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हिन्दुओं के इस पदचाप को देख कर कइयों को डर लग रहा है… ये डर अच्छा है

ट्विटर पर एक वीडियो दिखा। तेलंगाना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता संगीत की धुन पर, हजारों की संख्या में, पुलिस के घेरे में, सड़क से मार्च करते हुए जा रहे हैं। पूरी तरह से अनुशासित कार्यकर्ताओं की यह भीड़, जो न किसी अराजकता में शामिल थी, न ही कोई नारेबाजी कर रही थी, उसे देख कर वामपंथियों की बुरी तरह से सुलग गई।

इनकी गिरोह के सदस्य इस वीडियो को शेयर करते हुए लिख रहे हैं कि ये ‘प्राइवेट आर्मी है जो भारत की सड़कों पर घूम रही है’। कोई लिख रहा है कि ये खाकी पहने हुए नाज़ी हैं। एक मूर्ख वामपंथन ने लिखा कि RSS शिवसेना की वैचारिक संतान हैं। एक मजहबी नाम वाले लौंडे ने लिखा है कि अतिवादी हिन्दुओं का यह पैरामिलिट्री समूह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यूपी पुलिस के साथ मिल कर मजहब विशेष वालों के घरों में छापेमारी कर रही है।

ऐसे ट्वीट या सोशल मीडिया पोस्ट में ऐसी बहकी-बहकी बातें करने वाले लोगों के नाम या विचार देखेंगे तो आप पाएँगे कि वो या तो मजहब विशेष के नाम वाले लोग हैं जिन्हें इस्लामी आतंकवाद से कभी कोई समस्या नहीं रही, कभी वहाँ अतिवाद या कट्टरपंथ नहीं दिखा, वो हमेशा ‘हम तो शांतिप्रिय लोग हैं’ के हरे चोले में छुपते रहे, या फिर ये वो ज़हरीले वामपंथी हैं जिन्हें देश की कल्पना से ही समस्या है।

एक इस्लामी उम्माह की अवधारणा से चलता है जिसके लिए हर गैरमुस्लिम ‘वाजिबुल कत्ल’ है, और दूसरा वैश्विक कम्यून की अवधारणा से चलता है जहाँ ‘आज़ादी’ के नाम पर राष्ट्रविरोधी शक्तियों को पनपने का खाद-पानी दिया जाता है, और दो-दो रुपए की भीख से बीड़ी और गाँजा खरीदने की परम्परा से ‘गरीबी एक राष्ट्र प्रायोजित हिंसा है अतः सरकारी कर्मचारियों को मार देना उचित है’ जैसे सड़े हुए ख्याल आते हैं। दोनों विचारधाराएँ कट्टर हैं, दोनों में आम लोगों की हत्या को रोमेंटिसाइज किया जाता है, दोनों में रक्तपात और नरसंहार को जायज और जरूरी माना जाता है।

हाल के दिनों में इन्हीं दोनों विचारधाराओं के मजहबी उन्मादी लोग और वैचारिक आतंकवादियों ने सड़क और डिजिटल माध्यमों पर जो आग लगाई है, उससे देश के कई हिस्से उबल रहे हैं। जिन ‘प्रदर्शनों’ को, जो कि वास्तव में मजहबी और वैचारिक दंगे थे, इन्होंने स्वतःस्फूर्त (ऑर्गेनिक) कह कर बताया कि देश के लोग सड़कों पर हैं, उन सारे ही दंगों में सुरक्षा एजेंसियाँ अब बता रही हैं कि योजनाबद्ध तरीके से इसमें कट्टरपंथी संगठनों और वामपंथियों शहरी नक्सलियों का हाथ, पैर और पूरा शरीर लिप्त है।

ये सड़ी हुई मानसिकता के जिहादी और समय पड़ने पर बाप का नाम बदल लेने वाली मजहबी भीड़ के पैदल सैनिक, पुलिस के एक डंडे पड़ने पर बाप-बाप करते हैं और ‘नाम पंकज तिवारी, बाप का नाम गौरी तिवारी’ कहते-कहते ‘अल्ला कसम मैं पत्थर नहीं चला रहा था’ बोलने लगते हैं। तस्वीरें सामने आ रही हैं जहाँ चेहरे पर कपड़े बाँधे ये आतंकी भीड़ में पिस्तौल लिए दिख रहे हैं। वीडियो में जिन छात्रों को वामपंथी गिरोह अपना लल्ला और लल्ली कह कर लॉलीपॉप चुसवा रहा है, वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का गेट तोड़ते और दंगा करते दिख रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियों ने बताया कि जामिया नगर में लगभग 150 कट्टरपंथी, जिनका ताल्लुक PFI से है, दंगों से दो दिन पहले से घात लगा कर बैठे थे। गौरतलब है कि जामिया वाले दंगे में तीन लोगों को कथित तौर पर गोली लगने की खबर है, जिसे पुलिस ने नहीं चलाया, कई बसें जलाई गई, पत्थरबाज़ी जम कर हुई। उसके बाद ये भीड़ जामिया मिलिया इस्लामिया के कैम्पस में घुस गई जहाँ पुलिस को घुसना पड़ा।

तो आप स्वयं तय करें, कि देसी कट्टे ले कर, पेट्रोल बम बना कर, बसें जलाने वाले अगर किसी इस्लामी कट्टरपंथी संगठन से वास्ता रखते हैं, और पुलिस पर हमला करने वाली भीड़ अगर मस्जिदों से निकल कर बाहर आती है, ट्रेन जलाती है, 61 पुलिस वालों को अपनी गोलियों से घायल करती है, 14-18 लोगों की गोली से हत्या करती है (जिसमें से एक पुलिस द्वारा आत्मरक्षा में मारा जाता है), उस भीड़ को पुलिस गालों पर चुम्मा ले कर शांत करेगी, या फिर डंडों से पीटते हुए तितर-बितर करेगी?

इन वामपंथियों और जिहादी मानसिकता वाले कई मजहबियों को इस बात से समस्या है कि जो लोग पकड़े जा रहे हैं, वो खासा मजहब से ही क्यों हैं! एक जहरीली वामपंथन ने दूसरे महामूर्ख द्वारा ट्वीट किए गए नामों की सूची को रीट्वीट करके पूछा कि ये सारे नाम मजहब विशेष वाले हैं तो लोग बताएँ कि यूपी पुलिस द्वारा की गई ये हत्याएँ साम्प्रदायिक और इस्लामविरोधी नरसंहार नहीं। सूची में कहा गया है कि यूपी के दंगों में 16 में से 14 मरने वाले मजहबी नाम वाले हैं।

इन दोनों मूर्खों से, और मजहबी जहर फैलाने वाली राणा अयूब से सवाल यह है कि ये दोनों इस परिणाम पर कैसे पहुँचे कि ये हत्याएँ पुलिस ने की हैं? दूसरी बात, अगर दंगे में कट्टरपंथी सड़कों पर आएँगे, देसी कट्टा चलाएँगे, पुलिस को गोली मारेंगे, तो गिरफ्तारी क्या हिन्दुओं की होगी क्योंकि देश में उनकी जनसंख्या ज्यादा है? ये भी कह दो सीलमपुर में पेट्रोल बम फेंकने वाले के हाथ में ही बम फट जाने का कारण भी हिन्दू ही हैं!

तस्वीरों में कट्टा ले कर घूमते दंगाइयों को देख कर यह तो नहीं लगता ये लोग ओलम्पिक में 10 मीटर पिस्टल इवेंट की तैयारी हेतु किसी फ़ायरिंग रेंज में हर दिन प्रैक्टिस करते होंगे। दूसरी बात जो कट्टे के साथ होती है, वो ये है कि कभी-कभी वो हाथ में ही फटता है, और अमूमन सीधा नहीं चलता। तीसरी बात यह है कि भीड़ में कट्टा ले कर उतरने वाले दंगाई को बस ट्रिगर दबाने से मतलब है, वो यह भूल जाता है कि बड़े भाई का कुर्ता और छोटे का पाजामा पहने दंगाइयों की भीड़ में गोली उसके बाप को भी लग सकती है। कट्टा ले कर आने का मकसद पुलिस को गोली मारना तो कम ही होता है, बल्कि यह उम्मीद होती है कि कोई मरे तो उसका लाभ उठाया जाए। अपनी ही प्रजाति का कोई दंगाई मरे तो राग-मायनोरिटी भी गाया जा सकता है।

इकोसिस्टम बाकी सँभाल लेता है

आपने कभी सोचा है कि ये भीड़ एक व्हाट्सएप्प मैसेज पर, या तुर्की के किसी मुफ्ती के ऐलान पर, या लाउडस्पीकर से आती अनजान आवाज पर भी सड़कों पर माचिस और पेट्रोल ले कर कैसे उतर आती है? आप और हम ऐसा करने से पहले दस बार सोचेंगे कि अगर पेट्रोल के साथ पकड़े गए तो क्या होगा? पत्थर उठाया तो किसी को लगने पर पुलिस ने देखा तो क्या होगा? दूसरे लोगों में पुलिस का डर रहता है। साथ ही, उन्हें नौकरी, घर चलाने, भीड़ में घायल होने का भी डर रहता है।

लेकिन इसके उलट मजहबी उन्माद के जहर में तले हुए इन दंगाइयों को भरोसा है कि वो भीड़ के नाम पर बच जाएँगे क्योंकि कई पार्टियों ने बाक़ायदा चुनावी रैलियों में इन पर से केस वापस लेने की बातें कही हैं। इन्हें विश्वास है कि वो जेल नहीं जाएँगे, जाएँगे भी तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में इनकी पैरवी करने वाले वकील जजों को डाँट कर, उन पर चिल्ला कर, उन्हें बाहर करवा लेंगे।

इन दंगाइयों को न तो घायल होने का डर है, न मरने का क्योंकि इनके माँ-बापों की आम मान्यता यही है कि दो-चार तो मर-खप भी गए तो वो किसी नेक काम में शहीद हुए हैं। कभी सुनिए आतंकियों के बापों की दलीलें कि आत्मघाती हमले में फट कर हवाओं में बिखरे हुए उसके बेटे पर उसे गर्व है कि वो इस्लाम के लिए नेक काम कर के गया है। ये एक बाप की मानसिक समस्या नहीं है, यह कई बापों की सामूहिक सोच है जो आठ-आठ साल के बच्चों को सड़क पर मशाल ले कर उतार देती है।

न मरने का डर, न घायल होने की चिंता, जेल जाने से बचने का आश्वासन है ही, फिर कोई पढ़ाई क्यों करे, दंगे में मजहब का नाम ऊँचा न करे! रही सही कसर इकोसिस्टम में बैठे योद्धा कर देते हैं जो उन्हें हमेशा पीड़ित, शोषित और सताए हुए लोगों की तरह दिखाते हैं। चैनलों में एक की मौत पर दस दिन बकवास चलता है। आपको यह विश्वास दिला दिया जाएगा कि अगर वो ‘शांतिप्रिय’ है, और हाथ में कट्टा ले कर पकड़ा गया है, तो उसकी कोई मजबूरी रही होगी।

एक कहानी निकल आएगी कि वो तो डॉक्टर बनना चाहता था, वो तो पाँच बजे जग कर पढ़ता था, वो तो UPSC की तैयारी कर रहा था। उसका दंगे में सड़क पर होना, उसका पुलिस कॉन्स्टेबल की पेट में गोली उतारना, सब जायज हो जाते हैं क्योंकि वो ‘शांतिप्रिय’ है और उसके घर वालों ने बताया है कि वो तो UPSC की तैयारी कर रहा था। जा कर पता कीजिए ओसामा बिन लादेन की डिग्री के बारे में। पूछिए किसी से भारत का दुर्दांत अपराधी सहाबुद्दीन कितना पढ़ा लिखा है। सर्च कीजिए गूगल पर हर आत्मघाती आतंकी की शैक्षणिक योग्यता के बारे में।

किसी के हाथों में किताब होने से और जीवन में एक लक्ष्य रखने भर से उसके दूसरे हाथ का कट्टा और भीड़ में शामिल हो कर दंगा करना जायज नहीं हो जाते। सारे डकैत काली माँ की पूजा करते हैं, हनुमान जी की आरती गाते हैं तब लूटने और हत्या करने निकलते हैं। तो क्या उन्हें क्लीन चिट दे दी जाए कि वो तो बड़ा ही धार्मिक व्यक्ति था?

लेकिन इकोसिस्टम यही करता है। वो बुरहान वनी के बाप के हेडमास्टर होने को प्रमुखता से छापता है। वो आदिल अहमद डार के पुलवामा हमलों को यह कह कर जायज बताना चाहता है कि उसे बचपन में एक आर्मी अफसर ने उठक-बैठक करवाई थी। ये गिरोह हमेशा यही कहता है कि गरीबी और अशिक्षा के कारण वो मजबूर था हथियार उठाने को! और ऐसा कहते-कहते आतंकियों के हिमायती मीडिया वाले, जहरीले वामपंथी सूअरगुच्छ आपको यह समझा देंगे कि ये हमलावर, ये आतंकी, ये दंगाई अपनी जगह पर न सिर्फ सही हैं, बल्कि कोई भी ऐसी स्थिति में यही करता।

ये इकोसिस्टम आपको मध्यप्रदेश की पुलिस द्वारा गाँधी के भजन गाते छात्र-छात्राओं को घसीटने की बात पर, उन्हें ठंढ में जंगल में ठिठुरने को छोड़ने पर पुलिस की बर्बरता नहीं देख पाता क्योंकि वहाँ की सरकार कॉन्ग्रेस की है। लेकिन यही इकोसिस्टम लगभग 6000 दंगाइयों को, जिसमें 327 पर प्राथमिकियाँ दर्ज हुईं, जिसमें 19 की मौत हुई, जिसमें 288 पुलिस वाले घायल हुए, जिनमें से 61 पुलिस वाले गोलियों से जख्मी हुए हैं, प्रदर्शनकारी कह कर उन्हें मासूम बना देता है।

शब्दों से लगातार खेलते रहना इनकी पुरानी अदा है। प्रदर्शनकारी पुलिस से अनुमति ले कर ही प्रदर्शन कर सकते हैं। अगर आपके पास अनुमति नहीं है, और आप इकट्ठा हो रहे हैं, या फिर अनुमति ले कर इकट्ठा हो रहे हैं कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण होगा, और घर से पेट्रोल की बोतलें और माचिस, देसी कट्टे और गोलियाँ ले कर निकले हैं, दंगों से दो दिन पहले से घात लगा कर बैठे हुए हैं, तो फिर आप दंगाई और आतंकी हैं, प्रदर्शनकारी नहीं।

सहिष्णुता की परीक्षा आखिर कब तक?

हमारे पूरे इतिहास में, खास कर पिछले हजार सालों की बात करें तो हिन्दुओं की सहिष्णुता ने आज तक हिन्दुओं को बस ‘घंटा’ ही दिया है पकड़ने को। सहिष्णुता का अचार बना कर खाते रहे हिन्दू और आज आलम यह है कि इस्लामी विश्वविद्यालयों की दीवारों पर ख़िलाफ़त की माँग उठने के साथ-साथ, हिन्दुओं को कैलाश भेजने की तहरीरें दिख रही हैं। वहाँ बुलंद आवाज हिन्दुत्व की कब्र खोदने की बातें हो रही हैं। जामिया मिलिया के कट्टरपंथी छात्र ‘हिन्दुओं से आजादी‘ की बात कह रहे हैं। वो भीड़ में कह रहे हैं कि ‘वक्त आ गया है’ कि सड़कों पर निकला जाए और मु###नों को संगठित किया जाए।

और आपको लगता है कि ये मासूम हैं? आपको लगता है कि जिनके जेहन में हिन्दुओं के लिए नफरत के सिवा और कुछ है ही नहीं, वो नागरिकता कानून के प्रावधानों को पढ़ कर विरोध करने आएँगे? आपको लगता है कि अपने साक्षर होने का सबूत ये जामिया और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्र इस बात से देंगे कि NRC तो आया ही नहीं तो हल्ला किस बात का? आपको ये नहीं दिख रहा कि PFI के 150 छात्र अगर जामिया दंगों से दो दिन पहले उस इलाके में घुस चुके थे, तो उनका संबंध वहाँ के छात्रों से नहीं रहा होगा? आप यह क्यों भूल जाते हैं कि 750 फर्जी आईकार्ड उसी जामिया के कैम्पस पर हाल के दिनों में मिले थे?

तो आपको लगता है कि ये विरोध तो नागरिकता कानून का है! ये विरोध इनके भीतर बैठी उस घृणा से उपजा है जहाँ ये ललबबुआ बने, चूल में तेल और आँखों में काजल लगा कर ‘हिन्दुओं से आजादी’ और ‘गजवा-ए-हिन्द’का ख्वाब देखते हैं। ये उस हिन्दूघृणा की परिणति है जहाँ इनके भीतर एक डर बैठाया गया कि तुम्हें वो जीने नहीं देंगे। ये डर पाला गया, इनकी बहू-बेटियों को शिक्षा से दूर रखा गया, इनके बच्चों को मदरसों से बाहर आने ही नहीं दिया गया, और आज भी इनकी शिक्षा का स्तर बस यही है कि कथित तौर पर UPSC की तैयारी करने वाला सुलेमान कॉन्स्टेबल मोहित के पेट में गोली मार देता है!

इनको बार-बार नीचे ही रखा गया, उन्हीं पार्टियों के द्वारा जो इन्हें कहते रहे कि वो ही इनके एकमात्र तारणहार हैं। अगर मजहब विशेष वाला पढ़ लिख लेगा तो वो भाजपा के विरोध में, किसी भी पैजामाछाप नेता के उकसाने पर सड़क पर क्यों उतर जाएगा? वो तो यह सोचेगा कि गलती से भी पुलिस केस दर्ज हो गया तो सरकारी नौकरी मिलने की उम्मीद तो गई! इसलिए, इन्हीं के कथित हिमायतियों ने इन्हें कहा कि तुम अपनी कट्टरता पालो, प्रदर्शन करो क्योंकि तुम्हें सताया जा रहा है।

इन्होंने कभी पलट कर पूछा नहीं कि जब सारी सरकारी योजनाएँ, जो भारत के हर नागरिक के लिए होती हैं, उसके लाभ के साथ-साथ, इनके लिए स्पेशल योजनाओं का भी लाभ इन्हें मिल रहा है तो इन्हें आखिर सता कौन रहा है? इन्हें पागल बनाया गया दुनिया में बस एक ही मस्जिद है जो आतंकी बाबर ने बनवाई थी, रामजन्मभूमि के मंदिर को तोड़ कर, तो वो अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी हिन्दुओं को दे दिया, तो भी तुम्हारे साथ धोखा हो गया है! इन्हें यह कहा गया कि तुम्हारी बहनों के हक के बारे में सोचने वाली सरकार, जो तीन तलाक जैसे घृणित परम्परा को अपराध बनाती है, वो इनकी दुश्मन है।

इन्हें विश्वास दिलाया गया कि तुम्हारा कट्टरपन ही तुम्हारी असली ताकत है और जब तक आग लगाते रहोगे, तुम्हारा फायदा होता रहेगा। अब बात यह है कि फायदा इस भीड़ का हुआ है या फिर कुछ नेताओं का जिन्हें यही लोग दोबारा वोट देंगे? उस दौर में जब नौकरियाँ कम हो रही हैं, दुनिया में AI और मशीन लर्निंग की बातें हो रही हैं, फोन न्यूरल इंजन वाले प्रोसेसर से चल रहा है, कुछ लोग चाहते हैं कि भारत के बीस करोड़ लोगों में से कुछ लाख अपने बिस्तर के नीचे पेट्रोल से भिंगाई हुई मशाल रखें।

ये चाहते हैं कि ये कुछ लाख मजहब वाले उनकी कही बातों को आँख मूँद कर मान लें और एक मैसेज पढ़ कर कट्टे ले कर भीड़ में निकल जाएँ। किस इंसान को ऐसा लगता है कि इस कट्टेबाजी, पत्थरबाजी और ‘हिन्दुओं से आजादी’ के नारे से सौ करोड़ हिन्दुओं को इस देश में उनके डर से सबकुछ हासिल हो जाएगा? किस मजहबी ‘शांतिप्रिय’ को ये लगता है कि कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में दंगा न कर के, सिर्फ भाजपाशासित जगहों पर आग लगाने, योगी की पुलिस पर गोली चलाने और दिल्ली में बस जलाने से समुदाय विशेष का भला हो जाएगा?

वो तो भला हो हिन्दुओं का जो सहिष्णु नहीं, अतिसहिष्णु हैं कि उन्हें ऐसे प्रदर्शनों का हिस्सा बनने से बेहतर घरों में टीवी देखना पसंद है, वरना ये दंगे कौन-सा रूप ले लेते कोई नहीं जानता। लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है। हिन्दुओं के एकमात्र बड़े देश में, पूरे धर्म की ही कब्र खोदने की बातें हो रही हैं! ये नारा सामान्य नारा नहीं है। ‘हिन्दुत्व’ की ‘कब्र’ खोदने की बात कही जा रही है, जिसका मतलब बिलकुल स्पष्ट है कि पूरे धर्म, उसकी धार्मिकता, उसके प्रतीकों को समूल नष्ट करने की बात हो रही है। क्योंकि हिन्दुओं को तो कई बार मिटाने की कोशिशें हुईं, फिर भी सौ करोड़ यहीं हैं।

दूसरी बात, हिंदुत्व को ये जलाना नहीं चाहते, उसकी कब्र खोदना चाहते हैं। ये मामूली नारा नहीं है, इसमें इस्लामी घृणा लिजलिजा रही है। ये पूरे धर्म को, उसकी धार्मिकता को इस्लामी तरीके से दफनाने की बात कर रहे हैं। ये हिन्दुओं से आजादी की बात कर रहे हैं। और ये वो लोग हैं जो रिसर्च स्कॉलर हैं, बीए हैं, एमए हैं, शोधकर्ता हैं, तहजीब और शिक्षा के दीपक हैं, अपने समाज की अगली पंक्ति के लोग हैं ये। और इनकी पढ़ाई का उद्देश्य क्या है: हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर!

ऐसे कुत्सित विचारों को पनपने किसने दिया? वामपंथियों की चालाकी देखिए कि जब इनके काडर कम होने लगे, इन्हें जेएनयू जैसी जगहों पर भी नितम्ब चिपका कर, चार पार्टियों के गठबंधन में चुनाव लड़ना पड़ रहा है, हर राज्य से खदेड़े जा रहे हैं, तब इन लोगों ने कथित अल्पसंख्यकों का रहनुमा बन कर आगे आने की योजना बनाई। यहाँ उन्हें कट्टरपंथी के रूप में बैठे-बिठाए वामपंथी कार्यकर्ता मिल गए। दोनों वैचारिक स्तर पर एक ही तरह से मार-काट की सोच रखने वाले, एक ही तरह की अवधारणा में पले कि हिंसा तो जरूरी और जायज है, पूरक बन कर नजर आने लगे।

पहले इन्हें कॉन्ग्रेस वाले जगह देते थे, अब जब इनका उग्र रूप सामने आने लगा तो वामपंथी इन्हें इकोसिस्टम का लाभ देने लगे हैं। इनको आज तक ये पता नहीं चल पाया है कि पैदल सिपाही बन कर उनके दादा भी पत्थर फेंकते थे, पोता भी फेंक रहे हैं, कम से कम छोटी टुकड़ी के सेनापति ही बन जाते, लेकिन न जाने क्यों नहीं बन पाए! सत्य तो यह है कि इनमें डर बिठा कर, उस डर को पाला गया, और उसका फायदा लिया जाता रहा। ये पिसते रहे, खुद को समझाते रहे कि इनके साथ तो बड़ी ज्यादती हुई है और हिन्दू तो बस उन्हें अब मार ही देगा।

यही कारण है कि एक अनुशासित स्वयंसेवकों का मार्च, जो कि पुलिस के दायरे में है, कोई नारेबाजी नहीं हो रही, वो भी किसी शहर की सड़क से गुजरती है तो कुछ लोगों को डर लगने लगता है। वो यह भूल जाते हैं कि कहीं भी बाढ़ आए, भूकंप हो, घर टूटे, आग लगे, बड़ी दुर्घटना हो, तो यही स्वयंसेवक मदद की पहली टुकड़ी के रूप में पहुँचते हैं, और ये नहीं पूछते कि ‘कौन जात हो’, तुम्हारा मजहब क्या है?

अगर एक अनुशासित भीड़ से तुम्हें डर लगता है तो उन हिन्दुओं का सोचो, उन आम नागरिकों का सोचो जो किसी शुक्रवार की नमाज के बाद हापुड़, सीलमपुर, बसीरघाट, मुर्शिदाबाद आदि जगहों पर एक अराजक भीड़ को पत्थर फेंकते, आग लगाते, पुलिस पर गोली चलाते, पेट्रोल बम फेंकते, पुलिस के जवानों को बार-बार हमला कर के पीछे ढकेलते देखते होंगे तो उन्हें कैसा डर लगता होगा।

फिर भी, अगर इस भीड़ को देख कर तुम्हें डर लग रहा है, तो फिर डरो क्योंकि ये डर पूरे भारतीय समाज की शांति के लिए अच्छा है। अगर ये डर तुम्हारे भीतर रहेगा कि तुम्हारी आगजनी, पत्थरबाजी, गोली चलाने की प्रवृत्ति के टक्कर में एक ऐसी टोली है जो हर जिले में तैनात है, तो तुम सड़कों पर आ कर आग लगाने से पहले सोचोगे। पढ़-लिख लो थोड़ा, वरना ये जिहाद और ये वामपंथी संघर्ष, कमलेश तिवारी की गर्दन या गढ़चिरौली के नरसंहार के रूप में भले ही तुम्हारी घृणा को शांत कर देगा, लेकिन तुम आज भी पेट्रोल और माचिस लिए भटकते हो, कल भी ऐसे ही भटकोगे। चुनाव तुम्हारा है क्योंकि स्वयंसेवकों की और भी टोलियाँ अब सड़कों पर निकलेंगी, मधुर संगीत पर कदमताल करते हुए।

ईसा मसीह की 114 फीट ऊँची प्रतिमा का शिलान्यास: कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने सौंपे ज़मीन से जुड़े दस्तावेज़

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के विधायक डीके शिवकुमार ने रामनगर के कनकपुरा तालुक के Harobele गाँव में कपालीबेटा में क्रिसमस के मौक़े पर दुनिया की सबसे ऊँची, 114 फीट की ईसा मसीह की मूर्ति का शिलान्यास किया।

ख़बर के अनुसार, जीसस की यह प्रतिमा कपालीबेटा में स्थापित होगी जहाँ डीके शिवकुमार को राज्य सरकार द्वारा जीसस की प्रतिमा के लिए 10 एकड़ ज़मीन मिली थी। क्रिसमस के अवसर पर, डीके शिवकुमार ने ट्रस्ट को ज़मीन से संबंधित दस्तावेज़ सौंपे जो इस प्रतिमा को स्थापित करने की ज़िम्मेदारी संभालेंगे। इस प्रतिमा का निर्माण हार्ड ग्रेनाइट से होगा।

कथित तौर पर, प्रतिमा की कुल ऊँचाई 114 फीट होगी और शिलान्यास की प्रक्रिया ईसा मसीह के दाहिने पैर की पूजा करके की गई थी। क्राइस्ट द रिडीमर प्रतिमा रियो डी जनेरियो की ऊँचाई 98 फीट है और ब्राजील में 26 फीट है।

Harobele गाँव की लगभग 99 फ़ीसदी आबादी ईसाई है। उन्होंने शिवकुमार और उनके भाई डीके सुरेश के प्रति आभार व्यक्त किया, जो बैंगलोर ग्रामीण से सांसद हैं। शिलान्यास के दौरान एमएलसी एस रवि, चिन्नाराजू जो ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व करते हैं, वो भी अन्य लोगों के साथ उपस्थित थे।

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधायक डीके शिवकुमार वर्तमान में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ज़मानत पर बाहर हैं। उन्हें इस मामले के संबंध में चार दिनों की पूछताछ के बाद 3 सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ़्तार किया था। ईडी ने गिरफ़्तार करने के बाद उनसे 14 दिन तक लगातार पूछताछ की थी। इसके बाद, 17 सितंबर को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें 1 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। इसके बाद 30 सितंबर को उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवाई हुई, उस समय कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई 14 अक्टूबर तक के लिए टाल दी थी।

ग़ौरतलब है कि ईडी ने शिवकुमार और उनके परिवार से जुड़े 317 खातों का ज़िक्र किया था जिनके माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की घटना अंजाम दिया गया था। प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को बताया था कि शिवकुमार की कई संपत्तियाँ बेनामी हैं और 317 बैंक खातों के जरिए धन शोधन किया गया है। ईडी ने कहा था कि शिवकुमार के ख़िलाफ़ जाँच के अनुसार, शोधित धन 200 करोड़ रुपए से अधिक थी और क़रीब 800 करोड़ रुपए मूल्य की बेनामी संपत्ति थी।

कर एजेंसियों ने शिवकुमार और उनके साथ जुड़े चार अन्य लोगों के ख़िलाफ़ आयकर अधिनियम, 1961 की धारा-277 और 278 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-120 (बी), 193 और 199 के तहत मामले दर्ज किए थे।

पेट्रोल-डीज़ल तैयार रखो, जैसे ही ऑर्डर मिलेगा, आग लगा देना, जो होगा वो हम देख लेंगे: कॉन्ग्रेस नेता

ओडिशा में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद प्रदीप माझी द्वारा विवादित बयाद दिए जाने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में प्रदीप माझी फोन पर किसी से भड़काऊ भाषा में बात कर रहे थे। दरअसल, वो फोन पर किसी से बात करते हुए कह रहे थे, “पेट्रोल और डीज़ल तैयार रखो। जिस क्षण आपको ऑर्डर मिलेगा, सब कुछ में आग लगा देना, बाक़ी जो होगा वो हम देख लेंगे।”

जानकारी के अनुसार, ज़िले के कोसागुमुडा थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित रूप से हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में कॉन्ग्रेस पुलिस की निष्क्रियता का विरोध करते हुए नबरंगपुर में 12 घंटे का बंद रखा गया। जनपद के कम से कम 10 प्रखंडों में सुबह से ही जाम की स्थिति बनी रही।

ओडिशा टीवी (OTV) की ख़बर के अनुसार, इस मामले को लेकर जब माझी ने कांरीगुड़ा छाक के पास विरोध-प्रदर्शन किया, तो नबरंगपुर के एडिशनल एसपी ने हस्तक्षेप किया और उनसे इस आंदोलन को वापस लेने के लिए कहा। इसके बाद, माझी ने कथित तौर पर अपने कार्यकर्ताओं को कॉल किया और उन्हें पेट्रोल और डीजल के साथ तैयार रहने के लिए कहा।

इस बीच, नबरंगपुर टाउन में अम्बेडकर चौक के पास कुछ उपद्रवियों ने एक वाहन को आग लगा दी। हालाँकि, आग लगाने वाले उपद्रवियों की पहचान नहीं हो सकी है, लेकिन सूत्रों को संदेह है कि आग लगाने की इस इस घटना को माझी का निर्देश मिलने के बाद ही अंजाम दिया गया है।

बाद में, OTV से बात करते हुए, कॉन्ग्रेस नेता ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को आग लगाने का निर्देश दिया था। उन्होंने बताया, “मैं अब लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता। BJD सरकार के शासनकाल में महिलाओं और बालिकाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है, इस पर मैं चुप्पी नहीं साथ सकता। पहले कुंडली में एक नाबालिग लड़की के साथ जवानों ने सामूहिक बलात्कार किया था। अब, नाबरंगपुर में एक अन्य नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई।”

माझी ने BJD के नेतृत्व वाली ओडिशा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “13 दिन बीत चुके हैं लेकिन मृतक नाबालिग लड़की की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी तक सामने नहीं आई है। डॉक्टर, गृह विभाग और सरकार क्या कर रहे हैं?”

उन्होंने कहा, “हमें क़ानून हाथ में लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है और सरकार ने हमें ऐसा करने के लिए मजबूर किया है। जैसा कि गाँधीवादी सिद्धांत हमें न्याय सुनिश्चित करने में मदद नहीं कर रहे हैं, हम सुभाष चंद्र बोस के आदर्शों को अपनाने के लिए बाध्य हैं। हमें न्याय पाने के लिए हिंसा को अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है। मैंने फोन पर जो कुछ भी कहा, उस पर मुझे पछतावा नहीं है। अगर मुझे अपनी माँ और बहनों को सुरक्षित रखने के लिए हिंसा अपनानी पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूँगा।”

इस बीच, नबरंगपुर BJD के सांसद रमेश माझी ने हिंसा को भड़काने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को उकसाने के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं की आलोचना की। उन्होंने कहा, “जो कुछ भी हुआ है, पुलिस उसकी जाँच कर रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी जल्द ही आ जाएगी। 2019 के चुनावों में अपनी हार का गुस्सा इस तरह से निकालना सही नहीं है। उनके अंदर आदिवासियों या दलितों के लिए कोई भावना नहीं है, वो केवल इस तरह की गतिविधियों के माध्यम से सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं। सभी आरोपितों को जल्द ही पकड़ लिया जाएगा।”

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PFI के 150 कट्टरपंथी इस्लामी अलग-अलग राज्यों से जब आते हैं दिल्ली तो होता है जामिया दंगा: DP का खुलासा

देश भर में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुए। इस क़ानून का मक़सद पड़ोसी इस्लामिक राष्ट्रों से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देना है, बस। लेकिन शायद इतनी भी समझ लोगों में नहीं! भ्रम और बहकावे के कारण जगह-जगह उग्र हुई मुस्लिम भीड़ ने पथराव, हिंसा और बर्बरता भरे प्रदर्शनों को अंजाम दिया। इसके बाद ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ मिलकर दिल्ली पुलिस जामिया मिलिया इस्लामिया में हुए दंगों के कारणों की जाँच कर रही है। इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस का इशारा कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) पर है।

शाहीन बाग क्षेत्र में हिंसक विरोध-प्रदर्शन की ओर इशारा करते हुए पुलिस ने कहा कि उस क्षेत्र के इतना अस्थिर होने के पीछे के कारणों का समय आने पर ख़ुलासा किया जाएगा। दिल्ली पुलिस ने शाहीन बाग, ओखला, जामिया नगर, बटला हाउस के आसपास के क्षेत्र में मौजूद PFI के ऑफिसों पर ऊँगली उठाई है।

पुलिस के अनुसार, जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा से दो दिन पहले 13 दिसंबर को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI के लगभग 150 सदस्यों ने विभिन्न राज्यों से दिल्ली में प्रवेश किया था। पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों के मुताबिक़, जामिया इलाक़े में हिंसा भड़कने से पहले वो कहीं छिप गए थे।

पुलिस के अनुसार, PFI के अराजक तत्वों द्वारा पथराव और आगजनी की शुरुआत की गई। पुलिस ने बताया कि विरोध-प्रदर्शन की शुरुआत दिल्ली में हुई क्योंकि कार्यकर्ताओं को पता था कि मीडिया इस ख़बर को तुरंत ब्रेक कर देगा और इससे हिंसा को फैलाने में अधिक मदद मिलेगी।

वहीं, पुलिस ने इस बात के भी पर्याप्त साक्ष्य जुटाए हैं कि PFI की सक्रिय भूमिका न केवल दिल्ली में ही थी बल्कि लखनऊ में भड़के दंगे में उनकी सक्रिय भूमिका थी। हिंसक विरोध-प्रदर्शनों को अंजाम देने के बाद कई PFI इस्लामी कट्टरपंथी भूमिगत हो गए।

जामिया मिलिया इस्लामिया घटना के हिंसक विरोध के सिलसिले में दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई पहली FIR में कहा गया था कि रविवार को 7 से 8 छात्रों के साथ उपद्रवियों ने विश्वविद्यालय के गेट के अंदर से पथराव किया।

जामिया हिंसा से संबंधित दिल्ली पुलिस की FIR में चार स्थानीय राजनेताओं और कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक समेत छ: लोगों को संदिग्ध बताया गया। दिल्ली पुलिस ने अपनी FIR में पूर्व कॉन्ग्रेस विधायक आसिफ़ ख़ान को एक आरोपित के रूप में नामित किया।

पुलिस ने बताया कि अन्य छ: आरोपित व्यक्तियों की पहचान स्थानीय राजनेताओं आशु खान, मुस्तफ़ा, हैदर, क़ासिम उस्मानी-CYSS का सदस्य, दिल्ली की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की छात्र शाखा, AISA सदस्य चंदन कुमार, SIO के सदस्य आसिफ़ तनहा, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया के रूप में की गई है। ख़ुफ़िया एजेंसी के अधिकारी ने बताया कि वे पर्याप्त सबूत इकट्ठा कर चुके हैं और सही समय पर कार्रवाई करेंगे।

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फिरोजाबाद पुलिस ने जारी की 100 उपद्रवियों की सूची- देखें, पहचानें, और पुलिस को बताएँ!

बीते दिनों नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर उत्तरप्रदेश के कई जिलों में उपद्रवियों ने काफी उत्पात मचाया। इसी बीच कई लोगों की मौत और कई पुलिस वालों के घायल होने की खबरें मीडिया में आई। जिसके बाद सरकार और प्रशासन ने इस मामले पर सख्ती दिखाई, साथ ही दंगाईयों की पहचान कर इनपर कार्रवाई करने के आदेश दिए। इसी क्रम में फिरोजाबाद पुलिस ने आज 20 दिसंबर को जनपद फिरोजाबाद में हुई हिंसा में शामिल 100 दंगाईयों की दूसरी की श्रृंखला जारी की।

ट्विटर पर जारी किए गए पोस्टर्स में फिरोजाबाद पुलिस की ओर से लिखा गया, “20 दिसंबर को फिरोजाबाद में हुई हिंसा में ये लोग (पोस्टर में दिख रहे लोग) जिम्मेदार हैं। जिन्होंने बवाल और आगजनी करके सरकारी संपत्ति और आम जनता के जान-माल को नुकसान पहुँचाया। इन्हें पहचानने में फिरोजाबाद पुलिस की मदद करें। बस आपको फोन करना है। अच्छे नागरिक का फर्ज निभाएँ। आपकी पहचान पूर्णत: गोपनीय रखी जाएगी।”

फिरोजाबाद पुलिस की ओर से जारी पोस्टर में पुलिस उपाधीक्षक नगर, नगर मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक नगर का फोन नंबर दिया गया है। इसके अलावा पोस्टर में एक लैंडलाइन नंबर भी दिया गया है। जिसके आगे लिखा है कि इस नंबर पर नाम बताए बिना भी सूचना दी जा सकती है। सूचना देने वाले का नाम पूर्ण रूप से गोपनीय रखा जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले भी फिरोजाबाद पुलिस ने बवाल में शामिल उपद्रवियों को पकड़ने के लिए पोस्टर जारी किए थे। साथ ही घोषणा की थी कि इनकी जानकारी देने वालों को इनाम दिया जाएगा। बता दें फिरोजाबाद में शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद हुई हिंसा के दौरान चार लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए है।

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कौन हैं रंगा-बिल्ला जिसका नाम जहरीली वामपंथन अरुंधति रॉय ले रही है?

पुरानी फ़िल्में अगर देखी होंगी तो विलन के चमचे हमेशा धारी वाली टी शर्ट और गले में रुमाल से लैस होते थे। इनका नाम भी हमेशा रंगा या बिल्ला हुआ करता था। ये मेन विलन का सबसे तगड़ा वाला गुंडा हमेशा एक ही हुलिए और एक ही नाम का क्यों होता था, ऐसा काफी दिन तक सोचते रहे हम भी। बहुत बाद में रंगा बिल्ला की कहानी सुनाई दी।

दोनों कार चोर थे। मुंबई में पुलिस से बचने के चक्कर में ये भाग कर दिल्ली आए थे और दिल्ली में एक कमरा किराए पर ले लिया था। एक फ़िएट कार चुरा कर उसका नंबर प्लेट दोनों ने बदला और सोचा कि किसी का अपहरण कर के उस से पैसे फिरौती के भी कमाएँ।

अगस्त, 1978 के आखरी दिन थे। एक नौसेना अधिकारी के दो बच्चे आकाशवाणी केंद्र में अपना कोई कार्यक्रम देने जा रहे थे। दोनों ने उनका अपहरण कर लिया, मगर टुच्चे कार चोरों से अपहरण जैसा बड़ा अपराध संभला नहीं। बेटा छोटा था, पकड़े जाने के डर से संजय चोपड़ा नाम के इस बच्चे की नृशंस हत्या कर दी दोनों ने मिलकर। बड़ी बहन गीता को भी बलात्कार के बाद मार डाला।

दोनों बच्चों ने इन अपराधियों से जमकर लड़ाई की थी। चलती कार में कई लोगों ने बच्चों को इनसे लड़ते देखा था। शवों पर भी रंगा बिल्ला के टूटे बाल पाए गए थे, अपराधियों को सर पर चोट भी लगी थी इस दौरान। अपने कुकृत्य को अंजाम देने के बाद दोनों दिल्ली से भागने लगे। मगर सफ़र में एक फौज़ी से झगड़ा हो जाने पर ये पुलिस के हत्थे चढ़ गए। चार साल मुक़दमा चलने के बाद दोनों को फाँसी हुई थी। बिल्ला शायद पहला फाँसी की सजा पाया अपराधी था, जिसका पत्रकारों ने इंटरव्यू लिया था। वो अंत तक कहता रहा कि सारा अपराध रंगा का है, उसने कुछ नहीं किया। उसे सेल से घसीट कर, छटपटाने, चीखने के बावजूद, फाँसी पर टांग दिया गया था।

इन दुर्दांत अपराधियों का नाम आज भी जिन्दा है। और इनका नाम इसलिए याद आया क्योंकि अशोक अचानक से कुशवाहा हो गए हैं, अम्बेदकर दलितों के नेता हैं, पटेल–गाँधी कॉन्ग्रेसी हो गए हैं, शिवाजी महाराष्ट्र के हैं और भी सारे लोग जाति, क्षेत्र, धर्म के नाम पर बाँटे जा रहे हैं। मेरे हिसाब से बँटवारा पूरा-पूरा होना चाहिए। ये आधा-अधुरा देना नहीं देने के बराबर है। मुंबई मिल कांड वालों का बंटवारा हो! निर्भया कांड वाले भी बाँटो!

क्या हुआ रंगा-बिल्ला नहीं बाँटेंगे? वो सबके हैं? और सबके क्यों हैं? क्योंकि अरुंधति ने कहा है!

अरुंधति ने तो सबको अपना पता 7-RCR बताने को कहा है। मुझे यकीन है कि सबको 7-RCR का मतलब भी नहीं पता होगा। मोदी हों या मनमोहन, यहाँ देश के प्रधानमंत्री रहते हैं। अरुंधति के कहने पर पूरा देश प्रधानमंत्री थोड़े न बन जाएगा। ठीक उसी तरह क्या आप अपना नाम किसी हत्यारे-बलात्कारी के नाम से जोड़ना चाहेंगे? शायद नहीं। और कोई ऐसा करे, उसके लिए जिस पागलपन की जरूरत होगी, वो खुद अरुंधति के अलावा शायद ही किसी के पास हो इस देश में!

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देशी कट्टे से पुलिस पर गोली चला कर होती है UPSC की तैयारी! अपने ‘शहीद दंगाई हीरो’ के बचाव में मीडिया

मेरठ पुलिस पर गोली चलाने वाला दंगाई युवक हुआ कैमरे में कैद, जारी हुआ Video

उत्तर प्रदेश के मेरठ में पिछले शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को हुई हिंसा में पुलिस पर गोली चलाने वाले 2 युवकों की वीडियो मेरठ पुलिस ने जारी की। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि नीली जैकेट पहना एक युवक पुलिस पर बंदूक ताने खड़ा है, लेकिन उसके मुँह पर नकाब है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने वीडियो जारी करते हुए बताया कि उन्हें दिसंबर 19 से दिसंबर 21 के बीच हुई हिंसा में इस तरह के हमले झेलने पड़े और इसी कारण उन्हें दंगाईयों को पलटकर जवाब देना पड़ा। बता दें पूरे राज्य में भड़की हिंसा के दौरान अभी तक जहाँ पूरे राज्य में 17-18 मौतें होने का दावा किया जा रहा है। उनमें से 6 मौतें अकेले मेरठ की घटना हैं।

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गौरतलब है कि राज्य के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा भी मीडिया से बातचीत के दौरान पुलिस पर हुए हमलों का जिक्र करते हुए बता चुके हैं कि राज्य में 21 जिलों में हुई हिंसा में 288 पुलिसकर्मी घायल हुए है, जिनमें से 62 गोली लगने के कारण घायल हुए हैं। उपमुख्यमंत्री ने मीडिया को ये भी बताया कि जिन क्षेत्रों में हिंसा भड़कीं, वहाँ पुलिस ने 500 गैर-प्रतिबंधित कारतूस भी बरामद किया है। 

इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन घटनाओं की निंदा करते हुए दंगाईयों से कह चुके हैं कि दंगे करने वाले अपनी अंतरात्मा से पूछें कि उन्होंने सही किया है या नहीं। वहीं यूपी पुलिस की तारीफ करते हुए कह चुके हैं कि उन्होंने हिंसा रोकने के लिए अच्छा काम किया।

बता दें एक ओर जहाँ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सारी हिंसा के लिए सरकारी मशीनरी को जिम्मेदार बताते हुए प्रदर्शनकारियों के प्रदर्शन को शांतिपूर्ण करार दे चुके हैं। वहीं डीजीपी के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान राज्य के 7 जिलों में 100 करोड़ से ज्यादा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है। जिसके मद्देनजर प्रशासन ने उन पर कार्रवाई करने के भी आदेश दे दिए हैं।

कॉन्ग्रेस ने 362 लोगों को डाला था डिटेंशन सेंटर में: PM ने नहीं बोला झूठ, राहुल और टेलीग्राफ का दावा झूठा

“कॉन्ग्रेस और अर्बन नक्सलियों द्वारा उड़ाई गई डिटेन्शन सेंटर की अफवाह सरासर झूठ है जो इस देश की मिट्टी के मुस्लिम हैं, जिनके पुरखे माँ भारती की ही संतान थे, उन पर नागरिकता क़ानून और एनआरसी दोनों का ही कोई लेना-देना नहीं है। कोई देश के मुस्लिमों को डिटेन्शन सेंटर में नहीं भेजने जा रहा।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बयान रविवार (दिसंबर 22) को रामलीला मैदान में विपक्ष के अफवाहों का जवाब देते हुए दिया। इसके बाद भी सियासत थमी नहीं और कॉन्ग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि मोदी कह रहे हैं कि देश में कोई डिटेंशन सेंटर नहीं है। जबकि अगर आप पीएम के बयानों पर गौर करें तो उन्होंने कहा कि देश के मुस्लिमों को कोई डिटेंशन सेंटर में नहीं भेजा जाएगा। जबकि विपक्षी नेताओं व मीडिया के एक बड़े वर्ग ने अफवाह फैलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में एक भी डिटेंशन सेंटर न होने की बात कही।

पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने नरेंद्र मोदी को आरएसएस का प्रधानमंत्री बताया और कहा कि वो माँ भारती से झूठ बोलते हैं। राहुल गाँधी ने असम का एक वीडियो भी शेयर किया, जिसमें एक कथित एक्टिविस्ट ने बताया कि असम में डिटेंशन सेंटर हैं। जबकि पीएम मोदी ने ऐसा कहा ही नहीं कि देश में एक भी डिटेंशन सेंटर नहीं है।

बीबीसी के एक पत्रकार के वीडियो के हवाले से दावा किया कि प्रधानमंत्री झूठ बोल रहे हैं। जब पीएम मोदी के बयान को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सवाल पूछा गया तो उन्होंने बताया था:

डिटेंशन सेंटर को लेकर कही जा रही बातें पूरी तरह निराधार हैं और मोदी सरकार के दौरान कोई डिटेंशन सेंटर नहीं बनाया गया है। विदेशी नागरिकों के वीजा शर्तों के उल्लंघन या किसी अन्य नियम के उल्लंघन की स्थिति में उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखे जाने का प्रावधान है। ऐसे विदेशी नागरिकों को वापस अपने देश भेजे जाने तक डिटेंशन सेंटर में रखा जाता है। इसके लिए देश के कुछ भागों में डिटेंशन सेंटर पहले से मौजूद हैं। ऐसे प्रावधान पूरी दुनिया में हैं। इसका एनआरसी से कोई लेना-देना नहीं है।

‘टेलीग्राफ इंडिया’ सरीखे मीडिया संस्थानों ने भी डिटेंशन सेंटर को लेकर पीएम मोदी के बयान को ग़लत सन्दर्भ में पेश किया और झूठा साबित करने की कोशिश की:

दरअसल, अमित शाह के बयान को विपक्ष ने इसीलिए तवज्जो नहीं दी क्योंकि इससे उन नेताओं की पोल खुल जाती, जों अफवाह फैलाने में लगे हुए हैं। वहीं प्रधानमंत्री के बयान को तोड़ने-मरोड़ने का मौक़ा मिलने के कारण इनलोगों ने जम कर जनता को भरमाने का प्रयास किया। अब आते हैं आज से 8 साल पहले की एक ख़बर पर। दिसंबर 13, 2011 को पीआईबी द्वारा प्रकाशित किए गए एक ख़बर से साफ़-साफ़ पता चलता है कि कॉन्ग्रेस की सरकारों के दौरान डिटेंशन सेंटर बनाए गए थे।

दिसंबर 2011 की PIB की ख़बर, जो कॉन्ग्रेस की पोल खोलती है

जब की ये ख़बर है, तब यूपीए-2 की सरकार थी। पीआईबी ने बताया था कि भारत सरकार ने गोलपुरा, कोकराझाड़ और सिल्चर में डिटेंशन सेंटर बनाए हैं, ताकि अवैध घुसपैठियों को प्रत्यर्पण तक वहाँ और रखा जाए। इस ख़बर में बताया गया था कि नवंबर 2011 तक कॉन्ग्रेस ने 362 लोगों को डिटेंशन सेंटर में भेजा था। गोलपुरा में 221, कोकराझाड़ में 79 और सिल्चर के डिटेंशन कैम्प में 62 लोगों को भेजे जाने की ख़बर आई थी। मनमोहन सरकार के दौरान इसी अवधि तक 78 लोगों को प्रत्यर्पित किया गया था।

जनवरी 13, 2011 को घुसपैठियों के प्रत्यर्पण के लिए भारत और बांग्लादेश के बीच करार भी हुआ था। इस दौरान भारत ने बांग्लादेश से आने वाले अवैध घुसपैठियों को प्रत्यर्पित किए जाने का मुद्दा भी उठाया था। तत्कालीन गृह राज्यमंत्री मुल्लाप्पली रामचंद्रन ने इस बारे में लोकसभा में लिखित जानकारी दी थी। इस ख़बर से अफवाह फैला रहे विपक्षी नेताओं, मीडिया और अर्बन नक्सल्स की पोल खुल जाती है।

‘हिंदू दानिश कनेरिया हमारे साथ क्यों खाता है?’ – Pak क्रिकेट टीम का घिनौना सवाल और अख्तर का जवाब

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शोएब अख्तर ने एक चैट शो में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के घिनौने चेहरे का पर्दाफाश किया है। उन्होंने एक चैट शो के दौरान स्वीकारा है कि उनकी टीम हिंदू ख़िलाड़ी दानिश कनेरिया के साथ काफी नाइंसाफी करती थी। शोएब के अनुसार, दानिश कनेरिया हिंदू थे इसलिए पाकिस्तानी टीम में उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था। साथ ही टीम के खिलाड़ी यहाँ तक कहते थे कि दानिश कनेरिया उनके साथ खाना क्यों खाते हैं?

चैट शो में पूर्व क्रिकेटरों असीम कमाल और राशिद लतीफ के साथ शोएब अख्तर ने कई खुलासे किए। ओबीएन की रिपोर्ट के अनुसार, इस चैट शो के दौरान शोएब अख्तर ने एक सवाल के जवाब में कहा, “स्टीव वॉ ने एंड्रयू साइमंड्स को लगातार मौके दिए। वो दस साल तक क्रिकेट खेले। एबी डिविलियर्स ने क्विंटन डि कॉक को रिहेबिलिटेशन सेंटर भेजा, उन्हें तैयार किया और आज देखिए वो क्या कर रहे हैं? हमारे यहाँ तो ड्रेसिंग रूम में ही खिलाड़ियों को खराब कर दिया जाता है।”

इसी दौरान राशिद लतीफ ने यूसुफ योहाना का मामला उठाया और कहा कि यूसुफ को भी बहुत तंग किया गया, लेकिन वो भी बेमिसाल खिलाड़ी ‌थे। शोएब अख्तर ने यूसुफ के बारे में बताते हुए कहा, “यूसुफ के नाम 12 हजार रन दर्ज हैं। मगर, हमने कभी उनका सम्मान नहीं किया। दो-तीन खिलाड़ियों से मेरी लड़ाई भी हुई। मैंने कहा कि अगर कोई हिंदू है, तो भी वो खेलेगा। और फिर उसी हिंदू ने हमें टेस्ट सीरीज जिताई। “

बता दें कि यूसुफ योहाना मूल रूप से ईसाई थे। लेकिन बाद में अचानक उन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया था। कहानी तो यह भी चली कि क्रिकेट करियर को लंबा खींचने के लिए मजबूरी में उनके जैसे स्टार खिलाड़ी को भी धर्म परिवर्तन करना पड़ा।

शोएब अख्तर ने दानिश कनेरिया का जिक्र करते हुए बताया, “बात खुल जाएगी, मगर बताना चाहता हूँ कि कुछ खिलाड़ियों ने मुझसे कहा कि दानिश कनेरिया हमारे साथ खाना क्यों खाता है। मैंने उन सभी से कहा कि मैं तुम्हें यहाँ से उठाकर बाहर फेंक दूँगा, तुम अपने घर के कप्तान होगे। वो खिलाड़ी तुम्हें 6-6 विकेट लेकर दे रहा है। इंग्लैंड में दानिश और शमी ने ही हमें सीरीज जिताई थी।”

गौरतलब है कि ऐसे समय में जब भारत में नागरिकता संशोधन कानून के तहत 3 इस्लामिक देशों से आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने पर सरकार से सवाल किया जा रहा है, उस समय शोएब अख्तर और अन्य क्रिकेट्रों द्वारा किया गया खुलासा बेहद महत्तवपूर्ण है। यह खुलासा बताता है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक चाहे सांसद बन जाएँ, पार्षद बन जाएँ या क्रिकेटर बन जाएँ… उनकी स्थिति हमेशा दयनीय ही रहेगी।

6 साल की उम्र में जिस पूर्व सांसद की हो गई थी शादी, उस सावित्री बाई फुले ने छोड़ा कॉन्ग्रेस का ‘हाथ’

पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले ने कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है। इस्तीफ़ा देने के बाद सावित्री बाई फुले ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी आवाज़ पार्टी में नहीं सुनी जा रही थी। इस वजह से उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। साथ ही उन्होंने घोषणा की कि अब वो अपनी ख़ुद की पार्टी बनाएँगी।

दरअसल, पिछले साल ही लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सावित्री बाई फुले ने भारतीय जनता पार्टी का दामन छोड़कर कॉन्ग्रेस का हाथ थामा था। बहराइच की पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले ने 2012 में बीजेपी के टिकट पर बलहा (सुरक्षित) विधानसभा सीट से चुनाव जीता था और 2014 में उन्हें सांसद का टिकट मिला और तब वह संसद पहुँची थीं। 2018 में वो बीजेपी छोड़कर, कॉन्ग्रेस में शामिल हो गई थीं।

पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले की 6 साल की उम्र में शादी कर दी गई, लेकिन विदाई नहीं हुई थी। बाल-विवाह के बावजूद फूले छ: साल की उम्र में ही समाज सेवा से जुड़ गई थीं, लेकिन राजनैतिक जीवन की शुरुआत आठ साल की उम्र से हुई। हालाँकि, 16 दिसंबर, 1995 को एक सामाजिक आंदोलन के दौरान उन्हें पीएसी की गोली लग गई, जिसके बाद उन्हें लखनऊ जेल ले जाया गया। जेल पहुँचते ही उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें अब केवल समाज सेवा ही करनी है।

जेल से निकलने के बाद सावित्री बाई फुले ने अपने पिता से बात की और ससुराल पक्ष वालों को बुलाकर अपनी इच्छा व्यक्त की। सबकी सहमति के बाद अपनी सगी छोटी बहन की शादी अपने पति से कराने के बाद उन्होंने पूरी तरह से संन्यास धारण कर लिया और बहराइच के जनसेवा आश्रम से जुड़ गईं। इसके बाद वो ग़रीब लड़कियों की शादी कराने, साधुओं का भंडारा, प्रवचन जैसे कामों में जुट गईं।

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