नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के 9 दिसंबर को पास होने के बाद से ही देशभर में हिंसात्मक विरोध-प्रदर्शनों से दहशत का माहौल बना हुआ है। कॉन्ग्रेस समेत पूरा विपक्ष इस क़ानून के विरोध में खड़ा हुआ है। दंगाइयों द्वारा मचाए गए उत्पात की ख़बरें लगातार सुर्ख़ियों में बनी हुईं हैं। फिर भले ही उपद्रवियों को इस क़ानून के बारे में धेला भर कुछ न मालूम हो, लेकिन विरोधरुपी आग लगाने में वो इस क़दर डूबे नज़र आए कि उन्होंने 7 से 14 साल के बच्चों को भी न सिर्फ़ बरगलाया बल्कि उनसे जानलेवा हमला भी करवाया।
लेकिन, क्या आपको मालूम है कि दंगाइयों द्वारा मचाए उत्पात के चलते जब हालात क़ाबू से बाहर होते हैं तो पुलिस वालों के पास इतना भी वक़्त नहीं होता कि वो चैन से दो वक़्त का खाना भी खा सकें। 21 दिसंबर का दिन एक ऐसा ही दिन था। IPS ऑफ़िसर नवनीत सिकेरा ने अपने दोस्त से मिली जानकारी के आधार पर SI सुशील सिंह राठौर के साथ घटित एक ऐसी घटना का ज़िक्र किया, जिसमें उनके दो अन्य साथियों (SI गौरव शुक्ल और SI विजय पांडे) का ज़िक्र शामिल था।
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में SI सुशील सिंह राठौर अपने दोनों साथियों के साथ ड्यूटी पर थे। ड्यूटी के दौरान उन्हें नाश्ता-पानी की फ़ुर्सत नहीं मिली। लेकिन शाम को वो और उनकी टीम ड्यूटी प्वाइंट के सामने एक रेस्टोरेंट में गए। जहाँ उन्होंने अपने साथियों के साथ खाना तो खाया, लेकिन कोई उनका बिल चुका कर चुपचाप ऐसे वहाँ से चला गया, जिसकी भनक तक उन्हें नहीं लगी। इसका ज़िक्र IPS ऑफ़िसर नवनीत सकेरा ने अपनी फ़ेसबुक वॉल पर भी किया।
दरअसल, उस क्षेत्र में SI सुशील सिंह राठौर और उनके दो साथियों की तैनाती के चलते उस जगह किसी तरह का कोई हिंसात्मक विरोध-प्रदर्शन नहीं हो पाया था और शांति-व्यवस्था बनी हुई थी। जबकि उसके एक दिन पहले यानी 20 दिसंबर को वहाँ हिंसात्मक विरोध-प्रदर्शन हुए थे। इसी वजह से तीनों पुलिसकर्मी मुरादाबाद के सिविल लाइन के पीली कोठी चौराहे पर सुबह से ही मुस्तैद थे। लेकिन, शाम होते-होते उन्हें भूख लगने लगी।
इलाक़े में शांति-व्यवस्था दुरुस्त देखते हुए वो तीनों शाम के समय मुरादाबाद के सिविल लाइन के पीली कोठी चौराहे के नज़दीक स्थित रेस्टोरेंट में खाना-खाने चले गए। वहाँ उन्होंने खाने का ऑर्डर दिया। जहाँ सुशील सिंह और उनके साथी बैठे हुए थे, वहीं पास में ही एक फैमिली भी बैठी थी। जब उनका ऑर्डर किया खाना टेबल पर आ गया तो तीनों पुलिसकर्मी खाना खाने लगे। इतने में उनके पास ही में बैठी फैमिली कब खाना खाकर बिल पेमेंट करके चली गई, इसका उन्हें पता ही नहीं लगा, और न ही उन्होंने पुलिसकर्मियों से इस बारे में कोई बात ही की थी।
लेकिन, जब पुलिसकर्मियों ने खाना खाने के बाद बिल पेमेंट करने के लिए वेटर को बुलाया तो वहाँ मैनेजर ने ख़ुद आकर उन्हें बताया कि उनके खाने का बिल पेमेंट हो चुका है। यह पूछे जाने पर कि उनके खाने का बिल किसने दिया, तो उन्हें रेस्टोरेंट के मैनेजर से जवाब मिला कि जो फैमिली उनके पास में बैठी थी, उन्होंने आपका बिल दिया और साथ ही आप लोगों के लिए एक मैसेज भी छोड़ा है जिसके अनुसार, “आप लोग अपना घर-परिवार छोड़कर दिन-रात हमारे लिए खड़े रहते हैं, तो आपके प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य बनता है।”
जब सुशील सिंह और उनके साथियों ने यह भावनात्मक संदेश सुना तो सब भौंचक्के से रह गए। सम्मान की भावना से गदगद पुलिसकर्मियों के दिलो-दिमाग में अनेकों भावनाएँ घर कर गईं। किसी अजनबी से मिले इतने सम्मान को पाकर वे सभी ख़ुशी से फूले नहीं समाए। वो लोग दौड़कर गेट पर आए, जिससे उस फैमिली को इस आदर-सम्मान और प्रेमभाव के लिए धन्यवाद दे सकें। लेकिन, वो फैमिली तब तक वहाँ से जा चुकी थी, पुलिसकर्मी उस फैमिली से मुलाक़ात नहीं कर पाई।
SI सुशील सिंह और उनके साथी भले ही उस फैमिली से न मिल पाएँ हों लेकिन IPS ऑफ़िसर नवनीत सिकेरा ने धन्यवाद देने के लिए फ़ेसबुक जैसे मंच का सहारा लिया और पूरे वाकये को लिखकर बयाँ कर डाला। इसमें उन्होंने यह भी लिखा कि पुलिस के प्रति जनता के इसी विश्वास और प्रेम की वजह से हम पुलिसवाले पूस की सर्द रातों में, जेठ की तपती दोपहरी में और मूसलाधार बारिश में भी उनकी सुरक्षा में अपना सब कुछ छोड़कर सदैव तत्पर रहते हैं। उन्होंने अफ़सोस जताते हुए लिखा कि वो उस फैमिली से तो नहीं मिल पाए पर जब हम लोग अपनी फोटो ले रहे थे तो उस परिवार के एक सदस्य की भी फोटो उसमें आ गई थी, जिसे उन्होंने अपलोड भी किया।
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों की ऐसी कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिनमें पुलिसकर्मियों की जान लेने पर उतारू दंगाइयों में बच्चे भी शामिल थे, जिन्होंने पुलिस पर तेज़ाब भरी बोतलें फेंकी, तो कहीं उन पर पत्थरबाज़ी की। लेकिन, फिर भी जगह-जगह मुस्तैद पुलिसकर्मी अपनी जान की परवाह किए बिना जनता की सुरक्षा में तैनात रहे।
जनता की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों के बारे में यह बात कोई नहीं जानता कि उन्हें भी भूख लगती है, उन्हें भी दो पल सुकून के चाहिए होते हैं, ताकि वो दो निवाले शांति से खाकर अपने काम में फिर से जुट सकें। लेकिन, अफ़सोस की बात है कि दंगों के दौरान पुलिसकर्मियों को फ़ुर्सत के यह चार पल नसीब नहीं हो पाते।
ज़रा सोचिए, क्या हो अगर पुलिस दंगे और अशांति भरे माहौल से ख़ुद को बचाने में जुट जाए और गंभीर हुए हालातों को क़ाबू करने की बजाए हाथ खड़े कर दे? क्या हो अगर दंगाइयों, उपद्रवियों और हिंसक विरोधियों से लोहा लेने में जुटी पुलिस पीछे हट जाए? क्या हो अगर साम्प्रदायिक रंग में रंगे दंगों की स्थिति को भाँपकर पुलिस वहाँ न पहुँचे जहाँ लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हों? क्या हो अगर पुलिस छोटे-छोटे आपसी बैर को समय पर सुलझाकर उसे बड़ी लड़ाई के रूप में परिवर्तित होने से न रोक ले?
इन जानलेवा परिस्थितियों से लोगों को सुरक्षा मुहैया कराने में अगर एक बार पुलिस से चूक हो जाए तो उसकी भरपाई कैसे होगी, इसका अंदाज़ा ख़ुद-ब-ख़ुद लगाया जा सकता है। इसलिए पुलिस को नकारा-निकम्मा कहने से पहले ऊपर दिए गए सवालों के जवाब में पुलिस की अहम भूमिका को जानें और समझें, हो सकता है तब पुलिसकर्मियों के अस्तित्व में आप ख़ुद को सुरक्षित रख पाने की असल वजह को महसूस कर पाएँ।
नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ देश भर में हुए बवाल के बीच उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओपी सिंह का एक बड़ा बयान आया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार डीजीपी ने इस पूरी हिंसा के लिए कट्टरपंथी समूहों और मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) समेत समाजवादी पार्टी को पश्चिमी यूपी में भड़की हिंसा के लिए उत्तरदायी कहा है।
डीजीपी ओपी सिंह ने बताया कि इस संबंध में उन्होंने पीएफआई दफ्तर के तीनों पदाधिकारियों मोहम्मद वसीम, नदीम अली, मोहम्मद अश्फाक को गिरफ्तार किया है। जिन्होंने पूछताछ में प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने के प्लान का खुलासा किया।
गौरतलब है कि यूपी डीजीपी का बयान उस समय आया है, जब राज्य में हुई 18 लोगों मौतों के लिए पुलिस को सवालों को घेरे में लिया जा रहा है। लेकिन, यहाँ यह भी देखने वाली बात है कि कट्टरपंथी समूह और समाजवादी पार्टी के बयानों में लगभग एक समानता है। क्योंकि दोनों ही इस हिंसा के लिए वर्तमान सरकार को और राज्य की पुलिस को जिम्मेदार ठहराना चाहते हैं।
यहाँ बता दें कि बीते रविवार को ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सारी हिंसा के लिए सरकारी मशीनरी को जिम्मेदार बताते हुए प्रदर्शनकारियों के प्रदर्शन को शांतिपूर्ण करार दे चुके हैं। लेकिन, वहीं डीजीपी के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान राज्य के 7 जिलों में 100 करोड़ से ज्यादा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है। जिसके मद्देनजर प्रशासन ने उन पर कार्रवाई करने के भी आदेश दे दिए हैं।
एक जानकारी के अनुसार पुलिस ने अब तक राज्य में 925 लोगों को गिरफ्तार किया है और 213 मामले दर्ज किए हैं। इसके अलावा पुलिस ने संभल, कानपुर, रामपुर, लखनऊ, अलीगढ़, फिरोजाबाद, मुजफ्फरनगर और मेरठ जैसी जगहों 500 गैर-प्रतिबंधित कारतूस भी बरामद किया है। प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किए गए देसी कट्टे भी पुलिस की पड़ताल में पाए गए हैं।
पुलिस महानिदेशक के मुताबिक चूँकि पुलिस ने हिंसा को रोकने के लिए कारतूस का इस्तेमाल किया ही नहीं, इसलिए ये बात स्पष्ट है कि दंगाईयों ने ही इन गोलियों का इस्तेमाल कर पुलिस पर हमला किया। इस कारण से कम से कम 62 पुलिसकर्मी घायल (गोली लगने से) हो गए। जबकि कुल घायल पुलिस वालों की संख्या 288 (गोली या अन्य तरह से चोटिल) है।
यहाँ बता दें कि यूपी में बीते दिनों हुई हिंसा पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने यूपी डीजीपी ओम प्रकाश सिंह के लिए नोटिस जारी कर उनसे चार हफ्तों में जवाब माँगा है। नोटिस में हिंसा के दौरान हुई मौतों, इंटरनेट सेवाओं को बाधित किए जाने और पुलिसकर्मियों द्वारा लोक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसे बिंदुओं पर जवाब माँगा गया है।
चीन अपने देश में रह रहे उइगर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अख़्तियार करने के बाद अब अपने ‘समाजवादी मूल्यों’ (Socialist Values) को प्रतिबिंबित करने के लिए बाइबल और क़ुरान को फिर से लिखेगा।
Dailymail की ख़बर के अनुसार, पार्टी के एक प्रमुख अधिकारी ने कहा है, “नए संस्करण में ऐसी कोई भी बात नहीं होनी चाहिए जो कि कम्युनिस्ट पार्टी के विश्वासों के ख़िलाफ़ जाती हो। जो भी पैराग्राफ ग़लत समझे जाएँगे, उनमें या तो बदलाव किया जाएगा या फिर उनका फिर से अनुवाद करवाया जाएगा।”
चीन में इस संबंध में जो आदेश जारी हुआ है, उसमें हालाँकि विशेष रूप से बाइबल और क़ुरान का उल्लेख नहीं किया गया है। पार्टी का कहना है, “ऐसे धार्मिक धर्मशास्त्रों के व्यापक मूल्यांकन की बात कही गई है, जो उन बातों को लेकर हैं, जो समय में आए बदलाव के अनुरूप नहीं हैं।” दरअसल, यह आदेश नवंबर में चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेंट कॉन्फ़्रेन्स की राष्ट्रीय समिति की जातीय और धार्मिक मामलों की समिति द्वारा आयोजित एक बैठक के दौरान दिया गया था, जो चीन में जातीय और धार्मिक मामलों की देखरेख करता है।
सिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, पिछले महीने हुई कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना की केंद्रीय समिति की एक बैठक हुई थी। इस बैठक में 16 विशेषज्ञों, विश्वासियों और विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों के एक समूह में भाग लिया। फ्रांसीसी अखबार ले फिगारो की ख़बर के अनुसार, मीटिंग के चेयरमैन वांग यांग ने बात पर ज़ोर दिया था कि धार्मिक अधिकारियों को राष्ट्रपति शी के निर्देशों का पालन करना चाहिए और ‘युग की आवश्यकताओं’ और ‘समाजवाद के मूल मूल्यों’ के अनुसार विभिन्न धर्मों की विचारधाराओं की व्याख्या करनी चाहिए।
उन्होंने अधिकारियों से ‘चीनी विशेषताओं के साथ एक धार्मिक प्रणाली’ बनाने का आग्रह किया। अधिकारियों ने श्री वांग के निर्देशों पर सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि यह मिशन ‘इतिहास का विकल्प’ है। इसके अलावा उन्होंने यह दावा भी किया कि धार्मिक पुस्तकों का ‘पुनर्मूल्यांकन’ करके, वे ‘चरमपंथी विचारों (heretical ideas)’ और ‘विधर्मी विचारों’ को देश को ख़त्म करने से रोकेंगे।
यह बैठक नवंबर में इसलिए हुई क्योंकि क्योंकि चीन को अपनी धार्मिक नीति पर वैश्विक आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। लीक हुए दस्तावेज़ों से पता चला था कि चीनी सरकार कैसे सुदूर-पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में अपने मुस्लिम लोगों को निर्वासित करने के लिए पुन: शिक्षा केंद्रों की एक प्रणाली चलाती है।
लीक हुए दस्तावेज़ों में चीन (बीजिंग) के डिटेंशन सेंटर्स को चलाने के दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख शामिल था। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि इस क्षेत्र के डिटेंशन सेंटर्स (क़ैदखाने) में कम से कम दस लाख जातीय उइगर और अन्य मुस्लिम हैं।
इसके अलावा, पूर्व बंदियों ने दावा किया कि मुस्लिमों को पोर्क (सूअर का मांस) खाने और उन आंतरिक शिविरों में मंदारिन बोलने के लिए भी मजबूर किया गया। शुरू में इन डिटेंशन सेंटरों के अस्तित्व को नकारने के बाद, चीन ने स्वीकार किया कि उसने शिनजियांग में ‘व्यावसायिक शिक्षा केंद्र’ खोले हैं, जिसका उद्देश्य मंदारिन और नौकरी से जुड़े कौशल सिखाकर चरमपंथ को रोकना है।
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने नवंबर में कहा था कि लीक हुए दस्तावेज़ों ने साबित कर दिया था कि चीनी अधिकारी मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यकों का बड़े पैमाने पर और व्यवस्थित तरीक़े से दमन करने में लगे हुए थे।
चीन का विदेश मंत्रालय बर्खास्त रहा, प्रवक्ता गेंग शुआंग ने सोमवार को ‘कुछ मीडिया’ पर चीन के आतंकवाद और शिनजियांग में चरमपंथ विरोधी प्रयासों को ख़त्म करने का आरोप लगाया। लंदन में चीनी दूतावास ने इस तरह के दस्तावेज़ों से इनकार करते हुए इस तरह की ख़बर को फ़र्ज़ी करार दिया।
नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (NRC) के मुद्दे पर हिंगोली से शिवसेना के सांसद हेमंत पाटिल पार्टी के रुख़ से अलग खड़े नज़र आ रहे हैं। इन दोनों मुद्दों पर उन्होंने मोदी सरकार का समर्थन करते हुए ज़िला प्रशासन को एक पत्र लिखा है।
इस पत्र में कहा गया है, “मैं CAA और NRC के समर्थन में निकाली गई रैली में शामिल नहीं हो सका, क्योंकि मैं मीटिंग में बिज़ी था। मैं इसके लिए दु:ख व्यक्त करता हूँ। मैंने लोकसभा में इन मुद्दों का समर्थन किया। शिवसेना हमेशा से हिन्दुत्ववादी विचारधारा वाली पार्टी रही है। मैं इन दोनों मुद्दों का पुरज़ोर समर्थन करता हूँ, इसलिए मैं इस बारे में पत्र लिख रहा हूँ।”
शिवसेना ने लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर मोदी सरकार का समर्थन किया था। लेकिन, राज्यसभा में शिवसेना सांसदों ने वोटिंग से पहले वॉक-आउट कर लिया था। इस मामले पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा था, “ये कानून वीडी सावरकर के सपनों के भारत के ख़िलाफ़ है। सावरकर का मानना था कि सिंधु नदी से लेकर सिंधु महासागर तक भारत एक राष्ट्र है। जैसा कि सावरकर ने सोचा था, क्या आप (केंद्र सरकार) उस तरह से देश को एकजुट कर रहे हैं। आप दूसरे देशों (पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश) से हिन्दुओं को बुला रहे हैं। इसका मतलब है कि आप सावरकर के विचारों को अनदेखा कर रहे हैं।”
दरअसल, नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। कॉन्ग्रेस और शिवसेना समेत कई विपक्षी राजनीतिक दल इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं।
हाल ही में भाजपा नेता संबित पात्रा ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें शिवसेना के एक नेता ने माना था कि उन्हें नागरिकता संशोधन क़ानून के बारे में नहीं पता। इतना ही नहीं उन्होंने इस क़ानून की जानकारी जुटाने की कोई ज़ेहमत नहीं उठाई। इसलिए उन्होंने इस क़ानून के बारे में पढ़ना भी उचित नहीं समझा और बिना पढ़े ही इसके विरोध में खड़े हो गए। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि नागरिकता संशोधन क़ानून और को लेकर नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स को लेकर किस तरह से बेवजह का मुद्दा बनाया जा रहा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य जनता को भ्रमित करना भर है।
हैदराबाद के सरूरनगर स्टेडियम में कल बुधवार (दिसंबर 25, 2019) को संघ द्वारा आयोजित ‘विजय संकल्प सभा’ के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुँचे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई बड़ी बातें की। इस समारोह में संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस सभी को स्वीकार करता है, उनके बारे में अच्छा सोचता है और उन्हें बेहतरी के लिए उच्चस्तर पर ले जाना चाहता है। उन्होंने देश में बिगड़ते हालातों को देखकर समरसता बनाए रखने की बात कही। साथ ही धर्म विजय के बारे में भी कार्यकर्ताओं को बताया। उन्होंने कहा कि भारत पारंपरिक रूप से ‘हिंदुत्ववादी’ रहा है। इसलिए धर्म और संस्कृति की विविधता के बावजूद संघ 130 करोड़ देशवासियों को ‘हिंदू समाज‘ मानता है।
वे कहते हैं कि जब संघ ‘हिंदू समाज’ कहता है तो उसमें सभी शामिल हो जाते हैं जो यह मानते हैं कि भारत उनकी मातृभूमि है। वैसे लोग जो देश के पानी, जमीन, पशु और जंगलों से प्यार करते हैं और जो देश की महान संस्कृति और परंपरा को जीते हैं, वे सभी हिंदू हैं।
उन्होंने कहा, एक प्रचलित वाक्य है- विविधता में एकता। लेकिन हमारा देश एक कदम आगे जाता है। केवल विविधता में एकता नहीं बल्कि एकता की ही विविधता है। हम विविधताओं में एकता नहीं खोज रहे हैं, हम उस एकता को खोज रहे हैं जिससे विविधता निकली है।
अपने भाषण के दौरान मोहन भागवत ने रवींद्र नाथ टैगोर के निबंध ‘स्वदेशी समाज’ का उल्लेख करते हुए कहा कि टैगोर ने कहा है कि भारत का उद्धार, न राजनीति से होगा और न नेताओं से। इसके लिए समाज में परिवर्तन चाहिए। क्योंकि भारतीय समाज का स्वभाव है एकता की ओर बढ़ना है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने समारोह में दिए अपने भाषण में ब्रिटिश राज और उनके ‘फूट डालो- राज करो’ की नीति की भी लोगों को याद दिलाई। इसके साथ ही संघ प्रमुख ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की बात दोहराई, जिसमें टैगोर ने हिंदू और मुस्लिमों के बीच एकता पर जोर दिया था।
संघ प्रमुख ने आगे कहा कि भारत में पैदा होने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है। वे अलग-अलग धर्मों का पालन कर रहे हैं जो अलग-अलग हैं लेकिन सभी भारतीय हैं और भारत माता की संतान हैं।
गौरतलब है कि बुधवार को हुए इस संघ समारोह में करीब 20 हजार संघ कार्यकर्ता अपनी यूनिफॉर्म पहनकर शामिल हुए। जिनमें से कुछ ने वहाँ पर लाठी के साथ मार्च भी किया। इस दौरान बीजेपी महासचिव राम माधव, गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी सहित तेलंगाना राज्य के सभी सांसद और पार्टी के अन्य पदाधिकारी भी वहाँ मौजूद रहे।
राहुल गाँधी द्वारा मसूद अजहर को “मसूद अजहर जी”कहने के बाद ट्विटर पर “#RahulLovesTerrorists” ट्रेंड किया था। यह कॉन्ग्रेस की प्रवृत्तियों की ओर इशारा भले रहा हो, लेकिन, कॉन्ग्रेस की वास्तविक आतंकवाद समर्थक नीतियाँ मात्र ‘जी’ के उल्लेख से कहीं अधिक खतरनाक और गंभीर रही हैं। सच तो यह है कि सैम पित्रोदा का पुलवामा हमले को छोटी-मोटी घटना बताते हुए आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले को गलत बताना भी कॉन्ग्रेस पार्टी और द्रमुक जैसे उसके सहयोगी दलों के नेताओं के बयानों और दूसरे खतरनाक कामों की तुलना में बहुत छोटी सी बात है।
14 फरवरी 1998 को कोयंबटूर में विनाशकारी बम धमाके हुए थे, जिसमें 58 लोग मारे गए थे। इस हमले में लालकृष्ण आडवाणी की जान चमत्कारिक तरीके से बची थी क्योंकि उनका हवाई जहाज आकस्मिक तरीके से 90 मिनट से अधिक की देरी से चला था। तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने उस नाजुक मौके पर भी हास्यास्पद और विचित्र आरोप लगाते हुए विस्फोटों के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराया था।
इसके बाद, आरएसएस ने सीताराम केसरी पर मुकदमा दायर किया था। ऐसा होने पर खबरें आई थीं कि केसरी ने कहा कि उन्होंने वैसा कोई आरोप लगाया ही नहीं था। फिर, उन्होंने आरोप लगाने से इनकार करने का खंडन किया और अपनी बात पर अड़े रहे। कोयम्बटूर की उस घातक घटना में आडवाणी की जान भले बच गई थी लेकिन कई भाजपा कार्यकर्ताओं समेत 58 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस नेताओं में मानवीय संवेदना नहीं जागी और उन्होंने इस तरह का लापरवाह, असंवेदनशील और अमानवीय बयान दिया।
इतना ही नहीं, पार्टी ने केसरी के इस आरोप का पूरी तरह से समर्थन किया। पार्टी की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष ने कहा: “अगर बम भाजपा के अलावा किसी और ने लगाया होता, तो ऐसा करने वाले ने निश्चित रूप से आडवाणी को मार दिया होता। क्योंकि यह बम खुद भाजपा के लोगों ने लगाया था, इसलिए उन्होंने जानबूझकर आडवाणी की बैठकों में देरी की।”
बात इतनी ही नहीं है। इन बम धमाकों को अंजाम देने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी समूह अल-उम्मा और तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम (टीएनएमएमके) थे। इन विस्फोटों के बाद 2004 और 2006 आदि में कॉन्ग्रेस ने वास्तव में तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम (टीएनएमएमके) के साथ गठबंधन किया। इसके पहले टीएनएमएमके इसी नाम से चुनाव लड़ा करती थी। फरवरी 2009 में इसने एक अलग राजनैतिक इकाई का गठन करके उसका नाम मणिथनेया मक्कल काची (एमएमके) रखा।
कोयंबटूर में 1998 में हुए धमाके वहाँ की द्रमुक सरकार की आतंकवाद समर्थक नीतियों के कारण हुए थे।
उन धमाकों से पहले नवंबर 1997 में वहाँ झड़पें हुई थीं। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने पहले सेल्वाराज नामक पुलिस कॉन्स्टेबल को मार डाला था। इसके बाद भड़के दंगों में 18 मुस्लिम मारे गए। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट विचारधारा वाली पत्रिका फ्रंटलाइन ने भी लिखा था कि :
“सेल्वाराज की हत्या ही वह एक घटना थी, जिसके कारण कोयंबटूर का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ था। अल-उम्मा कार्यकर्ताओं ने 29 नवंबर की रात को सेल्वाराज पर तब हमला किया, जब वह कोट्टाइमेडु के एक मुस्लिम-बहुल इलाके में यातायात व्यवस्था संभाल रहे थे। उसी दिन, कोट्टाइमेडु के पास बाज़ार थाने के सब-इंस्पेक्टर एम. चंद्रशेखरन ने अल उम्मा के पदाधिकारी जहाँगीर और दो अन्य मुस्लिम युवाओं को बिना ड्राइविंग लाइसेंस मोटरसाइकिल पर सवारी करने के आरोप में हिरासत में लिया था। अल उम्मा के तत्कालीन राज्य सचिव मोहम्मद अंसारी ने थाने में जाकर उनकी रिहाई की माँग की थी। इस दौरान अंसारी और सब-इंस्पेक्टर के बीच बात बढ़ गई और अंसारी ने “कोयंबटूर को दो टुकड़ों में तोड़ कर रख देने” की धमकी दी थी। इस घटना के लगभग एक घंटे बाद, चार मुस्लिम युवकों ने 31-वर्षीय सेल्वाराज को चाकू मार दिया जबकि पहले की घटना से उसका कोई संबंध नहीं था। अल उम्मा के लोग किसी भी पुलिसकर्मी को निशाना बनाना चाहते थे क्योंकि उनके साथियों को पुलिस ने हिरासत में लिया था और अंसारी को पुलिस स्टेशन में “अपमानित” किया गया था। विडंबना यह है कि सेल्वाराज ने घटना के कुछ ही देर पहले दूसरे ट्रैफिक काॉन्स्टेबल के स्थान पर ड्यूटी शुरू की थी।
सेल्वाराज की मृत्यु से पुलिस बल उत्तेजित हो गया। उन्होंने अगले दिन हड़ताल कर दी और हमलावरों की गिरफ्तारी की माँग की। उनका आरोप था कि द्रविड़ मुनेत्र कळगम सरकार ने उन्हें अल उम्मा के खिलाफ कार्रवाई करने से रोक रखा था। उनके गुस्से के पीछे एक तथ्य यह भी था कि सेल्वा की हत्या से पहले कोयंबटूर और मदुरै में बीते 18 महीनों में मुस्लिम चरमपंथी चार पुलिसकर्मियों और जेल अधिकारियों की हत्या या उन पर चाकू से हमले कर चुके थे। पुलिसकर्मियों के परिवारों ने भी कानून का पालन कराने वालों की सुरक्षा की माँग की थी। स्थिति इतनी गंभीर थी कि शहर में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए सेना और रैपिड एक्शन फोर्स को बुलाना पड़ा था। (फ्रंटलाइन, 26 दिसंबर, 1997)। ”
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी डीएमके स्टालिन के साथ
साफ है कि द्रमुक ने पुलिस के काम में दखल दिया और उसे अल-उम्मा के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने से रोका था। 14 फरवरी 1998 को हुए विस्फोटों के पहले द्रमुक सरकार ने इस संगठन पर प्रतिबंध भी नहीं लगाया था। विस्फोटों के बाद ही अल-उम्मा पर प्रतिबंध लगाया गया था। कोयंबटूर में नवंबर 1997 में हुए संघर्ष और बाद में फरवरी 1998 में विस्फोटों की जाँच के लिए गोकुलकृष्णन आयोग नियुक्त किया गया था। फ्रंटलाइन पत्रिका ने भी जून 2000 के अंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया कि गोकुलकृष्णन आयोग ने विस्फोटों के लिए सुरक्षा व्यवस्था में चूक को जिम्मेदार ठहराया था।
रिपोर्ट में पुलिस की इस बात के लिए गंभीर आलोचना की गई थी कि वह आतंकवादी समूहों द्वारा सरवन मेटल मार्ट के निकट एक खाली पड़ी पुरानी इमारत में बम जमा करने और संदिग्ध गतिविधियों की सूचना होने के बावजूद विस्फोटों से पहले तिरुमाला स्ट्रीट पर बाबूलाल कॉम्प्लेक्स नामक भवन को नहीं खोज सकी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर उन्होंने आस-पास के इलाके में तलाशी और जाँच अभियान चलाया होता तो उसे अल-उम्मा के लोगों की साजिश का पता चल जाता और वे 14 फरवरी से पहले ही आतंकवादियों को गिरफ्तार और बमों को जब्त कर इस साजिश को नाकाम कर सकते थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि 15 फरवरी की सुबह से पहले बहुत तेजी से की गई कार्रवाई में पुलिस ने कोयम्बटूर में आतंक फैलाने की साजिश का पर्दाफाश करते हुए अल-उम्मा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया और विस्फोटकों तथा घातक हथियारों की जब्ती की थी। पुलिस की इस तूफानी कार्रवाई में सब-इंस्पेक्टर एम. चंद्रशेखरन ने जान की बाजी लगाते हुए न केवल साथी पुलिस कर्मियों और जनता की जान बचाई थी बल्कि उसने विशेष जाँच दल की आँखें भी खोल दीं, जिसने बाद में कार्रवाई करते हुए न केवल आतंकवादियों को गिरफ्तार किया बल्कि छिपाए गए बमों को भी खोज निकाला था।
पुलिस इस मामले में निश्चित रूप से कार्रवाई करना चाहती थी लेकिन विस्फोटों से पहले डीएमके सरकार ने उसके हाथ बाँध रखे थे। फ्रंटलाइन ने भी कोयंबटूर विस्फोट कांड रोकने में असफल रहने के द्रमुक सरकार को दोषी ठहराया था। उसने लिखा: “धमाकों के बाद तमिलनाडु सरकार द्वारा शुरू की कार्रवाई बेशक प्रभावी थी, लेकिन इतने भर से सरकार इस आलोचना से नहीं बच सकती थी कि वह खुफिया रिपोर्टों पर कार्रवाई करने और घटना के पहले ही विस्फोटकों की बरामदगी करके आतंकवादी हमला रोकने में विफल रही थी। यह कहना उचित होगा कि द्रमुक सरकार बड़ी संख्या में निर्दोष मुसलमानों और उन थोड़े से कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं के बीच अंतर नहीं कर पाई, जिन्होंने सामान्य मुसलमानों में व्याप्त असुरक्षा की भावनाओं का फायदा उठाया। सरकार को मुस्लिम कट्टरपंथियों को अलग-थलग करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की दिशा में जल्दी से जल्दी कदम उठाना चाहिए था।”
इन विस्फोटों के तुरंत बाद इंडिया टुडे में आईआर जगदीशन और केएम थॉमस का आलेख प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने कहा कि,
“विपक्ष ने सरकार पर हिंसा और विस्फोटों का पूर्वानुमान करने और उसके लिए निवारक उपाय करने में असफल रहने का आरोप लगाया है… देर से ही सही आलोचनाओं से चिढ़ी सरकार ने इन विस्फोटों के पीछे के संदिग्ध लोगों के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में कुछ निर्णायक कदम उठाए। दो मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों, अल उम्मा और जेहाद कमिटी पर प्रतिबंध लगा दिया गया और अल उम्मा के अध्यक्ष एसए बाशा समेत इन संगठनों के कुछ नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था। इन संगठनों को मुख्यमंत्री करुणानिधि की कड़ी चेतावनी के बाद 15 फरवरी को कई चरमपंथी ठिकानों पर छापे मारे गए थे। छापों में गिरफ्तार किए गए आठ लोगों की पहचान बाद में अल उम्मा कार्यकर्ताओं के रूप में हुई। विस्फोटों के बाद हुई हिंसा पर भी सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती से तेजी से काबू पा लिया गया था।
इसके बाद 16 फरवरी को की गई सघन गश्त के दौरान पुलिस को एक रिहायशी इलाके में खड़ी कार में 60 किलोग्राम विस्फोटक मिले। इन बमों को नष्ट करने में दो दिन लगे… राज्य में चरमपंथियों का खतरा काफी समय से मंडरा रहा था लेकिन राजनीतिक कारणों से राज्य सरकार इस बारे में निर्णायक कार्रवाई नहीं कर रही थी। कोयम्बटूर के पुलिस सूत्रों का कहना है कि सरकार मुस्लिम कट्टरपंथियों की गतिविधियों से अच्छी तरह वाकिफ थी, लेकिन उसने चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय की प्रतिक्रिया के डर से उनके खिलाफ कार्रवाई में देरी की।
लगता है कि इन आरोपों ने राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन की चूलें हिला दीं और चुनावों में प्रतिक्रियात्मक संभावनाओं को खत्म करने के लिए सरकार ने अभिनेता रजनीकांत की मदद ली। द्रमुक के नियंत्रण वाले सन टीवी पर बार-बार प्रसारित कार्यक्रम में सुपरस्टार ने भाजपा और जयललिता को समस्याएँ खड़ी करने का जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि विस्फोट के पीछे वे लोग हैं, जो केंद्र में अन्नाद्रमुक-भाजपा की सरकार बनवाना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने धमाकों के लिए सीधे-सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराया है। हालाँकि, आरोप से इनकार करते हुए आरएसएस ने केसरी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है।”
यहाँ कोयम्बटूर धमाकों से जुड़े प्रकरण में कब क्या हुआ से लेकर देरी से की गई पुलिस कार्रवाई, इस्लामी कट्टरपंथियों की गिरफ्तारी और भारी मात्रा में हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी को आसानी से देखा जा सकता है। साफ देखा जा सकता है कि जो कार्रवाई की गई, द्रमुक सरकार उसे आसानी से विस्फोटों से पहले कर सकती थी लेकिन अपनी मुस्लिम-समर्थक नीतियों के कारण ही उसने अल-उम्मा जैसे आतंकवादी संगठनों को सक्रिय रहने दिया।
हालाँकि, बाद में द्रमुक सरकार ने अल-उम्मा पर प्रतिबंध लगाया और धमाकों के बाद कार्रवाई की, लेकिन कॉन्ग्रेस ने विस्फोटों के बाद भी आतंकवादियों का बचाव करना जारी रखा और आरएसएस पर विस्फोट करने का आरोप लगाया।
अधिकांश राजनीतिक नेताओं और दलों ने विस्फोटों पर गहरा दुःख और क्षोभ व्यक्त किया था। तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन और प्रधानमंत्री आईके गुजराल ने इस घटना पर गहरा दुःख प्रकट किया था, फिर भी द्रमुक अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने धमाकों को चुनावी प्रक्रिया बाधित करने की विदेशी साजिश का हिस्सा करार दिया था। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता और माकपा महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने भी विस्फोट के पीछे विदेशी हाथ होने की आशंका जताई थी। गुप्ता ने आईएसआई को भारतीय चुनाव प्रक्रिया बाधित करने के प्रयास का दोषी ठहराया था, लेकिन कॉन्ग्रेस इस मामले में अकल्पनीय रूप से निचले स्तर पर गिरी रही।
उल्लेखनीय है कि द्रमुक मई 1996 में तमिलनाडु में सत्ता में पहुँची थी। 1996 के अंत में, मुस्लिम आतंकियों ने कोयम्बटूर सेंट्रल जेल में वार्डन जी भूपालन को जेल के भीतर ही एक पेट्रोल बम हमले में मार डाला था। उसके पहले, अन्नाद्रमुक के शासनकाल में अगस्त 1993 में चेन्नई में आरएसएस कार्यालय पर बम विस्फोट हुआ था, जिसमें छह वरिष्ठ प्रचारकों सहित 14 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के परिणामस्वरूप अन्नाद्रमुक सरकार ने कट्टरपंथी संगठनों, विशेष रूप से अल-उम्मा, के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी। लेकिन द्रमुक के शासनकाल में अगस्त 1993 के आरएसएस कार्यालय विस्फोट कांड तथा अवैध हथियार रखने के आरोप में टाडा के तहत हिरासत में लिए गए 16 अल-उम्मा कार्यकर्ताओं को जनवरी 1997 में जमानत पर रिहा कर दिया गया क्योंकि राज्य सरकार के अभियोजक ने उनकी जमानत का विरोध नहीं किया था।
एक गुप्त सूचना के आधार पर तमिलनाडु पुलिस कमांडोज ने भारी मात्रा में विस्फोटक (जिलेटिन की छड़ें), डेटोनेटर, लोहे के पाइप, पीवीसी पाइप, अलार्म घड़ियाँ, केबल, तार, सोल्डरिंग उपकरण, आरी और बिजली के टेस्टर आदि बम बनाने में लगने वाली चीजों का जखीरा बरामद किया था। इसके बावजूद सरकार निश्चिंत बनी रही। कमांडोज ने बरामदगी-जब्ती की यह कार्रवाई 11 मार्च, 1997 को चेन्नई के एक उपनगर कोडुंगैयुर में एक घर से की थी। इस सिलसिले में पुलिस ने अल-उम्मा समूह से जुड़े दो कट्टरपंथियों को भी गिरफ्तार किया: मोहम्मद खान उर्फ सिराजुद्दीन (26 साल) और 22-वर्षीय शाहुल हमीद उर्फ अफ्तार। मोहम्मद खान अल-उम्मा के संस्थापकों में से एक एसए बाशा का भाई है।
कोयम्बटूर धमाकों से दो महीने पहले नवंबर-दिसंबर 1997 में पूरा तमिलनाडु सिलसिलेवार बम विस्फोटों से हिल गया था। बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर 6 दिसंबर, 1997 को चेरन एक्सप्रेस, पांडियन एक्सप्रेस और एलेप्पी एक्सप्रेस ट्रेनों में भी धमाके किए गए थे। पुलिस ने नौ लोगों की जान लेने वाले इन विस्फोटों के पीछे केरल के गुमनाम संगठन इस्लामिक डिफेंस फोर्स को जिम्मेदार ठहराया था।
10 जनवरी 1998 को चेन्नै के बीचोबीच अन्ना फ्लाईओवर के नीचे एक विस्फोट हुआ और इस्लामिक डिफेंस फोर्स ने इसकी जिम्मेदारी ली। इसके बाद 8 फरवरी को तंजावुर के पास सालियामंगलम के एक चावल मिल में शक्तिशाली विस्फोट हुआ। पुलिस ने मिल से विस्फोटकों और डेटोनेटर का एक बड़ा जखीरा जब्त किया। पुलिस को जाँच में पता चला कि मिल मालिक अब्दुल हमीद का बेटा अब्दुल कादर मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों से जुड़ा था। मिल के मालिक और उसके बेटे दोनों को गिरफ्तार किया गया था। विस्फोट में अब्दुल कादर गंभीर रूप से घायल हो गया था। उसके बाद चेन्नै में वेपरी और तांबरम में आतंकवादी संगठनों से जुड़े दो मुसलमानों से सैकड़ों डेटोनेटरों बरामद हुए। पुलिस ने इन दोनों से 84 जिलेटिन की छड़ें, 50 किलोग्राम सल्फर, 11.5 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट, 100 डेटोनेटर, दो देशी पिस्तौल और नाइट्रिक तथा सल्फ्यूरिक एसिड की बोतलें जब्त कीं।
इन सभी विस्फोटों और कुकृत्यों के बाद भी अल-उम्मा पर प्रतिबंध तो दूर, कोई कड़ी कार्रवाई तक नहीं हुई थी, 8 फरवरी के विस्फोट के बाद भी नहीं। किसी बड़ी वारदात की ओर संकेत करने वाली चेतावनी जैसी इन घटनाओं पर राज्य सरकार सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रही। किसी बड़ी दुर्घटना को रोकने की दिशा में यह सरकार की बड़ी विफलता थी।
प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन अल-उम्मा के अध्यक्ष एसए बाशा ने जुलाई 2003 में कोयंबटूर का दौरा करने पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जान से मारने की धमकी भी दी थी। बाशा और आठ अन्य लोगों ने यह धमकी उस समय खुले आम दी थी जब हिंदू मुन्नानी नेता की हत्या से संबंधित एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद पत्रकार कोयंबटूर अदालत परिसर में इन मुजरिमों से बात कर रहे थे। इस तरह के व्यक्ति और उसके संगठन अल उम्मा को द्रमुक सरकार ने 14 फरवरी 1998 के विस्फोटों तक बेरोकटोक काम करने दिया था।
आउटलुक और फ्रंटलाइन जैसी तगड़ी आरएसएस-विरोधी पत्रिकाओं ने भी इन धमाकों में तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम (टीएनएमएमके) की भूमिका स्वीकार की थी। फ्रंटलाइन ने मार्च 1998 के अंक में प्रकाशित किया था: “विस्फोटों के कुछ घंटों के भीतर ही तमिलनाडु सरकार ने अल-उम्मा और जिहाद कमिटी पर प्रतिबंध लगा दिया था। अल-उम्मा के संस्थापक अध्यक्ष एसए बाशा और संगठन के 12 अन्य सदस्यों को चेन्नई में गिरफ्तार किया गया; चेन्नई के ट्रिप्लिकेन में उनके घर से विस्फोटक सामग्री और हथियार भी जब्त किए गए थे। जिहाद कमिटी और तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम (टीएमएमके) के नेताओं को राज्यव्यापी कार्रवाई में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार लोगों में जिहाद कमिटी का अध्यक्ष आरएम हनीफा, महासचिव मोहम्मद हनीफा, छात्रसंघ सचिव अकरम खान, टीएमएमके अध्यक्ष और कॉलेज व्याख्याता एमएच जवाहिरुल्ला तथा कोषाध्यक्ष जीएम पक्कर शामिल थे। अगले कुछ दिनों में इन तीन संगठनों के 100 से अधिक कार्यकर्ताओं को कीझक्कराई, देवाकोट्टाई, डिंडिगुल, नागपट्टिनम, तंजावूर, नागरकॉइल, मेलापलायम और उदुमालपेट से गिरफ्तार किया गया। लगभग 1,000 अन्य लोगों को एहतियाती तौर पर हिरासत में लिया गया था … “
यहाँ तक कि आउटलुक ने भी कोयम्बटूर धमाकों में टीएनएमएमके के शामिल होने की बात स्वीकार की। उसने लिखा:
“कोयम्बटूर में फरवरी में हुए धमाकों के बाद शुरू हुई कार्रवाई जारी रहने के बीच यह बात और साफ देखी जा सकती है कि आम मुसलमान तेजी से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। हर दिन पुलिस छुटभैये इस्लामी कट्टरपंथी संगठन अल उम्मा द्वारा छिपाए गए सैकड़ों किलो विस्फोटक बरामद कर रही है। इन बरामदगियों से साफ है कि वास्तव में अल उम्मा आतंकवादी समूहों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ संगठन है…
प्रारंभ में मुस्लिम कट्टरपंथी समूह 10 प्रमुख संगठनों के रूप में विभाजित थे। लेकिन, कोयंबटूर में नवंबर के दंगों के बाद उनमें से ज्यादातर ने आपस में मिलकर काम करना शुरू कर दिया था। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण समूह थे: तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम, अखिल भारतीय जिहाद कमिटी, अल उम्मा, तमिल इस्लामिक पेरावई, सुन्नत अल जमात यूथ फ्रंट, सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया), स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लाम, मुस्लिम प्रोटेक्शन फोर्स और जेएक्यूएच (जमीअतुल अहले क़ुरान वल हदीस)।
… अल उम्मा के गिरफ्तार सदस्यों के अनुसार, आईएसआई ने 1994 में मदुरै में हिंदू मुन्नानी नेता, राजगोपाल को खत्म करने का सुझाव दिया था। इसके अलावा, आरएसएस कार्यालय (अगस्त 1993) और हिंदू मुन्नानी कार्यालय (1995) में विस्फोट में प्रयुक्त आरडीएक्स की आपूर्ति भी आईएसआई द्वारा की गई थी।
…15 दिसंबर तक अल उम्मा के लोगों ने अतिरिक्त विस्फोटक जुटाने में केरल की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के कट्टरपंथी इस्लामी अध्यक्ष अब्दुल नासिर मदनी का समर्थन भी हासिल कर लिया था। पुलिस सूत्रों के अनुसार, चार सप्ताह में इन आतंकियों ने लगभग 1000 किलोग्राम विस्फोटक जमा कर लिए थे।”
यह उन विस्फोटों में टीएनएमएमके और अब्दुल मदनी की भागीदारी को जान लेना पर्याप्त है। अब मदनी और टीएनएमएमके के समर्थन में कॉन्ग्रेस, वाम और द्रमुक के कृत्यों को देखा जाए।
तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के पाँच साल के शासन (2001-06) के बाद मई 2006 में द्रमुक एक बार फिर सत्तरूढ़ हुई। इसके बाद, 24 जुलाई 2006 को इंडियन एक्सप्रेस में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था –“कोयंबटूर आतंकी घटनाओं के आरोपी के लिए द्रमुक ने जेल को स्पा में बदला”। समाचार में बताया गया था.
“अब्दुल नासिर महदानी की आयुर्वेदिक मालिश का खर्च वहन सरकार कर रही थी और उसकी पत्नी के खिलाफ गिरफ्तारी का वॉरंट होने के बावजूद वह महदानी से बेरोकटोक मिल सकती थी।
इन हालात में आतंक पर नकेल कसने की जरूरत पर सख्त बातें करने वालों पर हँसा जा सकता है। महदानी 1998 के कोयंबटूर सीरियल विस्फोटों का मुख्य आरोपी है, जिसमें बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी को निशाना बनाने की कोशिश करते हुए 58 लोगों की हत्या कर दी गई थी।
जब से करुणानिधि ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है, तब से यहाँ उच्च सुरक्षा वाली जेल में रखे गए महदानी और अल उम्मा के अन्य 166 कैदियों के बीच माहौल खुशनुमा है। इनमें से ज्यादातर को कोयंबटूर विस्फोटों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। करुणानिधि की बदौलत, 10 मालिश वालों और चार वरिष्ठ आयुर्वेदिक डॉक्टरों की एक टीम ने 2001 से जेल के अस्पताल में रखे गए महदानी पर “उच्च गुणवत्ता वाला उपचार” शुरू किया है …
हालाँकि जेल मैनुअल में कहा गया है कि कोई कैदी यदि किसी प्रकार की निजी चिकित्सा हासिल करता है तो उसे उपचार की लागत का भुगतान करना होगा, तमिलनाडु सरकार महदानी की “धारा” और “पिझ़ीकिल” (आयुर्वेदिक मालिश) चिकित्सा का बिल भरने के लिए करदाताओं के पैसे का उपयोग कर रही है …
विस्फोट मामलों की जाँच कर रहे अधिकारियों को जिस बात ने सबसे ज्यादा क्षुब्ध किया, वह यह थी कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने चुपचाप अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 268 के तहत प्रतिबंध हटाते हुए महदानी के जेल के अंदर कहीं भी आने-जाने पर लगी रोक को खत्म कर दिया गया था।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम सामने न आने की शर्त पर बताया था, “द्रमुक के सत्ता में आने के तुरंत बाद, उसे जेल से बाहर ले जाने और उसका इलाज केरल में करवाने की कोशिश की गई थी। हमने इस तरह के कदम का कड़ा विरोध किया। केरल में आरोपी के प्रति दोस्ताना रवैया रखने वाली सरकार होने के चलते उसके एक बार केरल पहुँचने के बाद वह हमारी पकड़ से दूर हो जाता। यह सब तब हो रहा था जब विशेष अदालत में चल रही सुनवाई पूरी होने वाली थी और जल्द ही मामले में फैसला आने की उम्मीद थी।” इस अधिकारी ने यह भी कहा कि “…वास्तव में, विस्फोट से पहले के दिनों में, तमिलनाडु (1996-2001) में सत्तारूढ़ द्रमुक पर मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के साथ रब्त-जब्त रखने और अल उम्मा जैसे जेहादी समूहो की गतिविधियों को नज़रअंदाज करने के आरोप थे।”
हालाँकि कोयंबटूर विस्फोटों के बाद द्रमुक को इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा था और इसने केंद्र में भाजपा के साथ गठबंधन की अवधि के दौरान 1999 से 2003 तक खुले तौर पर आतंकवाद-समर्थक नीति का पालन नहीं किया था, लेकिन 2004 से मौका मिलते ही वह अपने असली रूप में वापस पहुँच गया था। द्रमुक ने 2004 के लोकसभा चुनावों और तमिलनाडु में 2006 के विधानसभा चुनावों में फिर से टीएनएमएमके के समर्थन से जीत हासिल की। मई 2006 में शपथ ग्रहण के दो ही हफ्ते बाद, तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने किचान बुहारी के 12 मुस्लिम कट्टरपंथी सहयोगियों के खिलाफ मामले खत्म करने का आदेश दिया। अल-उम्मा समर्थक बुहारी कोयंबटूर विस्फोटों के प्रमुख अभियुक्तों में शामिल था। इंडियन एक्सप्रेस ने 8 अगस्त 2006 को एक रिपोर्ट की:
“…तिरुनेलवेली के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “…वरिष्ठ पुलिसकर्मी मुस्लिम कट्टरपंथियों के प्रति द्रमुक सरकार की ज़बरदस्त सहानुभूति से हैरान थे। प्रत्यक्षतः, जिस आरोपी से सरकार को सहानुभूति थी, उसने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले तिरुनेलवेली जिले में शांति भंग करने के इरादे से गंभीर अपराध किया था और वह कानून-व्यवस्था संबंधी समस्याएँ पैदा करने का आरोपी था। साथ ही, उसका और उसके साथियों का संबंध मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों से था। सरकार को चाहिए था कि वह कानून को स्वाभाविक तरीके से काम करने देती। किसी सरकार के इन कदमों से पुलिस का मनोबल गिरता है।”
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मेलापालयम थाने में 2001 की अपराध संख्या 15 के रूप में दर्ज एक मामले में पकड़े गए पाँच में से दो आरोपी किशोर थे, जिन्हें उनकी कम उम्र के कारण छोड़ दिया गया था, लेकिन अन्य तीन – एमएस सैयद मोहम्मद बुहारी, शेख हैद और जफर अली ने अपना अपराध स्वीकार किया था। इसके बावजूद, सरकार ने उनके खिलाफ मामलों को वापस लेने का आदेश दिया। …ऐसे भी आरोप हैं कि सत्तारूढ़ द्रमुक अपने सहयोगी दल तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम (टीएमएमके) के तुष्टीकरण के लिए इन मामलों में कमजोरी दिखा रहा था। पुलिस के एक वर्ग का मानना है कि द्रमुक सरकार द्वारा छह मामलों के खत्म करने का फैसला संभवतः टीएमएमके के साथ चुनाव-पूर्व समझौते का हिस्सा रहा हो। ”
टीएनएमएमके केवल द्रमुक का गठबंधन सहयोगी नहीं था, बल्कि द्रमुक के नेतृत्व वाले डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव अलायंस (डीपीए) गठबंधन में कॉन्ग्रेस भी शामिल थी। यह अलग बात है कि किसी पार्टी का गठबंधन मुख्यधारा की किसी ऐसी पार्टी से हो, जिसके कुछ सदस्य कभी आतंकवाद के पक्षधर होने के दोषी हों, लेकिन किसी कट्टरपंथी आतंकवाद-समर्थक पार्टी के साथ गठबंधन करना और उसके दबाव में आतंकवादियों को रिहा करना तथा उनके खिलाफ मामले वापस लेना बिलकुल अलग किस्म की बात है। (उस समय, तमिलनाडु विधानसभा में 234 में से द्रमुक के पास 97 और कॉन्ग्रेस के पास 33 विधायक थे। इस प्रकार द्रमुक और कॉन्ग्रेस को मिला कर उनके पास बहुमत था और किसी अन्य दल के समर्थन की आवश्यकता नहीं थी। मजे की बात यह है कि टीएनएमएमके हालाँकि द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन डीपीए का समर्थन कर रहा था, उसके पास अपना एक भी विधायक नहीं था।)
1998 के कोयंबटूर धमाकों के मामले में गिरफ्तार अब्दुल नज़र मदनी को बरी करने के खिलाफ अपील न करने का द्रमुक सरकार का फैसला निश्चित रूप से वोट बैंक के लालच में गलत किस्म की सहानुभूति का नतीजा था।
कॉन्ग्रेस विधायक दल ने 2006 में केरल विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर 1999 से कोयंबटूर जेल में बंद अब्दुल मदनी को छोड़ने की माँग की थी। इस प्रस्ताव को वामपंथियों का भी समर्थन था। केरल विधानसभा ने 16 मार्च 2006 को सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को पारित किया। मदनी पर बाद में आईपीएल क्रिकेट के दौरान 2008 में बेंगलूरु में हुए बम विस्फोटों का आरोप भी लगा। मार्च 2006 में उसकी रिहाई की माँग के प्रस्ताव और 1 अगस्त 2007 को कोयंबटूर विस्फोट मामले में उसके बरी होने के बाद वह 2008 में एक और हमले में शामिल पाया गया था।
इंडियन एक्सप्रेस ने 25 जुलाई 2006 को रिपोर्ट किया: “अगर तमिलनाडु में द्रमुक सरकार 1998 कोयंबटूर विस्फोट के आरोपी अब्दुल नासिर महदानी की आयुर्वेदिक मालिश की व्यवस्था कर रही है, तो केरल में वाम दल और कॉन्ग्रेस उसके अकड़े पड़े पैरों को ठीक करने की कोशिश में जुटे थे।”
बाद में, 2009 में द्रमुक-कॉन्ग्रेस सरकार ने कोयम्बटूर विस्फोट के दोषियों को समय से पहले से रिहा कर दिया। इस कृत्य के लिए भाजपा ने उनकी कड़ी आलोचना की थी।
सितंबर 2005 में, टीएनएमएमके ने देश के विभिन्न हिस्सों में बम विस्फोटों में सिमी के शामिल होने के तथ्य के बावजूद सिमी पर से प्रतिबंध हटाने की खुले तौर पर माँग की थी। टीएनएमएमके तमिलनाडु में कॉन्ग्रेस की सहयोगी थी। मई 2006 की टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया था,: “टीएनएमएमके अध्यक्ष एमएच जवाहिरुल्लाह और इसके महासचिव एस हैदर अली ने चेन्नई में संवाददाताओं से बातचीत में अन्नाद्रमुक को दूसरी भाजपा करार देते हुए सोमवार को कहा कि तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कडळगम (टीएनएमएमके) ने 8 मई, 2006 को होने वाले विधानसभा चुनावों में द्रमुक के नेतृत्व वाले डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव अलायंस (डीपीए) को अपना समर्थन देने का फैसला किया है। टीएनएमएमके कार्यकर्ता राज्य के सभी 234 निर्वाचन क्षेत्रों में काम करेंगे ताकि डीपीए की जीत सुनिश्चित हो सके।”
इस पार्टी ने कोयम्बटूर विस्फोटों के पहले 1997 में हुए साम्प्रदायिक दंगों का विरोध करते हुए तमिलनाडु में 4 फरवरी 1998 को हुए लोकसभा चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की थी। यह पार्टी 1999 के लोकसभा चुनावों, 2001 के विधानसभा और 2004 के लोकसभा चुनाव में भी कॉन्ग्रेस गठबंधन के साथ थी। 2001 में अन्नाद्रमुक और कॉन्ग्रेस साथ थे। 11 जुलाई 2006 को मुंबई की उपनगरीय ट्रेनों में 11 मिनट के भीतर हुए सात विस्फोटों में 187 लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के घायल होने की घटना के बाद तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने टीएनएमएमके के साथ संबंधों के लिए कॉन्ग्रेस और द्रमुक की भर्त्सना की थी।
मुंबई मिरर ने 20 जुलाई 2006 को जयराज सिवन की लिखी रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, “सिमी आध्यात्मिक संगठन है”। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि “तमिलनाडु का नेता ‘सिमी बचाओ’ अभियान में शामिल हुआ।” यह समाचार इस प्रकार था –
“चेन्नै: तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव अलायंस (डीपीए) को तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कळगम (टीएमएमके) के साथ अपने संबंधों की व्याख्या करनी पड़ सकती है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने टीएमएमके पर स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के साथ ‘गहरे संबंध’ होने का आरोप लगाया था। उल्लेखनीय है कि सिमी 11 जुलाई के मुंबई सीरियल धमाकों में कथित संलिप्तता के लिए संदेह के घेरे में है।
सत्तारूढ़ डीपीए के साथ अपने संबंधों के बावजूद, टीएमएमके को केंद्र और राज्य की खुफिया एजेंसियां जाँच कर रही हैं क्योंकि 1998 के कोयंबटूर सीरियल धमाकों के बाद अल-उम्मा पर लगे प्रतिबंध के परिणामस्वरूप अधिकांश अल-उम्मा नेता टीएमएमके में शामिल हो गए थे।
हालाँकि डीएमके ने तब से इस संगठन से कुछ दूरी बना रखी थी – मुख्यतः भाजपा के साथ पाँच साल के गठबंधन के दौरान – लेकिन 2004 के संसदीय चुनावों से पहले टीएमएमके भी डीपीए में शामिल हो गया। इस बारे में करुणानिधि का कहना है कि कई अन्य छोटे दलों की तरह टीएमएमके गठबंधन का सहयोगी नहीं है, बल्कि वह केवल दोस्ताना रुख रखने वाली पार्टी है।
इस बारे में संपर्क किए जाने पर टीएमएमके अध्यक्ष प्रोफेसर एमएच जवाहिरुल्लाह ने कहा, “भाजपा के आरोप बेतुके हैं। हमारा स्वतंत्र संगठन है और हम लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यमों से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विश्वास करते हैं।” यह पूछे जाने पर कि क्या वह अतीत में सिमी के सक्रिय सदस्य थे, उन्होंने कहा, “मैं 1989 तक सिमी में था। उसके बाद 30 वर्ष की उच्चतम आयु सीमा पार कर लेने पर मैं सिमी का सदस्य नहीं रहा।” हालाँकि, उन्होंने सिमी का बचाव करते हुए कहा, “सिमी एक आध्यात्मिक संगठन है। वह चरमपंथी गतिविधियों में कभी शामिल नहीं होगा।“
करुणानिधि और उनके सहयोगियों ने अब तक सिंह के इस आरोप पर प्रतिक्रिया नहीं दी है कि द्रमुक और कॉन्ग्रेस जैसे डीपीए के सहयोगी राज्य में टीएमएमके जैसी कट्टरपंथी और जेहादी ताकतों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।“
जुलाई 2006 में मुंबई में हुए बम धमाकों में सिमी की संलिप्तता साफ-साफ उजागर होने के बाद भी टीएनएमएमके ने सिमी को ‘आध्यात्मिक संगठन’ कहने की धृष्टता की थी, जबकि सिमी के नेता खुले तौर पर ओसामा बिन लादेन की ‘सच्चे नायक और इस्लामी योद्धा’ के रूप में प्रशंसा कर रहे थे।
आज इतने सालों के बाद भी, कॉन्ग्रेस ने 1998 के कोयंबटूर धमाकों के लिए आरएसएस पर अपने झूठे और बेशर्म आरोपों के लिए माफी नहीं माँगी है। न ही, उसने कभी टीएनएमएमके की निंदा की या उसके साथ अपने गठबंधन अथवा संबंधों की साफ-साफ व्याख्या की।
राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस को सीधे-सीधे आरएसएस पर उनके झूठे आरोपों के लिए माफी माँगने या कम से कम 1998 के कोयंबटूर विस्फोटों के अपराधियों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा जाना चाहिए। आतंकवादियों के लिए ‘जी’ जैसे शब्दों का उपयोग करने से कहीं अधिक, कॉन्ग्रेस और द्रमुक जैसे उसके सहयोगियों के कृत्यों को ज्यादा व्यापक रूप से उजागर किया जाना चाहिए।
फरार कॉन्ग्रेस नेता आशुतोष शर्मा को पुलिस ने धर-दबोचा है। शर्मा ने एक पत्रकार के साथ मारपीट की थी। राजद सहित कई विपक्षी दलों ने शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को बिहार बंद का आयोजन किया था। उसी समय आशुतोष शर्मा ने एक पत्रकार की पिटाई की थी। उसके बाद से ही वो फरार चल रहा था। हाल ही में उसका पटना के पास एक मंदिर में रुद्राभिषेक करते हुए फोटो वायरल हो गया था, जिसके बाद पुलिस जोर-शोर से उसकी तलाश में जुट गई थी। उसके कई अन्य फोटो भी वायरल हुए थे।
फरारी के दौरान भी उसने अपने फेसबुक पेज पर अपना फोटो पोस्ट किया था। उससे पहले उसने न सिर्फ़ एक पत्रकार की पिटाई की थी बल्कि कई अन्य मीडियाकर्मियों के साथ भी बदतमीजी की थी। उसने कई अख़बारों के पत्रकारों व फोटोग्राफरों की पिटाई की थी।
पत्रकारों के कैमरे व अन्य उपकरणों को भी तोड़ डाला गया था। पत्रकारों के मोबाइलों को भी नहीं बख्शा गया था। एक फोटोग्राफर का सिर फोड़ डाला गया था। आशुतोष पटना जिला ग्रामीण कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष है।
आशुतोष ने नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में बुलाए गए बंद के दौरान ये हरकतें की थीं। उपद्रवियों ने पटना में दैनिक जागरण के फोटोग्राफर दिनेश कुमार को पीट-पीटकर जख्मी कर दिया था, जिससे वह लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़े थे। फोटोग्राफर मोहन शर्मा, रिपब्लिक टीवी के बिहार के रीजनल एडिटर प्रकाश सिंह, रिपब्ल्कि भारत के वीडियो जर्नलिस्ट सूरज को भी उपद्रवियों ने निशाना बनाया था। पटना के डाकबंगला चौराहे पर प्रकाश सिंह के साथ बंद समर्थकों ने मारपीट की थी। इसमें भी आशुतोष शर्मा का नाम सामने आया था।
लेखिका अरुंधति रॉय ने लोगों को भड़काते हुए सरकार की बात न मानने की सलाह दी है। सीएए के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शन को लेकर आग में घी डालने का काम करने वाली अरुंधति रॉय ने खुलेआम लोगों को सरकार की बात न मानने को कहा। उन्होंने एनपीआर को एनआरसी के लिए डेटाबेस करार दिया और कहा कि वो अपना नाम, पता व डिटेल्स के बारे में सरकारी अधिकारियों को ग़लत जानकारी दें। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सभा को सम्बोधित करते हुए अरुंधति ने सीएए को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ बताया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि एनपीआर और एनआरसी में कोई सम्बन्ध नहीं है।
केंद्रीय कैबिनेट ने मंगलवार (दिसंबर 24, 2019) को एनपीआर को अपडेट करने की प्रक्रिया के लिए 3941.35 करोड़ रुपए का बजट जारी किया। इसमें भारत के सभी निवासियों का विवरण होगा। इसमें स्थानीय स्तर पर ऐसे लोगों के डिटेल्स होंगे, जो पिछले 6 महीने से वहाँ रहे हैं, या फिर अगले 6 महीने वहाँ रहेंगे। सबसे पहले यूपीए-2 सरकार ने 2010 में एनपीआर तैयार करने की प्रक्रिया की थी और तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इसमें नाम रजिस्टर कराने वाली पहली नागरिक बनी थीं। कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ही इसे एनआरसी से भी जोड़ा गया, जिसे भाजपा सरकार ने हटा दिया है।
अरुंधति रॉय ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सरकारी लोग उनसे नाम, पता, नंबर इत्यादि के डिटेल्स लेने उनके घर आएँगे। उन्होंने कहा कि इसके लिए आधार कार्ड अथवा ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने को कहा जाएगा। अरुंधति ने कहा कि इस योजना के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने के लिए उनलोगों ने एक योजना तैयार की है। अपनी ‘योजना’ के तहत अरुंधति ने लोगों को सलाह दी कि जब एनपीआर डेटा कलेक्शन के दौरान सरकार उनका नाम पूछे, तो ग़लत जानकारी दें। उन्होंने कहा कि अगर पता पूछा जाए तो ‘7 RCR’ बता दें।
बता दें कि ‘7 RCR (अब लोक कल्याण मार्ग)’ भारत के प्रधानमंत्री का पता होता है। अरुंधति रॉय ने डिटेंशन सेंटर और एनआरसी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में दिए गए बयान को ‘झूठ’ बताया। पीएम ने मीडिया रिपोर्ट्स को नकारते हुए कहा था कि मुस्लिमों के लिए कोई डिटेंशन सेंटर नहीं बनाया गया है और एनआरसी के लिए कोई आधिकारिक चर्चा नहीं हुई है। अरुंधति रॉय ने कहा कि पीएम मोदी ने जानबूझ कर झूठ बोला क्योंकि उन्हें पता है कि मीडिया उनके हाथ में है, जो सच्चाई नहीं दिखाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी पुलिस मुस्लिमों के घर-घर जाकर उन्हें लूट रही है।
कॉन्ग्रेस नेता एवं पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अरुंधति रॉय के बयान पर आश्चर्य जताया। उन्होंने कहा कि सरकार को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि वो लोगों को भड़का रही हैं। नटवर सिंह ने आरोप लगाया कि अरुंधति लोगों को क़ानून तोड़ने की सलाह दे रही है। भाजपा सांसद रवि किशन ने कहा कि ये वामपंथी जिस देश का खाते हैं, उसी देश की हत्या करने पर उतारू हैं। रवि किशन ने कहा कि ये वामपंथी मानवता के दुश्मन हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (दिसंबर 25, 2019) को लखनऊ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 25 फ़ीट ऊँची प्रतिमा का अनावरण किया। इस दौरान उन्होंने योगी आदित्यनाथ सरकार की भी तारीफ़ की। पीएम मोदी ने जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि ये भी संयोग है कि सुशासन दिवस के दिन, यूपी का शासन जिस भवन से चलता है, वहाँ अटल जी की प्रतिमा का अनावरण किया गया है। उन्होंने कहा कि पूर्व पीएम वाजपेयी की ये भव्य प्रतिमा, लोकभवन में कार्य करने वाले लोगों को सुशासन की, लोकसेवा की प्रेरणा देगी
इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के पितृपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी को समर्पित ‘अटल मेडिकल यूनिवर्सिटी’ का भी शिलान्यास किया। बता दें कि लखनऊ लम्बे समय तक वाजपेयी का संसदीय क्षेत्र भी रहा है। 1991 से लेकर 2004 तक उन्होंने लगातार 5 बार यहाँ से जीत कर संसद में क़दम रखा। इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा:
“अटल जी कहते थे, कि जीवन को टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता। उसको समग्रता में देखना होगा। यही बात सरकार के लिए भी सत्य है, सुशासन के लिए भी सत्य है। सुशासन भी तब तक संभव नहीं है, जब तक हम समस्याओं को संपूर्णता में, समग्रता में नहीं सोचेंगे। हेल्थ सेक्टर के लिए सरकार का रोड मैप है। पहला Preventive healthcare पर काम करना, दूसरा Affordable healthcare का विस्तार करना, तीसरा Supply Side Interventions, यानी इस सेक्टर की हर डिमांड को देखते हुए सप्लाई को सुनिश्चित करना और चौथा- Mission Mode intervention को अमल में लाना।”
अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं की बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि स्वच्छ भारत से लेकर योग तक, उज्ज्वला से लेकर फिट इंडिया मूवमेंट तक और इन सबके साथ आयुर्वेद को बढ़ावा देने तक- इस तरह की हर पहल बीमारियों की रोकथाम में अपना अहम योगदान दे रही है। पीएम ने आँकड़े गिनाते हुए बताया कि आयुष्मान भारत के कारण देश के करीब 70 लाख गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज हो चुका है, जिसमें करीब 11 लाख यहीं यूपी के हैं।
इस दौरान प्रधानमंत्री ने सीएए को लेकर हिंसा करने वालों को भी समझाया। उन्होंने कहा कि नागरिकों को अधिकार के साथ-साथ अपने दायित्व को भी निभाना चाहिए और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से बचना चाहिए। उन्होंने ऐसे लोगों को खुद से पूछने की सलाह दी कि क्या उनका रास्ता सही था, जो जलाया गया वो उनके बच्चों को काम आने वाला भी तो था। पीएम मोदी ने समझाया कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा जनता का भी दायित्व है।उन्होंने कहा कि ऐसे क़दम उठाने से पहले मारे गए लोगों के परिजनों व घायलों के बारे में सोचना चाहिए।
हमारी सरकार के लिए सुशासन का अर्थ है- सुनवाई, सबकी हो। सुविधा, हर नागरिक तक पहुंचे। सुअवसर, हर भारतीय को मिले। सुरक्षा, हर देशवासी अनुभव करे। और सुलभता, सरकार के हर तंत्र की सुनिश्चित हो: PM @narendramodi
इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने वाले फ़ैसले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ये एक दशकों पुरानी बीमारी थी, जो भाजपा सरकार को विरासत में मिली थी, लेकिन इसे सुलझा दिया गया। सीएए पर उन्होंने कहा कि इससे पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए लाखों दलितों व पीड़ितों को न्याय मिलेगा। उन्होंने राम जन्मभूमि मामले का शांतिपूर्वक हल निकलने की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि दशकों पुराना अयोध्या विवाद ख़त्म हो गया।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने नागरिकता संधोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव करने वालों के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। अब तक के आँकड़ों के अनुसार, कुल 5558 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। इसके अलावा 925 लोगों को गिरफ़्तार भी किया है। अब तक 213 एफआईआर दर्ज किए गए हैं। कानपुर के एसएसपी अनंत देव ने बताया कि अकेले कानपुर में 21,500 उपद्रवियों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है। शहर के विभिन्न पुलिस थानों में 15 एफआईआर दर्ज किए गए हैं।
बाबूपुरवा पुलिस थाने में 5000 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है। वहीं यतीमगंज थाने में 4000 उपद्रवियों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है। शहर में 5 दिनों से इंटरनेट बंद है। पुलिस ने बताया कि शांति-व्यवस्था कायम है और पिछले कुछ दिनों में हिंसा की कोई भी नई वारदात नहीं हुई है। बाजार भी खुले हुए हैं। डीएम विजय विश्व पंत ने बताया कि जैसे ही स्थिति और सुधरेगी, इंटरनेट सेवा को बहाल कर दिया जाएगा।
पूरे उत्तर प्रदेश में सीएए को लेकर हुई हिंसा में 18 लोगों के मारे जाने की ख़बर है। आत्मरक्षा में सुलेमान को गोली लगने वाली घटना को छोड़ दें तो पुलिस ने कहीं भी फायरिंग किए जाने से इनकार किया है। सुलेमान के साथियों ने सब-इंस्पेक्टर आशीष से उनकी पिस्टल छीन ली थी। सुलेमान ने कॉन्स्टेबल मोहित पर गोली चलाई, जो उनके पेट में जाकर लगी। आत्मरक्षा में किए गए फायर में सुलेमान की मौत हो गई, जिसे मीडिया ने बड़ा मुद्दा बनाया। मीडिया ने उसे ‘यूपीएससी की तैयारी करने वाला छात्र’ बता कर पुलिस को ही घेरा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लखनऊ में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए उपद्रवियों से कहा कि वो अपने दिल पर हाथ रख कर पूछें कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना और पुलिस पर हमला करना था क्या? बॉलीवुड के कई लोगों ने भी उलटा यूपी पुलिस को ही निशाने पर लिया है। फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने पुलिस को बर्बर बताया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने दावा किया है कि कई निर्दोष लोग भी मारे गए हैं, जिसकी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।