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भगोड़े विजय माल्या की जब्त संपत्ति बेचकर बैंक करेंगे वसूली, PMLA कोर्ट ने दी मंजूरी

नया साल शुरु होते ही भगौड़े विजय माल्या को प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के स्पेशल कोर्ट ने एक बड़ा झटका दिया है। दरअसल, ताजा जानकारी के मुताबिक मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) की विशेष अदालत ने आज भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और कई अन्य बैंकों को भगौड़े विजय माल्या की जब्त संपत्ति को बेचकर कर्ज वसूली करने की इजाजत दी है।

लेकिन, विजय माल्या के वकीलों ने मुंबई में हो रही इस मामले की सुनवाई के दौरान आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि यह केवल डेट रिकवरी ट्राइब्यूनल ही तय कर सकता है। जिसके मद्देनजर स्पेशल कोर्ट ने इस निर्णय पर 18 जनवरी तक स्टे लगाया है, ताकि माल्या इस आदेश के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील कर सकें।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले पिछले साल फरवरी के महीने में ईडी पीएमएलए कोर्ट को बोल चुकी है कि उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं है, अगर माल्या की संपत्ति से वसूली की जाए।

बैंकों के करीब नौ हजार करोड़ रुपए के लोन ना चुकाने, बैंक धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में  ब्रिटेन में माल्या को मुकदमें का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा भारत में भी उसपर कार्रवाई जारी है।

इस हालिया कार्रवाई से पहले बता दें दिसंबर महीने में विजय माल्या मामले में लंदन कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था। जिसके बाद कयास लगाए गए थे कि कोर्ट जनवरी में विजय माल्या पर फैसला सुना सकता है। वहीं, कहा जा रहा है कि विजय माल्या पर दायर दिवालिया घोषित होने की याचिका खारिज या रद्द हो सकती है।

बता दें कि विजय माल्या 2 मार्च, 2016 को देश छोड़कर लंदन भाग गया था। माल्या को कड़ा झटका देते हुए मुंबई की धनशोधन निरोधक क़ानून (पीएमएलए) की विशेष अदालत ने उसे भगोड़ा ‘आर्थिक अपराधी’ घोषित कर दिया था। लंदन की एक अदालत ने 10 दिसंबर, 2018 को उनके प्रत्यर्पण का आदेश दिया था। ब्रिटेन के गृहमंत्री साजिद जावीद ने चार फ़रवरी 2019 को माल्या को करारा झटका देते हुए उसे भारत प्रत्यर्पित करने के आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। माल्या को वहाँ के हाईकोर्ट में अपील करने के लिए 14 दिनों का समय दिया गया था।

एक नकली विरोध के लिए 20 दिन की बच्ची का इस्तेमाल! अंधविरोध और भावुकता का कॉकटेल

वामपंथी और मोदी-विरोधी किसी भी हद तक जाने से नहीं घबराते। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर चल रहा विरोध-प्रदर्शन भी इसकी नए सिरे से पुष्टि करता है। उनकी योजना होती है कि कुछ भी भावुक सा बोल कर, प्रतीकात्मक रूप में दिखा कर, गलत बात को जेनरलाइज करके ऐसे दिखाना, जैसे भारत जल रहा है। वो असलियत से दूर होते हैं। इसके लिए वे 20 दिन की बच्ची का भी इस्तेमाल कर लेते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वही बीस दिन की बच्ची बड़ी हो कर पूछेगी कि अम्मी थोड़ा पढ़ लेती तो कानून के बारे में क्लेरिटी आ जाती कि इसमें तो उनके मजहब के लिए कुछ गलत है ही नहीं।

हम बात कर रहे हैं 20 दिन की उस बच्ची के बारे में, जिसे सीएए के विरोध प्रदर्शन का सबसे छोटा चेहरा बना कर पेश किया जा रहा है। बीस दिन की बच्ची के हवाले से लिखा गया है कि वो जब बड़ी हो कर अम्मी से पूछेगी, “जब हम पर जुल्म हो रहा था तो आप क्या कर रही थीं।” जबकि अगर वो बच्ची ठीक से पढ़-लिख ले तो उसका सवाल ये होगा, “इतनी ठंड में बिना कानून पढ़े मेरी जान को खतरे में डाल कर, किसके उकसाने पर गई थी?”

उस बच्ची का नाम उम्मी हबीबा है। बताया गया कि वो महज 20 दिन की है। उसकी माँ के कुल 5 बच्चे हैं और वो मीडिया अटेंशन का कारण इसीलिए बन रही है, क्योंकि वह अपने बच्चों को सीएए विरोधी प्रदर्शन में लेकर आती है। क्या 20 दिन की बच्ची से उसकी मर्जी पूछी जा सकती है? क्या उसे पता भी है कि वो कहाँ है और उसका इस्तेमाल किसलिए किया जा रहा है? उसकी अम्मी संविधान बचाने की बात करते हुए धरने पर बैठी हुई है। संविधान को किस से क्या ख़तरा है, इसका उत्तर ख़ुद वामपंथियों के पास भी नहीं है।

वैसे ये पहला मौक़ा नहीं है, जब इस तरह की करतूत की जा रही हो। जेएनयू में सरकार विरोधी प्रदर्शन के दौरान विकलांग छात्रों को आगे कर दिया गया था। बाद में उनका इस्तेमाल कर छात्रों ने पुलिस पर बर्बरता के आरोप लगाए थे। ऐसे ही जामिया हिंसा के दौरान महिला छात्रों को आगे कर दिखाया गया था कि पुलिस ‘मासूम चाहतों पर जुल्म’ कर रही है। शाहीन बाग़ में सीएए का विरोध प्रदर्शन करने बैठी उम्मी की अम्मी भी यही कर रही है। उम्मी को तो पता भी नहीं है कि उसके साथ क्या हो रहा है?

दरअसल, किसी भी विवादित हिंसक प्रदर्शन को छिपाने के लिए, अंतररराष्ट्रीय मीडिया का अटेंशन पाने के लिए ऐसी तरकीबें आजमाई जाती रहती है। लेकिन, ये भी सोचा जाना चाहिए कि अगर उम्मी की तबियत खराब होती है, या फिर उसे ठण्ड लग जाती है तो क्या यही प्रदर्शनकारी इसका इल्जाम सरकार पर नहीं थोपेंगे? सरकार पर एक मासूम बच्ची के साथ बेरहमी करने का झूठा आरोप लगाया जाएगा। सोशल मीडिया पर इसे ‘क्रन्तिकारी’ बता कर शेयर भी किया जा रहा है।

जामिया का पुलिस को CCTV फुटेज देने से इनकार, उपद्रवी छात्रों का गुनाह छिपाने की कोशिश?

जामिया हिंसा: अयोध्या फैसले के बाद संविधान को ‘जलाने’ वाले ही आज CAA के विरोध में उसे बचाने उतरे

सहारनपुर में जश्न मना रहे युवकों को मुस्लिम समुदाय ने रोका: पत्थरबाजी से बढ़ा सांप्रदायिक तनाव, 3 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के थाना गागलहेड़ी के एक गाँव कुतुबपुर कुसानी से सांप्रदायिक तनाव की खबर आई है। बताया जा रहा है मामला बैंडबाजे पर नाचते हुए युवकों को दूसरे संप्रदाय के युवकों द्वारा रोकने के बाद शुरु हुआ। जहाँ देखते ही देखते पहले दोनों के बीच झगड़ा हुआ और फिर पथराव शुरू हो गया। सूचना मिलने पर मौके पर पहुँची कई थानों की पुलिस ने स्थिति को संभाला और आरोपितों को गिरफ्तार किया।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार की शाम गाँव कुतुबपुर कुसानी में रहने वाले धर्मपाल सिंह इंटर कालेज से सेवानिवृत्त हुए थे। जिसके चलते उनके संस्थान में उनके लिए एक छोटा सा विदाई समारोह आयोजित हुआ। जहाँ शामिल होने के बाद वह अपने रिश्तेदारों के साथ नाचते-गाते घर आ रहे थे। इस जश्न में उनके साथ गाँव के कई युवा भी शामिल थे। लेकिन, इसी बीच जब वह रास्ते से गुजरते हुए शाहिद उर्फ राजिक और तौफीक के घर के सामने पहुँचे, तो इन लोगों ने उन्हें डांस व शोर-शराबा करने से मना कर दिया। इसके बाद सारी कहासुनी शुरू हुई।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर

देखते-ही-देखते बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ही संप्रदाय के लोग आमने-सामने आ गए और एक-दूसरे पर पथराव करने लगे। घटना की सूचना पर कई थानों की फोर्स मौके पर पहुँची। पुलिस ने सड़क पर लाठी फटकार कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया। पथराव में सचिन, बृजेश, विपिन व कुनाल जख्मी हो गए, जिन्हें जिला अस्पताल भिजवाया गया।

हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार अब स्थिति सामान्य है। लेकिन गाँव वाले फ्लैगमार्च निकालकर अपना विरोध दिखा रहे हैं। मामले के संबंध में 3 युवकों को गिरफ्तार किया गया है। मगर रिपोर्ट अभी किसी के ख़िलाफ़ दर्ज नहीं हुई हैं।

बता दें, गागलखेड़ी में हुई इस घटना के अलावा सहारनपुर के एक गाँव पजौरा में भी सांप्रदायिक टकराव देखने को मिला। जिसमें 2 महिलाओं के जख्मी होने की खबर हैं। जहाँ शराब के नशे में धुत सागर का झगड़ा शादाब नाम के युवक से हुआ और जब बात दोनों के घर पर पहुँची, तो दोनो पक्ष बिन कुछ-सोचे समझे आमने-सामने आ गए। जब तक बाकी लोग कुछ समझ पाते और मौके पर पहुँची पुलिस कुछ कर पाती, इन लोगों ने पुलिस के सामने ही पथराव शुरु कर दिया।

काफी मशक्कत के बाद पुलिस ने मामला शांत कराया। लेकिन तब तक 2 महिलाएँ घायल हो गईं थीं। इस मामले के संबंध में पुलिस ने आधी रात तक दबिश डाल कर मौ. शादाब, मौ. शहजाद तथा नदीम व दूसरे पक्ष के सागर, योगेश व पारुल को पकड़ लिया।

UP पुलिस को गुमराह कर रहे समुदाय के लोग, दंगाइयों को सुपुर्द करने का वादा भी नहीं किया पूरा

उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हिंसा करने वालों को बचाने में समुदाय विशेष के लोग जुट गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार समाज के लोगों ने दंगाइयों को खुद पकड़कर पुलिस के हवाले करने का वादा किया था। लेकिन, इस पूरा नहीं किया। इतना ही नहीं बवालियों तक पुलिस पहुॅंच नहीं पाए इसलिए उसे गुमराह करने की कोशिश भी हो रही।

इसे देखते हुए मेरठ में मंगलवार (दिसंबर 31, 2019) को पुलिस ने चार थानों की टीमें बनाकर उपद्रवियों की पहचान शुरू कर दी। सूचना के अनुसार, फोटो और सीसीटीवी वीडियो के आधार पर बवालियों की पहचान की जा रही है। दिक्कत ये है कि एक ही चेहरे के अलग-अलग नाम बताकर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की जा रही। मसलन, एक चेहरे को किसी ने इस्लाम नगर का कबीर बताया तो दूसरे ने श्याम नगर का रशीद बता दिया।

ज्ञात हो कि दंगाइयों ने मेरठ शहर में एक साथ लगभग डेढ़ दर्जन स्थानों पर पथराव, फायरिंग और आगजनी की थी। हिंसा में छह बवालियों की मौत हुई थी, जबकि तीन पुलिसकर्मी गोली से घायल हो गए थे। मामले के 250 वीडियो फुटेज के आधार पर 132 दंगाइयों को चिह्नित करने का काम किया गया है। स्थानीय खत्ता रोड पर काली पट्टी बाँध कर फायरिंग करने वाले फैसल समेत तीन आरोपितों पर पुलिस द्वारा 20-20 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है।

पुलिस ने स्वीकार किया है कि दंगा होने का एक कारण ये भी रहा कि कुछ इलाकों में पब्लिक के साथ रिलेशन नहीं बन पाना भी है। जैसे सीओ कोतवाली दिनेश शुक्ला को ही ले लीजिए। उनकी तैनाती को दो साल हो चुके हैं। बावजूद उन्हें उपद्रवियों को लेकर कोई सुराग तक नहीं मिल पाया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसका अर्थ ये है कि अधिकारी अपने सर्किल एरिया में इतना पब्लिक रिलेशन नहीं बना पाए कि हिंसा या आगजनी के दौरान आमजन पुलिस के साथ सहयोग करें।

दैनिक जागरण के मेरठ संस्करण में प्रकाशित खबर

पब्लिक रिलेशन नहीं बनाने पर वरिष्ठ अधिकारियों ने सभी थाना प्रभारियों और सर्किल ऑफिसर को फटकार लगाई है। हालाँकि, 27 दिसंबर को जुमे की नमाज पर शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे। समुदाय विशेष के मोहल्लों में लोग पुलिस को गुमराह करते हुए आरोपितों का ग़लत नाम-पता बता रहे हैं।

आरोप है कि मुस्लिम समाज के लोग बवालियों को बचाने के लिए पुलिस को इधर-उधर भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि किसी निर्दोष को जेल नहीं भेजा जाएगा। साथ ही कहा है कि दोषियों को भी नहीं बख्शा जाएगा।

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J&K: 5 माह बाद शुरु हुई सरकारी अस्पतालों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा, नौशेरा में 2 जवान हुए वीरगति को प्राप्त

जम्मू-कश्मीर में 5 अगस्त 2019 से आर्टिकल 370 निष्क्रिय हो जाने के बाद सुरक्षा लिहाज से बंद की गई ब्रॉडबैंड सेवा और एसएमएस सेवा को कल (दिसंबर 31, 2019) शाम सरकारी अस्पतालों में बहाल कर दिया गया।

मंगलवार आधी रात से कश्मीर के सभी इलाकों में एसएमएस सुविधा शुरु हुई और साथ ही स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों में इंटरनेट सेवा को भी शुरू कर दिया गया। कश्मीर वासियों के लिए सरकार का यह कदम नए साल पर तोहफे जैसा है। 

इस संबंध में जानकारी देते हुए जम्मू-कश्मीर के प्रधान सचिव रोहित कंसल ने मीडिया को बताया, “सभी सरकारी अस्पतालों में 31 दिसंबर मध्यरात्रि से इंटरनेट सेवा और सभी मोबाइल फोन पर पूरी तरह से एसएमएस सेवा बहाल करने का निर्णय लिया गया है।”

प्रधान सचिव के मुताबिक, “अभी यह फैसला नहीं लिया गया है कि इंटरनेट सेवाएं कब शुरू की जाएँगी। यह मुद्दा सरकार के संज्ञान में है। स्थिति सुधरने के साथ जल्द ही इंटरनेट सेवा भी शुरू कर दी जाएगी।”

बता दें इससे पहले प्रशासन कश्मीर के कई इलाकों में मोबाइल इंटरनेट के अलावा लैंडलाइन जैसी सेवाएँ शुरु कर चुका है। लेकिन प्रीपेड की सुविधा अभी भी कश्मीर में शुरु होना बाकी है।

10 दिसंबर को प्रधान सचिव ने बताया था कि इससे पूर्व कश्मीर में मोबाइल फोन पर बहाल की गई एसएमएस सेवाएँ, छात्रों, छात्रवृत्ति के इच्छुक छात्रों, व्यापारियों और अन्य लोगों की मदद के लिए थी। साथ ही यह चरण पूर्ण संदेश सेवाओं की बहाली प्रक्रिया का हिस्सा था।

नौशेरा में दो जवान शहीद

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ राज्य में स्थिति सुधरने के कारण इंटरनेट सेवा बहाली की खबर आई हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में सर्च ऑपरेशन के दौरान दो भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। बताया जा रहा है कि आतंकियों ने घात लगाकर जवानों पर हमला बोला। पूरे इलाके की घेराबंदी कर ली गई है। सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है और आतंकियों को ढूंढा जा रहा है।

5 अगस्त के बाद राज्य में दिखा फर्क़

बता दें, आर्टिल 370 समाप्त हो जाने के बाद कई लोग सरकार के इस कदम पर सवाल उठा रहे थे, लेकिन मंगलवार को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह ने बताया कि आखिर इस कदम के बाद वहाँ पर क्या फर्क़ आया है।

उन्होंने बताया, “2019 में 160 आतंकवादी मारे गए और 102 को गिरफ्तार किया गया जबकि आतंकवादी संगठनों में शामिल होने वाले स्थानीय युवाओं की संख्या में कमी आई है।” मीडिया से बातचीत में डीजीपी दिलबाग सिंह ने कहा, “2018 में इस तरह के 218 (स्थानीय) युवक आतंकवादी संगठनों में शामिल हुए थे लेकिन 2019 में केवल 139 शामिल हुए।

कोटा में 1 सप्ताह में 22 बच्चों की मौत, CM गहलोत ने कहा- हमारे यहाँ इलाज और दवाइयाँ फ्री

राजस्थान के कोटा में दिसंबर 2019 ने मासूमों की मौत का आँकड़ा 99 पहुँच गया। जहाँ पूरा देश नववर्ष के उल्लास में मग्न होकर खुशियाँ मना रहा है, कोटा में स्थिति एकदम उलट है। जब मंगलवार (दिसंबर 28, 2019) को राज्य के स्वास्थ्य सचिव स्थिति का अवलोकन कर रहे थे और बैठक कर रहे थे, तभी 5 घंटे के अंदर 4 बच्चों की मौत हो गई। जेके लोन हॉस्पिटल में 25 दिसंबर से लेकर 31 दिसंबर तक 22 बच्चों की मौत की खबर है। अस्पताल प्रशासन ने बताया है कि ज़्यादातर भर्ती किए गए बच्चे रेफरल हैं। बाराँ और कोटा ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों में अधिकतर नवजात हैं।

डॉक्टरों ने बताया है कि नवजात बच्चों में अधिकतर ऐसे हैं, जिन्हें जन्म से ही साँस लेने में तकलीफ है और जब उनकी साँस सही हुई तो उनके दिमाग पर इसका गहरा असर हो गया। डॉक्टर फ़िलहाल इसे ही बच्चों की मौत का कारण मान रहे हैं। बच्चों की मौत को लेकर लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला भी चिंतित हैं। उन्होंने मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन व विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की। लोक सभाध्यक्ष ने बच्चों के मौत के बढ़ते आँकड़ों को चिंताजनक करार दिया। अस्पताल में न तो उचित संख्या में नर्सिंग स्टाफ हैं और न ही संसाधन हैं।

लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला कोटा से ही सांसद हैं। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया कि वो राज्य सरकार के साथ सामंजस्य बैठा कर काम करें और सुनिश्चित करे कि ज़रूरी उपकरण और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्य सरकार को संवेदनशील होकर कार्य करने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि उनका मंत्रालय लगातार निगरानी कर रहा है।

जयपुर से स्वास्थ्य मंत्रालय की 4 सदस्यीय टीम पहुँची। उधर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि राजस्थान में दवाइयाँ फ्री मिलती हैं और लोग बाहर से इलाज के लिए यहाँ आते हैं। गहलोत ने टेस्ट और इलाज फ्री होने की बात करते हुए याद दिलाया कि उनकी सरकार ने ‘निरोगी राजस्थान’ का नारा दिया है।

अस्पताल में रोज़ाना नेताओं की मंडली तो पहुँच रही है लेकिन व्यवस्था जस की तस है। मंगलवार को 5 बच्चों की मौत स्थिति की गवाही देते हैं। नेताओं, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और मीडिया के लोगों की भीड़ लगातार अस्पताल में बनी हुई है। भीड़ के संक्रमण से बचने के लिए उचित व्यवस्था नहीं है। डॉक्टर इलाज छोड़ कर नेताओं के आवभगत में जुटे हैं। बीमारी से कराहते बच्चों के माता-पिता परेशान हैं। ‘राजस्थान पत्रिका’ के कोटा संस्करण के अनुसार, अस्पताल में कई कर्मचारी और स्टाफ वर्षों से जमे हुए हैं, जिन्हें बदला जाना आवश्यक दिख रहा है।

भाजपा ने भी स्थिति के अवलोकन के लिए तीन महिला सांसदों की एक टीम कोटा भेजी। भाजपा ने कहा कि उसके विधायकों ने 50 लाख रुपए की सहायता राशि दी है लेकिन कॉन्ग्रेस की तरफ़ से कोई देखने तक नहीं आया है। भाजपा सांसदों ने आरोप लगाया कि जब बच्चों की मौत हो रही थी, तब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत झारखण्ड में जश्न मनाने गए हुए थे।

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के दफ़्तर में मचाई तोड़फोड़, उद्धव ठाकरे से नाराज़गी है वजह

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे मंत्रिमंडल का विस्तार क्या हुआ, तीनों दलों के कई विधायक अपनी ही पार्टियों से नाराज़ नज़र आ रहे हैं। जहाँ एक तरफ बीड जिले में एनसीपी के विधायक प्रकाश सोलंकी ने अपनी ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया, पुणे में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपने ही दफ्तर में जम कर तोड़फोड़ मचाई। ताज़ा मामला पुणे की भोर सीट से विधायक संग्राम थोपते को मंत्रिपद न मिलने का है। वो वयोवृद्ध कॉन्ग्रेस नेता अनंतराव थोपते के बेटे हैं। उनके समर्थकों ने पुणे में कॉन्ग्रेस कार्यालय में भारी तोड़फोड़ मचाई।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को अपने मंत्रिमंडल में 36 नए मंत्रियों को शामिल किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री को मिला कर महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में कुल 43 सदस्य हो गए हैं। उद्धव के बेटे आदित्य, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और अमित देशमुख नए मंत्रियों में प्रमुख नाम हैं। पुणे पुलिस ने बताया कि थोपते के नाराज़ समर्थकों ने कॉन्ग्रेस कार्यालय पर हमला बोल दिया और वहाँ मौजूद कुर्सियों व गद्दों को फेंक डाला।

पुणे में पार्टी के दफ्तर ‘कॉन्ग्रेस भवन’ में कॉन्ग्रेस के ही कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाया। शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में परिवारवादी नेताओं को बढ़ावा दिए जाने का आरोप लग रहा है, जिसके बाद बगावत के सुर उठने लगे हैं। मजालगाँव से 4 बार चुनाव जीतने वाले विधायक प्रकाश सोलंकी ने भी अप्रत्यक्ष रूप से यही आरोप लगा कर इस्तीफा दिया है। एनसीपी नेता सोलंकी ने घोषणा की है कि वो अब राजनीति से ही दूरी बना कर रखेंगे। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि उनके इस्तीफे का मंत्रिमंडल विस्तार से कुछ लेना-देना नहीं है।

पूर्व मुख्यमंत्री सुशिल कुमार शिंदे की बेटी और कॉन्ग्रेस नेता प्रणीति सोलापुर से विधायक चुनी गई हैं। उन्हें भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, जिसके बाद वोभी नाराज़ बताई जा रही हैं। उनके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।

हमारी दोस्ती चाहिए तो अपने हिस्से का आरक्षण मुस्लिमों को भी दें दलित: शेहला रशीद की नई शर्त

जेएनयू की पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद ने मुस्लिमों को एससी कैटेगरी के अंदर आरक्षण देने की माँग की है। शेहला ने सोशल मीडिया पर पूछा कि कौन लोग ऐसे हैं, जो मुस्लिमों का मित्र बनना चाहते हैं? इसके बाद उन्होंने शर्त रख दी। शेहला ने लिखा कि वो लोग ही मुस्लिमों के हितैषी हो सकते हैं, जो एससी कैटेगरी के अंदर दलित मुस्लिमों के लिए आरक्षण की माँग करें। शेहला ने कहा कि ये एक बेहतर शुरुआत होगी। शेहला का मानना है कि एससी वर्ग में मुस्लिमों को आरक्षण नहीं देना यह दिखाता है कि भारत मजहब के आधार पर भेदभाव कर रहा है। उन्हें लोगों ने जम कर जवाब दिया।

बता दें कि छात्र नेता रहीं शेहला रशीद ने जम्मू कश्मीर की राजनीति में क़दम रखा ही था कि उनकी पार्टी के संस्थापक शाह फैसल दिल्ली एयरपोर्ट पर तुर्की भागते हुए पकड़े गए। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा धरी की धरी रह गई। इसके बाद उन्होंने अल्लाह और इस्लाम की बातें करते हुए राजनीति से सन्यास ले लिया और ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ बन गईं। जहाँ भी मोदी सरकार या भाजपा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होता है, शेहला या तो वहाँ पहुँचती हैं, या फिर सोशल मीडिया के माध्यम से समर्थन देती हैं।

दलित मुस्लिमों को एससी कैटेगरी के अंदर आरक्षण देने की शेहला की माँग का अर्थ क्या है? इसका मतलब ये होगा कि दलितों को मुस्लिमों के साथ एकता प्रदर्शित करने के लिए अपने हिस्से का आरक्षण और अन्य सरकारी सुविधाओं में मुस्लिमों को भी हिस्सा देना होगा। अगर मुस्लिमों को एससी कैटेगरी में आरक्षण X% मिलता है तो इसका अर्थ ये है कि उतनी ही संख्या में दलितों का हिस्सा कट जाएगा। क्या शेहला चाहती हैं कि दलितों को अगर मुस्लिमों के साथ रहना है तो उन्हें अपने हिस्से के आरक्षण की कुर्बानी देनी होगी?

सवाल तो ये भी उठता है कि जात-पात वगैरह तो हिन्दू समाज की देन है न? दशकों से वामपंथी इतिहासकारों का यही नैरेटिव रहा है। तो फिर ये ‘दलित मुस्लिम’ क्या होता है? इसका अर्थ ये है कि मुस्लिमों में भी जाति-व्यवस्था जम कर घुसी हुई है। वैसे मोदी-शाह की जोड़ी जिस तरह से एक-एक कर तीन तलाक़, अनुच्छेद 370, राम मंदिर और सीएए जैसे वादे पूरे कर रही है, उससे शेहला और उनका गैंग पहले से ही चिढ़ा हुआ है।

जामिया हिंसा: अयोध्या फैसले के बाद संविधान को ‘जलाने’ वाले ही आज CAA के विरोध में उसे बचाने उतरे

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाहीन बाग पर हुए महिला प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर कई लोग वहाँ मौजूद महिलाओं की तारीफों के पुलिंदे बाँध रहे हैं। ट्वीट कर-करके हाईवे ब्लॉक करने वाली महिलाओं की तारीफ हो रही है। उन्हें नारी सशक्तिकरण का चेहरा बताया जा रहा है। इसी बीच रेहाना खातून नामक महिला की फोटो शेयर करके भी बताया जा रहा है कि वो अपने 20 दिन के बच्चे को लेकर इस कड़ाके की ठंड में केवल प्रदर्शन करने इसलिए आई हैं ताकि संविधान को बचाया जा सके। महिला का कहना है कि अगर वो ये प्रदर्शन नहीं करेगी, तो उनके बच्चे उससे पूछेंगे, “आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या है।”

हालाँकि, जाहिर है कि शाहीन बाग के प्रदर्शन में शामिल महिलाओं की ऐसी तस्वीरों का प्रयोग सोशल मीडिया पर सीएए के ख़िलाफ़ खड़े लोगों की प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए शेयर किया जा रहा है। लेकिन वामपंथी मीडिया गिरोह के हर ‘नाटक’ की तरह इस प्रदर्शन में भी एक ट्विस्ट है। जिसे समझने के लिए लिए हमें कुछ दिन पहले जाना पड़ेगा, जब राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया था।

दरअसल, राममंदिर मामले में कोर्ट का फैसला आने के बाद जेएनयू छात्रों के बीच व्हॉट्सअप पर बातचीत हुई थी। जिसे पढ़ने के बाद आप वर्तमान में हो रहे प्रदर्शन की तस्वीर को सही से समझ पाएँगे और जान पाएँगे कि हाईवे जाम करने वालों के इस विरोध में कितनी सच्चाई है, इसे शुरू करने वाले लोगों का क्या उद्देश्य है?

ऊपर दिए चैट के स्क्रीनशॉट में देखा जा सकता है कि आज सड़के जाम करके संविधान को बचाने की बात करने वालों में शर्जील इमाम इस ग्रुप का हिस्सा है और जो अयोध्या पर फैसला आने के बाद संविधान को जलाने की बातें कर रहा है। साथ ही ये भी बोल रहा हैं कि वो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए फैसले को नहीं जला सकते, क्योंकि वो बहुत लंबा है। जिसपर वसीम नाम का सदस्य शर्जील की बात का रिप्लाई देते हुए कहता है कि वो संवैधानिक होने की कोशिश नहीं कर रहा, लेकिन ऐसा करने से उनपर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

बता दें, इस बातचीत में शर्जील सिर्फ़ इतना ही नहीं कहता। वो अपनी बात को ये कहकर शुरू करता है कि वो चाहता हैं कि संविधान को जलाने का समारोह जेएनयू में आयोजित हो। वो समझाता है कि किस तरह आखिर ये फैसला एक बदलाव का समय है और जो मुस्लिम संविधान की वाह-वाही कर रहे हैं उन्हें संदेश भेजा जाना चाहिए है कि वे संविधान में यकीन नहीं करते। इसलिए इसे जला दिया जाना चाहिए।

इसके बाद वो लोगों संविधान खारिज करने की अपील करते हुए कहता है कि इसके लिए ज्यादा लोगों की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ़ कुछ मुस्लिम और गैर-मुस्लिम इसके लिए काफी हैं। इस बीच एक सनी नाम का ग्रुप सदस्य उसे सलाह देता है कि तुम ऐसा जेएनयू के दरवाजे के बाहर क्यों नहीं करते। जिसपर शर्जील जवाब देता है कि उसकी इच्छा है कि ये काम कहीं पर भी हो, लेकिन बस हो। ऐसे में जब कोई दूसरा शख्स उसे कहता है कि वे कोर्ट के फैसले को जला सकते हैं, तो शर्जील कहता है कि वो संविधान जलाने की सलाह देगा, क्योंकि फैसला 1500 पेजों का है।

अब आखिर ये शर्जील है कौन?

शर्जील इमाम जेएनयू में मॉडर्न हिस्ट्री का छात्र है। इसने आईआईटी बॉम्बे से कम्प्यूटर साइंस की पढ़ाई की है। साथ ही द वायर, द क्विंट और फर्स्टपोस्ट जैसे वामपंथी प्रोपगेंडा फैलाने वाली वेबसाइट्स में बतौर स्तंभकार काम करता है। इसके अलावा अपने खाली टाइम में शर्जील भीड़ को भड़काकर दंगे फैलाने और सड़कें जाम करने का काम भी करता है।

जिसका उदाहरण फेसबुक पर मुस्लिम स्टूडेंट ऑफ जेएनयू द्वारा अपलोड की गई 14 दिसंबर 2019 की वीडियो है। जिसमें शर्जील सीएए के ख़िलाफ़ भीड़ को कहता नजर आ रहा है कि उनकी संपत्तियाँ जब्त कर ली जाएँगी और उन्हें पाकिस्तान भेज दिया जाएगा। इसके अलावा 40 सेकेंड की वीडियो में वो कुरान का हवाला दे देकर बताने की कोशिश कर रहा है कि आखिर किस तरह कुरान, संविधान से ऊपर हैं। वीडियो में वो बताता हैं कि वो किस तरह एक जेएनयू का छात्र है और दिल्ली में चक्काजाम करना चाहता है।

वीडियो में उसे कहते सुना जा सकता है कि वो चाहता है कि दिल्ली में चक्का जाम हो। जिसके लिए वो समुदाय विशेष को केंद्र में रखकर कहता है कि मु###न सिर्फ़ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि… हिंदुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। इसके बाद वो भीड़ को उकसाते हुए कहता है “क्या मु###नों में इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद कराया जा सके।”

संविधान को फासीवादी बताते हुए शर्जील यहाँ फिर कुरान का हवाला देता है और बताता है कि ये कुरान में है अगर कोई तुम्हें घर से निकाले तो तुम उसे घर से निकालो।

9 मिनट की वीडियो में ही शर्जील भीड़ को समझा देता है कि आखिर कैसे लोगों को सड़कों पर उतरने से हिचकना नहीं चाहिए। वो बताता है कि ये दिल्ली हैं और पुलिस की हर कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया आएगी। इसके अलावा शर्जील ये भी कहता है, “आग लगाने के लिए 2 काम करने होंगे… लाठी खाने के लिए तैयार रहना होगा और नंबर दो ऑर्गनाइज़ (संगठित) रहना होगा।”

इतना ही नहीं, शर्जील इस वीडियो में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को भी खारिज करता दिख रहा है। शर्जील अपनी कट्टरता के अनुरूप भीड़ को तैयार करते हुए भीड़ को उन लोगों से दूर रहने की सलाह देता है जो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए उन्हें बुलाते हैं। उसका कहना है, “अगर वो सच में हमारी परवाह करते हैं, तो उन्हें हमारे पास आना चाहिए। देखते हैं कौन आएगा।” इसके बाद वो भीड़ को अन्य समूहों के प्रति भड़काता है और कहता है कि आम आदमी पार्टी या AISA से उम्मीदें मत लगाइए। हम दिल्ली को बंद करना चाहते हैं, यहाँ दुकाने बंद करना चाहतें हैं, दूध की बिक्री बंद करना चाहते हैं।

अब सोचिए, 14 दिसंबर को जिस शर्जील की स्पीच में इतना जहर हो और जिसने दो मिनट भी मजहब से हटकर बात न की हो, जो दिल्ली बंद करने पर आमादा हो, सड़क जाम करवाने पर उतारू हो, जो कुरान का हवाला देकर बाकी सभी प्रदर्शनों को खारिज कर रहा हो… और जिसके कहने पर अगले ही दिन जामिया से 3 किलोमीटर दूर चलकर आए प्रदर्शनकारी वहाँ इकट्ठा हो जाएँ और कहें वे वहाँ संविधान को बचाने आए हैं। तो उस प्रदर्शन को क्या समझा जाएगा? ट्विटर पर 20 दिन के बच्चे के साथ उसकी माँ की तस्वीरें और संविधान बचाने के नामपर सड़कों पर बैठे लोगों की तस्वीर शेयर करके इस प्रोटेस्ट को गंभीरता रूप दिया जा रहा है।

लेकिन, जिसकी जड़ शर्जील जैसे लोग हैं और जिस प्रदर्शन का पूरा खाका एक कट्टरपंथी ने तैयार किया हो, उस समय शाहीन बाग का प्रोटेस्ट कितना वास्तविक लग सकता है और इसके पीछे का उद्देश्य क्या हो सकता है। ये खुद सोचिए…..

शर्जील लगातार 15वें दिन तक हाइवे ब्लॉक करने को अपने लिए गर्व की बात समझता हैं और लोगों को भड़काऊ बयान देकर उकसाना अपना फर्ज। लेकिन, उसे हीरो बनाने वालों को और उसके दिखाए रास्ते पर चलकर हाईवे पर बैठने वालों को ये याद रखने की जरूरत है कि शर्जील वही शख्स है जिसने एक महीने पहले अयोध्या फैसला आने पर संविधान को जलाने की बात की थी और अब मौक़ा देखकर इसे बचाने के नाम पर चक्काजाम करवा रहा है।

‘नया साल गैरों का त्योहार, मुस्लिम न मनाएँ खुशी वरना बनेंगे गुनहगार: देवबंद के उलेमा का फतवा’

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में देवबंदी उलेमा ने नए साल के मौक़े पर मुस्लिमों से अपील की है कि वे 1 जनवरी को नया साल न मनाएँ। न्यूजस्टेट की रिपोर्ट के मुताबिक उनका तर्क है कि 1 जनवरी को ईसाई धर्म के लोग नया साल मनाते हैं। इस्लाम में नया साल तो मोहर्रम से शुरु होता है। इसलिए वे लोग गैरों के त्योहार न मनाएँ और जो मुस्लिम इस 1 जनवरी को नया साल मनाते हैं वो गुनहगार होते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, नए साल के जश्न में डूबे युवाओं से इस तरह की अपील इत्तेहाद उलेमा ए हिन्द के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुफ्ती असद कासमी ने की है। उन्होंने कहा है कि आम तौर पर जनवरी को ही नए साल के रूप में मनाया जाता है। लेकिन इस्लामी नजरिए के एतबार से जनवरी इस्लामी साल की शुरुआत नहीं हैं। इसलिए वे इस्लामी नजरिए से बताते हुए कहते हैं कि इस्लाम का नया साल मोहर्रम से शुरु होता है और इस्लाम के अंदर मोहर्रम को ही नया साल माना जाता है।

उनके मुताबिक, जनवरी से जो नया साल शुरु होता है, उसे ईसाई धर्म को मानने वाले मनाते हैं। जिससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन वह मुस्लिमों से ये अपील करना चाहते हैं कि जनवरी में कोई भी मुस्लिम इसकों न मनाए। क्योंकि जो भी जनवरी की शुरुआत में नया साल मनाते हैं वे गुनहगार होते हैं।

गौरतलब है कि इंटरनेट पर मौजूद इस विषय की जानकारी के अनुसार, इस विषय पर कई लोगों की अलग-अलग राय हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वाकई इस्लाम के मुताबिक जनवरी में नए साल को मनाना एक गुनाह हैं और भूलकर भी ऐसा नहीं करना चाहिए। वहीं, कुछ समुदाय के लोगों का कहना है तथाकथित न्यू ईयर का जश्न मनाने के दौरान कई गुनाह होते हैं, जैसे नाच-गाने के दौरान महिला और पुरुष के बीच कोई पर्दा न होता, लोग शराब पीते हैं आदि-आदि। इसलिए गैर-मुस्लिमों को ही ये त्योहार मनाने देना चाहिए और इस तरह की चीजों का अनुसरण नहीं करना चाहिए। इसके अलावा लोग कहते हैं कि अगर इतने के बावजूद भी उनके मन में सवाल उठते हैं तो उन्हें इस विषय के बारे में मुफ्ती से पता करना चाहिए, ताकि मुफ्ती अन्य मुफ्तियों से बात करके इस बारे में फतवा जारी कर सके।

नए साल के अवसर पर मुस्लिम युवकों से अपील करने वाले उलेमा इससे पहले टीएमसी सांसद पर की गई टिप्पणी के कारण चर्चा का विषय रह चुके हैं। जहाँ उन्होंने नुसरत जहाँ द्वारा दुर्गा पूजा करने को नाजायज ठहराया था और कहा था कि इस्लाम में अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और की इबादत करना/पूजा करना जायज नहीं है, उनको अपना नाम बदल लेना चाहिए। इस्लाम को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो मुस्लिम नाम रखकर इस्लाम और मुस्लिमों को बदनाम करे।