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JNU में आपत्तिजनक नारे लिखने वाले 7 छात्रों की हुई पहचान, पुलिस ने दर्ज की FIR

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) कैंपस में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के संबंध में दिल्ली पुलिस ने दस छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज किया है। एफआईआर जेएनयू कैंपस में गुंडागर्दी और जानबूझकर संपत्ति का नुकसान करने के लिए संपत्ति संरक्षण अधिनियम की धारा 3 के तहत दर्ज की गई है।

यूनिवर्सिटी ने कैंपस को खराब करने वाले उपद्रवी के खिलाफ दो शिकायतें दर्ज की थी। बता दें कि उपद्रवियों ने गुरुवार (नवंबर 14, 2019) को स्वामी विवेकानंद की मूर्ति को तोड़ दिया था, जिसका उद्घाटन होना बाकी था। स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को बदरंग करते हुए उसके पेडेस्टल पर अपशब्द भी लिखे थे। “भगवा जलेगा”, “Fu&^% BJP” आदि को लाल रंग के पेंट से लिखकर पेडेस्टल को कुरूप बना दिया था।

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार (नवंबर 15, 2019) को पहली शिकायत दर्ज की थी। स्वामी विवेकानंद प्रतिमा समिति के अध्यक्ष बुद्ध सिंह ने शनिवार को अज्ञात लोगों के खिलाफ प्रतिमा को नुकसान पहुॅंचाने को लेकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने इस मामले की जॉंच भी शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, अब तक मामले में सात छात्रों की पहचान की जा चुकी है। हालॉंकि नामों का खुलासा नहीं किया गया है।

इस बीच एक वीडियो सामने आया है जिसमें छात्र ‘आज़ादी’ का नारा लगाते हुए दिख रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो जेएनयू कैंपस का है। हालाँकि ऑपइंडिया इस वीडियो के प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

जेएनयू कैंपस में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के साथ की गई बर्बरता की तस्वीर वैज्ञानिक, लेखक और JNU में मॉलिक्यूलर मेडिसिन के प्रोफ़ेसर आनंद रंगनाथन ने ट्विटर पर शेयर की थी। इसके बाद लोग बिफर उठे थे। लोगों ने आनंद रंगनाथन की पोस्ट को रीट्वीट कर कम्युनिस्टों को कोसना शुरू कर दिया। लोगों ने JNU को बंद करने की भी माँग की। एक यूज़र ने कहा था कि भाजपा इन गुंडों के साथ कुछ ज़्यादा ही नरमी से पेश आ रही है।

कॉन्ग्रेस राज में दलित की पिटाई, पेशाब पीने को किया मजबूर: दोनों पैर काटने पड़े फिर भी नहीं बची जान

इस महीने की शुरुआत में पंजाब के संगरूर जिले में एक 37 वर्षीय दलित युवक की बेरहमी से पिटाई की थी। उसे पेशाब पीने को मजबूर किया गया था। शनिवार को इस युवक की अस्पताल में मौत हो गई। इस घटना से दलित बेहद आक्रोशित हैं। स्थानीय लोगों ने SDM कार्यालय संगरूर के बाहर प्रदर्शन किया। विपक्षी दलों ने राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर इस घटना को लेकर निशाना साधा है।

शिअद प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि कांग्रेस सरकार में दलितों से बर्बर बर्ताव किया जा रहा है। भाजपा नेता तरूण चुघ ने कहा है कि दलित मौजूदा शासन में खुद को महफूज नहीं मान रहे। पंजाब राज्य के अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य पूनम कांगड़ा ने घटना के बारे में बताया कि इस मामले को संज्ञान में ले लिया गया है। उन्होंने कहा कि वो पुलिस के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करेंगे।

संगरूर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) संदीप गर्ग ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि पीड़ित ने स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (PGIMS) में दम तोड़ दिया। उन्होंने यह भी बताया कि घायल व्यक्ति का इलाज करने के लिए डॉक्टर्स को उसके पैर तक काटने पड़ गए थे। वहीं, डॉक्टर्स ने बताया कि मांस को किसी नुकीली चीज नोचने के कारण पीड़ित के पैर में इन्फेंक्शन हो गया था। इसलिए पैर काटना ज़रूरी हो गया था।

दैनिक जागरण के अमृतसर संस्करण में प्रकाशित खबर

ख़बर के अनुसार, चांगलीवाल गाँव निवासी दलित युवक की 21 अक्टूबर को रिंकू और उसके कुछ साथियों से किसी बात को लेकर विवाद हो गया था। तब ग्रामीणों के हस्तक्षेप से मामला शांत हो गया था। उसने पुलिस को बताया था कि सात नवंबर को रिंकू ने उसे अपने घर बुलाया और उसने इस मामले को लेकर उससे बहस की। चार लोगों ने उसे पकड़ खंभे से बाँध दिया और फिर उसकी जमकर पिटाई की। पीड़ित ने जब उनसे पीने लिए पानी माँगा, तो उसे पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया।

पुलिस ने बताया कि चारों आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और उनके ख़िलाफ़ अपहरण, ग़लत तरीके से बंदी बनाने और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत संगरूर के लेहरा पुलिस स्टेशन में मामला किया गया है। आरोपितों की पहचान रिंकू सिंह, अमरजीत सिंह, लक्की व बिंदर के रूप में हुई है।

मृतक की पत्नी मनजीत कौर का कहना है कि आरोपितों ने उसके पति के बेरहमी से पिटाई की। अमानवीय व्यवहार किया गया, इससे पति की जान चली गई। पुलिस आरोपितों के ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई करे और मृतक के परिजनों को इंसाफ़ दे।

पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने पूरे प्रकरण को लेकर संगरूर के SSP से रिपोर्ट माँगी है। आयोग की अध्यक्ष तेजिंदर कौर ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से इस घटना की जानकारी मिलने के बाद आयोग ने इस मामले में स्वत: संज्ञान में लेते हुए रिपोर्ट माँगी है।

बगदादी और ओवैसी में फर्क नहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर लगना चाहिए बैन: शिया वक्फ बोर्ड के प्रमुख

भड़काऊ बयानों को लेकर शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने सांसद असदुद्दीन ओवैसी की तीखी आलोचना की है। उन्होंने ओवैसी की तुलना खूॅंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के सरगना रहे अबू बकर अल बगदादी से की है। बगदादी को हाल ही में अमेरिका ने मार गिराया था। रिजवी ने ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर प्रतिबंध लगाने की मॉंग भी की है।

रिजवी ने कहा, “ओवैसी और बगदादी में कोई अंतर नहीं है। बगदादी आतंक फैलाने के लिए आतंकियों, हथियार और गोला-बारूद का इस्तेमाल करता था, जबकि ओवैसी अपनी जुबान के जरिए आतंक फैलाने का काम करते हैं। वह मुस्लिमों को आतंकी गतिविधियों और खून-खराबे के लिए उकसाते हैं। ऐसे गंभीर माहौल में ओवैसी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए।” ओवैसी ने कहा था कि 9 नवंबर को अयोध्या भूमि विवाद पर आया सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ‘क़ानून पर विश्वास की जीत’ है और वह ‘अपनी मस्जिद वापस चाहते हैं’।

रिजवी ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सर्वश्रेष्ठ निर्णय बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में इससे बेहतर निर्णय नहीं देखा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ओवैसी को छोड़कर इस निर्णय से सभी संतुष्ट हैं। ऐसे में इन दोनों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

अयोध्या मामले में फैसले के बाद ओवैसी ने कहा था, “सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) है, लेकिन वह अचूक नहीं है। मैं इस फैसले से संतुष्ट नहीं हूँ। हमें संविधान पर पूरा विश्वास है। हम अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे। हमें दान में दी गई पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए।” इस बयान के बाद 11 नवंबर को वकील पवन कुमार यादव ने भोपाल के जहाँगीराबाद पुलिस स्टेशन में ओवैसी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। 

उल्लेखनीय है कि वसीम रिजवी ने इससे पहले भी AIMIM अध्यक्ष के बयान को निशाने पर लेते हुए कहा था कि ओवैसी जैसे नेता समाज में नफरत फैलाने का काम करते हैं। उन्होंने ओवैसी के बयान पर तंज कसते हुए कहा था कि सिर्फ मुस्लिमों में नफरत पैदा करने के लिए इस तरीके के बयान दिए जा रहे हैं कि खैरात नहीं ली जा सकती और हिंदुओं का पैसा मस्जिद में नहीं लग सकता है। उन्होंने कहा था कि ओवैसी जैसे नेताओं के ऐसे बयानों का ध्येय सिर्फ नफरत को बढ़ावा देना और देश के मुस्लिमों को अलग-थलग करने की साजिश है।

बता दें कि वसीम रिजवी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए 51 हजार रुपए देने की भी घोषणा कर चुके  हैं। गुरुवार (नवंबर 14, 2019) को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में रिजवी ने कहा कि बोर्ड ने मंदिर का समर्थन किया है। रिजवी इससे पहले मंदिर निर्माण के लिए 10 हजार रुपए दान कर चुके हैं।

BHU के हिन्दू धर्म फैकल्टी में आज फिरोज खान घुसे हैं, कल विश्वनाथ मंदिर से ‘मजहबी गान’ भी बजेगा

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी या काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एक आंदोलन चल रहा है। इस आंदोलन की लोगों को खबर भी नहीं है, क्योंकि काशी दिल्ली में नहीं है और उसे जवाहरलाल नेहरू या उनके खानदान के चिरागों ने नहीं बनवाया था। काशी से खबरें तो चलीं लेकिन उन खबरों से वह मूल मुद्दा गायब था, जिसके कारण वहाँ के छात्र धरना और प्रदर्शन कर रहे हैं।

मुद्दा यह है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में, जो कि AMU की तर्ज पर ‘अल्पसंख्यक’ या ‘मजहबी’ सीमाओं में बँधा नहीं है, एक फैकल्टी या संकाय है जिसका नाम है संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय। इसके अलावा इसी विश्वविद्यालय में लगभग हर विषय से जुड़े संकाय और विभाग हैं, जिसमें उनकी समुचित शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था है।

यहाँ सिर्फ इस फैकल्टी के एक विभाग को छोड़ कर किसी भी दूसरे विभाग या संकाय में शिक्षकों या विद्यार्थियों के लिए किसी भी तरह की मनाही नहीं। फिर सवाल यह है कि किसी एक विभाग में भी यह मनाही क्यों है कि वहाँ हिन्दुओं या हिन्दुओं के अंग-प्रत्यंगों (सनातनी, आर्यसमाजी, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि) के अलावा किसी का भी प्रवेश वर्जित है?

महाविद्यालय का ‘यह भवन’, यानी पूरा महाविद्यालय नहीं, बस एक भवन सिर्फ हिन्दुओं के लिए है

वहाँ के छात्र उसका कारण बताते हैं। कारण यह है कि यह विभाग उन विषयों के अध्ययन-अध्यापन के लिए बना है जो हिन्दू धर्म से जुड़े कर्मकांड से ले कर उसके वैज्ञानिक पक्ष एवम् सनातन हिन्दू परम्पराओं, वेद, वेदांग, ज्योतिष की व्याख्या और निष्पादन की पूरी धार्मिक प्रक्रिया आदि पर आधारित है। यहाँ से निकले हुए बच्चे हिन्दू आस्था के केन्द्रों में, वहाँ के मंदिरों में पुरोहित बनते हैं, समाज में कर्मकांड, पूजा-पाठ आदि से ले कर तिथि-पंचांग की समुचित व्याख्या करते हैं और हिन्दू धर्म की केन्द्रीय बातों में अगाध श्रद्धा रखते हैं।

अब प्रश्न आता है कि कोई समुदाय विशेष वाला वेद-वेदांग क्यों नहीं पढ़ा सकता? उत्तर यह है कि यह विभाग सिर्फ वेद-वेदांग के लिए ही नहीं है, यह विभाग पूरे विश्व में हिन्दू धर्म से जुड़ी हर बात, हर सवाल का जवाब देने हेतु उत्तरदायी है। यह धर्म विज्ञान से जुड़ी व्यवस्था है और यहाँ के द्वारों पर शिव और पार्वती की मूर्ति है जिसे प्रणाम किए बगैर शिक्षक या विद्यार्थी घुसते तक नहीं। एक तरह से विश्वविद्यालय परिसर में यह एक मंदिर है, जहाँ प्रविष्ट होने से ले कर बैठने, पढ़ने, सुनने और बोलने तक के लिए तय नियम हैं जो कि हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धा न रखने वालों के लिए नहीं है।

जिसे वेद पढ़ना है, वो कहीं और जा कर पढ़े और बाँचे। उसमें समस्या नहीं है। BHU के ही कला संकाय के अंतर्गत संस्कृत भाषा पढ़ाने के लिए संस्कृत विभाग में मजहब विशेष के प्रोफेसरों की नियुक्ति को लेकर किसी भी तरह की वर्जना नहीं है। संस्कृत एक भाषा है, जिसे कोई भी सीख सकता है, पढ़ सकता है, पढ़ा सकता है। संस्कृत धर्म नहीं है, लेकिन हिन्दू धर्म है, और उसकी एक विशिष्ट तरीके से पढ़ाई होती है, तो वहाँ सेकुलर होने के नाम पर यह मिलावट अनुचित है।

आप इसे इस आलोक में समझिए कि मस्जिदों में अजान देने, कुरान की शिक्षा देने, मदरसों में शरीयत पढ़ाने या मुल्ला-मौलवी-इमाम बनाने की शिक्षा देने की जगह में किसी हिन्दू प्रोफेसर को भेजा जाए। क्या इस देश में ऐसी व्यवस्था है जहाँ इस्लामी मजहबी तरीकों को समाज में बाँचने वाले मौलवियों को तैयार करने की शिक्षा हिन्दू दे रहा हो?

बीएचयू की स्थापना के समय इस संकाय के लिए शिलापट्ट पर नियम लिखे गए थे जिसमें लिखा हुआ है कि ‘यह भवन सिर्फ हिन्दुओं और हिन्दुओं के अंग-प्रत्यंगों’ के प्रयोग के लिए है। मूल भावना बस यही थी कि जिसकी श्रद्धा होगी, वही अपने श्रद्धा की पूर्णता में, न कि सिर्फ विषय ज्ञान के आधार पर, शिव-पार्वती की मूर्तियों को प्रणाम करते हुए अध्ययन-अध्यापन की शुरुआत करेगा और हिन्दू धार्मिक परम्पराओं के हर निर्दिष्ट नियम को मानते हुए शिक्षण काल को पूरा करेगा।

अब सवाल यह है कि जो मजहब विशेष से है, उसकी श्रद्धा हिन्दू धर्म में कैसे हो जाएगी? अगर वह मूर्तियों को प्रणाम करने लगे तो वो बुतशिकन से बुतपरस्त हो जाएगा और अपने ही मजहब से नकार दिया जाएगा। जिसकी परवरिश एक तय तरीके से हुई है, वो अचानक से उस संकाय में प्रोफेसर बना दिया जाए जो पूरे विश्व में हिन्दू धर्म और आस्था पर उठते सवालों या शंकाओं का निवारण करता है? आप मुझे एक उदाहरण दिखा दीजिए कि किसी इस्लामी संस्थान में हिन्दू प्रोफेसर शरीयत पढ़ाकर मौलवी तैयार कर रहा हो!

साथ ही, मतलब इससे भी नहीं है कि कौन क्या कर रहा है, मतलब इससे है कि बीएचयू में आए जेएनयू वाले उपकुलपति कह रहे हैं कि वो आज के समय के हिसाब से चलेंगे और बीएचयू को सेकुलर तरीके से चलाएँगे। किसी उपकुलपति के सेकुलर शब्द की समझ इतनी संकीर्ण हो सकती है, यह देख कर ही पता चलता है कि वहाँ के विद्यार्थियों में विरोध की भावना क्यों है।

क्या सेकुलरिज्म के नाम पर मजहब विशेष के लिए झटका मांस खाने का आदेश दे दिया जाए? या फिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का नाम काशी मु##म विश्वविद्यालय इसलिए कर दिया जाए कि सौ साल से ‘हिन्दू’ रहा नाम में, अगले सौ साल ‘मु#म’ रहने दो, समाज में अच्छा संदेश जाएगा? सेकुलर की व्याख्या यह नहीं है कि दूसरे धर्म में दख़लंदाज़ी की जाए, बल्कि सेकुलर की व्याख्या यह है कि हर धर्म, मजहब, रिलीजन की अपनी मान्यताएँ हैं जिनका हर दूसरे धर्म, मजहब, रिलीजन के लोग सम्मान करें।

इस वीसी के लिए, जबरदस्ती से संदेश देने की कुलबुलाहट ही सेकुलरिज्म है। वीसी ‘आज के समय’ से चलने की बात करते हुए बीएचयू के संविधान को परे रख कर चलने लगे हैं। कुछ बच्चे कह रहे हैं कि वीसी राकेश भटनागर स्वयं को सरकार मानते हैं। हमारे रिपोर्टर ने जब बीएचयू जा कर छात्र-छात्राओं और प्रोफेसरों से बात की तो पता चला कि डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति अतिविशिष्ट तरीके से हुई है।

इनके साथ के जो अभ्यर्थी थे, जिनके बारे में बाकी शिक्षकों का दावा है कि बेहतर थे, उन्हें दस में से शून्य और दो की बीच ही अंक दिए गए, जबकि डॉ. फिरोज खान की हिन्दू धर्म, वेद-वेदांग की व्याख्या की क्षमता इतनी बेहतरीन थी कि उन्हें दस में दस अंक मिले। अब, जब किसी को दस में दस मिलते हैं, तो जाहिर सी बात है कि वो विलक्षण प्रतिभा का धनी होगा।

जब इस पर बवाल हुआ तो स्थानीय मीडिया ने इसे सहजता से ‘वो बनाम हिन्दू’ वाले मोड में मोड़ दिया कि फिरोज खान को ये श्लोक याद हैं, वो तो भजन भी गाते हैं, उनके पिता ये बजाते थे, और उनको संस्कृत के ज्ञान है आदि। बात यह है कि इस संकाय में ही संस्कृत विभाग है और उसमें मजहब विशेष के प्रोफेसर के होने पर किसी को आपत्ति नहीं है, बात यह है कि आज ये पहला प्रोफेसर उस दूसरे विभाग में घुसाया जा रहा है, जो कि सिर्फ हिन्दुओं के लिए है, फिर कल को वहाँ का डीन, विभागाध्यक्ष कोई मजहब विशेष से बनेगा, और बाद में पता चलेगा कि रामनवमी मनाने के नए तरीके में अजान देना भी एक आवश्यक क्रिया है।

प्रश्न यह नहीं है कि फिरोज खान से दिक्कत क्या है, प्रश्न यह है कि धर्म विज्ञान संकाय में फिरोज खान की जरूरत क्या है? ये जबरदस्ती हो ही क्यों रही है? क्या देश में सेकुलरिज्म के नाम पर कम मिलावट हो रही है जो हिन्दू आस्था के मूल पर ही चोट की जा रही है? एक तरफ इस्लाम है, और उसके समर्थक हैं, जिन्हें हलाल तंत्र पर ही विश्वास है कि वो अब चश्मा भी हलाल ही पहन रहे हैं, और दूसरी तरफ मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाने के बाद, जब आज के दौर में वैसी तोड़-फोड़ संभव नहीं तो इस तरह की घुसपैठ कराई जा रही है ताकि धर्म के केन्द्र ही प्रदूषित कर दिया जाए!

यहाँ सेकुलर भावुकता दिखाने की जरूरत नहीं है। यहाँ इससे भी मतलब नहीं कि मुल्ला, मौलवी और इमाम कैसे बनाए जाते हैं, हलाल तंत्र में एक भी दूसरे मजहब का होना उस वस्तु को हराम कर देता है, मतलब इससे है कि क्या सेकुलरिज्म के नाम पर काशी विश्वनाथ मंदिर में कोई मुल्ला शिव का अभिषेक करवाएगा? क्या सेकुलरिज्म के नाम पर गायत्री मंत्र की जगह मंदिरों से अजान भी पढ़वाई जाए?

ये बेहूदगी हो ही कैसे रही है? इस पर चर्चा क्यों हो रही है कि हिन्दू धर्म विज्ञान संकाय में इस ख़ास मजहब का जाएगा ही तो क्या हो जाएगा? मंदिरों से अजान पढ़ने और गंगा घाट पर आरती की जगह इसी समुदाय के दस हजार लोगों को नमाज पढ़ने से भी कुछ नहीं होगा, क्योंकि आपकी मति भ्रष्ट हो चुकी है। आपके लिए ‘क्या हो जाएगा’ एक क्षणिक प्रश्न है जहाँ शिवलिंग पर मजहब विशेष द्वारा आयतें पढ़ते हुए जलाभिषेक किसी पत्थर पर कुछ बोलते हुए पानी डालने जैसा ही है। आपके लिए ‘यार नमाज ही तो पढ़ रहा है, किसी के कुछ पढ़ने से क्या हो जाएगा’ बहुत सामान्य बात है लेकिन हिन्दू धर्म विज्ञान आप जैसे मूढमतियों और कूढ़मगजों के लिए नहीं है, इसलिए इस पर चर्चा करना बेकार है।

प्रश्न यह नहीं है कि ‘क्या हो जाएगा’, प्रश्न यह है कि ‘क्यों होगा ऐसा, आवश्यकता क्या है?’ क्या तय नियमों के हिसाब से न चलने की कोई मजबूरी है या फिर वीसी का जेएनयू वाला वामपंथी मिजाज हिलोरें मार रहा है कि जहाँ जाओ उसे बर्बाद करने की पूरी कोशिश करो? इसी संकाय के एक छात्र ने अपने विभागाध्यक्ष के बारे में बताया कि फिरोज खान को यहाँ घुसाने के पीछे की सारी सेटिंग प्रोफेसर उमाकांत चतुर्वेदी की है जिनके बारे में पैसे ले कर नियुक्तियॉं करने की बातें प्रचलित हैं। साथ ही, डॉ. फिरोज खान उसी जयपुर कैम्पस से आते हैं, जहाँ चतुर्वेदी पाँच साल कार्यरत थे। चतुर्वेदी जी के छात्र बताते हैं कि वो 15 मिनट की बातचीत में आपको अपनी धनलोलुपता का परिचय दे देंगे। इस पर पूरी बात यहाँ इस ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़ें।

मामले को ऐसे भावुक रंग दिया जा रहा है कि एक दूसरे समुदाय से संस्कृत पढ़ाना चाह रहा है, भजन गाता है और लोग इसे बेमतलब का ‘हिन्दू-मु##म’ रंग दे रहे हैं। लेकिन ऐसा मानने वाले बस कमरे में बैठ कर ऐसा मान रहे हैं। उन्होंने उन छात्रों से बात नहीं कि जो बार-बार कह रहे हैं कि हर जगह संस्कृत के शिक्षक मु##न हैं, और भाषा या भाषा विज्ञान पढ़ाने वालों के मजहब से किसी को कोई आपत्ति नहीं लेकिन जहाँ बात धर्म की है, वहाँ सौ सालों की परंपरा और नियम में यह मिलावट क्यों की जा रही है?

शिक्षा सिर्फ किताब और कलम ही नहीं है। शिक्षा कमरे में बैठ कर, श्यामपट्ट पर खरिया रगड़ते शिक्षक की बातें रटना ही नहीं है। अध्ययन और अध्यापन के मायने संदर्भ में बदलते रहते हैं। यहाँ संदर्भ यह है कि यह संकाय सिर्फ भाषाई शिक्षा का केन्द्र नहीं है, यह धार्मिक आस्था का मसला है जिसे आप कुतर्कों से झुठला नहीं सकते। इसे आप फर्जी ‘हिन्दू-मु##न’ और ‘सर्वसमावेशन’ के नाम पर सामान्यीकृत नहीं कर सकते।

यहाँ के छात्र-छात्राएँ हिन्दुओं की परम्पराओं, कर्मकांडों, ज्योतिष विद्या, धार्मिक अनुष्ठानों और धर्म विवेचना, धर्मग्रंथों की व्याख्या आदि कार्यों के लिए बाह्य समाज में जाते हैं और इस सनातन धर्म के लिए कवच सदृश हैं। अगर आज इसकी जड़ में ही मिलावटी पोषण दिया जा रहा है, तो बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा कि बगल के काशी विश्वनाथ मंदिर में इसी सेकुलरिज्म के नाम पर लाउडस्पीकर से ‘अल्लाहु अकबर’ की आवाज आएगी।

राम मंदिर का काम पूरा, जनसंख्या नियंत्रण का कानून बन जाए तो राजनीति से संन्यास ले लूॅं: गिरिराज सिंह

अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने फिर से जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाने की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि यह कानून बनने के बाद वे राजनीति को अलविदा कह देंगे। बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट से बीजेपी के सांसद और केंद्रीय पशुपालन मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, “अयोध्या में राम मंदिर स्थापना का मेरा काम तो पूरा हो गया है। मेरे जैसे लोगों के लिए अब राजनीति से अलविदा लेने का वक्त आ गया है। खासकर, जनसंख्या नियंत्रण का काूनन बन जाए तो मैं राजनीति से अपने को अलग कर लूॅंगा।”

शनिवार (नवंबर 16, 2019) को बिहार के कटिहार में पूर्व सांसद निखिल चौधरी के घर पहुँचे गिरिराज सिंह ने पत्रकारों से बात करते हुए ये बातें कहीं। गिरिराज सिंह हमेशा से राष्ट्रवाद, राम मंदिर और जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनाने का मुद्दा प्रमुखता से उठाते रहे हैं।

जब उनसे मुख्यमंत्री बनने को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ना तो वो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और न ही उनकी काबिलियत है। उन्होंने कहा, “जहाँ तक मेरा मुख्यमंत्री बनने का सवाल है। ना मैं मुख्यमंत्री का उम्मीदवार हूँ और ना ही मेरी काबिलियत है। मैं यहाँ (राजनीति में) विधायक या सांसद बनने नहीं आया था। मैं तो ‘जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है’ और अयोध्या में राम मंदिर के सपने के साथ आया था। दोनों काम पूरा हो गया है। अब मेरे जैसे लोगों का राजनीति से अलविदा लेने का समय आ गया है।”

इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए जेएनयू, देश विरोधी ताकतों के सिर उठाने और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी। जेएनयू में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति तोड़े जाने को लेकर उन्होंने अवॉर्ड वापसी गैंग और टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ कई राजनीतिक पार्टियों को देश विरोधी ताकतों के साथ खड़ा होने के लिए जमकर लताड़ा।

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विवेकानंद की प्रतिमा को नुकसान पहुँचाने के सवाल पर गिरिराज ने कहा, “अब कहाँ है अवॉर्ड वापसी गैंग और टुकड़े-टुकड़े गैंग। अरविंद केजरीवाल हों, कम्यूनिस्ट पार्टी हो चाहे कॉन्ग्रेस पार्टी, आज सबकी जुबान बंद है। जिन लोगों ने तोड़ा है वो बच नहीं पाएँगे और ऐसे लोगों को देश देख रहा है।”

99% मुस्लिम कन्वर्टेड हैं, राम उनके लिए भी पूज्य हैं: स्वामी रामदेव

योगगुरु रामदेव ने कहा है कि भगवान राम ना सिर्फ हिंदुओं के लिए बल्कि मुस्लिमों के लिए भी पूज्य हैं, क्योंकि देश के 99 प्रतिशत मुस्लिम धर्मांतरित हैं। इसके अलावा बाबा रामदेव ने अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद देशवासियों द्वारा जिस तरह से इस फैसले को स्वीकार किया गया है, उसकी भी तारीफ की। रामदेव ने कहा कि अयोध्या में बनने वाला मंदिर भव्य और भारतीय संस्कृति को परिलक्षित करने वाला होना चाहिए।

बाबा रामदेव ने इंडिया टुडे टीवी को दिए इंटरव्यू में यह बात कही। उन्होंने कहा, “भगवान राम केवल हिन्दुओं के ही नहीं, बल्कि मुस्लिमों के लिए भी आदरणीय हैं। मुस्लिमों का मजहब अलग हो सकता है, लेकिन पूर्वज हमारे एक ही हैं। डीएनए हमारा एक ही है और मैं प्रमाणिकता के साथ इस बात को कहता हूँ कि 99% हिंदुस्तान के जितने भी मेरे मुस्लिम भाई हैं, उनमें मैं अपना ही स्वरूप देखता हूँ, क्योंकि वो सब कनवर्टेड मुस्लिम हैं।”

स्वामी रामदेव ने अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डेभाल के आवास पर धर्म गुरुओं की हुई बैठक का हवाला भी दिया। उन्होंने कहा कि वहॉं देश के कम से कम 15-20 बड़े और प्रतिष्ठित मुस्लिम नेता थे। उन्होंने भी मेरी बातों का समर्थन किया। बकौल रामदेव मुस्लिम नेताओं ने कहा कि वे इस बात से 100% सहमत हैं कि हमारे पूर्वज एक हैं और हमारा डीएनए एक ही है।

रामदेव ने आगे कहा कि कोई भी देश, कोई भी समाज, कोई भी मजहब अपने पूर्वज को गौरव देता है। मुस्लिमों को भी अपने पूर्वजों को गौरव देना चाहिए और साथ ही राम मंदिर निर्माण में सहयोग करना चाहिए। इसमें दुर्भावना की कोई बात नहीं है। रामदेव ने कहा कि मुस्लिम लोगों ने चाहे जिस भी कारण से अपना मजहब बदला हो, अब उस गड़े मुर्दे को उखाड़ने से कोई फायदा नहीं है। लेकिन मुस्लिम लोग भी अपने ही भाई हैं।

उन्होंने मस्जिद निर्माण में हिन्दुओं के सहयोग की बात करते हुए कहा कि मुस्लिम भाई भी अपनी इबादत कर रहे हैं, तो उनके अंदर भी हिन्दू भाई हाथ बँटाए। इससे अयोध्या में भाईचारे की एक नई मिसाल कायम हो सकती है। उन्होंने कहा कि वो इसको लेकर आशान्वित हूँ। राम मंदिर पर आए फैसले पर उन्होंने कहा, “मैं इसे राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य में देख रहा हूँ। जैसे ईसाइयों के लिए वेटिकन सिटी और मुस्लिमों के लिए मक्का है, वैसे ही हिन्दुओं के लिए अयोध्या में राम मंदिर को एक मुख्य तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।” सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सांसद असदुद्दीन ओवैसी के बयान पर टिप्पणी करते हुए बाबा रामदेव ने कहा, “ओवैसी की हमेशा नकारात्मक सोच रही है और वह घृणा से भरे हुए हैं। वह हिन्दू और मुस्लिमों के बीच झगड़ा पैदा करने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता शांति और एकता बनाए रखने की है।”

उल्लेखनीय है कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया। जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन रामलला को इसलिए दी, क्योंकि मुस्लिम पक्ष जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को दी है। इसके लिए कोर्ट ने केंद्र से तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने के लिए कहा है।

17/11/2012 ठहर गई थी मुंबई, 17/11/2019 अटकी है बाल ठाकरे के बेटे की सॉंसें

वह 2012 का 17 नवंबर था जब पूरी मुंबई ठहर गई थी। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के निधन का समाचार सुनते ही कभी न रुकने वाले महानगर गुमसुम हो गया था। लेकिन, यह 2019 का 17 नवंबर है। बाल ठाकरे के बेटे और मौजूदा शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की सॉंसें अटकी हुई है और मुंबई हमेशा की तरह अपने रफ्तार से भाग रही है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी शिवसेना के साथ सरकार बनाने को लेकर अब भी तैयार नहीं हैं। एनसीपी के मुखिया शरद पवार के साथ उनकी होनी वाली मुलाकात इस संबंध में निर्णायक साबित हो सकती है। रविवार को पुणे में पवार अपनी पार्टी के नेताओं से चर्चा करने वाले हैं। इसके बाद वे दिल्ली आएँगे और सोमवार को उनकी मुलाकात सोनिया से हो सकती है।

यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब पिछले दिनों कहा गया था कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लेकर शिवसेना, राकांपा और कॉन्ग्रेस के बीच आम सहमति बन गई है। इसके मुताबिक शिवसेना अपने हिंदुत्व के एजेंडे से पीछे हटते हुए कथित अल्पसंख्यकों को 5 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण देने और वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मॉंग से पीछे हटने को तैयार भी हो गई थी। सत्ता के समझौते के कथित मसौदे के मुताबिक शिवसेना को मुख्यमंत्री की कुर्सी और 16 मंत्री पद मिलने थे, वहीं एनसीपी को 14 और कॉन्ग्रेस के 12 विधायकों को मंत्री बनना था।

शिवसेना बाल ठाकरे की पुण्यतिथि पर सरकार गठन करना चाहती थी। लेकिन, सोनिया के बदले रुख ने आखिरी वक्त में उसकी पूरी योजना खटाई में डाल दी। इधर, एनडीए से औपचारिक रूप से शिवसेना का बाहर जाना करीब-करीब तय हो गया है। पार्टी सांसद संजय राउत ने कहा है कि संसद के 18 नवम्बर से शुरू होने वाले शीतकालीन सत्र से पहले रविवार को दिल्ली में होने वाली राजग घटक दलों की बैठक में उनकी पार्टी की तरफ से कोई शामिल नहीं होगा। एनसीपी की मॉंग पर शिवसेना अपने मंत्री को मोदी कैबिनेट से पहले ही इस्तीफा दिलवा चुकी है। राउत ने यह भी कहा है कि पार्टी चाहती है कि उनके अध्यक्ष उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।

बावजूद इसके शिवसेना की अड़चनें दूर होती नहीं दिख रही। गौरतलब है कि 21 अक्टूबर को हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने को 56 सीटें जीती थी। 288 सदस्यीय सदन में सबसे अधिक 105 सीटें भाजपा को मिली थी। कॉन्ग्रेस ने 44 और एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की थी। शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन नतीजों के बाद वह ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मॉंग पर अड़ गई थी। इसे ठुकराते हुए भाजपा ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। भाजपा को कई निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी है। महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल 119 विधायकों का समर्थन होने की बात कह चुके हैं।

अब घुप्प अंधेरे में भी लक्ष्य भेद सकेगा अग्नि-2 मिसाइल: रात के समय हुआ सफल परीक्षण

भारत ने शनिवार (नवंबर 16, 2019) को ओडिशा के बालासोर में अग्नि-2 मिसाइल का रात्रिकालीन परीक्षण किया। इसकी मारक क्षमता 2000 किलोमीटर की है। स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड ने एपीजे अब्दुल कलाम आइलैंड पर इस परीक्षण को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। आपको बता दें कि अग्नि-2 का सफल परीक्षण पिछले वर्ष ही हुआ था लेकिन ये पहली बार है जब इसका रात के समय परीक्षण किया गया है। इसकी मारक क्षमता को बढ़ा कर 3000 किलोमीटर किया जा सकता है।

अग्नि-2 मिसाइल के बारे एक और ख़ास बात यह है कि ये परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। डीआरडीओ ने मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस का रात में अरेस्टेड लैंडिंग का परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया था। लगभग 2 महिने पहले ही दो सीट वाले एलसीए तेजस का गोवा के आईएनएस हंसा में पहली बार सफलतापूर्वक अरेस्टेड लैंडिंग कराई गई थी। एजेंसी ने इसके बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि ये टेक्स्टबुक लैंडिंग है।

जहाँ तक अग्नि मिसाइल की बात है, इसे 2004 में ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल कर लिया गया है। यह 15 वर्षों से वायुसेना को अपनी सेवाएँ दे रहा है। ये ज़मीन से ज़मीन तक मार करने वाली आधुनिक मिसाइल है। अग्नि-2 एक टन तक परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम है। इसे डीआरडीओ की एडवांस सिस्टम लेबोरेटरी ने तैयार किया है। इसकी लम्बाई लगभग 20 मीटर होती है।

अग्नि को इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के अंतर्गत डिजाइन किया गया है। सटीक निशाने पर जाकर काम करने के लिए इसमें हाई-एक्यूरेसी नेविगेशन सिस्टम का प्रयोग किया गया है। अब रात्रिकालीन सफल परीक्षण के बाद अग्नि-2 ने एक नई कामयाबी हासिल की है।

भंग हो सकता है शिया व सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड: हाईकोर्ट ने कहा- अपना रुख स्पष्ट करे सरकार

क्या शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ख़त्म हो जाएगा? अगर इलाहबाद हाईकोर्ट के ताज़ा आदेश की बात करें तो ऐसा ही लगता है। हालाँकि, कोर्ट ने इस सम्बन्ध में कोई फ़ैसला नहीं लिया है लेकिन यूपी और केंद्र की सरकारों से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सरकार से पूछा है कि दोनों वक़्फ़ बोर्डों को मिला कर एक मुस्लिम बोर्ड बनाने को लेकर उसके क्या विचार हैं? कोर्ट ने एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए ऐसा कहा। इस पीआईएल में दोनों वक़्फ़ बोर्डों को भंग कर एक मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड बनाने की बात कही गई है।

जस्टिस पंकज कुमार जायसवाल और जस्टिस आलोक माथुर ने कहा कि वो फ़िलहाल इस मामले में कोई फ़ैसला नहीं ले रहे हैं। याचिकाकर्ता मसर्रत हुसैन ने वक़्फ़ एक्ट का हवाला देते हुए अदालत से इन दोनों ही बोर्डों को मिला कर एक बोर्ड बनाने के सम्बन्ध में आदेश देने के लिए निवेदन किया। इस एक्ट में कहा गया है कि दो ही परिस्थितियों में शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की व्यवस्था की जा सकती है। पहली, प्रदेश में शिया वक्फ की कुल संख्या कुल वक़्फ़ का 15% या इससे अधिक हो। दूसरी, वक़्फ़ों की सम्पत्तियों व उनसे होने वाली आय में शिया वक़्फ़ का हिस्सा 15% या उससे ज्यादा हो।

याचिकाकर्ता ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ये दोनों ही परिस्थितियों नहीं हैं और इसीलिए दोनों ही वक़्फ़ बोर्डों को भंग कर दिया जाना चाहिए। उसने कहा कि इस सम्बन्ध में केंद्र और राज्य सरकारों को लिखे जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं आया है। बता दें कि मुस्लिमों में शिया और सुन्नी, दोनों के ही तौर-तरीके अलग हैं। सुन्नी मुस्लिमों में तीन प्रमुख पंथ होते है- बरेलवी, देवबंदी और अहले हदीस। अयोध्या में मस्जिद के लिए 5 एकड़ ज़मीन दिए जाने के बाद भी इस पर बहस शुरू हो गई है कि ये मस्जिद किस पंथ का होगा, शिया या सुन्नी?

हालाँकि, फिलहाल तो कोर्ट ने दोनों बोर्डों को भंग किए जाने की याचिका के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी करने से इनकार किया है लेकिन भविष्य में दोनों सरकारों का जवाब आते ही अदालत इस सम्बन्ध में आगे की सुनवाई करेगी।

देशद्रोही ओवैसी, भारत छोड़ो: BJP विधायक के बयान के बाद लोगों ने कहा- हमें 30000 मंदिर वापस चाहिए

असदुद्दीन ओवैसी के बयान को लेकर राजनीति तेज़ हो गई है। भारत में अलग-अलग हिस्से से लोगों ने ओवैसी के बयान के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के कुछ ही दिनों बाद ओवैसी ने ट्विटर पर लिखा कि उन्हें उनकी मस्जिद वापस चाहिए। उनके इस बयान पर लोगों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हिन्दुओं को भी 30,000 मंदिर वापस चाहिए, जिन्हें तोड़ कर इस्लामिक आक्रांताओं ने मस्जिदें बनाईं। कई लोगों ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का अपमान के रूप में देखा। लोगो ने ओवैसी पर हिन्दुओं के ख़िलाफ़ घृणा फैलाने और मुस्लिम कट्टरवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने कहा कि हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी दूसरे जाकिर नाइक बन रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर ओवैसी इसी तरह बोलते रहे तो देश में क़ानून-व्यवस्था भी है जो अपना काम करेगा। बाबुल सुप्रियो के इस बयान के बाद लोगों ने पूछा कि अगर असदुद्दीन ओवैसी लगातार बयानबाजी कर रहे हैं तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? ओवैसी ने विरोध के बावजूद अपना ट्वीट डिलीट नहीं किया है और वो अपने बयान पर कायम हैं।

तेलंगाना में भाजपा के फायरब्रांड नेता राजा सिंह ने भी ओवैसी के इस बयान का विरोध किया है। राज्य में भाजपा के एकलौते विधायक ने कहा कि ओवैसी भड़काऊ बयानों के जरिए माहौल बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद मस्जिद के लिए दी गई 5 एकड़ ज़मीन को खैरात बताया था। ओवैसी ने कहा था कि वो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। राजा सिंह ने कहा कि राम मंदिर के ख़िलाफ़ बयान देने वाले ओवैसी पर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए।

विधायक राजा सिंह ने ‘ओवैसी, भारत छोड़ो’ का नारा देते हुए कहा कि उनकी तरह मानसिकता रखने वाले सभी लोगों को देश से बाहर जाना चाहिए। कई अन्य लोगों ने भी उनका समर्थन किया। इसके बाद ट्विटर पर ‘ओवैसी भारत छोड़ो’ का ट्रेंड भी चलने लगा।