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BSP नेता मुख्तार अंसारी के बेटे के घर में छापेमारी, 6 विदेशी बंदूकों सहित 4431 कारतूस बरामद

उत्तर प्रदेश के बहुजन समाजवादी पार्टी के नेता मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी के दिल्ली स्थित घर पर लखनऊ पुलिस ने गुरुवार (अक्टूबर 17, 2019) को छापेमारी करके 6 बंदूक और 4,431 कारतूस बरामद किए।

बरामद हथियारों की कीमत लाखों में बताई जा रही है। इनमें इटली, ऑस्ट्रिया और स्लोवेनिया मेड रिवॉल्वर, बंदूक और कारतूस शामिल हैं। इसके अलावा अब्बास के पास से मैंग्नम की रायफल, अमेरिका मेड रिवॉल्वर, ऑस्ट्रिया की स्लाइड और ऑटो बोर पिस्टल भी इस छापेमारी में जब्त हुई है।

जानकारी के मुताबिक अभी हाल ही अब्बास पर एक लाइसेंस पर एक से ज्यादा हथियार खरीदने के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ था। जिसे यूपी पुलिस ने महानगर कोतवाली में दर्ज किया था। इसके अलावा उस पर फर्जी तरीके से आर्म्स लाइसेंस को दिल्ली ट्रांसफर कराने का भी मुकदमा दर्ज था।

पढ़ें: 400 राउंड गोलियाँ, गवाहों की रहस्यमयी मौत लेकिन… हत्यारा कोई नहीं!

इन शिकायतों के आधार पर ही लखनऊ पुलिस ने अब्बास के दिल्ली में वसंत कुंज स्थित घर पर छापेमारी की और विदेशी हथियारों के साथ 4,431 के करीब कारतूसें बरामद कीं। इसके अलावा कई अन्य प्रकार के संदिग्ध उपकरण भी अब्बास के घर से बरामद हुए हैं।

मामले से संबंधित जारी प्रेस नोट के अनुसार पुलिस ने मुख्तार अंसारी के बेटे पर धारा 420, 467, 468, 471, और 30 आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है। इन नोट में हथियार बरामदगी के संबंधित सभी जानकारी दी गई हैं।

इसके अनुसार पुलिस ने इस छापेमारी में इटली से लाई गई एक 12 बोर की डबल बैरल, स्लोवेनिया से लाई गई 12 बोर सिंगल बैरल गन, इंडियन आर्म्स कॉर्प लखनऊ से खरीदी हुई 300 बोर रायफल, दिल्ली से खरीदी हुई 12 बोर डबल बैरल गन, शस्त्रागार मेरठ से खरीदी गई 357 बोर रिवॉल्वर Ruger, GP100 भी शामिल है।

पुलिस द्वारा जारी प्रेस नोट

यहाँ बता दें कि उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार अब्बास अंसारी ने साल 2012 में लखनऊ से ही डबल बैरल बंदूक का लाइसेंस प्राप्त किया था। इसके बाद उसने इसी के आधार पर अन्य हथियारों का भी सौदा किया और पुलिस को सूचित किए बिना दिल्ली पहुँच गया।

लेकिन शिकायत दर्ज होने के बाद अब्बास के ख़िलाफ कार्रवाई करने के लिए विभिन्न टीमें गठित की गई और जानकारी के आधार पर अब्बास के निवास स्थान पर छापेमारी हुई। जिसमें अब्बास पर लगाए आरोप सही मिले।

‘अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था, न कि पैगंबर मुहम्मद का… मुस्लिम समुदाय यह जानती है’

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई पूरी कर ली है और फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस पर अपना फैसला सुनाएगी। इस बीच योग गुरू बाबा रामदेव ने राम मंदिर निर्माण को लेकर बात करते हुए कहा कि पूरी दुनिया और मुस्लिम समुदाय जानती है कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था, न कि पैगंबर मुहम्मद का। यही सत्य है और अदालत का फैसला सत्य पर आधारित होता है।

एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए रामदेव ने कहा कि अयोध्या मामला जल्द ही सुलझने वाला है। विवादित स्थल पर राम मंदिर का निर्माण किया जाना चाहिए। बाबा रामदेव ने कहा कि इस देश में पैदा हुए सभी लोगों के पूर्वज राम हैं। राम मंदिर का निर्माण लोगों की आस्था से जुड़ा है। हर कोई यह जानता है कि अयोध्या में राम पैदा हुए थे। इसके बाद भी राजनीतिक स्वार्थवश इसे विवाद का विषय बना दिया गया।

इसके साथ ही रामदेव ने महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी को अपना समर्थन देते हुए कहा कि राज्य और केंद्र में एक स्थिर सरकार की जरूरत है। उन्होंने कहा, “हमें यह सोचना होगा कि भारत अगले 10-15 वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और यूरोप के मुकाबले कहाँ खड़ा है। हमें स्थिर राजनीति और शासन के लिए एक मजबूत पार्टी को सशक्त बनाना है।”

रामदेव ने कहा कि लोगों को हरियाणा और महाराष्ट्र में एक अच्छी सरकार का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की तारीफ करते हुए कहा कि वो ईमानदार व्यक्ति हैं, उनके पास कोई अर्जित संपत्ति नहीं है। उनका कहना है कि मनोहर लाल खट्टर एक अच्छे इंसान हैं और वह भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी हर कार्य को मुमकिन करने में सक्षम है। इन दोनों ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 एक ही झटके में हटाकर यह साबित कर दिया है। इसके अलावा भी कई ऐसे फैसले लिए गए हैं, जिसके बारे में पिछली सरकारों ने सोचने तक भी हिम्मत नहीं की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा अनुच्छेद 370 के अधिकतम प्रावधानों के निष्क्रिय किए जाने की प्रशंसा करते हुए कहा कि सरदार पटेल के बाद पीएम मोदी और अमित शाह ‘एक राष्ट्र, एक संविधान और एक ध्वज’ के साहस के साथ सामने आए। रामदेव ने कहा, “इससे नरेंद्र मोदी-अमित शाह सरकार पर लोगों का भरोसा मजबूत हुआ है। सभी राजनीतिक और सामाजिक बाधाएँ केवल अमित शाह और पीएम मोदी दूर कर सकते हैं।”

आगे उन्होंने देश में नफरत फैलाने वालों को निशाने पर लेते हुए कहा, “इस देश में वैचारिक आतंकवाद चल रहा है। दलितवादी, मार्क्सवादी और कुछ तथाकथित समाजवादी हमारे पूर्वजों के खिलाफ नफरत फैलाते रहे हैं। इसे मिटाने की जरूरत है। कुछ लोग देश की एकता को तोड़ने के लिए नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। हमें इसके खिलाफ लड़ने के लिए और भी कानूनों की जरूरत है।” साथ ही उन्होंने हरियाणा और महाराष्ट्र के लोगों से विधानसभा चुनाव में मतदान करने की अपील की।

27 पूर्व सांसद नहीं छोड़ रहे घर, दिल्ली पुलिस बिजली पानी बंद करा कर बाहर करेगी

सरकार के लिए लम्बे समय से पूर्व सांसदों से निवास खाली करने की समस्या विकट बनी हुई थी। मगर अब इस काम में तेज़ी आ सकती है क्योंकि अब सांसदों से उनके आवास खाली करने के लिए सरकारी तंत्र की मदद में दिल्ली पुलिस पूर्व सांसदों से उनके आवास खाली करवाने उतरेगी। बता दें कि सभी चिह्नित सांसद आवासों की बिजली, पानी और गैस की सुविधा को काटने का भी खाका तैयार कर लिया है।

संसद के निचले सदन लोकसभा में निर्वाचित सांसदों को जो आवास रहने के लिए दिए जाते हैं उनके लिए यह नियम है कि संसद सदस्यता समाप्त होने के एक महीने के भीतर उन्हें यह आवास खाली करना होता है। मगर कई ऐसे महानुभाव हैं जो इन आवासों को जागीर समझकर बैठ जाते हैं और अपनी हनक के चलते इसे छोड़ने के वक़्त आना-कानी करते हैं।

लम्बे समय से देखा जाता रहा है कि कई नेता इस तरह की हरकतों की वजह से चर्चाओं में आते हैं। ऐसे ही एक मामले में सबसे पहले नाम उछला था मुलायम सिंह यादव का, जिन्होंने लखनऊ में पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले खाली करने के कोर्ट के आदेश के बावजूद बंगला खाली करने में बड़ी आना-कानी की थी। यही हाल अब संसद निवास का हो रहा है।

हाल ही में 2019 के लोकसभा चुनाव संपन्न हुए हैं। इसके बाद सभी नवनिर्वाचित सांसदों को बंगले अलॉट किये जाने हैं। आवास खाली करने को लेकर देरी का एक मुख्य कारण यह भी है कि पूर्व सांसद अपना टर्म ख़त्म होते ही आवास खाली करने में बगलें झाँकने लगते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस कार्रवाई के पीछे असल कारण है कि अगस्त में अनधिकृत रूप से रह रहे सांसदों को जब आवास खाली करने को कहा गया तो करीब 200 लोग ऐसे थे जिन्होंने आवास नहीं छोड़े थे। यही वजह है कि नवसारी से गुजरात भाजपा के सीआर पाटिल की अध्यक्ता वाली इस कमिटी ने यह निर्णय लिया।

मंदिर की जगह स्कूल एक वामपंथी प्रपंच: अजीत भारती के विचार | Ajeet Bharti on School Over Ram Mandir

मोहम्मद आसिफ खान नाम का एक मुसलमान ट्वीट करते हुए कहता है कि अयोध्या में एक 500 साल पुरानी मस्जिद थी, जिसे आतकंवादियों ने 6 दिसम्बर को ढहा दिया था। उन आतकंवादियों पर केस चलना चाहिए और उस जगह पर सरकारी खर्चे से एक मस्जिद बननी चाहिए और वहाँ पर एक स्मारक भी बनना चाहिए। यही न्याय होगा। वहीं कुछ लोग कह रहे हैं कि सामाजिक सौहार्द के लिए मंदिरों की जगह स्कूल और अस्पताल ही बनवा देना चाहिए।

सोशल मीडिया पर कुछ भी बकवास करने वाले लोग भूल जाते हैं कि न तो भारत देश का इतिहास सिर्फ़ 500 साल पुराना है और न ही स्कूल और अस्पताल सनातन धर्म के धार्मिक स्थलों की जगह ले सकते हैं। स्कूलों और अस्पतालों का अपना महत्व है लेकिन इसे धार्मिक स्थलों की जगह पर ही बनवाने का लॉजिक एक वामपंथी प्रपंच से बढ़कर कुछ नहीं है।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें

अयोध्या मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने की समझौते की पुष्टि, कहा- करना पड़ सकता है बाबरी पर समझौता

हिंदुस्तान के इतिहास में सबसे संवेदनशील मामले को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सारी सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया। कई लोग कई तरह के कयास लगा रहे हैं। दोनों पक्षों में मध्यस्तता करने की कई कोशिशें की गईं मगर हर बार उनके विफल होने की ही खबरें सामने आईं। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने पुष्टि की है कि मध्यस्था पैनल के माध्यम से हिन्दू पक्षों के सामने एक समझौते का मसौदा पेश किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भूमि विवाद को सुलझाने के लिए पैनल ने अपनी ओर से एक रिपोर्ट दायर की थी जिसमें समझौता सम्बन्धी कुछ दस्तावेज़ हैं। मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से अधिवक्ता शाहिद रिज़वी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा था कि ‘आप उन कामों को करना चाहते हैं जो कभी नहीं कर सकते तो आप उन्हें अंत समय में भी कर सकते हैं। अदालत के बहार दोनों पक्षों ने अपनी अपनी शर्तों के साथ अपनी बात रखी हैं’।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों वाली संविधान पीठ ने 40 दिन तक लगातार सुनवाई करने के बाद बुधवार को सुनवाई पूरी करते ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। चूँकि, मामला आपराधिक नहीं बल्कि सिविल है इसलिए फैसले की घोषणा से पहले समझौता भी हो सकता है।

दरअसल मामले में निर्वाणी अखाड़ा, राम-जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति और कुछ अन्य हिन्दू पक्ष भी इस मामले में भूमि विवाद के निपटारे के पक्ष में हैं। जबकि मामले में प्रमुख वादी विश्व हिन्दू परिषद के समर्थन वाला रामजन्मभूमि न्यास और रामलला विराजमान सहित 6 अन्य पक्षकार हैं।

‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं देंगे बाबरी मस्जिद के पक्षकार, अब विकास की दरकार’

राम जन्मभूमि पर अदालत ने पूरी बहस सुनने के बाद अंत में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, इससे पहले तक बड़े-बड़े हवाई दावे कर रहे मुस्लिम पक्ष के वकीलों की खिसियाहट सामने आ गई। जब राजीव धवन ने मंदिर का प्रस्तावित नक्शा फाड़ दिया तब एक चीज़ तो साफ़ हो गई कि समुदाय विशेष के मन में इस मामले के उचित हल के लिए काफी द्वेष पैदा हो चुका है। मतलब साफ़ है कि जिस क्षण का देश भर को लम्बे वक़्त से इंतजार था, उसकी प्रतीक्षा में अब ज्यादा समय नहीं बचा हैं मगर फिर भी कुछ लोग अदालत पर भरोसा सिर्फ अपना माइनॉरिटी स्टेटस पुख्ता रखने भर के लिए ही विश्वास रखते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के रुख ने स्पष्ट रूप से आइना दिखा दिया और इसको देखते हुए मस्जिद के पैरोकारों ने भी अब समझ लिया है कि वास्तविक स्थिति क्या है, उन्हें आभास हो गया है कि अब न्याय की गंगा किस ओर से बहेगी। यही वजह है कि बाबरी मस्जिद के पक्षकारों में से एक प्रमुख पक्षकार इकबाल अंसारी ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील नहीं करेंगे।

यूँ तो देश में न्याय का अंतिम और सबसे बड़ा मंदिर सर्वोच्च न्यायलय है लेकिन इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति होने पर इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका डालने का पूरा अधिकार है। इसी अधिकार के तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फैसले पर अपनी असहमति ज़ाहिर करने के साथ अपील की जा सकती है।

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में मस्जिद के लिए जिरह करने वाले मुस्लिम पक्ष की ओर से प्रमुख चेहरा रहे इकबाल अंसारी ने कहा कि वह खुश हैं कि मामले की सुनवाई अपने तार्किक अंजाम की ओर पहुँच गई है अब उन्हें बस फैसले का इंतजार है। हालाँकि, उन्होंने यह ही स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला करे, इकबाल उसका सम्मान करेंगे।

बता दें कि इकबाल अंसारी हाशिम अंसारी के बेटे हैं जो इस पूरे मामले से जुड़े सबसे बुज़ुर्ग वादी थे। हालाँकि, उन्होंने खुदको इस मामले से पूरी तरह अलग कर लिया था। उस वक़्त उन्होंने कहा था कि राम का मंदिर बनना चाहिए लेकिन इसमें कुछ लोग लगातार राजनीति कर रहे हैं। उसी वक़्त अंसारी ने यह भी कहा था कि यदि प्रधानमंत्री मोदी चाहेंगे तो ज़रूर इस मसले का हल निकल सकेगा।

उन्होंने कहा था कि “सत्तर सालों से अयोध्या विवाद की वजह से बस राजनीति हो रही है और मुझे उम्मीद है कि अब शहर में कुछ विकास होगा”। आज उनके बेटे इकबाल अंसारी ने कहा कि वह अपने पिता के सपने को साकार करने के लिए वचनबद्ध हैं।

हिन्दुओं को अपने इतिहास का सच नहीं पता चलना चाहिए, ये ‘मॉब’ बनाने की साजिश है: The Print

The Print की पत्रकार और ‘विचार’ खंड की संपादक रमा लक्ष्मी के अनुसार हिन्दुओं के हज़ारों मंदिर इस्लामी आक्रान्ताओं ने तोड़े, और उनके ऊपर अपनी मस्जिदें खड़ी कीं, यह सच, सच होने के बाद भी, बताया जाना गलत है। हिन्दुओं को यह सच बताने, इसके पक्ष में अरुण शौरी की ‘Hindu Temples: What Happened To Them’ जैसी किताबें लिखा जाना गलत है, ‘गुनाहे-अज़ीम’ है। क्यों? क्योंकि इससे 92 की तरह हिन्दू अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने एकजुट हो जाते हैं।

गंदी सोचों का इतिहास जब कभी लिखा जाएगा, तो “मेरे वाले ऊपर वाले के सिवा और किसी की उपासना करने वाले का कत्ल कर दूँगा- वह भी गला धीरे-धीरे रेत कर” वाले मज़हब से भी गंदी, सड़ाँध मारती, बजबजाती विचारधारा पत्रकारिता के समुदाय विशेष की गिनी जाएगी। लिबरल गिरोह के ये पत्रकार अब पूरी तरह गुंडागर्दी और हिन्दुओं का मुँह अपने हाथों से भींच कर दबाने पर उतर आए हैं। अभी तक ये ऐसी किताबों और दस्तावेज़ों को झूठा, मनगढ़ंत बताते थे, कपोल-कल्पनाओं पर आधारित कहते थे, और इनके हिन्दूफ़ोबिक नैरेटिव को काटने वाला हर विवरण भी इनके लिए ‘वर्क ऑफ़ फ़िक्शन’ होता था- जैसे रामायण-महाभारत, जैसे मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत, जैसे इस्लामी आक्रांताओं के हत्या-बलात्कार-लूट के नंगे नाच को बयाँ करने वाली फ़ारसी इतिहासकार वसफ़ की किताब, जैसे अरुण शौरी की किताब, जैसे सीताराम गोयल-राम स्वरूप-आरसी मजूमदार-कोएंराड एल्स्ट जैसे इतिहासकारों की किताबें।

“बेचारा शांतिप्रिय, दुष्ट हिन्दू” के अपने प्रोपेगंडा को ‘सनातन’ कर देने के लिए इन्होंने इतिहास में झूठ लिखने, और सच बोलने वालों को झूठा बोलने से कोई गुरेज नहीं किया। सावरकर हिन्दू हितों के पैरोकार होने के चलते “वीर” से “हिंसा फ़ैलाने वाला” बन जाते हैं, मुट्ठी-भर सेना के बावजूद अकबर की विशाल सेना को नाकों चने चबवाने की महाराणा प्रताप की उपब्धि को उनकी हार के रूप में प्रचारित किया जाता है, इतिहास की पुनर्विवेचना कर “कश्मीर और पाकिस्तान हिन्दू कट्टरता की गलती थे” की घोषणा से कट्टरपंथ को न केवल क्लीन चिट दे दी जाती है, बल्कि हिन्दू धर्म और इसके धार्मिक पक्ष को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर देने की ज़मीन तैयार की जाती है। अरुण शौरी की किताब भी जब प्रकाशित हुई तो या तो उसे नज़रंदाज़ किया गया, या मानिनी चटर्जी, रिचर्ड ईटन और रोमिला थापर (और इनकी तरह के अन्य) जैसे झूठे और मक्कार लोगों ने “जुलाहे से पार न पाए, गदहे के कान मरोड़े” की तर्ज पर तथ्य को न काट पाने की खीझ में किताब से लेकर लेखक तक पर कीचड़ उछालने, निजी आक्षेप करने और किताब को प्रतिबंधित करने की दबी-छिपी अपील करने जैसे पैंतरे इस्तेमाल करने शुरू कर दिए।

और जब यह झूठ अदालतों में खुलने लगा, अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे से हिन्दू मंदिर, और उसे तोड़े जाने के सबूत मिलने लगे, तो यह गिरोह बिलबिला पड़ा है। अब सच बोलने को भी अपराध घोषित करने की तैयारी चल रही है। रमा लक्ष्मी का यह ट्वीट उसी दिशा में माहौल बनाने के लिए उठा कदम है। ‘हिन्दू मॉब’ के डर के बहाने हिन्दुओं के पक्ष में, इस्लाम के ख़िलाफ़ कोई भी बात सार्वजनिक जीवन में बोले जाने को रोक देना- सुनने में आज ऐसा साम्प्रदायिक, अन्यायपूर्ण कानून भले असंभव लग रहा है, लेकिन लिबरलों का यही ध्येय है, और बहुत दूर भी नहीं है।

झूठ की स्वीकारोक्ति पहले भी हो चुकी है- मजबूरी में

मजबूरी में अपने झूठ की स्वीकारोक्ति लिबरल एक-आध बार कर चुके हैं- लेकिन वह भी हिन्दुओं से, हिन्दू धर्म से दुश्मनी की ही नीयत से। कपिल कोमिरेड्डी ने किताब लिखकर माना ज़रूर कि हिन्दुओं पर हुए लगभग एक हज़ार साल के हत्याकांडों को उनके लिबरल गैंग के पत्रकारों ने दबाया-छुपाया-नकारा, लेकिन साथ में जोड़ दिया कि यह सब ‘साम्प्रदायिक सद्भाव’ की “सदिच्छा” और ‘साम्प्रदायिक ताकतों को ताकत न मिले’ के “विभाजन की हिंसा देखने के बाद उपजे” एजेंडे के तहत किया गया। यानि केवल हिन्दुओं की पीठ पर सेक्युलरिज़्म लादने का पैंतरा, वह भी झूठ और फ़रेब के दम पर, नैतिक रूप से अच्छा था- बस उल्टा पड़ गया; “संघियों” ने अंग्रेजी पढ़ना सीख लिया, विश्वविद्यालयों के Humanities विभाग से बाहर धकेले जाने के बाद भी इतिहास का ज्ञान पा लिया, और हमारे प्रोपेगंडा को नंगा करने चले आए। इसलिए मानना पड़ रहा है।

झूठ की मजबूरी में स्वीकारोक्ति, जिसे हिंदी में “थूक के चाटना” कहते हैं, और भी हुई है। एक बार तो रमा लक्ष्मी के बॉस साहब शेखर गुप्ता को ही मानना पड़ा था कि हाँ, उनके पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने मोदी सरकार के अच्छे कामों को नकारने, दबाने, छिपाने की कोशिश की थी? “क्यों?” का जवाब उन्होंने तो नहीं दिया, लेकिन उनके मुँह पर उंगली रख लेने से सच छिप नहीं जाएगा- इसीलिए क्योंकि भाजपा ने अपनी छवि ‘हिन्दू पार्टी’ की बना रखी है, भाजपा का चुनाव जीतने को ‘हिन्दुओं की जीत’ मानी गई, इसीलिए इसे रोकने के लिए सच-झूठ को ताक पर रख दिया गया। उसी तरह, जैसे रमा लक्ष्मी के लिए हिन्दुओं के धर्म पर हुए हमले का सबूत लाना इतना बड़ा ‘पाप’ है कि ऐसे ‘पापी’ अरुण शौरी के लिबरलों के चहेते बनने से उन्हें दुःख हो रहा है।

मंच से भाषण ही नहीं बल्कि कुछ ठोस करने की जरूरत

जब मैं यह लिख रहा हूँ, तो उसी समय खबर आ रही है कि वाराणसी की एक रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने इतिहास ही नहीं, इतिहास-लेखन में भी सावरकर के योगदान को याद करते हुए कहा, “अगर सावरकर नहीं होते तो हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों के नजरिए से देख रहे होते। वीर सावरकर ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने 1857 की क्रांति को पहले स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया था।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “वक्त आ गया है, जब देश के इतिहासकारों को इतिहास नए नजरिए से लिखना चाहिए। उन लोगों के साथ बहस में नहीं पड़ना चाहिए, जिन्होंने पहले इतिहास लिखा है। उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उसे रहने दीजिए। हमें सत्य को खोजना चाहिए और उसे लिखना चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपना इतिहास लिखें। हम कितने वक्त तक अंग्रेजों पर आरोप लगाते रहेंगे?“

अच्छी बात कही, आपने शाह जी। आपसे और आपकी पार्टी से देश को भारी उम्मीदें हैं। सत्ता में यह आपकी दूसरी पारी है। इसलिए आपसे और प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीदें और बढ़ जाती हैं कि आखिर वो दिन कब आएगा जब आपकी तरफ से सफ़ेद झूठ परोसती किताबों के पुनर्लेखन के लिए आदेश जारी होंगे? मीनाक्षी जैन, बीबी लाल, केके मोहम्मद, कोएंराड एल्स्ट, डेविड फ्रॉली जैसे हिन्दू और Indic विद्वानों को डीएन झा, रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा की जगह देने की जगह देने की जरूरत है। ताकि इतिहास का वह पहलू भी दुनियाँ के सामने आए जो अभी तक वामपंथी इतिहासकारों ने छिपाया है।

राम मंदिर की जगह स्कूल-अस्पताल बनवाने की बात करने वाले बुद्धिमानों के नाम कुछ बातें

एक ट्वीट पढ़िए। हैंडल वाले का नाम ‘मजहबी’ है, बाबरी मस्जिद को लेकर जज्बाती है और इमोशनल हो कर लिखता है: अयोध्या में पाँच सौ साल पुरानी एक मस्जिद हुआ करती थी। उस मस्जिद को आतंकवादियों ने 6 दिसंबर 1992 को तोड़ दिया। इन आतंकवादियों पर अदालती कार्रवाई होनी चाहिए और सरकारी खर्चे पर वहाँ एक मस्जिद अवश्य ही बननी चाहिए। और हाँ, एक स्मारक भी बनाई जानी चाहिए वहाँ। वही न्याय होगा। हैशटैग रीबिल्ड बाबरी मस्जिद!

आसिफ खान का ट्वीट

जज्बाती आसिफ खान ने बाबरी को तोड़ते हुए लोगों की तस्वीर भी साथ में लगाई। आसिफ खान एक महत्वपूर्ण बात भूल गया कि भारत का इतिहास 500 साल पुराना नहीं है, न ही कोई ‘सरयू घाटी सभ्यता’ सोलहवीं शताब्दी में आई थी। उस पुराने मस्जिद के पहले वहीं और भी पुराना मंदिर था। उस पुराने मंदिर को इस्लामी आतंकियों ने तोड़ा था। इसलिए न्याय की इच्छा करने वाले पहले तो हिन्दुओं के साथ न्याय करें और उन आतंकियों के पूरे खानदान को कोर्ट में ला कर पूछें कि क्या अपने बाप-दादाओं के आतंक के लिए माफी माँगते हो? फिर उनसे उस मंदिर के निर्माण के लिए पैसे लिए जाएँ और वहाँ राम हो।

कल अयोध्या राम मंदिर मामले की सुनवाई खत्म हो गई, हिन्दुओं को लग रहा है कि फैसला उनके पक्ष में आएगा, दूसरे मजहब वाले सोच रहे हैं कि कुछ सेकुलर टाइप बात हो जाएगी। मजहब विशेष के पक्ष की तरफ से बार-बार विचित्र दलीलें भी दी गईं जिसमें वराह की मूर्ति को बच्चों का खिलौना कहने से ले कर दीवारों पर संस्कृत में उकेरे श्लोकों को ‘मस्जिद/दरगाह/ईदगाह बनाने वाले मजदूरों ने लिख दिया होगा’ जैसी बातें शामिल हैं।

फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने शर्तें रखीं कि वो अपना दावा छोड़ देंगे अगर सरकार अयोध्या के 22 मस्जिदों के रखरखाव की जिम्मेदारी ले, जहाँ मंदिर है या मस्जिद है, उसे उसी सूरत में देखा जाए (यानी उस पर कहीं भी कोई केस न करे), और एक कमिटी बना कर यह देखा जाए कि ASI के नियंत्रण में जो भी धार्मिक/मजहबी स्थल हैं, उनकी स्थिति क्या है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड दावा रखे, छोड़े या धरती पर से गायब ही हो जाए, उससे इस केस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ये कितनी महीन बात है कि जिस अयोध्या में इस्लामी आतंकियों के विध्वंस की इबारत हर तरफ लिखी हुई है, वहाँ के मस्जिदों के रखरखाव का जिम्मा सरकार ले। वही सरकार जो हिन्दुओं के मंदिरों से आने वाली आय और खर्चे पर अपना नियंत्रण रखती है। मतलब, एक तरीके से हिन्दुओं के मंदिरों का खर्चा उन मस्जिदों के रखरखाव के लिए जाए, जो हो सकता है कि किसी मंदिर को ही तोड़ कर बनाई गई हो।

अब बात क्यूट लोगों की

फैसला तो भी आए, क्यूट लोगों ने दो तरह के प्रपंच फैलाने शुरु कर दिए हैं। पत्रकार शिरोमणि फेसबुक पर ज्ञान दे रहे हैं कि टीवी मत देखिए और मंदिर-मस्जिद मत कीजिए, सामाजिक सौहार्द बनाए रखिए। सही बात है, सामाजिक सौहार्द बना रहना चाहिए। इसके लिए उन लोगों को ज्यादा कोशिश करनी चाहिए जो बात-बात पर पत्थर ले कर ऐसे खड़े हो जाते हैं मानो कंगारुओं की तरह थैली के साथ पैदा हुए, और जीवन भर ज्ञान की जगह राह चलते वही पत्थर इकट्ठा किया जो इनकी अक्ल पर पड़े थे।

हिन्दुओं का क्या है, बुनियादी तौर पर सहिष्णु लोग, कभी एक मस्जिद नहीं तोड़ी, न किसी को जबरदस्ती कन्वर्ट किया, न लव-जिहाद टाइप के घटिया खेल खेलते हैं, न ही व्हाट्सएप्प मैसेज पढ़ कर आतंकियों को बचाने पत्थर ले कर पुलिस और सेना की राह में खड़े हो जाते हैं, न ही रात के एक बजे छतों पर बैठ कर मजहबी जुलूसों पर पत्थर बरसाते हैं… ऐसे लोग तो फंडामेंटली सौहार्दप्रेमी हैं। दूसरे पक्ष वालों को पत्रकारश्रेष्ठ के आह्वान पर थैलियों के पत्थर खाली कर के, सामाजिक समरसता और सर्वधर्म समभाव हेतु भव्य मंदिर के निर्माण हेतु गगनभेदी ध्वनि में ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करना चाहिए।

दूसरे तरह के क्यूटाचरण करने वाले वो क्यूट प्राणी हैं जो ऐसा कहते ही नहीं, मानते भी हैं, कि मंदिर-मस्जिद से क्या मिलने वाला है, वहाँ एक स्कूल या अस्पताल बनवाना चाहिए लाखों लोगों का भला होगा। सुनने में बहुत कर्णप्रिय और तार्किक लगता है ये वाक्य। लगता है कि कितनी सही बात कह दी गई है। आश्चर्य होता है कि आज के साम्प्रदायिक दौर में भी ऐसी भावना के साथ, मानवता के लिए सोचने वाले लोग हैं।

क्या सच में ऐसा है? एक समय मैं भी यही सब सोचा करता था। फिर मुझे याद आया कि जिस धर्म के हजारों बड़े मंदिर तोड़ दिए गए, उनकी आस्था पर सिर्फ इस मकसद से हमला किया गया कि ये टूट जाएँ और यह विश्वास करने लगें कि उनका भगवान भी स्वयं के घर की रक्षा नहीं कर पा रहा, और अंततः दूसरे मजहब में मतपरिवर्तन के साथ चले जाएँ, उस धर्म के लोग जब अपनी आस्था को पहचानने को खड़े हुए हैं तो उन्हें स्कूल और हॉस्पिटल की याद दिलाई जा रही है?

हिन्दुओं के लिए मंदिर उनके जीवन का हिस्सा है। स्कूल और कॉलेज की बात करने वालों के नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिलाना चाहूँगा। साथ ही यह भी कहूँगा कि जिसने उस विश्वविद्यालय को तोड़ा, उसके वंशजों को, उसके नाम को याद करने वालों को, उस बलात्कारी आतंकवादी बख्तियार खिलजी को महान योद्धा मानने वालों को अपनी जमीन, अपना पैसा और अपना पसीना दे कर हजारों स्कूल और कॉलेज खुलवा कर भारतीय समाज को शिक्षित करने की बात सोचनी चाहिए।

जिन लुटेरों और आतंकियों को कुछ लोग सिर्फ इसलिए महान बताते हैं, और उसे महान लिबरल शासक कहते हैं क्योंकि उसने हिन्दुओं को सताया, उसके मंदिर ध्वस्त किए और लाखों को तलवार की नोक पर इस्लाम कबूल करवाया, उनके वंशजों और मानने वालों के हाथ लाखों हिन्दुओं का रक्त है। इसलिए बेशक स्कूल भी बने और अस्पताल भी, लेकिन वो मजहब विशेष की जमीन पर बने, उसके पैसों से बने। इस पाप का प्रायश्चित वही लोग करें, जिन्होंने हिन्दू आस्था पर आघात किया था।

जहाँ भी मंदिर था वहाँ तो बिना किसी संशय के पहले से बड़ा मंदिर बने ताकि उन इस्लामी बलात्कारी आतंकवादियों और उनकी शैतान औलादों को यह ध्यान में रहे कि मंदिर तोड़ कर तुम उसके भगवान द्वारा स्वयं को न बचा पाने का उपहास तो कर सकते हो, लेकिन काल करवट ले कर दोबारा जब उसी भगवान के अनुयायियों को शक्ति देता है, तो वो वही भगवान है जो अपनी रक्षा को खड़ा होता दिख रहा है।

हिन्दुओं के लिए इस्लामी आतंक बिलकुल नई चीज थी

हिन्दुओं को रौंदा गया क्योंकि वो तैयार नहीं थे। उन्हें यह पता ही नहीं था कि कोई पतित व्यक्ति या मजहबी उन्मादियों का समूह किसी दूसरे की भूमि पर कब्जा करने भी आ सकता था। उन्हें यह बात इसलिए पता नहीं थी क्योंकि उन्होंने कभी इस तरह की बातों पर विचार ही नहीं किया था, उनके सामने यह परिस्थिति कभी आई ही नहीं कि ऐसा करने की ज़रूरत क्या है?

जब आपके पास अपना जीवन जीने के और मानवता की भलाई के लिए कार्य करने के अलावा और कोई उद्देश्य ही न हो, तो फिर आप किसी ऐसी लड़ाई की तैयारी कैसे करेंगे जो आपकी कल्पना या तार्किकता से परे हो। जिस धर्म के लोग अपनी गोष्ठियों का अंत ‘प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो’ से करते हों, उनके लिए यह सोचना कि किसी दूसरे मजहब के लोगों पर आक्रमण कर के, उनकी आस्था के प्रतीकों को आग लगा कर, उसके ज्ञान के भंडार को तबाह कर के, अपनी सत्ता स्थापित करना स्वभाविक है, समझ से परे है।

इसलिए हिन्दू कभी भी तैयार नहीं था। ऐसे इस्लामी आतंकी दरिंदों के लिए तो बिलकुल नहीं जो सिर्फ लूटने नहीं आते थे, बल्कि बलात्कार करना, मंदिर तोड़ना, गाँवों में आग लगाना उनके लिए आनंद देने वाली बातें थीं। इसलिए शक्ति के प्रदर्शन से एक पूरी पीढ़ी कुचल दी गई, उसका इतिहास मिटा दिया गया। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें हमने प्रेरक कहानी में उस आतंकवादी की कहानी पढ़ी जो सत्रहवीं बार के आक्रमण में सफल होता है। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें उन्मादी मुगल शासकों को उदारवादी बताया गया।

उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें यह बताया गया कि भारत की सांस्कृतिक विरासत तो उन्हीं मुगलों की दी गई है। फिर हमें ताजमहल दिखा दिया गया, फिर हमें लाला किला दिखा दिया गया, फिर हमें उनकी कब्रें दिखा दी गईं और कहा गया कि देखो, इनके बापों ने तुम्हें लूटा, बलात्कार भी किया, लेकिन बिरयानी की रेसिपी भी तो दी। फिर एक धोखे से स्कोडा-लहसुन तहजीब का वास्ता दिया जाने लगा कि अल्पसंख्यक हैं, इन्हें इनके हिसाब से चलने दो, बजाने दो लाउडस्पीकर, उन्हीं लाउडस्पीकरों से मजहबी उन्माद का ज़हर भरने दो शुक्रवार की शामों को, थोड़ा सहन करना सीखो, बड़े दिलवाले बनो।

हम सब कुछ बने। हमने बलात्कारी आक्रान्ताओं के नाम उसी जगह शहर बसा दिया जहाँ नालंदा के खंडहर मौजूद हैं। हमने इस्लामी आतंकियों के नाम सड़के बनवा दीं और याद किया कि भारत में तो जो भी व्यवस्था है इन्हीं शासकों ने दी है। हमें कहा गया कि धन्यवाद दो इन्हें कि ये अंग्रेजों की तरह लूट कर कहीं ले नहीं गए, यहीं बसे रहे। कितना क्यूट तर्क है! मैं तुम्हारे घर में घुसूँ, तुम्हारी माँ-बहनों का बलात्कार करूँ, गहने-जेवर लूट लूँ, और उसी मकान के एक कमरे में रहने लगूँ और अपने भोजन के लिए तुम्हीं से बिरयानी बनवाऊँ, और बाद में मेरे समर्थक, तुम्हारे संबंधियों को यह बताते फिरें कि कैसे कृतघ्न लोग हो, तुम्हें बिरयानी बनानी सिखाई, शांति से साथ रहना सिखाया और तुम लोग बस उसके पीछे ही पड़े हो!

इसलिए स्कूल-कॉलेज-अस्पताल नहीं, बनेगा तो मंदिर ही

उसी ऐतिहासिक मजहबी गलती को धार्मिक रूप से सही करना ज़रूरी है। जो स्कूल-अस्पताल का तर्क देते हैं, उनके लिए मेरे पास एक समाधान है। मजहबी भाइयों को नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद की ज़रूरत नहीं होती। वो सड़कों पर, पार्कों में, रेलवे ट्रैक से लेकर किसी भी खाली जगह पर अपने पाक इलाके की तरफ सर करते हुए नमाज पढ़ सकते हैं। इसलिए, मानवता की भलाई और सामाजिक सौहार्द के लिए उन्हें नई मस्जिदों की जगह स्कूल और अस्पताल ही बनवाने चाहिए।

हो सके तो पुराने स्थलों को भी उसी हिसाब से मेकओवर कर के स्कूल-कॉलेज आदि बनवा देना चाहिए। लाखों लोगों का भला होगा। लोगों को ज्ञान मिलेगा, बीमारियों से (जिसमें मानसिक बीमारी भी आती है) निजात मिलेगी और वो बाजारों में फटने से, कहीं बम रखने से, किसी आतंकी वारदात को अंजाम देने से बच जाएँगे। इसलिए जिन्हें जिस चीज की ज़रूरत है, उन्हें वह मुहैया कराई जाए।

हिन्दुओं के साथ तो समस्या है कि वो मंदिर में ही पूजा कर सकते हैं। जितना बड़ा मंदिर, उतने ज्यादा लोग एक साथ, मूर्ति को पूजने आते हैं। इससे लाखों नहीं, करोड़ों लोगों का भला होता है। देखिए, हमारी किताबों में लिखा है कि पूजा आदि के लिए मंदिर का होना ज़रूरी है। उसमें जो मूर्ति होती है, उसकी प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वो पूरा इलाका ही जाग्रत हो जाता है और उसमें देवी/देवता का अंश प्रकट हो जाता है। इसलिए मंदिर जितने ज़्यादा होंगे, उतने ही ज़्यादा हिन्दुओं का लाभ होगा, वो धार्मिक बनेंगे।

हिन्दुओं के ज्यादा धार्मिक होने से सबको फायदा है क्योंकि हिन्दू कभी भी सामूहिक रूप से धार्मिक हो कर, योजनाबद्ध तरीके से किसी दूसरे मजहब या रिलीजन वालों पर हमला नहीं करता, जमीन नहीं हड़पता, बलात्कार नहीं करता, विश्वविद्यालयों में आग नहीं लगाता। वो धार्मिक होता है तो हर जीव से प्रेम करता है, प्राणियों में सद्भावना देखता है, विश्व के कल्याण की बातें करता है। उसको अपने धर्म के प्रचार द्वारा ‘कन्वर्जन’ जैसी बेहूदगी नहीं करनी होती। कुल मिला कर हिन्दू जब धार्मिक होता है तो वो चिल्ड-आउट रहता है और आदरपूर्वक एक दूसरे को ‘जय श्री राम, ब्रो!’ कह कर आनंद पाता है।

वहीं दूसरे मजहब के लोग जब मजहबी होते हैं, तो उन पर दबाव आता है कि तुमने पाँच काफिरों को अपना बनाया या नहीं, जवान हो गए लेकिन लव जिहाद तो किया ही नहीं, तुमने जन्नत में इंतजार में बैठी 72 हूरों के लिए तो अपने आप को फोड़ा ही नहीं! इतने ज्यादा मजहबी नहीं भी हुए तो भी, आतंकी वारदातों पर मौन सहमति तो देते ही हैं कि हमें क्या, हमारे लोग थोड़े ही मरे हैं। हमारे तो आतंकी भी मरेंगे तो हमारे नेता कह ही देंगे कि हमारे लोग सरकार में होते तो उन्हें फाँसी नहीं होती।

हिन्दुओं को कट्टर बता कर, उन्हें सद्भावविरोधी बताने की साजिशें

यही अंतर है। और ये अंतर बुनियादी है। ये अंतर इतना व्यापक है इसलिए बीच-बीच में इस तरह की बातें होती हैं जिसमें उनके हजारों सालों के आतंक को, लाखों गिराई गई लाशों को, हजारों तबाह किए मंदिरों के अपराध को किसी बिगड़ैल लड़के द्वारा किसी दूसरे को ‘जय श्री राम‘ कहलवाने की बात के बराबर रख दिया जाता है। तब ‘जय श्री राम’ के नारे की भयावहता उस नारे के समकक्ष हो जाती है जो आईसिस के झंडे पर छपा है। आप सोचिए कि हजारों लोगों को जिस संगठन में मजहबी उन्माद के नाम पर मार दिया, उसके अपराध का भार, किसी एक लड़के द्वारा किसी को थप्पड़ मारने के बराबर कर दिया जाता है।

ये अंतर इतना व्यापक और बुनियादी है इसीलिए ‘भगवा आतंक’ जैसे शब्दों की रचना की जाती है ताकि उसे इस्लामी आतंक के समकक्ष रखा जा सके। ताकि कहा जा सके कि हिन्दू भी तो आतंकी हैं। सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए ऐसी बातों को तूल दिया गया कि दूसरे मजहब का सर्वव्याप्त आंतक एक फर्जी आरोप वाले ‘हिन्दू टेरर’ के सामने बौना पड़ जाए।

फिर जब परतें उतरने लगीं, किलों में दरार पड़ने लगे, सत्य सर उठाने लगा तो चोरों को शहीद बताने की मुहिम चली। हर अपराध के पीछे ‘जय श्री राम’ घुसाया जाने लगा, ताकि ‘हिन्दू आतंकी’ की थ्योरी जिंदा रहे। सारी खबरें गलत साबित हुईं, सबने माना कि उन्होंने बस ऐसे ही ‘जय श्री राम’ वाली बात जोड़ दी। लिंच तो हिन्दू भी बहुत हुए, दूसरे मजहब से अधिक हुए, दूसरे मजहब वालों द्वारा हुए, लेकिन उन खबरों को छापा ही नहीं गया। गौरक्षकों की ‘शांतिप्रिय समुदाय’ द्वारा लगातार हत्याएँ होती रहीं, और उल्टे कहा जाता रहा कि गौरक्षक ही आतंकी हैं।

मंदिर हजार साल पहले भी तोड़े गए थे, मंदिर आज भी चाँदनी चौक में तोड़े जाते हैं। तब घोड़े पर बाहर से आए तुर्क और मुगल आतंकी होते थे, अब यहीं बसे वो अल्पसंख्यक होते हैं जो स्कोडा-लहसुन तहजीब का चूरण फाँकते हुए शिवलिंग पर पेशाब करते हैं, विसर्जन के जुलूस पर पत्थर फेंकते हैं, काँवड़ियों पर पत्थर फेंकते हैं, दुर्गा पूजा की मूर्तियों की गर्दन तोड़ते हैं, रामनवमी के जुलूस पर चप्पल फेंकते हैं… कितनी बार, और कितनी घटनाएँ गिनाऊँ इन ‘डरे हुए’ लोगों की ?

हमें हमारे मंदिर लौटा दो, पत्थरबाजी बंद करो

स्कूल-अस्पताल हम तब भी बनवाते थे, अब भी बनवा रहे हैं। उसका बजट अलग है। संस्कृति और आस्था का बजट अलग है। वो भी ज़रूरी है, ये भी ज़रूरी है। वो वर्तमान सुधारने के लिए ज़रूरी है, ये भूत में हुई गलतियों को वर्तमान में सुधार कर, भविष्य में सनातन आस्था के दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिए आवश्यक है। किसी की आस्था या धार्मिक विश्वास से किसी को नुकसान न पहुँच रहा हो, तो उसके अस्तित्व में आने या न आने पर चर्चा की गुंजाइश खत्म हो जाती है। यहाँ आस्था पूजा के लिए है, खिलाफत लाने के लिए नहीं कि पूरी धरती एक ही मजहब के नीचे आनी चाहिए, नहीं आई तो रास्ते में आने वाले काफिरों को काटते चलो, ऊपर एक सुइट बुक है।

इसलिए तर्क चाहे कितना भी क्यूट क्यों न लगे, उसे उसके क्यूटत्व पर मत स्वीकारिए। उसके पीछे के विचारों को परखिए। मंदिर से सद्भाव फैलता है, शांति आती है, लोग धार्मिक काम करने को प्रेरित होते हैं। और इस धर्म में कभी भी यह नहीं सिखाया गया कि दस गैर-हिन्दू को हिन्दू बना दो, पूरी धरती पर सनातन धर्म का ही शासन रहे, यहाँ किसी गैर-हिन्दू पर धर्म के नाम पर ट्रक चढ़ा दोगे तो स्वर्ग में अप्सराएँ रोमेंटिक गीत गाएँगी और यू विल हैव अ गुड टाइम देयर! ये हिन्दुओं में नहीं होता।

कोर्ट ने चिदंबरम फिर दिया झटका: अब 24 अक्टूबर तक रहेंगे ED की हिरासत में

राउज़ एवेन्यू कोर्ट में पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को एक बार फिर झटका लगा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने चिदंबरम को 7 दिनों के लिए ईडी की कस्टडी में भेज दिया है। आईएनएक्स मीडिया केस में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम अब आगामी 24 अक्टूबर तक ईडी की कस्टडी में रहेंगे। इस दौरान पी चिदंबरम को घर से खाना ले जाने की अनुमति मिलेगी, वेस्टर्न टॉयलेट और दवाइयाँ ले जाने की भी इजाजत दे दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इसके पहले INX मीडिया मामले में चिदंबरम को तिहाड़ जेल प्रशासन रॉउज एवेन्यू कोर्ट में पेशी पर लाई थी। कोर्ट में कपिल सिब्बल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कस्टोडियल पूछताछ की ज़रूरत है तब इन्होंने तुरंत 5 सितंबर को कस्टडी क्यों नहीं ली। ईडी ने जब भी चिदंबरम को बुलाया है वो आए हैं। आख़िरी बार चिदंबरम ईडी के सामने 8 फ़रवरी 2019 को पेश हुए थे।

कपिल सिब्बल ने आगे कहा कि, पहले सीबीआई ने गिरफ़्तार किया फिर पुलिस कस्टडी फिर न्यायिक हिरासत इसलिए जब अब 60 दिन पूरे होने वाले हैं तब ईडी कस्टडी माँग रही है। ये सब मिलकर चिदंबरम को जेल में ही रखना चाहते हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बता दें कि इसके पहले आज सीबीआई वाले मामले में चिदंबरम की न्यायिक हिरासत खत्म हो रही और सीबीआई ने चिदंबरम की न्यायिक हिरासत 14 दिन बढ़ाने की माँग की है। तो वहीं एक और मामले में ED भी चिदंबरम को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती है।

माफिया से मिले कर्नाटक कॉन्ग्रेस महासचिव… वो भी कॉन्ग्रेस मुख्यालय में! सिद्धरामैय्या बोले – कुछ गलत नहीं

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस पार्टी को अपने एक नेता का एक हिस्ट्रीशीटर से मिलना भारी पड़ रहा है। यह घटना न सिर्फ हैरान कर देने वाली है बल्कि जो पार्टी खुद भ्रष्टाचार में डूबकर नहाई हो और अब विपक्ष में बैठने के वक़्त आए दिन उसी मुद्दे पर सरकार को घेरने का दावा ठोकती हो, उसके खुद के ही नेता आजकल इन हरकतों से उसे शर्मिंदा करवाने में कायदे से लग गए हैं।

दरअसल कर्नाटक कॉन्ग्रेस पार्टी  के एक नेता केसी वेणुगोपाल जोकि अपने प्रदेश कर्नाटक में अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस पार्टी के महासचिव भी हैं, हाल ही में उनका एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह एक हिस्ट्रीशीटर यानी अपराधी इश्तियाक अहमद से बात करते देखे जा सकते हैं। बताया जा रहा है कि यह वीडियो कर्नाटक राज्य में उपचुनाव के ठीक पहले सामने आया है या कहें कि कर्नाटक में उपचुनाव से ठीक पहले ही कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता वेणुगोपाल एक हिस्ट्रीशीटर उर्फ़ अपराधी इश्तियाक अहमद से मिल रहे हैं। हैरान कर देने वाली बात यह है कि दोनों कॉन्ग्रेस के मुख्यालय में एक दूसरे से मिल रहे थे। यह भी बता दें कि अहमद की बीवी कॉन्ग्रेस पार्टी में शिवाजीनगर इलाके से कर्नाटक कॉन्ग्रेस पार्टी में कॉर्पोरेटर जैसे अहम पद पर काबिज हैं।

बताया जा रहा है कि यह वीडियो पिछले हफ्ते रिकॉर्ड किए गए थे जोकि अब मीडिया में लीक हो गए हैं, जिसके बाद कर्नाटक की कॉन्ग्रेस पार्टी पर सवालों की बौछार हो रही है। मीडिया में लीक हुए कर्नाटक कॉन्ग्रेस के नेता केसी वेणुगोपाल एक बदमाश के साथ दिखाई दे रहे हैं। मज़े की बात यह है कि कॉन्ग्रेसी नेता और एक बदमाश की प्रगाढ़ मित्रता दर्शाता यह वीडियो भी उन्ही की पार्टी के कर्नाटक में बने मुख्यालय का है। इसी वीडियो में कर्नाटक कॉन्ग्रेस पार्टी के ही विधान परिषद सदस्य रिजवान अरशद भी दोनों के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। बता दें कि हाल ही में इश्तियाक अहमद को आईएमए ज्वेलरी की एक पोंज़ी स्कीम में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के मुताबिक इश्तिआक ने आईएमए ज्वेलरी के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहम्मद मंसूर खान से दो करोड़ रूपये की फिरौती की मांग की थी।

पुलिस सूत्रों की मानें तो इस लेन-देन की जानकारी मोहम्मद मंसूर खान ने अपनी एक डायरी में लिखी हुई है, जिसको पूरे मामले में सबूत के तौर पर आधार मानते हुए पुलिस ने इश्तियाक अहमद को गिरफ्तार किया था। हालाँकि पुलिस की मानें तो अहमद के अपराध की जड़ें 1993 से जुड़ी हुई हैं। साथ ही 50 से ज्यादा मामलों में उसका नाम मिल है और पुलिस का मानना है कि अहमद की उन मामलों में संलिप्तता थी। इश्तियाक को 2018 में शहर के कुछ रेस्टोरेंट्स से भी रंगदारी वसूलने के आरोप में एक बार पुलिस ने गिरफ्तार किया था। एम्बिडैंट पोंज़ी स्कीम की जाँच में पुलिस ने इश्तियाक अहमद की गहन जाँच की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले सप्ताह इश्तियाक अपनी पत्नी के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी के कार्यालय में मौजूद था। इस मामले पर सवाल पूछे जाने पर दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाक़ात करने पहुँचे कर्नाटक के विपक्षी नेता सिद्धरामैय्या ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं। मीडिया से बातचीत में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य में विपक्ष के नेता सिद्धरामैय्या ने कहा-

“इसमें वेणुगोपाल क्या कर सकते हैं अगर वह व्यक्ति ही खुद उनसे मिलने आता है। इश्तियाक की पत्नी एक कॉर्पोरेटर हैं। अब क्या वेणुगोपाल किसी आने वाले को उनकी गर्दन से पकड़ कर भगा दें। अगर हमने उस व्यक्ति को पार्टी में पद दिया होता तो शायद आपका यह सवाल वाजिब हो सकता था मगर ऐसा कुछ नहीं है। आज जो हुआ, उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।