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कमलेश तिवारी की पत्नी ने कहा- हत्यारों को जेल में रोटी न खिलाना, मॉं ने मृत्युदंड की मॉंग दोहराई

गुजरात एटीएस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए कमलेश तिवारी हत्याकांड के दोनों मुख्य आरोपितों अशफ़ाक़ और मोईनुद्दीन को गिरफ़्तार कर लिया। मंगलवार (अक्टूबर 22, 2019) की शाम को ख़बर आई कि गुजरात
एटीएस ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया है। इससे पहले दोनों लगातार भागते फिर रहे थे और यूपी पुलिस की एसटीएफ ने इनकी तलाश में बरेली से लेकर शाहजहाँपुर तक जाल बिछाया था। उन दोनों को कई जिलों में उनके परिचितों से मदद मिली थी। इस मामले में पलिया से तौहीद नाम का पुलिस ड्राइवर और बरेली के एक मुफ़्ती को भी हिरासत में लिया गया था।

अब ख़बर आ रही है कि कमलेश तिवारी के परिजन इस गिरफ़्तारी से संतुष्ट हैं। इससे पहले सूरत से इस हत्याकांड के 3 साजिशकर्ताओं को धर-दबोचा गया था। कमलेश तिवारी की माँ कुसुम तिवारी ने कहा है कि वो अपने बेटे के हत्या के मामले में गिरफ़्तार सभी आरोपितों की गिरफ़्तारी से ख़ुश हैं। साथ ही उन्होंने कमलेश तिवारी की पत्नी की माँग दोहराते हुए कहा कि सभी दोषियों को फाँसी की सज़ा दी जानी चाहिए। कमलेश तिवारी की माँ ने कहा कि वो सरकार की कार्रवाई से भी संतुष्ट हैं।

बता दें कि 18 अक्टूबर को हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई थी। उसके बाद से ही यूपी पुलिस की एसटीएफ और गुजरात पुलिस की एटीएस इस मामले में कार्रवाई कर रही थी। कमलेश तिवारी की माँ ने कहा कि गुजरात एटीएस ने बेहतरीन कार्य किया है। कमलेश तिवारी की पत्नी ने माँग की कि आरोपितों को जेल में रोटी न खिलाई जाए। वहीं, उनके बड़े बेटे सत्यम ने भी फाँसी की माँग दोहराई। हत्यारोपितों में अशफ़ाक़ मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का काम करता था। वहीं मोईनुद्दीन जोमाटो का डिलीवरी बॉय था। इन्होने सूरत में अपने परिवार से संपर्क कर रुपए का बंदोबस्त करने को कहा था, जिसके बाद ये धर-दबोचे गए।

गुजरात एटीएस के डीआईजी हिमांशु शुक्ल ने बताया कि दोनों हत्यारोपितों ने अपना गुनाह भी कबूल कर लिया है।ये वही दोनों हैं, जिन्होंने भगवा वस्त्रों में कमलेश तिवारी के ख़ुर्शीदबाग स्थित घर में घुस कर उनकी हत्या कर दी थी। सीसीटीवी में इनकी तस्वीरें भी आ गई थीं। 2015 में कमलेश तिवारी पर पैगम्बर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी देने का आरोप लगा था। आरोपितों ने इसी कारण उनकी हत्या की साज़िश रची।

कठुआ गैंगरेप मामला: 6 सदस्यीय SIT पर FIR का आदेश, गवाहों को प्रताड़ित करने का आरोप

कठुआ गैंगरेप कांड में नया मोड़ आया है। कोर्ट ने इस मामले की जाँच कर रही जम्मू-कश्मीर पुलिस की टीम पर ही एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। विशेष जाँच दल (STF) की 6 सदस्यीय टीम इस मामले की जाँच कर रही थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रेम सागर की अदालत ने इस मामले में उन सभी 6 अधिकारीयों पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है, जो इस मामले की जाँच कर रहे थे। अदालत ने सचिन शर्मा, साहिल शर्मा और नीरज शर्मा नामक तीन गवाहों की याचिका पर सुनवाई करते हुए जम्मू के एसएसपी को ये निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इन सभी 6 लोगों के ख़िलाफ़ संज्ञेय अपराध बनता है

जनवरी 2018 में जम्मू कश्मीर के कठुआ में एक 8 वर्षीय बच्ची का गैंगरेप किया गया था। इस मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया था और उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की गई थी। आरोपित विशाल जंगोत्रा का दावा था कि जब ये घटना हुई, तब वह यूपी में था और अपने कॉलेज में परीक्षाएँ दे रहा था। कठुआ में जिस बच्ची का बलात्कार हुआ, वो कई दिनों से गायब थी। लगभग एक सप्ताह बाद गाँव से क़रीब 1 किलोमीटर दूर उसकी लाश मिली थी। स्थानीय लोगों ने इस मामले में सीबीआई जाँच की माँग की थी।

अदालत ने तत्कालीन एएसपी पीरजादा नावीद के ख़िलाफ़ भी एफआईआर दर्ज करने का निदेश दिया है, जो अब रिटायर हो चुके हैं। आरोप है कि एसआईटी ने झूठे बयान देने के लिए गवाहों को प्रताड़ित किया था और उनका शोषण कर उन्हें विवश किया। ये सभी जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच के अधिकरी थे। आरोप है कि विशाल जंगोत्रा के ख़िलाफ़ झूठे सबूत तैयार करने के लिए पुलिस ने ऐसा किया। गवाहों ने अदालत को बताया था कि उनके द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बावजूद पुलिस ने अभी तक कोई एक्शन नहीं लिया है।

सिटी जज ने सुनवाई की अगली तारीख 7 नवंबर को तय की है। एसआईटी में शामिल अधिकारियों में से अब बस डीएसपी नासिर हुसैन ही जम्मू कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच के साथ हैं। पीरजादा दक्षिण अफ्रीका में यूएन मिशन में कार्यरत हैं। डीएसपी श्वेताम्भरी शर्मा जम्मू पुलिस मुख्यालय में कार्यरत हैं। इस एसआईटी को तत्कालीन महबूबा मुफ़्ती सरकार ने गठित किया था। कठुआ में वकीलों के विरोध के कारण इस मामले को पठानकोट कोर्ट में शिफ्ट कर दिया गया था। जून में इस मामले के तीनों मुख्य आरोपितों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी, वहीं तीन पुलिसकर्मियों को सबूत से छेड़छाड़ के आरोप में 5 वर्ष किस सज़ा दी गई थी।

मुख्य आरोपित सांजी राम के बेटे विशाल जंगोत्रा को बेक़सूर ठहराया गया था। इसके बाद जंगोत्रा ने पुलिस पर प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस के ख़िलाफ़ लोगों ने विरोध दर्ज कराया था। इस मामले में एक आरोपित नाबालिग भी था।

केजरीवाल उनके मंत्रियों का लाखों का इलाज बाहर से और जनता जाए मोहल्ला क्लीनिक: कपिल मिश्रा

दिल्ली सरकार के पाँच साल के कार्यकाल में मुख्यमंत्री केजरीवाल अक्सर मोहल्ला क्लीनिक का महिमामंडन करते नहीं थकते। ये अलग बात है कि उन्ही की पार्टी से विधायक रहे और वर्तमान में भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने केजरीवाल और उनके मंत्रियों पर दिल्ली सरकार के इसी दावे को लेकर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि केजरीवाल और उनके मंत्री अपने इलाज के लिए निजी अस्पताल में लाखों खर्च कर देते हैं। एक आरटीआई के हवाले से कपिल मिश्रा ने बताया कि अब तक इस सिलसिले में जनता से वसूले गए टैक्स से करीब 50 लाख रूपए खर्च किए गए हैं।

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अपने ट्वीट से इस मामले के ज़रिए दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कपिल मिश्रा ने लिखा, “केजरीवाल के पूरे मन्त्रिमण्डल में किसी भी मंत्री के परिवार में भी कोई बीमार पड़ा तो ईलाज दिल्ली के बाहर करवाया, स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन तक के घर वालो ने लाखों रुपए का ईलाज बाहर करवाया, अपने बच्चों के लिए जिस हेल्थ मॉडल पर भरोसा नहीं उसे हमारे बच्चों पर थोपा जा रहा हैं।”

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बता दें कि कपिल मिश्र ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट से एक वीडियो भी ट्वीट किया जिसमें उन्होंने बताया कि मोहल्ला क्लीनिक की बजाय केजरीवाल और उनके मंत्री इलाज कराने विदेश जा रहे हैं।

कपिल मिश्रा ने बताया, “जब आम लोगों के इलाज की बात आती है केजरीवाल उन्हें मोहल्ला क्लीनिक या फिर सरकारी अस्पताल जाने को कहते हैं। दिल्ली सरकार अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रचार करने में ही करोड़ों खर्च कर देती है। लेकिन अगर स्वास्थ्य सुविधाएँ असल में अच्छी हैं तो फिर ये लोग अपने खुद के बच्चों या परिवार वालों को इन जगहों पर क्यों नहीं भेजते, न ही दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में भेजते हैं। अकेले केजरीवाल और उनके परिवार ने दिल्ली के बाहर इलाज करवाने में अब तक 13 लाख रूपए खर्च कर डाले। यही हाल मनीष सिसोदिया का भी है। सतेन्द्र जैन के परिवार को दिल्ली सरकार के खर्चे पर दिल्ली से बाहर भेजा जाता है। पिछले पाँच साल में दिल्ली के मंत्रियों और उनके परिवारों पर तकरीबन 50 लाख रूपए की मोटी रकम खर्च की गई।”

कपिल मिश्रा ने बताया कि यह जानकारी उन्होंने आरटीआई के ज़रिए हासिल की, इसका मतलब है वे खुद अपनी मोहल्ला क्लीनिक और स्वास्थ्य सेवाओं का असल हाल जानते हैं।

कमलेश तिवारी हत्याकांड: फरार हत्यारे मोइनुद्दीन और अशफ़ाक़ गुजरात-राजस्थान बॉर्डर से गिरफ़्तार, देखें Video

अभी-अभी आ रही जानकारी के अनुसार कमलेश तिवारी हत्याकांड के दोनों आरोपित मोईनुद्दीन और अशफाक पुलिस के हत्थे चढ़ गए हैं। दोनों को गुजरात पुलिस के एटीएस ने गुजरात-राजस्थान बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया और लखनऊ पुलिस ने दोनों को सीजेएम की अदालत में पेश किया। उन दोनों और बाकी आरोपितों फैजान, राशिद पठान और मौलाना मोहसिन शेख सलीम की न्यायिक रिमांड अदालत ने पुलिस को अगले 5 दिन के लिए सौंप दी है।

देखें गिरफ़्तारी का वीडियो:

एक प्रेस नोट में मीडिया को यह जानकारी देते हुए बताया गया कि मोईनुद्दीन और अशफाक दोनों ही सूरत के रहने वाले थे और अपने साथ लाया हुआ पैसा खत्म हो जाने के बाद परिवार और दोस्तों से आर्थिक सहायता लेने की कोशिश कर रहे थे। गुजरात एटीएस के फिजिकल और टेक्निकल सर्विलांस के ज़रिए इन दोनों के रिश्तेदारों और करीबियों पर कड़ी निगरानी रखने से ही गिरफ़्तारी सम्भव हो पाई। एटीएस के अनुसार दोनों ही आरोपित पाकिस्तान भागने की फ़िराक में थे। दोनों से हुई प्राथमिक पूछताछ में एक बार फिर कमलेश तिवारी के विवादित बयान के ही हत्या के पीछे होने के शक की एक बार और पुष्टि हो गई है। दोनों को शामलाजी के पास से हिरासत में लिया गया है।

गिरफ़्तारी के बाद जारी प्रेस नोट

बता दें कि आरोपितों की गिरफ्तारी से पहले एसआईटी ने सोमवार को दोनों की तलाश में कई होटलों, लॉज और मदरसों में छापेमारी की थी, लेकिन उन्हें नहीं पकड़ सकी। हालाँकि, सभी आने-जाने वाले मार्गो पर अलर्ट जारी कर दिया गया था। दोनों हत्यारों पर अलग-अलग 2.5 लाख रुपए का इनाम घोषित करने के अलावा पुलिस ने दोनों के फोटोग्राफ्स भी जारी कर दिए थे। बता दें कि कमलेश तिवारी की हत्या 18 अक्टूबर को लखनऊ में की गई थी।

बंगाल में NRC से ममता बनर्जी का साफ इंकार, कहा – यहाँ मेरी सरकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी ने आज (मंगलवार, 22 अक्टूबर, 2019 को) पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (National Register of Citizenship, NRC) लागू किए जाने की किसी भी तरह की संभावना से साफ़ इंकार कर दिया है। “मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ सारे सरकारी कर्मचारियों की मौजूदगी में यह कहती हूँ कि हमारा अपने राज्य में कोई NRC कवायद करने का इरादा नहीं है।” ममता सिलीगुड़ी शहर के पास उत्तर कन्या में राज्य सरकार के सचिवालय की उत्तर बंगाल शाखा में बोल रहीं थीं। वे वहाँ के प्रशासनिक बैठक को सम्बोधित कर रहीं थीं

इसी में उन्होंने आगे कहा, “अतः किसी डिटेंशन कैम्प के निर्माण का सवाल खड़ा ही नहीं होता। वह तो तब आएगा जब हम उसे बनाएँगे।” ममता बनर्जी ने असम की NRC का ठीकरा भी 1985 के असम एकॉर्ड (समझौते) के सर फोड़ते हुए कहा कि असम में NRC की कवायद हुई क्योंकि यह असम समझौते का हिस्सा था। “वे असम में ऐसी कवायद इसलिए कर पाए क्योंकि यह मुद्दा 1985 के असम एकॉर्ड का हिस्सा था, और इसलिए क्योंकि राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।” उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि बंगाल में NRC की कवायद इसलिए नहीं होगी क्योंकि “यहाँ सरकार हम चलाते हैं।”

असम समझौता दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार और असम के दो संगठनों ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण संग्राम परिषद के नेताओं के बीच हुआ था। इन दोनों संगठनों ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की गिरफ़्तारी और निर्वासन के लिए 6 साल (1979 से 1985) तक चले आंदोलन का नेतृत्व किया था।

ममता बनर्जी ने अपने भाषण में संसद में लंबित नागरिकता संशोधन बिल की भी बात की। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस ने इस बिल का विरोध इसलिए किया क्योंकि ऐसी चीज़ें मज़हब के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। गौरतलब है कि उपरोक्त प्रस्तावित बिल तीन मुस्लिम-बहुल पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के पंथिक अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता का प्रावधान करता है। इसके लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता भारत में निवास या नौकरी करते हुए “कम से कम 6 साल” का कुल समय गुज़ारने की है।

उन्होंने दावा किया कि अगर यह बिल कानून बन गया तो भारत के लोग 6 साल के लिए विदेशी नागरिक बन जाएँगे। “तो भारतीय, और खासकर कि बंगाली, 6 साल के लिए विदेशी नागरिक बन जाएँगे। ऐसे लोगों का आप 6 साल तक क्या करेंगे? और उसके बाद क्या होगा?”

कॉन्ग्रेस की बदहाली वाले वक़्त में मोदी सरकार के मुरीद हुए खुर्शीद, इस योजना को बताया सबसे सफल

कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने मोदी के कामकाज को लेकर उनकी सरकार की योजनाओं की खूब प्रशंसा की है। कॉन्ग्रेस पार्टी के बदहाली वाले वक़्त में वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने मोदी सरकार की एक योजना पर जमकर तारीफ के पुल बाँधे हैं। उन्होंने कहा है कि भले ही मोदी जी लगातार कॉन्ग्रेस पार्टी की आलोचना करते रहे मगर उनकी पार्टी के नेता दिन-प्रतिदिन प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के कामकाज के तरीके को लेकर उसके मुरीद होते चले जा रहे हैं।

बता दें कि फर्रुखाबाद से सांसद रहे सलमान खुर्शीद ने नरेन्द्र मोदी की आयुष्यमान भारत योजना की जमकर तारीफ की। खुर्शीद बोले कि गरीब और मध्यम आय वर्ग वाले लोगो के लिए यह एक बेहतरीन योजना है। प्रत्येक व्यक्ति को इसका समर्थन करना चाहिए। लखनऊ में वित्त आयोग की 15वीं बैठक के एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुँचे सलमान खुर्शीद ने कहा कि इस योजना में जितना पैसा आवंटित किया गया था उतना अभी तक खर्च होना बाकी है। बता दें कि इससे पहले सलमान खुर्शीद अपनी पार्टी के अध्यक्ष पद पर टिप्पणी के चलते सुर्ख़ियों में आये थे। उन्होंने राहुल गाँधी को अपना नेता बताते हुए अध्यक्ष पद पर उनके बैठने की बात की थी हालाँकि उन्ही की पार्टी के नेताओं ने उनके बयान को खारिज कर दिया था।

पीएम मोदी की किसी विपक्षी द्वारा तारीफ कोई नई बात नहीं है, बताते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी की कार्यशैली ही कुछ ऐसी है कि अपने विरोधियों को अपना मुरीद बनाने में वे कभी नहीं चूकते। यह कहना गलत नहीं होगा कि पीएम मोदी ने राजनीति में एक ऐसा स्थान हासिल किया है जहाँ राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर उनके कार्यों और भारत को गतिशील बनाए रखने के प्रयासों पर उनकी खूब सराहना होती है। भारत के विपक्षी दलों से लेकर इस्लामिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प तक मोदी के कार्यों का डंका बजता है। बता दें कि यह पहला वाकया नहीं है कि जब प्रधानमंत्री की तारीफों के पुल बाँधने में कोई कॉन्ग्रेसी सामने आया हो। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर और जयराम रमेश पीएम मोदी को लेकर अपनी राय सार्वजानिक रूपसे पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर जता चुके हैं।

अपनी पार्टी की खिसकती राजनीतिक ज़मीन पर नसीहत देते हुए जयराम रमेश ने तो यहाँ तक कह दिया था कि कॉन्ग्रेस अपनी हर हार के लिए पीएम मोदी को ज़िम्मेदार ठहराना बंद करे। वहीं दूसरी और सरकार के कामकाज को लेकर विपक्षी पार्टी होने के बावजूद कई नेता मोदी सरकार के कामकाज से इत्तेफाक रखते हैं इसका प्रमाण तब देखने को मिला जब संसद में अनुच्छेद 370 को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी खुद में ही तय नहीं कर पा रही थी कि कश्मीर में 370 हटाए जाने का समर्थन करना है या विरोध। एक ओर सदन में विपक्षी दल के नेता के तौर पर जहाँ अधीर रंजन चौधरी ने इस बिल का विरोध किया था तो वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश से कॉन्ग्रेस नेता और नई पीढ़ी का चेहरा कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खुले-आम इसका समर्थन किया था।

हिन्दू, मुस्लिम से घृणा करने लगा है: कमलेश की हत्या के बाद वामपंथी हिन्दू को ही गुनहगार कह रहे हैं!

ट्विटर और फेसबुक पर आज-कल एक नई बात सामने आ रही है: हिन्दू घृणा फैला रहे हैं, समुदाय विशेष के खिलाफ संगठित होने के लिए आवाज़ उठा रहे हैं, ब्ला-ब्ला-ब्ला… सारे हैंडल या तो वामपंथियों के हैं या उनके नाम एक खास मजहब से ताल्लुक रखते हैं। अब मजहब का नाम लेने से भी बचता हूँ क्योंकि मिठाई के डब्बे में चाकू ले कर कौन दरवाजे पर आ जाए, और हाथ-पैर पकड़ कर रेत दे, कोई नहीं जानता।

कमलेश तिवारी की हत्या हुई, गर्दन हलाल किया गया, कुछ मीडिया रिपोर्ट की बात मानें तो तेरह बार गर्दन पर चाकू से हमला हुआ, एक बार गर्दन में चाकू मार कर रीढ़ की तरफ खींचते हुए शरीर का फाड़ दिया गया। गर्दन पर कैसे निशान हैं, वो तो आप सब ने देखे ही होंगे। छाती पर भी तस्वीरों में पाँच-छः बार चाकू से गोदने के चिह्न दिख ही रहे हैं।

नृशंस हत्याएँ होती रही हैं, पूरी दुनिया में होती हैं, और होती रहेंगी, आपसी दुश्मनी में लोग कई बार क्रूरता की हदें पार कर देते हैं। लेकिन ये दुश्मनी आपसी नहीं थी। ये दुश्मनी तो एक हिंसक विचारधारा और मजहबी उन्माद से सनी हुई उस सोच से उत्पन्न हुई, जहाँ कोई फतवा जारी कर देता है, और लाख लोग किसी की हत्या करने के लिए, बेखौफ तैयार हो जाते हैं। किसी ने ये भी नहीं देखा कि कमलेश तिवारी ने क्या कहा था, किस संदर्भ में कहा था, जो बोला जा रहा था, वो कब और कैसे कहा था। लेकिन किसी दाढ़ी वाले ने, टोपी लगा कर, लाउडस्पीकर पर चिल्ला कर कह दिया कि फलाने का अपमान हुआ है, गर्दन काटो इसकी। गर्दन काट दी गई।

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हिन्दुओं से डरने का हक भी छीन रहे हैं लोग

ऐसी हत्याएँ समाज और देश की चेतना को झकझोड़ देते हैं। एक आम आदमी इस देश की न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया से गुजरते हुए, उसका सम्मान करते हुए, जेल जाता है, शारीरिक और मानसिक यातनाएँ झेलता है, जबकि उसका अपराध बस ऐसा ही है कि लाखों लोगों द्वारा उसी तरह की बातें हर रोज सोशल मीडिया पर होता हैं, लेकिन उन पर कोई कानून कुछ भी काम नहीं करता। वो आदमी बाहर आता है, एक खास मजहब के लोग, जिसका नाम लेना भी आज-कल गुनाह हो गया है, ताक में रहते हैं कि कब दबोचें और मार दें। फिर एक दिन उसे मार देते हैं।

इससे उस धर्म के लोगों में डर फैलता है जो स्वतः हिंसक नहीं रहा। हिन्दू आज किस कदर खौफ में जी रहे हैं, वो सोशल मीडिया पर दिख रहा है। लोग इसलिए डर रहे हैं कि कोई उनके धर्म के देवी-देवताओं पर अश्लील बातें करे, वो तो बच जाएगा लेकिन आप ने अगर दूसरे मजहब वाले को उसी भाषा में जवाब दिया तो आपको मिठाई के डब्बे में चाकू और पिस्तौल के साथ कोई अशफ़ाक़ या मोइनुद्दीन हलाल कर देगा।

अगर वो डर रहा है तो अब वामपंथी और एक खास मजहब के लोग हिन्दुओं से डरने का अधिकार भी छीन लेना चाहते हैं। मतलब, हिन्दू डर भी नहीं सकता। उसके सामने, सिर्फ और सिर्फ, मजहबी कारणों से किसी की गला रेत कर, हलाल स्टाइल में हत्या की जाती है, क़ातिल जान-बूझ कर गोली मारने के बाद संदेश देने के लिए समय ले कर हलाल करता है, और हिन्दुओं से कहा जा रहा है तुम्हारा डर गलत है, हम तो शांतिप्रिय लोग हैं, हमारे फलाने तो प्रेम की बातें करते हैं, इसलिए तुम भी प्रेम की बात करो।

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ट्विटर पर प्रेम की बात, पर वास्तव में गला रेतने को मौन सहमति

इसी को कहते हैं मुद्दे से भटकाना। मुद्दा है कमलेश तिवारी की हत्या और उसमें शामिल इतने लोग, जो लखनऊ, बरेली और सूरत तक फैले हुए हैं। मुद्दा है कि इसकी योजना बनाई गई, और किसी ने समय ले कर गोली मारने के बाद भी उसे हलाल किया, ताकि हिन्दुओं को संदेश जाए। मुद्दा यही है। और वामपंथी लम्पट समूह और खास मजहब के लोग वहाँ से भटक कर ये बता रहे हैं कि फलाना तो शांति की बात करते हैं, हमारा मजहब तो शांतिप्रिय है।

इसके लिए आम बोल-चाल में उपयोग होने वाला एक उचित शब्द याद आता है: घंटा! सारा विश्व तुम्हारी इस शांतिप्रियता को देख रहा है, और भोग रहा है। हर दिन होती सामूहिक हत्याएँ, बम धमाके, आत्मघाती हमले और मजहबी उन्माद को सर में लिए घूमते आम लोग, हर उस जगह के लोगों का जीना हराम कर रहे हैं, जहाँ वो हैं। दूसरी तरफ ये लोग हैं जो इन दुष्कृत्यों को डिफेंड करते हैं, टीवी पर कहते हैं कि कमलेश तिवारी ने जो किया, उसे उसकी उचित सजा मिली।

इसलिए, सोशल मीडिया पर खूब ज्ञान की बातें करो, लेकिन सत्य यही है कि वास्तव में हर वो जगह इस मजहबी हिंसा का शिकार है जहाँ ये थोड़ी भी ज़्यादा संख्या में हैं। म्याँमार में जिन लोगों ने बौद्ध भिक्षुओं को आत्मरक्षा में हिंसा करने को मजबूर कर दिया, उन्हें और किसी नजरिए से देखा जाए? ये जो ट्विटर पर ज्ञानवाणी कार्यक्रम चला रहे हैं, उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि कमलेश तिवारी की हत्या मजहबी उन्माद का परिचायक है, और फलाने मजहब से ताल्लुक रखने के कारण वो लोग इसकी भर्त्सना करते हैं।

इसलिए, आज अगर हिन्दू डरा हुआ है, चिंतित है, अपने ही देश में एक खास तरह के विचार रखने वालों से बच कर चलता है, तो उसका कारण हिन्दू नहीं है। उसका कारण उसी मजहब के वो लोग हैं जो चुप हैं। उसका कारण यही ज्ञानी लोग हैं जो कभी भी इस्लामी आतंक की निंदा नहीं करते। उसका कारण हर वो आदमी है जो इस तरह की बातों पर चर्चा नहीं करता और एक खास मजहब के लोगों को सही राह नहीं दिखाता। इसलिए, हिन्दुओं के खौफ में होने का कारण वही हैं जिनके नुमाइंदों ने कमलेश का गला रेता।

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क्या हिन्दू घृणा करता है मजहब विशेष से?

नहीं, हिन्दू डरा हुआ है मजहब से क्योंकि एक भी मुस्लिम यह नहीं कह रहा कि जिसने भी कमलेश का गला रेता उसने गलत किया और ये कानून विचित्र है जिसमें किसी के कहने भर से लोगों को जेल में रहना पड़ता है, और जेल से बाहर आने पर पूरे आसार हैं कि उसे हलाल कर दिया जाएगा। इसलिए हिन्दू घृणा नहीं कर रहा, वो प्रतिक्रिया दे रहा है। इस प्रतिक्रिया के पहले की क्रिया एक खास मजहब के लोगों ने की, और हिन्दू अपनी आवाज उठा रहा है।

हर हिन्दू को एक साथ हो कर इस देश की सरकार से, इस देश के मुस्लिमों से, इस देश के बुद्धिजीवियों से एक ही सवाल पूछना चाहिए कि कमलेश तिवारी की हत्या क्यों हो जाती है? आखिर इन मौलवियों को ऐसे फतवा देने पर जेल में क्यों नहीं डाला जाता? ये तो आग लगाने वाले लोग हैं जिनके हाथों में मजहब को राह दिखाने की बागडोर दे दी गई है। कहा जाता है कि फतवा लाने वाले लोग पढ़े-लिखे और समझदार होते हैं।

अब सवाल यह है कि इन्होंने क्या पढ़ा, क्या लिखा और समझदारी किस चीज की है? क्योंकि पढ़ने-लिखने वाले समझदार लोग किसी की गर्दन उतार लेने की बातें तो नहीं करते। जब मजहब शांतिप्रिय है, तो इसके मानने वाले इस तरह के कैसे हो गए हैं जो या तो कमलेश तिवारी जैसों का गला रेतने के लिए छुरा तेज कर रहे हैं, या हत्या के बाद नाच रहे हैं?

आखिर किस तरह की शिक्षा उस आठ साल के बच्चे को दी गई होगी जो तरन्नुम में गा रहा है कि कमलेश की गर्दन काट ली जाए! उसे किसने बताया ये सब? ये जहर किस स्कूल में मिला होगा उसे? इस पर तमाम ट्विटर के शहजादे और सुल्तानों को सोचना चाहिए कि आठ साल के बच्चे को ये मार-काट कौन पढ़ा रहा है? क्या यही आठ साल का लड़का मिठाई के डब्बे में छुरा ले कर कल को किसी की गर्दन नहीं काट लाएगा अगर उसे कोई ऐसे ही समझा दे? कैसा समाज बनाना चाह रहे हो भाई जहाँ ऐसे बच्चों की फौज खड़ी कर रहे हो जो किसी झूठी बात पर हिन्दुओं को मारने के लिए तैयार हो रहा है? और फिर कहते हो हम तो शांतिप्रिय हैं। इसलिए मेरा जवाब वही है कि घंटा शांतिप्रिय नहीं हो तुम लोग! बस आग लगाना चाहते हो इस देश में।

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क्या हिन्दुओं की प्रतिक्रिया हेट-स्पीच है?

हेट-स्पीच होता क्या है? ‘हेट स्पीच’ अंग्रेज़ी का वो शब्द है जिसका विडम्बनापूर्ण आविष्कार वामपंथियों ने किया है। विडंबना इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अगर आप स्वतंत्र अभिव्यक्ति या ‘फ्री स्पीच’ में विश्वास रखते हैं, तो फिर कोई भी ऐसी बात, जो इस पर किसी भी तरह का ब्रेक लगाती है, वो ‘फ्री स्पीच’ की मूल भावना के खिलाफ हो जाती है। वामपंथी हमेशा फ्री स्पीच का झंडा लेकर दौड़ते हैं, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे‘ फ्री स्पीच है।

दूसरी बात जो ये वामपंथी चम्पक गिरोह और मीडिया का समुदाय विशेष करता पाया जाता है, वो यह है कि जब तक आपने इनसे सहमति दिखाई तब तक ही वो बात मान्य है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। अगर आप इनके गिरोह के बाहर के हैं, इनसे अलग विचार रखते हैं, तो वो फ़ौरन ‘हेट स्पीच’ यानी ‘घृणा पैदा करने वाला भाषण’ कह दिया जाएगा। असहमति और उनकी विचारधारा से अलग होना स्वतः आपको घृणा फैलाने वाला बना देता है।

इसलिए, कमलेश तिवारी की हत्या एक मजहब की सामूहिक घृणा से जन्मा प्रतिशोध का कार्य नहीं है, लेकिन कमलेश तिवारी की हत्या के विरोध में अगर कुछ हिन्दू खड़े हो कर आवाज़ उठाते हैं तो इन वामपंथियों और खास मजहबी नामों वालों को स्थान विशेष में असह्य पीड़ा उठने लगती है। इनकी धूर्तता पर गौर कीजिए कि हत्या पर कोई चर्चा ही नहीं करनी, लेकिन हत्या के बाद अगर कोई अपनी बात कह रहा है, जिसका अधिकार भारत का संविधान देता है, तो वो हो गया ‘हेट स्पीच’!

कब तक ये लोग ठगते रहेंगे और कब तक हिन्दू ठगे जाते रहेंगे ऐसी मीठी, लेकिन जहर बुझी बातों से? आप सोचिए कि किस स्तर की घृणा है इनके मन में हिन्दुओं के लिए कि एक नृशंस हत्या को दरकिनार कर के ये बात को मोड़ कर वहाँ ले आते हैं जहाँ हिन्दू ही वापस गुनहगार दिखने लगता है। ऐसा करने के लिए किस स्तर का दोगलापन लाना पड़ता होगा अपने विचारों में, इस पर हिन्दुओं को, इसके बुद्धिजीवियों को, ओपिनियन मेकर्स को सोचना होगा।

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प्रिय हिन्दुओ! तुम्हें संगठित तो होना ही पड़ेगा

अब हिन्दुओं को लिए ऐसे भयावह समय में, जहाँ एक खास मजहब का व्यक्ति दो महीने से अपने मजहबी फतवे की तामील करने के लिए कोर्ट-प्रशासन से स्वयं को अलग और ऊपर मानते हुए, योजनाबद्ध तरीके से गोली मारने के बाद गला रेत कर किसी हिन्दू की हत्या कर देता है, इनसे बचने के लिए संगठित तो होना ही पड़ेगा। ये प्रशासनिक खतरा नहीं है कि प्रशासन इससे निपटेगा, ये सामाजिक खतरा है जिसके लिए आत्मरक्षा के लिए कई स्तर पर तैयारी आवश्यक है।

राजनैतिक दृष्टिकोण से भी देखें तो जब तक हिन्दू इकट्ठा हो कर, एक दवाब समूह बन कर, अपनी उपस्थिति और अपरिहार्यता नहीं दिखाएगा, तब तक पार्टियाँ भी इन्हें ‘फॉर ग्रान्टेड’ ले कर चलती रहेंगी। ‘फॉर ग्रान्टेड’ का मतलब है कि तुम अपरिहार्य नहीं, तुम बस हो, और हमें पता है कि तुम कुछ कर नहीं सकते। राजस्थान और मध्यप्रदेश चुनावों में इसकी एक झलक दिखी थी कि अगर आप एक बड़े समूह को लगातार ढकेल कर कोने में ले जाओगे तो वो छटपटाहट में आपका नाक तोड़ सकता है।

सरकार दर सरकार, पार्टी दर पार्टी, हिन्दुओं को इस तरह से देखती रही है जैसे उनका हित कुछ है ही नहीं। दूसरी सबसे बड़ी आबादी को अल्पसंख्यक कहना, उन्हें उन जगहों पर भी अल्पसंख्यकों वाली योजनाओं का लाभ देना जहाँ वो बहुसंख्यक हैं, ये बताता है कि भले ही सरकार बदल गई है लेकिन इन बातों पर ध्यान देने का समय किसी के पास नहीं। अल्पसंख्यक तो हिन्दू भी हैं कई राज्य में, उन्हें सुविधा क्यों नहीं मिलती?

कायदे से हिन्दू समूहों को इन बातों को मुद्दा बना कर, हर चुनाव में, इसे चर्चा में लाना चाहिए कि अल्पसंख्यक होने की पहचान पंचायत स्तर पर हो न कि राष्ट्रीय स्तर पर। सबसे बड़ी बात आती है कि अल्पसंख्यकों को दबाया जाता है, जहाँ बहुसंख्यक होते हैं। लेकिन, जब पंचायत में सबसे बड़ी संख्या तुम्हारी, तब तुम अल्पसंख्यक कैसे? जिले में सबसे बड़ी आबादी तुम, तो वहाँ तुम अल्पसंख्यक कैसे? राज्य में बहुसंख्यक तुम तो वहाँ अल्पसंख्यक का दर्जा कैसे?

बात इस पर नहीं है कि उन्हें क्या मिल रहा है, बात इस पर है तुम्हें क्यों डरना पड़ा रहा है इस देश में? हिन्दुओं को भारत में डर क्यों लग रहा है? क्या हिन्दू ये सुनिश्चित करेगा कि वो राजनीति में अपनी उपस्थिति दिखाए। और उपस्थिति से मतलब यह नहीं है कि लाख लोगों की रैली में भगवा झंडा ले कर नारे लगाए। उपस्थिति दर्ज कराने का आशय इससे है कि अपने स्थानीय नेताओं से ले कर, सांसद और प्रधानमंत्री तक को, चिट्ठी लिख कर सवाल पूछो कि कमलेश तिवारी मर तो गया, लेकिन मरा कैसे?

संगठित होने पर एक लाख लोगों ने बिहार और भारत, दोनों सरकारें, गिरा दी थीं। बस एक लाख लोगों ने। कोई हिंसा नहीं, बस एक तरह का ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ कह लीजिए। क्या हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, अपनी उँगलियाँ चला कर, हर वामपंथी चम्पक और मजहबी उन्माद को डिफेंड करने वाले खास नामों को आईना दिखा सकते हो?

क्योंकि संख्या बल तुम्हारे साथ है, गलत भी तुम्हारे साथ हुआ है, मारा तुम्हारा साथी गया है और तुमसे कहा जा रहा है कि घृणा भी तुम्हीं फैला रहे हो। सवाल यह है कि हिन्दू इस नैरेटिव में फँसेगा या सीधा सवाल करेगा कि कमलेश की हत्या व्यक्ति ने की या मजहब ने? जवाब आपके पास है, उसे हर जगह लिखिए, पूछिए, बताइए। …और तब तक पूछिए जब तक सही जवाब नहीं मिले। …और सही जवाब सिर्फ़ वही है जो आप सुनना चाहते हैं।

EVM-चुनाव आयोग सब मोदी की जेब में: हार की आशंका में नतीजों से पहले ही फिर से कॉन्ग्रेस ने ढूँढा बहाना

एग्जिट पोलों में महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में लगातार दूसरी बार भाजपा की जीत और कॉन्ग्रेस की हार दिखने के बाद कॉन्ग्रेस के नेता फिर से EVM राग पर उतर आए हैं। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता सिद्दरमैया ने आज (मंगलवार, 22 अक्टूबर, 2019 को) इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के साथ ही चुनाव आयोग पर भी हमला बोला। इस संवैधानिक संस्था पर निशाना साधते हुए वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने इसे भारतीय जनता पार्टी के नियंत्रण में बताया

कर्नाटक के हुबली कस्बे में मीडिया से बात करते हुए सिद्दरमैया ने कहा कि जब वे महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के लिए गए थे तो उन्होंने तेलंगाना के हैदराबाद से महाराष्ट्र के सोलापुर शहर तक का रास्ता पैदल ही तय किया था। इस यात्रा में सड़कों की स्थिति को उन्होंने “दयनीय” बताते हुए महाराष्ट्र से ही आने वाले केंद्रीय सड़क और हाईवे मंत्री नितिन गडकरी पर निशाना साधा।

इस उदाहरण की मदद से उन्होंने पिछले पाँच साल में कोई विकास कार्य न होने का आरोप लगाते हुए कहा, “…पता नहीं लोग उन्हें वोट कैसे दे रहे हैं। मुझे नहीं पता।” इसी में उन्होंने EVM का भी मुद्दा जोड़ दिया। बकौल सिद्दरमैया, “मुझे नहीं पता क्यों (भाजपा जीत रही है), मुझे ऐसा लगता है कि वे EVM का दुरुपयोग कर रहे हैं। भारत का निर्वाचन आयोग उनके नियंत्रण में है और उनके निर्देशों के हिसाब से चलता है।” उन्होंने साथ ही सीबीआई और ED के भी दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग के तथाकथित दुरुपयोग की तुलना उन दोनों से की।

सिद्दरमैया ने बैलेट पेपरों के इस्तेमाल की वकालत करते हुए कहा कि कई विकसित देश भी इनके इस्तेमाल की ओर लौट गए हैं। “जब लोगों ने इस पर शंका जाहिर कर दी है, तो आप (भाजपा) EVM आखिर क्यों चाहते हैं? चुनाव आयोग को निर्णय लेना है, जब सभी पार्टियों ने शंका जाहिर की है।”

उन्होंने जोड़ा, “नतीजे 24 अक्टूबर को आएँगे, हमें जनादेश को स्वीकार करना होगा, मुझे नहीं पता किस तरह का नतीजा वे देंगे।”

भाजपा पर चुनाव आयोग के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए उन्होंने सवाल किया कि आगामी 5 दिसंबर को होने वाले विधानसभा उपचुनावों की तारीख की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता साथ ही तुरंत लागू क्यों नहीं की गई। “इसे आप क्या कहेंगे? इससे क्या नतीजा निकाला जा सकता है?” उन्होंने कर्नाटक की येद्दियुरप्पा सरकार पर भी कर्नाटक में हाल ही में आई बाढ़ से पीड़ित लोगों को राहत पहुँचाने में असफ़ल रहने का आरोप लगाया।

एक दिन में डूबे ₹53,000 करोड़: इन्फ़ोसिस के दो शीर्ष लोगों पर गलत तरीकों के प्रयोग का आरोप

इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी फर्म इन्फ़ोसिस के शेयर मूल्य में आज (22 अक्टूबर, 2019 को) एक दिन में 17% की कमी आई है। एक विसलब्लोअर की शिकायत के बाद हुए इस वाकये में कंपनी के बाजार मूल्य (मार्केट कैप) में कुल ₹53,541 करोड़ की कमी आई है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार), और सुबह ₹643.3 पर खुले शेयर दिन के कारोबार का अंत होते-होते ₹638.3 पर बंद हुए। अप्रैल 2013 के बाद से यह सबसे बड़ी गिरावट है। अब कंपनी का मूल्य ₹2,76,300.08 है।

इस गिरावट के पीछे कारण जो विसलब्लोअर की शिकायत है, उसमें आरोप लगाया गया है कि कंपनी के दो चोटी के कार्यकारी अधिकारी (एग्जीक्यूटिव) अल्पकालिक कमाई और मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए अनैतिक (अनएथिकल) तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस आरोप से हुए नुकसान के चलते सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही स्टॉक एक्सचेंजों की सबसे बड़ी गिरावट वाली कंपनियों की फेहरिस्त में शुमार हो गई है। अगर बेचे गए शेयरों की बात करें तो सेंसेक्स (BSE) पर 117.7 लाख और निफ्टी (NSE) पर इन्फ़ोसिस के 9 करोड़ शेयरों की बिकवाली हुई।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुद को ‘एथिकल एम्प्लॉईज़’ कहने वाले कंपनी के ही कर्मचारियों के एक समूह ने इन्फ़ोसिस के सीईओ सलिल पारेख और सीएफ़ओ नीलांजन रॉय पर अल्पकालिक कमाई और मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए अनैतिक (अनएथिकल) तरीकों के प्रयोग का आरोप लगाया था। कल (सोमवार, 22 अक्टूबर, 2019 को) इन्फ़ोसिस ने मुद्दे पर बयान जारी करते हुए कि विसलब्लोअर की शिकायत को कम्पनी के नियमों के अनुसार ऑडिट समिति के सामने रख दिया गया है, और उस पर कार्रवाई कंपनी की विसलब्लोअर पॉलिसी के अनुसार की जाएगी।

वहीं आज कंपनी के चेयरमैन नंदन नीलकेणी ने एक दूसरा बयान जारी करते हुए कहा कि कंपनी की ऑडिट कमेटी विसलब्लोअर की शिकायत की एक स्वतंत्र जाँच करेगी। ऑडिट कमेटी ने स्वतंत्र आंतरिक ऑडिट बॉडी EY के साथ सलाह मशविरा शुरू कर दिया है। इसके अलावा स्टॉक एक्सचेंजों को इंगित कर दिए गए बयान में नीलकेणी ने लॉ फर्म शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी को भी एक स्वतंत्र जाँच के लिए नियुक्त किए जाने की बात भी कही है।

विवादों के साथ हाल के सालों में कंपनी का यह पहला वास्ता नहीं है। इसके पहले कंपनी में सबसे ताकतवर माने जाने वाले सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने 2017 में तत्कालीन सीईओ और एमडी विशाल सिक्का के खिलाफ कम्पनी बोर्ड के कई सदस्यों को पत्र लिखकर मोर्चा खोल दिया था। इस रस्साकशी का अंत सिक्का के इस्तीफे से हुआ।

‘इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ खड़े भाई मतिदास चौक को नष्ट करने की योजना बना रही है केजरीवाल सरकार’

अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ पुरानी दिल्ली में प्रस्तावित बदलावों को लेकर हल्ला बोला है। दिल्ली सरकार इन दिनों चाँदनी चौक और उसके आसपास के इलाकों में बदलाव का खाका तैयार करने में इतना व्यस्त है कि उन्हें अतिक्रमण और धार्मिक स्थल में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता। यही वजह है कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व वाले भाई मतिदास चौक को ध्वस्त करने का प्लान तैयार किया जा रहा है। सिरसा ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट से एक वीडियो ट्वीट किया। इस वीडियो में अपनी बात रखते हुए सिरसा ने बताया कि दिल्ली सरकार ने सचिवालय की एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा है कि पुरानी दिल्ली में ऐतिहासिक महत्त्व वाले हिन्दुओं और सिखों के पवित्र धार्मिक स्थल को गिराने की योजना बनने जा रही है। इतना ही नहीं सिरसा बोले कि इससे पहले अरविन्द केजरीवाल की सरकार ऐसा करने की कोशिश कर चुकी है, चाँदनी चौक में दिल्ली सरकार पियाउ साहिब गुरुद्वारा भी ध्वस्त करने की ओर अग्रसर थी मगर हाईकोर्ट के आदेश के बाद ऐसा नहीं होने दिया गया।

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बता दें कि दिल्ली सरकार ने चाँदनी चौक इलाके में विकास कार्यों के लिए एक बैठक बुलाई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस बैठक में विकास के लिए कई ऐसी इमारतों को हटाने का भी प्रस्ताव रखा गया था इसमें चाँदनी चौक इलाके का पागल बाबा मंदिर और भाई मतिदास चौक जैसी कई धरोहर शामिल हैं। केजरीवाल सरकार अपने इस कदम से पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक को एक खूबसूरत शक्ल देने का दावा कर रही है।

बता दें कि भाई मतिदास चौक एक ऐतिहासिक घटनास्थल है जहाँ भाई मतिदास ने मुगलों के इस्लामिक कट्टरपंथ के दांत खट्टे कर दिए थे। उन्होंने इस्लाम के आगे समर्पण करने की बजाय हिन्दुओं की रक्षा में अपने प्राण त्याग दिए थे। भाई मतिदास सिखों के नौंवे गुरु तेगबहादुर जी के प्रधानमंत्री थे। मुग़ल शासक औरंगजेब ने उन्हें जीवित रहने के बदले इस्लाम स्वीकार कर उसको फ़ैलाने और उसका प्रचार प्रसार करने की पेशकश की थी मगर सिखों की आस्था की रक्षा के लिए आगे आए भाई मतिदास ने इससे साफ़ इनकार कर दिया। इस्लाम की दावत ठुकरा देने पर मुग़ल बादशाह ने उन्हें जान से मारने का आदेश दे दिया।

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9 अगस्त 1675 को औरंगजेब ने उन्हें पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में दो खम्भों के बीच रस्सी से बाँधकर आरी से काटने का हुक्म दिया था। उल्लेखनीय है कि आखिरी वक़्त पर भी उनसे जब उनकी आखिरी ख्वाइश पूछी गई तो उन्होंने जान बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार नहीं किया बल्कि उन्होंने कहा कि ‘जब मुझे काटा जाए तो मेरा चेहरा अपने गुरु तेगबहादुर की तरफ रहे’। इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ हिन्दुओं की आस्था को बचाए रखने के लिए शहीद हुए भाई मतिदास को उनकी मौत के 344 साल बाद आज भी पूरी आस्था के साथ याद किया जाता है।