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चू#$या… 4 साल के बच्चे को यही गाली दी थी स्वरा भास्कर ने, अब बोली – ‘मैं तो मज़ाक कर रही थी’

स्वरा भास्कर ने अपने उस विवादित वीडियो को लेकर सफाई दी है जिसमें चार साल के एक बच्चे द्वारा उन्हें आंटी कहने की प्रतिक्रिया में स्वरा ने अभद्र भाषा (चू#$या) का उपयोग किया था। अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि उस शो में वह दरअसल फिल्म इंडस्ट्री के अपने शुरुआती दिनों का अनुभव साझा कर रही थीं।

स्वरा ने कहा, “मैं मुंबई में शूटिंग का अपना अनुभव शेयर कर रही थी। इस दौरान मैंने जो शब्द इस्तेमाल किए वह एडल्ट कॉमेडी है, मैंने यह शब्द एक एडल्ट मज़ाक के तौर पर उस वक़्त के अपने फ्रस्टेशन (कुंठा) को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किए थे।”

बता दें कि स्वरा का एक बच्चे को गाली बकने का यह मामला ज्यादा पुराना नहीं है। कुछ ही दिनों पहले एक कॉमेडी शो ‘सन ऑफ़ अबीश‘ में स्वरा भास्कर ने खुद बताया था कि एक बच्चे के द्वारा उन्हें आंटी बोलने पर उन्होंने उसको चू#$या और कमीना कह दिया था। इस वीडियो के वायरल होने के बाद स्वरा भास्कर को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था।

एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वरा ने इस मामले में अपनी सफाई पेश करते हुए कहा, “मुझे बच्चे पसंद हैं, उस शो को वास्तव में देखने वाले जानते होंगे कि मैं एकलौती ऐसी हूँ जो बच्चों की भलाई के लिए बात कर रही थी। मैं वास्तव में चाहती थी कि उस बच्चे को फिल्मों में एक ब्रेक मिले।” उन्होंने कहा कि शो का स्वरुप मजाकिया था, यही वजह है कि उन्होंने जो बात कही, उसका लहजा भी मज़ाक जैसा ही था।

बता दें कि इस भद्दे कमेन्ट के लिए स्वरा भास्कर के खिलाफ दिल्ली भाजपा के कार्यकर्ता आकाश जोशी ने राष्ट्रीय बाल आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। इस घटना को लेकर स्वरा भास्कर ने अब जाकर चुप्पी तोड़ी और अपने बचाव में कहा है कि वह तो मज़ाक था। जबकि स्वरा सोशल मीडिया यूजर्स के निशाने पर तभी आ गईं थीं जब उन्होंने चार साल के बच्चे को चू#$या और कमीना कहा था।

राष्ट्रपति शासन पर शिवसेना ने उड़ाया था BJP नेता का मजाक, पुत्र-मोह में आज खुद उड़ रही खिल्ली!

महाराष्ट्र सरकार में वित्त मंत्री रह चुके भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार पर शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के माध्यम से निशाना साधा था। जबकि मुनगंटीवार ने सीएम पद के लिए शिवसेना द्वारा 50-50 फॉर्मूले पर अड़ जाने को लेकर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग सकने की सबसे बड़ी वजह बताया था। इसके बाद शिवसेना ने अपने मुखपत्र के ज़रिए उन पर निशाना साधा था। दरअसल सुधीर ने अपने एक बयान में कहा था कि यदि सात नवम्बर तक राज्य में किसी पार्टी की सरकार नहीं बनती है तो महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा। उनके इस बयान पर शिवसेना ने कटाक्ष करते हुए सामना में पूछ लिया कि क्या राष्ट्रपति की मुहर उनके महाराष्ट्र वाले दफ्तर में रखी है? और इस लेख का शीर्षक क्या दिया? – ‘राष्ट्रपति तुम्हारी जेब में हैं क्या? महाराष्ट्र का अपमान’

यह लेख सिर्फ सामना का नहीं है। यह लेख है शिवसेना की मानसिकता का। वही राय जिसके कारण महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के एक साथ लड़ने के बावजूद भाजपा-शिवसेना में एक राय नहीं बन पाई। इस पर बोलते हुए मुनगंटीवार ने कहा था कि दोनों के मिलकर सरकार बनाने में सबसे बड़ा रोड़ा मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना की जिद है। अपने बयान में भाजपा नेता सुधीर ने कहा था, “तय समय सीमा के भीतर सरकार न नियुक्त होने पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाएगा।” बता दें कि 8 नवम्बर को महाराष्ट्र सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया, जिसके बावजूद सूबे में नई सरकार का गठन नहीं किया जा सका।

शिवसेना चाहती तो इसे राजनीतिक सलाह के तौर पर ले सकती थी, राज्य के नागरिकों को एक और चुनाव की ओर झोंकने से बच सकती थी लेकिन नहीं! सामना के जरिए आरोप लगाया कि भाजपा के नेता ने राष्ट्रपति शासन थोपने की धमकी दी है ठीक वैसे ही जैसे वह अन्य एजेंसियों का इस्तेमाल करती है। अपने मुखपत्र सामना में सम्पादकीय के ज़रिए हमला बोलकर शिवसेना ने इसे महाराष्ट्र का अपमान कहा है। सम्पादकीय में मुंगंटीवार के बयान के ज़रिए फडणवीस पर निशाना साधते हुए लिखा गया है – “विदा होती सरकार के बुझे हुए जुगनू रोज नए मजाक करके महाराष्ट्र को कठिनाई में डाल रहे हैं।”

अपने मुखपत्र में भाजपा से सवाल करते हुए शिवसेना ने कहा कि क्या राष्ट्रपति की सील भाजपा के महाराष्ट्र दफ्तर में रखी है। सामना ने अपने सम्पादकीय के अंत में लिखा, “राष्ट्रपति संविधान की सर्वोच्च संस्था हैं। वे व्यक्ति नहीं बल्कि देश हैं। देश किसी की जेब में नहीं है।”

दरअसल महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा को 105 सीटें मिलीं जबकि शिवसेना को 56 सीट। मगर देवेन्द्र फडणवीस की सरकार में साथ होने के बावजूद भी इस चुनाव के नतीजे आते-आते शिवसेना और भाजपा के बीच कड़वाहट बढ़ गई। और यह हुई शिवसेना के अड़ियल रवैये (राजनीति पर पुत्रमोह भारी पड़ी) के कारण।

2014 के मुकाबले इस चुनाव में 17 सीटें कम जीतने वाली भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 145 के आँकड़े से दूर रही। शिवसेना ने नतीजों के एलान के बाद 50-50 प्लान की बात कही थी। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शिवसेना ने आधे-टर्म (ढाई साल) के लिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी थी मगर दोनों पार्टियों की इस मुद्दे पर एक राय नहीं बनी।

हमसे किसी ने कहा ही नहीं: J&K से लेकर महाराष्ट्र-कर्नाटक तक ‘फूफा मोड’ में कॉन्ग्रेस

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं का व्यवहार आजकल घर के उस ऐंठू जमाई जैसा हो गया है, जिन्हें हर बात में वीवीआईपी ट्रीटमेन्ट चाहिए। घर में चाहे शादी किसी को भी लगी हो, नए दूल्हे की तरह नाराजगी और पसंद-नापसंद का ध्यान उसी का रखा जाए, नई बहू की तरह लाड़-दुलार उन्हीं का हो- भले पूरे गाँव ही नहीं खानदान के सबसे लीचड़ और नाकारा व्यक्ति वही हों।

महाराष्ट्र का उदाहरण लीजिए। चारों मुख्य पार्टियों भाजपा, कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना में सबसे कम यानी केवल 44 विधायक उनके जीते हैं, और राज्यपाल के राष्ट्रपति शासन से पहले की मीटिंग में न बुलाने पर बिफ़र ऐसे रहे हैं मानो बैठक में होते तो दावा सीएम की दावेदारी का पेश कर देते!

अरे, अगर भाजपा की सरकार नहीं बन रही, क्योंकि 105 विधायकों के बाद भी भाजपा के पास संख्याबल नहीं है तो अगला निमंत्रण दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिव सेना (56 विधायक) या तीसरी एनसीपी (54) को दिया जाएगा, कि सीधे कॉन्ग्रेस से ही पूछ लिया जाएगा? और कॉन्ग्रेस को तो वैसे भी अभी मोलभाव में लगी शिव सेना और एनसीपी बाहरी समर्थन के लिए रखे हैं! यह तो वही बात हुई कि दूल्हा-दुल्हन अभी राजी हुए नहीं, और बारात में नागिन डांस करने वाले न्यौता न मिलने पर हुक्का-पानी बंद करा देने की धमकी दे रहे हैं!

ऐसे लॉजिक से तो कॉन्ग्रेस से भी पहले दो एमएलए वाली असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और एक विधायक वाली राज ठाकरे की मनसे से पूछा जाना चाहिए था। लेकिन क्या है कि ऐसे उलटे लॉजिक से लोकतंत्र चलता नहीं है।

अब यही हाल कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व कर्नाटक सीएम सिद्दरमैया का भी है। एचडी देवगौड़ा का आरोप कि उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे के सीएम बनने के मौके पर टाँग मार दी, के जवाब में वे बताने लगे कि वे तो मीटिंग में मौजूद ही नहीं थे, कॉन्ग्रेस आलाकमान ने उनकी राय ही नहीं ली!

कोई बताए उन्हें कि ये बात तो ठीक है कि आपने खड़गे जी के मौके पर मट्ठा नहीं डाला, लेकिन इस बात की क्या नाराजगी कि आपसे पूछा क्यों नहीं गया! आप ही के नेतृत्व में चली सरकार के खिलाफ तो चुनाव केंद्रित था। आप ही के नेतृत्व में गई पार्टी को जनता ने नकार दिया। ऐसे में इस बात का भोंपा क्या काढ़ना कि आपसे किसी ने पूछा क्यों नहीं!

इसके पहले कॉन्ग्रेस जम्मू-कश्मीर के बीडीसी चुनावों का भी बहिष्कार यह कारण बताते हुए कर चुकी है कि चुनावों की तारीख उसके हिसाब से तय नहीं हुई है। पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में 24 अक्टूबर को हुए स्थानीय चुनावों में न लड़ने का ऐलान किया था और राज्य में कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रविंदर शर्मा ने सरकार द्वारा चुनावों की तारीख की घोषणा एकतरफ़ा तरीके से थोपे जाने की भी बात उस समय कही थी।

अयोध्या पर फैसला सुनाने वाले 5 जज उस समय पैदा भी नहीं हुए थे, जब दायर हुआ था पहली बार मुकदमा

अयोध्या विवाद पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाने के बाद सीजेआई रंजन गोगोई समेत संवैधानिक पीठ के पाँचों न्यायधीशों का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। अब शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जिसने इस फैसले का लंबे वक्त से इंतजार किया हो और वो आने वाले समय में इन पाँचों जजों के नाम को भूल पाए। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि दशकों पुराने इस विवाद पर संतोषजनक फैसला सुनाकर मामले को हमेशा के लिए सुलझाने वाले पाँचों न्यायधीशों का जन्म भी उस समय नहीं हुआ था, जब इस विवाद की शुरुआत हुई थी या ये मामला कोर्ट तक पहुँचा था।

साल 1950 में 16 जनवरी को फैजाबाद जिले के स्थानीय कोर्ट में पहली बार इस मामले पर मुकदमा दर्ज हुआ था। इसे दर्ज करने वाले शख्स का नाम गोपाल सिंह विशारद था। जिन्होंने रामलला की पूजा के अधिकार के लिए संरक्षण की गुहार लगाई गई थी। इसके बाद इस मामले में दूसरी याचिका 5 दिसंबर 1950 को रामचंद्र दास द्वारा दायर की गई थी। जिसे 18 सितंबर 1990 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।

अब ऐसे में तारीखों के अनुरूप यदि पाँचों जजों की उम्र और इस मामले पर दायर हुए पहले मुकदमे की तिथि को देखा जाएगा, तो पता चलेगा कि ऐतिहासिक फैसला सुनाकर देश में अमन कायम करने वाले इन न्यायधीशों का जन्म भी उस समय नहीं हुआ था, जब इस पूरे मामले में पहली और दूसरी बार मुकदमा दायर हुआ।

दरअसल, सीजेआई रंजन गोगोई इन पाँचों न्यायधीशो में उम्र के लिहाज से सबसे बड़े हैं, जिनकी जन्मतिथि 18 नवंबर 1954 है। इसके बाद जस्टिस बोबड़े हैं, जिनका जन्म 24 अप्रैल 1956 को हुआ। वहीं जस्टिस भूषण की जन्म तारीख जुलाई 5, 1956 और जस्टिस नजीर की 5 जनवरी 1958 है, जबकि जस्टिस चंद्रचूड़ इन सब न्यायधीशों में सबसे कम उम्र के हैं, जिनकी जन्मतिथि नवंबर 11, 1959 है।

1989 में जिस समय इस मामले से संबधित मुकदमों को इलाहाबाद हाइकोर्ट स्थानांतरित किया गया था, उस समय ये पाँचों न्यायधीश वकालत की प्रैक्टिस कर रहे थे। पाँचों की नियुक्ति हाईकोर्ट में बतौर जज सन 2000 में या उसके बाद हुई थी, जबकि बाबरी विध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हो चुका था।

‘5 एकड़ जमीन मिली तो बनवाएँगे स्कूल या अस्पताल’ – 14 कोस में जगह माँगने वाले इकबाल अंसारी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के बाद बाबरी मस्जिद पक्षकार इकबाल अंसारी का बड़ा बयान आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अंसारी ने मस्जिद के लिए मिलने वाली 5 एकड़ जमीन पर स्कूल या अस्पताल खोलने की बात कही है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार हमें जमीन देती है तो हम वहाँ पर स्कूल या फिर अस्पताल बनवाएँगे।”

इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा है कि कोर्ट के फैसले के बाद हिंदू-मुस्लिम के बीच पैदा हुई नफरत खत्म हो गई हैं। इसलिए अब वे नहीं चाहते कि हिंदुस्तान में माहौल में बिगड़े।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, इकबाल अंसारी ने उनसे बातचीत में बताया कि उन्होंने पहले ही कहा था कि कोर्ट जो भी फैसला करेगी, वह उसका सम्मान करेंगे। उन्हें कोर्ट ने मस्जिद के लिए जमीन दी है। लेकिन कहाँ दी है, उन्हें ये नहीं मालूम।

उनके मुताबिक अगर जमीन पर विचार करने के लिए उन्हें बुलाया जाएगा तो वह इस पर अपनी रणनीति जरूर बताएँगे। इसके अलावा उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दोनों मजहबों के बीच नफरत जो पैदा हुई थी वो खत्म हो गई है। वह नहीं चाहते कि आगे किसी भी कारणवश दोनों समुदायों के बीच नफरत हो।

अंसारी ने कहा कि देश में मोदी और राज्य में योगी की सरकार है। इस बीच देश में अमन शांति रही है, वैसे ही आगे भी रहेगी। उनके अनुसार सरकार उन्हें कोर्ट के आदेशानुसार जमीन देती है तो वह उस पर स्कूल और हॉस्पिटल बनवाएँगे।

उन्होंने अपनी बातचीत में स्पष्ट कहा, “हम चाहते हैं कि इसमें अब कोई नया मोड़ ना आए। हिंदुस्तान में कोई अफरा-तफरी का माहौल ना हो। हम सरकार से माँग करेंगे कि हमें मदरसा बना कर दें।”

बता दें कि इससे पहले इकबाल अंसारी ही वह शख्स थे, जिन्होंने मुस्लिमों को दी जाने वाली जमीन पर माँग उठाई थी कि उन्हें उसी 67 एकड़ में जमीन चाहिए, जिसे 1991 में सरकार ने विवादित स्थल समेत अधिकृत किया था।

इस दौरान अंसारी ने कहा था, “अगर वे हमें जमीन देना चाहते हैं, तो हमें हमारी सुविधा के मुताबिक दी जानी चाहिए और वह 67 एकड़ अधिग्रहित जमीन में से ही होनी चाहिए। तब हम यह लेंगे, अन्यथा हम इस पेशकश को ठुकरा देंगे, क्योंकि लोग कह रहे हैं चौदह कोस से बाहर जाओ और वहाँ मस्जिद बनाओ, यह उचित नहीं है। “

कॉन्ग्रेस के खात्मे का समय आ गया है, यह देश से पहले पार्टी को तवज्जो देती है: AAP नेता

महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी है। इस संबंध में राजभवन की तरफ से एक प्रेस-रिलीज भी जारी कर दी गई है। राज्यपाल ने कहा है कि चूँकि प्रदेश में संवैधिनक रूप से सरकार बनने के आसार नहीं है, लिहाजा राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए।

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर कॉन्ग्रेस की शिथिलता पर आम आदमी पार्टी की नेता प्रति शर्मा मेनन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के खात्मे का समय आ गया है। प्रीति शर्मा ने मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए देश से पहले पार्टी आती है। कॉन्ग्रेस हमेशा ही देश से पहले पार्टी को तवज्जो देती है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस, बीजेपी को महाराष्ट्र ‘थाली में सजाकर’ दे रही है।

प्रीति ने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान भी कॉन्ग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने से सख्ती से मना कर दिया और भाजपा को आसानी से जीत हासिल करने में मदद की। और अब वे भाजपा को महाराष्ट्र थाल में सजाकर दे रहे हैं। इनका ये रवैया जल्द ही इनका सफाया कर देगी। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के विधायकों को राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के साथ शामिल हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह सचमुच कॉन्ग्रेस के खात्मे का समय है।”

बता दें कि भाजपा, शिवसेना और एनसीपी- राज्य में तीनों सबसे बड़े दल सरकार गठन में असफल रहे। राज्यपाल ने पहले राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। जब बीजेपी ने असमर्थता जताई तो फिर शिवसेना को आमंत्रित किया गया। शिवसेना भी इसमें असफल रही तो फिर राज्यपाल ने एनसीपी को भी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया क्योंकि वो राज्य में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। मगर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। एनसीपी नेताओं का कहना है कि कल से वे कॉन्ग्रेस के जवाब का इंतजार कर रहे हैं। मगर उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है।

‘कारसेवकों को मिले शहीद का दर्जा, उनके ख़िलाफ़ दर्ज मामले वापस लिए जाएँ’ – PM मोदी को पत्र

अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ठीक 72 घंटे बाद, अखिल भारत हिन्दू महासभा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बाबरी मस्जिद को गिराने के मामले में कारसेवकों के ख़िलाफ़ दर्ज आपराधिक मामले को वापस लेने की माँग की है।

इसके अलावा, संगठन ने 1992 में मारे गए कारसेवकों को ‘शहीद’ का दर्जा दिए जाने की माँग की है। इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि ने गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी पत्र भेजा है। बता दें कि 12 नवंबर को लिखे गए पत्र में लिखा गया है, “चूँकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि श्री रामलला एक निर्विवाद मंदिर है, इसलिए उसका शिखर भी मंदिर का था, न कि किसी मस्जिद का गुंबद, तो अनजाने में मंदिर के शिखर को तोड़ने वाले कारसेवकों पर चल रहे बाबरी मस्जिद के गुंबद तोड़ने वाले केस को अविलम्ब सरकार द्वारा समाप्त किया जाए।”

हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि का लिखा ख़त

चक्रपाणि ने कारसेवकों, जो 1992 में ही नहीं बल्कि कारसेवा करने के प्रयास में अलग-अलग घटनाओं में मारे गए, उनके लिए ‘शहीद’ का दर्जा देने और उनकी सूची पट्टिका तैयार कर उसे अयोध्या में लगवाया जाने की माँग की। साथ ही माँग की गई कि उनके परिवार को आर्थिक सहायता और सहयोग दिया जाए।

30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या में विवादित स्थल के पास कारसेवकों पर गोलीबारी की गई थी, इस दौरान कई लोग मारे गए थे।

इस बीच, राम जन्मभूमि न्यास ने कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की निगरानी करने वाले ट्रस्ट की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को करनी चाहिए। न्यास ने कहा कि आदित्यनाथ को गोरक्षा पीठ के महंत के तौर पर ट्रस्ट की अध्यक्षता करनी चाहिए ना कि मुख्यमंत्री के तौर पर।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

माओवादी कैसे मारे गए, इसकी जाँच हो लेकिन रिपोर्ट आने तक हम कोई सवाल नहीं खड़े कर रहे: केरल HC

केरल हाई कोर्ट ने पलक्क्ड़ में अक्टूबर माह में मारे गए संदिग्ध माओवादियों के एनकाउंटर की परिस्थितियों की जाँच के आदेश दे दिए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने कहा है कि इस की तफ्तीश हो कि एनकाउंटर में शामिल अफसरों के हाथों इस घटना के दौरान कोई आपराधिक कृत्य तो नहीं घटित हुआ है। लेकिन साथ ही साथ यह भी स्पष्टीकरण आदेश में उल्लिखित है कि जाँच के आदेश को पीठ के इस एनकाउंटर की सत्यता, उसकी परिस्थितियों या माओवाद के आरोपितों की मृत्यु पर सवाल के रूप में न देखा जाए। इन विषयों पर अभी अदालत दूर-दूर तक कोई राय नहीं व्यक्त कर रही है।

आदेश में जस्टिस आर नारायण पिशारदी ने अधिकारियों को वर्तमान के नियमों और रवायतों के अनुसार दोनों माओवादियों के शवों की अंत्येष्टि करने की भी अनुमति दे दी है। उन्होंने सेशंस कोर्ट के उस निर्णय को पलट दिया जिसमें राज्य सरकार को कहा गया था कि उसे अगले आदेश तक कार्तिक और मनिवासकाम नामक माओवाद संदिग्धों के शवों को संभाल कर रखना होगा। यह आदेश उन दोनों के रिश्तेदारों की याचिका पर दिया गया था।

इस घटना के बाद पिछले हफ्ते (6 नवंबर, 2019 को) टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित एक लेख में केरल के मुख्य सचिव टॉम जोसे ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद की परिभाषा (वे तत्व जो हिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक मंशा से करते हैं, और इस प्रक्रिया में नागरिकों को नुकसान पहुँचाते हैं या नुकसान की राह पर धकेलते हैं। अतः एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई करने वाले नागरिकों को नुकसान पहुँचाने के चलते आतंकवादी होते हैं) के हिसाब से माओवादी आतंकी ही हुए। उन्होंने यह पक्ष रखा कि सरकारों का काम निहत्थे और शांतिप्रिय नागरिकों की हिफाज़त करना होता है।

जोसे ने लिखा कि इसका कोई औचित्य नहीं कि शांतिप्रिय आम नागरिकों और नक्सल आतंकियों के ह्यूमन राइट्स एक जैसे हों। यह न केवल देश के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ होगा, बल्कि कानून का पालन करने वाले आम नागरिकों का मखौल उड़ाना उनका अपमान होगा।

राम मंदिर निर्माण की देख-रेख करें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ: राम जन्मभूमि न्यास ने उठाई माँग

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार की ओर से गठित होने वाले ट्रस्ट में सीएम योगी आदित्यनाथ को शामिल करने की माँग उठी है। राम जन्मभूमि न्यास ने कहा है कि वह चाहते हैं राम मंदिर निर्माण की देख-रेख करने के लिए बनने वाले ट्रस्ट का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करें।

न्यास का कहना है कि वो योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं बल्कि गोरक्षा पीठ के महंत की हैसियत से राम मंदिर के ट्रस्ट में शामिल किए जाने की माँग करते हैं। न्यास के प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा, “राम जन्मभूमि न्यास चाहता है कि योगी आदित्यनाथ ट्रस्ट का नेतृत्व करें। गोरखपुर में प्रतिष्ठित गोरखनाथ मंदिर, जो गोरक्षा पीठ से संबंधित है, ने राम मंदिर आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई है। महंत दिग्विजय नाथ, महंत अवैद्यनाथ और अब योगी आदित्यनाथ मंदिर आंदोलन के अभिन्न अंग रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित ट्रस्ट में न्यास की प्रमुख भूमिका होगी, लेकिन उन्होंने विवरण का विभाजन नहीं किया। ट्रस्ट के अन्य सदस्य विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष चंपत राय और विहिप के कोषाध्यक्ष ओम प्रकाश सिंघल हो सकते हैं। बता दें कि 2015 में विहिप नेता अशोक सिंघल के निधन के बाद चम्पत राय विहिप और उसके फ्रंटल संगठनों की गतिविधियों की देखरेख कर रहे हैं।

महंत कमल नारायण दास ने कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए गठित किए जाने वाला ट्रस्ट महंत नृत्य गोपाल दास के निरीक्षण में होगा। रविवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ मीटिंग के दौरान महंत कमल नारायण ने न्यास का प्रतिनिधित्व किया था। इस मीटिंग में हिन्दू और मुस्लिम के कई नेता शामिल हुए थे।

इसके साथ ही दिगंबर अखाड़ा का कहना है कि उनके प्रमुख महंत सुरेश दास इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए बुधवार (नवंबर 13, 2019) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करेंगे। इस बीच, निर्मोही अखाड़े के महंत दीनेंद्र दास ने राम जन्मभूमि न्यास का विरोध करते हुए असहमतिपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “हम राम जन्मभूमि न्यास के खिलाफ लड़ रहे हैं। हम उनके ट्रस्ट के सदस्य बनने के लिए कैसे सहमत हो सकते हैं? वे अपने ट्रस्ट को छोड़कर हमारे साथ ट्रस्ट का हिस्सा बन सकते हैं। यह सरकार के लिए एक समाधान खोजने और एक साथ लाने के लिए है।”

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या टाइटल सूट पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए निर्मोही अखाड़ा को भगवान की सेवा करने और उसकी संपत्ति के प्रबंधन के अधिकार के दावे को खारिज कर दिया था। लेकिन बेंच ने विवादित स्थल पर निर्मोही अखाड़ा की ऐतिहासिक उपस्थिति और उनकी भूमिका पर ध्यान दिया और केंद्र को आदेश दिया कि वह राम मंदिर निर्माण के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोदी अखाड़ा को उपयुक्त भूमिका सौंपे। ।

एक संजय जिसके कारण बाला साहेब ने कुत्ता पालना छोड़ दिया, दूसरे ने उनके बेटे को धोबी का कुत्ता बना दिया

24 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा। 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली थी। लेकिन, शिवसेना की एक जिद्द ने न केवल राज्य की राजनीति को भॅंवर में फॅंसाया, बल्कि उसकी खुद की हालत भी ‘न राम मिली, न माया’ जैसी कर दी।

इस सियासी ड्रामे में जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा वह है शिवसेना सांसद संजय राउत का। राउत पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के कार्यकारी संपादक भी हैं। उनकी अति सक्रियता ने लोगों को उस दौर की याद दिला दी है, जब शिवसेना की तरफ से इसी तरह बड़े-बड़े दावे करने के लिए ‘हिंदी का सामना’ के कार्यकारी संपादक संजय निरुपम जाने जाते थे। उस दौर में कहा जाता था कि निरुपम वहीं बोलते हैं, जो बाला साहेब का आदेश होता है। जब राउत बार-बार “शिवसेना का ही सीएम होगा” दोहरा रहे थे, तब भी यही माना जा रहा था कि वे उद्धव ठाकरे के दिल में दफ़न आकांक्षा को ही बयॉं कर रहे हैं।

निरुपम के दिन बहुरने तब शुरू हुए जब 1993 में उन्हें ‘दोपहर का सामना’ का कार्यकारी संपादक बाला साहेब ने बनाया। कुछ दिनों में ही वे बाल ठाकरे की आँखों के तारे हो गए। वफादारी का इनाम भी उन्हें जल्द मिला। बाला साहेब ने 1996 में उन्हें राज्यसभा में भेज दिया। लेकिन, राजनीति में स्थापित होते ही निरुपम 2005 में शिवसेना को छोड़ कॉन्ग्रेस में चले गए।

इधर, निरुपम कॉन्ग्रेस में गए और उधर शिवसेना में राउत का कद बढ़ने लगा। वैसे, राजनीति में राउत का सितारा भले निरुपम के जाने के बाद चमका हो, लेकिन सामना के कार्यकारी संपादक वे 1992 में ही बन गए थे। कहा तो यह भी जाता है कि निरुपम की मातोश्री में एंट्री भी उन्होंने ही कराई थी। निरुपम की पत्नी गीता वैद्य मराठी हैं और राउत की पुरानी परिचित भी। 1992 के दंगों के और 1993 के बम धमाकों के बाद जब बाला साहेब ने हिन्दी भाषियों के लिए अखबार शुरू करने का फैसला किया तो राउत ने ही उन्हें निरुपम का नाम सुझाया था।

निरुपम के जाने के बाद शिवसेना में बड़बोले नेता की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही थी। उसी जगह को भरने के लिए राउत आगे बढ़ाए गए। लेकिन, इसकी बड़ी कीमत बाला साहेब की हिन्दुत्वादी राजनीति को चुकानी पड़ी है। मातोश्री अब ‘मातेश्री’ का शरणागत है। शिवसेना ने उस कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की, जिसके सरकार को कभी बाला साहेब ने ‘हिजड़ों का शासन’ कहा था। उद्धव ठाकरे ने सोनिया गॉंधी और शरद पवार जैसों की राजनीति पर भरोसा किया। उनके कहने पर मोदी कैबिनेट से अपने मंत्री को इस्तीफा दिलवा दिया। फिर भी सोनिया गॉंधी और शरद पवार ने अकेले छोड़ दिया।

निरुपम के जाने के बाद एक मौके पर बाल ठाकरे ने कहा था कि मैंने कुत्ता पालना छोड़ दिया है। लेकिन उद्धव में न तो बाला साहेब वाले तेवर हैं और न उन जैसी धमक। सो, शायद ही वह कभी अपना दर्द बयॉं कर पाएँ। वे शायद भूल गए थे कि धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल सुनाने वाला राज सारथी संजय था। ये आज के संजय हैं। बड़बोलेपन से अपने नेता की लुटिया डूबोने का मौका नहीं छोड़ते। चाहे वे कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता संजय झा हों या फिर नीतीश कुमार के करीबी बिहार के मंत्री संजय कुमार झा।