Home Blog Page 5263

‘हम यहाँ भीख माँगकर भी खुश, कॉन्ग्रेस सरकार में यह मुमकिन नहीं होता’: Pak रिफ्यूजी हिंदू

लोकसभा में सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB, कैब) बहुमत से पास होने के बाद आज ऊपरी सदन में इसे पारित कराने के लिए बहस जारी है। माना जा रहा है शाम या देर रात तक इस पर फैसला आ जाएगा, सारी तस्वीर साफ हो जाएगी। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इस फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इनका मानना है कि केंद्र सरकार के इस कदम से इन सबके जीवन में उजाला आ जाएगा।

इन्हीं लोगों में एक नाम गुलशेर का भी है। गुलशेर इसी वर्ष 14 मई को अपने तीन बच्चों के साथ भारत आए थे। यहाँ आकर उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए न्यायिक लड़ाई लड़ी और अंत में सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल की मदद से उन्हें स्कूल में दाखिला दिलवाने में सफल हुए। इस खुशी को अभी कुछ महीने ही बीते थे कि मोदी सरकार ने इस विधेयक (नागरिकता संशोधन विधेयक) को पेश करके उनके जीवन में एक और तोहफा दे दिया।

बच्चों को कुछ दिन पहले मिला था शिक्षा का अधिकार

ऑपइंडिया ने इस मौक़े पर गुलशेर से बात की और जानना चाहा कि एक खुशी के तुरंत बाद मोदी सरकार के प्रयासों से मिलने वाली दूसरी सौगात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है और उन्हें इस समय कैसा लग रहा है। सवाल सुनते ही गुलशेर काफी भावुक नजर आए और पूरे मामले पर बात करते हुए उनके शब्दों में उत्साह, भारत के प्रति प्रेम, वर्तमान सरकार के प्रति आभार झलकता रहा।

गुलशेर से बातचीत का अंश

सवाल- नागरिकता संशोधन विधेयक पास हो जाने के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदुओं को नागरिकता मिलेगी… बच्चों के एडमिशन के बाद ये खबर सुनकर कैसा लग रहा है?
जवाब- हमें बहुत अच्छा लग रहा है। हम बहुत खुश हैं। मोदी सरकार ने हमारे लिए बहुत अच्छा किया है। अब हमारे बच्चों का भविष्य बन जाएगा। हम पाकिस्तान से अपना धर्म बचाकर आए थे। अगर, अब हमें अधिकार मिल रहे हैं, तो विरोध करने का तो कोई सवाल ही नहीं है। सरकार हमें हमारा हक दे रही है। हम बहुत खुश हैं… हम कौन सा दूर के हैं। पाकिस्तान और भारत पहले एक थे। लेकिन अब अगर पाकिस्तान में हमारे बहन-बच्चों पर अत्याचार हो रहे हैं, तो हम कहाँ जाएँगे… हम तो हिंदुओं के मुल्क में आएँगे न?

सवाल- जब पाकिस्तान से भारत आए थे, तो क्या उम्मीदें थीं? लगता था भारत अपनाएगा या नहीं?
जवाब- हाँ हमें लगता था भारत हमें अपनाएगा। मोदी सरकार ये प्रस्ताव लाई है। हम इससे बहुत खुश हैं। हम बहुत-बहुत धन्यवाद करते हैं कि वो हमें हमारा हक दे रहे हैं। हम यहाँ खुशी से जीना चाहते हैं, खुशी से रहना चाहते हैं। हमारे बच्चे खुश हैं यहाँ पर। हमारे साथ कोई भेदभाव नहीं है। अब अधिकार मिलेंगे तो हमारे बच्चे आगे बढ़ेंगे और अच्छा करेंगे। हमारे बच्चे भी आगे फौज में जाएँगे, सरकारी नौकरी करेंगे। हमें कोई दिक्कत नहीं है यहाँ पर। हमारा धर्म है और हम उसे ही बचाकर भारत आए हैं।

सवाल-3 आपके अलावा आपके जानने वालों में अन्य साथी भी होंगे, उनकी कैब को लेकर क्या प्रतिक्रिया है?
जवाब- हम सबकी एक ही प्रतिक्रिया है। सरकार का जो प्रस्ताव है, हम इससे खुश हैं। लोग 20-30 सालों से नागरिकता पाने का इंतजार कर रहे हैं। कइयों की पासपोर्ट गुम चुकी है, कुछ को वीजा नहीं मिल रहे। ऐसे में हम सब इस प्रस्ताव से बहुत खुश हैं।

सवाल-4 धन्यवाद के अलावा मोदी सरकार के लिए क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- हम मोदी सरकार की बहुत तारीफ करते हैं। अगर हिंदुओं के हित के लिए किसी ने कुछ किया है तो वो मोदी सरकार है। वो जो कर रही है, बहुत अच्छा कर रही है… लोग हिंदू-मुस्लिम कर रहे हैं… मुस्लिमों को बताइए यहाँ पर क्या दिक्कत है? उनको क्या परेशानी है? हमारे वहाँ पर हिंदू तकलीफ में हैं। उन पर अत्याचार होते हैं। तभी हम यहाँ आते हैं, कौन चाहता है अपना घर छोड़ना… हम अपना काम, बिजनेस सब अपने धर्म को बचाने के लिए छोड़कर आए हैं, अपने बच्चों के लिए आए हैं… वहाँ हमारे बच्चे इतने पढ़े लिखे थे, लेकिन फिर भी बच्चों की पढ़ाई आगे नहीं बढ़ रही थी। यहाँ आने के बाद हमने धक्के खाए, कोर्ट के दरवाजे खटकाए। हम सिर्फ़ अपने बच्चों के लिए आगे बढ़े।

सवाल-5 आपको लगता है कि वर्तमान में अगर कोई और सरकार होती तो ऐसा मुमकिन हो पाता?
जवाब-नहीं बिलकुल नहीं। कभी मुमकिन नहीं हो पाता। कॉन्ग्रेस ने ही तो धर्म के नाम पर देशों को बाँटा था। पाकिस्तान, बांग्लादेश सब धर्म के नाम पर अलग हुए थे। आज हमारा हिंदुस्तान सबसे आगे है। यहाँ हर किसी को अधिकार है। हमारे देश (पाकिस्तान) में भी ऐसा होता तो हम यहाँ शरण लेने क्यों आते? अपने बच्चों को, अपना घर-परिवार, जमीन, मातृभूमि को कोई छोड़ता है? मकान चाहे एक कमरे का हो, लेकिन सबको अपना घर अच्छा लगता है… आज हम यहाँ धक्के खा रहे हैं, हमारे पास घर नहीं है, बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसा नहीं है… लेकिन फिर भी कहते हैं कि हम मजदूरी करके भी खुश हैं। हमें इस देश में इज्जत मिल रही है। सारी सुविधा मिल रही है। इससे ज्यादा और क्या चाहिए… हम यहाँ भीख भी माँगकर खुश हैं।

इस बातचीत के दौरान अपने हर दूसरे वाक्य में गुलशेर ने मोदी सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि शाम या देर रात तक इस विधेयक के पास हो जाने पर वो इस फैसला पर कल जमकर खुशी मनाएँगे। ढोल-नगाड़े बजाए जाएँगे और मिठाई भी बाँटेंगे।

बता दें कि गुलशेर जैसे बहुत से ऐसे शरणार्थी हैं, जिन्हें मुस्लिम बहुल देशों (पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश) में अल्पसंख्यक होने के कारण प्रताड़ना झेलना पड़ी और आखिरी उम्मीद के साथ वो भारत आए और अब मोदी सरकार के प्रयास पर उन्हें धन्यवाद दे रहे हैं।

इससे पहले यहाँ सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दिल्ली में बसे पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों ने मजनू के टीले पर जमकर जश्न मनाया था। इस दौरान लोगों ने पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जिंदाबाद के नारे लगाए थे। साथ ही ‘जय श्री राम’ से भी इलाका गूँज गया था। लोगों ने यहाँ मिठाई बाँटी थी और पीएम मोदी की तस्वीर को अपने घरों की दीवारों पर भी लगा लिया था।

पाक से आए हिंदू ने बेटी का नाम रखा ‘नागरिकता’, पिता ने कहा – भारत की बेटी हुई है

‘Pak में मेरे परिवार को मुस्लिम बना दिया’ – CAB पर बोलना था विरोध में, डेरेक ओ’ब्रायन ने सच उगल दिया

एक कहानी, एक दंतकथा अकसर वकालत में सुनने को मिलती है- एक चतुर लेकिन बौखल वकील बुढ़ापे में यह भूल गया कि किस तरफ़ से बहस करने की फीस मिली है, और जाकर अपने ही मुवक्किल को कातिल साबित करने वाली दलीलें दे आया। तृणमूल के सांसद और हम सबके बचपन के ‘बॉर्नवीटा क्विज़ मास्टर’ डेरेक ओ’ब्रायन यही मूर्खता आज राज्य सभा में कर आए हैं।

नागरिकता विधेयक की मुख़ालफ़त करने सदन में खड़े हुए डेरेक ओ’ब्रायन ने वे सभी तर्क दे डाले, जिन्हें सुनने के बाद नागरिकता विधेयक ज़रूरी लगने लगे। और जैसे अपने ‘बॉर्नवीटा’ वाले दिनों में कठिन सवालों से ‘बच्चों’ को लाजवाब कर देते थे, वैसे ही उन्होंने भाजपाईयों की ‘बोलती बंद’ कर दी। कुछ ‘कंस्पिरेसी थ्योरी’ वाले ऐसा भी कह सकते हैं कि भाजपाईयों को अमित शाह ने चुप करा दिया होगा कि ‘दादा’ हमारे साइड से बैटिंग कर रहे हैं, याद मत दिलाना, लेकिन इस दावे के पक्ष में फ़िलहाल कोई सबूत नहीं आए हैं।

‘बंगाली धर्म’ पंजाबी मुस्लिम कैसे जाने?

डेरेक के भाषण में विरोधाभास शुरू से दिखा। दुनिया के सबसे बड़े विभाजन (मज़हबी विभाजन) को नकारने की बात करने वाले वे उसी की आड़ में बंगाली विघटनवाद फैलाने की कोशिश करते, यह संदेश देने की कोशिश करते नज़र आए कि बंगाल की पहचान भारत से अलग है, बंगाली संस्कृति वृहत्तर हिन्दू संस्कृति का हिस्सा नहीं है। और इसी के साथ बंगाली हिन्दुओं की संस्कृति को बंगाली मुस्लिमों की संस्कृति से एकरूप करते भी वे दिखे। इसके लिए उन्होंने अपने भाषण का पहला हिस्सा विशुद्ध बांग्ला में रखा, ताकि उसे अन्य-भाषी लोगों के लिए अस्पष्ट करके उन्हें बिन-बोले यह संदेश दिया जा सके कि अगर तुम बांग्लादेशी मुस्लिमों को अपना नहीं मानोगे, तो बंगाली हिन्दू भी तुम्हारा अपना नहीं रहेगा।

अपने भाषण के इसी विभाजनकारी हिस्से में उन्होंने कहा, “बंगाली धर्मो बंगाली ही जाने, बंगाली ही जाने।” हालाँकि यह पूरी तरह सत्य नहीं है, क्योंकि बंगाल का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव दुर्गा/शक्ति पूजा “जूपी के भईया” भगवान श्री राम का शुरू किया हुआ है, बंगाली संस्कृति के सबसे बड़े लेखकों में एक कृत्तिबास ओझा वर्तमान बिहार के निवासी थे, कन्नौजी ब्राह्मण बंगाली ब्राह्मणों के पूर्वज रहे हैं, लेकिन मैं उनकी बात फिर भी मान लेता हूँ। अब अगर राम, दुर्गा, सरस्वती में अनन्य आस्था रखते हुए भी मैं गैर-बंगाली होने के चलते ‘बंगाली धर्मो’ को नहीं जान सकता, तो बांग्लादेशी मुस्लिम कैसे जान जाएगा? वह तो न ही इस्लाम की बुतशिकनी शिक्षाओं के चलते ‘धर्मो’ की आस्था को पहचानता है, और न ही भारत की बहुलतावादी संस्कृति में न रहने और बांग्लादेश की कट्टरता में जीने के कारण मज़हबी सहिष्णुता से परिचित है।

“बंगाली के देशप्रेम शिखाबेन ना”- इसीलिए तो उनकी संख्या बचाकर रखनी है

अपने भाषण में आगे डेरेक ओ’ब्रायन दिसंबर महीने के राष्ट्रवादी बंगाली ‘आइकनों’ बाघा जतीन, खुदीराम बोस आदि से जुड़े होने का हवाला देते हैं। इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी।

बंगाली देशप्रेम को याद करने वाले डेरेक को यह याद रखना चाहिए कि आखिर इस देश के राष्ट्रपिता बंगाली नहीं हैं। वो गुजराती हैं लेकिन पूरे देश के राष्ट्रपिता हैं। ठीक उसी तरह सुभाष बोस और स्वामी विवेकानन्द या महा-ऋषि श्री ऑरोबिन्दो सिर्फ बंगाल के नहीं हैं बल्कि पूरे देश के हैं।

डेरेक इस बिल को ‘बंगाली-विरोधी’ कैसे कह रहे हैं? उन्हीं के आँकड़ों (जो राज्य सभा के पटल पर रखे हैं, इसलिए मान कर चल रहा हूँ कि झूठे नहीं होंगे) के मुताबिक NRC के बाद जिन लोगों की नागरिकता पर खतरा है, उनमें से 60% बंगाली हिन्दू हैं। तो उन्हीं की नागरिकता, देशप्रेम बचाने के लिए तो नागरिकता विधेयक आ रहा है। उन्हीं की भारत में साझेदारी बचा कर रखने की बात नागरिकता विधेयक में है, जिनके पूर्वज डेरेक द्वारा उद्धृत बाघा जतीन, विवेकानंद, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि हैं।

उनका ‘नाज़ी जर्मनी’ नागरिकता विधेयक लाने वालों पर नहीं, इससे बाहर छोड़े गए लोगों पर लागू होता है

डेरेक ने इसके बाद नाज़ी जर्मनी से भारत की तुलना करने की कोशिश की। उन्होंने नाज़ी जर्मनी से भारत में समानताएँ गिनाने की कोशिश की। शायद उनके दिमाग में यह नहीं आया कि जिन बातों को वह भारत पर लागू करने के लिए इतना जोर लगा रहे हैं, वह बिना किसी ज़ोर-आजमाईश के उन देशों पर भारत से पहले और स्वतः लागू हो जातीं हैं, जिनके बहुसंख्यक मुस्लिमों की वह वकालत कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर, NRC के ‘डिटेंशन कैम्पों’ को वह नाज़ी कंसन्ट्रेशन कैम्पों से जोड़ रहे हैं, जबकि अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो पूरे देश ही गैर-मुस्लिमों के लिए कमोबेश कंसन्ट्रेशन कैम्प बने हुए हैं- पाकिस्तान में किसी भी हिन्दू या ईसाई लड़की को दिन-दहाड़े उठा लिया जाता है और बलात्कार के बाद निकाह के लिए सरकारी अमला (पाकिस्तानी मुस्लिमों के ही दबदबे वाला) मजबूर करता है, बांग्लादेश में अल्लाह के नाम पर नाक-मुँह बनाने पर भी गोली मारी जा सकती है, और अफगानिस्तान में तो अपने हिन्दू-बौद्ध इतिहास को मिटाने के लिए बामियान बुद्ध ही नहीं, गांधार सभ्यता, कुषाणों, शकों, हूणों आदि से जुड़े न जाने कितने स्मारक ही मिटा दिए गए।

नाज़ी “जर्मन खून”, फ़र्ज़ी ‘आर्यन नस्ल’ आदि को बचाने के लिए अपने ही देशों के नागरिकों की नागरिकता छीन रहे थे, लेकिन नागरिकता विधेयक का भारतीय नागरिकों से मतलब ही नहीं है। यह तो नागरिकता चाह रहे विदेशियों के बारे में है। हाँ, पाक-बांग्लादेश-अफ़ग़ानिस्तान में ज़रूर कई सारे कानून मुस्लिम और गैर-मुस्लिम नागरिकों में भेदभाव करते हैं। इसीलिए भारत उन नाज़ी-इस्लामी देशों के पीड़ितों को शरण देना चाहता है, और ये बता रहे हैं कि जिसने उन्हें वहाँ परेशान किया, उसे ही यहाँ भी आ कर वही दमनचक्र चलाने का मौका दे दिया जाए।

जिस नाज़ी “महा-झूठ” की बात डेरेक कर रहे हैं, वह ‘भारत खतरे में है’ नहीं, बल्कि ‘इस्लाम खतरे में है’ है। इसी महा-झूठ के बल पर कठमुल्लावादियों ने न केवल पाकिस्तान ले लिए, बल्कि इन तीनों देशों (पाक-बांग्लादेश-अफ़ग़ानिस्तान) में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार भी इसी झूठ के बल पर हो रहे हैं। और करने वाले वही हैं, जिन्हें डेरेक अत्याचार करने वालों के बराबर का हक देना चाहते हैं भारत की नागरिकता पाने का।

मंदिर तोड़ कौन रहा है?

एक अच्छी बात हुई कि मंदिरों की ज़मीन पर शौचालय बनवाने वाले गिरोह से डेरेक उस टोली में आ गए हैं, जिन्हें मंदिरों की चिंता होती है। वे बताते हैं कि मोदी के गुजरात में 80 मंदिर क्षतिग्रस्त हुए हैं, राजस्थान में 104 हुए, वगरैह-वगरैह। बिलकुल गलत बात है, और इसके लिए सजा तो देनी ही चाहिए- डीएम से लेकर पीएम को। चूँकि डीएम तुरंत उपलब्ध हो सकता था रोकने के लिए, इसलिए उसे निलंबित किया जाना चाहिए, और सीएम को एक महीने व पीएम को एक दिन की सैलरी खुद से जुर्माने के रूप में किसी धार्मिक संस्था को दान देनी चाहिए।

लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि मंदिर तोड़ कौन रहा है? हिन्दू? शक्ति मंदिर वैष्णव तोड़ रहे हैं, जैन मंदिर बौद्ध तोड़ रहे हैं, या कोई अन्य समुदाय विशेष इन सभी के मंदिर तोड़ रहा है? मंदिरों के तोड़े जाने, अपवित्र किए जाने की घटनाएँ बढ़ेंगी डेरेक की बातें मान लेने से, या घटेंगी?

आपका परिवार मुस्लिम न बनता अगर नागरिकता विधेयक होता

डेरेक अंत में सबसे बड़ा कारण दे देते हैं अपनी ज़िंदगी से ही इस नागरिकता विधेयक को ऐसे ही मान लेने का। वे बताते हैं कि कैसे उनके परिवार का जो हिस्सा पाकिस्तान-बांग्लादेश में रह गया, उसे ईसाई से मुस्लिम बनना पड़ा। अब डेरेक खुद बताएँ कि अगर उनके परिवार को पाक-बांग्लादेश में ऐसा करने पर मजबूर करने वाले विचार लिए हुए मुस्लिम ही बंगाल में भी घुस आए, तो डेरेक ओ’ब्रायन को दानिश पठान बनने में कितना समय लगेगा?

सिंधिया ने नागरिकता बिल पर दिया बयान, किसी को पता नहीं चल रहा आखिर कहना क्या चाहते हैं

कपिल सिब्बल ने वीर सावरकर और अंबेडकर का किया अपमान, बाबा साहेब को बताया देश विभाजन का समर्थक

पाक से आए हिंदू ने बेटी का नाम रखा ‘नागरिकता’, पिता ने कहा – भारत की बेटी हुई है

नागरिकता विधेयक पर ही BJP को मिली दोबारा सत्ता, बिना घोषणापत्र पढ़े ही शेखर गुप्ता फैला रहे झूठ-भ्रम

फतेहपुर: 16 वर्षीय दलित रेप पीड़िता को मिली ‘उन्नाव जैसे हश्र’ की धमकी, शिकायत दर्ज

उत्तरप्रदेश के फतेहपुर के गाजीपुर थाना क्षेत्र में गैंगरेप का शिकार हुई एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की को आरोपितों के परिजनों ने धमकी दी है कि वो उसका ‘उन्नाव जैसा हश्र’ कर देंगे।

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने बताया कि करीब 20-25 दिन पहले 4 लड़कों ने दलित लड़की का अपहरण करके बलात्कार किया था। जिसके बाद इस मामले में सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित मामला दर्ज हुआ और मुख्य आरोपित प्रदीप को जेल भेज दिया गया, जबकि बाकी तीनों अभी फरार हैं। उन्हें ढूँढने के लिए दबिश दी जा रही है।

इस बीच मंगलवार को पीड़िता अपने पूरे परिवार के साथ पुलिस अधीक्षक के ऑफिस पहुँची। जहाँ उसने आरोप लगाया कि आरोपित के परिजन उनसे सुलह करने का दबाव बना रहे हैं और समझौते से मना किए जाने पर उसका हाल ‘उन्नाव सामूहिक दुष्कर्म की शिकार लड़की’ जैसा करने को कह रहे है।

इस संबंध में पुलिस अधीक्षक ने लड़की की शिकायत की पुष्टि की है और बताया है कि मामले की जाँच जारी है। जाफरगंज के पुलिस उपाधीक्षक श्रीपाल यादव ने आश्वासन दिया है कि यदि शिकायत में उल्लिखित तथ्यों की पुष्टि होती है तो धमकी दिए जाने का एक और मामला दर्ज किया जाएगा।

लड़की के पिता का कहना है कि उनकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म करने वाले चारों आरोपित उनके गाँव के हैं। जिस कारण उनके परिजन उनपर सुलह करने का दबाव बना रहे हैं। उन्होंने बताया, “आरोपितों के परिजन सुलह न करने पर लड़की और हमें उन्नाव घटना की तरह जलाकर मार डालने की धमकी दे रहे हैं।”

उन्नाव मामला

उन्नाव के बिहार थाना क्षेत्र के गौरा मोड के पास गुरुवार (5 दिसंबर) को सुबह तड़के एक गैंगरेप की पीड़िता अपने मुक़दमे की तारीख पर रायबरेली के लिए ट्रेन पकड़ने जा रही थी। इस बीच गैंगरेप के दो आरोपितों ने अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर अचानक पीड़िता पर हमला बोल दिया। उन्होंने पीड़िता पर लाठी-डंडे और चाकू से कई वार किए। हैवानियत के नशे में चूर आरोपित इतने पर भी नहीं रुके, उन्होंने पीड़िता पर मिट्टी का तेल डाला और आग लगा दी। आग लगने से पीड़िता चीखने-चिल्लाने लगी जिसके बाद घटना स्थल पर आसपास के लोग पहुँचे। लोगों की भीड़ को आता देख सभी आरोपित वहाँ से भाग निकले। पीड़िता को तुरंत अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया, लेकिन वो इतनी झुलस चुकी थी कि उसने दो दिन बाद ही अपना दम तोड़ दिया।

उन्नाव रेप पीड़िता के ऊपर केरोसिन तेल डालकर जिंदा जलाकर मारने वाले हैवानों के चेहरे आए सामने
‘हैदराबाद के जैसा दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी जाए…’ – उन्नाव में जला कर मार दी गई बेटी के पिता का छलका दर्द
…एक और ‘प्रीति रेड्डी’, उन्नाव में गैंगरेप पीड़िता पर लाठी-डंडे-चाकू से वार, केरोसिन डाल जलाया ज़िंदा
समाज एनकाउंटर पर जश्न मनाता है, तो उसका कारण है: उन्नाव की बेटी भी कल मर गई

सिंधिया ने नागरिकता बिल पर दिया बयान, किसी को पता नहीं चल रहा आखिर कहना क्या चाहते हैं

राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) पर चर्चा चल रही है। सभी पार्टियों के नेता अपना विचार रख रहे हैं। कॉन्ग्रेस समेत कई विपक्षियों ने इस बिल का विरोध किया है। इस बीच कॉन्ग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर बयान सामने आया है। हालाँकि यह समझना काफी मुश्किल है कि आखिर उन्होंने बोला क्या? सभी लोग यह जानने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि आखिर वो बोलना क्या चाहते हैं, मगर अफसोस… कोई समझ नहीं पा रहा।

अगर आप उनके बयान को सुनेंगे तो आपको ऐसा लगेगा जैसे कि उन्हें किसी ने जबरदस्ती इस विषय पर बयान के लिए कहा हो और उनके पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे, या फिर यूँ कहें कि वो अपने विचार को लेकर स्पष्ट नहीं थे। एक ही बात को बार-बार घुमाकर बोल रहे थे, जिसका कोई मतलब नहीं निकल रहा था। वीडियो में वो थोड़े से बदहवास से भी नज़र आ रहे थे। शायद थोड़े से परेशान भी थे। तभी तो नागरिकता संशोधन विधेयक को बार-बार ‘अध्यादेश’ बोल रहे थे।

इंदौर में जब मीडिया ने सिंधिया से नागरिकता संशोधन बिल पर राय पूछी तो वो 2-4 शब्दों तक ही सिमटे नज़र आए। इनका बयान सुनने पर दो-चार शब्द ही थे जिसे वो बार-बार दोहरा रहे थे। अध्यादेश, संविधान, नागरिकता, जात-पात, धर्म, राज्य- यही वो चंद शब्द थे, जिसके इर्द-गिर्द ही ज्योतिरादित्य सिंधिया का बयान घूमता रहा। वो इन्हीं कुछ शब्दों में उलझे नज़र आए। हालाँकि वो किसी को ये नहीं समझा पाए कि आखिर वो कहना क्या चाहते थे। इसके पीछे की वजह ये हो सकती है कि शायद वो खुद भी नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर कहना क्या है और किस संदर्भ में कहना है।

हालाँकि बाद में शायद उन्हें भी एहसास हुआ कि उनकी बातें लोगों के समझ में नहीं आ रहा है, तो उन्होंने ट्वीट करते हुए अपनी बातें स्पष्ट की। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “CAB 2019 संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ है, भारतीय संस्कृति के विपरीत भी है। अंबेडकर जी ने संविधान लिखते समय किसी को धर्म, जात के दृष्टिकोण से नहीं देखा था। भारत का इतिहास रहा है कि हमने सभी को अपनाया है- वसुधैव कुटुंबकम भारत की विशेषता है।धर्म के आधार पर पहले कभी ऐसा नहीं हुआ।”

वैसे सिंधिया इससे पहले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने के मोदी सरकार के फैसले का समर्थन कर चुके हैं। हालाँकि कॉन्ग्रेस शुरू से लेकर अब तक सरकार के इस कदम का विरोध कर रही है। कुछ दिनों पहले सिंधिया ने अपने ट्विटर अकाउंट के बॉयो से अपना कॉन्ग्रेसी परिचय हटा दिया था। इसे लेकर भी पार्टी आलाकमान से उनकी नाराजगी की खबरों ने सुर्खियाँ बटोरी थी। ट्विटर के नए बॉयो में सिंधिया ने खुद को जनसेवक और क्रिकेट प्रेमी बताया था। अक्टूबर में भिंड में पार्टी के एक कार्यक्रम में भी सिंधिया ने मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था, “चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस ने दो लाख कर्जमाफी का वादा किया था, लेकिन किसानों के 50 हजार तक के ही कर्ज माफ हुए।”

इसरो का 50वाँ लॉन्च: ख़ुफ़िया सैटेलाइट कक्षा में, सेना को एयर स्ट्राइक में नहीं होगी अब समस्या

हालिया समय में शायद भारत के बाकी सारे सरकारी संस्थानों को मिलाकर उतनी सफलताएँ नहीं हाथ नहीं लगी हैं, जितनी अकेले इसरो ने हासिल की हैं। एक के बाद एक नए मील के पत्थर गाड़ती भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान ने एक और सफलता हासिल करते हुए भारत की ख़ुफ़िया सैटेलाईट राईसैट-2बीआर1 को उसकी कक्षा में स्थापित किया है।

अंतरिक्ष, विज्ञान और तकनीकी व अपने कार्य में आम लोगों के बीच अभूतपूर्व रुचि और उत्साह को देखते हुए इसरो ने अपने ट्विटर हैंडल के माध्यम से लोगों के इस लॉन्च को लाइव देखने का भी प्रबंध किया हुआ था।

मीडिया की खबरों के अनुसार भारत की सैटेलाइट के अलावा इसरो के लॉन्च व्हीकल ने 9 विदेशी सैटेलाइटों को भी ‘लिफ़्ट’ देते हुए उन्हें उनकी कक्षा तक भेजा है। यह इसरो की सफलताओं की उस शृंखला में एक और मनका है, जिसके तहत इसरो दूसरे देशों (यहाँ तक कि कई बार विकसित देशों) के उपग्रहों को उनके देश के वैज्ञानिकों और स्पेस एजेंसियों से भी सस्ते और प्रभावी रूप से अंतरिक्ष में पहुँचा देता है।

इन 9 उपग्रहों में 6 केवल अमेरिका के हैं, जबकि एक-एक इटली और अपनी अभियांत्रिकी के लिए मशहूर जापान और इज़राइल के भी हैं। गौरतलब है कि अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा अंतरिक्ष अभियानों के क्षेत्र में दुनिया की अग्रणी मानी जाती है। लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे अनेक मौके आए हैं, जब अमेरिका ने नासा की बजाय इसरो की सहायता से अपने उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे हैं।

यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा रॉकेट पोर्ट के लांचिंग सेंटर से हुई है। RISAT2-BR1 के पहले तक भारत को बादल घिर आने की स्थिति में ज़मीनी तस्वीरों के लिए कनाडाई उपग्रहों से मिली तस्वीरों पर निर्भर रहना पड़ता था क्योंकि युद्धक विमानों का वर्तमान बेड़ा इसमें सक्षम नहीं है। यह स्वीकार्य स्थिति नहीं है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सैन्य संबंधों में कोई स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता। अगर भारत को कल को ऐसे किसी देश से युद्ध करना पड़ जाए जिसके खिलाफ कनाडा सहायता न करना चाहे तो खराब मौसम में भारत के युद्धक विमान अंधे हो जाते।

यह समस्या भारत की इस साल फरवरी में हुई बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान भी खड़ी हुई थी।

यह लॉन्च इसरो का 50वाँ था। इस खास मौके पर इसरो के अध्यक्ष के शिवन ने एक किताब भी लॉन्च की, जिसमें पूर्वकाल की उपलब्धियों का ज़िक्र है।

तस्वीर फर्स्टपोस्ट से साभार

कपिल सिब्बल ने वीर सावरकर के गलत बयान का संसद में किया जिक्र

नागरिकता संशोधन बिल पर राज्यसभा में चल रही बहस में कॉन्ग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने भी हिस्सा लिया। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए इस बिल का विरोध करते हुए वरिष्ठ वकील सिब्बल ने न जाने कहाँ से वीर सावरकर और भीमराव अंबेडकर को बहस में खींच लिया। और वो भी गलत!

कपिल सिब्बल ने कहा कि सबसे पहले टू नेशन थ्‍योरी वीर सावरकर ने दी थी (गलत जानकारी)। और इस टू नेशन थ्‍योरी के बारे में भीमराव अंबेडकर भी अपनी सहमति दे चुके हैं। इसके बाद सिब्बल ने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए (प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए असंसदीय शब्दों का प्रयोग भी) कहा कि हमारे देश को जुरासिक पार्क मत बनाइए।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील ने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस एक देश में भरोसा करती है। हालाँकि सोशल मीडिया यूजर तुरंत उन्हें घेर लिए और हिन्दुस्तान अखबार की 1947 की कटिंग लेकर आ गए। खैर, वो राज्य सभा में आम लोगों को कैसे देखते, सो बड़बड़ाना चालू रखा।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार संविधान की बुनियाद बदलने जा रही है। इतिहास बदलने जा रही है। इसके बाद उन्होंने पीएम मोदी को घेरते हुए कहा, “आपने सबका साथ, सबका विकास कहा था। सबका साथ तो आपने खो दिया, क्‍योंकि जब से सत्‍ता संभाली है, किसी का विकास नहीं किया।”

पाक से आए हिंदू ने बेटी का नाम रखा ‘नागरिकता’, पिता ने कहा – भारत की बेटी हुई है

नागरिकता विधेयक पर ही BJP को मिली दोबारा सत्ता, बिना घोषणापत्र पढ़े ही शेखर गुप्ता फैला रहे झूठ-भ्रम

‘5 लाख बंगाली हिंदुओं को मिलेगी नागरिकता’ – जिन्हें NRC से मिली थी निराशा, CAB ने जगाई आशा!

पाक से आए हिंदू ने बेटी का नाम रखा ‘नागरिकता’, पिता ने कहा – भारत की बेटी हुई है

लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद दिल्ली के मजनू का टीला में पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी बेहद खुश हैं और ये लोग बिल पास होने की खबर सुनते ही नाचने गाने लगे। उन्हें उम्मीद है कि लंबे संघर्ष के बाद उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी। हिंदू शरणार्थियों ने नाच-गाकर और ढोल बजाकर जश्न मनाया। पाक से आए ये हिंदू शरणार्थी इतने खुश हुए कि 7 साल से शरण लेकर भारत में रह रहे एक हिंदू शरणार्थी ने सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को जन्मी बेटी का नाम ही ‘नागरिकता’ रख दिया। बच्ची के पिता ने कहा- भारत की बेटी हुई है।

हिन्दू शरणार्थी ने बच्ची का नाम ‘नागरिकता’ रखा है

बेटी की माँ आरती ने कहा, “नागरिकता मिलने से आजादी मिल जाएगी। हम कुछ अच्छा व्यवसाय कर सकते हैं। सात साल के बाद आज वह दिन आया जिसका हमें इंतजार था।” बच्ची के पिता ने कहा कि उन्हें इस बिल से बहुत खुशी हो रही है, इसलिए उन्होंने अपनी बेटी का नाम नागरिकता रखा है। परिजनों ने कहा कि सभी पार्टियों से निवेदन है कि वे इस बिल का विरोध न करें। उनका कहना है कि अब उन्हें आसानी से नागरिकता मिल जाएगी। उन्होंने बताया कि वह भारत में 7 साल से रह रहे हैं।

दिल्ली के मजनू का टीला में पाकिस्तान से आकर रहने वाले हिंदू शरणार्थी पड़ोसी मुल्क से इस कदर सताए गए हैं कि वो खुद को पाकिस्तानी कहलवाना तक पसंद नहीं करते। वो खुद को हिंदुस्तानी कहते हैं। नागरिकता की माँ आरती से जब पूछा जाता है कि पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्हें किस प्रकार की समस्याओं और परिस्थितियों का सामना करना पड़ा तो उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ पर कोई इज्जत नहीं मिलती थी। प्यास लगने पर उनके ग्लास में पानी नहीं दिया जाता था। वहाँ हिंदुओं का कोई इज्जत नहीं है। वो लोग चाहते हैं कि वहाँ पर सिर्फ मजहब विशेष वाले रहें। उन्होंने कहा कि भारत में वो पूरे इज्जत के साथ आराम से रह रहे हैं।

नागरिकता की दादी ने भी इस बात पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि यहाँ पर वो अपनेपन से रह रही हैं, जबकि वहाँ पर उनके साथ भेद-भाव हो रहा था। वहीं जब उनसे यह पूछा जाता है कि क्या पाकिस्तान में हिंदू लड़कियाँ सुरक्षित नहीं है, तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा कि वहाँ पर वो बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है और ये बात कहते हुए अब काफी समय हो गया है। वो इससे तंग आ चुके हैं। वो बताती हैं कि वो लेग वैध वीजा लेकर भारत आए थे और समय-समय पर उसे रीन्यू भी करवाते रहते हैं।

इस दौरान जब उनसे पूछा गया कि नागरिकता बिल को लेकर वो क्या कहना चाहती हैं तो नागरिकता की दादी कहती हैं, “उसके लिए तो हमारी पोती ही काफी है। हम इतने खुश हो गए कि इसका नाम ही ‘नागरिकता’ रख दिया। किसी ने भी आज तक अपनी बच्ची का नाम नागरिकता नहीं रखा होगा। हमने पहले ही नागरिकता को हाथ में पकड़ लिया है और हमें उम्मीद है कि इसके आने के साथ ही हमें नागरिकता मिलेगी ही मिलेगी।” इसके साथ ही नागरिकता की दादी ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे का नाम ‘भारत’ रखा था, तभी से उनके मन में था कि एक दिन वो भारत जरूर जाएँगी। उन्होंने अपनी बेटी का नाम ‘भारती’ रखा और अब अपनी पोती का नाम ‘नागरिकता’ रखा है।

वहाँ पर रह रहे एक अन्य हिन्दू शरणार्थी से जब पूछा गया कि पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्हें किन जुल्मों-सितम का सामना करना पड़ा तो उन्होंने काफी भावुक होते हुए कहा कि पाकिस्तान के अंदर हिंदू होना गुनाह है, क्योंकि वहाँ हिंदुत्व की कोई अहमियत ही नहीं है। यहाँ हिन्दुस्तान में हिन्दू-मु##म-सिख-ईसाई सारे भाई-भाई है। भारत ही वो जगह है, जहाँ हम हिन्दू सुरक्षित हैं, इसलिए वो पाकिस्तान से भारत में रहने आए हैं। उन्होंने सभी पार्टियों से निवेदन किया है कि राज्यसभा में इस बिल का समर्थन करें ताकि उनका और उनके बच्चों का भविष्य संवर सके।

पाकिस्तान से आए इन हिंदुओं को उम्मीद है कि जल्द ही उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी और उनकी शरणार्थी पहचान खत्म हो जाएगी। इनमें से ज्यादातर शरणार्थियों का कहना है कि पाकिस्तान में अपना घर छोड़ने का फैसला इनके लिए आसान नहीं था। लेकिन उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। धार्मिक उन्माद के कारण इन पाकिस्तानी हिंदुओं को अपना देश छोड़ना पड़ा।

बता दें कि नागरिकता संशोधन बिल में प्रावधान है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिन्दू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध एवं पारसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है। बिल के जरिए मौजूदा कानूनों में संशोधन किया जाएगा, ताकि चुनिंदा वर्गों के नागरिकता दी जा सके। राज्यसभा में विधेयक पास होने पर यह कानून बन जाएगा।

JNU केसः केजरीवाल सरकार ने नहीं दी देशद्रोह का केस चलाने की इजाजत, 19 फरवरी को होगी सुनवाई

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) देशविरोधी नारेबाजी के मामले में आज (दिसंबर 11, 2019) पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कहा कि अभी भी दिल्ली सरकार से देशद्रोह के सेक्शन पर अप्रूवल नहीं मिला है। फिलहाल मामले से जुड़ी फाइल गृह मंत्रालय के पास है। इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई 19 फरवरी तक टाल दी। 

बता दें कि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने देशद्रोह मामले में जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार को निर्देश देने से 4 दिसंबर को इनकार कर दिया था। JNU के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और और उमर खालिद के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देने के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के लिए गाइडलाइन जारी करने से इनकार किया था। पीठ ने कहा था कि यह दिल्ली सरकार पर निर्भर है कि वह मौजूदा नियमों, नीति, कानून और तथ्यों के अनुसार यह फैसला लें कि मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी दी जाए या नहीं। 

अदालत ने कहा कि याचिका में गंभीर प्रकृत्ति के आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए दिशा निर्देश देने की माँग की गई है, जिसमें बतौर आरोपित प्रभावशाली व्यक्ति शामिल हैं। इस पर अदालत ने कहा कि मौजूदा नियमों के अलावा ऐसे दिशा निर्देश जारी करने के लिए सरकार को निर्देश देने की कोई वजह नजर नहीं आती। उन्होंने कहा कि इस पर विभिन्न अदालतों ने पर्याप्त संख्या में फैसले दे रखे हैं।

गौरतलब है कि 14 जनवरी 2019 को दिल्ली पुलिस ने करीब 1200 पन्ने का आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया था। इसमें जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के सदस्य उमर खालिद को मुख्य आरोपित बनाया था। वहीं, सात अन्य आरोपितों में आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उतर गुल, रईस रसूल, बसरत अली व खालिद बशीर भट का नाम शामिल है। इसके अलावा रामा नागा, आशुतोष, शहला राशीद, डी राजा की बेटी अपराजिता राजा, रुबैना सैफी, समर खान समेत 36 छात्रों को भी आरोपित बताया गया है।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) देशविरोधी नारेबाजी के मामले में आज (दिसंबर 11, 2019) पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कहा कि अभी भी दिल्ली सरकार से देशद्रोह के सेक्शन पर अप्रूवल नहीं मिला है। फिलहाल मामले से जुड़ी फाइल गृह मंत्रालय के पास है। इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई 19 फरवरी तक टाल दी। 

‘गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़की हिंसा सुनियोजित नहीं’ – नानावती आयोग से ‘CM मोदी’ को क्लीन चिट

साल 2002 में गुजरात में हुए साम्प्रादायिक दंगों पर नानावती-मेहता आयोग की फाइनल रिपोर्ट विधानसभा में आज पेश कर दी गई। इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तत्कालीन मुख्यमंत्री) को क्लीन चिट दी गई। बता दें 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी में 59 कारसेवकों को जलाए जाने के बाद राज्य में हिंसा भड़की थी। जिसके बाद से तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई आरोप लगते रहे। लेकिन, बुधवार (दिसंबर 11, 2019) को गुजरात विधानसभा में दंगों की जाँच कर रहे नानावती आयोग की अंतिम रिपोर्ट रखी गई। जिसमें गुजरात के गृह मंत्री प्रदीप सिंह जाडेजा ने सदन में रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगे आरोप खारिज किए गए हैं।

रिपोर्ट को तत्कालीन राज्य सरकार को सौंपे जाने के पाँच साल बाद सदन के पटल पर रखा गया। नानावती-मेहता कमिशन की रिपोर्ट में कहा गया कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी जलाए जाने के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा सुनियोजित नहीं थी। इसलिए, आयोग ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी है।

1500 से अधिक पन्नों की अपनी रिपोर्ट को सदन में पेश करते हुए आयोग ने कहा कि जाँच में उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे साबित कि राज्य के किसी मंत्री ने इन हमलों के लिए उकसाया या भड़काया। कुछ जगहों पर भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस अप्रभावी रही, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मी नहीं थे या वे हथियारों से अच्छी तरह लैस नहीं थे।

इसके अलावा आयोग ने अहमदाबाद शहर में सांप्रादायिक दंगों की कुछ घटनाओं का हवाला देकर कहा कि दंगों के दौरान पुलिस ने उन्हें नियंत्रित करने में सामर्थ्य, तत्परता नहीं दिखाई, जो आवश्यक था। इसलिए आयोग ने दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ जाँच या कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।

नानावती आयोग:

  • ये आयोग साल 2002 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने साम्प्रदायिक दंगों की जांँच के लिए गठित किया था। जिनमें 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
  • इन दंगों की पृष्ठभूमि गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन की दो बोगियों में आग लगाई जाने वाली घटना थी, जिसमें 59 कारसेवक मारे गए थे।
  • 2002 के गुजरात दंगे और उस पर की गई कार्रवाई पर न्यायमूर्ति नानावती-मेहता आयोग की रिपोर्ट का पहला हिस्सा 25 सितंबर, 2009 को विधानसभा में पेश किया गया था।
  • इसके बाद आयोग ने 18 नवंबर, 2014 को तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी। लेकिन तब से यह रिपोर्ट राज्य सरकार के पास ही थी।

राजदीप सरदेसाई ने स्वीकारा 2002 के दंगों के लिए मोदी ज़िम्मेदार नहीं, मीडिया ने झूठ फैलाया

जिन मुस्लिम लड़कों ने दी जान से मारने की धमकी, उसे मोदी ने किया माफ: मोदी ‘फ़ासिस्ट’ है या अति-लिबरल?

गोधरा कांड: 16 साल बाद पकड़ा गया याकूब, मिली उम्रकैद, ट्रेन में आग लगाकर 59 की जान लेने में था शामिल

पहली पत्नी की सहमति से की गई दूसरी शादी वैध नहीं हो जाती: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट में न्यायाधीश हेमंत कुमार श्रीवास्तव और न्यायाधीश प्रभात कुमार सिंह की खंडपीठ ने एक मामले पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि पहली पत्नी की रजामंदी के बावजूद भी किसी व्यक्ति को दूसरी शादी करने का अधिकार नहीं मिलता। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार ऐसी शादी वैध नहीं होती।

पटना हाईकोर्ट ने यह फैसला एक सीआरपीएफ के पूर्व असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर की अपील पर सुनाया। जिन्होंने कुछ समय पहले पहली पत्नी के साथ गुजर-बसर करने के दौरान ही सीआरपीएफ की एक महिला कॉन्स्टेबल सुनीता उपाध्याय से शादी कर ली थी।

जानकारी के अनुसार, दूसरी शादी के बाद अपीलकर्ता की पहली पत्नी रंजू सिंह ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की थी और उनपर विभागीय कार्रवाई शुरू हुई थी। जाँच सम्पन्न होने के बाद सीआरपीएफ अधिकारी वास्तविकता में पहली पत्नी के दोषी पाए गए थे और उन्हें प्रशासन के आदेशानुसार उनकी नौकरी से निकाल दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपने ऊपर सुनाए गए फैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार करने की माँग की, लेकिन फिर भी उनके ख़िलाफ़ लिए आदेशों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

अपीलकर्ता (सीआरपीएफ अधिकारी) के वकील ने इस पूरे मामले पर सुनवाई करते हुए बताया कि उनके मुवक्किल पर उनकी पहली पत्नी द्वारा लगाए आरोपों पर हुई विभागीय जाँच के दौरान ही उनकी पहली पत्नी ने एक हलफनामा भी दायर किया था, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि पूर्व सीआरपीएफ अधिकारी ने सुनीता उपाध्याय से दूसरी शादी उनकी मर्जी से की। लेकिन उस समय उस दस्तावेज को जाली बताकर दरकिनार किया गया और कहा गया कि प्रशासन ने उनके मामले में हर पहलू पर जाँच की है। इसके बाद उनपर चार्ज लगाए गए और उनपर कार्रवाई हुई।

पूरे मामले में पेश की गई दलीलों को गौर से सुनने के बाद कोर्ट ने सीआरपीएफ अधिकारी की अपील को खारिज कर दिया और कहा कि अगर ऐसा मान भी लिया जाए कि पहली पत्नी ने शिकायत कर्ता को शादी करने की अनुमति दी। तब भी ये शादी कानूनी रूप से वैध नहीं है। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम एक्ट का हवाला देकर कहा कि पहली पत्नी की रजामंदी के बावजूद भी किसी व्यक्ति को दूसरी शादी करने का अधिकार नहीं मिलता।

कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का हवाला देकर कहा कि दो हिंदुओं के बीच में विवाह तभी संपन्न माना जाएगा, जब दोनों में से किसी का कोई जीवनसाथी पति या पत्नी के रूप में उनके साथ न रहता हो।

14 साल की लड़की, 52 साल का वकील: दोनों की शादी को बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठहराया वैध
सेक्स की सहमति, शादी का झूठा वादा, और संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
‘…अगर आप शारीरिक संबंध बनाती हैं, यह जानते हुए कि उसके साथ शादी निश्चित नहीं है तो वह रेप नहीं होगा’