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केवल 25 सेकेंड बजेगी फोन की घंटी: टेलीकॉम कंपनियों की टक्कर कस्टमर पर भारी

टेलीकॉम कंपनियों की प्रतिस्पर्धा ग्राहकों को भारी पड़ने वाली है। एयरटेल और वोडाफोन आइडिया ने अपने नेटवर्क से बाहर की कॉल पर घंटी बजने का समय घटाकर केवल 25 सेकेंड कर दिया है। अमूमन कॉल आने के समय बजने वाली फोन की घंटी की अवधि 40 से 45 सेकेंड होती है।

एयरटेल ने कहा कि उसने फोन की घंटी बजने की अवधि को 25 सेकेंड तक सीमित करने का निर्णय लिया। जियो के ऐसा करने के बाद यह फ़ैसला किया गया है। इससे ग्राहकों को असुविधा हो सकती है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) नियामक की ओर से इस संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश ना होने के चलते कंपनी के पास कोई और विकल्प नहीं बचा है। हालाँकि, कंपनी नियामक के सामने इस बात को कई बार रख चुकी है।

एयरटेल और वोडाफोन आइडिया के इस कदम का एक मकसद कॉल जुड़े रहने के समय के मुताबिक उस पर लगने वाले इंटरकनेक्ट उपयोग शुल्क (आईयूसी) की लागत घटाना भी है। ट्राई से जुड़े सूत्रों ने बताया कि नियामक 14 अक्टूबर को ‘कॉल किए जाने वाले व्यक्ति के फोन की घंटी बजने की समय-सीमा’ के मुद्दे पर एक खुली चर्चा कराने की योजना बना रहा है। इसके अलावा इस पूरे आईयूसी मुद्दे पर भी बातचीत होगी। इसके लिए एक परिचर्चा पत्र पहले ही जारी कर दिया गया है। इस पर जल्द निर्णय किया जाएगा।

एयरटेल ने अपने पत्र में कहा, “यद्यपि हमने महसूस किया कि इससे ग्राहकों को परेशानी हो सकती है लेकिन ट्राई की ओर से कोई निर्देश नहीं होने और इंटरकनेक्ट शुल्क के घाटे से बचने के लिए हमारे पास कोई और विकल्प नहीं बचा है। इसलिए हमने हमारे नेटवर्क पर फोन की घंटी बजने की अवधि को घटाने का निर्णय किया है।”

एयरटेल ने जियो के इस क़दम के प्रभाव के बारे में बार-बार ट्राई को बताया है। कंपनी का कहना है कि फोन की घंटी बजने की अवधि कम करने से मिस्ड कॉल की संख्या बढ़ेगी। इससे किसी व्यक्ति को कॉल लगाने और साथ ही मिस्ड कॉल देखने के बाद वापस कॉल करने की संख्या भी बढ़ेगी। इससे ग्राहकों के अनुभव के साथ-साथ नेटवर्क की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

पिछले महीने आईयूसी के मुद्दे को लेकर सभी कंपनियों का विवाद नियामक के पास तक पहुँच गया था। एयरटेल ने दूसरे नेटवर्क पर कॉल जुड़ने को पैसा कम चुकाने के लिए जियो पर प्रणाली के साथ ‘धोखाधड़ी’ करने का आरोप लगाया था। वास्तव में आईयूसी को एक जनवरी 2020 से ख़त्म किए जाने का प्रस्ताव है। लेकिन ट्राई इस समय-सीमा की अभी समीक्षा कर रहा है।

पाकिस्तान से 70 साल पुराना हिसाब पूरा: भारत को मिलेंगे ₹306 करोड़, 1948 से ब्रिटिश बैंक में पड़ा है

ब्रिटेन के एक हाई कोर्ट ने हैदराबाद के निजाम के 3.5 करोड़ पाउंड के फंड को लेकर दशकों से चल रहे मामले में बुधवार (2 अक्टूबर, 2019) को भारत के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। देश के विभाजन के बाद हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान ने 1948 में लंदन के नेशनल वेस्टमिंस्टर बैंक में 10 लाख पाउंड (क़रीब 8.87 करोड़ रुपए) जमा किए थे। इस पर दावे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले 70 सालों मुक़दमा चल रहा था। अब यह रकम बढ़कर करीब 35 मिलियन पाउंड (करीब 306 करोड़ रुपए) हो चुकी है।

रुपए के मालिकाना हक को लेकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ चल रही इस क़ानूनी लड़ाई में निज़ाम के वंशज प्रिंस मुकर्रम जाह और उनके छोटे भाई मुफ्फखम जाह भारत सरकार के साथ थे। हैदराबाद के तत्कालीन निज़ाम ने 1948 में ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त को ये रक़म भेजी थी। फ़िलहाल, यह रक़म लंदन के नेशनल वेस्टमिंस्टर बैंक में जमा है।

विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि यूके की अदालत ने पाकिस्तान के इस दावे को ख़ारिज कर दिया है कि इस रक़म का मक़सद हथियारों की शिपमेंट के लिए पाकिस्तान को भुगतान के रूप में किया गया था। इतना ही नहीं पाकिस्तान ने कई बार यह कोशिश की थी कि यह मामला किसी तरह से बंद हो जाए, लेकिन उसके मंसूबे पर पानी फेरते हुए लंदन की अदालत ने उसके हर प्रयास को विफल कर दिया। 

लंदन के रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस के जज मार्कस स्मिथ ने अपने फैसले में कहा कि हैदराबाद के 7वें निजाम उस्मान अली खान इस फंड के मालिक थे। उनके बाद उनके वंशज और भारत इस फंड के दावेदार हैं।
हैदराबाद के निजाम की ओर से मुकदमे की पैरवी कर रहे पॉल हेविट ने कहा, “हमें खुशी है कि कोर्ट ने अपने फैसले में 7वें निजाम की संपत्ति पर उनके वंशजों के उत्तराधिकार को स्वीकार किया है। यह विवाद 1948 से ही चला आ रहा था।”

खबरों के मुताबिक पैसे भेजने के कुछ दिनों बाद ही निजाम ने बैंक से लौटाने को कहा था। उनका कहना था कि पैसा उनकी सहमति के बिना पैसा भेजा गया। लेकिन बैंक ने ऐसा नहीं किया। बैंक की ओर से बताया गया कि पैसा पाकिस्तान के खाते में जा चुका है और उसकी सहमति के बिना इसे बिना वापस नहीं किया जा सकता।

इसके बाद निजाम ने बैंक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की। मामला हाउस ऑफ लॉर्ड्स तक भी पहुॅंचा। लेकिन उस समय इसके स्वामित्व पर फैसला नहीं हो पाया। इसका कारण पाकिस्तान का संप्रभु प्रतिरक्षा दावा था। इसके बाद से पैसा यूके के नेटवेस्ट बैंक में फ्रीज पड़ा हुआ था।

साल 2013 में पाकिस्तान ने इस फंड की राशि पर अपना दावा करते हुए केस की कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए संप्रभु प्रतिरक्षा का दावा हटा लिया था। इस केस में दोबारा कार्रवाई शुरू होने के बाद निज़ाम परिवार और भारत सरकार के बीच इस मामले को लेकर समझौता हुआ और भारत ने इन निज़ाम परिवार के दावे का समर्थन किया।

10 बरस के मासूम का गला रेता, पुलिस को मदरसे के किसी अंदर वाले पर शक

उत्तर प्रदेश के एक मदरसे में 10 साला के एक बच्चे पर बेरहमी से हमला किया गया है। मंगलवार (1 अक्टूबर) को हुए इस हमले में बुरी तरह घायल छात्र को मेरठ के मेडिकल कॉलेज में दाखिल कराया गया है, जहाँ उसकी हालत नाज़ुक बनी हुई है

बताया जा रहा है कि हमले में मदरसा इस्लामिया अरबिया अहले सुन्नत फैज़-उल उलूम रहमानिया के छात्र को चाकू से गोदा गया और उसका गला रेत दिया गया। हमला तब हुआ जब वह 16 अन्य छात्रों के साथ मदरसे के हॉल में रात को सोया था। मदरसे में करीब 200 बच्चे रहते हैं।

एक मदरसा कर्मचारी के शब्दों में, “जब हमला हुआ तो हॉल में 17 छात्र थे। सभी सो रहे थे। हमलावर चुपचाप कमरे में पहुँचे और छात्र का गला रेतने के अलावा उसे चाकू घोंपा। आवाज़ें सुनकर एक दूसरा छात्र जाग गया और उसने मदद के लिए शोर मचाना शुरू किया तो हमलावरों को भागना पड़ा।”

शोरगुल सुनकर मदरसे के कर्मचारी जाग गए और भागते हुए हॉल में पहुँचे जहाँ उन्हें घायल छात्र मिला। मदरसे के प्राध्यापक ने छात्र को आनन-फानन में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया, जहाँ से उसे मेरठ के मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया गया।

मामला गजरौला थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मोहम्मदाबाद गाँव का है। एसपी विपिन तडा और गजरौला के एसएचओ डीके शर्मा ने मदरसे पहुँच कर जाँच शुरू कर दी है। तफ्तीश कर रही पुलिस को शक किसी मदरसे के अंदर के ही व्यक्ति पर है और दो कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में भी ले लिया गया है। हमले में प्रयुक्त चाकू पुलिस को मदरसे की बाउंड्री के पार खेत में मिला। पता चला है कि यह चाकू मदरसे के ही किचन का है।

पुलिस ने उस पर से निशान मिटाने की कोशिश के चिह्नों की पुष्टि की है। एसपी तडा के अनुसार, “पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और दो कर्मचारियों को शक के आधार पर हिरासत में ले लिया गया है। एक संदिग्ध के कमरे में खून के निशान हैं और हमलावर ने उन्हें पानी से धोने की कोशिश की है। हमें शक है कि मदरसे के अंदर से ही कोई हमले में शामिल है। हमले का कारण अभी पता नहीं चला है।”

‘5 साल से अपना खून-पसीना कॉन्ग्रेस को दिया, ₹5 करोड़ में बेच दिया टिकट’

हरियाणा कॉन्ग्रेस का घमासान थमता नहीं दिख रहा। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने विधानसभा चुनाव के टिकटों के बॅंटवारे में धांधली का आरोप लगाते हुए कांग्रेस मुख्यालय के बाहर बुधवार को प्रदर्शन किया। उन्होंने सोहना विधानसभा सीट का टिकट पॉंच करोड़ रुपए में बेचे जाने का आरोप लगाया।

तंवर ने समर्थकों के साथ पार्टी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और धरना दिया। कहा कि विधानसभा की सीटों के बंटवारे को लेकर बड़े पैमाने पर धांधली चल रही है। पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा कि धांधली कर अगर कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतारे गए तो पार्टी जीत कैसे हासिल करेगी।

तंवर ने कहा, “पिछले 5 सालों से मैंने अपना खून-पसीना कॉन्ग्रेस को दिया। यहाँ नेतृत्व बरबाद हो चुका है। हम पार्टी के लिए समर्पित हैं, लेकिन ऐसे लोगों को टिकट क्यों दी जाए, जिन्होंने अभी हाल ही में पार्टी को ज्वाइन किया है और पहले पार्टी की आलोचना कर चुके हैं।

उन्होंने कहा, “आज बीजेपी के 14 विधायक ऐसे हैं जिन्हें कॉन्ग्रेस से भगा दिया गया। 7 सांसद ऐसे हैं जिनकी पृष्ठभूमि कॉन्ग्रेसी है। बीजेपी ने 3 महीने में मुझे भी 6 बार ऑफर दिया। लेकिन मैंने इसे स्वीकार नहीं किया और न करूॅंगा।”

उनका कहना है कि बीते 5 सालों में जिन्होंने पार्टी के लिए काम किया उन्हें टिकट बँटवारे के दौरान अनदेखा किया गया और जिन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ काम किया, उन्हें भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने टिकट देने के दौरान तवज्जो दी। वो चाहते उनके समर्थकों को टिकट दी जाए। जिसके लिए उन्होंने हरियाणा से टिकट चाहने वाले कॉन्ग्रेसियों की लंबी चौड़ी सूची आलाकमान को भी सौंपी हैं

यहाँ बता दें कि अभी कुछ दिन पहले ही तंवर की जगह शैलजा कुमारी को हरियाणा कॉन्ग्रेस की कमान दी गई है। हुड्डा स्वयं तंवर को अलग करने की माँग कर रहे थे। जिसके बाद से दोनों नेताओं में अंदरुनी तनातनी चल रही थी, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते ये सार्वजनिक हो गया है।

सूत्रों के अनुसार तंवर ने पार्टी नेतृत्व से 10 सीटें मॉंगी है। राज्य में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएँगे और 24 अक्टूबर को नतीजे आएँगे। 90 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा 78 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर चुकी है।

150 रुपए का डॉलर, 3.3% पर दम तोड़ती अर्थव्यवस्था: इमरान खान के गर्जन-तर्जन के पीछे फटेहाल पाक

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के कश्मीर पर बिगड़ते जा रहे बोल असल में बदहाल अर्थव्यवस्था और एक देश के तौर पर नाकामी की ओर बढ़ रहे हालातों से ध्यान भटकाने की कोशिश हैं। पिछले अगस्त में सत्ता संभालने वाले ‘तालिबान खान’ इमरान का ‘नया पाकिस्तान’ आर्थिक मोर्चे पर गिरती विकास दर (3.3%) और मुँह फैलाती जा रही महंगाई के दो पाटों में पिस रहा है। डॉलर की कीमत (150 रुपए)आसमान पर है और एक कर्ज की क़िस्त चुकाने के लिए उसे दूसरा कर्ज लेना पड़ रहा है।

पारम्परिक रूप से पाकिस्तान चीन, अमेरिका और सऊदी की तिकड़ी के सहारे खड़ा रहता था। लेकिन पिछले कुछ समय में समीकरण बदले हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद से चाहे उनके इस्लामोफोबिया के चलते या फिर चाहे इस सच के अनुभव से कि इतने साल में पाकिस्तान ने अमेरिका से पैसा लेकर आतंक का खात्मा नहीं किया, बल्कि उसे बढ़ावा ही दिया है, अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध बहुत हद तक ठंडे पड़ गए हैं। पाकिस्तान को नया कर्ज या सहायता तो दूर, ट्रम्प ने लगभग हर पुराने मदद के रास्ते को रोक दिया है या पहरा बिठा दिया है।

चीन से हिंदुस्तान की दुश्मनी में जा मिला ‘दुनिया का पहला इस्लामिक स्टेट’ पाक उससे भी बहुत अधिक आर्थिक सहायता इसलिए लेने में कतरा रहा है क्योंकि वह ‘कर्ज’ के बदले अनीश्वरवादी चीन के साम्राज्य का हिस्सा नहीं बन सकता। CPEC (चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) उसने इसीलिए ठंडे बस्ते में डाल दिया है और चीन के साथ वह केवल रणनीतिक रूप से हिंदुस्तान को घेरने, खुद को आतंकी के आधिकारिक ठप्पे से बचाने और गधों के निर्यात के नकद कारोबार जैसी चीजों तक सीमित किए हुए है।

ले-देकर बचा सऊदी, तो उसकी सीमित सहायता पाकिस्तान के विशाल, अनुत्पादक खर्चों और 2018 के 3.9% से वित्त वर्ष 2019 में 7.3% हो रही और अगले एक साल में 13% (अनुमानित) होने जा रही महंगाई के चलते ऊँट के मुँह में जीरा साबित हो रही है। UNCTAD ट्रेड ऐंड डिवेलपमेंट रिपोर्ट 2019 के मुताबिक सऊदी ही नहीं, IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) का 6 अरब डॉलर का कर्ज भी पाकिस्तान के ज्यादा काम नहीं आना है।

घाटा, टैक्स चोरी और मुँह फाड़े सेना

पाकिस्तानी सेना देश के बजट का 17-22% लेती है। बावजूद इसके कि वह खुद 100 अरब डॉलर के आर्थिक साम्राज्य की मालिक है, जो बैंकिंग, सीमेंट, रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में पसरा हुआ है। हाल ही में उसने सरकार से खनन, तेल और गैस का काम भी अपने हाथों में ले लिया है। इसके उलट पाकिस्तानी सरकारी कम्पनियाँ घाटे में गहरी डूबती जा रहीं हैं। केवल 1% के टैक्स देने वाले नागरिकों के दायरे के अलावा उसका टैक्स-जीडीपी अनुपात 11% दुनिया के न्यूनतम में से एक है।

वराह, कमल, विक्रमादित्य, हाथी: राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट में फॅंसीं बाबरी मस्जिद की पैरोकार

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई के दौरान ऐसे कई मौके आए हैं, जब मुस्लिम पक्ष के वकील अपनी ही दलीलों में उलझते नजर आए। खासकर, अयोध्या में खुदाई पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट को लेकर।

मुस्लिम पक्ष की ओर से दलीलें रख रहीं वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट में कहा कि विक्रमादित्य सुंग वंश के थे। इसके बाद जस्टिस अशोक भूषण ने उन्हें याद दिलाया कि वह गुप्त वंश के थे। अरोड़ा ये बोल कर फँस गईं कि उस स्थल पर खुदाई के बाद हाथी की मूर्तियों के मिलने से यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ मंदिर ही था। बता दें कि हिन्दू संस्कृति में हाथी के पूजा का सिद्धांत रहा है। भगवान गणेश को गजानन भी कहते हैं। इंद्र का वाहन भी हाथी ही है। अरोड़ा ने हाथी की मूर्तियों के खिलौना होने की बात कही।

इसके बाद जजों ने उनसे कमल के निशान को लेकर सवाल पूछा। जजों ने अरोड़ा से पूछा कि क्या मस्जिदों में भी कमल के निशान होते हैं? इस पर साफ़-साफ़ जवाब न दे पाने वाली अरोड़ा ने ये कह कर पल्ला छुड़ाने की कोशिश की कि ऐसा हो सकता है। हालाँकि, पीठ के अन्य जजों ने जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर से ये बात जाननी चाही। जस्टिस नजीर ने साफ़-साफ़ कह दिया कि उनकी जानकारी में कहीं ऐसा नहीं है कि मस्जिदों में कमल के निशान हो। मीनाक्षी अरोड़ा ने दावा किया कि कमल किसी भी धर्म का प्रतीक चिह्न रहा हो सकता है- हिन्दू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध या मुस्लिम।

मीनाक्षी अरोड़ा अदालत में इतनी कन्फ्यूज्ड नजर आईं कि उन्होंने अष्टकोणों को भी हिन्दू धर्म का मानने से इनकार कर दिया। जजों को उन्हें याद दिलाना पड़ा कि अष्टकोण का सिद्धांत हिन्दू धर्म में ही रहा है। जस्टिस एसए बोबडे ने इस दौरान वराह की मूर्ति को लेकर भी सवाल किया। उन्होंने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में वराह का भी जिक्र है, जिसके बारे में हिन्दू धर्म-ग्रंथों में भी चर्चा है। उन्होंने कहा कि वराह तो मस्जिद में नहीं हो सकता। मीनाक्षी अरोड़ा एक बार फिर से बगले झाँकती हुई नज़र आईं। इसी तरह एएसआई की पूरी रिपोर्ट को ही त्रुटिपूर्ण करार देने के चक्कर में उन्होंने कई और गलतियाँ की।

मीनाक्षी अरोड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पुरातत्व कोई फिजिक्स या केमिस्ट्री जैसा विज्ञान नहीं है, यह सामाजिक विज्ञान है। अरोड़ा ने कहा था कि कार्बन डेटिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। अरोड़ा ने कहा कि चूँकि, आर्कियोलॉजी एक नेचुरल साइंस नहीं है, इसके रिपोर्ट्स में यथार्थता नहीं है। उन्होंने दावा किया था कि पुरातत्व ने अभी तक ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं दिया है, जिसे वेरीफाई किया जा सके।

गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली संविधान पीठ मामले की रोजाना सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं।

दूरदर्शन तमिल ने प्रधानमंत्री के भाषण का किया ब्लैकआउट, सहायक निर्देशक निलंबित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के IIT-मद्रास में दिए गए भाषण को न प्रसारित करने के कारण डीडी (दूरदर्शन) के तमिल संस्करण की सहायक निर्देशक को निलंबित कर दिया गया है। मोदी तमिलनाडु की राजधानी चेन्नै में दीक्षांत समारोह के दौरान छात्रों को संबोधित कर रहे थे। दूरदर्शन पोडिगई टीवी की सहायक निर्देशक आर वासुमति पर कर्त्तव्य की उपेक्षा (dereliction of duty) का आरोप है।

पीएमओ ने जावड़ेकर को किया था तलब  

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय ने केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से इसका जवाब माँगा था। जावड़ेकर के मंत्रालय के ही अंतर्गत दूरदर्शन आता है। पीएमओ ने पूछा था कि दूरदर्शन पोडिगई टीवी पर प्रधानमंत्री के भाषण का सजीव प्रसारण (live telecast) न किए जाने का क्या कारण था।

30 सितंबर की घटना

घटना 30 सितंबर (सोमवार) की है, जब प्रधानमंत्री के भाषण के समय दूरदर्शन पोडिगई टीवी पर एक तमिल गाना और नाटिका प्रसारित हो रहे थे। उस समय मोदी IIT-मद्रास के 56वें दीक्षांत समारोह और इस दौरान हुई सिंगापुर-भारत हैकिंग प्रतियोगिता (Hackathon) के पुरस्कार वितरण समारोह में भागीदारी करने पहुँचे हुए थे

उल्लेखनीय है कि सरकारी चैनल होने के चलते दूरदर्शन की यह ज़िम्मेदारी थी कि प्रधानमंत्री के भाषण को अपने दर्शकों तक वरीयता पर पहुँचाना। हालाँकि एक सीमा तक दूरदर्शन को परिचालन की स्वायत्ता है, लेकिन यह अंततः लोक सेवक प्रसारक (public service broadcaster) है, जिसकी संस्थापक सरकार ही है। अतः मोदी का भाषण दिखाना दूरदर्शन के लिए बाध्यकारी था, न कि निजी चैनलों की तरह ऐच्छिक।

निकाय चुनाव से पहले J&K के कई नेता आजाद, 58 दिनों से थे नजरबंद

जम्मू-कश्मीर में कई नेताओं की नजरबंदी हटा दी गई है। माना जा रहा है कि निकाय चुनावों के कारण प्रशासन ने यह कदम उठाया है। आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद इन नेताओं को एहतियातन उनके घर में नजरबंद कर दिया गया था। करीब दो महीने तक ये नेता नजरबंद रहे।

जिन नेताओं की नजरबंदी हटाई गई है उनमें पूर्व मंत्री और डोगरा स्वाभिमान संगठन पार्टी के अध्यक्ष चौधरी लाल सिंह का नाम भी शामिल है। जानकारी के मुताबिक जिन नेताओं पर से नजरबंदी हटाई गई हैं उसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस, कॉन्ग्रेस, पैंथर्स पार्टी के नेताओं के नाम हैं। इसमें लाल सिंह के अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस के देवेंद्र राणा और एसएस सालाथिया, कॉन्ग्रेस रमन भल्ला और पैंथर्स पार्टी के हर्षदेव सिंह का नाम है। एनसीपी के उमर अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस सज्जाद गनी लोन अब भी हाउस अरेस्ट हैं।

पैंथर पार्टी के हर्षदेव ने एएनआई को बताया, “5 अगस्त को मुझे रमण भल्ला, देवेन्द्र राणा, एसएस सालाथिया और जावेद राणा के साथ हिरासत में लिया गया था। मैं अपने घर में बंद था। कल 58 दिन बाद हमें बाहर जाने की अनुमति मिली। हमें कहा गया कि हमारे बयानों पर निगरानी रखी जाएगी।”

बता दें कि राज्य में हालात नियंत्रण में रखने के लिए इन नेताओं को एहतियातन नजरबंद किया गया था। आशंका थी कि ये नेता भड़काऊ बयान देकर के लोगों को हिंसा के लिए उकसा सकते हैं।

कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह भी इस संबंध में बयान देते हुए कहा था कि किसी भी जम्मू-कश्मीर में किसी भी राजनेता को 18 माह से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जाएगा। यहाँ उन्होंने ये भी साफ़ किया था कि जो नेता हाउस अरेस्ट हैं, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें घर में मेहमान की तरह रखा जा रहा है।

वहीं, भाजपा नेता राम माधव की मानें तो शांति बनाने के लिहाज से पहले हिरासत में लिए लोगों की संख्या 2000-2500 से थी, लेकिन धीरे-धीरे ये संख्या घटकर 200-250 हो गई है। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के 310 ब्लॉकों में ब्लॉक विकास परिषदों के अध्यक्षों के चुनाव के लिए मंगलवार को अधिसूचना जारी की गई थी। अधिसूचना के मुताबिक 24 अक्टूबर को चुनाव होंगे। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख नौ अक्टूबर है जबकि नामांकन पत्रों की जांच 10 अक्टूबर को की जाएगी। नामांकन वापस लेने की तारीख 11 अक्टूबर है।

मुस्लिमों के लिए दीमक जैसा शब्द प्रयोग होता है, तो क्या यह गाँधी का भारत है या गोडसे का: महबूबा मुफ्ती

महात्मा गाँधी की 150वीं जयन्ती पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसने का प्रयास किया। उन्होंने महात्मा गाँधी पर नरेंद्र मोदी द्वारा लिखे लेख को आधार बनाकर हैरानी जताते हुए कहा कि आप वैश्विक मंच पर बापू को याद करते हैं, लेकिन घर आकर उनके हत्यारों की प्रशंसा करते हैं।

गौरतलब है कि आज राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150 वीं जयन्ती पर अमेरिका के डेली अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने नरेंद्र मोदी का एक लेख छपा है। जिसमें प्रधानमंत्री ने लिखा, “महात्मा गांधी में समाज में बड़े विरोधाभासों के बीच एक जरिया बनने की अनोखी क्षमता थी।”

जिसे री-ट्वीट करते हुए महबूबा मुफ्ती के ट्विटर हैंडल से लिखा गया, “हैरानी है, आप वैश्विक मंच पर बापू को याद करते हैं लेकिन घर वापस आकर उनके हत्यारों की प्रशंसा करते हैं।”

इसके अलावा महबूबा मुफ्ती अपने ट्वीट से लिखती हैं कि जब हम गाँधीजी की जयन्ती मनातें हैं, तो हमें स्वयं से ये सवाल करना चाहिए कि हम उनके भारत के प्रति न्याय, मानवीय मूल्यों, सत्य और अहिंसा के विचारों के प्रति वचनबद्ध हैं। ऐसे समय में जब मुस्लिमों और अल्पसंख्यकों के लिए एक दीमक जैसा शब्द प्रयोग होता है, तो क्या यह गाँधी का भारत है या गोडसे का?

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने के बाद बताया जा रहा है कि महबूबा मुफ्ती को नजरबंद कर दिया गया है और उनका सोशल मीडिया अकॉउंट उनकी बेटी इल्तिजा द्वारा संचालित किया जा रहा है।

‘अगर महात्मा गाँधी आज होते तो वे भी RSS का हिस्सा होते’

राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने कहा है कि अगर महात्मा गाँधी आज होते तो वे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा होते। संघ विचारक सिन्हा के इस बयान की बड़ी प्रतिक्रियाएँ आनी तय है। उन्होंने महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया। सिन्हा ने कहा कि जो लोग गाँधी का नाम और चित्र सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते रहे हैं, उन्होंने ही गाँधी के विचारों को भुला दिया और वे ही गाँधी के विचारों के ख़िलाफ़ हैं। साथ ही उन्होंने आरएसएस को गाँधी की विचारधारा का अनुयायी करार दिया

राज्यसभा सांसद प्रोफेसर राकेश सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक भी हैं। वह काफ़ी दिनों से मीडिया चर्चाओं में संघ की तरफ से अपनी बात रखते रहे हैं और आरएसएस के इतिहास को लेकर उनके अध्ययन की सभी प्रशंसा करते हैं। उन्होंने आरएसएस संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की जीवनी भी लिख रखी है। राकेश सिन्हा ने ट्विटर पर लिखा:

“महात्मा गाँधी सिर्फ़ स्वतंत्रता की ही लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि भारतीय सभ्यता के मूल तत्व को आधार बनाकर पश्चिमी सभ्यता की राक्षसी प्रकृति जिसमें दमन, अमानवीयता, संसाधनों की लूट, विस्तारवाद, ताक़तवर होने का अहम, व्यक्तिवाद और ‘हम और तुम’ की खाई अंतर्निहित है, को भी चुनौती दे रहे थे।

बता दें कि संघ विचारक का ये बयान ऐसे समय में आया है जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने आरोप लगाया है कि भाजपा गाँधी को हटा कर आरएसएस को आगे कर रही है। वहीं, दूसरी तरफ सरसंघचालक मोहन भागवत ने महात्मा गाँधी को पूजनीय बताते हुए कहा कि संघ उनकी विचारधारा पर काम कर रहा है। मोहन भागवत ने कहा कि ‘स्व’ के आधार पर भारत की पुनर्रचना का स्वप्न देखने वाले तथा सामाजिक समता और समरसता के संपूर्ण पक्षधर, अपनी कथनी का स्वयं के आचरण से उदाहरण देने वाले, सभी लोगों के लिए आदर्श पूज्य गाँधीजी को हम सबको देखना, समझना तथा अपने आचरण में उतारना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजघाट जाकर महात्मा गाँधी को नमन किया। कई अन्य बड़े नेताओं व मंत्रियों ने महात्मा गाँधी को उनके जन्मदिवस पर याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छता अभियान’ में भी महात्मा गाँधी के चेस को ही प्रतीक चिह्न बनाया गया था।