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31 जनवरी तक धारा 144, लखनऊ समेत 42 जिलों में इंटरनेट बंद: योगी सरकार ने उठाया सख्त कदम

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर सड़कों पर उतरी भीड़ अब दंगाईयों का रूप ले चुकी है। उत्तर प्रदेश के तो हर जिले से खबरें आ रही हैं कि प्रदर्शन के नाम पर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जा रहा है और पुलिस पर भी हमला लगातार हो रहा है। ऐसी स्थिति में यूपी में अब अधिक सतर्कता बरती जा रही है। जिसके चलते 42 जिलों में सुरक्षा लिहाज से इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गईं हैं और पूरे प्रदेश में 31 जनवरी तक धारा 144 लागू हो चुकी है। इसके अलावा प्रदेश में स्कूल-कॉलेजों को भी आज बंद किया गया है। अब की आगे की स्थिति देखते हुए कल बाकी के फैसले लिए जाने की संभावना है।

गौरतलब है कि प्रदेश में गुरुवार को भीड़ के हिंसक हो जाने से देर रात एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। जबकि एडीजी जोन, आइजी रेंज, समेत 70 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। इसके साथ ही लखनऊ व सम्भल में रोडवेज की 4 बस, करीब 1 दर्जन कार तथा 5 दर्जन दो पहिया वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था।

इसके बाद कानपुर, फिरोजाबाद, मेरठ, बुलंदशहर, गोरखपुर, बिजनौर, हापुड़, सहारनपुर, अमरोहा, बहराइच, बरेली, संभल मुजफ्फरनगर में भी काफी हिंसक प्रदर्शन देखने को मिले थे। जिस कारण शहरों में मृतकों का आँकड़ा 6 से बढ़कर 13 हो गया। अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार मेरठ में 4, कानपुर, फिरोजाबाद और बिजनौर में 2-2, वाराणसी, संभल और मुजफ्फरनगर में 1-1 की मौत हुई है। वहीं, बताया जा रहा है कि सीतापुर, हरदोई, लखीमपुर, सुल्तानपुर, गोंडा और बलरामपुर में भी दंगाईयों ने उपद्रव की कोशिश की थी, लेकिन पुलिस की सतर्कता के कारण माहौल संभला रहा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को हुई हिंसा पर यूपी के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने बताया कि शुक्रवार को नमाज के बाद सुनियोजित ढंग से प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरे और पुलिस पर हमला बोला। उपद्रवियों ने कम उम्र के बच्चों को आगे किया, जिनकी सुरक्षा के दृष्टि से पुलिस ने संयम बरतते हुए त्वरित कार्रवाई की।

बता दें कि राज्य में भड़की हिंसा पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ काफी नाराज हैं। उन्होंने देर रात वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अधिकारियों से बात की और प्रदेश के हालातों पर अपनी नाराजगी जाहिर की। इससे पहले इस मामले पर सख्ती दिखाते हुए वे पुलिस को उपद्रवियों के ख़िलाफ़ एक्शन लेने के लिए आदेश दे चुके हैं और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में भी कहा है कि वे उपद्रवी दोषियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई करेंगे। जो भी हिंसा का दोषी होगा उसकी संपत्तियाँ सीज की जाएँगी और उसी से हिंसा में हुई क्षति की भरपाई होगी।

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‘यह टाइम दस्तावेज़ जुटाने का नहीं, सड़कों पर उतरने का है’- मालेगाँव के मौलाना का दंगाई फरमान

महाराष्ट्र के मालेगाँव में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव और दस्तूर बचाओ समिति के संस्थापक मौलाना उमरैन महफ़ूज़ रहमानी ने मजहब विशेष से नागरिकता क़ानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में सड़कों पर उतरने का फरमान जारी किया है।

मुस्लिमोंं से अपील करते हुए मौलाना ने कहा, “पिछले एक महीने से, हमने निवासियों को अपने दस्तावेज़ोंं पर ध्यान केंद्रित करने से रोक दिया है। नागरिकता विधेयक के क़ानून बनने के बाद, हम लोगों से सड़कों पर आने के लिए अपील कर रहे हैं।”

ख़बर के अनुसार, मौलाना रहमानी गुरुवार (19 दिसंबर) को हुए हिंसक विरोध के आयोजक थे। मौलाना रहमान का कहना है:

“जब असम में NRC की जा रही थी, तो हमने मुस्लिमों से कहा था कि वो अपने पास 23 आवश्यक दस्तावेज़ों की लिस्ट रख लें और उसे ध्यान से देखें कि उसमें कोई स्पेलिंग मिस्टेक तो नहीं है। यह बड़ी अजीब बात है कि केंद्र सरकार अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हुए अल्पसंख्यकों से पहचान-पत्र माँग रही है, लेकिन अगर उनके दस्तावेज़ों में किसी तरह की कोई स्पेलिंग मिस्टेक होगी तो स्थानीय निवासियों को नागरिकता नहीं दी जाएगी।”

उन्होंने कहा असम में NRC के दौरान मालेगांव नगर निगम के बाहर के बाहर कई चिंतित मुस्लिमों की लंबी कतारें लग गईं।

वहीं, इस मुद्दे पर मालेगाँव सेंट्रल के विधायक मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल ने कहा, “मालेगाँव की आबादी का बड़ा हिस्सा पिछले 2 दशकों में उत्तर प्रदेश से पलायन कर यहाँ आया है। तीन पीढ़ियों से जो लोग मालेगाँव में रह गए वो अब यूपी जा रहे हैं और अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज़ तलाश रहे हैं… लोग सचमुच में काफी डरे हुए हैं।” इसके आगे विधायक मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल ने कहा:

“अगर उनके आधार कार्ड में हुई स्पेलिंग की ग़लती को उन्हें सुधरवाना है तो स्थानीय विधायक से लेटर लेना पड़ता है। मेरे विधायक चुने जाने के बाद पहले कुछ हफ्तों में, हर दिन कम से कम एक हज़ार लोग इस तरह के पत्र को हासिल करने के लिए मेरे कार्यालय पहुँचे थे।”

हालाँकि, बीजेपी के मालेगाँव इकाई के अध्यक्ष किशोर गायकवाड़ ने अल्पसंख्यकों में डर व्याप्त होने की बात से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि मौलवी, मुस्लिमों के बीच प्रोपगैंडा फैला रहे हैं।

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हमने पढ़ा नहीं लेकिन हमें पता है… हिंदू-मुस्लिम सबको साबित करनी होगी अपनी नागरिकता: शिवसेना नेता

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी दल इस कानून का विरोध कर रहे हैं। दरअसल इस नए कानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन बेबुनियाद और निराधार है, क्योंकि जो लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर को इस कानून के बारे में जानकारी ही नहीं है, वो बस सुनी-सुनाई बात पर विरोध कर रहे हैं।

इस बीच एक वीडियो सामने आया है, जिसमें शिवसेना के एक नेता ने माना है कि उन्हें नागरिकता संशोधन कानून के बार में नहीं पता है। उन्होंने इसके बारे में अभी तक नहीं पढ़ा है। वीडियो में एक मीडियाकर्मी से बात करते हुए शिवसेना नेता कहते हैं, “CAA के बारे में हमें भी नहीं बताया जा रहा है कि इसके अंदर किसको नुकसान है और किसको फायदा है। हमें तो अभी तक ये भी बताया जा रहा है कि हिंदुओं को भी अपना प्रमाण पत्र साबित करना होगा, मुस्लिमों को भी अपना नागरिकता प्रमाण पत्र देना होगा। तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उद्धव ठाकरे का भी यही मानना है कि जो गरीब और आम जनता हैं, उनके पास कुछ डॉक्यूमेंट्स नहीं होते हैं।”

इस दौरान जब रिपोर्टर उनसे पूछता है कि क्या उन्हें भी इस कानून के बारे में नहीं पता है, तो वो कहते हैं कि उन्हें तो इस बारे में काफी अधिक जानकारी है, लेकिन सरकार ने उन्हें अभी तक नहीं बताया है। इस पर जब रिपोर्टर उनसे पूछता है कि क्या कहता है ये कानून तो वो कहते हैं, “मीडिया से हमें पता चला है कि इस कानून के अंतर्गत जितने भी हमारे देश की जनता है, उनकी जनगणना की जाएगी, उनको यहाँ पर नागरिक रखा जाएगा…” 

शिवसेना नेता की बात को बीच में ही काटते हुए रिपोर्टर कहता है कि वो NRC नहीं, बल्कि CAA के बारे में उनसे पूछ रहे हैं। तो फिर वो कहते हैं, “इस एक्ट के अंदर हमें यही बताया गया है कि हमारे जो मुस्लिम भाई हैं, उनको अपनी नागरिकता साबित करनी होगी।” रिपोर्टर ने जब पूछा कि क्या एक्ट में यही लिखा है, तो वो कहते हैं कि मीडिया के द्वारा उन्हें यही पता चला है। हालाँकि उन्होंने अभी तक इस एक्ट पढ़ा नहीं है और अंतत: वो मान लेते हैं कि उन्हें इस एक्ट के बारे में नहीं पता है।

दरअसल CAA, नागरिकता लेने की नहीं बल्कि देने का कानून है। इस कानून के अंतर्गत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुए वहाँ के अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जाएगी और इसका सिलसिला भी शुरू हो गया है। भारत सरकार ने शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को गुजरात में पाकिस्तान से आए 7 शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी है। इससे पहले एक मुस्लिम महिला हसीना बेन को भारत की नागरिकता दी गई थी।

पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का नहीं? शशि थरूर ने भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट कर तो यही संदेश दिया!

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पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का नहीं? शशि थरूर ने भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट कर तो यही संदेश दिया!

हमेशा विवादों से घिरे रहने वाले कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर एक बार फिर सुर्ख़ियों में छाए हुए हैं। दरअसल, उन्होंने ‘भारत बचाओ रैली’ की एक तस्वीर अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर की, जिसमें भारत का ग़लत नक़्शा दिख रहा था। थरूर का यह पोस्ट सात घंटे तक रहा, लेकिन उसके बाद उन्होंने अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया, लेकिन आज के सोशल मीडिया युग में यूज़र्स की पैनी नज़र से कहाँ कुछ बच ही पाता है, बस उन्हें घेर लिया गया।

शशि थरूर के इस पोस्ट के सोशल मीडिया पर जाते ही यूज़र्स ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। एक ट्विटर यूज़र ने कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए लिखा कि कॉन्ग्रेस पीओके को कभी भारत का हिस्सा मानती ही नहीं है और ये बात आज एक बार फिर साबित हो गई है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नवंबर में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भारत का नया नक़्शा ट्वीट किया था, जिसमें भारत की सीमाओं की सही जानकारी दी गई थी।

इससे पहले, शशि थरूर ने शुक्रवार (20 दिसंबर) को कर्नाटक के इतिहासकार रामचंद्र गुहा को हिरासत में लिए जाने की घटना पर भी भ्रामकता फैलाने की कोशिश की थी। अपने एक ट्वीट में उन्होंने लिखा था, “क्या यह पुलिसवाला अपने मुक्के से रामचंद्र गुहा को मारने की धमकी दे रहा है?” लेकिन, उन्होंने इस वीडियो को शेयर करने से पहले यह जानने की कोशिश नहीं की कि क्या रामचंद्र गुहा को सच में किसी पुलिसकर्मी ने मुक्का दिखाया था! इससे उनकी यह मंशा साफ़ दिखती है कि वो फर्ज़ी ख़बर के प्रचार-प्रसार का काम कितनी मुस्तैदी के साथ करते हैं, फिर भले ही सच्चाई से उसका कोई लेना-देना न हो।

बता दें कि भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट करने वाले शशि थरूर पहले शख़्स नहीं हैं, इससे पहले बॉलीवुड अभिनेता फ़रहान अख़्तर ने भी भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट किया था। ऐसा उन्होंने नागरिकता क़ानून का विरोध करते समय कुछ ग्राफ़िक्स का इस्तेमाल करते हुए किया था। लेकिन, जब उन्हें सही जानकारी प्राप्त हुई तो उन्होंने अपनी ग़लती के लिए माफ़ी माँग ली थी।

अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा था, “यहाँ आपको जानने की ज़रूरत है कि ये प्रदर्शन क्यों ज़रूरी हैं। आप सभी से 19 तारीख को क्रांति मैदान, मुंबई में मिलते हैं। सिर्फ़ सोशल मीडिया पर विरोध करने का समय अब ख़त्म हो चुका है।” अपनी इसी पोस्ट के साथ उन्होंने एक नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण की व्याख्या करने वाली इमेज शेयर की थी, जो कि ग़लत थी।

नागरिकता क़ानून को लेकर किए गए फ़रहान के ट्वीट की वजह से हिन्दू संगठन ने उनके ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज कराई थी। इस शिक़ायत में कहा गया था, “बॉलिवुड ऐक्टर फ़रहान अख़्तर ने अपने ऑफिशल ट्विटर हैंडल से देशद्रोही ट्वीट किया, जिससे डर और अराजकता फैल गई।”

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CAA पर बवाल के बीच… Pak से प्रताड़ना का शिकार होकर भागे 7 शरणार्थियों को मिली नागरिकता

देश भर में नागरिकता संशोधन कानून पर मचे बवाल के बीच पाकिस्तानी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है। शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को गुजरात में 7 पाकिस्तानी शरणार्थियों को नागरिकता दी गई। केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया ने कच्छ में इन्हें नागरिकता का प्रमाणपत्र दिया। ये लोग पाकिस्तान से प्रताड़ना का शिकार होकर गुजरात आए हैं। इस तरह से शरणार्थियों को नागरिकता देने के मामले में गुजरात पहले नंबर पर आ गया है। 

मनसुख मांडविया ने इस बारे में ट्वीट करते हुए लिखा, “आज (दिसंबर 20, 2019) कच्छ, गुजरात में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों से मुलाकात की और 7 शरणार्थियों को नागरिकता प्रमाणपत्र दिया। CAA को लेकर सभी में उत्साह और जश्न का माहौल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा लिया गया ये ऐतिहासिक फैसला इन लोगों के जीवन मे नया सवेरा लेकर आया है।”

2007 में पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आए मेहताब सिंह ने कहा, “मैंने 2007 में पाकिस्तान छोड़ दिया था। यह एक इस्लामिक गणराज्य है। वहाँ मंदिरों को तोड़ दिया जाता है। हिंदू लड़कियों और महिलाओं को अगवा किया जाता है और उन पर अत्याचार किया जाता है। यहाँ तक कि वहाँ की पढ़ाई भी इस्लामिक है।”

उन्होंने आगे कहा, “2014 तक हमारे पास आधार कार्ड और बैंक खाते नहीं थे। भाजपा के सत्ता में आने के बाद ही हमें आधार कार्ड मिला और बैंक खाते खोले गए। मैं बहुत खुश हूँ कि अब मैं एक भारतीय नागरिक हूँ। यह हमारे लिए दिवाली की तरह है।”

इससे पहले पाकिस्तान से आई एक महिला हसीना बेन को बिना किसी तामझाम के केवल मेरिट और मानवता के आधार पर गुजरात में भारत की नागरिकता प्रदान की गई थी। बता दें कि हसीना बेन मूलरूप से भारत की ही रहने वाली थीं, लेकिन 1999 में निक़ाह हो जाने के बाद वो पाकिस्तान चली गईं थी। पाकिस्तान में उनके शौहर की मृत्यु हो जाने पर उन्होंने भारत वापस आने का फ़ैसला किया। दो साल पहले ही उन्होंने भारत की नागरिकता के लिए आवेदन किया था। उन्हें 18 दिसंबर 2019 को भारत सरकार की तरफ़ से भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र प्रदान किया गया।

केंद्रीय मंत्री मंडाविया ने कहा कि गुजरात में हजारों शरणार्थी हैं, जो कि पाकिस्तान में हुए धार्मिक उत्पीड़न के कारण भाग कर यहाँ आए हैं। नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 (CAA) आने के बाद उन्हें भारतीय नागरिकता मिल रही है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के शुक्रगुजार हैं। 

नागरिकता संशोधन कानून के अमल में आने के बाद गुजरात में बसे हजारों पाकिस्‍तानी शरणार्थियों के भारत का नागरिक बनने का मार्ग प्रशस्‍त हो गया है। वर्ष 1952 में पाकिस्‍तान के सिंध से आए सिंधी, लोहाणा, कोली, थरपाकर,बादिन थट्टा, महेश्‍वरी आदि समुदाय के हजारों लोग शरणार्थी के रूप में अहमदाबाद, गाँधीनगर, कच्‍छ, बनासकांठा, पाटण, मोरबी में आकर बस गए थे। 

उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में 19 दिसंबर को गुजरात में भी हिंसक प्रदर्शन हुआ था। अहमदाबाद के शाह आलम में भीड़ ने पुलिस पर भारी पथराव किया था। इसमें 19 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। पुलिस ने कई उपद्रवियों को गिरफ्तार भी किया था।

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उत्तरप्रदेश के कानपुर, फिरोजाबाद, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा समेत अन्य जिलों में आज नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के नाम पर दंगे हुए। अधिकांश जगहों पर दंगाई भीड़ ने पुलिस अधिकारियों को इस बीच अपना निशाना बनाया। जिसके चलते पुलिस पोस्ट और गाड़ियों को भी नुकसान पहुँचाया गया। इस बीच कई तरह की वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आईं। जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव दिखाया गया। लेकिन इसी बीच कुछ जिलों से अलग-अलग घटनाओं पर वीडियो भी आईं। जिनसे स्पष्ट हो गया कि उत्तर प्रदेश में हो रहे विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य अब नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन नहीं है बल्कि पुलिस पर हमला और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाना हैं।

उत्तरप्रदेश के हमीर पुर में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। वहीं फिरोजाबाद में 12 पुलिस वाहनों को आग लगा दी गई।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरप्रदेश के हापुड में हिंसक भीड़ ने पुलिस पर हमला किया।

एएनआई के अनुसार, दंगाई ने नए कानून के ख़िलाफ चल रहे प्रदर्शन में गोरखपुर में भी पुलिसबलों पर पत्थर फेंके।

इसी तरह उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में भी पत्थरबाजी के कारण कई पुलिसवालों और प्रदर्शनकारियों को चोटें आईं। और पुलिस को हिंसा रोकने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा।

फिर, अमरोहा और बहराईच में भी सुरक्षाबल को दंगाईयों को रोकने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा।

इधर, कानपुर में भी अनियंत्रित मुस्लिमों की भीड़ द्वारा पुलिस जीप और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया। उधर, मुजफ्फनजर में भी विरोध उस समय हिंसा में बदल गया जब प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों में आग लगा दी।

गौरतलब है कि ये केवल चंद वीडियो हैं। इनके अलावा सोशल मीडिया पर बहुत से प्रमाण हैं। जो इस कानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध पर सवालिया निशान लगाते हैं। अब तक जानकारी के अनुसार यूपी में 3000 से ज्यादा लोगों के नाम पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और कईयों के ख़िलाफ़ आगे की कार्रवाई की जा रही है। इसके अलावा कई जिलों में इंटरनेट सेवा भी सुरक्षा कारणों से बंद कर दी गईं हैं।

पायल रोहतगी ने चिदंबरम को सुनाई खरी-खरी, कहा- मुझे भी पुलिस ने ही उठाया था, जब मैं अकेली थी

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू पर कथित तौर पर विवादस्पद टिप्पणी करने के कारण हाल ही में गिरफ्तार हुईं पायल रोहतगी कुछ दिन पहले बेल पर रिहा हो चुकी है। जेल से बाहर निकलते ही उन्होंने कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम को निशाने पर लिया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता द्वारा इतिहासकार गुहा की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थन में बोलने के लिए उन्हें घेरा है और कहा है कि कॉन्ग्रेस सिर्फ़ अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीट रही है।

दरअसल, नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने पहुँचे इतिहासकार रामचंद्र गुहा को कल गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद कॉन्ग्रेस दिग्गज नेता ने उनके समर्थन में लिखा, “रामचंद्र गुहा को जब गिरफ्तार किया गया, तब वह किसी प्रकार के कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे थे, वे अकेले थे और उन्होंने धारा 144 का भी उल्लंघन नहीं किया था। उनके इर्द-गिर्द 4 पुलिस वाले खड़े, जिसे दिखाकर उन्हें इस धारा के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया।”

अब इसी ट्वीट को आधार बनाकर पायल रोहतगी ने पूर्व वित्त मंत्री को घेरा और लिखा, “मुझे भी गिरफ्तार किया गया था सर और मैंने किसी भी नियम-कानून का उल्लंघन नहीं किया थाl कॉन्ग्रेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीट रही हैl उसने मुझे मेरे घर से उठा लियाl मैं भी घर पर अकेली थीl”

बता दें, पायल के इस ट्वीट के बाद कई लोग उनके समर्थन में आए और कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ़ कॉन्ग्रेसी लाल सलाम और टुकड़े-टुकड़े गैंग को ही है। वरना ये लोग तो प्रधानमंत्री को चोर बोल के सुप्रीम कोर्ट में माफी माँग लेते हैं।

गौरतलब है कि इसके बाद पायल रोहतगी के मंगेतर संग्राम सिंह ने बताया कि जो इंसान देश में तोड़फोड़ कर रहे हैं, सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुँचा रहे हैं वो कभी भी देश हित में हो नहीं सकते। कैब या कोई भी बिल हो वो सिर्फ़ देश की एकता व अखण्डता को तोड़ना चाहते हैं ऐसे देशद्रोहियों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए।

कॉन्ग्रेस पार्षद शहजाद खान ने पुलिस को मारने के लिए भीड़ को उकसाया, कहा- एक भी पुलिस वाले को मत छोड़ना

अहमदाबाद पुलिस ने गुरुवार (दिसंबर 12, 2019) को शाह-ए-आलम में भड़की हिंसा मामले में शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को कॉन्ग्रेस पार्षद समेत 48 लोगों को गिरफ्तार किया। कॉन्ग्रेस पार्षद शहजाद खान पठान पर आरोप लगा कि उन्होंने सीएए के विरोध प्रदर्शन में उमड़ी भीड़ को उकसाया और अति संवेदनशील माहौल में पुलिस वालों से बदला लेने की बात की। बता दें, प्रदर्शनकारियों से दंगाईयों में तब्दील हुई इस भीड़ ने इस दौरान पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की। जिसमें करीब 26 पुलिस वाले घायल हो गए। इसके अलावा पुलिस जीप को भी निशाना बनाया गया।

जानकारी के अनुसार इस पूरे मामले में पुलिस ने 5000 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली है। जिसमें से कुछ लोगों की पहचान होने का भी दावा किया जा रहा है। बताया जा रहा है दंगाईयों की इस भीड़ द्वारा 26 पुलिस वाले घायल किए गए हैं। जिसमें डीसीपी बिपिन अहिर, एसीपी आरबी राणा और जेएम सोलंकी के नाम भी शामिल हैं।

टाइम्स नॉऊ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने खुद इस बारे में जानकारी दी है कि उन्होंने इस मामले में 5000 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली है। जबकि कॉन्ग्रेस पार्षद समेत 50 लोग नामजद हैं। इनमें से पुलिस ने 48 लोगों को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया है। जिनपर हत्या की कोशिश, दंगा भड़काने और पुलिस को प्रताड़ित करने के इल्जाम हैं।

इसके अलावा पुलिस ने इस बारे में भी बताया कि उन्होंने शहजाद पठान को गुरुवार को ही हिरासत में ले लिया था, लेकिन गिरफ्तारी शुक्रवार को हुई। पुलिस अधिकारी जेएम सोलंकी के मुताबिक पुलिस पठान को ले जा रही थी, तो उसने वहाँ मौजूद स्थानीय लोगों को पुलिस से बदला लेने की बात की और एक भी पुलिस वाले को न छोड़ने के लिए कहा। जिसके कारण पुलिस का मानना है कि इसी उकसाने की वजह से पुलिस पर हमला हुआ।

गौरतलब है कि इस हमले की वीडियो सोशल मी़डिया पर वायरल होने के बाद क्रिकेटर से राजनेता बने गौतम गंभीर ने भी इसपर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मुझे लगता है कि मानवाधिकार के सभी लड़ाके, बॉलीवुड के लोग और फर्जी वामपंथी पत्रकार संयुक्त राष्ट्र गए हैं कि पुलिस वालों के मानवाधिकार होते हैं या नहीं।”

CAA विरोध के नाम पर देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने पर सितारे चुप, कंगना ने कहा- कायर हैं सब

नागरिकता संशोधन कानून पर देश के कोने-कोने में विरोध की आवाजें उठती नजर आ रही हैं। दंगाई हर जगह प्रदर्शन के नाम पर सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग नए कानून के समर्थन में तो कई इसके विपरीत अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लेकिन, इसी बीच बॉलीवुड के कई कलाकार ऐसे नोटिस किए गए हैं, जो इस पूरे विषय पर अपनी चुप्पी बनाए हुए है। जिसके कारण ट्विटर पर एक ट्रेंड भी चला #Shameonbollywood. हालाँकि इस ट्रेंड के बाद भी कलाकारों की प्रतिक्रिया मौन रही। लेकिन कंगना रनौत भड़क उठीं।

बीतें दिनों जयललिता फिल्म की शूटिंग में व्यस्त कंगना रनौत से जब ट्विटर पर चले इस ट्रेंड पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने सवाल किया, तो उन्होंने कलाकारों को लताड़ते हुए कहा कि मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि बॉलीवुड डरपोकों और कायरों से भरा हुआ है।

कंगना बॉलीवुड कलाकारों को निशाना बनाते हुए कहती हैं कि जो खुद में ही खोए हुए हैं और दिन में 20 बार आईना देखते हैं। जब उनसे कुछ पूछो तो कहते हैं कि हमारे पास इलेक्ट्रसिटी और जरूरत की हर चीज मौजूद है। हमें विशेषाधिकार प्राप्त है हम देश की चिंता क्यों करें।

बॉलीवुड कलाकारों के ख़िलाफ़ चले ट्रेंड को बिलकुल सही बताते हुए कंगना कहती हैं कि उनकी नजर में सभी सेलेब्रिटीज डरे हुए इंसान हैं, वे हर चीज से डरते हैं, वे डरपोक हैं, कायर हैं और बिना रीढ़ के लोग हैं। जो बाहरी लोगों का मजाक उड़ाते हैं, लड़कियों का मजाक उड़ाते हैं।

ताना कसते हुए कंगना रनौत कहती हैं कि ऐसे कलाकार सिर्फ़ सोशल मीडिया पर मेकअप, कपड़ों, जिम की फोटो शेयर करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके मुताबिक, “सोशल मीडिया का मंच उन्हें अपने विचार व्यक्त करने के लिए ही दिया गया है, ताकि वो लोगों के बारे में सोचें और उन्हें दिशा दिखाएं, ना कि सिर्फ इंस्टाग्राम पर पोस्ट लिखें। वे कायर लोग हैं, जो लोगों के बारे में बोलने से कतराते हैं। एक्टर्स को अपनी पोजीशन का जवाबदेह होना चाहिए। ये लोग फालतू फिल्में बनाकर असली सिनेमा को खत्म कर रहे हैं।”

कंगना कहती है कि बॉलीवुड के स्टार्स पर भरोसा कर उन्हें अपना आदर्श नहीं मानना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि वो असल में क्या हैं। मैंने बॉलीवुड के लोगों से ज्यादा डरपोक लोग नहीं देखे हैं।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ सीएए पर चुप्पी साधकर अपना स्टैंड स्पष्ट न करने पर बॉलीवुड कलाकारों को कंगना ने बुरी तरह लताड़ा है, तो वहीं उनकी बहन रंगोली चंदेल लगातार इसके समर्थन में है और दंगाईयों की वीडियो शेयर करके बोल रही है कि ऐसे ही बदमाशों से देश को मुक्ति दिलानी है।

यूनिवर्सिटी दंगों के 6000 लोगों को रोकने के लिए जब कैनेडी ने 30,000 जवान उतार दिए थे

सितंबर 1962 की बात है। शहर था ऑक्सफोर्ड, जहाँ मिसिसिपी विश्वविद्यालय में एक अश्वेत युवक, जेम्स मेरेडिथ, को प्रवेश देने पर श्वेत अमरीकियों ने दंगा शुरु कर दिया। तीन कारें जला दीं, पुलिस के जवानों पर हमला किया, एक फ्रांसीसी पत्रकार और एक अन्य शहरी इस हिंसा में मारे भी गए। मेरेडिथ जब अपने हॉस्टल में पहुँचा तो यूनिवर्सिटी के 2500 विद्यार्थियों और स्थानीय लोगों ने कैम्पस की मुख्य बिल्डिंग लिसियम को घेर लिया।

इस हिंसा को गवर्नर रॉस बर्नेट रोक नहीं पाए तो राष्ट्रपति जेएफ कैनेडी ने उनसे बात की और कहा कि हिंसा पर काबू करने के लिए उन्हें जो करना होगा, वो करेंगे। गवर्नर ने कहा कि मेरेडिथ को बाहर कर दिया जाए, तो हिंसा रुक जाएगी। राष्ट्रपति ने कहा कि जब तक हिंसा खत्म नहीं होगी बातचीत का सवाल ही नहीं उठता। गवर्नर नहीं चाहते थे कि फेडरल पुलिस उनके अधिकार क्षेत्र में आए, इनसे उनकी भद्द पिट जाती।

लेकिन राष्ट्रपति कैनेडी के लिए उस दंगे को रोकना जरूरी था जिसे ‘ओले मिस रायट्स’ के नाम से जाना जाता है। शहर की जनसंख्या लगभग 6000 थी, और दंगाई शहर जो नस्लभेदी रूप में सड़कों पर था, उसे रोकने के लिए राष्ट्रपति ने 30000 जवानों को भेज दिया। उसके बाद दंगा करने वाले लोगों को पकड़ा गया। दंगाई विद्यार्थी सर पर हाथ रख कर बाहर निकले, उन्हें अपराधियों की तरह ही देखा गया, वैसा ही व्यवहार किया गया।

रवीश कुमार ने कुछ दिन पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल के छात्रों द्वारा जामिया के दंगाई छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई के विरोध का जिक्र करते हुए, अमेरिका के 19 विश्वविद्यालयों के कुल 400 छात्रों के समर्थन का जिक्र किया था। उन्होंने सोचा कि अमेरिका का नाम लेने से इन दंगाइयों को लेजिटिमेसी यानी स्वीकार्यता मिल जाएगी कि देखो भइया, अंग्रेजी बोलने वाले भी इनके समर्थन में हैं।

उपरोक्त सारी तसवीरें Getty Images से ली गई हैं जो कि ओले मिस दंगों के बाद की हैं

जिस कैनेडी स्कूल की बात करते हुए रवीश ने लिखा था, “बंदूक के साये में जामिया मिल्लिया के छात्र अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए चले आ रहे हैं। जब भी यह दृश्य आँखों के सामने से फार्वर्ड होता था मेरे ज़हन में सारा इतिहास रिवाइंड होने लगता था। जब भी यह दृश्य धुंधला (ब्लर) होता था अतीत का इतिहास साफ (क्लीयर) हो जाता था। जब अतीत का इतिहास धुंधला होता था, सामने बन रहा इतिहास साफ दिखने लगता था। अगर आपने व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से इतिहास की पढ़ाई नहीं की है तो मेरी बात आसानी से समझ जाएँगे। उम्मीद है हाथ ऊपर कर लाए गए छात्र ख़ुद को अपमान के जाल में फँसने नहीं देंगे और समझ सकेंगे कि यह भारतीय स्टेट का नया चेहरा है। और उस चेहरे से नकाब हटना शुरू हुआ है।”

अब मैं अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी के शब्दों को इसी परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्र के नाम में दिए गए संबोधन में उन्होंने जो कहा था, वो रखना चाहूँगा, “अमेरिकी नागरिक यूँ तो कानून से असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, पर उसकी अवज्ञा के लिए नहीं।” सीधे शब्दों में कैनेडी ने वही बात कही, जो इसी सप्ताह मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने कहा था कि छात्र अगर हिंसा करते हैं तो पुलिस को अपना काम करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि छात्रों को दंगा करने का अधिकार नहीं है।

कुछ तस्वीरें रोमेंटिक लगती हैं, लेकिन होती नहीं

इसीलिए, संवेदनशील होने से पहले आपको यह देखना और समझना होगा कि जो आप देख रहे हैं, वो परिणाम है, या फिर शुरुआत। ‘हाथ उठा कर बाहर आते बच्चे’ इस प्रकरण की पहली तस्वीर नहीं है, वो इसकी आखिरी तस्वीर है। जंतर-मंतर पर शांति प्रदर्शन करने वाली भीड़ इस प्रकरण की पहली तस्वीर नहीं है, वो इस घटनाक्रम की अंतिम तस्वीर है।

इस पूरी घटना और दुर्घटना पर इमोशनल होने से पहले हमें इस पूरे तथाकथित विरोध प्रदर्शन की वो तस्वीरें भी देखनी पड़ेंगी जहाँ पुलिस आईसीयू में है, उनका सर फटा हुआ है, आँख कटी है, हाथ में कट्टे से चली गोली लगी है, पत्थरों का ढेर कहीं लगा हुआ है, जलती हुई बसें हैं, ‘हिन्दुओं से आजादी’ के नारे हैं, दीवारों पर इस्लामी शासन के ख़िलाफ़त की इबारत लिखी हुई है, और अपनी ही लाइब्रेरी को तोड़ते वो छात्र-छात्राएँ हैं जो पुलिस पर इस तोड़-फोड़ का जिम्मा डालना चाहते हैं।

इन तस्वीरों की पेशी किस अदालत में होगी? जब तुमने हिंसा कर ली, दुनिया के सामने नग्न हो गए, पीटे गए, भगाए गए, मजहबी उन्माद से सनी बातें पब्लिक में बाहर आ गईं, तब तुम ये बता रहे हो कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और संविधान का कौन सा आर्टिकल क्या कहता है? मैं ये कैसे मान लूँ कि आज जो तुम ‘हम तो छात्र हैं, हम तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे’ वो सत्य है? क्योंकि तस्वीरें और वीडियो में मैं देख पा रहा हूँ एक राजनैतिक कानून के विरोध में मजहब के वर्चस्व के नारे लगाए जा रहे हैं!

तुम हमें बता रहे हो कि हम ये मान लें कि ‘अल्लाहु अकबर’ का मतलब ‘गॉड इज ग्रेट’ होता है? इतने मासूम तो मत ही बनो। दंगा करते वक्त ये नारा उतना ही साम्प्रदायिक है जितना ‘हिन्दुओं से आजादी’ और ‘हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी’ है। राजनैतिक विरोध में ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की जगह कैसे बन जाती है?

अगर ये तस्वीरें जामिया के कैम्पस की हैं, तो हाथ उठाए बाहर आते विद्यार्थियों की तस्वीर बहुत सुकूनदायक हैं। ये बताता है कि दिल्ली पुलिस ने एक मजहबी उन्मादी भीड़ को न सिर्फ नियंत्रण में लिया, बल्कि उन्हें अपनी ही लाइब्रेरी या कैम्पस को आग के हवाले करने से बचा लिया। जिस भीड़ में कट्टे से गोलियाँ चल रही हों, जिस भीड़ में जामिया नगर के हार्डकोर अपराधी शामिल हों, जिस भीड़ ने बसों में आग लगाई हो, जो भीड़ छात्रों के साथ पत्थरबाजी कर रही हो, जो भीड़ कैम्पस में बचने के लिए घुस जाती है, वो भीड़ अपने फायदे के लिए लाइब्रेरी को बच्चों समेत आग लगाने से बाज आ जाती क्या?

लाइब्रेरी में बैठे बच्चों का हो सकता है कोई दोष न हो, लेकिन बाहरी लोग उसी लाइब्रेरी में घुस कर अगर उन्हें चाकू की नोक पर किडनैप कर लेते, तेल छिड़ककर वहाँ आगजनी करते तो, उसके बाद हुए नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार होता? क्या यही वामपंथी लम्पट और यही रवीश कुमार यह नहीं कहते कि गेट पर मूक दर्शक बन कर परमिशन का इंतजार करती रही पुलिस, और एक लाइब्रेरी आग के हवाले कर दी गई? तब क्या यह न कहा जाता कि अमित शाह ने सीधा आदेश दिया होगा कि लाइब्रेरी को जल जाने दो क्योंकि फासिवादियों का पहला निशाना पुस्तकालय ही होते हैं?

इसलिए तस्वीरों को देखिए, और ध्यान से देखिए। उन तस्वीरों को भी देखिए (ऊपर गैलरी में) जब अमेरिकी पुलिस ने दंगाइयों को सर पर हाथ रखवा कर बाहर किया था ताकि एक अश्वेत नागरिक को विश्वविद्यालय में पढ़ने की स्वतंत्रता मिले। यहाँ तो विरोध के कारण भी बेकार हैं। कल जिस तरह से जामिया की छात्राओं का अल्पज्ञान और उनकी कल्पनाशीलता जंतर-मंतर के प्रदर्शन में नजर आई, उससे जाहिर है कि उन्होंने न तो इस नागरिकता संशोधन कानून 2019 को पढ़ा है, न ही उन्हें यह पता है कि NRC है क्या।

NRC की नियम और शर्तें किसने देखी हैं?

NRC पर रवीश से बात करते हुए एक छात्रा कहती है कि आप यह देखिए कि महिलाएँ शादी के बाद दूसरे घर में चली जाती हैं, उनके पास डॉक्यूमेंट नहीं होता, वो बदलवा नहीं पाती। इसलिए इसके आने से भारत की सारी महिलाएँ अवैध नागरिक साबित हो जाएँगीं। आप सोचिए कि पढ़े-लिखे लोगों के ज्ञान का स्तर इतना बेकार है तो क्यों न मेरे कैब का ड्राइवर आदिल अली मुझसे पूछेगा, “सर आप तो पत्रकार हैं, आप ही बताइए कि 1951 से 1988 के बीच जन्मे मुस्लिमों को ही नागरिक माना जाएगा, ये गलत है कि नहीं?”

वो ड्राइवर तो उतना पढ़ा लिखा नहीं है। इंटरनेट पर खोज नहीं सकता। लेकिन ये छात्राएँ आखिर किस आधार पर ऐसी बातें बना रही हैं, और रवीश कुमार माइक लिए आनंद पा रहे हैं कि देश की लड़कियाँ आज अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ी हो गई हैं! दुर्भाग्य है कि वो देश की लड़कियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहीं, वो एक अच्छे संस्थान से हैं और उस स्थान के सामूहिक ज्ञान पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

जब कोई, ऐसे कानून को ले कर विरोध करने लगे जो अभी अपने शुरुआती रूप में भी नहीं आया है, खुद ही उसके नियम और शर्तों का आविष्कार कर ले कि होगा तो यही, और ऐसे ही, फिर आप ऐसे लोगों को समझा नहीं सकते। ये लड़कियाँ या तमाम प्रदर्शनकारी, दंगाई और बुद्धिजीवी गिरोह किस आधार पर बोल रहा है, आग लगा रहा है, लेख लिख रहा है? असम वाले NRC का हालिया स्वरूप सुप्रीम कोर्ट के संरक्षण में सामने आया है।

आप जरा सोचिए कि भारत की आधी आबादी, लड़कियाँ और स्त्रियाँ, इस देश की अवैध नागरिक हो जाएँगी? ये कॉन्सपिरेसी थ्योरी तो समझ में आ रही थी कि NRC के जरिए मजहब विशेष को निकालने की साजिश हो रही है, लेकिन सारी औरतों को अवैध घोषित करके मोदी और शाह क्या पा जाएँगे? इतने मूर्ख हैं क्या हमारे प्रधानमंत्री और कैबिनेट?

प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने तो बाकायदा ग्राफिक्स और चार्ट-वार्ट बना कर समझाया कि कैसे बीस करोड़ मुस्लिमों को एक झटके में अवैध बना दिया जाएगा। जाहिर-सी बात है कि जिनका विश्वास ‘वायर’ और रवीश जैसों में है, वो तो सच में परेशान हो जाएँगे कि बीस करोड़ लोगों को क्यों निकाला जा रहा है।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, दोनों ने बार-बार यह आश्वासन दिया है कि लोग किसी भी तरह के बहकावे में न आएँ, लेकिन लोगों को भड़काने वाले अपने काम में लगे हुए हैं। कह रहे हैं कि नागरिकता कानून को NRC के साथ देखने की जरूरत है। अब ये लोग नागरिकता रजिस्टर भी खुद ही बना रहे हैं कि इसमें ऐसा होगा, वैसा होगा। जो ड्राफ्ट रूप में भी कहीं नहीं है, जिसका प्रयोग असम में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर हुआ क्योंकि असम एक जनजातीय और अलग संस्कृति वाला इलाका है, जहाँ घुसपैठ से लोग परेशान थे, उसे पूरे भारत पर लागू करने की कल्पना के रूप में क्यों परोसा जा रहा है?

इस सरकार को कॉन्ग्रेस द्वारा लाए गए विधेयकों को, जिसके पक्ष में मनमोहन सिंह से ले कर सीताराम येचुरी तक बोल चुके हैं, उसे दोनों सदनों में बहुमत से पास करा लेने के बाद, हर बार इन्हीं नेताओं की पार्टियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भी पास कराना पड़ता है। तीन जगह से अप्रूवल लेने के बाद, इसे यह कहा जाता है कि वो सब तो ठीक है, लेकिन लोग तो दंगे कर रहे हैं, उनका क्या।

एक लाइन में यह कह दिया जाता है कि सांसद तो मात्र 300 हैं भाजपा के, लेकिन असली आवाज तो उन्हीं लोगों की है जो दंगा कर रहे हैं। आखिर दंगा करने वाले कब से लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवाज बन गए? विरोध प्रदर्शन का मतलब यह नहीं होता कि चूँकि विरोध हो रहा है तो जिस बात का विरोध हो रहा है, वो गलत है। आप खुद ही सोचिए कि इन दंगाइयों का तर्क और क्या है?

इन्होंने न तो नागरिकता कानून को पढ़ा है जो भारत के नागरिकों के लिए है ही नहीं, न ही NRC पर सरकार का कोई ड्राफ्ट उपलब्ध है जिसे निशाना बना कर ये लोग कुछ तार्किक बातें कर पाएँ, तो फिर इनके विरोध को बहुमत से चुनी हुई सरकार, और करोड़ों लोगों की सहमति (जिन्होंने भाजपा का मैनिफेस्टो पढ़ा, नेताओं के भाषण सुने और वोट दिया) कैसे छोटी पड़ जाएगी?

इसलिए, अंतिम तस्वीरों को मत देखिए। आप उन तस्वीरों को देखिए जो घटनाक्रम की हैं। आप उन तस्वीरों को देखिए जहाँ हिन्दुओं को कैलाश जाने के लिए कहा जा रहा है। आप उन आवाजों को सुनिए जो ‘हिन्दुओं से आजादी’ चाहते हैं, और उसके पीछे की उस विशाल भीड़ को देखिए जो एक आवाज में ‘आजादी’ चिल्ला कर सहमति दे रही होती है। बात यह नहीं है कि जामिया में कितने प्रतिशत छात्र गैरमुस्लिम हैं, बात यह है कि ‘हिन्दुओं से आजादी’ और ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया’ कहने वालों की भीड़ वहीं की है।

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