शंटू को घेर लिया गया और धमकाया गया, उसकी जैकेट को हमारे सामने ही फाड़ दिया गया, अरुप को आधे घंटे से ज़्यादा समय तक पीटा गया और उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उसका मोबाइल भी किसी ने छीन लिया था।
ये JNUSU छात्र बिना किसी विरोध के उन मासूम आम छात्रों के साथ ये सब करने में कामयाब रहे, क्योंकि उस दौरान आसपास एक भी AVBP के छात्र नहीं थे। नकाबपोश चेहरे वाले वहाँ कई छात्र खड़े थे। हम में से कई लोग संदेह कर रहे थे कि उनमें से कुछ हमारे छात्र नहीं हो सकते हैं और कुछ जामिया मिलिया के हो सकते हैं। जब अरूप को आखिरकार लड़कियों की भीड़ से बचाया गया, तो वह कुछ भी कहकर रो पड़ा और काँप उठा। हम उन लड़कियों के व्यवहार और उनकी अश्लील हरकत से हैरान थे। जब हमारे छात्रों ने एफआईआर करने के लिए कहा तो ये सुनकर उन लड़कियों ने धमकी दी कि वह यह आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज करवा देंगी कि इन छात्रों (अरूप आदि ….) ने उनका यौन शोषण किया है।
लगभग 5:00 बजे हमने देखा कि नकाबपोश चेहरे वाले सैकड़ों छात्र हॉस्टल की ओर लाठी, डंडे और पत्थर लेकर दौड़ रहे थे। बाद में मैंने सुना कि ताप्ती, साबरमती, कोयना, एक के बाद एक कई अन्य छात्रावासों पर हमला किया गया, सीसी टीवी के साथ बर्बरता की गई और यहाँ तक कि संकाय के क्वार्टर पर भी हमला किया गया। कुछ छात्र बुरी तरह से घायल हैं, कुछ बाहर चले गए, कुछ लापता हैं।
यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह वह विश्वविद्यालय है जिसने हमें विविधता का सम्मान करने के लिए, राय और विचारों में अंतर के लिए जगह बनाने और सद्भाव और सह-अस्तित्व बनाने के लिए सिखाया। यह वह विश्वविद्यालय नहीं है जिसे मैं जानती और मुझे उस बिरादरी का सदस्य होने पर गर्व होता था।
पिछले दिनों कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने कहा था कि उनका नाम राहुल सावरकर नहीं है। इसके बाद उन्हें भाजपा ने बताया था कि वे सावरकर हो भी नहीं सकते। अब भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने उनका नया नामकरण कर दिया है। उमा ने राहुल को ही नहीं, बल्कि उनकी बहन कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी वाड्रा को भी नया नाम दिया है।
उमा ने कहा है कि जिन्ना कोई और नहीं, बल्कि राहुल जिन्ना और प्रियंका जिन्ना हैं। दोनों नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर समुदाय विशेष के बीच माहौल बिगाड़ रहे हैं। भय पैदा कर रहे हैं। उमा भारती ने कहा कि देश के विभाजन के वक्त जो काम जिन्ना ने किया था, वही काम अब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गॉंधी और उनकी बहन प्रियंका गॉंधी कर रहे हैं। विभाजन के नफरत का जो जहर जिन्ना ने फैलाया था, वही आज दोनों फैला रहे हैं। राहुल-प्रियंका नए जिन्ना हैं। देश में जहरीला भावनात्मक विभाजन कर रहे हैं, जो हम नहीं होने देंगे।
Uma Bharti,BJP: Jinnah is no more but Rahul Jinnah & Priyanka Jinnah are there who are disturbing environment & instilling fear among Muslims on CAA. Did anyone of us say that Sonia Gandhi’s father was a soldier in Mussolini’s army in Italy? pic.twitter.com/Wq98toiFBn
इतना ही नहीं उमा ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि क्या हम लोगों में से किसी ने कहा है कि सोनिया गॉंधी के पिता इटली में मुसोलिनी की सेना में एक सैनिक थे? जब से वे (सोनिया गॉंधी) हमारी बहू बनीं और हमारे देश में शादी की, तब से हम दिल से उनका सम्मान करते हैं। मध्य प्रदेश के पन्ना में सीएए के समर्थन में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उमा ने ऐसे और कार्यक्रमों के आयोजन पर भी जोर दिया।
BJP leader Uma Bharti on #JNUViolence: There are some thinkers in the country who are like a particular snake which is less in number but is highly venomous… Efforts are being made to make environment venomous… We have to fix some things & we will fix them. pic.twitter.com/JfHBXRsb8J
इससे पहले जेएनयू में हिंसा को लेकर भी उमा ने विपक्ष को निशाने पर लिया था। उन्होंने कहा था कि विचारकों का एक धड़ा यूनिवर्सिटी के वातावरण में जहर घोल रहा है। उन्होंने इन विचारकों की तुलना सॉंपों की एक विशेष प्रजाति से करते हुए कहा था कि ऐसे सॉंप संख्या में तो कम हैं, लेकिन बहुत जहरीले होते हैं। हमें समाधान निकालकर उन्हें ठीक करना होगा।