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RSS की किस शाखा में जाते हो? राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने कर्मचारियों से पूछा

ऐसा प्रतीत हो रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ाव को एक बार फिर ‘गुनाह’ बनाने का दुष्चक्र शुरू हो चुका है। नेहरू और गाँधी जो दमन नहीं कर पाए उसे करने की कोशिश अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार कर रही है। अजमेर में जिला प्रशासन ने सरकारी कर्मचारियों से घोषणा-पत्र के जरिए यह बताने को कहा है कि वे संघ की किस शाखा में जाते हैं।

एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर कैलाश चंद्र शर्मा ने सर्कुलर जारी किया है। कर्मचारियों से उनकी निजी जानकारी और वे संघ की किस शाखा से जुड़े हैं, यह पूछा गया है। टाइम्स नाउ ने सूत्रों के हवाले से बताया है की यह आदेश सभी जिलों को ऊपर से दिया गया है। इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि गंगापुर सिटी (सवाईमाधोपुर) के विधायक रामकेश मीणा ने विधानसभा में इस साल सवाल पूछ कर इसकी जानकारी माँगी थी। उन्होंने न केवल संघ की शाखाओं और उनमें जाने वाले सरकारी कर्मचारियों के बारे में पूछा था, बल्कि उनके सवाल का हिस्सा यह भी था कि सरकार आरएसएस का हिस्सा बने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बारे में क्या विचार रखती है।

उत्तरी अजमेर से भाजपा के विधायक और पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे सरकार में शिक्षा मंत्री रहे वासुदेव देवनानी ने गहलोत सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे राज्य में कर्मचारियों के बीच अघोषित आपातकाल लाने की कोशिश करार दिया है। उन्होंने पूछा कि जब किसी सामाजिक संस्था में शामिल होने पर कोई रोक नहीं है, तो फिर सरकार ऐसा स्व घोषणा-पत्र सरकार क्यों माँग रही है। गौरतलब है कि आरएसएस एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है। आज़ादी के दो दशक पहले हुई स्थापना से लेकर आज तक यही इसका स्वरूप और स्वभाव है।

यहाँ यह याद दिलाया जाना ज़रूरी है कि कॉन्ग्रेस भले ही संघ को ‘नाज़ी’ बताती है, लेकिन उसकी राज्य सरकार का यह कदम खुद खालिस फासीवाद है। इटली और जर्मनी, दोनों ही देशों में फासीवादी शासकों मुसोलिनी और हिटलर के उदय के समय ऐसे ही कदम उठाए गए थे। कम्युनिस्टों, समलैंगिकों, यहूदियों समेत ‘अवांछित’ समूह के संगठनों से ताल्लुक रखने वाले लोगों को चिह्नित किया गया था, जिसके बाद पहले उनके संगठन अवैध घोषित किए गए, फिर उन्हें ही ‘अवैध’ घोषित कर हत्याकाण्ड शुरू कर दिया गया।

उबर को सेक्स क्राइम की 5981 शिकायतें मिली: 464 के साथ रेप, 19 हत्याएँ भी

उबर को 2017 से 2018 के बीच यौन उत्पीड़न की 5,981 शिकायतें मिली। इसमें से 464 मामले रेप के हैं। यह पहला मौका है जब उबर ने इस तरह के आँकड़े जारी किए है। यह आँकड़ा केवल अमेरिका का है। सीएनएन के मुताबिक 84 पन्नों की रिपोर्ट में बताया गया है कि रेप पीड़ितों में से 92 फीसदी सवारी और 7 फीसदी चालक थे। रिपोर्ट में कंपनी से जुड़े 19 जानलेवा मामलों का भी खुलासा किया गया है। उत्पीड़न की बढ़ती शिकायतों के कारण उबर और उसकी प्रतिद्वंद्वी ‘लिफ्ट’ पर लगातार इनसे निपटने का दबाव बढ़ रहा है।

कंपनी को 2017 और 2018 में कुल मिलाकर बलात्कार के प्रयास की 587 शिकायतें मिली। उत्पीड़न के अन्य मामले बिना सहमति के छूने और चुंबन से संबंधित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, “उबर ने 2017 से 2018 के बीच पॉंच सबसे गंभीर श्रेणी के यौन उत्पीड़न मामलों में 16 प्रतिशत गिरावट दर्ज की है। सभी पॉंच श्रेणियों में गिरावट दर्ज की गई है।”

उबर की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में जानलेवा शारीरिक उत्पीड़न के 10 और 2018 में नौ मामले सामने आए।उबर ने कहा कि मारे गए लोगों में आठ सवारियॉं, सात चालक और चार तीसरे पक्ष यानी आसपास के लोग थे। 2017 में यौन हिंसा के 2,936 और 2018 में 3,045 मामले सामने आए। हालाँकि उबर का कहना है कि जिस बड़े पैमाने पर वह सेवा दे रही है उस लिहाज से अपराध का आँकड़ा बहुत ही कम है। अमेरिका में उबर ने पिछले साल 1.3 बिलियन लोगों को सेवा मुहैया कराई था। इतनी बड़ी संख्या में सवारी के लिहाज से अपराध का आँकड़ा एक फीसदी से भी काम बैठता है।

गौरतलब है कि 2017 में उबर का एक मामला भारत में भी बेहद सुर्खियों में रहा था। एक महिला ने सफर के दौरान रेप और यौन हिंसा की शिकायत उबर चालक के खिलाफ दर्ज करवाई थी। बाद में उसने उबर पर भी केस कर दिया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार महिला ने आरोप लगाया था कि उबर ने उसके मेडिकल रिकॉर्ड्स के साथ छेड़छाड़ की थी। हालॉंकि बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया था।

अमेरिका में एक साल पहले सीएनएन ने उबर सवारी के दौरान यौन हिंसा को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इससे पता चला था कि बीते चार साल के दौरान अमेरिका में उबर के 103 ड्राइवर के खिलाफ सवा​री ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। यह पहला मौका था जब अमेरिका में उबर सफर के दौरान सुरक्षा का मुद्दा गरमाया था।

गैंगरेप पीड़िता की अर्ध-नग्न लाश: टूटी उंगलियाँ, आँखें बाहर निकली हुईं – शाबोद्दीन, शेख बाबू, मकदूम ने कबूला जुर्म

‘वो छटपटा रही थी, मैं रेप कर रहा था, मरने के बाद भी… फिर बेटी के साथ भी’ – नसीरुद्दीन का कबूलनामा

दलित महिला की गैंगरेप के बाद हत्या: बाबू, शहाबुद्दीन और मकदूम ने कबूला जुर्म

हम क्रिमिनल नहीं नेता हैं, फिर भी कर रहे ऐसा सलूक: फ़ारूख़ अब्दुल्ला का दर्द-ए-लेटर

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने नेशनल कॉन्फ़्रेंस के पूर्व अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूख़ अब्दुल्ला का एक पत्र ट्वीट किया है। पत्र का मजमून यह है कि अधिकारी टाइम पर फारूक साहब को लेटर भी नहीं दे रहे। घर में नजरबंद कर ऐसा सलूक किया जा रहा है जैसे नेता नहीं वे अपराधी हों।

थरूर ने यह पत्र ट्वीट कर लिखा है, “कैद फारूख़ साब का पत्र है। संसद सदस्यों को संसद सत्र में भाग लेने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि उन्हें इस मामले में संसदीय विशेषाधिकार मिला हुआ है। अन्यथा गिरफ्तारी का इस्तेमाल विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए किया जा सकता है। संसद में भागीदारी लोकतंत्र और लोकप्रिय संप्रभुता के लिए आवश्यक है।”

फारूक अब्दुल्ला ने पत्र में लिखा है, “आपका (शशि थरूर) पत्र आज मुझे मजिस्ट्रेट के हाथों मिला। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे मेरा डाक भी समय से नहीं देते। एक वरिष्ठ सांसद और पार्टी नेता के साथ ऐसा सलूक करने का यह कोई तरीका नहीं है। हम क्रिमिनल नहीं हैं।”

गौरतलब है कि अगस्त में आर्टिकल 370 के तहत मिले जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर मोदी सरकार ने राज्य को दो क्रेंदशासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था। फैसले से पहले एहतियातन राज्य में सक्रिय दलों के नेताओं और अलगावादियों को हिरासत में लिया गया था। कई नेताओं को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया था। ऐसे नेताओं में अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार के राजनीतिक रूप से सक्रिय सदस्य भी हैं। इन्हें बीच में मोदी सरकार ने मौका दिया था कि घाटी में हिंसा न भड़काने, शांति-व्यवस्था में सहयोग करने की शर्त पर इनकी रिहाई सम्भव है। लेकिन न ही अब्दुल्ला और न ही मुफ़्ती घराने ने इसे स्वीकार किया था।

थरूर के इस ट्वीट के बाद लोगों का ट्विटर पर गुस्सा फूट पड़ा है और वे अब्दुल्ला की जम कर आलोचना कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने उन्हें अपराधियों से भी गया-बीता बता दिया। आरोप लगाया कि अब्दुल्ला के शासनकाल में न केवल कश्मीर में जिहाद को बढ़ावा दिया गया, बल्कि जम्मू को लूटा भी गया।

एक अन्य यूज़र ने पूछा कि फ़ारूख़ अब्दुल्ला और सोनिया गाँधी तब क्या कर रहे थे, जब कश्मीर में हिन्दू पुरुषों और बच्चों का हत्याकाण्ड चल रहा था, महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार हो रहा था। हालाँकि इस यूज़र ने जो आँकड़े दिए हैं वे अतिशयोक्ति से भरे हैं।

एक यूज़र ने कहा है अब्दुल्ला लिखित आश्वासन दें कि वे देश-विरोधी गतिविधियों में हिस्सेदारी नहीं करेंगे।

फ़ारूख़ अब्दुल्ला ने राम मंदिर पर दिया बेहद भावनात्मक बयान- कहा इजाज़त मिलने पर खुद लगाऊँगा मंदिर की ईंट

जाते-जाते जेटली गिना गए नेहरू और अब्दुल्ला की करतूतें, लिखा- ‘यह नया भारत है, बदला हुआ भारत है’

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हैदराबाद एनकाउंटर: आरिफ ने पुलिस से छीने थे हथियार, कर्नाटक में भी अपराधों को अंजाम दे चुके थे प्रीति रेड्डी के गुनहगार

हैदराबाद में पशु चिकित्सक प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) की गैंगरेप के बाद हत्या करने वाले चारों आरोपित कर्नाटक में भी कई अपराधों में शामिल थे। यह संदेह साइबराबाद पुलिस ने जताया है। अभियुक्तों को एनकाउंटर में मार गिराए जाने को लेकर हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पुलिस ने यह बात कही। साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनर ने कहा कि प्रीति रेड्डी के साथ हुई वारदात को सूक्ष्मता से समझने के लिए पुलिस चारों आरोपितों को घटनास्थल पर लेकर गई थी। वहॉं उन्होंने पहले पुलिस पर लाठियों से हमला किया। इसके बाद पुलिस के हथियार छीन उन पर फायरिंग की।

साथ ही उन्होंने कहा कि पुलिस को शक है कि चारों आरोपित आरिफ, केशवुलु, शिवा और नवीन कर्नाटक में भी कई आपराधिक मामलों में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने साफ़ किया कि जाँच जारी है।

पुलिस ने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से जॉंच के बाद ही चारों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर हुई थी। इसके आधार पर ही कोर्ट ने 10 दिन की न्यायिक हिरासत दी थी। पुलिस के मुताबिक 4 और 5 दिसंबर को आरोपितों से पूछताछ की गई। शुक्रवार सुबह सीन रीक्रिएशन के लिए चारों आरोपियों को घटनास्थल पर लेकर पुलिस गई थी। आरिफ ने पुलिस से हथियार छीने। डंडे और पत्थर से पुलिस पर हमला भी किया और भागने की कोशिश की। दो आरोपितों ने पुलिस के ऊपर गोली भी चलाई। घटना 5.45 से 6.15 के बीच हुई।

गौरतलब है कि जिस जगह डॉ. रेड्डी की लाश बरामद हुई थी, उस जगह अन्य महिलाओं की जली हुई लाशें भी मिलने की बात स्थानीय मीडिया में आई थी। उनमें से एक लाश को लेकर पुलिस ने कहा था कि फॉरेंसिक साक्ष्य देख कर प्राथमिक तौर पर लग रहा है मानसिक रूप से बीमार मृतका ने शायद आत्महत्या कर ली होगी। यह ‘एंगल’, कि आरोपित ऐसे ही अपराधों को अंजाम दे रहे किसी बड़े गैंग का हिस्सा हो सकते हैं, इस दावे से फिर से ताज़ा हो गया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा आज की घटना का स्वतः संज्ञान लेने पर सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस घटना का संज्ञान लेने वाले सभी पक्षों को उत्तर देगी- भले ही वह राज्य सरकार हो या एनएचआरसी।

प्रीति रेड्डी मर गई फिर भी रेप करते रहे दरिंदे: आरिफ के प्लानिंग की पूरी डिटेल

आरिफ ने ‘प्रीति रेड्डी’ का मुँह-नाक दबाया, उसी ने डेड बॉडी पर पेट्रोल डाला: पुलिस की रिपोर्ट में भयावह खुलासे

मारे गए सभी आरोपित: पुलिस ने वहीं किया एनकाउंटर, जहाँ ‘प्रीति रेड्डी’ के साथ किया था जघन्य अपराध

मिथिला की नई सीताएँ: छेड़खानी कर रहे युवक का किया ऑन स्पॉट फ़ैसला, पिटाई का वीडियो वायरल

एक तरफ जहाँ पूरा देश बलात्कार और हत्या के मुद्दे पर उबल रहा है, वहीं बिहार के दरभंगा में कुछ छात्राओं ने मिलकर छेड़छाड़ करने वाले एक मनचले को बिना देरी किए ऑन स्पॉट ही फ़ैसला सुना दिया। फ़ैसला भी ऐसा जिसे याद कर आरोपित अब शायद ही ज़िंदगी में फिर किसी अन्य महिला को छेड़ने का दुस्साहस करे। 

दरअसल, सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेज़ी के साथ वायरल हो रहा है। दरभंगा के ललित नारायरण मिथिला विश्वविद्यालय के कमला पीजी गर्ल्स हॉस्टल की एक छात्रा के साथ बीते बुधवार (4 दिसंबर) को छेड़खानी की एक घटना हुई थी। पीड़ित छात्रा ने बताया कि बेलवागंज के एक लड़के ने लड़कियों के हॉस्टल के पास ही उससे छेड़खानी की थी। काफ़ी देर तक वो छात्रा के सामने अश्लील हरक़तें करता रहा। इस बात से नाराज़ छात्राओं ने उस युवक को सबक सिखाने का मन बनाया।

इसके बाद एक साथ कई छात्राओं ने मिलकर अश्लील हरक़तें करने वाले शख़्स को जूते-चप्पलों से पिटाई करके सबक सिखाया। विश्वविद्यालय थाने की पुलिस को जब घटना की सूचना मिली तो वो उस मनचले को पकड़कर थाने ले गईं। पीछे-पीछे छात्राएँ भी थाने पहुँची, जहाँ उन्होंने मनचले के ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज करवाई।

इसके बाद हॉस्टल सुपरिटेंडेंट डॉ लावण्य कीर्ति सिंह काव्या भी वहाँ पहुँची, जहाँ उन्होंने छात्राओं को समझा-बुझाकर हॉस्टल वापस भेजा। सुपरिटेंडेंट ने कहा कि दो दिन पहले भी कमला हॉस्टल के पास एक मनचले ने छात्रा और सिक्योरिटी गार्ड के साथ बदतमीज़ी की थी। छात्राओं के अनुसार, उनके हॉस्टल के बाहर अक्सर लड़के अश्लील हरक़तें करते हैं और उन पर भद्दी टिप्पणियाँ भी करते हैं। उन्होंने शिक़ायत की कि उनके हॉस्टल के बाहर सुरक्षा गार्ड भी मौजूद नहीं रहता। इस सन्दर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन से भी कई बार शिक़ायत की, लेकिन उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

ख़बर के अनुसार, विवि थाना प्रभारी पवन कुमार सिंह ने बताया कि छात्राओं की ओर से सामूहिक शिक़ायत दर्ज कराई गई है। फ़िलहाल आरोपित पुलिस की हिरासत में है और उससे पूछताछ जारी है। वहीं, एसएसपी बाबू राम ने बताया कि सामूहिक शिक़ायत में हॉस्टल के आसपास संदिग्ध गतिविधियों का उल्लेख किया गया। उन्होंने बताया कि आरोपित के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

हैदराबाद एनकाउंटर पर रवीश कुमार के प्राइम टाइम की स्क्रिप्ट हुई लीक, NDTV में मचा हड़कम्प

सुबह हैदराबाद एनकाउंटर के बाद दोपहर में NDTV के पत्रकार रवीश कुमार के शाम वाले प्राइम टाइम की स्क्रिप्ट लीक हो गई, जिसकी एक कॉपी हमारे एक सुप्त सूत्र के हाथ लगी। हालाँकि, ऑपइंडिया इसकी सच्चाई की कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। हम उस स्क्रिप्ट को ज्यों का त्यों आपके लिए रख रहे हैं।

नमस्कार, मैं रवीश कुमार!

याद आ रहे हैं वेद प्रकाश शर्मा जिन्होंने 1992 में ‘वर्दी वाला गुंडा’ नामक कालजयी उपन्यास लिखा था जिसकी 15 लाख प्रतियाँ पहले ही दिन बिक गई थी, और कुल 8 करोड़ प्रतियाँ आज तक बिकी हैं। मेरी किताब ‘इश्क में शहर होना’ की 8 हजार बिकी हैं। ख़ैर, अपने बारे में मैग्सेसे अवार्ड के बाद ज्यादा बोलना उचित नहीं समझता।

आज सुबह की खबर सुनी कि हैदराबाद में पशु चिकित्सक के बलात्कार और हत्या के मामले के चार आरोपितों को पुलिस ने आत्मरक्षा में मार गिराया। पुलिस इसे मुठभेड़ कह रही है। पुलिस का क्या है, वो चाहे तो इसे फिल्म की शूटिंग भी कह सकती है और इन चार लालों की माँओं को कह सकती है कि उनका बेटा जिंदा है और जेल में बंद है, बस मिलने नहीं दे सकते।

आप सोचिए उस माँ की हालत जिसके घर का एकमात्र कमाने वाला चला गया। आप सोचिए उस माँ की हालत जो पहले ही अपने बेटे पर लगे आरोपों के कारण परेशान थी कि उन्हें भारत की इस लम्बी न्यायिक प्रक्रिया से लड़ना है, अब वो किसके लिए वकील लाएगी? आप सोचिए क्विंट के उस रिपोर्टर की मानसिक स्थिति जिसे फिर से उसी माँ से पूछना पड़ेगा कि अपने घर के एकमात्र कमाने वाले हाथ का पुलिस के मुठभेड़ में, इस एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्या का किरदार बनने पर कैसा लग रहा है!

मैंने तो सोचा था कि आज मैं दर्शकों को महाराष्ट्र सरकार की एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा अजित पवार को बाइज़्ज़त क्लीन चिट देने के ऊपर बताऊँगा कि उन्हें किस तरह से फड़णवीस सरकार ने न सिर्फ फँसाया था बल्कि पाँच साल का नकली शासन भी किया, लेकिन सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं। उसी ब्यूरो ने उद्धव ठाकरे की सरकार आते ही क्लीन चिट दे दी, जो बताता है कि भाजपा अपने विरोधियों को हर हाल में जेल में डाल कर ही राज करना चाहती है।

लेकिन भाजपा वालों से यह देखा नहीं गया, और हैदराबाद की पुलिस ने मोदी और शाह के दवाब में आ कर किसी फिल्मी कहानी की तरह इन चार मासूमों को बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के मुँहअँधेरे में घेर कर गोली मार दी। अब आप कहेंगे कि रवीश जी, आप ये किस आधार पर कह रहे हैं कि मुठभेड़ झूठा है? आप यह भी पूछेंगे कि जिस तर्क से मैं बलात्कारियों को पूरी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने की बात कह रहा हूँ, वैसे ही पुलिस को भी जाँच करने का पूरा हक है, फिर उन्हें एक लाइन में झूठा क्यों कहा जा रहा है।

मेरा जवाब है कि मैं संघियों से बात नहीं करता। मैं उनके मुँह ही नहीं लगता। तुम सब आईटी सेल वाले हो जिसे मोदी ने मुझे घेरने के लिए भेजा है। मुझे ऐसे ही मैग्सेसे और लंकेश अवार्ड नहीं मिला है। मैंने बार-बार, अपनी सहूलियत के हिसाब से सवाल पूछे हैं, जिसमें मैंने जय शाह से ले कर शौर्य डोभाल और जस्टिस लोया की बातें की हैं। सवाल का जवाब जरूरी नहीं है, सवाल जरूरी है क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र चलता है। सुप्रीम कोर्ट की बात भी तभी तक मानी जाए, जब तक वो मेरे मतलब की है क्योंकि हर व्यक्ति के पास सोचने की क्षमता होती है, उसे किसी सुप्रीम कोर्ट या पुलिस के तर्कों की ज़रूरत नहीं होती।

ये मानवाधिकारों का हनन है जहाँ पुलिस ने इन मासूम बच्चों को एक झूठी कहानी सुना कर, फुसला कर घुप्प अँधेरे में ले जाती है, और वहाँ कहती है कि वो भागने की कोशिश कर रहे थे! आप बताइए कि अंधेरे में वो कैसे भागते भला? दोपहर में तो उन्हें रास्ता भी दिखता लेकिन मानसिक यातनाओं से परेशान ये बच्चे उस जगह पर से कैसे भागते, किस दिशा में भागते? क्या उनके पास कोई जीपीएस था जो उन्हें राह बताता? ये सब सवाल हैं जो एक लोकतंत्र में पूछा जाना चाहिए। और ये सवाल मोदी और शाह से पूछा जाना चाहिए।

आप कहेंगे कि पुलिस तो स्टेट सब्जेक्ट है! जी, है स्टेट सब्जेक्ट लेकिन ये मानसिकता कहाँ से आई है? पुलिस तो डभोलकर, पनसरे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश और अखलाख मामले में भी गैरभाजपा की थी, लेकिन हमने फिर भी तय किया कि जहाँ सीधे तौर पर भाजपा या मोदी पर आरोप लगाना संभव न हो, हम ये तो कह ही सकते हैं कि अपराधी भाजपा की नीतियों से प्रेरित था! हम ये तो कह ही सकते हैं कि अखलाख को मारने वाले लोग वो थे जिन्होंने विधानसभा चुनावों में सपा को वोट दिया था, और लोकसभा में मोदी को… आखिर पत्रकार थोड़ी कल्पनाशीलता न दिखाए तो उसे मैग्सेसे तो छोड़िए शैम्पू का सेशै भी नहीं मिलेगा! बात करते हैं!

कोई मुझे ये बता दे कि विवाह की पार्टियों में व्यस्त तेलंगाना मुख्यमंत्री केसीआर जी के पास क्या इतना समय रहा होगा कि वो उस ‘डीजे… डीजे… प्रतापगढ़… छलकत हमरो जबनिया ऐ राजा’ इस वाले शोर में साइबराबाद पुलिस से बात भी कर पाए होंगे? फिर पुलिस का मुखिया किसको फोन करेगा? जी, केन्द्र के गृह मंत्रालय को। फिर बात क्या हुई होगी?

‘ऊपर’ आवाज आई होगी कि निपटा दो। और निपटाने की बात क्यों कही गई होगी? क्योंकि उसमें एक अल्पसंख्यक है जो कि हजार कारणों से उस दिन वहाँ हो सकता था! हमने विदेशी मामलों में कई बार देखा है कि आरोपित कभी-कभी मानसिक दवाब में, शारीरिक जरूरत के प्रभाव में, एक सेक्सुअली कुंठित समाज में अपनी इच्छा को पूर्ण होते न देख कर ऐसी गलतियाँ कर बैठता है।

मोहम्मद आरिफ और बाकी के तीन लोगों ने हो सकता है यही किया हो। जर्मनी में एक ऐसा मामला सामने आया था जहाँ एक बच्चे का बलात्कारी एक इराकी शरणार्थी था जिसे ‘सेक्सुअल इमरजेंसी’ लगी थी तो उसने बच्चे का रेप कर दिया। उसे डिपोर्ट भी नहीं किया गया क्योंकि वो डिप्रेशन में था। उसे मामूली सजा दी गई थी। जर्मनी गोरे लोगों का देश है, सभ्य लोगों का देश है, वहाँ बलात्कारी के हर मनोभाव की पूरी जाँच होती है, तब जा कर सजा दी जाती है। हम लोग कौन हैं? हम लोग वो हैं जहाँ के न्यायालय का न्यायाधीश संदिग्ध परिस्थितियों में मारा जाता है, और न्यायालय कहता है सब ठीक है।

हम यह नहीं देख पा रहे कि कोई अल्पसंख्यक समुदाय का बच्चा आखिर क्या सोच रहा होगा जब उसने ऐसा किया होगा। आप देखिए कि कथित तौर पर उसने पूरी योजना बनाई कि वो कब आती है, कब जाती है, किस वाहन का उपयोग करती है। इसका मतलब है कि उसे अगर सही विद्यालय में रखा जाता, उसे तर्कशास्त्र पढ़ाया जाता, उसे योजना बनाने वाली बातें पढ़ाई जातीं तो वो बेहतरीन छात्र हो सकता था।

लेकिन आरिफ, नवीन, केशव, शिवा सब गरीब थे। और आप गरीब हैं तो आपको शिक्षा कहाँ मिलेगी! आपके लिए जो एक जगह थी, जेएनयू, वहाँ भी महीने के तीन सौ रुपए लिए जाएँगे! यही है सत्य इस सभ्य समाज का, इस देश का जहाँ विक्रम लैंडर ठीक से लैंड नहीं करा पाते इसरो वाले और उन पर करोड़ों ऐसे फूंका जाता है जैसे फ्री का पैसा हो। क्या वो पैसा जेएनयू जैसे संस्थानों को दे कर ऐसे योजनाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए नहीं दिया जा सकता था?

आप ये तो देखिए कि आरिफ ने बलात्कार कर के छोड़ा ही नहीं, उसे जलाया भी ताकि सबूत नष्ट हो जाए। इसका मतलब समझते हैं आप? इसका मतलब है कि उसका दिमाग सही तरीके से काम कर रहा था, वो सोच-समझ पा रहा था, उसमें काबिलियत थी कि उसे सही दिशा दी जाती, उसे जेएनयू जैसी जगहों पर रखा जाता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वो बहुत आगे जाता।

लेकिन मोदी, शाह और भाजपा ने जिस तरह की विषाक्त विचारधारा को लगातार हवा दी है, ऐसे भटके हुए नौजवान अंधेरे में मार दिए जाते हैं ताकि भविष्य में पुलिस के मुखिया को मोटा पद मिले। लेकिन, बात इतनी ही नहीं है, आप इन मानसिक रूप से विक्षिप्त प्रदेशवासियों को देखिए जो पुलिस की इस गुंडई पर उन्हें राखी बाँध रही हैं, फूल बरसा रही हैं, जिंदाबाद के नारे लगा रही हैं!

ये कैसा समाज है जो बलात्कार और हत्या के मासूम आरोपितों को मारने वाली गुंडा पुलिस पर पुष्पवर्षा कर रही है? हमारे मित्र शेखर गुप्ता, जो वरिष्ठ पत्रकार हैं, उन्होंने भी इसे माफिया-स्टाइल की हत्या कहा है। उन्होंने कहा है कि क्या आरोपितों को न्यायिक प्रक्रिया का लाभ मिला? उन्होंने पुलिस को आईसिस के बराबर रख कर पूछा है कि उनके कत्लेआम और इस हत्याकांड में क्या अंतर है?

अब कुछ आईटी सेल वाले, संघी ट्रोल, शेखर गुप्ता जैसे कद्दावर पत्रकार से यह सवाल पूछ रहे हैं कि उन्हें कैसे पता कि पुलिस मुठभेड़ सही नहीं है? कुछ लोग कह रहे हैं कि एक लोकतांत्रिक सरकार की अनुशासित पुलिस और आइसिस को बराबर मानना घटिया मानसिकता का परिचायक है। वो शेखर गुप्ता से पूछ रहे हैं कि उन्होंने जिस न्यायिक प्रक्रिया और जाँच का फायदा बलात्कारियों, मेरा मतलब है बलात्कार आरोपितों, को दिया है, वही ‘ड्यू प्रोसेस’ की बात पुलिस के लिए क्यों नहीं? वो कैसे जानते हैं कि पुलिस ने फ़र्ज़ी एनकाउंटर किया है?

ये सारे लोग संघी हैं। ये इसी तरह बड़े पत्रकारों को घेरते हैं, गाली-गलौज करते हैं सोशल मीडिया पर। इनके सवालों में कोई दम नहीं। शेखर गुप्ता ने इस देश को मिलिट्री तख्तापलट से बचाया है जब उन्होंने सेना द्वारा दिल्ली पर रातोंरात चढ़ाई की खबर को इंडियन एक्सप्रेस के मुखपृष्ठ पर छाप कर पूरा प्लान चौपट कर दिया था। शेखर गुप्ता हमारे पूजनीय होने चाहिए, मेरा वश चले तो अपने मैग्सेसे अवार्ड का थ्री-डी प्रिंट करवा कर उन्हें भेज दूँ, लेकिन आपको पता ही हिन्दी पत्रकार की इतनी औकात कहाँ कि वो अपने पैसे से फ़ोटोकॉपी भी करवा सके!

ये सारे लोग जो खुश हो रहे हैं, जो पुलिस पर वाहवाही की बौछार कर रहे हैं, एक बीमार मानसिकता के लोग हैं। मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि मेरी ही टीम के लगभग सारे लोग खुश हैं कि सही हुआ। लगता है मोदी और शाह ने कुँए में भाँग मिला दी है और सब नशे में झूम रहे हैं। मेरे सहयोगियों से मैंने पूछा कि वो क्यों खुश हैं तो वो कहने लगे कि अजित पवार को क्लीन चिट दे दी गई और वो खबर दब गई, इस बात पर खुश हैं। फिर मुझे विश्वास हुआ कि रवीश की टीम ने रवीश से दगाबाजी नहीं की है, वो अभी भी मेरे हैं, मेरे अपने…

आप देखिए कि कश्मीर से तेलंगाना तक मानवाधिकारों का हनन कैसे हो रहा है। पहले मुख्यमंत्री को विवाह का कार्ड दिया जाता है, फिर वहाँ भोजपुरी संगीत वाला डीजे बजाया जाता है, शोर मचाया जाता है, फिर पुलिस को ‘ऊपर’ से आदेश आता है कि हैदराबाद वाले कांड की त्वरित रिपोर्ट सौंपी जाए। पुलिस फोन मिलाती है, मुख्यमंत्री संगीत के शोर में फोन की घंटी सुन नहीं पाते। ‘ऊपर’ से दवाब बनता है, पुलिस आरोपितों को ले कर निकलती है, और बाकी क्या होता है, आपको पता ही है… इसलिए केसीआर पर बात करने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि कोई भी विवेकशील व्यक्ति ये जानता है कि ऐसे कार्रवाई सिर्फ भाजपा वाले ही करा सकते हैं।

केसीआर को आपने देखा है? उन्हें देख कर लगता ही नहीं कि उन्होंने कभी फोन रखा होगा, फोन कौन रखते हैं ये आप भी जानते हैं…

माहौल बनाया जा रहा है कि पब्लिक खुश है। पब्लिक तो लगातार भाजपा को वोट भी दे रही है, मेरे लाख बार समझाने के बाद भी, पत्रकारिता के दायरे से बाहर जा कर पाँच साल तक की स्टूडियो से कैम्पेनिंग के बाद भी मोदी को पहले से ज्यादा मतों से सत्ता दे दी… पब्लिक तो ऐसी है भारत की, ये किस बात पर खुश होते हैं, किस पर नहीं, अगर इसी को आधार बना दिया जाता तो मैं इतने सालों से प्रोपेगेंडा, सॉरी प्राइम टाइम और फेसबुक पर तीन-तीन किलोमीटर लम्बे पोस्ट लिखता रहता क्या? मुझे तो ये लोग टीवी समेत फेंक देते, लेकिन मेरी बात मानते कहाँ हैं!

एक समाज के तौर पर हम कहाँ जा रहे हैं? क्या पुलवामा में सीआरपीएफ के दस्ते को आरडीएक्स से उड़ा देना गुनाह है! क्या बुरहान वनी के के जनाजे में जाना कोई गुनाह है? या गुनाह यह है कि अहमद डार का बचपन में किसी अफसर ने कान उमेठा? या गुनाह यह है कि किसी हेडमास्टर के बेटे को आतंकवादी बनने को मजबूर होना पड़ा? क्या गुनाह यह है कि हैदराबाद की पशु चिकित्सक का बलात्कार करने के बाद, उसकी लाश से भी बलात्कार किया जाता है, फिर उसे जला दिया जाता है, या फिर गुनाह यह है कि वो चारों मासूम बच्चे पैसों की कमी की वजह से जेएनयू तक पहुँच नहीं पाए और किसी के स्कूटी के टायर की हवा निकाल दी…

अल्पसंख्यक वर्ग में शिक्षा का प्रतिशत पता कीजिए, पता चलेगा कि हम एक समाज के तौर पर कितने बेकार हो चुके हैं। आपने कैसा समाज दिया है जहाँ ये चार मासूम आज अपने मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए जिंदा नहीं बचे। आप याद कीजिएगा उन बड़ी ताकतों को जो पुलिस से ऐसे काम करवाती है। आप याद रखिएगा ऐसे समाज को जो इन हत्याओं का जश्न मना रही है। आप कहेंगे कि मैंने पीड़िता पर तो कुछ बोला ही नहीं। मेरा जवाब है कि वो तो काफी पहले चली गई, आज तो एक की जगह चार को मार दिया गया है। लोकतंत्र है, चार हत्याओं पर ज्यादा बात होनी चाहिए।

याद आ रहे हैं वेद प्रकाश शर्मा और याद आ रहा है निरहुआ दिनेश यादव जिसने ‘वर्दी वाला गुंडा’ लिखा, जिसने ‘वर्दी वाला गुंडा’ फिल्म बनाई। यही आज का सत्य है। मैं व्यथित हूँ।

NRC और CAB एक ही सिक्के के पहलू, बंगाल में लागू नहीं होने दूँगी: ममता बनर्जी

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) पर भी अपने विरोध का इजहार किया है। केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा है कि एनआरसी और कैब एक ही सिक्के के पहलू हैं। वे दोनों का पुरजोर विरोध करेंगी। साथ ही कहा कि पश्चिम बंगाल में कैब को भी लागू नहीं होने देंगीं।

ममता बनर्जी के अनुसार NRC और CAB का मुद्दा अर्थव्यवस्था में सुस्ती से ध्यान हटाने को लेकर उठाया गया है। उनका कहना है कि यदि सभी समुदाय के लोगों को नागरिकता दी जाएगी तो ही वे इसे स्वीकार करेंगे। लेकिन अगर धर्म के आधार पर भेदभाव होगा तो वे इसका विरोध करेंगी। ममता बनर्जी ने सभी पार्टियों से इस विधेयक का विरोध करने की अपील करते हुए कहा, “अगर मेरी जान भी चली जाए तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सीएबी को अंतिम दम तक स्वीकार नहीं करूँगी।”

उल्लेखनीय है कि सीएबी के मसौदे को कुछ संशोधनों के साथ कैबिनेट ने पास कर दिया है। इस विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर देश में रह रहे गैर मुस्लिम शरणार्थियों को बगैर वैध दस्तावेजों के भी भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। इसके अलावा इस विधेयक में भारत में निवास की अवधि की अनिवार्यता को भी 11 साल से घटाने का प्रस्ताव है।

साथ ही ममता ने मालदा में महिला को जलाकर मारे जाने की घटना स्वीकार की है। आज लोकसभा में जब केंद्रीय महिला बाल एवं विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जब मालदा का जिक्र किया तो टीएमसी के सांसद आपत्ति जताते हुए हंगामा करने लगे थे। ममता ने कहा कि मालदा की घटना की पुलिस जॉंच कर रही है। जलाने से पहले महिला के साथ रेप किया गया था या नहीं इस निष्कर्ष पर पहुॅंचने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया। उन्होंने कहा कि मैं महिलाओं के खिलाफ किसी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं करूॅंगी। मैंने आरोपित की तत्काल गिरफ्तारी और 3-10 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करने के निर्देश पुलिस को दे रखे हैं।

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‘न्यूट्रल पत्रकार’ राजदीप ने कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में अपनी पुस्तक को किया प्रमोट, दिया महाराष्ट्र पर लेक्चर

कॉन्ग्रेस पार्टी और देश के न्यूट्रल पत्रकारों के बीच जो परस्पर रिश्ता है वो बेहद ख़ास है। इनके बीच मधुर रिश्तों का लाभ निश्चित तौर पर कॉन्ग्रेस को मिलता रहता है। वहीं, न्यूट्रल पत्रकार भी अक्सर कॉन्ग्रेस पार्टी की चाटुकारिता करते नज़र आ ही जाते हैं। ऐसा ही कुछ न्यूट्रल पत्रकार राजदीप सरदेसाई करते नज़र आए। कॉन्ग्रेस पार्टी की अखिल भारतीय व्यावसायिक कॉन्ग्रेस (AIPC) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को उन्होंने अपनी पुस्तक
“2019 मोदी ने भारत को कैसे जीता” को प्रमोट करने के लिए चुना।

न्यूट्रल पत्रकार राजदीप सरदेसाई जो कि कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रति अपनी वफ़ादारी और नज़दीकियों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने AIPC द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में चर्चा की, जहाँ कॉन्ग्रेस प्रवक्ता संजय झा के अलावा और कोई मौजूद नहीं था। इस दौरान राजदीप सरदेसाई ने महाराष्ट्र की राजनीति पर भी बात की।

प्रतिभाशाली स्पिन-मास्टर, राजदीप सरदेसाई का कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके वरिष्ठ नेताओं के साथ बड़े मधुर और सौहार्दपूर्ण संबंध होने का इतिहास रहा है। राजदीप सरदेसाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के लिए 2002 की गोधरा की घटना का राजनीतिकरण करके कॉन्ग्रेस के प्रचार को प्रमोट करके पत्रकारिता क्षेत्र में क़दम रखे थे।

ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी न्यूट्रल पत्रकार ने कॉन्ग्रेस की चाटुकारिता करके ख़ुद को प्रमोट करने की कोशिश की हो। पिछले साल, ‘मुख्यधारा मीडिया के प्रख्यात, पत्रकार’, करन थापर ने अपनी पुस्तक को प्रमोट करने के लिए AIPC द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इस दौरान उन्होंने अपनी पुस्तक को प्रमोट करने के अलावा,  लोगों से AIPC में शामिल होने की अपील भी की थी।

दिलचस्प बात यह है कि करण थापर की पुस्तक को प्रमोट करने वाले वीडियो के अंत में, उनकी पिछली पुस्तक “न्यूज़मैन: ट्रैकिंग इंडिया इन द मोदी एरा” को प्रमोट करने के लिए राजदीप सरदेसाई ने बतौर अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

वर्षों से, राजदीप सरदेसाई कॉन्ग्रेस परिवार के प्रति वफ़ादार रहे हैं। इस साल फरवरी में, उन्होंने इंडिया टुडे टीवी में अपने एक शो के दौरान वाड्रा को बेगुनाह साबित करने पर तुले नज़र आए। उन्होंने अपने कार्यक्रम में यह दावा किया था कि लंदन में संबंधित सम्पत्तियाँ रॉबर्ट वाड्रा के नाम से पंजीकृत नहीं थी।

इस शो में वो यह कहते हुए नज़र आए कि लंदन की सम्पत्ति, वास्तविक मालिक के नाम पर पंजीकृत नहीं होने के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा किया गया। आधारभूत जानकारियों का अभाव और इस बात की पुष्टि की कि वाड्रा के नाम का उल्लेख सम्पत्ति के दस्तावेजों में नहीं है, इसलिए ईडी के द्वारा इस मामले को ग़लत तरीके से लक्षित किया जा रहा है, इसे सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा अनदेखा नहीं किया गया।

राजदीप सरदेसाई का दर्द उस समय भी छलका था जब केंद्र सरकार ने जस्टिस गौर को पीएमएलए का चेयरमैन नियुक्त किया था। केंद्र के इस फ़ैसले पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा था कि यही है असली कहानी क़िस्मत की। यह देखना बेहद आश्चर्यजनक लगता है कि राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार अपने आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी की ख़ूब बढ़चढ़ कर वाह-वाही करते हैं, और बिना किसी शर्म के हर दिन ख़ुद की न्यूट्रल छवि बनाए रखनी की जद्दोज़हद भी करते हैं।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के दौर में मुख्यधारा के मीडिया की विश्वसनीयता पहले ही काफी कम हो गई है। सोशल मीडिया के ज़माने में अब कुछ भी छिपा नहीं रह जाता। सोशल मीडिया के यूज़र्स अपनी खोजबीन करके राजदीप सरदेसाई जैसे न्यूट्रल पत्रकारों की पोल खोल कर रख देते हैं।

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बाँह चढ़ाकर मेरी ओर बढ़े कॉन्ग्रेस सांसद, सोमवार को देखूँगी: स्मृति ईरानी

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में अपने साथ हुई घटना पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा है कि सदन में कुछ पुरुष सांसद मेरी ओर बॉंह चढ़ाकर आए। उनमें से एक ने कहा कि स्मृति ईरानी बोल क्यों रही है? उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ उससे वे स्तब्ध हैं। क्या बीजेपी का सांसद होना उनकी गलती है। सोमवार को देखूॅंगी कि महिलाओं के हक में बोलने के लिए विपक्ष मुझे क्या सजा देता है।

उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को लोकसभा में कॉन्ग्रेस ने उन्नाव में दुष्कर्म पीड़िता को जलाए जाने का मामला उठाया था। इस दौरान कॉन्ग्रेस के दो सांसदों टीएम प्रतापन और डीन कोरियाकोस पर स्मृति ईरानी के साथ अभद्रता करने का आरोप भाजपा ने लगाया है। भाजपा ने बिना शर्त माफी की मॉंग की है।

संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि कॉन्ग्रेस सांसदों का धमकी भरे अंदाज में ईरानी के सामने जाकर अपनी बात कहना गलत है। दोनों को इसके लिए बिना शर्त माफी माँगनी चाहिए। कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जब यह मामला हुआ उस समय वह सदन में नहीं थे और उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है। वह सदस्यों से बात करेंगे। वहीं ईरानी की पीछे वाली सीट पर बैठी भाजपा की संगीता देव ने कहा कि कांग्रेस के दोनों सांसद आस्तीन चढ़ाकर मारने के अंदाज में महिला एवं बाल विकास मंत्री के पास आए थे।

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि ईरानी के बोलने के दौरान कॉन्ग्रेस के कुछ सांसदों ने जैसे हरकत की वह निंदनीय है और उन्हें इसके लिए माफी मॉंगनी चाहिए। इससे पहले उन्नाव का मामला उठाते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि आज हम एक तरफ राम मंदिर बनाने वाले हैं, दूसरी तरफ देश में ‘सीताएं’ जलाई जा रही हैं। जवाब में ईरानी ने कहा कि बलात्कार जैसी घटनाओं पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इस मुद्दे पर ईरानी और कांग्रेस के कुछ सदस्यों के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। ईरानी ने इसका जवाब देते हुए विपक्षी सांसदों से कहा कि आप यहॉं मुझ पर चिल्ला रहे हैं। इसका मतलब है कि आप एक महिला के साथ खड़ा नहीं होना चाहते और न ही मुद्दे पर बात करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में जब पंचायत चुनाव के दौरान विरोधियों को चुप कराने के लिए रेप का इस्तेमाल राजनैतिक तौर पर किया गया तब आप चुप थे।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार ईरानी ने कहा कि आज बंगाल के एक सांसद यहॉं मंदिर का नाम ले रहे थे। हैदराबाद-उन्नाव की घटना के बारे में बोल रहे थे। लेकिन, मालदा पर क्यों चुप्पी साध कर बैठे हैं। मालदा का जिक्र होते ही विपक्षी सदस्यों ने हॅंगामा शुरू कर दिया। टीएमसी के सदस्यों ने पूछा कि बताइए क्या हुआ? जवाब में ईरानी ने कहा कि बंगाल का अखबार पढ़िए। मालदा में रेप को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

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डांस बंद करने पर महिला के मुँह पर चलाई गोली: डांसर की हालत गंभीर, Video वायरल

उत्तरप्रदेश के चित्रकूट में एक विवाह समारोह के दौरान नाचने आई महिला डांसर पर गोली चलने की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। वीडियो में देखा जा सकता है कि महिला अपनी साथी डांसर के साथ स्टेज पर डांस कर रही है और उनके पीछे बहुत तेज आवाज में गाने चल रहे हैं। समारोह में बहुत लोगों ने दोनों महिलाओं को घेरा हुआ है और बार-बार उनसे नाचते रहने की बात कर रहे हैं।

इस वीडियो के बीच में सुना जा सकता है कि कुछ लोग बार-बार महिलाओं से कह रहे हैं कि अगर नाच रुका तो गोली चल जाएगी। जिसे सुनकर पहले तो दोनों महिला डांसर नाचती रहती हैं, लेकिन तभी गाने में रुकावट आती है और दोनों रुककर पीछे देखने लगती हैं। इतने में वीडियो में आवाज आती है “सुधीर भैया, आप गोली चला ही दो।” जिसके बाद तुरंत फायरिंग होती हैं और गोली जाकर महिला डांसर के मुँह पर लगती है। डांसर लहू-लुहान हो जाती है और वहीं बैठ जाती है। बाद में महिला को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जाता है और अज्ञात के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज होती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये वीडियो 1 दिसंबर को गाँव के मुखिया सुधीर सिंह पटेल की बेटी की शादी का है। जहाँ घटना के दौरान दूल्हे के मामा-चाचा भी स्टेज पर थे और फायरिंग के कारण वे भी घायल हो गए।

जानकारी के मुताबिक इस मामले में लड़के के चाचा राम प्रताप ने अज्ञात के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई है। अब पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है। वहीं, महिला डांसर की हालत गंभीर हैं और उसका कानपुर के एक अस्पताल में इलाज जारी है। पुलिस का कहना है कि उन्होंने गोली चलाने वाले शख्स की पहचान कर ली है।

यहाँ बता दें, इसी तरह की घटना साल 2016 में पंजाब के बठिंडा से भी आई थी। जब एक शादी में जश्न मनाने के दौरान एक 25 वर्षीय महिला डांसर की मौत हो गई थी। डांसर का नाम कुलविंदर कौर था, जो घटना के समय गर्भवती थी और जिसने पेट में गोली लगने के कारण मौक़े पर ही दम तोड़ दिया था।

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