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ऑटो ड्राइवर ने चाकू लेकर किया 5 साल की बच्ची का रेप, ख़ून से लथपथ नाबालिग अस्पताल में

देश में बलात्कार की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रही हैं। इस बार मामला बिहार से है। बिहार, जहाँ की स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने कहा है कि राज्य में हर 6 घंटे में औसतन 1 बलात्कार की घटना होती है। उसी बिहार के दरभंगा से खबर है। यहाँ एक ऑटो चालक ने 5 साल की बच्ची के साथ हैवानियत की हदें पार कर दी। दरिंदगी का आलम ये था कि ख़ून से लथपथ नाबालिग पीड़िता को आनन-फानन में डीएमसीएच में भर्ती कराया गया। वहाँ बच्ची का ऑपरेशन किया गया। पुलिस के अनुसार, आरोपित को गिरफ़्तार कर लिया गया है।

मामला इतना गंभीर था कि कई थानों की पुलिस के साथ डीएसपी अनोज कुमार पीड़िता को देखने दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल (DMCH) पहुँचे। डीएसपी ने मीडिया को बताया कि ऑटो चालक बच्ची को बहला-फुसला कर ले गया था। उसने गाछी (जंगल) में ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया। पीड़ित बच्ची के परिवार ने बताया कि वो एक अन्य बच्चे के साथ बाहर खेल रही थी, तभी ऑटो ड्राइवर तेतर साहनी की बुरी नज़र उस पर पड़ी।

तेतर ने दोनों बच्चों को प्रलोभन दिया और फिर उन्हें ऑटो में बिठा कर अपने साथ ले गया। सुनसान जंगल में ले जाकर उसने बच्ची के साथ रेप किया। जब बच्ची के घरवालों ने आस पास उसे न पाकर खोजना शुरू किया तो किसी ने बताया कि बच्ची को ऑटो में बैठे देखा गया है। परिजनों ने काफ़ी ढूँढने के बाद पाया कि सड़क किनारे एक ऑटो लावारिस हालत में पड़ी हुई थी। ऑटो के नजदीक पहुँचने पर जंगल के अंदर से बच्ची के रोने की आवाज़ आई। आवाज़ सुनते ही परिजन रात के अँधेरे में मोबाइल का टॉर्च जला कर उस तरफ़ दौड़ पड़े। लोगों की आवाज़ सुन कर आरोपित वहाँ से भाग निकला।

जब ऑटो ड्राइवर ने बच्ची के साथ रेप किया, तब बच्ची का साथी भी उसके बगल में ही था। दोनों बच्चे वहीं पर मौजूद थे। परिजनों ने बताया कि आरोपित दोनों बच्चों की जान लेने की फ़िराक में था। किसी व्यक्ति ने आरोपित तेतर के हाथ में चाकू भी देखा था। वह भगवानपुर का रहने वाला है। पीड़ित बच्ची ग़रीब परिवार से है। उसके पिता बाहर मजदूरी करते हैं। उक्त घटना सदर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में हुई। मामले में एफआईआर दर्ज कर आरोपित पर कार्रवाई की जा रही है।

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हर सप्ताह घटिया गोला-बारूद के कारण होता है एक हादसा: आयुध कारखानों से परेशान देश की सेना!

देश के आयुध कारखानें (ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड, OFB) सेना की अहम गोला-बारूद की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इससे सेना की परिचालन संबंधी तैयारियाँ प्रभावित हो रही हैं। इसके साथ ही सामग्रियों की कमी और गुणवत्ता की समस्या के चलते कई खाली और दोषपूर्ण फ्यूज की आपूर्ति की वजह से कई बड़े हादसे भी हुए हैं। संसद में पेश रक्षा सेवाओं पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट से यह जानकारी सामने आई है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने 14 मई को बताया था कि OFB द्वारा टैंक, तोपखाने, वायु रक्षा और अन्य तोपों की आपूर्ति की जा रही गोला-बारूद की खराब गुणवत्ता के कारण सेना ने अधिक संख्या में होने वाले हादसों पर आवाज उठाया था। इनमें 41 आयुध कारखानें ऐसे हैं, जिनके वार्षिक बजट 15,000 करोड़ रुपए से अधिक हैं। सेना ने रक्षा मंत्रालय को बताया कि औसतन हर सप्ताह गोला-बारूद से जुड़े एक हादसे हो रहे हैं, जो नियमित रूप से घातक चोट के साथ ही उपकरण को नुकसान पहुँचा रहे। इसके लिए ओएफबी द्वारा निर्मित किए जा रहे अधिकांश गोला-बारूद जिम्मेदार हैं। ये सेना के विश्वास को भी कमजोर करते हैं।

शुक्रवार (दिसंबर 6, 2019) को संसद में पेश की गई 2017-2018 के लिए ओएफबी के प्रदर्शन पर कैग की रिपोर्ट ने समान रूप से चिंताजनक तस्वीर को प्रदर्शित किया। कैग ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा है कि 31 मार्च, 2018 तक आयुध फैक्ट्रियाँ सेना की प्रमुख माँगों को पूरा नहीं कर सकी थीं। 

सेना और नौसेना ने 2013-14 से 2017-18 के बीच 9 प्रकार के गोला-बारूद में फ्यूज-संबंधित दोष / समस्याओं के कारण कम से कम 36 दुर्घटनाओं के बारे में बताया। इसमें 81 एमएम हाई-विस्फोटक (एचई) मोर्टार बम, एल -70 एयर डिफेंस गन के लिए 40 एमएम एचई राउंड, रॉकेट लॉन्चर के लिए 84 एमएम 84 रोशन ’मून और टी -72 टैंकों के लिए 125 एमएम एचई गोले शामिल हैं।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि फ्यूज वांछित समय और स्थान पर सुरक्षित और विश्वसनीय विस्फोट प्रदान करने के लिए गोला-बारूद का एक आवश्यक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोषपूर्ण फ्यूज से बैरल फटने के साथ-साथ आकस्मिक और समय से पहले विस्फोट हो सकता है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि फ्यूज की गुणवत्ता जाँचने के लिए अत्यधिक देरी की गई, जिसका कोई औचित्य नहीं था। इसलिए संबंधित कारखानों द्वारा दोष जाँचने के लिए लिए बताए जा रहे उपचारात्मक उपाय निराधार है।

इसके अलावा इसमें कहा गया है कि कुछ प्रमुख गोला-बारूद वस्तुओं के लिए सेना की माँगों की एक बड़ी मात्रा 31 मार्च 2018 तक बकाया रही। इस प्रकार इसकी परिचालन तैयारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आयुध कारखानों ने 2017-18 में केवल 49% वस्तुओं के लिए उत्पादन लक्ष्य प्राप्त किया। इसमें कहा गया कि उत्पादन और आपूर्ति में ओएफबी की कमी के कारण सेना के स्टॉक में सात प्रकार के गोला-बारूद (32% से 74% तक) और पाँच प्रकार के अतिरिक्त फ़्यूज़ (41% से 94%) की गंभीर कमी हुई। सेना OFB की सबसे बड़ी ग्राहक है, जिसका कुल उत्पादन का लगभग 80% हिस्सा हर साल 14,000 करोड़ रुपए से अधिक का है।

कैग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ओएफबी द्वारा किए गए काफी कम निर्यात आगे चलकर 2016-17 में 22.6 करोड़ रुपए से घटकर 2017-18 में 13.9 करोड़ रुपए हो गया। संयोगवश रिपोर्ट ऐसे समय में आती है जब सरकार ने ओएफबी के निगमीकरण के लिए सुरक्षा पर कैबिनेट समिति के लिए एक मसौदा नोट तैयार किया है, जिसमें लगभग 1.45 लाख कर्मचारी हैं, जो कार्यात्मक स्वायत्तता, दक्षता और नई विकास क्षमता को बढ़ाने के लिए हैं।

वहीं सीसीएस नोट का का कहना है कि यह कदम 2024-25 तक ओएफबी के कारोबार को 30,000 करोड़ रुपए तक बढ़ाने में मददगार साबित होगा। इसके निर्यात में 25% तक बढ़ोतरी होगी और साथ ही 2028-29 तक मौजूदा 20% से लेकर 75% तक प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता के बढ़ने की संभावना है।

मैं अपनी बहन को दफनाऊँगा क्योंकि जलाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है: उन्नाव पीड़िता का भाई

उन्नाव में बलात्कार पीड़िता को पाँच आरोपितों ने मिल कर जला डाला। इसके बाद ज़िन्दी और मौत से जूझ रही पीड़िता को दिल्ली स्थित सफदरगंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। शुक्रवार (दिसंबर 6, 2019) की रात पीड़िता को हार्ट अटैक आया और मृत्यु हो गई। इस घटना से पूरा देश सन्न रह गया। पीड़िता के परिजनों ने माँग की है कि सभी दोषियों को मौत की सज़ा दी जाए। परिवार का कहना है कि वो अब पीड़िता के पार्थिव शरीर को जलाएँगे नहीं बल्कि दफनाएँगे। उनका कहना है कि पहले से ही दरिंदों द्वारा आग लगा कर जला दी जा चुकी पीड़िता के शरीर में जलाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है, इसीलिए उनके शव को दफनाया जाएगा

बलात्कार पीड़िता के भाई ने बताया कि उनकी बहन 90% जल चुकी है, ऐसे में अंतिम क्रियाकर्म हेतु जलाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस घटना पर दुःख जताते हुए बयान जारी किया है। पुलिस और प्रशासन भी सवालों के घेरे में है क्योंकि परिजनों ने आरोप लगाया है कि लगातार मिल रही धमकियों की जानकारी होने के बावजूद पुलिस ने एक्शन नहीं लिया। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों के मन में क़ानून का डर बनाए रखने की ज़रूरत है।

23 वर्षीय पीड़िता के साथ ये घटना तब हुई, जब वह रायबरेली कोर्ट में सुनवाई के लिए जा रही थी। पीड़िता ने मरने से कुछ देर पहले अपने भाई से कहा था- “भैया, बचा लो! मैं मरणा नहीं चाहती। जिन्होंने मेरे साथ ग़लत किया है, उन्हें मैं मौत की सज़ा पाते देखना चाहती हूँ।” बता दें कि पीड़िता को जलाने आरोपित वही लोग हैं, जिन्होंने उसका बलात्कार किया था। उन्होंने उसका पीछा कर के उसपर केरोसिन तेल डाला और आग लगा दी। आरोपितों से बचने के लिए पीड़िता 1 किलोमीटर तक बदहवास अवस्था में भागती रही। यहाँ तक कि उसने 112 नंबर पर पुलिस को भी कॉल किया था।

जब पुलिस मौके पर पहुँची, तब तक वह 90 प्रतिशत जल चुकी थी। यूपी सरकार ने कहा था कि वो पीड़िता के इलाज का पूरा ख़र्च उठाएगी। परिजनों ने अब स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें पैसे नहीं चाहिए बल्कि वो आरोपितों को मौत की सज़ा मिलते देखना चाहते हैं।

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मुखिया की बेटी की शादी में महिला डांसर को गोली मारने का मामला: 2 गिरफ़्तार, पीड़िता की हालत सामान्य

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में कुछ लोगों द्वारा एक महिला डांसर के चेहरे पर गोली चलाने का वीडियो वायरल हुआ था। चित्रकूट पुलिस ने इस सम्बन्ध में कार्रवाई करते हुए 2 लोगों को गिरफ़्तार किया है। दोनों के नाम सुधीर और फूलसिंह हैं। पुलिस ने जानकारी दी है कि पीड़िता की हालत सामान्य है और डॉक्टरों द्वारा उनका इलाज किया जा रहा है। चित्रकूट पुलिस ने आगे बताया कि उन्होंने त्वरित कार्रवाई करते हुए विभिन धाराओं में आरोप पंजीकृत करते हुए गिरफ़्तारी की है। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप पुलिस को बयान देते हुए देख सकते हैं:

चित्रकूट में एक विवाह समारोह के दौरान माहौल तब अचानक से बदल गया जब एक व्यक्ति ने महिला डांसर के चेहरे पर गोली चला दी। डिस्को लाइट्स और म्यूजिक के बीच चल रहे नाचगान के दौरान महिला को आरोपित ने धमकी दी कि “गोली चल जाएगी” और अंततः उसने गोली चला दी। दरअसल, हुआ यूँ था कि समारोह के दौरान म्यूजिक सिस्टम में कुछ ख़राबी आने के कारण महिला ने डांस करना बंद कर दिया था, जो आरोपितों को नागवार गुजरा। इसीलिए, उन्होंने तैश में आकर गोली चला दी।

गोली महिला के चेहरे (ठुड्डी पर) पर लगी और वो तुरंत गिर पड़ीं। 22 वर्षीय पीड़िता को उसके बाद पास के अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ इलाज के बाद अब उसकी स्थिति सामान्य बताई जा रही है। ये घटना 30 नवंबर को मऊ क्षेत्र के टिकरा गाँव की है। पीड़िता हीना को ग्रामप्रधान सुहीर सिंह पटेल की बेटी की शादी में नाचने के लिए बुलाया गया था। हीना की साथी डांसर ने बताया कि वो दोनों म्यूजिक सिस्टम के ठीक होने का इंतजार कर रही थीं, तभी आरोपित ने हीना के चेहरे को लक्ष्य बना कर गोली चला दी।

साथी डांसर महिला ने बताया कि वो दोनों वहाँ के लोगों के साथ पूरा सहयोग कर रही थीं, फिर भी उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया। इन डांसरों को दूल्हा पक्ष द्वारा हमीरपुर से बुलाया गया था। उनके नाचगान के दौरान भी आरोपित ने पहले से ही जश्न मनाते हुए फायरिंग कर रहे थे। ख़बरों के अनुसार, इस घटना में दो अन्य लोग भी घायल हो गए। पुलिस को इस सम्बन्ध में उसी रात सूचना मिल गई थी, जिसमें बरात में गोली चलने की बात कही गई थी। अब पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो आरोपोटों की गिरफ़्तारी की है।

1991 के बाद पहली बार! हाई कोर्ट के किसी वर्तमान जज पर CBI ने किया केस दर्ज, खुद CJI ने दी थी अनुमति

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने एक निजी मेडिकल कॉलेज प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (PIMS) में छात्रों को दाखिले में कथित गड़बड़ी के संबंध में दिल्ली और लखनऊ में कई जगहों पर छापे मारे। इस संबंध में एजेंसी की ओर से शुक्रवार (दिसंबर 6, 2019) को जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि एजेंसी ने निजी चिकित्सा संस्थान में दाखिले में अनियमितताओं के संबंध में रिश्वत सहित अन्य आरोपों में भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून की संबंधित धाराओं के तहत सात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एन शुक्ला को भी नामजद किया है और उनके लखनऊ स्थित आवास पर छापेमारी की गई है। अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि एजेंसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायाधीश शुक्ला के साथ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आई एम कुद्दूसी, PIMS के बीपी यादव और पलाश यादव और सुधीर गिरि को भी मामले में नामजद किया है।

सीबीआई ने कहा कि उसने लखनऊ, मेरठ और दिल्ली में न्यायमूर्ति शुक्ला सहित सभी सात अभियुक्तों के परिसरों में कई बार छापेमारी की। इस दौरान जाँच एजेंसी ने संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेज बरामद किए। उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने 31 जुलाई 2019 को आदेश जारी कर सीबीआई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायमूर्ति एसएन शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमा दर्ज करने की अनुमति दी थी। जिसके बाद 4 दिसंबर को एसएन शुक्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया था।

बता दें कि 1991 के बाद यह यह पहला मामला है जब सीजेआई ने एक जाँच एजेंसी को किसी कार्यरत न्यायमूर्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी। इन पर प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पक्ष में निर्णय देने के लिए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। न्यायमूर्ति शुक्ला पर छात्रों के प्रवेश की समय सीमा बढ़ाने, मौजूदा नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाकर PIMS का पक्ष लेने का आरोप है।

एजेंसी ने इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आई एम कुद्दुसी को सितंबर 2017 में पहली एफआईआर दर्ज करने के एक दिन बाद गिरफ्तार किया था। यह मुकदमा जनवरी 2020 में शुरू होने की संभावना है। सीबीआई के अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि न्यायमूर्ति कुद्दुसी ने एक निजी व्यक्ति के साथ 25 अगस्त, 2017 को लखनऊ में अपने निवास पर न्यायमूर्ति शुक्ला से मुलाकात की और इस दौरान उन्हें अनैतिक लाभ पहुँचाया गया।

एफआईआर में कहा गया है कि मामले पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले में अंतर आने पर बीपी यादव ने न्यायमूर्ति शुक्ला को पहुँचाए गए अनैतिक लाभ को वापस पाने के लिए आई एम कुद्दुसी का सहारा लिया। इसके बाद कुद्दुसी ने जस्टिस शुक्ला से अनैतिक लाभ की वापसी के लिए संपर्क किया और इसका एक हिस्सा वापस कर दिया गया। इसके अलावा एफआईआर में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रिट याचिका को वापस लेने के लिए अभियुक्तों के बीच एक साजिश रची गई थी।

उल्लेखनीय है कि यह मेडिकल कॉलेज समाजवादी पार्टी के नेता बीपी यादव और पलाश यादव का है। 2017 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने मेडिकल संस्थान का निरीक्षण किया था। इस दौरान यहाँ बुनियादी सुविधाएँ कम पाई गई और मेडिकल की पढ़ाई के मानक भी पूरे नहीं हो रहे थे। जिसके बाद आदेश के तहत प्रसाद इंस्टिट्यूट समेत देश के 46 मेडिकल कॉलेजों में मानक पूरे न करने पर नए प्रवेशों पर रोक लगा दी गई थी।

नए प्रवेश पर रोक लगाए जाने के बाद प्रसाद इंस्टिट्यूट की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने मेडिकल कॉलेजों को राहत नहीं दी थी। इसके बाद प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। इस याचिका पर जस्टिस एसएन शुक्ला की बेंच ने सुनवाई की। जस्टिस एसएन शुक्ला ने सुनवाई के बाद प्रसाद इंस्टिट्यूट को नए प्रवेश लेने की अनुमति दे दी। इस फैसले को लेकर अन्य मेडिकल कॉलेजों के बीच हड़कंप मच गया। तभी से जस्टिस शुक्ला पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे।

‘हैदराबाद के जैसा दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी जाए…’ – उन्नाव में जला कर मार दी गई बेटी के पिता का छलका दर्द

उन्नाव ज़िले के सिंधुपुर गाँव में पाँच आरोपितों द्वारा गैंगरेप की पीड़िता को ज़िंदा जलाए जाने की ख़बर ने सबका दिल दहला दिया था। पीड़िता ने अपने परिवार से कहा था कि वो मरना नहीं चाहती, वो आरोपित को मौत की सज़ा पाते देखना चाहती है। लेकिन अफसोस! 23 वर्षीय पीड़िता, जो बुरी तरह जला दी गईं थी, जिन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था, कल रात वो जिंदगी की जंग हार गईं। पीड़िता को ज़िंदा जलाने का प्रयास 5 दिसंबर की सुबह उस समय किया गया था, जब वो रेप के मामले की सुनवाई के लिए रायबरेली की एक अदालत जा रही थी।

साल भर पहले शुभम और शिवम त्रिवेदी ने पीड़िता का अपहरण करने बाद उसके साथ गैंगरेप किया था। मार्च 2019 में पुलिस ने केस दर्ज किया। 30 नवम्बर को इन्हें बेल मिली। गुरुवार को जब पीड़िता रायबरेली कोर्ट जा रही थीं, तब शिवम और शुभम के अलावा हरिशंकर त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई ने उन्हें पीटा, चाकुओं से गोदा और फिर तेल उड़ेल कर आग लगा दी।

पीड़िता के भाई ने इंडिया टुडे को बताया,

“उसने कहा कि भईया मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है। जिन्होंने मेरे साथ यह किया है, उन्हें मैं मौत की सज़ा पाते देखना चाहती हूँ।” 

उन्नाव गैंगरेप पीड़िता को गुरुवार (5 दिसंबर) की शाम को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। अस्पताल ने तभी कहा था, “अगले 24-48 घंटे उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अभी वेंटिलेटर पर रखा गया है। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। उनका शरीर 90 प्रतिशत तक जल गया है, शरीर पर काफी चोटें हैं।” लेकिन डॉक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद उन्नाव की यह बेटी अपने साथ हुए जघन्य अपराध के दोषियों को सजा मिलते देख पाने की ख्वाहिश लिए इस दुनिया से चली गईं।

वहीं, पीड़िता के पिताजी का कहना है कि उनके गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। हैदराबाद में जो हुआ, वही सज़ा मिलनी चाहिए। उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी जानी चाहिए या फिर फाँसी की सज़ा दी जानी चाहिए।

उन्नाव गैंगरेप पीड़िता, जो 90 प्रतिशत तक जल गई थी और ज़िंदगी व मौत के बीच जंग लड़ रही थी उन्हें पाँच लोगों ने बड़ी बेरहमी से मारा-पीटा और फिर मिट्टी का तेल डालकर पीड़िता को ज़िंदा ही आग के हवाले कर दिया। 

इस मामले में शिवम त्रिवेदी और शुभम त्रिवेदी मुख्य आरोपित हैं, जिनके ऊपर अगवा कर गैंगरेप का आरोप लगा हुआ है। यह दोनों ही फ़िलहाल ज़मानत पर रिहा थे। इनके अलावा, पुलिस ने मुख्य आरोपितों की मदद करने वाले उमेश वाजपेई, हरिशंकर त्रिवेदी और राम किशोर त्रिवेदी को भी गिरफ़्तार किया है। 

पीड़िता ने एसडीएम दयाशंकर पाठक को दर्ज कराए अपने बयान में बताया कि आरोपित पक्ष उस पर केस वापस लेने के लिए लगातार दबाव बना रहा था। जब उसने केस वापस नहीं लिया तो आरोपितों ने उस पर यह जानलेवा हमला कर दिया। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई के तहत पाँचों आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया।

बता दें कि बलात्कार के मामले में जेल में बंद शुभम को 30 नवंबर, 2019 को ज़मानत दी गई थी। ज़मानत मिलने के तुरंत बाद, शुभम ने पीड़िता का पीछा करना और उन्हें धमकी देना शुरू कर दिया। पीड़िता और उसके परिवार ने कथित तौर पर पुलिस को धमकियों के बारे में सूचित किया लेकिन पुलिस ने शिक़ायतों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। फ़िलहाल, एक विशेष जाँच दल इस मामले की छानबीन कर रहा है।

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9 दिसंबर तक शवों को ना तो जलाया-दफनाया जाए, ना ही घर वालों को सौंपा जाए: हाई कोर्ट का आदेश

तेलंगाना हाईकोर्ट ने हैदराबाद में मारे गए बलात्कार आरोपितों के शवों के अंतिम संस्कार को रोक दिया है। हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी कर कहा कि चारों आरोपितों के शव सोमवार (दिसंबर 9, 2019) तक सुरक्षित रखे जाएँ। उस दिन शाम 8 बजे तक इन शवों को जलाया या दफनाया नहीं जा सकेगा। कोर्ट ने इस सम्बन्ध में तेलंगाना सरकार को आदेश दिया है। अब कोर्ट द्वारा निर्धारित समय तक आरोपितों के शवों को उनके परिवार को भी नहीं सौंपा जा सकेगा। तेलंगाना के मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को एक प्रतिवेदन मिला था, जिसमें इस एनकाउंटर को न्यायेतर हत्या बताया गया था।

इस एनकाउंटर को फ़र्ज़ी बताते हुए कोर्ट में पीआईएल भी दाखिल की गई है। सोमवार को इस पर सुनवाई होगी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि चारों आरोपितों के शवों के पोस्टमॉर्टम प्रक्रिया की वीडियोग्राफ़ी कराई जाए। उन वीडियो फुटेज को शनिवार की शाम तक कोर्ट में सब्मिट किया जाएगा। हालाँकि, शुक्रवार की शाम चारों आरोपितों के शवों की ऑटोप्सी पूरी कर ली गई थी और उसी दिन रात 10 बजे तक उन सभी का अंतिम संस्कार किया जाना था। अभी तक ये नहीं पता चला है कि ऑटोप्सी कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार हुई है या नहीं। 15 महिला एवं मानवाधिकार एक्टिविस्ट्स ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि ये एनकाउंटर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स के ख़िलाफ़ है।

इन याचिकाओं में माँग की गई है कि चारों आरोपितों के शवों की ऑटोप्सी तेलंगाना व आंध्र प्रदेश से बाहर के डॉक्टरों द्वारा कराई जाए। साथ ही फॉरेंसिक जाँच के लिए भी दोनों राज्यों के बाहर से विशेषज्ञों को बुलाने की माँग की गई है। साथ ही हाईकोर्ट से दरख्वास्त की गई है कि वो एक कमिटी बनाए, जो इस पूरे मामले की जाँच करे। शनिवार सुबह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक समिति हैदराबाद पहुँचेगी। आयोग ने इस एनकाउंटर का स्वतः संज्ञान लिया है और कहा है कि इसकी सावधानी से जाँच करनी ज़रूरी है।

बता दें कि 26 वर्षीय डॉक्टर प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) के गैंगरेप के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी। मोहम्मद आरिफ और जॉली शिवा सहित 4 आरोपितों ने गैंगरेप के बाद डॉक्टर रेड्डी का नाक और मुँह दबा कर उनकी हत्या कर दी। दरिंदगी का आलम ये था कि डॉक्टर रेड्डी की लाश के साथ भी बलात्कार किया गया। इसके बाद पीड़िता के डेड बॉडी पर पेट्रोल व डीजल छिड़क कर आग लगा दी गई। पुलिस शुक्रवार की सुबह पूरे दृश्य को रीक्रिएट करने के लिए चारों आरोपितों को घटनास्थल पर लेकर गई।

वहाँ उन चारों ने पुलिस पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। साथ ही पुलिसकर्मियों के हथियार लेकर भागने की कोशिश की। आत्मरक्षा में की गई फायरिंग में चारों मारे गए। इसके बाद से ही लोगों ने हैदराबाद पुलिस की वाहवाही शुरू कर दी। हैदराबाद के क़ानून मंत्री ने इसे ‘उपरवाले का इंसाफ’ करार दिया। हालाँकि, मानवाधिकार संगठनों ने एनकाउंटर पर शक जताते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और पुलिस का विरोध किया। अब मामला कोर्ट और ह्यूमन राइट्स कमीशन तक जा पहुँचा है।

‘मेरी बेटी की आत्मा को अब शांति मिलेगी’ – ‘प्रीति रेड्डी’ के पिताजी ने कही ‘दिल की बात’

मारे गए सभी आरोपित: पुलिस ने वहीं किया एनकाउंटर, जहाँ ‘प्रीति रेड्डी’ के साथ किया था जघन्य अपराध

‘पूरी तरह जली या नहीं’ – स्कूटर से बॉडी को वापस देखने आए थे आरोपित: ‘प्रीति’ रेड्डी केस में नया खुलासा

‘प्रीति’ रेड्डी केस: खेत में घसीट कर बारी-बारी से किया रेप, ट्रक में लाश डाल खरीदा था पेट्रोल-डीजल

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…वो पेट्रोल पम्प वर्कर, जिसकी मदद से ‘प्रीति रेड्डी’ के बलात्कारी-हत्यारे तक पहुँच पाई पुलिस

आरिफ ने ‘प्रीति रेड्डी’ का मुँह-नाक दबाया, उसी ने डेड बॉडी पर पेट्रोल डाला: पुलिस की रिपोर्ट में भयावह खुलासे

समाज एनकाउंटर पर जश्न मनाता है, तो उसका कारण है: उन्नाव की बेटी भी कल मर गई

रात के 12 बज कर 43 मिनट हो रहे थे। दिन भर हैदराबाद एनकाउंटर की खबरों पर लोगों के विचार पढ़ता रहा। उसी बीच उन्नाव की लड़की के बारे में भी खबर आई कि कोर्ट में केस की तारीख पर जा रही थी, रास्ते में पाँचों आरोपितों ने, जिनमें से दो ने उसके साथ पिछले साल दिसम्बर में बलात्कार किया था, तेल छिड़क कर आग लगा दिया

आग लगाने की घटना गुरुवार (दिसंबर 5) की थी। साल भर पहले पीड़िता का, शुभम और शिवम त्रिवेदी ने, अपहरण करने के बाद उसके साथ बलात्कार किया था। मार्च 2019 में पुलिस ने केस दर्ज किया। 30 नवम्बर को इन्हें बेल मिली। गुरुवार को जब पीड़िता रायबरेली कोर्ट जा रही थी तब शिवम और शुभम के अलावा हरिशंकर त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई ने उसे पीटा, चाकुओं से गोदा और फिर आग लगा दी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग लगने के बाद भी पीड़िता लगभग एक किलोमीटर तक भागती रही और मदद माँगती रही। अंत में, खुद ही 112 नंबर पर फोन कर के शिकायत की। बाद में लखनऊ के अस्पताल में इलाज शुरु हुआ, फिर उसे दिल्ली लाया गया जहाँ अपना बयान लिखवाने के बाद उन्नाव की बिटिया की हृदयाघात के कारण कल रात 11:40 पर मृत्यु हो गई

हैदराबाद वाले मामले में पुलिस ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि चूँकि कैदियों के हाथ खुले हुए थे, तो उन्होंने हथियार छीन कर पुलिस पर हमला बोल दिया और जवाबी फ़ायरिंग में उनकी गोली लगने से मौत हो गई। हालाँकि, बलात्कारियों से सहानुभूति रखने वालों को इस बयान पर विश्वास नहीं हो रहा, और उन्होंने यहाँ तक कहा है कि ऐसी कहानियाँ अब फिल्मों में भी नहीं दिखाई जातीं।

अधिकांश लोगों को कल सुबह की यह खबर अच्छी लगी। नेताओं ने, मंत्रियों ने, पत्रकारों ने और बुद्धिजीवियों ने इस घटना की न सही, पर परिणाम पर अवश्य प्रसन्नता जताई। एनकाउंटर पर कई लोगों ने अलग-अलग विचार रखे कि पुलिस का कहना अगर सही भी है तो भी इसमें गलती पुलिस की है कि उसकी तैयारी इतनी लचर थी कि कैदियों ने उनके हथियार छीन लिए।

मूलतः, जश्न न मनाने वालों का पक्ष यह रहा कि अगर एनकाउंटर को ही समाधान मान लिया जाएगा तो हम एक वहशी समाज हो जाएँगे जहाँ कानून-व्यवस्था की परवाह किसी को नहीं रहेगी। किसी ने इसे मॉब जस्टिस या भीड़ का न्याय कह कर उसकी निंदा की। ओवैसी जैसे नेताओं और शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों ने सीधा एनकाउंटर को माफिया-स्टायल बताते हुए सवाल किए कि पुलिस और आइसिस या तालिबान में क्या अंतर रह गया है।

न्यायिक प्रक्रिया और बुद्धिजीवी

हैदराबाद वाले कांड में कहा जा रहा है कि न्यायिक प्रक्रिया फॉलो नहीं की गई, लोगों का कानून पर विश्वास नहीं है, और वो विक्षिप्त हो गए हैं अगर उन्हें यह एनकाउंटर सही लग रहा है। लेकिन ऐसा कहने वाले लोग यह बात बड़ी आसानी से भूल जाते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया तो बाईस साल चली थी याकूब मेमन के लिए, तब तो आपने लिखा था- एंड दे हैंग्ड याकूब!

अफजल गुरु को जब न्यायिक प्रक्रिया से फाँसी मिलती है तो आप उसे शहीद कहते हैं या फिर बुद्धिजीवियों की जुबान में ‘एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग’ कह कर भर्त्सना करते हैं। अयोध्या मामले में जब यही प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है तो आप ही कहते हैं कि हमें अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए कि न्याय हुआ है कि नहीं? जस्टिस लोया के मसले पर प्रक्रिया से चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट कोई गलती नहीं पाता तब आप हर रात छाती पीटते हैं कि गलत हो रहा है।

फिर मैं यह कैसे मान लूँ कि दस साल तक मोहम्मद आरिफ पर केस चलता, और तब उसे सजा-ए-मौत मिलती तब आप यह न कह रहे होते कि ‘और उन्होंने आरिफ को भी टाँग दिया’? क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया पर आपका विश्वास सिर्फ तभी होता है जब फैसला आपके मन की मुराद पूरा करने जैसा रहा हो। फिर मैं यह कैसे मान लूँ कि आपको डॉ रेड्डी के बलात्कारियों और हत्यारों, या डॉ रेड्डी के परिवार वालों से कोई भी मतलब है? आप बस हर तंत्र को झकझोड़ना चाह रहे हैं ताकि लोग सड़कों पर उतर आएँ और दंगे करें।

यही लक्ष्य है इन लोगों का जो सिर्फ एक एनकाउंटर को, जिस देश में इतनी बड़ी जनसंख्या है, जहाँ हर मिनट कहीं न कहीं कोई जघन्य हत्या या बलात्कार जैसे कुकृत्य होते रहते हैं, ऐसे दिखा रहे हैं मानो हर मिनट बस एनकाउंटर ही हो रहे हैं।

आखिर समाज जश्न क्यों मना रहा है?

प्रश्न यह नहीं है कि एनकाउंटर सही है या गलत। हम कभी भी नहीं जान सकते कि एनकाउंटर योजना बना कर हुआ या फिर पुलिस जो कह रही है वो सत्य है। इसलिए लोग अपना-अपना पक्ष रख रहे हैं। प्रश्न यह है कि एक सभ्य समाज ऐसे असामान्य तरीकों पर जश्न क्यों मना रहा है? प्रश्न यह है कि जो हैदराबाद के नहीं हैं, जो डॉ रेड्डी को जानते तक नहीं, वो क्यों खुश हैं?

मैं एक पत्रकार के तौर पर इस एनकाउंटर पर यही कहना चाहता हूँ कि या तो ऐसा कानून बने कि अगर बलात्कारियों ने स्वीकार लिया हो, ओपन एंड शट केस हो, वीभत्स हो, तो पुलिस उन्हें चौराहे पर भीड़ के हवाले कर सकती है, या पुलिस सतर्क हो कर, अपने हथियार जोर से पकड़ कर, कैदियों के हाथ में हथकड़ी डाल कर कहीं भी लाया-ले जाया करे। एनकाउंटर का सच मैं नहीं जानता लेकिन मैं यह मानता हूँ कि इन चारों आरोपितों की मौत ज़रूरी थी क्योंकि डॉ रेड्डी वापस नहीं आ सकती पर ऐसे लोगों का समाज में रहना गलत है। हालाँकि, ये मौत उन्हें एक सजा के तौर पर कोर्ट से मिलती, महीने भर में मिलती, मर्सी पटीशन रिजेक्ट हो कर मिलती, तो बेहतर होता।

एक भाई, बेटा, दोस्त या सामान्य नागरिक के तौर पर, जिसने कल ही यह भी सुना कि उन्नाव की उस लड़की के साथ क्या हुआ, ऐसे एनकाउंटरों के परिणाम सुन कर खुशी क्यों नहीं होगी? एक नागरिक के तौर पर हमने न्याय और पुलिस व्यवस्था को टूटते हुए देखा है। हैदराबाद के बलात्कारियों का एनकाउंटर किसी को मॉब जस्टिस भले लग रहा है, लेकिन ये कोई सामान्य घटना नहीं है, ये एक हर दिन होने वाली बात नहीं है। यह एक अपवाद है।

जब नागरिक ऐसे मामलों से उब जाते हैं तो फिर ऐसी मौतों का जश्न मनाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में जब किसी की हत्या ही न्यायोचित थी, भले ही उस पर केस न चला हो, आम नागरिक के लिए यह एक छोटी-सी जीत है, जिस पर खुश होने का उन्हें हक है। इससे कोई तंत्र बिखर नहीं कर रहा, समाज कहीं नहीं जा रहा। इससे समाज को लगा है कि कर्मों का फैसला ऐसे भी होता है और ये दानव भगवान की कृपा से मारे गए हैं। समाज को हम दोषी तब मानते जब किसी निरपराध व्यक्ति को मार दिया जाता और पुलिस पर फूल बरसाए जाते।

समाज की नीयत पर सवाल तब उठाए जाते जब इस समाज ने किसी निर्दोष की हत्या पर ताली बजाई हो। समाज की सामूहिक संवेदना पर तब प्रश्नचिह्न लगाना उचित होता अगर भ्रम की स्थिति वाले मामले में, या किसी छोटे अपराध के आरोपित को, किसी ने सरे आम गोली मार दी, या पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया। समाज ने आज तक किसी निर्दोष की हत्या पर जश्न नहीं मनाया है। हमारी सामूहिक संवेदना ऐसे मामलों में हमेशा सही निर्णय लेती है। ये लाशें भले ही क़ानूनी प्रक्रिया के बिना गिरी हैं, लेकिन इनका गिरना किसी भी तर्क से गलत नहीं।

जो लोग समाज को असभ्य, वहशी और दरिंदगी वाला कह रहे हैं, उन्हें यह मत भूलना चाहिए कि दरिंदा यहाँ कौन था। अगर आपको उन चार बलात्कारियों में दरिंदगी नहीं दिख रही जिन्होंने एक अकेली लड़की के विश्वास को तोड़ा, धोखे से कहीं ले जा कर बलात्कार किया, जान ले ली, लाश के साथ भी बलात्कार किया, फिर लाश को जला दिया, फिर वापस देखने आए कि लाश जली है या नहीं, तो फिर आपको मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

समाज जश्न मनाने को स्वतंत्र भी है, और अपनी जगह सही भी है। इसी समाज ने अपराधियों को जेल से बेल पर बाहर आने के बाद बलात्कार पीड़िता और उसके पति को जान से मारते भी देखा है। इसी समाज ने सैकड़ों बार अपराधियों को सजा काट कर बाहर आने के बाद दोबारा वही अपराध करते देखा है, जो जघन्य की श्रेणी में आते हैं। यहाँ न्यायिक व्यवस्था समाज के सामने बिखर रही है, उसकी उम्मीदों को तोड़ रही है।

इसलिए, न्यायिक व्यवस्था से परे जब किसी भी तरह से न्याय हो जाता है तो समाज जश्न मनाता है। समाज किसी सामान्य घटना पर जश्न नहीं मना रहा, वो जानता और मानता है कि एनकाउंटर में हुई घटना विलक्षण है, सालों में एक बार होने वाली घटना है, हजारों बलात्कारियों के बाहर होने के बावजूद चार की ही मौत का समाचार लाने वाली घटना है। इसलिए समाज इसे एक प्रतीक के रूप में देखता है। समाज इसे उस उम्मीद के रूप में देखता है कि क्या पता कुछ बलात्कारी इस घटना से भी डरें, उन्हें यह याद रहे कि एक बार पुलिस ने यह भी किया था।

समाज की सामूहिक सोच हमेशा हमारी और आपकी वैयक्तिक सोच से ऊपर होती है। इसलिए न्यायिक व्यवस्था में, कई देशों में ज्यूरी का सिस्टम होता है, जहाँ कई लोग एक केस को सुनते हैं, और अपनी राय देते हैं। वहाँ सिर्फ कानून की दलीलें ही नहीं, संदर्भ और मानसिक अवस्था, सामाजिक व्यवस्था को भी ध्यान में लिया जाता है। आप एक ज्यूरी बिठा दीजिए, पुलिस अगर यह भी कह दे कि उन्होंने जान-बूझ कर एनकाउंटर किया, फिर भी ज्यूरी उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर देगी।

पॉलिटिकली करेक्ट लोग

मानवाधिकारों की बात और न्याय के रास्ते चलने की बात करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपराधियों के मानवाधिकार नहीं होते। अगर होते तो वो संवैधानिक स्वतंत्रता का लाभ ले रहे होते, न कि उन्हें जेलों में बंद किया जाता। अब बात यह आती है कि डॉ रेड्डी के बलात्कारी और हत्यारे तो अभियुक्त थे, अपराधी नहीं, वो अब स्वयं को बचाने कैसे आएँगे? सही बात है! लेकिन डॉ रेड्डी को भी तो यही तर्क मिलना चाहिए न? क्या वो जीवित है यह बताने के लिए कि इन चारों ने जो किया, वो कैसे किया? जितनी जानकारी उपलब्ध है, जो पुलिस ने बताया है वो अपने आप में इतनी विश्वसनीय है कि समाज आज उनकी मौत पर फूल बरसा रहा है। पुलिस के पास उनके डीएनए के सैंपल हैं, उसके आधार पर बलात्कार अगर कन्फर्म हो जाता है, तो हत्या भी कन्फर्म हो जाएगी। इसलिए मानवाधिकारों का रोना रोना बंद कीजिए।

कल तक जो लोग कह रहे थे कि जिंदा जला देना चाहिए, हत्या कर देनी चाहिए वो अब ऐसे पलट गए हैं जैसे इन हैवानों के होने से प्याज के दाम कम हो जाते और देश से भुखमरी गायब हो जाती। सनद रहे कि ऐसे लोगों की हत्या से आपकी बहन और बेटियाँ कुछ हद तक सुरक्षित हैं। अब लोग कह रहे हैं कि न्यायिक प्रक्रिया से फाँसी होती तो ठीक रहता! भारतीय क़ानून की किस किताब में अपराधी को जलाने की सजा है? किस किताब में बीच चौराहे पर पत्थर मारने की सजा है?

चूँकि एक एनकाउंटर हो गया है, और आपके भीतर का ‘पोलिटिकली करेक्ट’ हृदय धड़कने लगा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इस घटना से मिला परिणाम गलत है। घटना गलत हो सकती है, जो कि पुलिस साबित करेगी कोर्ट में लेकिन परिणाम और भी भयावह होते, तो भी समाज को स्वीकार्य होता। हम लोग हर बलात्कार के बाद अपनी संवेदना में बहुत कुछ लिखते हैं, सिस्टम को गाली देते हैं, बताते हैं कि कैसे फलाना बिशप रेप के बाद भी घूम रहा है, लेकिन जब उसी को किसी कारण से जो सजा कोर्ट से मिलती, वो सड़क हादसे में मिल जाए तो क्या आप खुश नहीं होते? इसका मतलब है कि आपको मतलब परिणाम से तो है लेकिन वो गिफ्टरैप में लिपटा हुआ आना चाहिए।

किसी देश में पत्थर मारने की सजा भी तो है, आप ने ही कई बार बलात्कारियों के लिए ऐसी सजा का समर्थन किया है, क्या तब आपके भीतर का वहशीपना बाहर नहीं आ रहा था? पोलिटकिली करेक्ट होने के चक्कर में हम सबने ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’ भी गाया है। मत गाइए ऐसे गीत। हाँ, यह भी याद रखिए कि जो हुआ है वो अपवाद है, पुलिस हर बलात्कारी को ऐसे ही नहीं मार रही। लेकिन, पुलिस को बिना जाँच के फिल्मी कहानी बनाने वाला कह देना बताता है कि आप कहीं न कहीं बलात्कारियों के पक्ष में हैं। बलात्कारियों के पक्ष में मत रहिए, उनका जाना ही उचित है, तरीका चाहे जो भी हो।

समाज को हक है उबलने का

इसलिए, अगर यह समाज हर दूसरे दिन बलात्कार की जघन्य घटनाओं के बारे में सुनता है, पढ़ता है, उससे दो-चार होता है, तो इस समाज का क्रोध कहीं तो अभिव्यक्त होगा ही। वो कहीं तो रास्ता ढूँढेगा प्रस्फुटित होने का। जब यह समाज देख रहा है कि भले ही कोई न्यायिक प्रक्रिया अपनाए, या तारीखों के चक्कर में घूमता रहे, उसे अपराधी मौका देख कर जला ही देगा, तो फिर वह समाज कल अखबार में यह खबर देख कर खुश क्यों नहीं होगा कि उन्नाव की बेटी के हत्यारों को यूपी पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया।

इसके पीछे पुलिस चाहे कितनी ही वाहियात कहानी क्यों न बना ले, समाज उसे पूरी तरह से माफ करने को तैयार क्यों नहीं रहेगा? उन्नाव की पीड़िता को यही तंत्र सुरक्षा नहीं दे सका, उसके जैसे हजारों को इस तंत्र ने बाहर छोड़ रखा है जो बार-बार अपराध कर रहे हैं, जो संसद में पहुँच गए हैं, जो मंत्री हैं, मुख्यमंत्री हैं… समाज ने इन सबको देखा है।

इसलिए, समाज ऐसे मौकों पर जश्न मनाता है जब वो जानता है कि सही क्या है, गलत क्या है। समाज को अच्छे से पता है कि पुलिस की कहानी में कितना दम है, लेकिन वो ‘विलिंग सस्पेंशन ऑफ डिस्बिलीफ़’ की राह चल पड़ता है और कहता है कि भैया आपकी कहानी बिलकुल सच्ची है, हमें पूरा यकीन है कि उन अपराधियों ने आपकी बंदूक छीन ली होगी, और आप पर गोली चलाई होगी।

ऐसा मानने के लिए समाज को बाध्य भी इसी तंत्र ने किया है। समाज इसलिए किसी भी तरह से गलत नहीं है जब वो इन अपराधियों की मौत पर जश्न मनाता है। इन अपराधियों को मौत के अलावा और कोई सजा मिलनी ही नहीं चाहिए थी। ऐसे लोगों की समाज में जरूरत नहीं है। लोग टैक्निकैलिटीज़ पर सवाल उठाते रहें, लेकिन एक नागरिक के तौर पर, जो हर दिन इसी देश की इसी न्यायिक व्यवस्था को नेताओं के बिस्तर पर, अमीरों के स्वीमिंग पूल में और बड़े वकीलों की जेब में देखता है, तो वो ऐसे दिनों का इंतजार करता है जब हैदराबाद की तर्ज पर उन्नाव की बेटी के लिए भी ‘न्याय’ उन पाँचों, शुभम त्रिवेदी, शिवम त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी, हरिशंकर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई की लाश के रूप में मिले।

और हाँ, गोली अगर भौंहों के बीचों-बीच लगी हो, तो और भी बढ़िया।

मोदी सरकार ने रेलवे के 32 ‘अक्षम’ वरिष्ठ अधिकारियों को किया जबरन रिटायर

आम धारणा है कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने की उम्र 60-62 साल मानी जाती है, लेकिन सरकार को यदि ऐसा लगे कि कोई कर्मचारी 50 की उम्र पार कर लेने के बाद अपने काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पा रहा है तो वह 50 के बाद ही उस कर्मचारी को पेंशन पर भेज सकती है। इन नियम का इस्तेमाल करते हुए मोदी सरकार ने हाल ही में 32 रेलवे अफ़सरों को रिटायर कर दिया है। यह जानकारी राज्य सभा में सरकार ने खुद दी है।

कार्मिक मामलों के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के जवाब में कल (बृहस्पतिवार, 5 दिसंबर, 2019 को) बताया कि रिटायर किए गए 32 लोगों में 22 कर्मचारी निदेशक (डायरेक्टर) और उससे ऊँचे पदों पर आसीन थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से यह दावा किया है कि हालाँकि एक तय उम्र के बाद सामयिक समीक्षा सरकारी कमर्चारियों की सेवा शर्तों का हिस्सा तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है। हाल-फ़िलहाल में इसके पहले भी रेलवे में इसका इस्तेमाल करने वाली मोदी सरकार ही थी, जब 2016-17 में 4 ऐसे कर्मचारियों को रिटायर कर दिया था।

1780 पर लटकी थी तलवार, पिछली बार 1824

रेलवे के अनुसार 2016-17 में ग्रुप A के कर्मचारियों के बीच उम्र के तकाज़े से अक्षम और अकुशल की छँटनी में 1824 लोगों के प्रदर्शन को जाँचा-परखा गया था, लेकिन अंत में गाज केवल 4 पर ही गिरी। इस बार उसके मुकाबले केवल 1780 लोग ही रडार पर थे, लेकिन 32 की गर्दन नप गई है। अभी यही प्रक्रिया विभिन्न जोनों में गैर-राजपत्रित (नॉन-गज़ेटेड) और JAG स्तर के अधिकारियों के साथ अपनाई जाएगी।

इस बाबत जितेंद्र सिंह ने संसद को सूचित किया कि 220 भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों को मोदी सरकार ने इसके इस्तेमाल से 5 साल में चलता किया है। इनमें से 96 वरिष्ठ अधिकारी थे। उनके लिखित जवाब के अनुसार 96 ग्रुप A के और 126 ग्रुप B के अधिकारियों को विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से सरकार ने सेवा के मूलभूत नियमों (फंडामेंटल रूल्स) में नियम FR 56 (j) के इस्तेमाल से बाहर का रास्ता दिखाया है। यह नियम सरकार को पूरा अधिकार देता है कि किसी सरकारी अधिकारी को अक्षमता, या ईमानदारी के अभाव में ‘सार्वजनिक हित के लिए’ रिटायर कर दे। सिंह के अनुसार इस नियम का इस्तेमाल सरकार की कुशलता में बेहतरी सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।

‘अल्लाह का कानून सबसे ऊपर, रामराज्य शिर्क, जामिया के छात्रों ने अयोध्या के फैसले को बताया मजाक’

‘जामिया के छात्र’ नामक जामिया मिलिया इस्लामिया का एक कथित छात्र संगठन ने एक ऐसी बैठक के लिए पोस्टर जारी किया है जो मजहब विशेष के लोगों से राजनीतिक रूप से अल्लाह के कानून द्वारा ‘शासन स्थापित करने’ के लिए संगठित होने का आह्वान करता है।

‘जामिया के छात्रों’ ने अपने फेसबुक पेज पर कहा है कि विश्वविद्यालय के पॉलिटेक्निक लॉन में आज शुक्रवार 6.40 बजे, ‘अल्लाह की आज्ञा हर कानून से ऊपर है’ (“The Command of Allah Is Over Every Law”) शीर्षक से एक निर्धारित बैठक आयोजित की थी।


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संगठन के फेसबुक पेज द्वारा साझा किए गए इवेंट के पोस्टर में दावा है कि “बाबरी मस्जिद एक मस्जिद है और ऐसा ही रहेगा, ऐसा न हो कि हम भूल जाएँ।”

संगठन द्वारा साझा किया गया एक अन्य पोस्टर यह घोषणा करता है कि ‘अल्लाह का कानून सभी से ऊपर है’ और यह भी कहता है कि ‘बाबरी मस्जिद एक मस्जिद रहेगी’।


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संगठन ने यह भी स्पष्ट रूप से घोषणा करते हुए पोस्ट साझा किए हैं कि वे ‘अल्लाह के कानून’ के सिवा कोई कानून नहीं मानते हैं। 29 अक्टूबर को साझा किए गए उनके एक पोस्ट में कहा गया है, “पूरी दुनिया कई आधारों पर विभाजित है। रंग, नस्ल और और इन सबसे ऊपर राष्ट्रीयता के आधार पर। लोग देश के आधार पर अपने रंग या अपने प्रजाति के आधार पर दूसरों के प्रति प्रेम और शत्रुता रखते हैं।”

यह आगे कहा गया है कि अल्लाह में विश्वास जुड़े रहने का सबसे शानदार तरीका है, राष्ट्रीयता या जन्म की तुलना में। यह अल्लाह के सभी विश्वासियों को अल्लाह के प्रति विश्वास के आधार पर फिलिस्तीनियों के साथ सहानुभूति रखने के लिए कहता है और इसलिए इजरायल को दुश्मन की तरह ट्रीट करने को कहा गया है।


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15 नवंबर को साझा किए गए एक अन्य पोस्ट में संगठन के अनुयायियों को यह याद दिलाने की कोशिश की गई है कि जो कोई उनके साथ असहमत था, वह अब पूरे दिल से सहमत होगा। संदर्भ अयोध्या का फैसला था, जिसे 9 नवंबर को घोषित किया गया था। पोस्ट में कहा गया है, “अदालत और अन्य संस्थान के पीछे के कई दुष्चक्र हैं। इसके पीछे गंदी डार्क रियलिटी है और हमें इससे पहले ही इसका खुलासा करने की जरूरत है। क्योंकि तब बहुत देर हो चुकी होगी।” 


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इस पोस्ट को पिछले साल 6 दिसंबर, 2018 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की सालगिरह पर उनके फेसबुक पेज पर पोस्ट किया गया था जिसे इस साल फिर से साझा किया गया था।

बाबरी विध्वंस दिवस पर साझा की गई 2018 की पोस्ट ने घोषणा की गई थी कि 1948 से, भारत में ब्राह्मणवादी शासन चल रहा है और ये शासन उत्पीड़न, और अन्याय’ की बात करता है। इसमें आगे कहा गया है कि बाबरी विध्वंश, दरअसल उम्मा अर्थात (पूरे विश्व में इस्लाम का शासन) के पतन का प्रतीक था।

इसमें कहा कि रामराज्य कुछ और नहीं बल्कि शिर्क (अत्याचारी, गैर मजहबी) का झंडा और बाबरी विध्वंस तौहीद अर्थात न्याय के झंडे के पतन के अलावा और कुछ नहीं है।

“मु###नों के नेतृत्व का दावा करने वाले और एक झूठी आशा देते हुए कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट या किसी भी कानून द्वारा अपने वर्ग के लाभ के लिए उन लोगों के एक झुंड द्वारा लिखा जा रहा है (जिनकी वैधता कभी भी उन सभी के द्वारा ही स्वीकार नहीं की गई है) उन्हें पता होना चाहिए कि कृत्रिम कानून, शक्तियाँ, लोग और अदालतें बदल जाएँगी और गायब हो जाएँगी लेकिन मस्जिद के मस्जिद होने की वास्तविकता क़यामत तक बनी रहेगी।”

जिस तरह से यरूशलेम में मस्जिद अल अक्सा को इजरायल ने ‘कब्जे’ में ले लिया है उसी तरह से बाबरी मस्जिद भी कब्जे में है। इस बात की भी घोषणा है, “न्याय तब तक दूर है जब तक तौहीद का झंडा और अल्लाह की कलमा सभी पर हावी नहीं होता है।”


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गौरतलब है कि विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने नाम न छापने की शर्त के पर कहा है कि इस संगठन के छात्र परिसर के अंदर नियमित बैठकें करते हैं, और इस समूह द्वारा आयोजित ‘फ्रेशर्स मीट’ आयोजनों में से एक में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के दो प्रोफेसर भी शामिल हुए हैं। जो की संस्था में अतिथि वक्ताओं के रूप में जुड़े हैं, ऐसा दावा किया गया है। 

छात्रों ने कहा कि समूह अपनी गतिविधियों और बैठकों को निर्बाध रूप से और विश्वविद्यालय प्रशासन के संज्ञान में चलाता आया है। उनके बयान अक्सर भारतीय पहचान को तोड़फोड़ और मजहबी पहचान को गले लगाने के लिए उकसाते हैं। उन्होंने कथित तौर पर ऐसी घटनाओं का भी आयोजन किया था जहाँ उन्होंने फिलिस्तीन के समर्थन की घोषणा की थी और इजरायल की निंदा की थी।

समूह द्वारा साझा की गई 4 अक्टूबर की पोस्ट वास्तुकला संकाय में एक इज़राइल द्वारा प्रायोजित घटना की निंदा करती है और कहती है कि इजरायल द्वारा किसी भी कार्यक्रम की अनुमति देना विश्वविद्यालय के संस्थापक सिद्धांतों के खिलाफ है।

छात्रों ने यह भी जोड़ा कि विश्वविद्यालय का एक नियम है कि प्रशासन की अनुमति के बिना कैंपस लॉन पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की मनाही है, यह विशेष समूह ‘जामिया के छात्र’ लगभग हर शुक्रवार को ऐसी बैठकें आयोजित करते रहे हैं।

जब ऑपइंडिया ने जामिया मिलिया इस्लामिया के जनसंपर्क अधिकारी, अहमद अज़ीम से बात करने की कोशिश की, तो हमें बताया गया कि उन्हें इस तरह के किसी भी आयोजन की जानकारी नहीं है और विश्वविद्यालय अपने परिसर को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी नहीं देता है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी छात्र समूह के कार्यक्रम में, परिसर के अंदर किसी भी लॉन या मैदान का उपयोग करने से पहले विश्वविद्यालय प्रॉक्टर से अनुमति लेनी होगी।

छात्रों के समूह के फेसबुक पेज पर एक नज़र बताता है कि वे वास्तव में इस्लामिक दृष्टिकोण से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने के लिए लगभग हर हफ्ते बैठक करते रहे हैं। यहाँ उनकी पिछली बैठकों के एजेंडे पर समूह द्वारा साझा किए गए कुछ पोस्टर हैं।



Students of Jamia past meetings

पोस्टर में से साथी छात्रों के लिए “आज का सलाउद्दीन होना” और “अल-कुद्स की मुक्ति (यरूशलेम के लिए इस्लामी नाम)” के लिए खड़े होने को कहता है। एक अन्य पोस्टर जिसका शीर्षक है ‘कौन आपका कानून बनाने वाला डिज़र्व करता है?’  ‘अल्लाह के सिवा कोई और नहीं।’