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हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की गला रेत कर हत्या, मिठाई के डिब्बे में छिपाकर लाए थे चाकू-पिस्टल

लखनऊ में नाका क्षेत्र स्थित हिन्दू महासभा कार्यालय में कमलेश तिवारी को बदमाशों ने गला रेतकर व गोली मारकर हत्या कर दी। शुक्रवार (18 अक्टूबर 2019) को हत्या की वारदात को अंजाम देकर हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए। गंभीर हालत में तिवारी को ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

डॉक्टरों ने बताया कि कमलेश तिवारी का किसी धारदार हथियार से गला रेता गया। पुलिस का कहना है कि हत्या की वारदात को किसी परिचित ने अंजाम दिया है। जानकारी के अनुसार, कमलेश तिवारी पर खुर्शीद बाग स्थित उनके कार्यालय में ही हमला हुआ। घटना-स्थल से पुलिस ने रिवॉल्वर भी बरामद की है। इससे यह माना जा रहा था कि कमलेश को सटाकर गोली मारी गई होगी।

डॉक्टर्स की पुष्टि किए जाने के बाद पता चला कि कमलेश तिवारी का गला रेतकर बड़ी बेरहमी से हत्या की गई। अभी तक यह पता चला है कि तिवारी से मिलने दो लोग आए थे, इनमें से एक ने भगवा वस्त्र पहन रखे थे। फ़िलहाल, पुलिस आरोपितों की तलाश में जुटी हुई है।

मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, तिवारी से मिलने आए दो लोग मिठाई के डिब्बे में असलहे और चाकू छिपाकर लाए थे। बातचीत के दौरान हमलावरों ने वारदात को अंजाम दिया और वहाँ से भाग निकले। गोली की आवाज़ जब बाहर निकली तो अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया। ख़बर के अनुसार, दो हमलावरों में एक ने तिवारी का गला रेता और दूसरे ने गोली मारी। उनके शरीर पर 15 से अधिक वार किए गए थे।

कमलेश तिवारी की दिन-दहाड़े हत्या किए जाने से लोगों में काफ़ी आक्रोश फैल गया है। उनके समर्थकों ने ख़ुर्शीद बाग़ कॉलोनी में प्रदर्शन शुरू कर दिया है। घटना-स्थल पर बड़ी संख्या में पुलिस बल व पीएसी की तैनाती कर दी गई है।

ग़ौरतलब है कि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे कमलेश तिवारी को पैगंबर साहब के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने के एक मामले में रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) के तहत गिरफ़्तार कर जेल भेजा गया था। इसके बाद साल 2017 में उन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले हिन्दू समाज पार्टी का गठन किया था।

सोनिया गाँधी ने हरियाणा की रैली से खींच लिए हाथ, कॉन्ग्रेस ने नहीं बताई कोई वजह

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हरियाणा चुनाव से हाथ खींच लिए हैं, इस चुनावी माहौल में हरियाणा के महेंद्रगढ़ में अपनी पहली चुनावी रैली से ठीक पहले ही आखिरी वक़्त पर जनसभा को संबोधित करने नहीं पहुँचीं। इसकी जानकारी भी पार्टी की ही ओर से ट्वीट के जरिए दी गई।

वहीं सोनिया की जगह राहुल इस रैली को संबोधित करेंगे इस बात की जानकारी देते हुए प्रदेश की कॉन्ग्रेस पार्टी ने लीपापोती करते हुए लिखा कि –

“आज दोपहर 2 बजे महेंद्रगढ़ में राहुल गाँधी जनता से संवाद करने पहुँच रहे हैं। किसी कारणवश कॉन्ग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी जी आने में असमर्थ हैं। आपसे निवेदन है कि इस जनसभा में पहुँच कर कॉन्ग्रेस परिवार को अपना समर्थन दें।”

कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस बात की कोई जानकारी नहीं दी कि सोनिया ने आखिरी वक़्त पर हरियाणा की जनसभा को संबोधित करने से क्यों इनकार कर दिया, यदि वे इस जनसभा को संबोधित करतीं तो पार्टी अध्यक्ष का पद संभालने के बाद इस चुनावी संग्राम में यह उनकी पहली जनसभा होती। हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सोनिया चुनाव से ज्यादा अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दे रही हैं।

बता दें कि राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए उनकी माँ सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष पद से खुदको दूर कर लिया था मगर इसी साल अगस्त में लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार का मुँह देखने के बाद एक बार फिर सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाली थी।

बता दें कि महेंद्रगढ़ में कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से राव दान सिंह मैदान में हैं जिनका मुकाबला भाजपा के राम बिलास शर्मा से है। 2014 में 90 सीट वाली हरियाणा की विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा को 47 सीटें मिली थीं वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी के खाते में 15 सीटें और इंडियन नेशनल लोक दल (आईएनएलडी) के पक्ष में 19 सीटें आईं थीं।

DoE ने कहा बंद होंगे 700 से अधिक ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालय, सिसोदिया ने कहा – नहीं होने दूँगा

दिल्ली में 700 से अधिक प्राथमिक विद्यालय बंद होंगे, जो बिना मान्यता प्राप्त किए चल रहे हैं। इस संदर्भ में राज्य शिक्षा निदेशालय (DoE) का कहना है कि इन ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा-18 का उल्लंघन किया है। इसके अनुसार, कोई भी विद्यालय, स्थानीय सरकारी प्राधिकरण द्वारा प्रमाण पत्र प्राप्त किए बिना कार्य नहीं करेगा।

ख़बर के अनुसार, इन सभी ग़ैर-मान्यता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों की पहचान नगर निगम द्वारा की जाएगी। इस संबंध में शिक्षा निदेशालय के एक अधिकारी ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया,

“जिला DDEs को मध्य वर्ग और उससे ऊपर के सभी ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों को बंद करने का नोटिस जारी करना चाहिए। निजी विद्यालय की शाखा दिल्ली के विभिन्न इलाक़ों में चल रहे 700 से अधिक ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों की सूची को DDEs के साथ साझा करेगी।”

वहीं, दिल्ली राज्य पब्लिक विद्यालय मैनेजमेंट एसोसिएशन के अनुसार, शहर में लगभग 3,000 ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालय हैं, जो हर साल दस लाख छात्रों को प्रवेश देते हैं। ऐसा सरकार द्वारा चेतावनी दिए जाने के बावजूद होता है। दरअसल, पिछले साल मई में, शिक्षा निदेशालय ने विद्यालयों को मान्यता देने या कक्षाएँ रोकने और 2018-19 शैक्षणिक सत्र में प्रवेश से बचने का अंतिम अवसर दिया था।

वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी बताया कि सरकार वास्तव में सरकारी मान्यता प्राप्त विद्यालयों में अवैध प्रैक्टिस पर भी नकेल कसने जा रही है। ऐसे विद्यालयों की मान्यता वापस लेने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना चाहिए और इस मामले को सख़्ती से निपटाया जाना चाहिए।

दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 से पता चला है कि शहर के सरकारी विद्यालय अभी भी सीखने के परिणामों के मामले में पिछड़ रहे हैं। इसमें बताया गया है कि दिल्ली के विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात 80:1 पर है, जो शिक्षा के अधिकार (RTE) के दिशा-निर्देशों के ख़िलाफ़ है।


इसके अतिरिक्त, दिल्ली विद्यालय शिक्षा मानदंडों में कहा गया है कि विद्यालयों की मान्यता भौगोलिक स्थिति के अनुसार होगी। नामांकन अनुपात बनाए रखने के लिए इलाक़े के अन्य विद्यालयों के साथ तालमेल बैठाए रखना होगा। आपको बता दें कि ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों की समस्या अन्य राज्यों में भी है। दरअसल, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में बिना मान्यता प्राप्त विद्यालयों से संबंधित मामले पर हरियाणा के अतिरिक्त मुख्य सचिव को तलब किया था।

दिल्ली विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में राज्य शिक्षा निदेशालय द्वारा गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करने की पहल पर शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया का कहना है कि किसी भी स्कूल को बंद नहीं किया जाएगा।

अल्लाह गवाह है कि मैंने उस दिन 1 नहीं बल्कि 15 बॉटल ख़ून दिया था: असदुद्दीन ओवैसी, लोगों ने लिए मजे

चुनावी माहौल है और ऐसे में हवाई वादे चलते हैं पर ये क्या कि कोई हवा बाँधने के चक्कर में कुछ ऐसा कह दे जो संभव ही न हो, साथ ही बेहद बेवकूफाना भी। कुछ ऐसा ही किया है, ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने, वैसे उनका विवादों से गहरा नाता रहा है। अपनी बेतुकी बयानबाज़ी के चलते आए दिन उनकी किरकिरी होती रहती है। रैलियों या समारोहों में भाषण देते समय वो अक्सर इतना बेसुध हो जाते हैं कि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता होता कि आख़िर वो बोल क्या रहे हैं! ऐसा हम नहीं बल्कि सोशल मीडिया डोमेन में कहा जा रहा है।

ऐसा ही कुछ विचित्र देखने को मिला उनकी एक रैली में, जहाँ वो लोगों को संबोधित करते हुए कह रहे थे, “एक अस्पताल में ख़ून की ज़रूरत थी तो किसी डॉक्टर ने आवाज़ लगाई कि क्या किसी का ब्लड ग्रुप ओ पॉज़िटिव (O+) है, तो मैंने कहा मेरा है।” इस पर डॉक्टर ने ओवैसी से ख़ून देने के लिए कहा।

इसके आगे ओवैसी ने कहा, “अल्लाह गवाह है कि मैंने उस दिन 1 नहीं बल्कि 15 बॉटल ख़ून दिया था, और हुआ क्या ख़ून भी देता था और अपने हाथ से वो बॉटल लेकर भागता था जहाँ उस ख़ून की ज़रुरत थी।”

ग़ौर करने वाली बात यह है कि ओवैसी कितनी सफ़ाई से अपने बयान में लोगों को ठगने का काम कर गए। बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि उनके इस बेतुके बयान का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। 

दरअसल, एक स्वस्थ्य व्यक्ति के शरीर में लगभग 5-6 लीटर ख़ून होता है। 1 यूनिट ब्लड से मतलब एक बॉटल ख़ून से होता है, जिसमें 350-450 मिलीलीटर ख़ून होता है। ओवैसी के बयान के मुताबिक़ उन्होंने 1 नहीं बल्कि 15 बॉटल ख़ून दिया। इसका मतलब उन्होंने 15 यूनिट ब्लड दिया जो कि हुआ (350×15= 5,250) या (450×15= 6,750 मिलीलीटर)। सरल शब्दों में कहें तो ओवैसी ने उस दिन 5-6 लीटर ख़ून दिया, यानी अपने शरीर की एक-एक बूँद तक उन्होंने डोनेट कर दी।

अश्चर्य इस बात पर होता है कि आख़िर इतना ख़ून देने के बाद उनके अंदर इतनी ताक़त कैसे बनी रही कि वो एक तरफ़ ख़ून भी देते रहे और हर बॉटल को दौड़कर ज़रुरतमंद तक पहुँचाते भी रहे। भई, ये तो किसी करिश्माई कमाल से कम नहीं, क्योंकि जिस अवस्था में कोई दौड़ना तो दूर की बात साँस तक नहीं ले सकता, उस अवस्था में ओवैसी दौड़ रहे थे।

ओवैसी का यह 15 बॉटल वाला वीडियो सोशल मीडिया पर भी ख़ूब छाया हुआ है, जिस पर यूज़र्स जमकर चुटकी ले रहे हैं। किसी ने कहा कि कहीं वो बॉटल 30 मिलीलीटर वाली तो नहीं थी, तो किसी ने लिखा कि वो बॉटल 2 मिलीलीटर वाली होंगी।

मतदाताओं को लुभाने के लिए ओवैसी जैसे नेता भोली-भाली जनता को बरगलाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते, फिर भले ही अपनी बयानबाज़ी से उन्हें मुँह की ही खानी पड़े।

120 हिन्दू परिवार के 700 लोगों को भगा दिया जाएगा उनके घरों से? NGT के सख्त कदम से संशय बरकरार

कुछ साल पहले तीर्थयात्रा के नाम पर भारत आकर बसे पाकिस्तानी हिंदू परिवारों का भविष्य अब खतरे में है। दरअसल, एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने दिल्ली स्थित मजनूं का टीला के दक्षिण में यमुना के किनारे बनी झुग्गियों और अर्ध स्थायी संरचनाओं पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मामले में कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। पर्यावरण और पारिस्थिकी के नजर से यह सही भी है लेकिन सवाल यह भी कि आखिर पाकिस्तान से जान बचा कर आए हिन्दू शरणार्थी परिवार आखिर जाएँगे कहाँ? क्योंकि इन सभी शर्णार्थियों ने इसी इलाके में अपना निवास बनाया है, जहाँ अतिक्रमण के ख़िलाफ़ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

जानकारी के मुताबिक 100 से ज्यादा परिवार कुछ साल पहले तीर्थयात्रा के वीजा पर भारत आए थे, लेकिन वे यहाँ से वापस जाने की बजाए यहीं बस गए। उन्होंने यमुना के किनारे झुग्गियों में रहना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और अब इनमें से अधिकतर के पास मजनूं का टीला के पते पर बने आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते सब हैं। इसके अलावा इन लोगों के बच्चों ने भी नजदीक के सरकारी स्कूलों में जाना शुरू कर दिया है। लेकिन फिर भी अगर एनजीटी के निर्देशानुसार इस मामले पर काम किया जाता है, तो क्या इन हिन्दू परिवारों को कहीं और बसाने का इंतजाम किया गया है या इन्हें वापस इनके मुल्क (पाकिस्तान, जिसे इन्होंने अपना मुल्क मानने से इनकार कर दिया है) भेज दिया जाएगा?

सालों से ठंडे बस्ते में पड़े इस मामले पर जगदेव नामक व्यक्ति ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष कुछ दिन पहले रिपोर्ट पेश की थी। जिसके बाद इस मामले पर खुलासा हुआ। याचिका में जगदेव ने गुरुद्वारे के दक्षिणी हिस्से से सटे अतिक्रमण के ख़िलाफ़ और पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई के ख़िलाफ कार्रवाई की माँग की थी।

इसी पर संज्ञान लेते हुए ही एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सख्ती से पूछा कि प्राधिकारी कैसे यमुना क्षेत्र में ऐसे अतिक्रमण की अनुमति दे सकते हैं? यहाँ जानना जरूरी है कि एनजीटी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों के निरीक्षण पर आधारित है।

डीडीए की ओर से एनजीटी के समक्ष पेश हुए वकील राजीव बंसल और अधिवक्ता कुश कुमार ने इस दौरान निरीक्षण की रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों पर बताया। उन्होंने कहा कि स्थल के निरीक्षण के दौरान पता चला है कि ये 120 हिन्दू परिवार साल 2011 से 2014 तक तीर्थयात्रा वीजा पर भारत आए थे। जिनमें कुल 700 लोग हैं। ये यमुना के किनारे बनी झुग्गी और अर्ध-स्थायी संरचनाओं में रह रहे हैं। इनके द्वारा कब्जा की हुई जमीन करीब 5000 वर्ग गज है।

बता दें कि ये 120 पाकिस्तानी हिन्दू परिवार इस इलाके में सालों से झुग्गियों में बसे हुए हैं, लेकिन इन्हें कोई बिजली मुहैया नहीं करवाई गई है। जल आपूर्ति भी साझा नलों से की जा रही है और कुछ निवासियों ने तो जीवनयापन के लिए फुटपाथ पर छोटी दुकानें भी शुरू कर दी हैं। इस जमीन पर आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय का अधिकार है। जिसे देखभाल और रख रखाव के लिए 7 जुलाई 1971 को डीडीए को हस्तांतरित किया गया था।

मंत्री के घर कचरा फेंकने जा रहे थे पप्पू यादव, ट्रैफिक पुलिस ने काटा 5000 रुपए का चालान

जन अधिकार पार्टी (JAP) के नेता और पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव पर बिना वैध लाइसेंस कूड़े से भरा ट्रैक्टर चलाने के मामले में जुर्माना लगाया गया है। पुलिस ने बताया कि पप्पू यादव ने इस कूड़े को राज्य सरकार के मंत्री सुरेश शर्मा के घर के सामने फेंकने की धमकी दी थी।

दरअसल, पप्पू यादव ने गुरुवार (अक्टूबर 17, 2019) को अपने कार्यकर्ताओं के साथ पटना के कई इलाकों में सफाई अभियान चलाया और कचरे को लादकर बिहार के नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा के सरकारी आवास पर फेंकने जा रहे थे। इसकी सूचना मिलते ही मंत्री सुरेश शर्मा के आवास की सुरक्षा बढ़ा दी गई और सचिवालय डीएसपी सहित कई पुलिस बल को वहाँ तैनात किया गया।

पुलिस ने पप्पू यादव के ट्रैक्टर को आशियाना मोड़ पर रोक दिया और उसके बाद पप्पू यादव और उनके समर्थकों को राजीव नगर थाना पुलिस अपने साथ ले गई। जब पप्पू यादव का ड्राइविंग लाइसेंस चेक किया गया तो वह टू व्हीलर का निकला, जो 2017 में ही एक्सपायर हो चुका था। पुलिस ने बताया कि पप्पू यादव को रोक कर 5000 रुपए का जुर्माना लगाया गया क्योंकि उनके पास हल्के वाहन चलाने का लाइसेंस था, जिसकी वैधता 2017 में ही समाप्त हो गई थी।


इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पप्पू यादव ने कहा, ‘‘मुझे विरोध दर्ज कराने के मौलिक अधिकारों से वंचित किया गया। मेरे पास लाइसेंस है लेकिन बहुत ही कमजोर आधार पर चालान किया गया कि मैं भारी वाहन चलाने की योग्यता नहीं रखता।”

वहीं मंत्री सुरेश शर्मा के घर के बाहर गंदगी फेंकने की बात पर उन्होंने कहा कि उन्हें मंत्री के घर के सामने गंदगी फेंकने से कोई खुशी नहीं होती। वो तो बस इतना चाहते थे कि मंत्री को भी उस नारकीय स्थिति का एहसास हो, जिसमें शहर के लोग रह रहे हैं।

पूर्व सांसद पप्पू यादव ने आगे कहा, ‘‘इस सरकार की प्राथमिकताएँ गलत हैं। सरकार अरबों रुपए प्रचार पर खर्च कर रही है लेकिन अस्पतालों को प्लेटलेट चढ़ाने की किट के लिए पैसे नहीं मिल रहे हैं। हालाँकि, इस असंवेदनशील सरकार के खिलाफ किसी भी तरह से आवाज उठाता रहूँगा। मैं अपने संसाधन से प्लेटलेट चढ़ाने की किट खरीद कर पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान को दान करूँगा।’’

ED ने कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर किया, ₹8,000 करोड़ के गबन का लगाया आरोप

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी और उनकी कंपनी मोजरबियर के ख़िलाफ़ कथित मनी लॉन्ड्रिंग और बैंक धोखाधड़ी मामले में आरोप पत्र दायर किया। जानकारी के अनुसार, गुरुवार (17 अक्टूबर, 2019) को दायर की गई ED की चार्जशीट में कहा गया है कि पुरी और उनकी कंपनी ने 8,000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की है।

ख़बर के अनुसार, ED की चार्जशीट में उल्लेख किया गया है कि पुरी, जो मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ के भांजे हैं, और उनके सहयोगियों ने लगभग 30 बैंकों और वित्तीय संस्थानों से व्यवसाय के लिए लगभग 8000 करोड़ रुपए की धनराशि का दुरुपयोग किया।

आपको बता दें कि ED द्वारा उल्लिखित राशि उनके पिछले अनुमानों से अधिक है। मोजरबियर की कुल देनदारियों को 7979 करोड़ रुपए बताया गया है।


विशेष न्यायाधीश संजय गर्ग ने कथित तौर पर चार्जशीट को संज्ञान में लिया और दस्तावेज़ों की जाँच के लिए 25 नवंबर की तारीख़ तय की है। ED ने पुरी को 20 अगस्त को गिरफ़्तार किया था। इसके बाद उन्हें 17 अक्टूबर तक अदालत ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। ED के अलावा CBI और आयकर विभाग भी पुरी और उनकी कंपनी मोजरबियर की जाँच कर रहे हैं।

इसके अलावा रतुल पुरी पर अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग का भी आरोप है। इस मामले में उसकी अग्रिम ज़मानत पहले ही ख़ारिज कर दी गई थी। ED ने यह भी आरोप लगाया है कि वीवीआईपी चॉपर घोटाले में गवाह की हत्या के लिए रतुल पुरी ज़िम्मेदार हैं।

रतुल पुरी, उनके पिता दीपक पुरी और उनकी माँ नीता पुरी (कमलनाथ की बहन) को सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा दर्ज किए गए बैंक धोखाधड़ी के मामले में ED द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) मामले में आरोपी के तौर पर दर्ज किया गया था। पुरी के ख़िलाफ़ ED का मामला 17 अगस्त की CBI की FIR पर आधारित था।

पुरी परिवार के अलावा, अन्य व्यक्तियों, संजय जैन और विनीत शर्मा को भी CBI ने कथित आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, जालसाज़ी और भ्रष्टाचार के लिए जाली और मनगढ़ंत दस्तावेज़ों का इस्तेमाल करने के लिए मामला दर्ज किया था। इन जाली दस्तावेज़ों का उद्देश्य मोजरबियर कंपनी के लिए बैंकों से फंड प्राप्त करना था।

HC की फटकार के बाद लाइन में आई केजरीवाल सरकार, देना पड़ा हिन्दू बच्चों को स्कूल में दाखिला

दिल्ली हाईकोर्ट की सख्ती के बाद केजरीवाल सरकार पाकिस्तान से आए तीनों हिन्दू बच्चों को स्कूल में दाखिला देने के लिए मान गई। 17 अक्टूबर को मामले में सुनवाई के बाद न्यायधीश राजीव शकधर ने बच्चों के तुरंत दाखिले के आदेश दिए। कुछ दिन पहले बड़ी उम्र का हवाला देकर स्कूल से अचानक निकाल दिए गए संजिना बाई, मूना बाई और रवि कुमार को भाटी माइन्स के सरकारी स्कूल में कक्षा नौंवी में दाखिला मिला।

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के जुल्मों सितम से परेशान होकर दिल्ली आए इन हिन्दू बच्चों को महीनों से तालीम के अधिकार के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा था। लेकिन कुछ दिन पहले बच्चों के पिता गुलशेर ने सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल की मदद से दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका दायर करवाई। जिसके बाद न्यायधीश राजीव शकधर ने इस पर संज्ञान लिया और 11 अक्टूबर को दिल्ली सरकार को नोटिस भेजा।

नोटिस में दिल्ली सरकार से पूछा गया कि आखिर उन्हें बच्चों को दाखिला देने में क्या दिक्कत है? इस दौरान कोर्ट ने दिल्ली सरकार को जवाब देने का समय और अगली सुनवाई की तारीख 17 अक्टूबर तय की।

17 तारीख को मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकील रमेश सिंह ने न्यायधीश से कहा कि वो अपने आदेश में इस दाखिले को ‘इंसानियत के आधार पर (humanitarian ground )’ पर लिया फैसला बताएँ, लेकिन बच्चों के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे वकील अशोक अग्रवाल ने कहा, “कौन सी इंसानियत के आधार पर? हम भिखारी नहीं हैं, हम अपने अधिकारों की माँग कर रहे हैं? राज्य कभी दान नहीं करता, यह संविधान के अनुसार काम करता है।

इसके बाद न्यायधीश शकधर ने वकील अशोक अग्रवाल की बात से सहमत होते हुए कहा, “मिस्टर अग्रवाल सही बोल रहे हैं, राज्य कभी दान नहीं देता, संविधान के तहत यह बच्चों का अधिकार है।”

बता दें कि 14 मई को पाकिस्तान से दिल्ली आए ये बच्चे छतरपुर के भाटी माइन्स में अपने पिता गुलशेर के साथ रहते हैं। बीते दिनों आगे की शिक्षा जारी रखने के लिए इन्हें कई तरह की परेशानियों से होकर गुजरना पड़ा। स्कूल ने पहले दाखिला दिया भी, लेकिन फिर बड़ी उम्र का हवाला देकर स्कूल से कुछ ही दिन में निकाल दिया। बच्चों के पिता इस बीच दिल्ली सरकार के कई अधिकारियों से मिले, लेकिन उनकी गुहार अनसुनी ही रही। अंत में उन्होंने थक हारकर वकील अशोक अग्रवाल की मदद से न्यायपालिका की ओर रुख किया। जिसके बाद दिल्ली सरकार को उन्हें दाखिला देने के लिए मानना ही पड़ा।

पूरा मामला जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- ऑपइंडिया एक्सक्लूसिव: पाकिस्तान से आए हिंदू बच्चों को स्कूल ने निकाला, केजरीवाल सरकार में अनसुनी फरियाद

स्कूल के एक कमरे में बंद कर दिए 17 गाय, सभी की मौत: MP की घटना, कमलनाथ ने कहा – दुखद

मध्य प्रदेश में गोरक्षा और गोसेवा के दावे और वादे के साथ सत्ता में आई कमलनाथ सरकार के राज में ग्वालियर जिले में 17 गायों को बंद करके रखने के चलते मौत हो जाने का मामला सामने आया है। मामला डबरा सिटी थाना अंतर्गत समूदन गाँव का है, जहाँ सरकारी स्कूल के एक छोटे से कमरे में 17 गायों को पिछले कुछ दिनों से बंद कर बिना चारा-पानी के भूखे-प्यासे मरने के लिए छोड़ दिया गया था। 

जानकारी के मुताबिक, कमरे के अंदर से बदबू आने पर बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) की रात कुछ अज्ञात लोग जेसीबी से गड्ढा खोदकर मृत गायों को दफना रहे थे। जिसकी सूचना बजरंगदल, विश्व हिंदू परिषद और गोसेवकों को लग गई थी। सूचना मिलते ही हिंदू संगठनों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता रात को मौके पर पहुँचे। जिनको देखकर जेसीबी चालक सहित अन्य लोग भाग गए। हिंदूवादी संगठनों से इसको लेकर हंगामा करना शुरू कर दिया।

बाद में मौके पर एसडीएम राघवेंद्र पांडे, एसडीओपी उमेश सिंह तोमर अपले के साथ पहुँचे। जहाँ मौके पर जेसीबी जब्त की गई। राघवेंद्र पांडे ने पुलिस की मदद से गड्ढों से 17 मृत गायों को बाहर निकलवाया और फिर इनका पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया। राघवेंद्र पांडे ने नाराज गोसेवकों को मामले की जाँच कराए जाने का आश्वासन दिया। मामले को लेकर सिटी थाने में गोसुरक्षा अधिनियम के तहत अज्ञातों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

नई दुनिया में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

एसडीएम राघवेंद्र पांडे का कहना है कि शुरुआती जाँच में गायों की मौत की वजह उन्हें अवैध रूप से कई घंटों तक कमरों में बंद करके रखना माना जा रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि भूख-प्यास से गायों की मौत हुई होगी। वहीं, हिन्दूवादी संगठनों का कहना है कि गायों की हत्या की गई है। एसडीएम ने इस बाबत जिला अधिकारी, जनपद पंचायत सीईओ और डबरा के लोक निर्माण विभाग को नोटिस जारी कर मामले की जाँच 3 दिन में प्रतिवेदन भेजने का निर्देश दिया है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने गायों की मौत पर दुख प्रकट करते हुए कहा, “ग्वालियर के डबरा के समूदन  में 17 गायों की मृत्यु की ख़बर बेहद दुखद। इस घटना की निष्पक्ष जाँच के निर्देश। जाँच में जिसका दोष सामने आए, उस पर कड़ी कार्यवाही हो। हम गौमाता की रक्षा व संवर्धन के लिये निरंतर प्रयासरत व बचनबद्ध। ऐसी घटनाएँ बर्दाश्त नहीं की जा सकती है।”

17 गायों की मौत पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कमलनाथ को और हर पंचायत में गोशाला खोलने की उनकी योजना को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस ने अपने वचन पत्र में गौशाला बनाने का वचन दिया था। अगर शासन-प्रशासन गाय को गोशाला में ले जाता, तो वो किसी कमरे में बंद नहीं होती और मौत का शिकार नहीं होती। वचन देकर मुकरना, फिर गाय का मर जाना, ये गौ हत्या जैसा पाप है। शासन को पहल करनी चाहिए, ताकि ऐसे गोमाता न मरें।” उन्होंने आगे कहा, “कॉन्ग्रेस ने गोमाता को वोट प्राप्ति का साधन बना लिया है। ये गोमाता की रक्षा की बजाय अपने हितों को साधने का काम कर रहे हैं। मैं आग्रह करता हूँ कि गोमाता पर ऐसे खेल बंद होना चाहिए। सरकार तत्काल गौशालाएँ खोलें, उसमें गायों को भेजें, ताकि ये अकाल मृत्यु का शिकार न हों।”

गौरतलब है कि हाल ही में दिग्विजय सिंह ने भी सड़कों पर मौजूद गायों को गोशाला में भेजने के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ से कहा था कि आप सच्चे गोभक्त तभी कहलाएँगे जब गोमाता के लिए गोशाला खोलेंगे। दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया पर कमलनाथ ने ट्वीट कर बताया कि वो जिस मामले पर उनका ध्यान केंद्रित करवा रहे हैं, उस पर काम करने के लिए वे पहले से प्रयासरत हैं।

‘वाजपेयी नहीं करते थे किसी को नाराज़… जबकि फ़ैसले को कठोरता से लागू करने की क्षमता है मोदी के पास’

महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है, ऐसे में सियासी घमासान तेज़ होना लाज़मी है। इस दौरान बयानबाज़ी का दौर भी अपने चरम पर है। ऐसे में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष शरद पवार ने भी कुछ ऐसा कह डाला, जो शायद उनकी खुद की पार्टी के लिए उल्टा पड़ जाए। दरअसल, उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। और ऐसा करते हुए उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी जब कोई फ़ैसला लेते थे, तो वे इस बात का ध्यान रखते थे कि उस फ़ैसले से किसी को कोई समस्या न हो, यानी कोई उनके फ़ैसले से नाराज़ न हो। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी की बात करें तो वो किसी भी फ़ैसले के क्रियान्वयन के मामले में प्रभावी और कठोर हैं।

2017 में, पीएम मोदी के प्रथम कार्यकाल के दौरान पद्म विभूषण पुरस्कार पाने वाले शरद पवार ने पीटीआई को दिए साक्षात्कार में कहा, “वाजपेयी एक भद्र पुरूष थे, जबकि किसी कार्यक्रम के क्रियान्वयन के मामले मेंं मोदी एक प्रभावी व्यक्ति हैं। कोई फ़ैसला ले लेने के बाद उसे कठोरता से लागू करने की मोदी के पास क्षमता है।” उन्होंने कहा कि भाजपा के दिग्गज़ नेता स्वर्गीय वाजपेयी के प्रति लोगों के बीच काफ़ी सम्मान था। बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री के पद पर थे, उस दौरान उन्होंने पवार को आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था।

इसके अलावा, पवार ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस पर भी निशाना साधा और कहा कि उन्होंने राज्य में किसानों और उद्योगों की समस्याओं को हल करने के लिए कोई पहल नहीं की। उन्होंने कहा कि फडणवीस नतीजे देने वाले और प्रभावी मुख्यमंत्री नहीं माने जाते हैं।

पिछले कुछ समय में कुछ पूर्व मंत्रियों और विधायकों ने NCP को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया, इस सवाल पर पवार ने कहा कि इससे उनकी पार्टी को युवा चेहरों को चुनावी मैदान में उतारने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि NCP इन दल-बदलू नेताओं को हराने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा देगी। इस दौरान उन्होंने उस धारणा को भी ख़ारिज कर दिया कि कॉन्ग्रेस की छवि धूमिल हो गई है। उन्होंने संकेत दिया कि राज़्य में दोनों पार्टियाँ मिलकर लड़ेंगी।