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पाकिस्तानी सेना ने इमरान खान से झाड़ा पल्ला, कहा- आजादी मार्च से हमारा नहीं लेना-देना

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान  के नेतृत्व में आजादी मार्च में शामिल प्रदर्शनकारी उनके इस्तीफे पर अड़े हुए है। इस मुश्किल वक्त में उस सेना ने भी उनका साथ छोड़ दिया है जिसकी वे कठपुतली माने जाते हैं। पाकिस्तानी सेना ने बुधवार (6 नवंबर) को कहा कि इस संकट से सरकार को उबारने के लिए वह मध्यस्थता नहीं करेगी। सेना ने साफ शब्दों में कहा है कि आज़ादी मार्च एक राजनीतिक गतिविधि है और सेना का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

डॉन की ख़बर के अनुसार, सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने एक निजी चैनल से कहा कि सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने पहले ही राजनीतिक नेताओं को एक प्रणाली तैयार करने और एक ऐसा माहौल बनाने का प्रस्ताव दिया था जो चुनावों में सेना की भूमिका को समाप्त कर सके।

राजनीति और चुनाव में सेना के हस्तक्षेप को लेकर उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना ने हमेशा कानून और संविधान के मुताबिक, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों का समर्थन किया है। हमारी जिम्मेदारियॉं हमें किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने की अनुमति नहीं देते हैं। गौरतलब है कि पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने सेना की बढ़ती भूमिका पर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बीते साल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया था।

मेजर जनरल गफूर ने कहा कि सेना चुनावों में तभी सम्मिलित होती है जब सरकार द्वारा संविधान के तहत सहायता के लिए अपेक्षित हो। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि संविधान हमें कोई भूमिका देता है या हमें इसकी ज़रूरत है। यह हमेशा सरकार का निर्णय होता है। अन्य पार्टियों का भी इनपुट है। सेना की इस मामले में कोई भूमिका नहीं है।”

सैन्य प्रवक्ता ने JUI-F सिट-इन द्वारा बनाई गई राजनीतिक स्थिति को परिभाषित करने में सेना की किसी भी भूमिका को उन्होंने ख़ारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “Sit-in एक राजनीतिक गतिविधि है। एक संस्था के रूप में सेना की न तो उसमें कोई भूमिका है और न ही अतीत में होगी…यह मामले से निपटने के लिए सरकार और विपक्ष के लिए है। यह उनका डोमेन और उनका काम है। ”

सेना ने आजादी मार्च को समाप्त करने में रूचि दिखाने से ऐसे वक्त में इनकार किया है जब इमरान के तख्तापलट को लेकर अटकलें लगाई जा रही है। हाल ही में संडे गार्डियन की रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तानी सेना अब इमरान ख़ान की जगह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी को देश का प्रधानमंत्री बनाने की योजना पर काम कर रही है।

ऐसा देखा जा रहा है कि हर परिस्थिति में पाकिस्तान का साथ देने वाला चीन का भी इमरान खान पर से भरोसा हटता जा रहा है। इमरान के इस्तीफे की माँग को लेकर कराची से इस्लामाबाद तक होने वाले ‘आजादी मार्च’ से भी यह साफ हो रहा है कि इमरान खान अब सभी तरफ से (मतलब जनता भी त्रस्त है, वो जिन्होंने उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुँचाया) अपना समर्थन खो रहे हैं।

राम सारे संसार के भगवान, इंशाअल्लाह हिंदुओं के हक में आएगा अयोध्या का फैसला: बाबर का वंशज

बाबर के वंशज और मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के परपोते याकूब हबीबुद्दीन उर्फ़ प्रिंस तुसी ने भरोसा जताया है कि अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हिंदुओं के हक में आएगा। न्यूज़ एक्स मीडिया चैनल से बातचीत में तुसी ने इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की दावेदारी खारिज करते हुए कहा कि वह किसी तरह से भी पक्षकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर इस विवाद पर अदालत का फैसला बाबर (मंदिर तोड़कर मस्जिद खड़ी करने वाले) के पक्ष में आता भी है तो यह बात 100 प्रतिशत सच है कि हम यह ज़मीन भारत सरकार को सौंप देंगे। तुसी ने बताया कि बाबर और मुग़ल वंश के बाद अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कंपनी ने इस ज़मीन के मालिकाना हक़ पर कब्ज़ा कर इसे हथिया लिया था। ईस्ट इण्डिया कंपनी के बाद अब इस ज़मीन को भारत सरकार को दे दिया जाना चाहिए।

प्रिंस ने कहा “मुझे लगता है कि अदालत का फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आएगा। यह सिर्फ हिन्दू या हिंदुस्तान का नहीं, बल्कि आस्था का मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर विचार करेगा, क्योंकि भगवान राम सिर्फ हिन्दुओं के नहीं बल्कि पूरे संसार के भगवान हैं। फैसला जो भी आए हम सभी को उसे स्वीकार करना होगा।”

तुसी ने कहा कि आस्था को देखते हुए अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आता है तो वहाँ (विवादित स्थल पर) एक भव्य राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले का सम्मान करने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि इस्लामिक कानून के मुताबिक दूसरे समुदाय को वहाँ मस्जिद बनाने की इजाज़त ही नहीं है। इस इंटरव्यू में विवादित ज़मीन पर तुसी के उत्तराधिकार के दावे को लेकर भी सवाल किया गया। इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि 16वीं शताब्दी में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने संभवतः एक मंदिर को तोड़कर वहाँ पर मस्जिद बनवाई थी, एएसआई पहले ही इस बात को प्रमाणित कर चुका है।

उन्होंने कहा “यह भूमि एक प्राइवेट प्रॉपर्टी है। प्राइवेट प्रॉपर्टी पर मुस्लिम या उसके संगठन दावा नहीं ठोक सकते। इस सम्बन्ध में वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में कानूनी कागजात भी पेश नहीं कर सका है।” साक्षात्कार में तुसी ने बताया कि भारत के राष्ट्रपति से अपनी भेंट के दौरान उन्होंने कहा था कि बाबर एक सेक्युलर शासक था, जबकि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने में उसके सेनापति मीर बाकी का हाथ था। तुसी ने कहा कि इस्लाम दूसरे धर्मों का आदर करने की शिक्षा देता है। इस मामले में अदालत का फैसला आने से पूर्व दोनों ही सम्प्रदायों हिन्दुओं और मुस्लिमों को तुसी ने फैसला स्वीकार करने के साथ शांति बनाए रखने की अपील की है।

बता दें कि तुसी अपने पूर्वजों की गलती के लिए पूरे हिन्दू समाज से माफ़ी भी माँग चुके हैं। वे अक्सर राम जन्मभूमि को लेकर दिए अपने बयानों के चलते चर्चाओं में रहते हैं। कुछ ही वक़्त पहले उन्होंने कहा था कि अगर राम मंदिर बना तो सबसे पहली ईंट वे खुद रखेंगे

जब साधु-संतों पर इंदिरा सरकार ने चलवाई गोलियाँ, गौ भक्तों के खून से लहूलुहान हो गई थी दिल्ली

गौ रक्षा आधुनिक हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक रहा है। किंवदंती है कि मुगलों का दार उल इस्लाम उखाड़ फेंकने वाले मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने ‘कैरियर’ की शुरुआत एक मुस्लिम कसाई का वध करके की थी, जब वह एक गाय की हत्या करने जा रहा था। सावरकर हालाँकि वैसे तो ईश्वरीय, परा-प्राकृतिक सत्ता को लेकर संशयवादी/नास्तिक थे, लेकिन जीवित गाय से प्राप्त होने वाले गौ-उत्पादों (पंचगव्य- दूध, घी, दही, गोबर और गौमूत्र) के वैज्ञानिक महत्व और लाभ, और गायों के साथ भारतीय जनमानस के भावनात्मक और आस्था के जुड़ाव के चलते वे भी गौ-रक्षा के समर्थक थे। भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों, Directive Principles of State Policy, में भी गायों के संवर्धन और रक्षण की बात कही गई है।

लेकिन इतने सब के बावजूद गौ रक्षक और गौ भक्त इस देश के सबसे अपमानित समूहों में से हैं, इस पर कोई दोराय नहीं हो सकती। कभी भारत में बैठकर रिपोर्टिंग करने वाली विदेशी रिपोर्टर फ़ुरक़ान खान “गौमूत्र पीने वालों, अपना गौमूत्र वाला धर्म छोड़ दो, आधी समस्याएँ दूर हो जाएँगी” की नसीहत दे कर चलीं जातीं हैं, क्योंकि पता है भारत सरकार घंटा कुछ करेगी। कभी आदिल डार गौमूत्र पीने वाले काफ़िरों को सबक सिखाने के लिए वीडियो संदेश छोड़कर पुलवामा हमला करता है, ताकि उन्हें पता चल जाए उनका क्या हाल होने वाला है। लिबरल गिरोह में जिसे लगता है कि किसी हिन्दू से कोई ट्विटर बहस वह हारने वाला है, वह ‘गौ भक्त’, ‘गौ रक्षक गुंडे’ और ‘गौमूत्र पीने वाले’ का तमाचा मार कर ब्लॉक कर देता है- क्योंकि हमारे खुद के नेता ही गौ रक्षकों को गाय की हत्या से रक्षा करने की भावना रखने भर से गुंडा घोषित कर देते हैं।

यह कोई 2014 या 2016 में पैदा हुई बीमारी नहीं है- आज़ादी के बाद से इस देश के नेता हमेशा ही गौ भक्तों को हिकारत भरी नज़रों से ही देखते रहे हैं, भले ही वे नेतागण अपने निजी जीवन में हिन्दू रीति-रिवाजों का नियमपूर्वक पालन करने वाले क्यों न हों, भले ही वे जनता से गाय-बछड़े का चुनाव चिह्न लगाकर वोट क्यों न बटोर रहे हों। ऐसे नेताओं में अग्रणी नाम भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में गिनी जाने वालीं (लिबरल गिरोह के हिसाब से तो नंबर 1), ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गाँधी का है।

आज से 53 साल पहले आज ही के दिन (7 नवंबर, 1966 को; विक्रम संवत में कार्तिक शुक्ल अष्टमी, जिसे गोप अष्टमी भी कहते हैं) इंदिरा गाँधी की सरकार ने निहत्थे साधु-संतों के नेतृत्व में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की
लोकतान्त्रिक तरीके से माँग कर रहे 3 से 7 लाख की भीड़ पर गोली चलवाई, आँसू गैस के गोले छोड़े, लाठियाँ बरसवाईं। यानी, दमन के वह सभी हथियार जनता को दोबारा चखने को मिले जिनको ब्रिटिश छोड़ कर गए थे, और जिनसे मुक्ति के सब्ज़बाग दिखाकर इन्हीं कॉन्ग्रेसी नेताओं ने आम आदमी को आज़ादी की लड़ाई में जोता था।

इस प्रदर्शन के आयोजक थे राजनीतिक ज़मीन तलाशता दिवंगत हो चुके श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारतीय जन संघ, मदन मोहन मालवीय और सावरकर के बाद किसी नए उद्धारक की आस देख रही हिन्दू महासभा (सावरकर ने उसी साल फरवरी में आमरण अनशन से प्राण त्यागे थे), आर्य समाज के नेता, विश्व हिन्दू परिषद और सनातन धर्म सभा नामक 1952 में बना संगठन।

संसद भवन के बाहर उन्हें रोक दिया गया और साधु-संतों ने अंदर बैठे सत्ताधीशों को निशाने पर लेकर इकठ्ठा भीड़ को सम्बोधित करना शुरू कर दिया। इसके पहले काफ़ी समय से माँग की जा रही थी कि संविधान के उन हिस्सों, जिन पर अमल करना सरकार के लिए जरूरी नहीं, से गौ-रक्षा को सरकार असली, ठोस नीति के रूप में कानून की शक्ल दे। इसको लेकर आंदोलन नेहरू के समय से चल रहा था और कॉन्ग्रेस के भीतर भी इसके समर्थकों की कमी नहीं थी। लेकिन मोहनदास करमचंद गाँधी की विरासत की दावेदारी से सत्ता पाने वाले जवाहरलाल नेहरू के आगे आवाज़ें घुटी हुईं थीं।

1965 में इस आंदोलन को हवा मिलनी शुरू हुई थी और देश के तीन शंकराचार्यों ने भी इस आंदोलन को अपने आशीर्वचन दे दिए थे। इसके बाद देश भर में विरोध-प्रदर्शन से लेकर भूख हड़तालें शुरू हो गईं थीं।

पहले तो इंदिरा गाँधी ने नई-नई सत्ता की अकड़ में मीडिया से कह दिया कि वे ऐसी किसी माँग के आगे नहीं झुकेंगी, लेकिन 7 नवंबर आते-आते ऐसा लगने लगा था कि वे जनभावना के सम्मान में नरम पड़ सकती हैं। आखिरकार 7 नवंबर को रैली हुई, और इस रैली के पीछे की भावनाओं को अगर और कुछ नहीं तो इस बात से समझा जा सकता है कि इसे उस तारीख तक दिल्ली में आज़ाद भारत की सबसे बड़ी रैली माना जाता है। इसमें वे नग्न नगा साधु भी शामिल हुए, जो आम तौर पर समाज से दूर रहते हैं, जो अपने पास आने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं को भी दौड़ा कर दूर भगा देते हैं। The Spokesman नामक अखबार के अनुसार इस रैली में कुल 15,000 के आस-पास तो केवल साधु-संन्यासी ही थे। अन्य रिपोर्टों में इसके अलावा बड़ी संख्या में औरतों और बच्चों के भी होने की बात कही जाती है।

उस समय तक शांतिपूर्वक चल रही रैली की भीड़ तब उत्तेजित हो गई जब पता चला कि भारतीय जनसंघ के सांसद स्वामी रामेश्वरानंद को “अगरिमापूर्ण आचरण” के आरोप में संसद से धक्के मारकर निकाल दिया गया है।

इसके बाद भीड़ को गुस्सा आ गया और भीड़ की उत्तेजना के जवाब में पुलिस ने लाठियाँ भांजनी, गोलियाँ चलानी और आँसू गैस के गोले दागने शरू कर दिए। बाद में विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने वाले चम्पत राय उस रैली में बतौर बीएससी के एक छात्र मौजूद थे। वे बताते हैं कि उस समय संयोगवश मंच पर अटल बिहारी वाजपेयी नामक वही आदमी भाषण दे रहा था, जो युवावस्था में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत को अंतिम संदेशवाहक था और बाद में भारत का ‘अजातशत्रु’ कहलाने वाला प्रधानमंत्री बना।

इसमें मरने वालों की संख्या पर बहुत विवाद है- सरकारी आँकड़े जहाँ महज़ 7 या 8 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारते हैं (और 500 से अधिक लोगों के अस्पताल में भर्ती होने की बात अगले ही दिन एक अखबार में छपी थी)। संघ विचारक केएन गोविंदाचार्य इस आँकड़े को 200 से ज्यादा बताते हैं। कुछ दक्षिणपंथी संगठनों का दावा है कि असल में 5000 से अधिक लोगों ने जान गँवाई थी, और उन्हें बिना निशान की कब्रों में सरकार ने दफन करा दिया (पत्रकारिता का समुदाय विशेष इसे ‘WhatsApp यूनिवर्सिटी’ से निकला आँकड़ा बताता है) टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इस घटना के अगले ही दिन छपी रिपोर्ट में पुलिस के 209 राउंड फायरिंग की बात कही गई थी।

अपने “इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” अंदाज़ में इंदिरा गाँधी ने बाद में संसद में इस प्रदर्शन को अपनी सरकार नहीं, देश और पूरे लोकतान्त्रिक सिद्धांत के ही खिलाफ बताने का फतवा जारी कर दिया। साथ ही तत्कालीन गृह मंत्री (और दो बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री का ओहदा संभाल चुके गौ-हत्या विरोधी) गुलज़ारी लाल नंदा का इस्तीफा ले लिया।

चूँकि उन दिनों इंटरनेट नहीं था, तो शायद ही यह पता चले कि असल में कितने लोग मरे थे, या पहले भीड़ ने हिंसा की (जैसा कि मिंट आदि का लिबरल गैंग दावा करता है), या अंग्रेजी शासन का खुमार नहीं भूली पुलिस ने अपनी राजनीतिक आका को खुश करने के लिए ‘यस बॉस’ कर हमला बोल दिया था। लेकिन इस घटना से यह तो साफ़ पता चलता है कि भारतीय सत्ता हिन्दू-विरोध की बुनियाद पर बने सेक्युलरिज़्म नामक सिद्धांत की वाहक ‘सेक्युलरासुर’ हमेशा से रही है। गौ रक्षकों को उस समय भी अपमान, हिंसा, हत्या के अलावा कुछ नहीं मिलता था।

गलती शायद हिन्दुओं की ही है- अगर गोप अष्टमी के दिन साधुओं के नेतृत्व के जनसमूह पर गौ रक्षा के मुद्दे पर वही शासक हमला कर दे, जनता रक्षक होना जिसका प्राकृतिक धर्म है, और गौ रक्षक होने का जो खुद ही को निर्देश देता है, तो नियति का इशारा उसी दिन समझ जाना चाहिए था कि गौ रक्षकों, गौ भक्तों के तो अच्छे दिन नहीं ही आने वाले हैं।

आतंकियों की हमदर्द माहिरा खान बाँटेगी शरणार्थियों की पीड़ा: एंबेसडर से यूएन की गुडविल ही न हो जाए चौपट

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियॉं गुडविल एंबेसडर यानी सद्भावना दूत नियुक्त करती रहती हैं। जाने-पहचाने चेहरों को यह जिम्मेदारी दी जाती है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सकारात्मक संदेश पहुॅंचाने में मदद मिले। लेकिन, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की नई गुडविल एंबेसडर के बॉयो पर जरा गौर फरमाइए।

पुलवामा के आतंकी हमले पर उनके होंठ सिल जाते हैं, लेकिन बालाकोट में आतंकी कैंपों पर एयरस्ट्राइक को वह बेहूदा बताती हैं। वह बॉलीवुड से ‘रईस’ बनती हैं। हिंदी फिल्म के अभिनेता के साथ विदेश में मस्ती कर सुर्खियॉं बटोरती हैं। पाबंदी लगने पर कहती हैं- मैं तो खुद ही छोड़ आई वो गलियॉं। कश्मीर में आतंकवाद से निपटने और आम लोगों की सुरक्षा के लिए मोदी सरकार की ओर से एहतियातन उठाए कदमों पर वह कहती हैं ‘
जन्नत जल रही है…’।

यूएनएचसीआर की नई सद्भावना दूत से अब आप शायद परिचित हो गए होंगे। ये हैं पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान। खुद को गुडविल एंबेसडर चुने जाने की जानकारी देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया में यूएन का आभार भी जताया। उनके जिम्मे वही काम होगा जिसके लिए यूएन ने कुछ साल पहले इस्लामिक स्टेट के आतंकियों की सेक्स स्लेव रही 23 साल की नादिया मुराद बासी ताहा को चुना था। मानव तस्करी की शिकार लोगों और खास तौर पर महिलाओं और लड़कियों की पीड़ा के बारे में जागरूकता फैलाना।

माहिरा ने ट्विटर पर लिखा है कि यूएन का एंबेसडर बनना उनके लिए सम्मान की बात है। वे इस बात पर गर्व करती हैं कि उनकी मातृभूमि पाकिस्तान ने पिछले 40 साल से रिफ्यूजियों के लिए अपनी बाहें खोली हुई हैं।

गुडविल एंबेसडर चुनने के लिए यूएन ने बकायदा गाइडलाइन तय कर रखी है। अमूमन ऐसे लोगों का चुनाव किया जाता है जिन्होंने अपने काम से मुकाम हासिल किया हो। जिनकी शख्सियत ही संदेश देने का काम करती हो। कला, साहित्य, विज्ञान, मनोरंजन, खेल आदि क्षेत्रों से चुने जाने वाले ऐसे लोगों का काम दूसरे समुदाय, समाज के बीच सद्भावना बढ़ाना होता है। चुनौतियों से निपटने के लिए जागरूकता पैदा करना इनकी जिम्मेदारी होती है।

इस कसौटी पर माहिरा का अब तक का सफर देखते हुए सवाल उठना लाजिमी है कि उनका चुनाव कर यूएन क्या संदेश देना चाहता है? माहिरा की खासियत है कि वो पाकिस्तान और अपने मजहब से जुड़े मुद्दों पर लगातार बोलती हैं। लेकिन आतंकवाद पर चुप्पी साध लेती हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार उन्हें नहीं दिखाई पड़ता। अहमदिया समुदाय के अधिकार की उन्हें फिक्र नहीं है। एक काम जो वे बखूबी करती हैं वह है मौका मिलते ही भारत के खिलाफ जहर उगलना।

न्यूजीलैंड में मस्जिद पर हुए हमले पर गहरा दुख व्यक्त करने वाली माहिरा पुलवामा के समय ट्विटर पर लाइव होने की सूचना दे रही थी, उनकी पूरी टाइमलाइन पर इस हमले को लेकर कोई जिक्र नहीं था। लेकिन जब आईएएफ ने बालाकोट स्थित आतंकी कैंपों पर अपनी कार्रवाई की, तो उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखा और कहा कि इससे बेहूदा कुछ नहीं है।

इसके बाद जब पाकिस्तान के न सुधरने वाले रवैये पर भारत ने वहाँ के कलाकारों को अपने देश में बैन किया था, तब भी माहिरा ने अपने प्रतिक्रिया देते हुए साफ किया था कि उन्हें इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि उनका ध्यान पहले से ही अपने मुल्क पर था। कश्मीर से आर्टिकल 370 के निष्प्रभावी पर भी उन्होंने जहर उगलने में कंजूसी नहीं की थी। उन्होंने कहा था कि भारत का यह फैसला निर्दोषों के लिए जान गँवाने जैसा है। ट्वीट किया, “जन्नत जल रही है और हम आँसू बहा रहे हैं।”

माहिरा खान UNHRC द्वारा शेयर की गई एक वीडियो में कहती नजर आ रही हैं कि पाकिस्तान ने पिछले 40 सालों में शरणार्थियों की मेजबानी करके पूरे विश्व में एक उदाहरण कायम किया है। लेकिन, गौर करने वाली बात है कि माहिरा हमेशा अपने देश में अल्पसंख्यकों के साथ होते अत्याचार पर चुप रही हैं। उन्होंने कभी प्रशासन से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जुटाई कि आखिर उनके देश में हिंदुओं, सिखों की हालत इतनी दयनीय क्यों है? आखिर क्यों उनके देश में अहमदियों से मुस्लिम बनने का तमगा छीन लिया गया? आखिर क्यों बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में लोग उनकी सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर आंदोलन कर रहे हैं और क्यों आवाज उठाने वाले लोगों से लेकर एक दिमागी रूप से कमजोर चोर तक को उनके प्रशासन द्वारा मार दिया जा रहा है?

माहिरा ऐसी गुडविल एंबेसडर हैं जिन्हें अपने मुल्क में पनप रहा आतंक नहीं दिखता। वे कश्मीर में सुरक्षा बढ़ाए जाने को जेल बनाना समझती हैं और लिखती हैं, “जो लोग कश्मीर को जेल बनाने पर आमदा हैं और खुशी मना रहे हैं, उन्हें अपने दिल में झांक कर देखना चाहिए। आपको ऐसा करने पर कश्मीर में परेशान हो रहे लोगों के लिए सहानभूति महसूस होगीl कश्मीर एक बार फिर खुले जेल की तरह हो गया है।”

माहिरा जैसों से तो दिल की सुनने और दिल में झॉंक कर देखने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उम्मीद यूएन से है कि वह अपने गुडविल का ध्यान रखे। ऐसा न हो कि शरणार्थियों का दर्द भी कम न हो और उसकी साख को भी बट्टा लग जाए।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के मंच पर दिखा पूर्व IAS गोपीनाथन: आर्टिकल 370 हटाए जाने पर दिया था इस्तीफा

पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने एक कट्टरपंथी इस्लामी छात्र संगठन के कार्यक्रम में शिरकत की। यह संगठन हिन्दुस्तान और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने के लिए जाना जाता है। गोपीनाथन वही अधिकारी हैं, जिसने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ नौकरी से इस्तीफा दे दिया था।

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में बुधवार को ‘डिकेड ऑफ़ डिगनिटी’ नामक कार्यक्रम का आयोजन कट्टर इस्लामिक संगठन कैम्पस फ्रंट ऑफ़ इंडिया (सीएफआई) की ओर से किया गया था। सीएफआई विवादित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) से जुड़ा है। सीएफआई के सदस्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने के आरोप झेल रहे हैं। इस संगठन से जुड़े लोगों पर अपने से परे विचार रखने वाले लोगों की हत्या के गंभीर आरोप हैं। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर जमकर नैतिकता बघारने वाले गोपीनाथन ने उसके कार्यक्रम में अपने विचार रखे।

बीते साल, पीएफआई से प्रेरित सीएफआई के सदस्यों ने केरल के एर्नाकुलम स्थिम महाराजा कॉलेज में छात्रों के एक समूह को चाकू से गोद दिया था। वे इस बात से खफा था कि कैंपस के भीतर दूसरे छात्रों ने वॉल राइटिंग कैसे की। एसएफआई के छात्रों पर हमले के इस मामले में सीएफआई के तीन सदस्य बिलाल, फारूक और रियाज गिरफ्तार किए गए थे। कथित तौर पर हमला करने वाली उस भीड़ में 15 और लोग शामिल थे।

अनुच्छेद 370 पर मोदी सरकार के फैसले का विरोध में आईएएस की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर गोपीनाथन सुर्ख़ियों में आए थे। हालाँकि केंद्र सरकार ने अभी तक उनका इस्तीफ़ा मंज़ूर नहीं किया है। इस्तीफ़ा देने के बाद यह बात सामने आई थी कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही थी। यह कार्रवाई कश्मीर पर केंद्र के फैसले से करीब एक महीने पहले 8 जुलाई को शुरू की गई थी।

सीएफआई के अब्बा संगठन पीएफआई पर घृणा और सांप्रदायिक घटनाओं को अंजाम देने जैसे गंभीर आरोप हैं। इस संगठन के सदस्यों ने केरल के प्रोफेसर का हाथ काट दिया था। प्रोफेसर ने कथित तौर पर पैंगबर मुहम्मद का अपमान किया था। नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने केरल में लव-जिहाद को बढ़ावा देने के पीछे इस संगठन का हाथ पाया है। बता दें कि पीएफआई की राजनीतिक इकाई एसडीपीआई भी विवादों से अछूती नहीं है। केरल के कन्नूर में हुई एबीवीपी के कार्यकर्ता की हत्या के सिलसिले में एसडीपीआई के कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था।

रेलवे में ‘केवल अग्रवाल वैश्य समुदाय’ के लिए भर्ती विज्ञापन जारी करने पर HR प्रबंधक बर्खास्त

भारतीय रेलवे के सबसे बड़े खानपान विक्रेताओं में से एक आरके मील्स द्वारा जारी एक विज्ञापन ने सोशल मीडिया पर कई लोगों की भावनाओं को आहत कर दिया। यह विज्ञापन ख़ासतौर पर उन उम्मीदवारों के लिए था जो ‘अग्रवाल वैश्य समुदाय’ से संबंध रखते हों। यह विज्ञापन टाइम्स ऑफ इंडिया के 6 नवंबर 2019 संस्करण में पेज 12 में प्रकाशित हुआ था। 

आरके मील्स द्वारा जारी किया विज्ञापन

Brandavan फूड प्रोडक्ट्स से संबंधित इस विज्ञापन के अनुसार, आरके मील्स को रेलवे फूड प्लाजा मैनेजर, ट्रेन कैटरिंग मैनेजर, बेस किचन मैनेजर और स्टोर मैनेजर के पदों के लिए 100 उम्मीदवारों की भर्ती करनी है।

विज्ञापन में आवेदन के लिए चार मानदंडों का उल्लेख किया गया, जो इस प्रकार हैं:

1. उम्मीदवारों को भारत में कहीं भी काम करने के लिए तैयार होना चाहिए

2. उम्मीदवार केवल अग्रवाल वैश्य समुदाय के होने चाहिए।

3. पारिवारिक पृष्ठभूमि अच्छी होनी चाहिए

4. 10+2 यानी 12वीं कक्षा पास होना चाहिए

इस विज्ञापन का स्क्रीनशॉट जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, यूज़र्स ने विज्ञापन के मानदंडों के प्रति नाराज़गी जताई। बता दें कि यह विज्ञापन Brandavan फूड प्रोडक्ट्स के मानव संसाधन विभाग द्वारा जारी किया गया था।

ऑपइंडिया ने रेलवे के अधिकारियों के संपर्क किया तो उन्होंने आरके मील्स द्वारा जारी किए गए विज्ञापन के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई किए जाने की बात जानकारी शेयर की।

रेलवे के अधिकारियों ने ऑपइंडिया को बताया, “IRCTC द्वारा इस मामले को गंभीरता से लिया गया है और ठेकेदार को जाति के आधार पर नौकरी देने से परहेज करने का नोटिस जारी किया है और किसी भी जाति/ पंथ/ धर्म या क्षेत्र से संबंधित उपयुक्त व्यक्तियों की भर्ती करने के लिए के लिए कहा गया है।”

इसके अलावा, रेलवे अधिकारियों ने पुष्टि की है कि ठेकेदार (आरके मील्स) ने रेलवे को कन्फ़र्म किया है कि उन्होंने ‘अग्रवाल वैश्य समुदाय’ के उम्मीदवारों के लिए आवेदन माँगने वाले HR प्रबंधक को ज़िम्मेदार ठहराते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया है।

आरके मील्स की वेबसाइट पर उपलब्ध नंबर पर कॉल करके ऑपइंडिया ने भी Brandavan फूड प्रोडक्ट्स तक पहुँचने की कोशिश की। हमारी ओर से जिन्हें कॉल किया गया उन्हें इस मुद्दे की पूरी जानकारी थी, लेकिन जब उनसे टिप्पणी माँगी गई, तो उन्होंने कॉल करने के लिए एक अन्य वैकल्पिक नंबर प्रदान किया।

ऑपइंडिया ने जब उस वैकल्पिक नंबर पर सम्पर्क किया, तो फोन स्विच ऑफ़ हो गया। नंबर स्विच ऑफ़ मिलने के बाद, वेबसाइट पर सूचीबद्ध नंबर को कई बार फिर से कॉल किया गया लेकिन किसी ने भी कॉल का कोई जवाब नहीं दिया।

इसके बाद अधिक जानकारी जुटाने के लिए Brandavan फूड प्रोडक्ट्स को ईमेल किया गया, लेकिन ऑपइंडिया को विक्रेता से अब तक कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। इस मामले पर जैसे ही कोई जानकारी प्राप्त होगी हम आपको अपडेट करेंगे।

मदरसे में जुटे आतंकी, ISI ने दिया जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को मार गिराने का ऑर्डर

आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से बौखलाया पाकिस्तान हर रोज नई साजिशें रच रहा है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने जम्मू-कश्मीर के नए उपराज्यपाल जीसी मुर्मू और ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल (बीडीसी) के हालिया चुनावों में जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों की हत्या का प्लान बनाया है। लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के साथ बैठक कर उसने मुर्मू पर हमले का आदेश दिया है।

आतंकी हमलों में तेजी लाने को लेकर जैश ए मोहम्मद ने 29 अक्टूबर को पीओके के कोटली इलाके स्थित एक मदरसे में कमांडरों के साथ बैठक की है। खुफिया एजेंसियों के मुताबिक इस बैठक में कमांडरों को निर्देश दिया गया कि वे अपने आतंकी शागिर्दों को ज्यादा से ज्यादा हमला करने के लिए उकसाएँ।

मीडिया की ख़बरों में खुफिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि मुर्मू पर हमले का आदेश आईएसआई ने कोटली में लश्कर और हिज्बुल के साथ बैठक में दिया। आईएसआई ने उपराज्यपाल और बीडीसी चुनाव में जीते उम्मीदवारों पर हमले की जिम्मेदारी लश्कर आतंकी जिया-उल-रहमान मीर को सौंपी है। जम्मू-कश्मीर भाजपा के कई बड़े नेता भी लश्कर और हिज्बुल आतंकियों की हिट लिस्ट में हैं।

बता दें कि कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ। इस बौखलाहट में वह लगातार आतंकियों की घुसपैठ कराने की कोशिश में सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है। ख़ुफ़िया एजेंसियों के मुताबिक पाकिस्तान ने खालिस्तान समर्थक समूहों से हाथ मिलाकर एक नया आतंकी संगठन खड़ा किया है। कश्मीर खालिस्तान रेफरेंडम फ्रंट (केकेआरएफ) नामक इस संगठन को भारत में माहौल बिगाड़ने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके लिए आईएसआई नई भर्तियॉं करने और नए आतंकी संगठनों को हथियार मुहैया कराने में जुटा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के बहाने पाकिस्तान विदेश में बसे खालिस्तानी आतंकवादियों को एकजुट करने में लगा है। भारतीय सुरक्षाबालों का ध्यान भटकाने के इरादे से K2 प्लान पर काम कर रहा है। इस योजना के तहत वह खालिस्तानी आतंकियों की मदद से कश्मीर और पंजाब में दहशतगर्दी को बढ़ावा देने की फिराक में है। पंजाब में ड्रोन के जरिए सीमापार से हाथियार पहुँचाने की घटनाएँ भी सामने आई हैं। इसके मद्देनज़र गृह-मंत्रालय पठानकोट में एनएसजी को तैनात करने पर विचार कर रहा है।

बता दें कि भारत सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले कानून को निरस्त कर दिया था। जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बाँटकर केंद्र शासित बना दिया गया है। मुर्मू ने एक नवंबर को जम्मू-कश्मीर के पहले उपराज्यपाल के तौर पर शपथ ली थी।

फैक्ट चेक: मेघालय में गिरा बीएसएफ़ का बस: पाक ने फैलाया झूठ, कहा- हमने एंडियन आर्मी को मार गिराया

पाकिस्तान भारत को उकसाने वाली अलग-अलग तरह की हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा है। कभी वह ख़ालिस्तानी आतंकवादी भिंडरावाले का इस्तेमाल करतारपुर कॉरिडोर के अपने वीडियो में करता है, तो कभी वह भारत को नीचा दिखाने के लिए कश्मीर पर समर्थन की भीख माँगने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर एक-एक देश के नेताओं के दरवाजे तक खटखटाने लगता है।

इसी तरह की एक ओछी हरकत को अंजाम देते हुए पाकिस्तान ने भारत में, भारत-पाकिस्तान सीमा से हज़ारों किलोमीटर दूर हुए एक हादसे को अपनी सेना की बहादुरी और भारत की शिकस्त बताते हुए प्रोपेगंडा करने की कोशिश की है।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार असल में 31 अक्टूबर, 2019 को बीएसएफ का एक बस मेघालय की पूर्वी जयंतिया पहाड़ियों में सड़क हादसे का शिकार हो गया था जिसमें 1 जवान की मृत्यु हो गई थी और 20 अन्य घायल हुए थे। पाकिस्तान की सेना के प्रोपेगंडा को आगे बढ़ाने वाले ट्विटर हैंडलों, जिनमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की तहरीक ए इंसाफ़ पार्टी का प्रोपेगंडाबाज अदनान मुग़ल शामिल है, ने खबर उड़ानी शुरू कर दी कि पाकिस्तानी सेना ने इस बस को एलओसी पर मार गिराया है और इसमें भारतीय सेना के सैनिक बैठे हुए थे।

इस पर एक ट्विटर यूज़र ने पाकिस्तानियों पर तंज़ कसते हुए कहा कि उनके खुद के पीएम और उनकी खुद की सेना ने पहले ही उनका इंटरनेट सीमित कर रखा है। बचे-खुचे का पाकिस्तानियों को सदुपयोग करना चाहिए, दुरुपयोग नहीं।

गौरतलब है कि पाकिस्तान की प्रोपेगंडा मशीन का मुख्य इंजन ट्विटर हैंडल इंटर सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) है, जिसके मुखिया जनरल आसिफ गफूर हैं। जनरल ग़फ़ूर खुद भारत के खिलाफ अकसर झूठ फैलाते पकड़े जाते हैं। जुलाई में उन्होंने रिटायर्ड एयर मार्शल डेन्ज़िल कीलोर का डॉक्टर्ड (छेड़-छाड़ किया हुआ) वीडियो शेयर किया था, इसमें 62 के युद्ध में हिंदुस्तानी फ़ौज को हुई कुछ ऐसी जान की हानि के किस्सों की बात की जा रही है, जिनसे शायद बचा जा सकता था। उसे गफूर ने उनका बालाकोट के बारे में बयान बताया था।

भाई को जान से मारने की धमकी देकर महबूब ने दिया धोखे से ट्रिपल तलाक, फरार

इस साल जुलाई के मानसून सत्र में संसद द्वारा जुर्म बना दिए जाने और सुप्रीम कोर्ट से प्रतिबंधित होने के बावजूद तीन तलाक के मामले लगातार सामने आते ही जा रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में तीन तलाक का मामला सामने आया है। मामले में शौहर द्वारा पत्नी को तीन तलाक देने के लिए धोखे का रास्ता अपनाने की बात सामने आ रही है।

मीडिया खबरों के मुताबिक शौहर महबूब ने बीवी के भाई यानि अपने साले को जान से मारने की धमकी देकर बेगम से तलाक के पेपर पर साइन करवा लिए। इसके बाद उसने तीन तलाक बोलकर मज़हबी रूप से भी संबंध विच्छेद कर लिया और इसके बाद वह भाग खड़ा हुआ। पीड़िता द्वारा शौहर और दो अन्य के विरुद्ध ग्रेटर नोएडा के दादरी थाने में तहरीर देने की बात कही गई है।

जानकारी के अनुसार मामला दादरी के नई आबादी क्षेत्र का है। मामले की पुलिस जाँच में पता चला है कि पीड़िता का निकाह लगभग 4 साल पहले (9 जनवरी, 2016 को) नई आबादी निवासी आरोपित महबूब से हुआ था। शादी से पीड़िता का दो साल का बेटा होने की बात भी मीडिया में कही जा रही है

आरोपित का नाम अमर उजाला की रिपोर्ट में महबूब बताया गया है, साथ ही उसका निवास स्थान दादरी का दौलतराम मार्केट, कटहेरा रोड होने का दावा किया गया है। पीड़िता का नाम मुस्कान बताया गया है।

विवाद की दैनिक जागरण की कवरेज में महिला को पति की प्रताड़ना से परेशान बताया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार महिला पिछले दो महीने से अपनी माँ और भाई के साथ रह रही थी। कथित तौर पर जब महिला परसों (मंगलवार, 7 नवंबर, 2019 को) अपनी माँ के साथ घर से बाजार की ओर जा रही थी, तभी आरोपित ने उन्हें डराते धमकाते हुए महिला को कुछ स्टाम्प पेपरों पर हस्ताक्षर के लिए मजबूर कर दिया। आरोप है कि उसने महिला के भाई को जान से मारने की धमकी भी दी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार महिला डर कर उनके साथ सूरजपुर के अदालती परिसर गई तो वहाँ उससे उन कागजों पर जबरन साइन कराया गया जिसमें लिखा था कि वह स्वेच्छा से ₹50000 के बदले इस संबंध से अलग हो रही है। इस दौरान आरोपित शौहर महबूब के साथ उसके दो भाई भी थे। और जब महिला ने मजबूरी में कागजों पर साइन कर दिए तो वह तीन बार तलाक बोलने के बाद भाग खड़ा हुआ।

मामले को लेकर पुलिस का कहना है कि वह मामले की जाँच कर रही है और जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। दादरी के पुलिस क्षेत्राधिकारी (सर्किल अफसर) सतीश कुमार ने मीडिया से इस विषय पर बात करते हुए मामले के अपने संज्ञान में आने की पुष्टि की है।

पकड़ी गई प्रियंका गॉंधी: ठाकुरों की लड़ाई को दलित की पिटाई बता सोशल मीडिया में फैलाया झूठ, पुलिस ने लताड़ा

कॉन्ग्रेस के सोशल मीडिया ट्विटर हैंडल के ज़रिए 6 नवंबर को समाचार चैनल ‘भारत संचार’ की न्यूज़ क्लिप शेयर की गई थी। इसे शेयर करते हुए लिखा गया था, “यूपी में हर तरफ सिर चढ़कर बोल रहा है जंगलराज। क़ानून का उड़ रहा माखौल, फेल हुआ अजय बिस्ट का राज।” साथ ही कहा गया था कि गवाही देने पर निमर्मता से पिटाई का ये वीडियो भाजपा सरकार की नाकामी का गवाही दे रहा है।

वीडियो के कुछ हिस्सों की आवाज़ बीप कर दी गई थी, जिससे पीड़ितों के साथ-साथ अपराधियों का विवरण स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ता। कॉन्ग्रेस महासचिव और यूपी की प्रभारी प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इसे शेयर करते हुए ट्विटर पर दावा किया कि वीडियो में जो लोग पिटते नजर आ रहे हैं वे दलित हैं।

उन्होंने अपने ट्वीट में दावा किया कि दबंगों ने गवाही देने के लिए भयावह तरीके से दलित भाइयों की पिटाई की।
साथ ही कहा कि राज्य में हर रोज दलित-आदिवासियों पर दबंग-अपराधी खुलेआम हमले कर रहे हैं और भाजपा सरकार मूकदर्शक बनी देख रही है।

असल में, यह वीडियो भूमि विवाद के कारण से 4 नवंबर को दो समूहों के बीच हुई भिड़ंत से जुड़ी थी। एक पक्ष द्वारा दूसरों पक्ष को पीटने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। दोनों पक्षों के पाँच लोगों को अब गिरफ़्तार कर लिया गया है और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 26 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। जानकारी के अनुसार, इन गुटों का नेतृत्व अर्जुन सिंह और करणपाल सिंह ने किया था। दो घायलों जिनमें नरेश और सोनू शामिल हैं उन्हें सैफई अस्पताल में भर्ती कराया गया।

मैनपुरी पुलिस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट ने प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा फैलाई गई फ़र्ज़ी ख़बर का खंडन करते हुए बताया है कि उन्होंने इस मुद्दे को जातिवादी रंग दे दिया। दरअसल, दो पक्षों के बीच जो झड़प हुई थी वो राजपूत परिवार के बीच हुई थी।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्रियंका गाँधी के दावों का खंडन करते हुए मैनपुरी पुलिस के एक अधिकारी का वीडियो भी जारी किया।

मैनपुरी के पुलिस अधिकारी ने कहा कि दो समूह फसल काटने को लेकर आपस में भिड़ गए थे और दोनों समूह ठाकुर समुदाय के थे। दोनों समूह एक दूसरे के साथ लड़े और हिंसक हो गए। इस बीच दोनों समूह के लोग घायल भी हो गए। दोनों समूहों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ क्रॉस FIR भी दर्ज कराई है। मैनपुरी पुलिस ने सोशल मीडिया के ज़रिए ऐसी फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने की निंदा भी की है।

इस ख़बर के लिखे जाने तक, न तो कॉन्ग्रेस और न ही प्रियंका गाँधी वाड्रा ने झूठे दावों को वापस लिया और न ही उन्होंने फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने के लिए माफ़ी माँगी है।