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सवेरा ने की PAK के आसिफ़ जान से शादी: अगले दिन भाई को मिला शव, कहा- उसे यातना देकर मार डाला

अल्पसंख्यकों के लिए नर्क बन चुके पाकिस्तान से ईसाई लड़की की हत्या की खबर आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का है। जहाँ 30 वर्षीय सवेरा मकबूल नामक लड़की ने कुछ दिन पहले ही लाहौर स्थित शामा कॉलोनी निवासी आसिफ जान से शादी की थी। लेकिन अगले ही दिन उसके भाई को उसका शव बरामद हुआ। मृतिका के भाई का आरोप है कि उसकी बहन को उसके ससुराल वालों ने यातनाएँ देकर मार डाला।

सवेरा के भाई सुलेमान मसीह द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में बताया गया कि सवेरा को उसके पति आसिफ जान और उसके घरवालों ने भीषण यातनाएँ दीं।

मसीह ने पुलिस को बताया, “जब हम शादी की अगली सुबह जान के घर पारंपरिक नाश्ता देने पहुँचे तो हमें बताया गया की सवेरा की तबीयत खराब है और उसे अस्पताल ले जाया गया है। लेकिन जब हम अस्पताल पहुँचे तो डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था। साथ ही मामले को पुलिस केस बताते हुए कहा था कि सवेरा के शरीऱ पर घाव है।“

जानकारी के मुताबिक इस मामले में पुलिस अधिकारी अब्दुर रशीद ने बताया कि पुलिस कई कोणों से मामले की जाँच कर रही है। उन्होंने कहा, ‘‘शव को परीक्षण के लिए भेज दिया गया है जिससे मौत का सही कारण पता चल सके।”

पुलिस अधिकारी के अनुसार शव परीक्षण के बाद ही पता चल पाएगा कि उसे (सवेरा) यातना के बाद जहर दिया गया या दिल का दौरा पड़ा। रशीद के अनुसार आसिफ जान को हिरासत में ले लिया गया है और उससे पूछताछ की जा रही है।

शाहीन बाग़ की आवारा भीड़ पर बावली हुई जा रही मीडिया की नज़र में कोटा के बच्चों की जान सस्ती

पहली घटना, दिल्ली के शाहीन बाग़ में। वही शाहीन बाग़ जहाँ पुलिस पर पत्थर फेंके गए, आगजनी की गई, दंगे किए गए और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। वहाँ कुछ प्रदर्शनकारी सस्ता प्रचार स्टंट करते हुए दिखते हैं और मीडिया उन्हें देश-विदेश में आंदोलनकारियों के रूप में दिखाता है। क्यों? क्योंकि एक 20 दिन की नवजात बच्ची वहाँ मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज कराने पहुँची है। चौंक गए न? मीडिया में तो यही चल रहा है- सीएए की सबसे कम उम्र की प्रदर्शनकारी उम्मी हबीबा, जिसका जन्म हुए अभी महीना भर भी नहीं हुआ। वो मोदी के ख़िलाफ़ धरना दे रही है।

दूसरी घटना, राजस्थान के कोटा में एक साल में 962 बच्चों की मौत हो जाती है। 25 दिसंबर को 1, 26 को 3, 27 को 2, 28 को 6, 29 को 1, 30 को 4 और 31 को 5 मासूम काल के गाल में समा गए। यानी, 7 दिनों में 22 मौतें। केवल दिसंबर महीने में 99 बच्चों की मौत हो गई। अस्पताल में व्यवस्था नहीं है, संसाधन नहीं है और उपकरणों की कमी है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि ये कोई नई बात नहीं। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि सीएए से ध्यान भटकाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। मीडिया यहाँ चुप है। सवाल नहीं पूछ रहा। क्यों? क्योंकि यहाँ भाजपा की सरकार नहीं।

जहाँ तक शाहीन बाग़ में उम्मी के मोदी विरोधी प्रदर्शन में शामिल होने का सवाल है, स्पष्ट है कि उस नवजात को ठंड के मौसम में उसके परिवार ने वहाँ पर लाया है। उसे तो ये तक नहीं पता कि सीएए क्या है, मोदी कौन है, उसके आसपास क्या हो रहा है और उसे कहाँ लेकर जाया जा रहा है? ये एक सस्ता पब्लिसिटी स्टंट है, जो मीडिया अटेंशन के लिए किया गया। ठीक उसी तरह, जैसे हिजाब और जैकेट के ऊपर से मरहम-पट्टी किए हुए प्रदर्शनकारी ‘पुलिसिया बर्बरता’ के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते दिखे।

मीडिया के लिए वामपंथियों के पब्लिसिटी स्टंट का ज़्यादा मोल है और कोटा के जेके लोन अस्पताल में 962 बच्चों का मरना एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर ध्यान देना वो उचित नहीं समझती। शाहीन बाग़ वाले मसले में मोदी-विरोध है, वो बिकता है। कोटा की ख़बर में राज्य सरकार की नाकामी है, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का असंवेदनशील रवैया और कॉन्ग्रेस पर सवाल उठते हैं, इसीलिए मीडिया के लिए यहाँ कोई ख़ास मसाला नहीं है। मुजफ्फरपुर और गोरखपुर वाली बात कोटा में नहीं है। इसीलिए, मीडिया मुट्ठी भर उपद्रवियों, दंगाइयों और बवालियों के आंदोलन को ज़्यादा तवज्जो देता है।

मुख्यमंत्री का बयान संवेदनहीन है क्योंकि राजस्थान के गृह सचिव वैभव गालरिया ने प्रारंभिक जाँच में पाया है कि हॉस्पिटल के सिस्टम में, इंफ्रास्ट्रक्चर में काफ़ी गड़बड़ियाँ हैं। हॉस्पिटल के नवजात शिशु वाले आईसीयू में ऑक्सीजन सप्लाई सही नहीं है। संक्रमण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है और ज़रूरी दवाओं का अभाव है। साफ़ ज़ाहिर होता है कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। अफ़सोस ये कि मुजफ्फरपुर की तरह (जहाँ सत्ताधीशों से ज़्यादा डॉक्टरों से सवाल-जवाब किया गया) यहाँ सवाल पूछने के लिए मीडिया का अभाव है।

अगर उम्मी हबीबा की बात करें तो उसकी माँ के कुल 5 बच्चे हैं और वो मीडिया अटेंशन का कारण इसीलिए बन रही है, क्योंकि वह अपने बच्चों को सीएए विरोधी प्रदर्शन में लेकर आती है। क्या 20 दिन की बच्ची से उसकी मर्जी पूछी जा सकती है? क्या उसे पता भी है कि वो कहाँ है और उसका इस्तेमाल किसलिए किया जा रहा है? उसकी अम्मी संविधान बचाने की बात करते हुए धरने पर बैठी हुई हैं। संविधान को किस से क्या ख़तरा है, इसका उत्तर ख़ुद वामपंथियों के पास भी नहीं है। ऐसे लोग एक बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खेलेंगे और बाद में मोदी को जिम्मेदार ठहराएँगे। चित भी मेरी और पट भी मेरी।

मेनस्ट्रीम मीडिया और कथित संवेदनशील बुद्धिजीवी तथा लिबरल गिरोह जो किसी माँ के हाथ में बच्चे की नाक में लगी ऑक्सीजन पाइप वाली तस्वीर दिखा कर संवेदना दिखा रहा था, आज वो चुप हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस के सरकार में बच्चों का इस संख्या में मरना जायज है। इस देश के मीडिया की दुर्गति यही है कि जब तक ‘भाजपा’ वाला धनिया का पत्ता न छिड़का गया हो, इन्हें न तो दलित की मौत पर कुछ कहना है, न बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु पर इन्हें वो ज़ायक़ा मिल पाता है।

UP में PFI के 25 सदस्य गिरफ्तार: DGP ने संगठन पर बैन के लिए गृह मंत्रालय को लिखा पत्र

उत्तरप्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ भड़की हिंसा पर कट्टरपंथी समूह पीएफआई की भूमिका लगातार घेरे में आ रही है। कई आला अधिकारी और राजनेता इस समूह को प्रत्यक्ष रूप से दंगों के लिए जिम्मेदार बता चुके हैं। ऐसे में यूपी के आईजी, लॉ एंड ऑर्डर प्रवीण कुमार ने जानकारी दी है कि उन्होंने इस समूह के 25 लोगों को विभिन्न आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया है। साथ ही यूपी के डीजीपी ने भी इस समूह को प्रतिबंधित करने के लिए गृह मंत्रालय को पत्र लिखा है।

मीडिया रिपोर्ट्स से अनुसार लखनऊ में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए लॉ एंड ऑर्डर आईजी प्रवीण कुमार ने बताया कि आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में पीएफआई से जुड़े 25 लोगों की गिरफ्तारी हुई है।

इसके अलावा, बता दें, उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओपी सिंह ने भी इस समूह को प्रतिबंधित करने के लिए गृह मंत्रालय को एक पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ 19 दिसंबर को हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन में जाँच के दौरान पीएफआई की संलिप्तता पाई गई।

जिसके बाद डीजीपी ओपी सिंह के पत्र पर देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि हिंसा में PFI की भूमिका आगे आ रही है, गृह मंत्रालय सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा। PFI पर स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से संबंध सहित कई आरोप हैं।

गौरतलब है कि नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ यूपी में हुई हिंसा में बीते दिनों पीएफआई से लिंक मिलने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि संगठन से जुड़े आरोपितों के यहाँ से आपत्तिजनक सामग्रियाँ, साहित्य, सीडी आदि मिले थे। जिसको आधार बनाकर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया नामक संगठन को बैन करने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार ने भेजा।

अब कहा जा रहा है कि प्रदर्शन के पीछे पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई के रोल पर जाँच का दायरा और ज्यादा बढ़ सकता है। क्योंकि पीएफआई 7 राज्यों में पिछले कई महीनों से सक्रिय है। इनमें दिल्ली, आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, केरल, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश शामिल हैं।

#RoadToEndia2020: भारत को बदनाम करने के लिए पाक कर रहा CAA दंगों की तस्वीरों-वीडियो का इस्तेमाल

नए साल के अवसर पर एक ओर जहाँ पूरा विश्व नई उम्मीदों और नई उमंगों के जश्न में डूबा हुआ था। वहीं, पाकिस्तान भारत के अंत की कामना करते हुए ट्विटर पर #roadtoendia (गौर देने वाली बात हैं INDIA की जगह यहाँ पाकिस्तान ‘END’ शब्द का प्रयोग किया) हैशटैग के साथ अनेकों फर्जी तस्वीरें और वीडियो ट्वीट कर रहा था।

पाकिस्तान कल पूरी रात, भारत में सीएए के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों के नाम पर फर्जी तस्वीरों को शेयर करके ऐसे दर्शाने की कोशिश कर रहा था कि भारत के दूसरे समुदाय वाले यहाँ केंद्र सरकार के कारण खौफ में हैं और उनके साथ यहाँ बर्बरता होती है।

हालाँकि, ये बात सब जानते हैं कि पाकिस्तान के पास भारत के कुछ ऐसे चुनिंदा लोगों की सूची है। जिनके बारे में वो जानता है कि अगर मोदी सरकार कोई फैसला लेगी, तो उसके विरोध में उन लोगों की राय पाकिस्तानियों की राय से मिलती-जुलती ही होगी। शायद इसलिए इस बार भी वो अपना प्रोपगेंडा साधने के लिए स्वरा भास्कर जैसे बॉलीवुड कलाकारों के बयान को शेयर करते पाए गए।

पाकिस्तानियों ने स्वरा भास्कर की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि भारत में अब कुछ हिंदू ऐसे हैं जो मजहब वाली अल्पसंख्यक आबादी का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि ‘हिटलर मोदी’ के चेहरे का सच उनके सामने आ चुका है।

इसके अलावा पाकिस्तानी लिखते हैं ,”पहले कश्मीर में और अब भारत के हर राज्य में मोदी मु##मों का दमन करके हिंदुत्व को बढ़ाना चाहता है। मोदी सिर्फ़ कश्मीर नहीं बर्बाद कर रहा, बल्कि पूरा भारत कर रहा है।”

इस हैशटैग पर पाकिस्तानियों ने कई ऐसी वीडियो और फर्जी तस्वीरों को भी शेयर करके ये साबित करने की कोशिश की है कि भारत में अल्पसंख्यकों के साथ मोदी सरकार में बर्बरता हो रही है, उन्हें मारा-पीटा जाता है, उनकी जान ली जा रही है आदि-आदि।

जानकर हैरानी होगी, लेकिन अपने मुल्क में हिंदुओं को प्रताड़ित कर देश छोड़ने पर मजबूर करने वाले पाकिस्तानी बर्बर तस्वीरों को शेयर करके मानवाधिकारों की भी दुहाई दे रहे हैं और चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र इस पर संज्ञान ले।

इसके अतिरिक्त भारत में शाहीन बाग में महिलाओं द्वारा किए जा रहे रहे प्रदर्शन की तस्वीर भी पाकिस्तानियों द्वारा शेयर की जा रही हैं। जिसकी हकीकत की पोल ऑपइंडिया पहले ही अपनी पड़ताल में खोल चुका है। जिसमें स्पष्ट पता चला था कि वहाँ संविधान को बचाने के नाम पर शाहीन बाग पर भीड़ इकट्ठा करने वाला कोई और नहीं, बल्कि शर्जील आलम नाम का जेएनयू छात्र हैं। जो अभी बीते दिनों अयोध्या फैसले पर संविधान को जलाने की बात कर रहा था।

उद्धव कैबिनेट में बेटा-बेटी और भतीजा ही नहीं, आतंकी याकूब मेमन के लिए ‘दया’ माँगने वाला असलम शेख भी

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के कैबिनेट विस्तार में सिर्फ बेटा-बेटी और भतीजों की ही लॉटरी नहीं लगी है। एक ऐसे कॉन्ग्रेसी विधायक को भी मंत्री बनाया गया है, जिन्होंने आतंकी याकूब मेमन के लिए दया मॉंगी थी। ये हैं असलम शेख। मुंबई की मलाड सीट से विधायक शेख को उद्धव ने कैबिनेट मंत्री बनाया है।

उन्होंने जुलाई 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखकर मेमन की फॉंसी को उम्रकैद में बदलने की अपील की थी। मेमन 1993 बम ब्लास्ट का दोषी था। इन धमाको में करीब 317 लोग मारे गए थे। मुखर्जी ने उसकी दया याचिका ठुकरा दी थी। दिलचस्प यह है कि उस वक्त जिनलोगों ने मेमन का समर्थन किया था उसे शिवसेना ने देशद्रोही बताया था। आप भी असलम शेख का लिखा वो पत्र यहॉं पढ़ सकते हैं;

उद्धव ठाकरे के कैबिनेट में 4 मुस्लिम नेता हैं। इनमें से एक असलम शेख को मंत्री बनाए जाने का कई तबकों में विरोध हो रहा है। अब असलम शेख कह रहे हैं कि भाजपा की मशीनरी ने उनका पत्र वायरल कर दिया है। हालाँकि, वो इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उन्होंने ही इस पत्र को लिखा था।

असलम शेख मुंबई की मलाड सीट से विधायक चुने गए हैं। जुलाई 2015 में शेख ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखकर मेमन के लिए दया का अनुरोध किया था। हालाँकि, मेमन की दया याचिका को खारिज कर दिया गया था और उसे 30 जुलाई 2015 को नागपुर की एक जेल में फाँसी दे दी गई थी। असलम शेख ने ताज़ा विवाद पर बयान देते हुए कहा:

“जिस दिन से भाजपा सत्ता से बाहर हुई है, तब से वह विभिन्न मुद्दों पर लोगों को गुमराह कर रही है। ये वही लोग हैं, जिन्होंने महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाया था। आज वही लोग मेरे ख़िलाफ़ आतंकवाद पर नरम रुख रखने का आरोप लगा रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या की। वे जो करने की कोशिश कर रहे हैं, वो ब्रिटिश तक नहीं कर सके।”

महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टी भाजपा ने न सिर्फ़ उद्धव ठाकरे पर निशाना साधा बल्कि असलम शेख को भी आड़े हाथों लिया। भाजपा ने कहा कि आदित्य के कैबिनेट में आने के बाद अब लग रहा है कि सबकुछ सिर्फ़ एक परिवार के ही इर्दगिर्द घूम रहा है।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को अपने मंत्रिमंडल में 36 नए मंत्रियों को शामिल किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री को मिला कर महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में कुल 43 सदस्य हो गए हैं। उद्धव के बेटे आदित्य, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और अमित देशमुख नए मंत्रियों में प्रमुख नाम हैं। अमित देशमुख दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे और सिने अभिनेता रितेश देशमुख के भाई हैं। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के भतीजे अजित पवार उप मुख्यमंत्री बनाए गए हैं।

33 कैबिनेट मंत्रियों में से 10 शिवसेना के हैं, 12 एनसीपी के और 10 कॉन्ग्रेस के हैं। एक मंत्री ‘क्रन्तिकारी शेतकरी पक्ष’ का है। 10 राज्यमंत्रियों में से 1 शिवसेना का, 5 एनसीपी के और 2 कॉन्ग्रेस के हैं। शिवसेना कोटे से एक निर्दलीय को राज्यमंत्री बनाया गया है। वहीं ‘प्रहार जनशक्ति पक्ष’ के विधायक को राज्यमंत्री का पद दिया गया है।

हालॉंकि कैबिनेट विस्तार के बाद सरकार में साझेदार तीन दलों शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी में मतभेद भी उभरकर सामने आ गए हैं। भाई सुनील को मंत्री नहीं बनाए जाने से शिवसेना सांसद संजय राउत नाराज बताए जा रहे हैं। एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंकी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने तो एक क़दम और आगे बढ़ कर पुणे में अपनी ही पार्टी के दफ्तर में तोड़फोड़ मचाई।

‘ऐसे राजनीतिक माहौल में मेरे जैसे MLA के लिए कोई जगह नहीं’ – कैबिनेट विस्तार के बाद ही ठाकरे-पवार को झटका

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के दफ़्तर में मचाई तोड़फोड़, उद्धव ठाकरे से नाराज़गी है वजह

AMU में दंगा करने वाले 12 की हुई पहचान: लगेगा गुंडा एक्ट, 6 महीने के लिए होंगे तड़ीपार

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में हिंसा भड़काने वाले 12 लोगों की पुलिस ने पहचान कर ली है। इन पर गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई होगी। प्रशासन इन्हें 6 महीने के लिए जिलाबदर करने की तैयारी में भी है। इनमें एएमयू छात्र संघ का अध्यक्ष सलमान इम्तियाज भी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इनमें पॉंच पूर्व छात्र हैं और इनका आपराधिक अतीत भी रहा है।

इन लोगों पर भीड़ को उकसाने और पुलिस पर हमला करने के लिए भड़काने का आरोप है। घटना 15 दिसंबर की है। सीसीटीवी फुटेज को खॅंगालने के बाद पुलिस ने इनकी पहचान की है। फुटेज एएमयू प्रशासन ने मुहैया कराए थे। पुलिस ने बताया कि इनमें से पॉंच पूर्व छात्र हैं। इन्हें जिले की शांति के लिए खतरा बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि इनका आपराधिक रिकॉर्ड है। अलीगढ़ के एसएसपी आकाश कुल्हाड़ी ने बताया, “मैंने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर इनके खिलाफ गुंडा एक्ट की तहत कार्रवाई करने की इजाजत मॉंगी है। इन्हें छह महीने के लिए जिलाबदर भी किया जा सकता है।”

आरोपितों में शामिल हुज़ैफ़ा आमिर एएमयू छात्र संघ का सचिव रहा है। हमजा सूफ़िया छात्र संघ का उपाध्यक्ष रहा है। नदीम अंसारी, आमिर, मिंटो और उस्मानी- इन पाँचों के अलावा एएमयू स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष सलमान इम्तियाज़ का नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया है। हमजा और हुज़ैफ़ा को एएमयू ने 5 सालों के लिए निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने वीसी ऑफिस में दंगा किया था। उन पर जुलाई 2019 में ही ये कार्रवाई की गई थी। दोनों ने यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों के साथ भी दुर्व्यवहार किया था।

ज्ञात हो कि 15 दिसंबर को रात आठ बजे एएमयू में अचानक छात्रों ने पथराव और फायरिंग शुरू कर दी थी। उपद्रवी छात्र जामिया में हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में उग्र हो गए थे। दंगाई छात्रों के उपद्रव के कारण डीआइजी समेत कई पुलिस अधिकारियों को चोट लगी थी। पुलिस को दंगाई छात्रों को रोकने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे और लाठीचार्ज करना पड़ा था। इस मामले में पुलिस ने 78 नामजद व 1300 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। अब पुलिस आगे की कार्रवाई में जुट गई है।

हिंसा वाले दिन प्रॉक्टर की टीम मान-मनव्वल करती रह गई थी लेकिन एएमयू के छात्र गेट तोड़ कर बाहर आ गए थे। उन्होंने पुलिस के साथ झड़प करने के लिए ऐसा किया था। पुलिस ने छात्रों को ग़ैर-क़ानूनी कार्य करने से रोकने के लिए मिन्नतें की लेकिन छात्र लगातार पत्थरबाजी करते रहे। उपद्रवी छात्रों ने पुलिस का बैरिकेड भी तोड़ डाला था।

AMU में छात्रों पर नहीं हुआ हथगोलों का इस्तेमाल: अफवाह फैलाने वालों का पुलिस ने किया पर्दाफाश

CAA पर बवाल में जख्मी तारिक AMU में पढ़ाएगा: जिस VC को छात्रों ने ‘निष्कासित’ किया था उसकी मुहर

‘जंग की मशाल उठाकर करो प्रदर्शन’ – AMU में भड़काऊ स्पीच देने पर डॉ कफील खान हिरासत में

2 बेगमों ने बाँट लिया शौहर: एक ही छत के नीचे अलग-अलग रहने को हुईं तैयार

उत्तर प्रदेश के मुरादनगर के मझौला क्षेत्र से एक बड़ा ही अजीब समझौते का मामला सामने आया। यहाँ पहले दो मुस्लिम सौतनों के बीच शौहर पर हक जताने को लेकर झगड़ा हुआ। फिर मामला पुलिस के पास पहुँचा। पुलिस ने जाँच के लिए पूरे केस को नारी उत्थान केंद्र को सौंपा। और अंत में फैसला हुआ कि अब दोनों महिलाएँ एक ही छत के नीचे लेकिन अलग-अलग अपने शौहर के साथ रहेंगी। दोनों के बीच झगड़ा न हो इसके लिए शौहर एक दिन एक बेगम के साथ रहेगा और दूसरे दिन दूसरी बेगम के साथ। इतना ही नहीं समझौते में ये भी तय हुआ कि शौहर दोनों बेगमों को अलग-अलग राशन भी लाकर देगा।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, मुस्लिम युवक की पहली बेगम ने कुछ समय पहले इलाके की महिला एसएसपी से शिकायत कर इस मामले में केस दर्ज करवाया था। उसने अपनी शिकायत में बताया था कि साल 2010 में उसका निकाह हुआ था। लेकिन निकाह के 7 साल बाद भी उसके कोई संतान नहीं हुई। संतान सुख पाने के लिए उसने अपने शौहर को दूसरा निकाह करने की सलाह दी।

बेगम की बात मानते हुए मुस्लिम युवक ने साल 2017 में दूसरा निकाह किया। लेकिन कुछ महीने बाद ही मुस्लिम शख्स की दूसरी पत्नी न केवल उसपर अपना अधिकार जताने लगी, बल्कि पहली पत्नी से मिलने पर पाबंदियाँ भी लगानी शुरू कर दी। जिसके चलते देखते-ही-देखते कुछ समय में दोनों के बीच मारपीट भी होने लगी और इसी कारण से पहली बीवी ने अपनी सौतन से जान का खतरा बताते हुए महिला एसएसपी से शिकायत की।

पूरे मामले की जाँच-पड़ताल करके पुलिस ने इस मामले की जाँच नारी उत्थान केंद्र स्थित परिवार परामर्श केंद्र में भेजा। जहाँ शिकायतकर्ता महिला, उसकी सौतन और शौहर को बुलाया गया और प्रभारी संध्या रावत ने इस मामले में उनकी काउंसलिंग की। काउंसलिंग के दौरान शौहर का दूसरी बीवी को ज्यादा समय देना विवाद की वजह सामने आया। दोनों बीवियाँ एक दूसरे से अलग मकान में रहना चाहती थीं। मगर, शौहर ने दोनों को अलग-अलग रखने में अपनी असमर्थता जताई। जिसे समझते हुए विवाद का निपटारा करने के लिए पुलिस ने उनको एक ही मकान में अलग-अलग रहने की सलाह दे दी। 

इसके बाद महिलाओं ने शर्त रखी कि पति एक दिन पहली बीवी के साथ रहेगा और दूसरे दिन दूसरी बीवी के साथ। दोनों का राशन भी अलग-अलग लाकर देगा। इस पर सहमति बन गई। 

गौरतलब है कि परिवार परामर्श केंद्र की काउंसलिंग के बाद ये पहला मामला नहीं है। जहाँ दो महिलाएँ एक शौहर को बाँटने के लिए तैयार हो गई हों। इससे पहले भी मुरादाबाद के सिविल लाइन से एक मामला सामने आया था। जहाँ काउंसलिंग के बाद तीन बीवियाँ आपसी विवाद भुलाकर अपने शौहर के साथ रहने को तैयार हो गईं थीं।

कोटा: 13 घंटे में मर गए 5 और बच्चे, राजस्थान के हेल्थ मिनिस्टर ने मौतों को CAA के विरोध से जोड़ा

25 दिसंबर को 1, 26 को 3, 27 को 2, 28 को 6, 29 को 1, 30 को 4 और 31 को 5। यानी 7 दिनों में 22 मौतें। यह आँकड़ा है राजस्थान के कोटा के जेके लोन अस्पताल में दम तोड़ने वाले मासूमों का। यहॉं दिसंबर महीने में कुल 99 बच्चों की मौत हुई। हालत इतनी बदतर है कि 28 दिसंबर की रात चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव की समीक्षा बैठक 5 घंटे चली और इस दौरान 4 बच्चे मर गए। 31 दिसंबर को ही 13 घंटे के भीतर 5 मौतें हुईं।

इन मौतों को लेकर राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार की असंवेदनशीलता एक बार फिर से उजागर हो गई है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने इन मौतों को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध से जोड़ दिया है। उनका कहना है कि पीएमओ के निर्देश पर भाजपा कोटा में हुई मौतों पर राजनीति कर रही है। इसकी आड़ में वह CAA विरोधी प्रदर्शनों को छिपाना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि 2015,2016 और 2017 में जब मौतें हुई तो भाजपा सत्ता में थी। हॉस्पिटल अथॉरिटी ने फंड की मॉंग की थी, लेकिन जारी नहीं किया गया।

इससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि राज्य के हर अस्पताल में रोजाना 3-4 मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। लगे हाथ उन्होंने यह भी दावा किया था कि इस साल केवल 900 मौतें हुई हैं जो बीते 6 साल में सबसे कम है। उन्होंने अपनी सरकार की नाकामी छिपाते हुए कहा था कि बीते सालों में 1500, 1300 मौतें भी हो चुकी हैं।

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में 1 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

कोटा के इस अस्पताल को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण (NCPCR) की एक रिपोर्ट भी सामने आई है। इसके मुताबिक अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही बच्चों की मौत का एक अहम कारण है। रिपोर्ट में NCPCR ने बताया है कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं, दरवाजे टूटे हुए हैं, जिस कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। इसके अलावा अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते रहते हैं।

गौरतलब है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला कोटा से ही सांसद हैं। मौतों का सिलसिला शुरू होने के बाद पहले उन्होंने इस ओर राज्य सरकार का ध्यान दिलाया। हालात नहीं सुधरने पर उन्होंने मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन व विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्य सरकार को संवेदनशील होकर कार्य करने की नसीहत दी थी। साथ ही कहा था कि उनका मंत्रालय लगातार निगरानी कर रहा है।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार अस्पताल का रिकॉर्ड बताता है कि इस साल 962 बच्चों की मौत हुई है। इनमें से 101 बच्चों की मौत नवंबर और 99 की दिसंबर में हुई। बीते साल 1,005 और और 2014 में 1,198 बच्चों की मौत हुई थी।

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‘अगस्त में बच्चे मरते ही हैं’ और ‘बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं’ के बीच मीडिया की नंगी सच्चाई

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महिला ने छुआ हाथ तो पोप फ्रांसिस गुस्से से हुए लाल, बच्चों के सामने ही कर दिया… देखें video

पोप फ्रांसिस मंगलवार को उस वक्त बेहद नाराज हो गए जब एक महिला ने उनका हाथ पकड़ लिया। इससे पोप इतने नाराज हुए कि न केवल महिला का हाथ झटक दिया, बल्कि हाथ पर थप्पड़ भी जड़ दिए। सोशल मीडिया में इस घटना को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई है। कुछ लोगों का कहना है कि पोप इस घटना से ज्यादा बेहतर तरीके से निपट सकते थे। कुछ लोग महिला के साथ सहानुभूति जताते हुए उम्मीद कर रहे हैं कि इस घटना से उसकी आस्था नहीं डिगेगी।

यह घटना मंगलवार (दिसंबर 31, 2019) की शाम उस वक्त हुई जब नए साल की पूर्व संध्या पर श्रद्धालु पोप का अभिवादन करने और ब्लेसिंग्स लेने के लिए सेंट पीटर स्क्वॉयर में जुटे थे। इनमें छोटे-छोटे बच्चों की तादाद भी काफी थी। इस समय का एक वीडियो सामने आया है जिसमें बच्चे और अन्य लोग पोप फ्रांसिस का अभिवादन करते दिखाई पद रहे हैं।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि पोप लोगों की तरफ हाथ बढ़ाते हैं और उसे छू कर वहाँ मौजूद लोगों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। इसी दौरान एक महिला पोप का हाथ पकड़ लेती है। पोप न केवल झटके से अपना हाथ छुड़ाते हैं, बल्कि महिला के हाथ पर थप्पड़ भी जड़ देते हैं। इसे देख वहाँ मौजूद सभी लोग हक्का-बक्का रह जाते हैं।

महिला की इस हरकत से पोप काफी नाराज दिखते हैं। गुस्से में फौरन महिला का हाथ झटक देते हैं। उसके हाथ पर जोर से थप्पड़ मारते हैं और उसे डाँटकर वहाँ से आगे चले जाते हैं।

हालाँकि, 30 सेकेंड के इस वीडियो को देखने पर पहली नजर में महिला की गलती नजर आती है। लेकिन, लोगों की प्रतिक्रिया बताती है कि पोप का व्यवहार वांछित नहीं था। असल में ऐसे मौकों पर पोप का हाथ छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा रही है।

सोशल मीडिया पर भी लोगों ने पोप की काफी आलोचना की। लोगों ने कहा कि ये कोई अच्छा बर्ताव नहीं है। पोप चाहते तो उसे समझा सकते थे और मामले को हल्के में ले सकते थे। वहीं कुछ लोगों ने कहा कि वे प्रार्थना करते हैं कि इस घटना के बाद महिला का विश्वास को ठेस न पहुँचे।

गौरतलब है कि नए साल की शाम से पहले क्रिसमस के अवसर पर पोप फ्रांसिस ने दुनिया के कई कई अशांत क्षेत्रों से शांति की अपील की थी। उन्होंने पश्चिम एशिया वेनेजुएला और लेबनान सहित कई अफ्रीकी देशों में चल रहे सशस्त्र संघर्ष को समाप्त करने की अपील की थी।

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ISRO 2020: चंद्रयान-3 को ग्रीन सिग्नल, आपके मोबाइल में जल्द होगा स्वदेशी ‘GPS’

नए साल 2020 के शुरू होने पर पर इसरो प्रमुख के. सिवन ने पिछले वर्ष 2019 की उपलब्धियों को गिनाया। साथ ही उन्होंने इसरो के 2020 के लक्ष्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि तमिलनाडु के थुथुकुडी में नया स्पेस पोर्ट बनेगा। इसरो चीफ ने जानकारी दी कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर बहुत अच्छा काम कर रहा है। सबसे बड़ी बात तो ये कि यह अभी अगले 7 वर्षों तक काम करता रहेगा। दुनिया में जीपीएस सिस्टम को मान्यता देने वाली संस्था 3-जीपीपीपी ने भारत के नाविक पोजिशनिंग सिस्टम को मान्यता दे दी है।

इसरो प्रमुख ने बताया कि वो दिन दूर नहीं जब देश के सभी मोबाइल फोन में हमारा अपना स्वदेशी पोजिशनिंग सिस्टम होगा। इसरो चीफ के. सिवन ने देश को बड़ी सूचना देते हुए कहा कि चंद्रयान-3 को सरकार ने मंजूरी दे दी है। उन्होने बताया कि चंद्रयान-3 भी चंद्रयान-2 के जैसा ही होगा। इस बार इसमें सिर्फ लैंडर-रोवर और प्रोपल्शन मॉडल होगा। ऑर्बिटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से इसमें मदद ली जाएगी।

इसरो चीफ ने जानकारी दी कि 2019 में गगनयान प्रोजेक्ट पर काफी काम हुआ है। गगनयान के लिए चुने गए चार एस्ट्रोनॉट्स की ट्रेनिंग में पूरे 1 साल लग सकते हैं, जिसे 2020 में पूरा कर लिए जाने की उम्मीद है। चुने गए एस्ट्रोनॉट्स की ट्रेनिंग रूस में होगी। इसरो प्रमुख ने आगे बताया:

“चंद्रयान-2 का लैंडर बहुत तेज गति होने की वजह से सही तरीके से नेवीगेट (दिशा और रास्ता) करने में अक्षम रहा और इसी कारण उसकी हार्ड लैंडिंग हुई। ये ग़लत अफवाह फैलाई जा रही है कि चंद्रयान-2 की असफलता की वजह से अन्य सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग में देरी हुई है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सैटेलाइट्स लॉन्च करने के लिए रॉकेट्स बनाने होते हैं। जैसे ही हमारे पास रॉकेट बनाने का काम पूरा होता है, हम लॉन्चिंग में जुट जाते हैं। इस वर्ष मार्च तक हम वो सारे सैटेलाइट्स लॉन्च कर देंगे जो 2019 के अंत तक तय किए गए थे।”

इसरो प्रमुख ने महत्वाकांक्षी गगनयान प्रोजेक्ट के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शुरुआती पड़ाव के तहत अनमैन्ड (मानवरहित) मिशन इस साल करने की योजना बनाई गई है। अगर काम पूरा होगा तो इसे लॉन्च किया जाएगा, नहीं तो इसे अगले साल के लिए टाला जा सकता है। सिवन ने बताया कि ऐसे मिशन काफ़ी मुश्किल होते हैं और इसके लिए बड़े स्तर पर तैयारियाँ करनी होती हैं। उन्होने बताया कि इसमें जरा सी भी चूक की गुंजाइश नहीं है। इसलिए, इसरो इस दिशा में फूँक-फूँक कर क़दम रख रहा है।

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