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ममता के बंगाल में ‘जय श्रीराम’ बोलने पर BJP कार्यकर्ता पर TMC के गुंडों ने चलाई गोली

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में जय श्रीराम बोलने पर भाजपा कार्यकर्ता को कुछ लोगों ने दिनदहाड़े गोली मार दी। भाजपा कार्यकर्ता का नाम राम प्रसाद मंडल है। इस हमले में 38 वर्षीय कार्यकर्ता के दाहिने पैर में गोली लगी। भाजपा ने इस हमले का आरोप टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगाया है, लेकिन राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने खुद पर लगे आरोपों को खारिज किया है। साथ ही भाजपा पर झूठा आरोप लगाने और पार्टी को बदनाम करने की राजनीति करने का आरोप लगाया है।

जानकारी के मुताबिक ये घटना गुरुवार की है। मामले में पुलिस का कहना है रामप्रसाद मंडल नाम के व्यक्ति के पैर में गोली मारी गई हैं और फिलहाल वह अस्पताल में भर्ती हैं। पुलिस का कहना है कि मामले में जाँच शुरू हो चुकी है। पीड़ित पक्ष की ओर से थाने में सत्येंद्र सरदार, सन्यासी नस्कर, मनोरंजन सरदार, तपन नस्कर और पवित्र नस्कर के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है। लेकिन गिरफ्तारी की अब तक कोई सूचना नहीं हैं।

कहा जा रहा है रामप्रसाद मंडल अक्सर बरुईपुर में भाजपा के नेतृत्व में केंद्र सरकार की उपलब्धियों का जिक्र करता रहा था और जय श्रीराम का जप भी करता था। ये बात टीएमसी कार्यकर्ताओं को पसंद नहीं थी। पीड़ित के परिजनों के अनुसार टीएमसी कार्यकर्ताओं को जय श्रीराम का नारा लगाने पर आपत्ति थी।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित के भाई ने बताया, “मैं थोड़ी देर के लिए बाहर गया और जब मैं वापस आया, तो मैंने अपने भाई को घायल पाया। उसे गोली मार दी गई थी। दुर्गा पूजा के फंड के लिए मेरा एक समूह के लोगों के साथ झगड़ा हुआ था। उन्होंने शायद मेरे भाई पर हमला किया। इसके अलावा, मेरा भाई सड़कों पर ‘जय श्री राम’ का नारा लगाता था, जो एक और कारण भी हो सकता है। उस पर पहले भी दो बार हमला कर चुका है। “

भाजपा के स्थानीय नेताओं के अनुसार तो रामप्रसाद पार्टी का एक सक्रिय सदस्य है और अक्सर जय श्रीराम बोला करता था। उससे नाराज होकर ही टीएमसी के कार्यकर्ताओं (गुंडों) ने उसपर हमला किया हैं। जानकारी के अनुसार इस घटना के बाद वहाँ तनाव का माहौल है। टीएमसी दावा कर रही है कि ये हमला भाजपा की अंदरूनी कलह का नतीजा है।

वहीं, बता दें कि दक्षिण 24 परगना (पूर्व) के जिला अध्यक्ष सुनीप दास ने आरोप लगाया है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा के उदय के बाद टीएमसी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को धमकाना शुरू कर दिया है और स्थानीय टीएमसी नेता भाजपा कार्यकर्ताओं को नियमित रूप से परेशान करते रहे हैं।

जेपी आंदोलन का जहर तो बिहार के हिस्से आया, लेकिन रत्न कहाँ गए?

ये वो दौर था जब गुजरात में ‘नव निर्माण’ नाम के छात्र आन्दोलन ने सरकार को उखाड़ फेंका था। गुजरात की ही तर्ज पर बिहार में भी आन्दोलन शुरू हो चुका था। मगर वहाँ और यहाँ एक अंतर था। बिहार की छात्र राजनीति में सक्रिय राजनैतिक दलों की छात्र इकाइयाँ भी शामिल हो रही थीं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी युवजन सभा, लोक दल, ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन इत्यादि बिहार के आन्दोलन में शामिल हुए। विपक्षी पार्टियों ने उस वक्त की कॉन्ग्रेसी सरकार के खिलाफ हड़ताल का आह्वान किया। राज्य भर में जब 1973 में हड़ताल की बात चल रही थी, तब राज्य की कमान कॉन्ग्रेस पार्टी के अब्दुल गफ्फूर के हाथ में थी।

इसी वक्त मध्य प्रदेश में 17 अगस्त 1973 को पुलिस की गोलियों से 8 छात्रों की मौत हुई और रैना जाँच आयोग ने इसके लिए सीधे तौर पर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार को दोषी बताया। बिहार भर के कई छात्र नेता उस वक्त बिहार छात्र संघर्ष समिति (बीसीएसएस) के तौर पर एक जगह इकठ्ठा होने लगे और 18 फरवरी 1974 को बीसीएसएस की बैठक हुई। इसमें लालू प्रसाद यादव को बीसीएसएस का प्रेसिडेंट चुना गया था। इस बीसीएसएस में सुशील कुमार मोदी और रामविलास पासवान जैसे नेता भी शामिल थे। 18 मार्च 1974 को बीसीएसएस ने बिहार विधानसभा का बजट सत्र के दौरान घेराव करने का फैसला किया।

इस घेराव के दौरान भूतपूर्व शिक्षा मंत्री रहे रामानंद सिंह का आवास ही जला दिया गया था। मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फूर ने छात्रों को समझाने की कोशिश की थी, मगर राज्य भर में चल रहे आन्दोलन में तब तक पटना में कुछ छात्र पुलिस के हाथों मारे जा चुके थे। बीसीएसएस ने 23 मार्च को फिर से बिहार भर में हड़ताल का आह्वान किया। जब बिहार भर में ये सब चल रहा था, तब जय प्रकाश नारायण गुजरात में ‘नव निर्माण’ आन्दोलन देखकर लौटने की तैयारी में थे। राजनैतिक रूप से ये ‘भूदान आंदोलन’ के खत्म होने का दौर भी था और जेपी अपने आप को भूदान आन्दोलन से अलग कर रहे थे। फरवरी के शुरुआती दौर से शुरू हुई ये कवायद आखिर 30 मार्च 1974 को खत्म हुई, जब उन्होंने आन्दोलन में शामिल होने की अपनी मंशा साफ जाहिर कर दी।

केंद्र की राजनीति और इन्दिरा गाँधी पर इन आन्दोलनों का असर न पड़ रहा हो, ऐसा भी नहीं था। ये जरूर कहा जा सकता है कि उस वक्त वो दूसरे मामलों में भी व्यस्त रही होंगी। ‘सरकारी संत’ कहलाने वाले विनोबा भावे के आन्दोलन से अलग होकर कॉन्ग्रेसी सरकार को हटाने के छात्र आन्दोलन में शामिल हो रहे जेपी के बारे में तब इन्दिरा गाँधी ने कहा था, “जो पूँजीपतियों से पैसा और मदद लेता रहता है, आखिर ऐसा आदमी भ्रष्टाचार पर बात भी कैसे कर सकता है?” कॉन्ग्रेसी समाजवाद उद्योगपतियों को भ्रष्ट और देश का शत्रु ही मानता था। उनकी ये सोच नेहरु वाले रिसाव के सिद्धांत से काफी हद तक आम आदमी में भी आई। विनोबा भावे ने इसके थोड़े ही समय बाद लगे आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’ घोषित किया था।

अप्रैल आते-आते ये आन्दोलन पूरी तरह जोर पकड़ चुका था। 8 अप्रैल को हजारों छात्र पटना के मौन जुलूस में शामिल हुए। गया में 12 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोलियाँ चलाई और लोग मारे गए। जवाब में आम जनता ने बिहार विधानसभा को भंग करने की माँग उठाई। एनएच 31 जाम कर दिया गया और लोगों ने खुद ही अपने आप पर कर्फ्यू लगा लिया। अप्रैल के इस दौर में जेपी दिल्ली में नागरिक अधिकारों की माँग करने वाले संगठनों के साथ मिलकर सरकार का इस्तीफा माँग रहे थे। जाहिर है ये माँगें कामयाब नहीं हुईं। इस दौर तक ये आन्दोलन अपने पूरे शबाब पर नहीं आया था। सत्ता और विपक्ष दोनों ओर से रस्साकशी जारी थी और आम लोगों का पलड़ा भारी दिख रहा था।

ये अलग बात है कि कुर्सी के लालच में पड़े राजनीतिज्ञ उस वक्त भी जनभावना को समझने से साफ इनकार कर रहे थे। 5 जून को आयोजित रैली में जेपी ने जनता से बिहार विधानसभा पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए कहा। जल्द ही ‘सम्पूर्ण क्रांति’ कहलाने वाले आन्दोलन का दौर आने लगा था। 1 जुलाई 1974 तक करीब 1600 प्रदर्शनकारी और 60 से अधिक छात्र नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे। जेपी ने 3 अक्टूबर से तीन दिन की राज्यव्यापी हड़ताल बुलाई और 6 अक्टूबर को एक जनसभा को भी संबोधित किया। नव निर्माण की ही तर्ज पर विधायकों से इस्तीफा देने के लिए भी कहा गया था लेकिन जैसा कि पहले ही कहा कि अपनी आँखों पर चढ़ी चर्बी के कारण राजनीतिज्ञ जनभावना नहीं समझ रहे थे। उस समय के 318 विधायकों में से केवल 42 ने इस्तीफा दिया था। कईयों ने इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया।

इन्दिरा गाँधी ने बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फूर को नहीं बदला। वो गुजरात की तरह बिहार में ‘कमजोर पड़ती’ नहीं दिखना चाहती थीं। गुजरात में चुनाव टाल दिए गए थे और मोरारजी देसाई के अनशन के बाद वहाँ 10 जून 1975 को चुनाव हुए। इन चुनावों में कॉन्ग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी थी और 12 जून 1975 को जिस दिन ये नतीजे आए, उसी दिन इलाहबाद हाई कोर्ट ने 1971 के लोकसभा चुनावों में धाँधली करने के आरोप में इन्दिरा गाँधी का चुनाव रद्द कर दिया। इस फैसले के कारण वो संसद से तो निकाली ही गई, साथ ही उन पर 6 साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबन्ध भी लगाया गया था। अदालत के फैसले को मानने से साफ इनकार करते हुए ‘आयरन लेडी’ फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गईं।

फिर तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी को कहकर मुख्य न्यायाधीश के तौर पर एएन रे को लाकर बिठाया गया। जेपी ऐसे फैसलों के भी विरोध में थे और इस बारे में भी उन्होंने इन्दिरा गाँधी को चिट्ठियाँ लिखी थीं। सत्ता कायम रखने के लिए इन्दिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को लोकतंत्र का गला घोंट दिया। देश में आपातकाल लागू हो गया, जिसे ‘सरकारी संत’ कहलाने वाले विनोबा भावे ने ‘अनुशासन पर्व’ भी घोषित कर दिया था। जय प्रकाश नारायण और सत्येन्द्र नारायण सिन्हा जैसे कई नेता इस दौर में गिरफ्तार कर लिए गए। जेपी को उस दौर में चंडीगढ़ में रखा गया था और बिहार की बाढ़ पर जनता की मदद के लिए उन्होंने पेरोल भी माँगा था। उनकी तबियत बिगड़ने पर जब 12 नवम्बर को उन्हें छोड़ा गया तो मुंबई के जसलोक अस्पताल में जाँच में पता चला कि उनकी किडनी फेल हो चुकी है। उस समय से बाकी की उम्र जेपी ने डायलिसिस पर गुजारी।

अब जब मुड़कर इस आन्दोलन को देखा जाए, तो ये आन्दोलन बिहार को कई राजनीतिज्ञ देने के लिए याद किया जा सकता है। इस आन्दोलन से निकले लालू प्रसाद यादव 1977 में 29 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के सांसद बने। आज कल चारा घोटाले के जुर्म में लालू यादव जेल की सजा काट रहे हैं। उनके शासन काल को बिहार में जातिवादी राजनीति के उदय के अलावा हाईकोर्ट की टिप्पणी में ‘जंगलराज’ घोषित करने के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने ‘गोपालगंज टू रायसीना’ नाम की किताब भी लिखी है। गोपालगंज से वो लम्बे समय तक सांसद रहे और रेल मंत्री भी बने। इस रेल मंत्री के गोपालगंज में रेलवे स्टेशन कहाँ है, ये गंभीर शोध का विषय हो सकता है।

इसी आन्दोलन से रामविलास पासवान जैसे राजनीतिज्ञ भी उभर कर आए। वो कॉन्ग्रेस, गठबंधन और भाजपा सभी सरकारों में मंत्री होने के लिए याद किए जा सकते हैं। कभी-कभी उन्हें राजनीति का बैरोमीटर भी कहा जाता है। वो जिस पक्ष के साथ दिखें, उनकी चुनावी जीत की संभावना प्रबल होती है। अपने ही परिवार के लोगों को राजनैतिक पार्टी बना डालने में वो भी दूसरे समाजवादियों जैसे ही रहे हैं। इसी आन्दोलन से निकले सुशील कुमार मोदी की सत्तर के दशक में पटना के जलजमाव पर अनशन की तस्वीरें नजर आती हैं। अब वो उप मुख्यमंत्री हैं और पटना के जलजमाव से पिछले ही वर्ष की तरह इस वर्ष भी उनका आवास डूबा रहा।

भारतीय पौराणिक कथाओं में एक समुद्र मंथन का जिक्र मिलता है। सुर-असुर दोनों ने मिलकर जो समुद्र मंथन किया था, उसमें कई निधियों के साथ हलाहल विष भी निकला था। अगर बिहार की राजनीति में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ को समुद्र मंथन माना जाए तो उससे निकले नेता ‘हलाहल’ ही लगते हैं। बाकी सवाल ये है कि अगर सम्पूर्ण क्रांति से निकल हलाहल हम बिहारियों के हिस्से आया, तो फिर सारी निधियाँ कहाँ गईं?

ग्रामीणों ने बांग्लादेश के 3 सैनिकों को हिरासत में लिया, भारतीय नागरिक के अपहरण की थी कोशिश

गुरुवार (10 अक्टूबर) को त्रिपुरा में सिपाहीजला ज़िले के एक इलाक़े में तनाव फैल गया जिसके बाद बांग्लादेश के सुरक्षा बल के सदस्यों ने कथित तौर पर एक भारतीय नागरिक का अपहरण करने की कोशिश की। ग्रामीणों ने बांग्लादेश की अर्धसैनिक बल रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) के तीन लोगों को हिरासत में ले लिया और उनके साथ मारपीट की। यह हादसा सुबह 9 बजे कलामचरा के बॉर्डर पिलर नंबर-2059 के पास हुआ।

ख़बर के अनुसार, सीमा सुरक्षा बल (BSF) और पुलिस टीमों ने मौक़े पर पहुँचकर पैराट्रूपर्स को बचाया और उन्हें बीएसएफ की आशबाड़ी सीमा चौकी पर ले गए।

ग्रामीणों ने कहा कि पैराट्रूपर्स ने अबू खैहर का अपहरण करने की कोशिश की थी, जिनकी माँ का गुरुवार को भोर से पहले निधन हो गया था। बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (BGB) और बीएसएफ ने कलमाचरा में दोपहर में एक फ्लैग मीटिंग भी की।

वहीं, ढाका ट्रिब्यून की ख़बर में इस बात की पुष्टि की गई कि ग़लती से सीमा पार करने के बाद बांग्लादेशियों को हिरासत में लिया गया था। भारत की सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) के तीन सदस्यों और ब्राह्मणपारा अपज़िला, कोमिला के अंतर्गत आसबारी सीमा की दो महिला मुख़बिरों को हिरासत में लिया।

हालाँकि, बीएसएफ ने बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के साथ की गई एक फ्लैग मीटिंग के बाद, एक ही सीमा बिंदु के माध्यम से 5 बजे के आसपास सभी पाँचों को सौंप दिया। इसकी पुष्टि, BGB की संगुकुएल BOP के कंपनी कमांडर सूबेदार नुरुल इस्लाम ने की। उन्होंने कहा, “जब उन्हें हमें सौंपा गया तो वे बीमार दिखाई दे रहे थे।”

RAB अधिकारियों की पहचान कॉन्स्टेबल्स रिगन बरुआ, अब्दुल मतीन और सैनिक वाहिदुल इस्लाम के रूप में हुई। सभी RAB, 11 की दूसरी अपराध रोकथाम कंपनी (सीपीसी 2) से जुड़े हैं।

महिला मुखबिरों में से एक की पहचान लिजा के रूप में की गई, जबकि दूसरी महिला के बारे में कहा गया कि वो उसी की ऑन्टी थी, लेकिन जब उसकी रिपोर्ट दर्ज कराई गई तो उसकी पहचान अनुपलब्ध थी।


राफेल की शस्त्र पूजा से मचे रार पर फवाद चौधरी के उलट अब Pak सेना आई बचाव में, कह दी ये बात

फ्राँस जाकर राफेल की शस्त्र पूजा करने पर राजनाथ सिंह को अपने देश में विपक्षियों द्वारा घेरा जा रहा है। लेकिन पाकिस्तान की सेना ने इसका समर्थन किया है। हालाँकि, खुद राजनाथ सिंह ने भी देश लौटकर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए कहा है, “मैं बचपन से मानता हूँ कि प्राकृतिक शक्ति है, जिसकी पूजा करने में कोई बुराई नहीं हैं।”

लेकिन पाकिस्तानी आर्मी के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने शस्त्र पूजा पर विरोध करने वालों पर कहा, “इसमें कुछ भी गलत नहीं है, क्‍योंकि यह धर्म के अनुरूप है।” गफूर के अनुसार, शस्त्र पूजा धर्मसम्‍मत है और इसका आदर होना चाहिए। उनका कहना है कि याद रखें यह केवल मशीन नहीं है जो मायने रखती है, बल्‍कि मशीन चलाने वाले का संकल्‍प और जुनून अहमियत रखता है।

इसके बाद गफूर ने अपनी वायुसेना के पास मौजूद शाहीन मिसाइल का जिक्र किया। उन्होंने लिखा हमें भी अपनी पाकिस्तान एयरफोर्श की शाहीन पर गर्व है।

पाकिस्तानी सेना की ओर से आसिफ गफूर की ओर से आया ये बयान वाकई देश में बैठकर आलोचना करने वालों के लिए एक बड़ा जवाब है। लेकिन ज्ञात हो कि इससे पहले पाकिस्तान की इमरान सरकार के मंत्री फवाद चौधरी भारत को मिले राफेल लड़ाकू विमान का मजाक उड़ा चुके हैं। वे नींबू-मिर्ची के साथ राफेल की फोटो शेयर करने पर भारत पर तंज कस चुके हैं।

इसके अलावा बता दें कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने भी राफेल की रिसीविंग पर मोदी सरकार पर निशाना साधा है। शस्त्र पूजा को लेकर कहा जा चुका है कि राफेल को रिसीव करने के बहाने मोदी सरकार अपना भगवा एजेंडा चला रही है। लेकिन दूसरी ओर राजनाथ सिंह ये कह चुके हैं कि हमारी वायुसेना विश्व की चौथी सबसे शक्तिशाली वायुसेना है और राफेल के आने से इसकी क्षमता में कई गुना ज्यादा वृद्धि होगी, जिससे इस क्षेत्र की शांति और सुरक्षा व्यवस्था और ज्यादा सुदृढ़ होगी। उन्होंने बड़े विनम्रता से देश लौटकर राफेल की पूजा पर जवाब दिया है।

PMC Bank घोटाला: राकेश और सारंग वाधवन से संबंधित 70 करोड़ के ‘दीवान बंगले’ को ED ने किया जब्त

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक में 4355 करोड़ रुपए का घोटाला करने वाले एचडीआईएल के निदेशक राकेश वधावन और सारंग वधावन से संबंधित एक आलीशान बंगले को जब्त कर लिया है। यह संपत्ति मुंबई के बाहरी इलाके में वसई के देव तलाओ क्षेत्र में 5 एकड़ में फैली हुई है। इसे दीवान बंगले के रूप में जाना जाता है। इस जमीन की कीमत तकरीबन 70 करोड़ रुपए बताई जा रही है।

बता दें कि वधावन फिलहाल मुंबई की एस्प्लेनेड कोर्ट के आदेश के बाद 14 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में हैं। इस दौरान, वे पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक में 4,355 करोड़ रुपए के घोटाले में पूछताछ का सामना कर रहे हैं। पूर्व पीएमसी बैंक के चेयरमैन वरियाम सिंह और पीएमसी बैंक के पूर्व एमडी जॉय थॉमस भी पुलिस हिरासत में हैं।

अब तक, ईडी ने राकेश वधावन और सारंग वधावन और उनके परिवार के सदस्यों से संबंधित कई संपत्तियों की जाँच की है। इस सिलसिले में जाँच एजेंसी ने नौ सीटर डसॉल्ट फाल्कन 200 और एक बॉम्बार्डियर चैलेंजर 300 सहित दो निजी व्यापार जेट्स जब्त किए हैं। इसके साथ ही अलीबाग के अवास बीच पर ढाई एकड़ में फैले उनके घर पर छापे के दौरान तीन एसयूवी बरामद की गई थी।

जाँच के दौरान ईडी को वधावन की बॉलीवुड की कई मशहूर हस्तियों और राजनेताओं के साथ की वो तस्वीरें हासिल हुई हैं, जिसमें वो लोग छुट्टियों के दौरान वधावन के घर पर पार्टी करते नजर आए। अब ईडी यह जाँच कर रही है कि क्या वधावन ने उन्हें संपत्ति भेंट की है। एजेंसी ने वधावन के स्वामित्व वाली 15 कारों को भी जब्त किया है, जिसमें दो रोल्स-रॉयस, दो रेंज रोवर्स और एक बेंटले शामिल हैं।

ईडी को मालदीव में वधावन से संबंधित एक शानदार नौका का भी पता लगा है और वित्तीय जाँच एजेंसी द्वारा नौका को जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। ईओडब्ल्यू ने मामले में लगभग 4,000 करोड़ रुपए की संपत्ति भी जब्त की है।

‘अयोध्या पर फ़ैसला अगर पक्ष में आए तो भी मस्जिद बनना मुमकिन नहीं, ज़मीन हिन्दुओं को दे दी जाए’

जहाँ एक तरफ़, सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए 17 अक्टूबर की तारीख तय कर रखी है, वहीं दूसरी तरफ़ इस ज़मीनी विवाद का मध्यस्थता के ज़रिए हल निकालने की एक और कोशिश शुरू की है। इसके लिए ‘इंडियन मुस्लिम फॉर पीस’ नाम के संगठन ने गुरुवार (10 अक्टूबर) को बैठक की। इस बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि करोड़ो हिन्दुओं की आस्था को देखते हुए विवादित ज़मीन राम मंदिर के निर्माण के लिए दे दी जाए। बैठक में कुल चार प्रस्ताव पारित किए गए, जिन्हें बाबरी मस्जिद के पक्षकार सुन्नी वक़्फ बोर्ड के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता कमेटी को भेजा जाएगा। 

चार प्रस्ताव इस प्रकार हैं:

  1. मंदिर-मस्जिद मसले का हल कोर्ट के बाहर हो।
  2. मस्जिद बनाने के लिए कोई अच्छी जगह दी जाए।
  3. प्रोटेक्शन ऑफ़ रिलीजन क़ानून-1991 के तहत तीन महीने की सज़ा को बढ़ाकर तीन साल या उम्र क़ैद की जाए।
  4. अयोध्या के रास्ते में जितनी भी मस्जिदें, दरगाह या इमामबाड़े हैं, उनकी मरम्मत की सरकार अनुमति दे।

ख़बर के अनुसार, संगठन के पदाधिकारियों के मुताबिक़ यह क़दम इसलिए उठाया जा रहा है जिससे भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता की पहचान बनी रहे और किसी पक्ष को नीचा ना देखना पड़े। बता दें कि इस संगठन में तमाम पदाधिकारी वही लोग शामिल थे, जो पिछले काफ़ी दिनों से आर्ट ऑफ़ लिविंग के श्री श्री रविशंकर के साथ समझौते को लेकर बातचीत कर रहे हैं।

इस नए संगठन का गठन इन सभी लोगों ने किया है। इसमें रिटायर्ड फ़ौजी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ज़मीरउद्दीन शाह, रिटायर्ड जज, रिटायर्ड आईएएस अनीस अंसारी, रिटायर्ड आईपीएस, रिसर्च फाउंडेशन के अतहर हुसैन समेत शहर के कई गणमान्य मुस्लिम और हिंदू लोग शामिल थे।

बैठक में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के पूर्व कुलपति रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल ज़मीरउद्दीन शाह ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ भी जाए तो मस्जिद बनना मुमकिन नहीं है। इसलिए बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ज़मीन उन्हें गिफ्ट कर दी जाए। इससे सौहार्द बना रहेगा। उन्होंने कहा कि इस बात पर सुन्नी सेंट्रल बोर्ड भी हमारे साथ है। हालाँकि, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पदाधिकारियों ने इस तरह की किसी भी बातचीत से इनकार किया है।

पूर्व IAS अनीस अंसारी ने कहा कि यह देश का सबसे गंभीर साम्प्रदायिक मामला है। इसका हल आपसी बातचीत के ज़रिए निकाला जाना चाहिए। हमने जो प्रस्ताव पास किया है, उसे सुन्नी वक़्फ बोर्ड के मार्फ़त शीर्ष अदालत की मध्यस्थता समिति में भेजेंगे। उन्होंने कहा कि वो मानते हैं कि शीर्ष अदालत में केस लड़ना एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन मध्यस्थता बेहतर रास्ता है।

वहीं, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के सचिव ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि अयोध्या मामले पर शीर्ष अदालत जो भी फ़ैसला करेगा उसे ही माना जाएगा। इस मामले में पर्सनल लॉ बोर्ड और बाबरी एक्शन कमेटी का स्टैंड आज भी वही है।

मध्यस्थता के लिए आयोजित इस बैठक का कुछ मुस्लिम संगठनों ने विरोध भी किया। इत्तेहादुल मुस्लिम मजालिस संगठन ने होटल के बाहर प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि जब 18 नवम्बर तक फ़ैसला आ जाएगा तो उससे पहले मध्यस्थता का क्या मतलब है? कुछ लोग सिर्फ़ अपनी राजनीति चमकाने के लिए आम जनता को बहकाने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा इंडियन मुस्लिम लीग ने भी गाँधी प्रतिमा पर प्रदर्शन किया। संगठन के मोहम्मद अतीक ने कहा कि बाबरी मस्जिद के नाम पर सौदेबाज़ी की जा रही है।

पीसी चाको हैं शीला दीक्षित की मौत के जिम्मेदार, कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें: संदीप दीक्षित

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की मृत्यु के बाद आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी दिल्ली कॉन्ग्रेस बिना अध्यक्ष के दो हिस्सों में बँटती नजर आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शीला दीक्षित के बेटे एवं पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने दिल्ली कॉन्ग्रेस प्रभारी पीसी चाको को कानूनी नोटिस भेजकर उन्हें अपनी माँ की मौत का जिम्मेदार ठहराया है।

उल्लेखनीय है कि शीला दीक्षित का निधन इसी वर्ष 20 जुलाई को हुआ था। जिस समय उनकी मौत हुई उस वक्त वे दिल्ली कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष थीं। संदीप दीक्षित के मुताबिक उनके निधन से कुछ दिन पहले उनके और पीसी चाको के बीच दिल्ली कॉन्ग्रेस के कामकाज को लेकर विवाद हुआ था। उनका कहना है कि चाको के मानसिक उत्पीड़न से उनकी माँ का निधन हुआ था।

संदीप दीक्षित ने पीसी चाको को नोटिस भेजकर माँग की है कि शीला को दिए गए मानसिक उत्पीड़न के लिए चाको माफी माँगे वरना वे कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। दीक्षित ने माफी न माँगने की हालत में चाको के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की भी बात अपने कानूनी नोटिस में लिखी है।

एबीपी न्यूज की खबर के अनुसार अस्वस्थ हालात में शीला दीक्षित द्वारा लिए गए दिल्ली कॉन्ग्रेस से जुड़े फैसले को पीसी चाको ने जिस प्रकार रोका, वे उससे बेहद आहत थीं। इन्हीं सब विवादों के चलते उनकी सेहत पर असर पड़ा।

खबरों के मुताबिक इस पूरे मामले की पुष्टि पीसी चाको और संदीप दीक्षित के नजदीकी सूत्रों ने की हैं। हालाँकि चाको ने कहा है कि वे नहीं बता सकते कि चिट्ठी में क्या है? लेकिन चाको की ओर से ये चिट्ठी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भेज दी गई है।

पूरा मामला

गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में हार के बाद अस्वस्थ हालत में अस्पताल में रहते हुए भी शीला दीक्षित ने सभी ब्लॉक कमेटियों को भंग करने, तीनों कार्यकारी अध्यक्षों के कार्यभार में फेरबदल और सभी 280 ब्लॉक में आब्जर्वर नियुक्त करने का अहम फैसला लिया था। लेकिन चाको ने उनके फैसले पर रोक लगा दी और पुरानी कमेटियों को बहाल रखा। इसके बाद से ही उन दोनों के बीच मनमुटाव बढ़ गया था। फिर, पूर्व मुख्यमंत्री अस्पताल से घर लौट आईं लेकिन उनका कुछ दिनों में निधन हो गया और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पद खाली हो गया।

कहा जाता है शीला दीक्षित ने अपने निधन से पहले कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को एक पत्र भी लिखा था, लेकिन उसमें क्या था इसका खुलासा अभी सार्वजनिक तौर पर नहीं हुआ। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक शीला दीक्षित ने अपने पत्र में सोनिया गाँधी से पार्टी में चल रही गुटबाजी को परेशानी का कारण बताया था। उन्होंने ये भी आरोप लगाया था कि पीसी चाको किसी वरिष्ठ नेता के इशारे पर पार्टी को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं।

इसके बाद ये जगजाहिर है कि उनके आखिरी दिनों में मानसिक तौर पर परेशान रहने की बात उनके बेटे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं। उन्होंने अपनी माँ के मौत के बाद ये भी कहा था कि पार्टी में कुछ लोग ओछी हरकत कर रहे हैं।, जिसका नुकसान पार्टी को हुआ।

ब्लैक लिस्ट होने के डर से पाक का नया पैंतरा: दिखावे के लिए हाफिज सईद के 4 टॉप आतंकी किए गिरफ्तार

आतंक के खिलाफ लड़ाई में हमेशा दोहरा चरित्र अपनाने वाले पाकिस्तान ने एक बार फिर से दुनिया को धोखा देने की साजिश रची है। जहाँ एक ओर पाकिस्तान पर फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (FATF) की तरफ से ब्लैक लिस्ट होने का खतरा मंडरा रहा है, वहीं दूसरी और पाकिस्तान ने इससे बचने के लिए फिर से एक दिखावा किया है।

दरअसल, पाकिस्तान ने आतंक के खिलाफ लड़ाई का ढोंग करते हुए गुरुवार (अक्टूबर 10, 2019) को मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज सईद के संगठन लश्कर-ए-तैयबा के चार टॉप आतंकियों को गिरफ्तार किया है। चारों को टेरर फंडिंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार चारों आतंकी की पहचान प्रोफेसर जफर इकबाल, याहया अजीज, मुहम्मद अशरफ और अब्दुल सलाम के रूप में हुई है। पाकिस्तान प्रशासन ने दावा किया है कि आतंकी फंडिंग के मामले में लश्कर-ए-तैयबा और हाफिज सईद के संगठन जमात उद दावा (जेयूडी) के पूरे शीर्ष नेतृत्व पर कार्रवाई की जाएगी।

खूंखार आतंकियों के खिलाफ पाकिस्तान की यह कार्रवाई एफएटीएफ की बैठक से पहले सामने आई है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों एफएटीएफ से जुड़े एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) ने माना था कि पाकिस्तान ने यूएनएससीआर 1267 के प्रावधानों को उचित तरह से लागू नहीं किया। वह मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज समेत दूसरे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहा है। ऐसे में अगले हफ्ते पेरिस में होने वाली बैठक में उसे ग्रे लिस्ट से हटाकर ब्लैक लिस्ट में रखा जा सकता है। यह बैठक 12 से 15 अक्टूूबर के बीच होनी है।

एफएटीएफ टेरर फंडिंग और आतंकवाद के चलते पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाल चुका है। अब एफएटीएफ पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डालने की प्लानिंग बना रहा है। इससे पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ गई है। वह इससे बचने के लिए आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का नाटक कर रहा है।

काउंटर टेरोरिज्म डिपार्टमेंट (CTD) के प्रवक्ता ने कहा कि प्रतिबंधित संगठन जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैय्यबा के टॉप आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया है. इन आतंकियों को सीटीडी पंजाब ने नेशनल एक्शन प्लान (NAP) के तहत टेरर फंडिंग के आरोप में गिरफ्तार किया है। सीटीडी ने कहा कि लश्कर-ए-तैय्यबा और जमात-उद-दावा का सरगना हाफिज सईद पहले से ही लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद है। 2008 के मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को 17 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ केस चलाया जा रहा है।

कॉलोनी में रहना है, तो असलम भाई कहना है, समझ गए ना, यहाँ मोदी जी नहीं आएँगे: बंद कराया भजन

सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है। यह वीडियो है महाराष्ट्र के मलाड का, जहाँ एक मुस्लिम युवक असलम अपने कुछ साथियों के साथ दुर्गा पंडाल में बज रहे भजन को न सिर्फ़ बंद करने का हुक़्म दिया बल्कि पंडाल में मौजूद लोगों को धमकीभरे लहज़े में चेतावनी देते हुए कहा, “कॉलोनी में रहना है, तो असलम भाई-असलम भाई कहना है, समझ गए ना। यहाँ मोदी जी नहीं आएँगे, यहाँ असलम भाई ही आएँगे…बस।”

महज़ 37 सेकंड के इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि असलम नाम का यह शख़्स पंडाल के लोगों पर किस तरीक़े से अपनी धौंस जमाता है। इस वीडियो को देखकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इलाक़े के लोगों पर असलम का काफ़ी दबदबा है क्योंकि जैसे ही उसने भजन बंद करने को कहा तो उन्होंने बज रहे भजन को डरकर तुरंत बंद कर दिया। और यह पूछे जाने पर कि क्या कहना तो डरकर जवाब दिया कि ‘असलम भाई-असलम भाई कहना है’।

ख़बर के अनुसार, इस वीडियो को विश्व हिन्दू परिषद् के नेता ने भी शेयर किया और लिखा कि कुछ शांतिप्रिय गुंडों ने गरबा पंडाल में भक्ति गीत बंद कर दिए, यह मुंबई का मलाड क्षेत्र है। लेकिन, यह धर्मनिरपेक्षता है और हमारे लिबरल्स को यह ग़लत नहीं लगा।

यह सर्वविदित है कि हमारे देश में दुर्गा पूजा का उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहाँ एक तरफ़ भक्तजन आस्था के इस पर्व में सराबोर दिखते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ मुस्लिम समुदाय ने आस्था के इस पर्व पर हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम देकर न सिर्फ़ हिन्दुओं की आस्था को तार-तार किया बल्कि उनके धार्मिक अनुष्ठानों में कई तरह के व्यवधान भी डाले। कहीं ईंट-पत्थर, तलवार और हथियार से हमले किए गए। कितनी ही मूर्तियाँ तोड़ी गईं। इतना ही नहीं, विसर्जन के दौरान मार्ग पर मांस के टुकड़े तक बिखेरे गए।

माओवादियों से संबंध के आरोप में UAPA के तहत, उस्मानिया यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर गिरफ्तार

तेलंगाना पुलिस ने उस्मानिया विश्वविद्यालय के एक सहायक प्रोफेसर डॉ के जगन को कथित माओवादियों के लिंक के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। तेलंगाना पुलिस ने प्रतिबंधित माओवादी दलों के कथित संबंधों वाले व्यक्तियों पर अपनी कार्रवाई जारी रखते हुए हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में कार्यरत एक सहायक प्रोफेसर डॉ के जगन के आवास पर तलाशी ली। 

डॉ जगन के हैदराबाद के तरनाका स्थित निवास पर ली गई तलाशी के दौरान भड़काऊ सामग्री, माओवादी पार्टी के लेटरहेड और प्रतिबंधित साहित्य बरमाद हुई। जिसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस अधिकारी जोगुलाम्बा गडवाल ने गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए कहा, “हमने जगन को गिरफ्तार किया है, जो उस्मानिया विश्वविद्यालय में एक सहायक प्रोफेसर है। जगन को हमने गैरकानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया है। अब तक मामले में चार सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें एक छात्र संगठन अध्यक्ष भी शामिल है।”

पुलिस के मुताबिक, प्रोफेसर के पास से नक्सलियों को लिखे गए पत्र भी बरामद किए गए। जोगुलाम्बा गडवाल ने कहा, “हमने उनके लैपटॉप में माओवादी पार्टी से संबंधित अन्य दस्तावेज भी जब्त किए हैं। आरोपित लगातार माओवादी पार्टी के सदस्यों के संपर्क में थे और उनमें से एक उनके लिए भर्ती भी था।” वहीं दूसरी ओर, विप्लव रचायतुला संगम (क्रांतिकारी लेखक संघ) के सदस्यों ने गिरफ्तारी की निंदा करते हुए जगन की तत्काल रिहाई की माँग की है।