तमिलनाडु में एक 22 वर्षीय महिला की शिक़ायत पर पुलिस ने उसके 35 वर्षीय शौहर को उसे धमकाने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया है। शिक़ायत के अनुसार, तंजावुर रोड की रहने वाली एक महिला ने अपने शौहर आर रोथार कानी और उसके पुदुकोट्टई ज़िले (अरन्थंगी) के रिश्तेदार के ख़िलाफ़ आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक धमकी और बाल विवाह के आरोप लगाए गए। रोथार, तमिलनाडु और केरल में निवास करने वाला एक तमिल मुस्लिम समुदाय है।
फोर्ट अखिल महिला पुलिस स्टेशन में रोथार कानी, उनकी 56 वर्षीय अम्मी आर संसारथ, 69 वर्षीय अब्बू राजा मोहम्मद के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने रोथार को गिरफ़्तार कर उसे कोर्ट में पेश किया गया, जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के अनुसार, आरोपित रोथार कानी ने 28 जनवरी 2015 को पीड़ित महिला से निक़ाह किया था। निक़ाह के बाद से ही दंपति अरन्थांगी में एक संयुक्त परिवार में रह रहा था। एक दिन बाद ही, पीड़िता ने अपने शौहर को किसी दूसरी महिला से फोन पर बात करते हुए पकड़ लिया।
जब पीड़िता ने इस संदर्भ में अपने शौहर से पूछताछ की तो उसने बिना किसी सवाल का जवाब दिए उसके साथ कथित रूप से मारपीट की। इस मारपीट में शौहर के रिश्तेदारों ने पीड़िता पर हमला किया। इसके बाद, सितंबर 2017 में पीड़िता को घर से निकाल दिया गया। उसके बाद से ही महिला त्रिची में अपने माता-पिता के साथ रह रही थी।
इसके बाद रोथार कानी काम के सिलसिले में सऊदी अरब चला गया। अपनी शिक़ायत में पीड़िता ने बताया कि जब उसका शौहर सऊदी अरब से लौटकर आया तो उसे उम्मीद थी कि वो उससे किसी तरह का समझौता करेगा। लेकिन, वो उस वक़्त हैरान रह गई जब उसे पता चला कि उसके शौहर ने 23 सितंबर को त्रिची में बेमा नगर की एक 17 वर्षीय नाबालिग से निक़ाह कर लिया।
जब पीड़िता ने इस बारे में अपने शौहर से पूछा तो उसने महिला धमकी दी कि अगर उसने किसी तरह की कोई शिक़ायत की तो उसके गंभीर परिमाम उसे भुगतने पड़ेंगे। धमकी के बावजूद, महिला ने शिक़ायत दर्ज कराई जिसके आधार पर आर रोथार कानी को पुलिस ने गिरफ़्ताकर कर लिया और बाक़ी आरोपितों की तलाश जारी है।
इस बीच, सेवई चाइल्डलाइन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 17 वर्षीय नाबालिग लड़की को उसके घर से सुरक्षित बचा लिया और बुधवार (9 अक्टूबर) को उसे बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश कर दिया। ख़बरों के मुताबिक़, नाबालिग लड़की ने इस आरोप से इनकार किया कि उसका निक़ाह रोथार कानी से हुआ था। समिति ने अगले आदेश के आने तक नाबालिग लड़की को रहने के लिए सरकारी रिसेप्शन होम में भेज दिया है।
जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की बेटी ने दावा किया है कि उनकी माँ समेत बहुत से नेता केवल केंन्द्र सरकार का शांति बनाए रखने वाले बॉन्ड न भरने के कारण अभी भी नज़रबंद हैं। उन्होंने बॉन्ड के औचित्य और वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब मुफ़्ती समेत तमाम नेताओं की गिरफ़्तारी और नज़रबंदी ही ‘अवैध’ थी, तो उससे आज़ादी के लिए बॉन्ड का क्या औचित्य? इल्तजा मुफ़्ती ने केंद्र से पूछा कि उनकी माँ को सरकार किस कानून के तहत आज़ादी के लिए बॉन्ड पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर रही है। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म किए जाने के पहले से ही महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला, फारूख अब्दुल्ला समेत घाटी के तमाम नेताओं को केंद्र सरकार ने एहतियातन नज़रबंद कर दिया था।
Reports say detainees released today were forced to sign bonds.Under what law is their release conditional as their detention was illegal itself? Many including Ms Mufti have categorically refused to sign these bonds. The govt with its rudderless approach is tying itself in knots
इल्तजा ने उपरोक्त सवाल अपनी माँ महबूबा मुफ़्ती के ट्विटर अकाउंट से उठाए। इसके
लिए उन्होंने मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया।
घाटी में इन्टरनेट सेवाएँ बंद कर दिए जाने और खुद की नज़रबंदी के चलते 370 हटने के तुरंत बाद महबूबा मुफ़्ती अन्य नेताओं की तरह सोशल मीडिया पर अनुपलब्ध रहीं। लेकिन विगत 20 सितंबर से उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट को इस्तेमाल करने का अधिकार बेटी इल्तजा मुफ़्ती को दे रखा है। यही तरीका फ़िलहाल तिहाड़ जेल में बंद पूर्व गृह और वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने भी अपनाया है, जो अपने परिवार वालों के ज़रिए जेल में बंद होते हुए भी ट्विटर पर समसामयिक मुद्दों से जुड़ी राय रखते रहते हैं।
Ms Mehbooba Mufti, former Chief Minister J&K to whom this twitter handle belongs has been detained since 5th August 2019 without access to the account. This handle is now operated by myself, Iltija daughter of Ms Mufti with due authorisation.
इल्तजा ने जिन तीन कश्मीरी नेताओं की सशर्त रिहाई से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों का ज़िक्र किया है, वे हैं यावर मीर, नूर मोहम्मद और शोएब लोन। अधिकारियों ने आज ही (10 अक्टूबर, 2019, गुरुवार) को हुई उनकी रिहाई के लिए अलग-अलग कारण होने की बात कही है। मीर रफियाबाद विधानसभा सीट से महबूबा की ही पीडीपी के पूर्व विधायक रह चुके हैं, वहीं लोन कॉन्ग्रेस के जिला अध्यक्ष होने के अतिरिक्त उत्तर कश्मीर के टिकट पर चुनावों में किस्मत आजमा चुके हैं। नूर मोहम्मद नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ता हैं, जिनका श्रीनगर के बटमालू में ख़ासा प्रभाव माना जाता है। अधिकारियों ने मोहम्मद की रिहाई के पहले उनके शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने के आश्वासन वाले बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने की बुधवार रात को पुष्टि की थी।
उत्तर प्रदेश में अपनी खोई साख पाने की मंशा से कॉन्ग्रेस बदलाव की तरफ बढ़ रही है। लेकिन, नए चेहरों से पुराने नाराज दिख रहे हैं। वाराणसी से पूर्व सांसद राजेश कुमार मिश्र ने उस परिषद का हिस्सा बनने से मना कर दिया है, जिसे कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को सलाह देने के लिए बनाया गया है। उनका कहना है कि वे प्रियंका गाँधी को सलाह देने की स्थिति में नहीं हैं।
सांसद राजेश मिश्रा ने पार्टी को देश के मौजूदा राजनीतिक परिवेश में आत्ममंथन करने की सलाह देते हुए महासचिव प्रियंका गाँधी के सलाहकार का दायित्व संभालने से इनकार कर दिया है। राजेश मिश्रा ने कहा कि उनकी हैसियत प्रियंका गाँधी को सलाह देने की नहीं है और उन्होंने अपने फैसले से कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के कार्यालय को अवगत करा दिया है। साथ ही उन्होंने लखनऊ कैंट सीट के प्रभारी का पद सँभालने से भी मना कर दिया है।
#Congress leader Rajesh Mishra on Thursday said he has declined to take up his appointment as a member of an advisory council to @priyankagandhi, saying that he is not in a position to advise her https://t.co/jw1y09cNNL
सलाहकार का पद स्वीकार न करने को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वह प्रियंका गाँधी को सलाह देने की स्थिति में नहीं हैं। उनको जो समझ में आया, उसके अनुसार उन्होंने यह कदम उठाया है। यह पूछे जाने पर कि क्या उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की नवगठित कार्यकारिणी से नाराज होकर उन्होंने यह कदम उठाया है, मिश्रा ने कहा कि बहुत सी चीजें गलत हैं, लेकिन यह पार्टी का अंदरूनी मामला है। अगर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी या महासचिव प्रियंका गाँधी उन्हें बुलाकर बात करेंगे तब वह उनके सामने सारी बातें रखेंगे।
पूर्व सांसद ने कॉन्ग्रेस को देश के मौजूदा राजनैतिक परिस्थितियों में आत्ममंथन की सलाह दी ताकि पार्टी की स्थिति दुरुस्त हो सके। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को देश के मौजूदा राजनैतिक परिस्थितियों के मद्देनजर जो करना चाहिए, वह नहीं कर पा रही है। कॉन्ग्रेस को मौजूदा हालात से उबारने के लिये मेहनत की जानी चाहिए तथा पार्टी के लोगों का मनोबल बढ़ाने वाला कदम उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को जमीनी, निष्ठावान, मेहनती तथा विशुद्ध कॉन्ग्रेसी लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए।
इसके साथ ही राजेश मिश्रा का कहना है कि पार्टी की अनुशासन समिति, दल के वरिष्ठ नेताओं तथा दल के राज्य प्रभारियों को पार्टी नेताओं की अनावश्यक बयानबाजी का संज्ञान लेकर स्थिति को सामान्य करने के लिये कदम उठाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की नवगठित समिति में नए अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के पद संभालने से पहले ही हंगामा शुरू हो गया है। कई वरिष्ठ नेता नाराज हैं और कुछ ने तो इस्तीफे भी दे दिए हैं।
हरियाणा के गुरुग्राम में गो-तस्करों ने बजरंग दल के एक कार्यकर्ता को गोली मार दी। घटना बुधवार (अक्टूबर 9, 2019) रात करीब 3 बजे की है। गोतस्करी रोकने के लिए बजरंग दल और हरियाणा पुलिस की टास्क फोर्स के गो-रक्षक गुरुग्राम के सेक्टर 10 इलाके में मौजूद थे। इस दौरान जब दोनों पक्षों में मुठभेड़ हुई तो गो-तस्करों ने गोली चला दी, जो मोनू मनेसर नाम के बजरंग दल कार्यकर्ता को जा लगी। उसे गंभीर हालत में मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
बजरंग दल का यह कार्यकर्ता गो-तस्करों का पीछा कर रहा था, जिस पिकअप वैन में गो-तस्कर गाय को ले जा रहे थे। इसका एक वीडियो भी सामने आया है। जिसमें देखा जा सकता है कि पुलिस के बैरिकेडिंग को गिरा कर गो-तस्कर की गाड़ी निकल जाती है।
बताया जा रहा है कि एक पिकअप वैन में गो-तस्कर गायों को लेकर जा रहे थे। रात को पेट्रोलिंग कर रही इस टास्क फोर्स ने जब इन तस्करों को देखा तो इनका पीछा किया। करीब 10 किलोमीटर तक टास्क फ़ोर्स ने इनका पीछा किया। गो-तस्करों को जैसे ही पता चला कि उनका पीछा किया जा रहा है, तो पकड़े जाने के डर से इन तस्करों ने चलते टेम्पों से गाय को फेंक दिया और फिर पुलिस और गो-रक्षकों के ऊपर फायरिंग कर दी। जिसमें मोनू मनेसर नाम का बजरंग दल कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गया।
DCP (crime), Gurugram Rajiv Deshwal on cow vigilante shot: At last they fired bullets which hit a member of a cow vigilante org. He was immediately admitted to a hospital. 5 of the 6 smugglers identified. Vehicle of smugglers has been recovered, search for smugglers is underway. https://t.co/92jlzaPdky
हालाँकि बाद में पुलिस ने गो-तस्करों को गिरफ्तार कर लिया है। इस मामले में गुरूग्राम के क्राइम डीसीपी राजीव देशवाल ने कहा कि तकरीबन 6 गौ तस्कर अपने गाड़ी में गाय ले जा रहे थे। जब कार्यकर्ता ने उन्हें देखा तो उन्होंने वाहन का पीछा किया और पुलिस को सूचित किया। पुलिस की गाड़ियों ने भी उनका पीछा किया। इस बीच तस्करों ने गायों को वाहन से फेंकना शुरू कर दिया।
डीसीपी ने बताया कि अंत में गो-तस्करों ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दी। जो गो-रक्षक के सदस्य को जाकर लगी। उन्हें तुरंत एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने बताया कि 6 में से 5 तस्करों की पहचान की जा चुकी है और साथ ही तस्करों का वाहन भी बरामद कर लिया गया है।
इंडोनेशिया में नॉर्थ सुमात्रा के गवर्नर ईडी रहमायादी ने तोबा झील देखने आए मुस्लिम पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ‘हलाल टूरिज्म’ का प्रस्ताव रखा, वहीं दूसरी तरफ़ क्षेत्र के ईसाइयों ने इसका विरोध करने के लिए दो दिवसीय ‘पोर्क उत्सव’ के आयोजन की योजना बनाई है। तोबा के पर्यटन उद्योग ने 1997 के एशियाई वित्तीय संकट और 2002 बाली बम विस्फोट के बाद अच्छा विकास किया है और इसलिए गवर्नर ने सोचा कि ‘हलाल पर्यटन’ उद्योग को और बढ़ावा देगा।
रहमायादी ने मस्जिदों के निर्माण का प्रस्ताव दिया था और रेस्तरां के लिए हलाल प्रमाणपत्र भी प्राप्त किया था। उन्होंने कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से सूअर मारने की ग़ैर-हलाल प्रथा को विनियमित करने का सुझाव दिया। उन्होंने यह भी कहा था कि योजना पोर्क-आधारित भोजन बेचने वाले खाद्य विक्रेताओं के लिए एक नीति लागू करेगी। रहमायादी ने संवाददाताओं से कहा, “अगर मुस्लिम पर्यटक यह सब देखेंगे, तो वे तोबा झील में फिर कभी वापस नहीं आएँगे।”
हालाँकि, इस क्षेत्र में रहने वाली ईसाई आबादी के बताक (इंडोनेशिया के उत्तर सुमात्रा प्रांत में रहने वाले कई जातियों को सामूहिक रूप से कहा बताक कहा जाता है) ने इस क़दम का विरोध किया है। तोबा झील के आसपास के निवासी जन्मदिन और शादियों जैसे अवसरों को यादगार बनाने के लिए सुअर को मार कर दावत देते हैं।
इंडोनेशिया में लगभग 90% आबादी मुस्लिम है, जबकि बाक़ी आबादी का अधिकतम हिस्सा ईसाई आबादी का है। बौद्ध और हिन्दू छोटे समुदाय हैं। ईसाई लोग नियमित रूप से जनवरी में चीनी नव वर्ष पर पोर्क उत्सव का आयोजन करते हैं जिसका नाम इस्लामी समूहों के विरोध के बाद ‘इम्लेक’ पर रखा गया था।
तोबा झील का गठन 74,000 साल पहले एक बड़े पर्यवेक्षणीय विस्फोट के बाद हुआ था, जो पिछले 25 मिलियन वर्षों में पृथ्वी पर सबसे बड़े विस्फोटक के रूप में जाना जाता है। अब यह एक बड़े ईसाई अल्पसंख्यक का घर है, जो अब इस क्षेत्र को मुस्लिम पर्यटन स्थल में बदलने योजनाओं के विरोध में है।
उत्तर सुमात्रा के गवर्नर ईडी रहमायादी ने प्रस्ताव दिया था कि उनका प्रशासन क्षेत्र में हलाल पर्यटन को बढ़ावा देगा, लेकिन बताक लोगों ने अब तोबा झील में और उसके आसपास पोर्क उत्सवों का आयोजन करके एक अनोखे तरीके से हलाल पर्यटन का विरोध करने का फ़ैसला किया है।
तोबा झील के बीच में समोसेर द्वीप के रीजेंट रैपिडिन सिंबलोन ने कहा कि वो गवर्नर की ‘हलाल और शरिया’ योजना का विरोध करेंगे।
पोर्क उत्सव के कार्यकर्ताओं में से एक, तोगु सिमोरंगकिर ने बताया कि इस उत्सव में लोगों को सूअर पकड़ने, सूअरों के वजन का अनुमान लगाने, सुअर के स्वच्छ स्टॉल लगाने और सूअरों के साथ सेल्फी लेने जैसी प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है। सर्वश्रेष्ठ पोर्क स्टेक को एक पुरस्कार भी दिया जाएगा, साथ ही साथ स्टैंड-अप कॉमेडी और एक संगीत उत्सव का आयोजन भी होगा।
कभी ये समुदाय विशेष हो जाते हैं, कभी ये राघव बहल जैसों के क्विंट के लिए ‘दो समूह’ हो जाते हैं, कभी इनके पाँच साल के बच्चे को कोई पाकिस्तान जाने को कह देता है जिससे ‘वायर’ हिन्दू माता-पिता को नसीहत देते हैं कि उन्हें अपने बच्चों को घृणा और साम्प्रदायिकता नहीं सिखानी चाहिए… लगता है कि हिन्दुओं ने बड़ा आतंक मचा रखा है भाई, इनको जल्दी से देश से निकालो।
लेकिन सच्चाई तो इससे कोसों दूर कुछ और ही है। मदरसों में रेप मौलवी और मुल्ला करें, काँवरिया पर पत्थरबाजी समुदाय विशेष करें, दुर्गापूजा पंडालों पर पत्थर समुदाय विशेष फेंकें, रामनवमी के जुलूस पर चप्पल समुदाय विशेष फेंके, विसर्जन की राह में मांस फेंके जाएँ, काफिरों से धरती खाली करने की बात एक किताब में हो, लेकिन किसके बच्चों को ‘घृणा और पूर्वग्रह’ से बचना सीखना चाहिए स्कूलों में? हिन्दुओं के!
पिछले दो दिन में, कम से कम आठ जगहों से दुर्गा विसर्जन पर पथराव, या पंडालों को भीतर मूर्तियों को तोड़ने, जलाने या सर तोड़ कर फेंक देने की बातें सामने आई हैं। ज़ाहिर है कि बलरामपुर में मस्जिद के पास विसर्जन का जुलूस गुजरा तो उस पर जो पथराव हुआ वो हिन्दुओं ने ही किया होगा ताकि ‘शांतिप्रियों’ का नाम फँसाया जा सके। वहीं, बस्ती नामक जगह पर कॉमन सेंस तो यही कहता है कि साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने को उतावले हिन्दुओं ने अपनी ही माँ दुर्गा के विसर्जन के रास्ते में मांस के टुकड़े फेंक दिए होंगे।
बदायूँ में मूर्ति भी खुद हिन्दुओं ने तोड़ी होगी ताकि इलाके के ‘शंतिप्रियों’ को बदनाम किया जा सके। रफीकुल की शक्ल का मास्क लगा कर, सर पर तिलक लगा कर, कोई हिन्दू ही असम के बारपेटा में लक्ष्मी की मूर्ति तोड़ रहा होगा ताकि एक मजहब के किसी शांत स्वभाव के नवयुवक को इस घटना का आरोपित बनाया जा सके। अरुणाचल के दोईमुख बाजार में देवी दुर्गा की मूर्ति भी बनाने वाले ने ही तोड़ी होगी क्योंकि इलाके के ईसाई से उनकी जाती दुश्मनी है और ऐसा करने के बाद इल्जाम लगाना आसान हो जाता है। बंगाल के केतुग्राम में देवी माँ की मूर्ति का सर भी हिन्दुओं ने स्वयं तोड़ा होगा ताकि बेचारे शांतिदूतों को नकारात्मक तरीके से दिखाया जा सके।
गया में मूर्ति विसर्जन पर पथराव तो वहाँ के भूमिहारों ने किया होगा ताकि शान्तिप्रियों का नाम मीडिया में आए और इस्लामोफोबिया फैलाया जा सके। क्योंकि ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ का नारा तो हिन्दुओं ने ही लगाया और तब आप के विसर्जन पर पथराव हुआ क्योंकि आप किसी के देश के खिलाफ नारा नहीं लगा सकते, बुरा लगता है। जहानाबाद में विसर्जन के दौरान पत्थरबाजी हिन्दुओं ने ही की होगी ताकि डर के माहौल में जी रहे शान्तिप्रियों को पूरे देश में पत्थरबाजी करने वाला बताया जा सके।
निजी अनुभव की नौटंकी जो लिबरपंथी करते रहते हैं
इसलिए, जब ‘वायर’ में यह लिखा जाता है कि ‘मैं अपने बच्चे के दोस्त के यहाँ पार्टी में गई और यह सुन कर सन्न रह गई कि उसका दोस्त उसे पाकिस्तान जाने की बात कहता है’, तो आपको तुरंत विश्वास हो जाएगा क्योंकि हिन्दू बच्चे तो गर्भ में चक्रव्यूह तोड़ना सीख लेते हैं, यहाँ तो फिर भी पाँच साल का परिपक्व, समझदार और चालाक बालक है जो स्कूलों में और घरों में यही सब तो सीखता है।
अंग्रेजी में बताया गया है कि हिन्दू माता-पिता बच्चों की अज्ञानता, घृणा और पूर्वग्रह का पता लगाते रहना चाहिए कि वो ये सब कहाँ से सीख रहे हैं
आप जरा सोचिए कि यही बात कोई भी व्यक्ति किसी भी मजहब विशेष के बच्चे के बारे में लिख दे कि… खैर, बच्चा तो छोड़िए, आप ये कह दीजिए कि एक नवयुवक यह बोल रहा था कि उसे पाँच काफिरों का धर्मांतरण करना है। या, यह कि मुगलों ने यहाँ के हिन्दुओं पर राज किया है, और आगे भी करेंगे। तो आप पर लिबरपंथी और कामभक्त वामपंथी लम्पट गिरोह तुरंत ‘बिगट’ और ‘कम्यूनल’ का ठप्पा वैसे ही चिपका देगा जैसे किसी प्रेमिका के गले पर पहले मिलन की रात में प्रेमी ‘लव बाइट’ जिद कर के चिपका देता है।
वामपंथी लम्पटों का यह सबसे पसंदीदा तरीका है जहाँ उन्हें किसी भी तरह के सबूत की ज़रूरत नहीं पड़ती, वो बस ‘निजी अनुभव’ के नाम पर दुनिया भर की विचित्र बातें लिख देते हैं। आप सोचिए कि कोई कितना नीचे गिरा होगा कि एक आर्टिकल लिखने के लिए उसे अपने बच्चे का ‘इस्तेमाल’ करना पड़ा होगा। जब कोई किसी भी घटना में पाँच साल के बच्चे को ले आते हैं तो मकसद यही होता है कि उस बच्चे की निश्छलता, दुनिया के तमाम विचारों से उसका अनजान होना, उस बिन्दु में कही जा रही बात को पूरी तरह से सत्य साबित कर दे।
इसलिए, जब कोई अपने होशो-हवास में इस तरह से किसी मासूम का इस्तेमाल करता है, ताकि वो सात-आठ सौ शब्दों का कोई लेख लिख सके, तो तरस आता है कि ये लोग किस तरह के समाज का निर्माण करना चाह रहे हैं? हर लेख में इसी तरह के विचित्र निजी अनुभव, जो आपको या मुझे कभी नहीं होता, बताते हैं कि कुछ लोग लेख लिखने के लिए अपने हिसाब के सामाजिक विकृतियों के उदाहरण ढूँढने में असफल रहने पर, अपने बच्चे तक को खींच लाते हैं।
लेकिन इसकी जरूरत है क्या? आप एक सामान्य विचार कब रखते हैं? आप ऐसा कब कहते हैं कि आतंक का मजहब है? आप ऐसा कब कहते हैं कि फलाँ जगह तो नकली नोट छापने के लिए कुख्यात है? जब हम किसी घटना को, व्यवहार को, तरीके को समाज में इस तरह से दिखाना चाहते हैं कि ये नया नॉर्मल है, ये अब सामान्य हो गया है, तो उसके लिए हमारे पास सिर्फ एक उदाहरण नहीं होना चाहिए, वो भी निजी!
ऐसा साबित करने के लिए, या समाज के ध्यानाकर्षण के लिए, हमारे पास उन बीस जिलों के नाम होने चाहिए जो बंगाल में है, और दंगे हुए हैं। तब हम कह सकते हैं कि ममता बनर्जी का बंगाल जल रहा है। ऐसा नहीं होता कि बिहार में एक जगह बम फटे, और हम कहने लगें कि बिहार इस्लामी आतंक के धमाकों से दहल रहा है। ये नहीं होता कि आप पार्क में जाएँ और एक दिन आप पर किसी का कुत्ता भौंके, तो आप आ कर ये लिखने लगें कि दिल्ली के पार्कों में कुत्तों ने मॉर्निंग वॉक पर जाना मुहाल कर दिया है।
अगर ‘वायर’ यह लिख रहा है कि हिन्दू माता-पिताओं को, अपने बच्चों को स्कूलों से घृणा सीख कर आने से बचाना चाहिए, तो ‘वायर’ को यह बताना पड़ेगा कि कितने हिन्दुओं के बच्चों ने, कितने दूसरे मजहब विशेष वालों को, किस-किस जगह पर, किस-किस बर्थ डे पार्टी में ये कहा कि भारत तुम्हारा देश नहीं। अगर उनके पास किसी फ़र्ज़ी, वानाबी पत्रकार की कल्पनाशील कहानी के सिवा कुछ नहीं है तो लानत है ऐसे मीडिया संस्थान के एडिटर पर जो इस तरह की घटिया बातों को हवा दे कर समाज में साम्प्रदायिकता का जहर बेच रहा है।
पैटर्न तो कुछ और है यहाँ
अब मुझे यह जानने में बहुत ज्यादा रुचि हो गई है कि काँवरियों के जत्थों पर पथराव क्यों होता है? क्या शान्तिप्रियों के इलाकों से गुजरने वाली सड़कें शान्तिप्रियों के बापों की जागीर है? आखिर, किस स्कूल में वो बच्चे पढ़ते हैं जो रात के एक बजे, काँवरियों के उनके इलाके से गुजरने पर घात लगा कर बैठते हैं और पत्थर-ईंट फेंकते हैं? किसी स्कूल में तो वो बच्चे भी जाते होंगे जो मस्जिद के पास से विसर्जन की भीड़ पर पत्थर फेंकते हैं? वो स्कूल नहीं जाते तो कहीं से तो ऐसी उत्तम शिक्षा पाते होंगे।
पिछले दो-तीन सालों में, कश्मीर में होने वाली पत्थरबाजी तो कम हो गई लेकिन दसियों जगह पर ‘शान्तिप्रियों’ ने हर हिन्दू पर्व पर, जिसमें थोड़ा भी बाहर जाने का स्कोप हो, अपनी पत्थरबाजी की छाप ज़रूर छोड़ी है। इनके कारण विचित्र होते हैं, अगर पूछा जाए तो। इनके हिसाब से मस्जिद के सामने से आप जुलूस नहीं ले जा सकते। क्यों? आखिर, मस्जिद के सामने से विसर्जन का जुलूस न निकाला जाए, तो कहाँ से निकाला जाए? दस किलोमीटर घूम कर जाएँ, या फ्लाइओवर बनवा दें?
कुछ जगह पता चला कि समुदाय विशेष के इलाके में ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगे, तो वो क्रोधित हो गए। अब मुझे यह कोई समझा दे कि भारत में ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ का नारा क्यों नहीं लगेगा? किसी ‘शांतिप्रिय’ को इस नारे से आपत्ति क्यों है? तुम्हारे सामने अगर कोई पाकिस्तान मुर्दाबाद कहता है, तो तुम इकट्ठा हो कर, पत्थर मारने की जगह ‘हिन्दुस्तान जिंदाबाद’ क्यों नहीं कहते? एक बार में हिन्दुओं का मुँह बंद हो जाएगा। तुम जिस देश में रहते हो, खाते हो, सड़क पर चलते हो, सरकार की योजनाओं का लाभ लेते हो, उस देश के नाम का नारा एक बार लगा कर देखो तो सही।
लेकिन नहीं, तुरंत पत्थर उठा लेंगे क्योंकि कश्मीर से ले कर लंदन तक समुदाय विशेष का फेवरेट हथियार यही है। हर जगह से इस प्रागैतिहासिक काल के हथियार का इस्तेमाल ये समुदाय विशेष वाले करते हैं। मौका मिला तो छतों पर इकट्ठा कर के रखते हैं कि कब हिन्दुओं का काफिला निकले तो फेंका जाए। इन घटनाओं से तो यही लगता है कि ये चाहते हैं कि हिन्दुओं की धार्मिक यात्रा, उनका कोई जुलूस, कोई विसर्जन आदि उनके इलाके से गुजरे और उनके हथियार काम में लाए जा सकें। बाकी का काम तो राघव बहल जैसे लोग कर ही देंगे कि बोल्ड अक्षरों में कट्टरपंथियों द्वारा की गई पत्थरबाजी को ‘टू ग्रुप्स’ यानी ‘दो समूह’ के बीच का झगड़ा बता देंगे।
मस्जिद के सामने से हिन्दू अपनी आस्था का प्रतीक नहीं ले जा सकता। लेकिन हाँ, हर शुक्रवार को, शहरों, गाँवों, कस्बों की मस्जिदों से बाहर, सड़क पर नमाज कौन पढ़ता है? कितनी बार आपने खबर सुनी है कि नमाज पढ़ने वालों पर हिन्दुओं ने पत्थर फेंका? रेल के ट्रैक पर नमाज क्यों पढ़े जाते हैं? ईद की नमाज दिल्ली के जामा मस्जिद में हर तरफ जगह बची होने के बावजूद सड़कों पर क्यों पढ़ी जाती है? कितनी बार इस सुनियोजित अराजकता पर किसी ने पत्थर फेंकना तो छोड़िए, सवाल भी किया है ढंग से? हाँ, इससे भले ही ट्रैफिक जाम लग जाए, कोई बात नहीं। शुक्रवार की नमाज है, सड़कों पर फैलेगी, रेल के ट्रैक पर होगी, बर्मिंघम के पार्कों में होगी…
क्यों? क्योंकि ये मजहबी बात से कहीं ज्यादा शक्ति प्रदर्शन है कि हाँ, हम करेंगे, जो करना है करो। साथ ही, तुम भले ही बहुसंख्यक हो, लेकिन हमारे इलाके से गुजरे तो पत्थरों से बींध देंगे क्योंकि हम अल्पसंख्यक हैं, और चूँकि ‘शांतिप्रिय’ हैं तो हम पहले से ही विक्टिम बन जाएँगे। हम किसी हिन्दू को विशुद्ध मजहबी कारणों से भी छुरा मारेंगे तो भी हमारे समर्थन में मीडिया का एक हिस्सा कहेगा कि जरूर हिन्दू ने कुछ किया होगा। हाँ, किया था हिन्दू ने कुछ, वो समुदाय विशेष से नहीं था इसलिए कभी प्रशांत पुजारी, कभी डॉक्टर नारंग, कभी अंकित सक्सेना, कभी भारत यादव के रूप में वह कट्टरपंथियों द्वारा मारा जाता रहा।
लेकिन सुधार किसमें चाहिए? हिन्दुओं में
अब बात आती है कि ये जो ‘वायर’ वाले और ‘क्विंट’ वाले, हिन्दुओं को ही आतंकी बताने लगते हैं। एक घटना में कोई ‘जय श्री राम’ की बात करता दिखता है, तो ये लोग एक महीने तक हर टुच्चे झगड़े में ‘जय श्री राम’ घुसा देंगे, और वो हर घटना बाद में झूठी साबित होगी। फिर भी, ये रुकते नहीं क्योंकि इनका उद्देश्य दूसरे मजहब वालों में यह दुर्भावना फैलाने की होती है कि देखो, अब तो जय श्री राम महीं बोलोगे, तब भी हिन्दू तुम्हें पीटेगा।
अब सवाल यह है कि ये लोग हर बार, कट्टरपंथियों की आतंकी वारदातों पर, मजहबी पत्थरबाजी पर, शान्तिप्रियों की गौतस्करी पर, बीफ माफिया के ‘शान्तिप्रियों’ द्वारा बीस हिन्दुओं की बीस महीने में हुई हत्या पर, चुप क्यों रह जाते हैं। अगर फेसबुक या एक-दो दक्षिणपंथी पोर्टल इन खबरों की रिपोर्टिंग न करें, तो ये लोग मजहबी बलात्कारियों तक को ‘राम (बदला हुआ नाम)’ कह कर छुपा लेते हैं।
कट्टरपंथियों द्वारा की गई लिंचिंग पर चुप्पी और हिन्दुओं द्वारा किए गए सामाजिक अपराधों को भी साम्प्रदायिक रंग दे कर रिपोर्ट करना ही इस वामपंथी मीडिया गिरोह और पाक अकुपाइड पत्रकारों की पहचान है। दोनों ही सूरतों में, एक मजहब को शांतिप्रिय बता कर उसे उसके उद्गम के साल से ही पीड़ित दिखाने की जिद और दूसरे धर्म को आक्रांता बता कर अल्पसंख्यकों के मन में डर और जहरीले विचारों को रखना, इनके वृहद अजेंडे के लिए सूटेबल है।
इनका असली अजेंडा है कि भारत में गृहयुद्ध की स्थिति बने और किसी भी तरह से एक खास पार्टी और विचारधारा की सरकार को हटाया जा सके। इनकी उम्मीद के विपरीत जब दो बार भाजपा की बहुमत वाली सरकार भी नहीं आ पाई, तो अब इनका अजेंडा है लोगों को भड़काना, साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलना।
यही कारण है कि हर आतंकी हमले में कट्टरपंथियों की संलिप्तता के बावजूद, रट यही लगाई जाती है कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता। हिन्दुओं के हर त्योहार पर शांतिप्रियों द्वारा व्यवधान से लेकर, मूर्तियों को तोड़ने, शिवलिंग पर पेशाब करने, जुलूसों पर पत्थरबाजी करने के बाद भी, आरोपितों और अपराधियों को ‘समुदाय विशेष’ से ले कर ‘दो समूह में झड़प’ के नाम पर छुपा लिया जाता है।
कितनी बार मस्जिदों को तोड़ने की बात तो छोड़िए, उसकी दीवार को छूने की भी खबर आपने सुनी है? कभी सुना है कि किसी गाँव की मस्जिद को हिन्दुओं ने तोड़ दिया? जबकि हिन्दुओं को मंदिर को तोड़ कर, उसकी दीवारों को नींव बना कर, बाबरी मस्जिद बना दी गई, काशी विश्वनाथ के बगल में ज्ञानवापी मस्जिद खड़ी हो गई, मथुरा में मस्जिद की एक दीवार मंदिर की ही है, फिर भी आपने कितने विद्रोह देखे हैं?
सच तो यह है कि इस शांतिप्रिय समुदाय की हरकतें हर त्योहार पर हिन्दू झेल रहे हैं। वो पुलिस से गुहार लगाते हैं कि उनकी सुन ली जाए। दो मिनट में पुलिस स्टेशन को घेर लेने वाली भीड़ किसकी होती है जो जयपुर में आग लगा देती है? रामनवमी के जुलूस पर चप्पल हिन्दू नहीं फेंकते, विसर्जन पर होती पत्थरबाजी हिन्दू नहीं करता, दुर्गा की मूर्तियों की गर्दन हिन्दू नहीं तोड़ता, शिव पर जल चढ़ाने जाते काँवरियों पर ईंट के टुकड़ों की बरसात हिन्दू नहीं करता, धार्मिक आयोजनों के राह में मांस के टुकड़े हिन्दू नहीं फेंकता…
हिन्दू बस सहनशील हो कर अभी भी कानून की शरण लेता है। हिन्दुओं की सहिष्णुता की सीमा कट्टरपंथी समुदाय टटोलना बंद कर दे क्योंकि हर व्यक्ति रक्त-मज्जा का ही बना होता है। इसी हाड़-मांस के इन्सान में समझदारी भी होती है, और वही किसी नारे के पीछे पागल हो कर बाजारों में फटता भी है। परंतु, हिन्दू हर मजहब के पाप का बोझ ले कर नहीं चल सकता, उसकी सहिष्णुता उसकी कमजोरी की तरह देखी जा रही है।
और अंत में, राष्ट्रकवि दिनकर की ये पंक्तियाँ स्मरण रहें:
तीन दिवस तक पंथ माँगते रघुपति सिंधु किनारे बैठे पढ़ते रहे छंद अनुनय के प्यारे प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता ग्रहण की बँधा मूढ़ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
महाराष्ट्र के सांगली जिले में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा, उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया तो इसका विरोध सिर्फ कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने किया था, राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि केंद्र सरकार के इस कदम के बाद राज्य में खून की नदियाँ बह जाएँगी लेकिन सच तो यह है कि वहाँ एक गोली तक नहीं चली।
शाह यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही संसद सत्र में तीन-तलाक,अनुच्छेद 370 और 35ए जैसी समस्याओं को जड़ से ख़त्म कर दिया। उन्होंने भारत की और से की गई बालाकोट एयर स्ट्राइक का भी ज़िक्र करते हुए कहा कि भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक करके दुनिया को यह दिखा दिया कि यदि वे एक भारतीय को मारते हैं तो उन्हें इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के किसानों के क़र्ज़ को लेकर बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि पिछले 5 साल में महाराष्ट्र सरकार ने सांगली जिले के 11 लाख किसानों का तकरीबन 3700 करोड़ रूपए का क़र्ज़ माफ़ किया है। सांगली की जनता को संबोधित करते हुए उन्होने यह भी बताया कि उनकी सरकार ने करीब 1.17 लाख गरीबों के घर में शौचालय बनवाए हैं, 46000 महिलाओं को गैस का कनेक्शन दिया साथ ही 38,000 घरों में बिजली पहुँचाने का भी काम किया है।
महाराष्ट्र में इस मौके पर बोलते हुए अपने भाषण में शाह ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी पर भी निशाना साधा, उन्होंने कहा “केंद्र और महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस और NCP की सरकार थी, तो उन्होंने महाराष्ट्र को 5 वर्ष में केवल 1 लाख 15 हजार 500 करोड़ रुपए दिए। आपने मोदी जी और देवेंद्र फडणवीस जी की सरकार बनाई तो मोदी जी ने 2 लाख 86 हजार 356 करोड़ रुपया महाराष्ट्र के विकास के लिए दिया है।”
अपने भाषण में उन्होंने यह भी बताया कि कैसे मोदी सरकार के कामकाज ने विदेशों में हिन्दुस्तानियों का सर गर्व से ऊँचा किया है उन्होंने कहा- “मोदीजी जिस भी देश में जाते हैं वहाँ एयरपोर्ट पर मोदी-मोदी के नारे सुनाई देने लगते हैं। यह सिर्फ भाजपा या मोदी जी का ही सम्मान नहीं है बल्कि देश के सवा-सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों का भी सम्मान है।”
कॉन्ग्रेस प्रत्याशी दिलप्रीत सिंह को लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर उपचुनाव में प्रचार करते हुए आचार संहिता के उल्लंघन का आरोपित पाया गया है। दिलप्रीत सिंह के खिलाफ आलमबाग रेलवे स्टेशन में में एफआईआर दर्ज कराई गई है और आगे की जाँच की जा रही है।
कैंट विधानसभा सीट पर उपचुनाव में आचार संहिता के उल्लंघन का यह पहला मामला है। आरोप है कि कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ने आलमबाग में रामलीला के दौरान मंच से अपने लिए वोट माँगे। दिलप्रीत सिंह ने 6 अक्टूबर को आलमबाग रेलवे कॉलोनी में आयोजित रामलीला में एक भाषण में लोगों को संबोधित करते हुए राज्य में आगामी उप-चुनावों में उन्हें और उनकी पार्टी को वोट देने की अपील की।
Lucknow: An FIR has been registered against Dilpreet Singh – Congress candidate for the by-elections to the legislative assembly of the state, for allegedly violating the Model Code of Conduct by addressing a Ramlila rally on 6th October and asking people to vote for his party.
अपर जिलाधिकारी संतोष कुमार वैश्य का कहना है कि आचार संहिता के लिए एमसीसी की टीमें प्रत्याशियों की निगरानी कर रही हैं। इसके साथ ही कैंट सीट पर उपचुनाव लड़ रहे 13 प्रत्याशियों में से अब तक किसी ने भी खर्च का ब्योरा नहीं दिया है। अधिकतर के रजिस्टरों में खामियाँ हैं। कॉन्ग्रेस प्रत्याशी का रजिस्टर भी अधूरा है। प्रशासन ने सभी प्रत्याशियों को नोटिस जारी किया है। बता दें कि लखनऊ कैंट सीट के लिए उपचुनाव 21 अक्टूबर को होने वाले हैं और इसके परिणाम 24 अक्टूबर को घोषित किए जाएँगे।
प्राय: ऐसा देखा गया है कि भाजपा प्रत्याशी या नेता ईश्वर के दरबार में माथा टेककर वोट माँगने जाते हैं। ये शायद ऐसा पहला मामला है, जब कॉन्ग्रेस प्रत्याशी भगवान के दरबार में वोट माँगने गया और रामलीला के दौरान आयोजित सभा में वोट माँगकर बुरी तरह से मुसीबतों में घिर गया। उसने भगवान के दरबार में वोट माँगते हुए आचार संहिता का उल्लंघन कर दिया।
अपने भाई अकबरुद्दीन ओवैसी की बदजुबानी को अपनी ‘कम ज़हरीली’ भाषा से ढँकने वाले असदुद्दीन ओवैसी कल खुद ही विष-वमन करते नज़र आए। हमेशा हिन्दुओं को, राष्ट्रवादियों को “संविधान में राष्ट्रवाद नहीं लिखा”, “संविधान में हिन्दुओं के लिए फलाना-ढिकाना नहीं है” की दुहाई देने वाले AIMIM प्रमुख ने न केवल समुदाय विशेष से आस्था और मजहब के आधार पर, मुस्लिमों को वोट देने की अपील की, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का समर्थन करने वाले मुस्लिमों को ‘छक्का’ (हिजड़ों, उभयलैंगिकों, ट्रांसजेंडरों समेत LGBT समुदाय के लिए प्रयुक्त अपमानजनक शब्द) भी बताया। वे नांदेड़, महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनावों के पहले एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे।
6 फीसदी लोग छक्के, क्योंकि मोदी को वोट देते हैं?
कभी राष्ट्रीय स्तर के यूनिवर्सिटी क्रिकेट खिलाड़ी रहे ओवैसी ने अपनी ज़हर की
राजनीति में भी क्रिकेट को घसीट लिया। 2014 और 2019 में 6-6% मुस्लिम वोट मोदी के
खाते में जाने की बात का ज़िक्र जनसभा में करते हुए उन्होंने कहा, “6 का जो नंबर है, क्रिकेट मैच में छक्का बोलते हैं।” और-तो-और, सुन रही जनता ने इस पर तालियाँ भी बजाईं, समर्थन में हूटिंग भी की।
Owaisi was in nanded yesterday..
while reacting to aadarsh kaka’s statement that H ppl dnt vote M candidate so he did nt gave ticket to M man from nanded south..
हमेशा हिन्दुओं को सेक्युलरिज़म का तकाजा याद कराने वाले ओवैसी ने मुस्लिमों से सेक्युलरिज़म भूल जाने की अपील की। “हमको अपने नुमाइंदों की ज़रूरत है।” देश में उन्होंने सेक्युलरिज़म को ‘अस्पताल के वेंटिलेटर पर’ बताया।
40-50 मुस्लिम सांसद मिल कर याकूब को बचा लेते
याकूब मेमन की फाँसी का ज़िक्र करते हुए ओवैसी ने दावा किया कि अगर याकूब मेमन की फाँसी के समय संसद में 40-50 मुस्लिम सांसद होते तो कॉन्ग्रेस पर सियासी दबाव बनाकर उसकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील कराया जा सकता था। (हालाँकि ऐसा वे कॉन्ग्रेस की मदद से भी कैसे कर पाते, यह समझ से परे है, क्योंकि मेमन की फाँसी के समय 2015 में पूर्ण बहुमत की सरकार भाजपा की थी, और राजनीतिक रास्ते से किसी की फाँसी रोकने के लिए गृह मंत्रालय की अनुशंसा चाहिए होती, जो कि सत्ताधारी होने के चलते भाजपा के ही हाथ में रहता,कॉन्ग्रेस, 40-50 अतिरिक्त मुस्लिम सांसदों या ओवैसी के हाथ में नहीं।)
Owaisi said do away with Secularism. We want Muslims in govt. We couldn’t save Terrorist Yakub Memon as we were not united.
In short he means demography is changing and he is dreaming to making India ISLAMIC Nation.
इस मामले में सिख समुदाय को भी घसीटते हुए
उन्होंने व्यंगात्मक तौर पर सिख समुदाय को ‘सलाम’ किया। “तुमने हमको आईना दिखा
दिया कि जिसके पास सियासी ताकत है, उसी की बात
सुनी जाती (है)।” ओवैसी का कहना था कि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत
सिह की हत्या के आरोपित बलवंत सिंह राजोआना की फाँसी सिखों के तुष्टिकरण के लिए ही
रोकी गई थी।
पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गुरुवार ( अक्टूबर 10, 2019) को मोदी उपनाम की टिप्पणी पर आपराधिक मानहानि मामले में अपना बचाव करने के लिए सूरत की एक अदालत में पेश हुए। उन्होंने कोर्ट से खुद को निर्दोष करार देने की माँग की। बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान कर्नाटक के कोलार में नीरव मोदी, ललित मोदी और नरेंद्र मोदी का नाम लेते हुए तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पूछा था कि सभी चोरों के उपनाम मोदी क्यों है?
Gujarat: Rahul Gandhi appeared at Surat Court in connection with a case over his comment”Why do all thieves have Modi in their names”. He has filed an application for permanent exemption.Court has given a date of 10th Dec for reply to his application. (earlier visuals) pic.twitter.com/otzMu25rKW
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट बीएच कपाड़िया ने मई में भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी द्वारा दायर एक शिकायत को स्वीकार करने के बाद राहुल गाँधी को समन जारी किया था। अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए पहली नजर में इसे राहुल गाँधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला माना। पूर्णेश मोदी द्वारा दर्ज की गई शिकायत में कहा गया था कि राहुल गाँधी ने अपने बयान से पूरे मोदी समुदाय को बदनाम किया है।
जानकारी के मुताबिक राहुल गाँधी ने इस मामले में पेशी से छूट के लिए अर्जी डाली है। कोर्ट ने कहा है कि 10 दिसंबर को उनकी इस अर्जी पर जवाब दिया जाएगा। बता दें कि स्थायी छूट के लिए आवेदन के तहत, एक अभियुक्त को आपराधिक कार्यवाही में उपस्थित होने से छूट दी जा सकती है, बशर्ते कि कुछ शर्तें पूरी हों।
I am in Surat today to appear in a defamation case filed against me by my political opponents, desperate to silence me.
इस मामले में राहुल गाँधी ने खुद को बेकसूर बताते हुए इसे उन्हें चुप कराने के लिए विपक्ष की साजिश करार दिया। साथ ही उन्होंने इस बारे में ट्वीट कर कहा- “मुझे चुप कराने के लिए बेकरार मेरे राजनीतिक विपक्षियों द्वारा दाखिल किए मानहानि के लिए पेश होने मैं आज सूरत में हूँ। मैं कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के प्यार और समर्थन के लिए आभार व्यक्त करता हूँ जो मेरे साथ एकजुटता और समर्थन जताने के लिए यहाँ इकट्ठा हुए हैं।”
राहुल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई गई थी। जुलाई में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राहुल गाँधी को सुनवाई में निजी तौर पर पेश होने से छूट दी थी और अगली सुनवाई की तारीख 10 अक्टूबर नियत की थी।
इसी तरह के एक अन्य मामले में वह शुक्रवार (अक्टूबर 11, 2019) को दोपहर 3 बजे अहमदाबाद के एक कोर्ट में पेश होंगे। बता दें कि अहमदाबाद में एक स्थानीय भाजपा पार्षद ब्रह्मभट्ट ने राहुल गाँधी के खिलाफ केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर किए गए अपमानजनक टिप्पणी को लेकर केस दर्ज करवाया है। उल्लेखनीय है कि राहुल गाँधी के ऊपर देश भर में विभिन्न अदालतों में कई मानहानि के मामले दर्ज हैं।