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ज़मीर की प्रेमिका सुनीता का बड़े भाई अनवर ने पहले पत्थर से सर फोड़ा, फिर पेट्रोल छिड़ककर जिंदा जलाया, मौत

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा ज़िले में नवागढ़ में एक और लव जिहाद और हत्या का मामला सामने आया है। जहाँ छोटे भाई ज़मीर खान की प्रेमिका सुनीता कुशवाहा के सिर पर पत्थर मारकर बड़े भाई अनवर खान ने उसे पेट्रोल छिड़ककर जिंदा जला दिया। अभी तक इस हत्या के कई वीडियो और तस्वीरें सामने आ चुकी हैं जिसमें क्रूरता और असंवेदनशीलता को साफ देखा जा सकता है। इतना ही नहीं हत्या की इस ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित अनवर ख़ान खुद पुलिस थाने गया और सरेंडर भी कर दिया, जैसे उसे अपने किए का कोई पछतावा न हो।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, थाने में पहुँचकर आरोपित ने जो कुछ भी बताया उसे सुनकर पुलिस भी दंग रह रह गई। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस की टीम मौके पर पहुँची। फ़िलहाल पुलिस आरोपित से पूछताछ में जुटी हुई है। ख़बर के अनुसार, महिला के जले हुए शव को पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया और उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। नवागढ़ पुलिस मामले की जाँच में जुट गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, नगर पंचायत नवागढ़ के वार्ड नंबर-2 में अनवर खान पिता सब्बीर खान का घर है। उसका छोटा भाई जमीर खान का 6-7 साल पहले सूरजपुर जिले के जयनगर थानांतार्गत सुनीता कुशवाहा (35) से बिलासपुर में काम के दौरान जान पहचान हुई और यह पहचान प्रेम में तब्दील हो गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान सुनीता गर्भवती भी हुई थी जिसके बाद सुनीता ने ज़मीर पर शादी का दबाव बनाया और मामला थाने तक भी पहुॅचा था।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि प्रेम संबंध के दौरान ज़मीर ने सुनीता से शादी करने का वादा किया था। लेकिन, कुछ समय बाद ज़मीर नौकरी छोड़कर अपने गाँव नवागढ़ वापस चला गया। गाँव पहुँचने के बाद ज़मीर ने सुनीता से दूरी बना ली। एक तरफ सुनीता, ज़मीर पर शादी का दबाव बना रही थी, तो वहीं दूसरी तरफ़ ज़मीर ने सुनीता को बिना बताए अपने घरवालों की मर्जी से निक़ाह कर लिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, जिस दौरान वह ज़मीर के घर पहुँची तब उसका प्रेमी जमीर खान मौजूद नहीं था। मगर पुराने मामले को लेकर सुनीता कुशवाहा और प्रेमी के परिजनों के बीच जमकर विवाद हुआ। रात में ज़मीर के घरवालों ने उसे घर के बाहर निकालकर दरवाजा बंद कर दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, बाहर से सुनीता दरवाजा खटखटाती रही। खोलने की गुहार लगाती रही। इसी बीच देर रात जमीर का बड़ा भाई अनवर खान कहीं से कबड्डी खेलकर वापस घर लौटा तो सुनीता कुशवाहा घर के बाहर ही थीं। दरवाजा खटखटाते देख, अनवर खान ने तैश में आकर सुनीता के सिर पर पत्थर पटक दिया। जिससे वह लहूलुहान होकर गिर पड़ी। इसके बाद अनवर खान ने जेरीकेन में रखे पेट्रोल को सुनीता पर डालकर आग लगा दी। बुरी तरह जलने से व सिर पर पत्थर से प्रहार के चलते युवती की मौके पर ही मौत हो गई।

पुलिस का कहना है कि हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित ख़ुद पुलिस थाने पहुँचा और सरेंडर कर दिया। उसने पुलिस को ख़ुद पूरी घटना बताई। नवागढ़ टीआई विवेक पांडेय के अनुसार, फिलहाल पुलिस आरोपित से पूछताछ में जुटी हुई है। जानकारी के मुताबिक़, पुलिस ने आरोपित के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा-302 के तहत अपराध का मामला दर्ज किया है। व युवती के मोबाइल के माध्यम से परिजनों को सूचना दे दी गई है।

राम मंदिर पर फैसले की आहट: PM ने मंत्रियों से कहा- अनावश्यक बयानबाजी से बचें, 34 संवेदनशील जिलों में रेड-अलर्ट

अयोध्या मामले पर फैसला आने से ठीक कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कैबिनेट मंत्रियों को नसीहत दी है कि वे इस मामले पर अनावश्यक बयानबाजी करने से बचें और देश में सद्भाव बनाएँ रखें।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पीएम मोदी ने बुधवार (नवंबर 6, 2019) को अपने मंत्रियों के साथ बैठक करने के दौरान उन्हें कहा है कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है। ऐसे में देश में सद्भाव और शांति बनाए रखने की हम सभी की जिम्मेदारी है। इस मुद्दे पर सभी को अनावश्यक बयानबाजी से बचना चाहिए और साथ ही इसे हार-जीत के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

बता दें कि अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले केंद्र सरकार ने सभी सांसदों (NDA) और मंत्रियों को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में रहने को कहा है। इसके साथ ही फैसले के कुछ दिनों बाद तक शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की गई है। जिसके मद्देनजर जैसे-जैसे फैसले की घड़ी नज़दीक आ रही हैं वैसे-वैसे कानून व्यवस्था कायम रखने वाली एजेंसियाँ पूरी तरह से मुस्तैद हो रही हैं।

अभी तक की जानकारी के मुताबिक पुलिस मुख्यालय ने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील 34 जिलों के पुलिस प्रमुखों को भी निर्देश जारी कर दिए हैं। इन जिलों में मेरठ आगरा, अलीगढ़ रामपुर, बरेली, फिरोजाबाद, कानपुर, लखनऊ, शाहजहांपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर और आजमगढ़ आदि हैं।

इसके अलावा याद दिला दें कि अभी कुछ दिन पहले ऐसी ही अपील राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी की गई थी। जिसमें संघ के शीर्ष नेताओं ने अपने प्रचारकों से अयोध्या मुद्दे पर फैसला अपने पक्ष में आने पर जश्न नहीं मनाने की अपील की थी।

इधर, केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के घर मुस्लिम धर्म गुरुओं और संघ नेताओं की बैठक के बाद भी फैसला लिया गया था कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर किसी भी तरह के मैसेज सर्कुलेट नहीं किए जाएँगे और फैसले के बाद सब एक दूसरे को हिम्मत देंगे।

पटना में मूर्ति विसर्जन के दौरान मस्जिद के सामने पथराव और आगजनी: आईजी समेत कई घायल

पटना में एक हिंसक झड़प दो समुदायों के बीच तब शुरू हो गई जब एक मूर्ति विसर्जन के लिए डालाजी मस्जिद के सामने से ले जाई रही थी। उसको लेकर हुई हिंसा में कई पुलिस वाले भी घायल हो गए, जिनमें इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) संजय सिंह भी शामिल हैं। यह घटना परसों (सोमवार, 4 नवंबर, 2019 को) रात 11 बजे के आसपास की है। इलाके की सुरक्षा में बढ़ोतरी कर दी गई है क्योंकि मंगलवार (5 नवंबर, 2019) तक हालात तनावपूर्ण बने हुए थे।

हिंसक लोगों ने जमकर तोड़फोड़ की जिसमें पुलिस की कई गाड़ियाँ और एक दमकल की गाड़ी भी क्षतिग्रस्त हो गए। दंगाई इतने पर भी नहीं रुके, और 2 बाइकों को भी आग के हवाले कर के ही माने। उनमें से एक बाइक को तो मस्जिद के सामने ही आग लगाई गई। 11 बजे शुरू हुई हिंसा दो घंटे बाद तक यानि रात 1 बजे तक चलती रही। उसके बाद ही प्रशासन ने किसी तरह स्थिति पर काबू पाया।

दोनों भिड़े हुए गुटों के बीच फँसे पुलिस वालों को काफी चोटें भी आईं क्योंकि दोनों पक्षों के बीच भारी पथराव भी शुरू हो गया था। इसमें फँसने वालों में आईजी संजय सिंह भी शामिल हैं। यह भाँपने के बाद कि संघर्ष और भी भयानक रूप ले सकता है, पूरी पुलिस फ़ोर्स को ही आदेश दिया गया कि वे शहर के आलमगंज इलाके की तरफ कूच कर स्थिति को काबू में करने का प्रयास करें। इसके बाद बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) की गोरखा वाहिनी को भी मौके पर तैनात किए जाने की नौबत आ ही गई। इस बीच आईजी संजय सिंह समेत घायल सभी पुलिस वालों को प्राथमिक चिकित्सा (फर्स्ट एड) आलमगंज थाने पर ही दिया गया।

स्थानीय निवासी मोहम्मद आलम के अनुसार यात्रा के साथ जा रहे युवा शराब पिए हुए थे और उनमें आपस ही में झगड़ा फसाद शुरू हो गया। “उनकी अपनी लड़ाई के दौरान मूर्ति टूट गई और उन सब ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि मूर्ति तोड़ने वाला पत्थर मस्जिद से फेंका गया था। हालाँकि उस समय तो यात्रा आगे चली गई लेकिन बाद में वे युवा लौटे और मस्जिद पर पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिसके बाद हालात काबू से बाहर हो गए।”

लेकिन मीडिया रिपोर्टों में पुलिस सूत्रों के हवाले से इसकी उलटी खबरें भी आ रहीं हैं। एक मीडिया सूत्र मूर्ति विसर्जन यात्रा में शामिल लोगों में से एक के हवाले से दावा करता है कि मूर्ति मस्जिद से फेंके गए पत्थर से ही टूटी थी।

टकराव की वजह की जड़ तक पहुँचने के लिए एक जाँच बिठा दी गई है। अभी तक पुलिस ने किसी को हिरासत में नहीं लिया है।

पाक जाने को बेहद उतावले सिद्धू: फिर लिखा पत्र, कहा- परमिशन नहीं मिली तो बाघा बॉर्डर से ही चले जाएँगे

अपने पाकिस्तान प्रेम को लेकर हमेशा विवादों में घिरे रहने वाले कॉन्ग्रेसी नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने एक बार फिर पाकिस्तान जाने की अपनी दबी इच्छा को जताया है। कभी बाजवा से गले मिलने तो कभी इमरान खान की ताजपोशी में शामिल होने के चलते विवादों में घिरने वाले सिद्धू पाकिस्तान जाने को लकार काफी परेशान हैं।

दरअसल पाक में इमरान सरकार द्वारा नौ नवम्बर को होने वाले करतारपुर साहिब गलियारे के उद्घाटन कार्यक्रम में जाने के लिए सिद्धू ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से अनुमति माँगते हुए दूसरी बार चिट्ठी लिखी है।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विदेश मंत्री एस जयशंकर को लिखी अपनी चिट्ठी में सिद्धू ने कहा है कि वे पाकिस्तान जाना चाहते हैं क्योंकि वहाँ की सरकार ने सिद्धू को करतारपुर के दरबार साहिब के इस उद्घाटन समारोह कार्यक्रम में आने का न्योता दिया है। बता दें कि यह गलियारा पंजाब के गुरदासपुर स्थित डेरा बाबा नानक गुरूद्वारे को पाकिस्तान के करतारपुर स्थित दरबार साहिब से जोड़ेगा।

मंत्रालय को लिखे अपने पत्र में सिद्धू ने लिखा, “इस निमंत्रण की पहली प्रति पहले ही जा चुकी है। कार्यक्रम बहुत स्पष्ट है और उसका समय 11 बजे तय किया गया है इसीलिए मेरा निवेदन है कि मुझे नौ नवंबर सुबह 9:30 से पहले गलियारे की सीमा पार करने की अनुमति दी जाए।” सिद्धू ने कहा कि एक आम सिख की तरह वह करतारपुर स्थित दरबार साहिब में जाकर मत्था टेककर लंगर खाना चाहते हैं, कार्यक्रम में सम्मिलित होने के बाद वे शाम को गलियारे के रास्ते लौट आएँगे।

बता दें कि सिद्धू ने अपने पत्र में पाकिस्तान का वीजा न होने का उल्लेख करते हुए लिखा, “अगर सरकार से उन्हें परमिशन नहीं दी गई तो वह तय कार्यक्रम से एक दिन पहले आठ नवम्बर को वाघा स्थित भारत-पाक सीमा से पाकिस्तान जाएँगे, रात को गुरूद्वारे में ठहर कर अगले कार्यक्रम में सम्मिलित होंगे और फिर अगले दिन गलियारे के ज़रिए भारत वापस आएँगे।”

दरअसल यह कोई पहला वाकया नहीं है कि जब सिद्धू पाकिस्तान को लेकर लालायित दिख रहे हैं। इससे पहले भी कई बार सिद्धू का नाम पाकिस्तान से जोड़ा जाता रहा है जिसके चलते अक्सर उनकी काफी आलोचना होती रहती है। करतारपुर के सम्बन्ध में सिद्धू ने शनिवार को भी पाकिस्तान जाने की अनुमति लेने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को चिट्ठी लिखी थी जिसे बाद में उन्होंने आगे की कार्रवाई के लिए मुख्य सचिव के पास भेज दिया था। बता दें कि करतारपुर गलियारे के खुलने के साथ ही भारतीय श्रद्धालुओं को परमिट लेकर रावी नदी के दूसरी ओर पाकिस्तान के नरोवल जिले में स्थित करतारपुर साहिब के दर्शन करने की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।

फिर से सोच लो, आपको टीपू सुल्तान का जन्मदिवस मनाना चाहिए या नहीं: कर्नाटक सरकार को हाईकोर्ट की राय

एक दंग कर देने वाली सलाह में कर्नाटक के हाई कोर्ट ने राज्य की बीएस येद्दुरप्पा सरकार से इस्लामिक तानाशाह टीपू सुल्तान की जयंती न मनाने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है। भाजपा सरकार ने कॉन्ग्रेस के समय से चलती आ रही टीपू का जन्मदिन मनाए जाने की प्रथा पर रोक लगा दी थी। इसके खिलाफ एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) डाली गई और सरकार के निर्णय को चुनौती दी गई थी। उसी की सुनवाई में अदालत ने यह सलाह दी थी।

भाजपा सरकार ने अदालत को यह बताया कि अगर कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्तर पर टीपू सुल्तान के जन्म दिन का उत्सव करना चाहता है तो उस पर कोई रोक नहीं है। केवल कॉन्ग्रेस की सरकारों के उलट भाजपा की सरकार, सरकार के स्तर पर यह आयोजन नहीं करेगी। इसके बाद भी कर्नाटक की उच्च अदालत ने भारतीय जनता पार्टी को इस्लामी कट्टरपंथी और तानाशाह की जयंती मनाना छोड़ने के निर्णय के बारे में एक बार और सोचने की सलाह देना बंद नहीं किया।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने भाजपा सरकार को इस बारे में फैसला लेने के लिए दो महीने का समय दिया है, ‘सभी पहलुओं’ पर सोच विचार कर के निर्णय लेने के लिए। इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2020 में होगी। टीपू सुलतान का जन्म दिन 20 नवंबर को पड़ता है, यानि कम से कम इस साल अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार न चाहे तो टीपू सुल्तान जयंती नहीं मनाई जा सकती।

कल (6 नवंबर, 2019 को) बिलाल अली की पीआईएल की सुनवाई करने बैठी बेंच ने यह सभी टिप्पणियाँ की थीं। इस बेंच का नेतृत्व और कोई नहीं, खुद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ए एस ओका कर रहे थे। इसी बेंच ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या कारण है राज्य सरकार द्वारा पिछले चार साल से किए जा रहे आयोजन को रोकने का। याचिकाकर्ता बिलाल दिलचस्प रूप से खुद कर्नाटक के निवासी नहीं बल्कि लखनऊ, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। वे अलबत्ता टीपू नेशनल सर्विस एसोसिएशन और टीपू सुल्तान यूनाइटेड फोरम के अध्यक्ष ज़रूर हैं।

अपनी पीआईएल में उन्होंने सरकार के टीपू जयंती को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी। साथ ही दावा किया कि यह रद्द किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के खिलाफ है।

दिलचस्प बात यह है कि तीन साल पहले 2016 में इसी हाई कोर्ट ने टीपू सुल्तान की जयंती सार्वजनिक धन से मनाए जाने के औचित्य पर ही सवाल खड़ा किया था। उस समय के मुख्य न्यायाधीश सुभ्रो कमल मुख़र्जी ने कहा था कि टीपू कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं, महज़ एक राजा था जिसने अपने स्वार्थ की रक्षा के लिए दुश्मनों से युद्ध किया था।

मिशनरी सेवा से गर्भवती होकर वापस लौटीं दो नन: कैथोलिक चर्च ने दिए जाँच के आदेश

एक कैथोलिक चर्च की नन जब मिशनरी का काम करने के बाद वापस पहुँचीं तो चर्च में हंगामा खड़ा हो गया। यह मामला उस वक़्त सामने आया जब समाजसेवा के नाम पर मिशनरी की ओर से काम करने गईं चर्च की दोनो नन अपने-अपने घर चली गईं मगर बाद में उन्हें इस बात का पता चला कि वह गर्भवती हैं और इस अवस्था में उन्हें कई दिन हो गए हैं।

जब यह मामला चर्च तक पहुँचा तो जाँच के आदेश दिए गए, पता चला कि मिशनरी के काम पर बाहर निकली इन दोनों औरतों और किसी पुरुष के बीच शारीरिक सम्बन्ध बनाए गए थे जिसके चलते यह स्थिति सामने आई और दोनों गर्भवती हो गईं। दो अलग-अलग पंथ को मानने वाली इन दोनों महिलाओं को अपने गर्भवती होने का जब आभास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी। इनमें से एक महिला को अपनी गर्भवती होने की जानकारी तब हुई जब वह पेट में दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल गई। इसके बाद जाँच में पाया गया कि वह गर्भवती हैं।

अफ़्रीकी महाद्वीप के सिसिली की रहने वाली यह नन बच्चे को जन्म देने के इतना करीब पहुँच गई कि उसने आखिर में अपना ठिकाना पलेर्मो को बना लिया। वहीं दूसरी नन को जब तक इस बात की जानकारी मिली तब तक वह अपने घर मेडागास्कर पहुँच चुकी थी। दरअसल यह महिला नन वाले अपने जीवन को छोड़ने पर विचार भी कर रही थी।

वहीं दूसरी ओर चर्च ने इन दोनों ही नन पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए जाँच शुरू कर दी है। ईसाईयों में नन और बिशप दोनों को अविवाहित जीवन की शपथ लेनी होती है जिसके बाद शारीरिक सम्बन्ध बनाने की आज़ादी नहीं रह जाती। बहुत सी नन महिलाओं ने कैथोलिक चर्च और मिशनरियों में पादरी द्वारा उनका शारीरिक शोषण करने के चौंकाने वाले खुलासे भी किए हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी ऐसे ही कई मामले हैं जिनमें से एक के सामने आने के बाद हड़कंप मच गया था। इस कड़ी में सबसे अहम केस बिशप फ्रांको का है। इसी साल की शुरुआत में कई नन महिलाओं द्वारा ईसाई मिशनरियों में होने वाले शारीरिक शोषण को लेकर कई खुलासे किए गए थे जिसके बाद खुद पोप फ्रांसिस ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि बहुत से बिशप-पादरियों ने कई नन महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया था।

‘आर्थिक सुस्ती’ के खिलाफ प्रदर्शन में खुद कॉन्ग्रेस हुई सुस्त: राहुल की ‘विदेशी छुट्टियों’ के कारण दिसंबर तक टला

भारत की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस ने आज घोषणा की है कि वह 1 दिसंबर को सर्वदलीय विरोध रैली नई दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘आर्थिक सुस्ती और कृषि संकट’ के मुद्दे पर करेगी। यह सितंबर से अब तक कॉन्ग्रेस द्वारा घोषित तीसरी ऐसी रैली है।

सितम्बर में कॉन्ग्रेस ने घोषणा की थी कि वह 15 से 25 अक्टूबर के बीच देश भर में विरोध प्रदर्शन करेगी। उस समय भी एक महीने पहले घोषणा कर दी गई थी। लेकिन दिलचस्प यह रहा कि बिना विरोध प्रदर्शन की मेहनत किए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी अज्ञात विदेशी स्थान पर छुट्टी मनाने विरोध प्रदर्शनों की तारिख बीत जाने के बाद निकल गए।

इसके बाद अक्टूबर में विरोध प्रदर्शनों की नियत तिथि के अंतिम दिन, 25 अक्टूबर, 2019 के बीतने के पहले कॉन्ग्रेस ने विरोध प्रदर्शन की नई तिथि बता दी ‘आर्थिक सुस्ती’ के खिलाफ।

22 अक्टूबर को कॉन्ग्रेस ने कहा कि वे विरोध प्रदर्शन देश भर में नवंबर के पहले हफ्ते से करेंगे। कॉन्ग्रेस ने कहा 5 से 15 नवंबर तक पार्टी देश भर में विरोध प्रदर्शन और दिल्ली में एक रैली करेगी। इन प्रदर्शनों का विषय भी ‘बढ़ती बेरोजगारी’, ‘डूबती अर्थव्यवस्था’ और ‘कृषि संकट’ था।

5 नवंबर बीत जाने के बाद कॉन्ग्रेस नींद से उठी और यह ध्यान आया कि उन्होंने एक और अंतिम तिथि में चूक कर दी। तो 6 नवंबर को (आज) फिर से विरोध प्रदर्शन की नई तारीख की घोषणा कर दी- इस बार अन्य दलों के साथ।

इसके बाद ट्विटर पर यूज़रों ने मौका नहीं गँवाया कॉन्ग्रेस को उसके पूर्व अध्यक्ष से भी बड़ा मज़ाक बताने में। एक ने लिखा कि जल्दी क्या है, अभी तो नया साल पड़ा हुआ है।

कॉन्ग्रेस को सबसे आलसी विपक्ष का भी तमगा मिल गया।

किसी ने सलाह दी, “तुमसे न हो पाएगा!”

कुछ लोगों ने सीधे-सीधे पिछले विरोध प्रदर्शनों का क्या हुआ, यह भी पूछना शुरू कर दिया।

किसी को यह घर में सगाई के फंक्शन को आगे टालने जैसा लगने लगा।

और तो और, कॉन्ग्रेस के इतने बुरे दिन आ गए कि आम आदमी पार्टी के ट्रोल भी उन्हें ट्रोल करने लगे।

2 दिसंबर को क्या होगा? देखते जाइए, कॉन्ग्रेस विरोध प्रदर्शन को 2020 की न्यू ईयर पार्टी बना कर छोड़ेगी।

केजरीवाल सरकार कुछ कर नहीं सकती तो सत्ता में क्यों हैं?: AAP को SC ने लताड़ा

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर कोई कामयाब कदम न उठा पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने केजरीवाल सरकार को जमकर फटकार लगाई। दिल्ली सरकार से सीधा सवाल करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि जब इस मामले में वह कुछ नहीं कर सकते तो फिर सत्ता में वे बैठे ही क्यों हैं। दिल्ली में बढ़ती जा रही प्रदूषण की समस्या लोगों को खासा परेशान कर रही है। गौरतलब है कि इस सम्बन्ध में दिल्ली सरकार समाधान के लिए अभी तक सिर्फ सम-विषम का विकल्प लेकर आई है जिसके फायदे पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही संशय ज़ाहिर कर चुका है। अपनी टिप्पणी में कोर्ट ने केजरीवाल सरकार से शुक्रवार तक सम-विषम योजना के तहत प्रदूषण कम होने के आंकड़े माँगे हैं।

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण न लगा पाने पर केजरीवाल सरकार की नाकामयाबी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि दिल्ली सरकार कल्याणकारी अवधारणा को भूल गई है। आपको गरीब लोगों की कोई चिंता नहीं है, अगर आपको लोगों की चिंता नहीं है तो आपको सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण से फैलने वाली बीमारियों को लेकर सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आपको शर्म नहीं आती कि इसी प्रदूषण के कारण विमानों के हवाई मार्ग बदले जा रहे हैं, करोड़ों लोग अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं, उनके लिए यह जिंदगी और मौत का सवाल बन गया है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर प्रदूषण इसी प्रकार से बढ़ता रहा तो हम लोग जी नहीं पाएंगे। अपनी उस टिप्पणी में कोर्ट ने कहा था कि अब बहुत हो चुका, इस समस्या के लिए केंद्र और राज्य दोनों को मिलकर इस सम्बन्ध में कदम उठाना पड़ेगा। दिल्ली का कोई भी कोना प्रदूषण से अछूता नहीं रह गया है और इस बढ़ते प्रदूषण के कारण हम अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण साल खोते जा रहे हैं।

अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में फैसला ‘सेक्युलर राजनीति’ के लिए परीक्षा की घड़ी: योगेंद्र यादव

अपने तोड़ मरोड़ से भरे हुए लेख में योगेंद्र यादव, जिन्हें पहले पोलिटिकल साइंस में अपने काम के लिए जाना जाता था, ने अपनी बौद्धिकता की चरम सीमा से आगे जाते हुए कहा है कि राम मंदिर कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों के साथ भारत में सेक्युलर पॉलिटिक्स की परीक्षा होगा। मैं दंग रह गई जब मैंने यह हैडलाइन पढ़ी, और इस लेख को पढ़ने का निश्चय केवल इसके लिए किया कि कहीं यह क्लिकबेट न हो। और वह नहीं था! एक समय ‘पोलिटिकल साइंटिस्ट’ कहे जाने वाले व्यक्ति ने सच में ऐसा कहा था।

लेकिन इस पर दोबारा सोचने पर, एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जिसे अकादमिक दुनिया को अंदर से जानने का मौका मिला है, मुझे आश्चर्य नहीं होता कि योगेंद्र यादव को ऐसा विश्वास है कि हिन्दुओं और राम मंदिर के पक्ष में कोई भी फैसला सेक्युलर नहीं होगा। उनकी बौद्धिक धोखेबाजी यहीं नहीं रूकती। उनकी राय है कि एनआरसी और यूसीसी (यूनिफॉर्म सिविल कोड), केंद्रीय मतांतरण विरोधी कानून और नागरिकता संशोधन विधेयक जैसे कानूनों को को भी ‘ग्रेडेड रिस्पांस’ (सधी प्रतिक्रिया) मिलनी चाहिए न कि एकमत समर्थन।

उनकी स्थिति से पता चलता है कि नेहरूवादी सेक्युलरिज़्म में दो परेशानियाँ हैं। एक, कोई भी निर्णय जो बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं का पक्ष दूर-दूर तक ले (जरूरी नहीं कि अल्पसंख्यकों का अपमान कर के) वह सेक्युलर नहीं हो सकता। दूसरा, भारत की विज़न एक बहस तक सीमित है जहाँ अल्पसंख्यकों की भावनाएँ कैनवास का इकलौता रंग हैं; हर तर्क या तो उनके खिलाफ है या उनके पक्ष में। मैं ऐसी दृष्टि के खिलाफ हूँ, क्योंकि मैं भी अल्पसंख्यकों की तरह मिट्टी की बेटी हूँ, और मैं भी अपनी राय और अधिकार रखने के लायक हूँ।

राम मंदिर: हिन्दू अभिव्यक्ति, मुस्लिमों का अपमान नहीं है

राम मंदिर के पक्ष में कोई भी फैसला केवल एक कारण के चलते माइनॉरिटी विरोधी रूप में बेशक नहीं देखा जाना चाहिए, और योगेंद्र यादव ऐसा कर के गलती कर रहे हैं। अयोध्या मुस्लिमों के मक्का की तरह है। यह एएसआई की रिपोर्ट में स्थापित हो चुका है कि वहाँ पर पहले एक भव्य हिन्दू मंदिर था और उसे तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई। किसी भी श्रद्धालु समुदाय की तरह हिन्दू मंदिर का पुनर्निर्माण चाहते हैं अब, जब देश राजशाही और अधिनायकवादी शासन से आज़ाद है। हिन्दुओं के पक्ष में निर्णय मुस्लिमों के खिलाफ नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिमों में से एक प्रेरित तबका ही इस मुद्दे का इस्तेमाल भावनाएँ भड़काने में कर रहा है। क्षेत्र में छोटी मुस्लिम जनसंख्या के साथ स्थानीय मुस्लिम समुदाय से कभी मस्जिद के लिए होहल्ला नहीं रहा। राम मंदिर के लिए आवाज़, दूसरी ओर, बहुंसख्यक समुदाय के पूरे सामाजिक-सांस्कृतिक मेल में से आती रही है, भारत के भीतर भी और बाहर भी।

दुर्भाग्यपूर्ण रूप से सैकड़ों सालों तक बहुंसख्यकों की कंडीशनिंग के चलते उन्हें लगता है कि अपनी सांस्कृतिक प्रथाओं की कोई अभिव्यक्ति अल्पसंख्यकों का अपमान है। लेकिन यह तुलना गलत है। भारत बहुंसख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों का है। यह किसी एक का अधिक और दूसरे का कम नहीं है। अतः इसका कोई कारण नहीं है कि बहुंसख्यकों को अपने होने भर से शर्मिंदा होना पड़े।

योगेंद्र यादव के लिए अल्पसंख्यकों के खिलाफ और उनके पक्ष में

भारत एक विभिन्नता वाला देश है जिसे सदियों से एक सूत्र में “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” पिरोता है। ऐसे देश में कोई सेक्युलरिज़्म के विचार को एक ही रंग में कैसे पेंट कर सकता है और बहुसंख्यकों के गुणों को क्रूर और सेक्युलरता के खिलाफ बता सकता है?

तीनों ही प्रस्ताव यूसीसी (यूनिफॉर्म सिविल कोड), केंद्रीय मतांतरण विरोधी कानून और नागरिकता संशोधन विधेयक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताए जा रहे हैं उनके द्वारा जिनके छिपे हित सामाजिक अस्थिरता, डेमोग्राफिक असंतुलन, सीमा पार घुसपैठ से जुड़े हुए हैं। इसके उलट ये तीनों ही प्रस्ताव देश के सेक्युलर परिचय को संरक्षित करते हैं।

  • यूसीसी सभी समुदायों पर प्रभाव डालता है, उन्हें फायदा पहुँचाता है और उनके बीच वैमनस्य को दबाता है। यह किसी भी एक समुदाय के पक्ष या विपक्ष में नहीं है।
  • मतांतरण विरोधी कानून किसी भी समुदाय से जबरिया मतांतरण पर रोक लगाएगा, जो एवंजेलिस्म और पैसे के लालच से होता है। यूसीसी की तरह यह भी सब पर लागू होगा। इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताने वाला ऐसे निर्णय की ओर इशारा कर रहा है जो अल्पसंख्यकों को असहज कर के छोड़ेगा।
  • नागरिकता संशोधन विधेयक हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों या ईसाइयों को अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने पर शरण और भारत की नागरिकता देगा। इससे भी भारत के अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई आँच नहीं आएगी।

भारत में सेक्युलरिज़्म ने समय-समय पर परीक्षा दी है और लम्बे समय तक हमले झेले हैं। यह किसी एक फैसले का मोहताज नहीं है। लेकिन यह साफ है कि योगेंद्र यादव जैसे कई सारे ‘बौद्धिक धोखेबाज’ और ‘संदिग्ध विश्लेषकों’ का खुलासा हो चुका है। जो केवल एक हिन्दू-समर्थक फैसले की आहट भर से आहत हैं।

समय आ गया है कि पोलिटिकल साइंटिस्ट का ढोंग करने वाले प्रोपेगंडाबाजों को मान लेना चाहिए कि बहुंसख्यकों की प्रकृति ही सेक्युलर मानी जाती है। अनगिनत पंथों में फैले हुए हिन्दू धर्म ने हमेशा आस्था, विचारधारा, पंथ और मान्यताओं के लिए छतरी का काम किया है। जबकि नव-सेक्युलरिज़्म एक भंगुर सिद्धांत है, प्रोपेगंडा और दोहरेपन की अवधारणाओं की दया पर खड़ा हुआ, वह आस्थाओं के बीच की बहुंसख्यकों की संस्कृति है, जो उन्हें स्वीकार करने और गले लगाने का धैर्य देती है।

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिन्दू अनुवाद मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

13 साल की उम्र में ISIS ने अगवा करके बनाया सेक्स स्लेव: फिर बार-बार हुआ बलात्कार

मात्र 13 साल की उम्र थी इमान अब्दुल्लाह की जब ISIS के आतंकियों ने उन्हें अगवा किया और फिर सेक्स स्लेव बनाकर बार-बार बेचते रहे। इस बीच कई वहशियों ने उनपर अपनी दरिंदगी दिखाई और अनगिनत बार उनका बलात्कार हुआ। ये क्रम इमान के साथ तब तक चला जब तक राहतकर्ताओं ने उन्हें आतंकियों की जकड़ से छुड़वाकर उनके परिवार से नहीं मिलवाया।

इराक के अल्पसंख्यक समुदाय यजीदी से आने वाली इमान ने मुंबई दौरे के दौरान अपने जीवन के उन दर्दनाक पलों की हकीकत को बयान करते हुए मंगलवार को पत्रकारों से बात की। यहाँ उन्हें और उनके कुछ साथियों को हार्मनी फाउंडेशन के वार्षिक मदर टेरेसा पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए आमंत्रिण किया गया था।

इस दौरान उन्होंने ISIS की ऐसी दरिंदगी का खुलासा किया, जिसे सोचकर भी आम इंसान की रूह काँप जाए। इमान ने बताया कि ISIS के आतंकियों ने न केवल उनके समुदाय (यजीदी) की लड़कियों को अगुआ करके सेक्स स्लेव बनाया, बल्कि उनका धर्म परिवर्तन भी करवाया। उन पर क्रूरता हुई और उन्हें शारीरिक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुसैन अल कैदी (बाईं), काव्यर उमर अहमद, डॉ अब्राहिम, मथई और इमान अब्दुल्लाह। (तस्वीर साभार: द हिंदू)

अब्दुल्ला इस दौरान वार्ता में हुसैन अल कैदी के साथ मौजूद थी। जो उन्हें रेस्क्यू करने वाले संस्था के निदेशक हैं। मीडिया से बातचीत में अल कैदी ने बताया, “कुर्द क्षेत्र से यूएस की सेना हटाए जाने के बाद उन्हें बहुत छला हुआ महसूस होता है। तुर्की द्वारा कुर्दीश सेनाओं पर हमले बढ़ गए हैं। कुर्दीश सेनाओं ने भी हिरासत में लिए ISIS के आतंकियों को छोड़ दिया है। हमें डर लगता है कि ये ISIS आतंकी दोबारा याजिदियों पर हमला करेंगे।”

इमान के साथ आए अल कैदी ने अपनी बात कहते हुए इस बात पर जोर दिया कि वे कुर्द के एक गर्वित नागरिक हैं। जहाँ मुस्लिम, ईसाई और यजीदी पूरी तरह शांति बनाकर रहते हैं।

गौरतलब है कि साल 2014 में ISIS ने इराकी शहर सिंजर पर कब्जा करके यजीदियों के घर पर हमला बोला था। जिसके बाद अमेरिकी सेना ने ISIS से लड़ने के लिए कुर्द सेना के साथ गठबंधन किया और आतंकवादियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। कई आतंकियों को इस दौरान जेल में भी डाला गया। स्थिति सुधरने लगी कि अक्टूबर 2019 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने उत्तरी सीरिया से अमेरिकी सेना वापस लेने की घोषणा कर दी और कुर्द बलों को लड़ाई लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया।