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हिंन्दू विरोधी दिग्विजय सिंह के लिए मंदिरो के दरवाजें बंद हों: भोपाल में लगे पोस्टर

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के मंदिर में रेप वाले बयान के बाद शुरू हुआ सियासी बवाल अब पोस्टर वॉर का रूप ले चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो प्रदेश की राजधानी भोपाल में कई मंदिरों के बाहर दिग्विजय सिंह के प्रवेश निषेध को लेकर पोस्टर लगाए गए हैं। जिनपर दिग्विजय सिंह को मंदिरों में प्रवेश नहीं देने का संदेश लिखा हुआ हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार शहर के परशुराम मंदिर, साईं मंदिर, हनुमान मंदिर समेत कई मंदिरों में ऐसे पोस्टर चिपकाए गए हैं। हालाँकि, अभी तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये पोस्टर किसने लगाए हैं, लेकिन इन पोस्टर्स पर निवेदक के तौर पर हिन्दू समाज का नाम लिखा हुआ है। साथ ही संदेश के रूप में दिग्विजय सिंह की तस्वीर पर क्रॉस का निशान लगाकर लिखा है, “हिंदू समाज की यही पुकार हिंन्दू विरोधी दिग्विजय सिंह के लिए मंदिर के दरवाजें बंद हों, बंद हों।”

यहाँ बता दें कि पुलिस को इन पोस्टर्स की भनक लगते ही ये सभी पोस्टर्स तुरंत हटवा दिए गए हैं।

गौरतलब है कि अभी बीते दिनों दिग्विजय सिंह ने भोपाल में संत समागम को संबोधित करते हुए कहा था कि सनातन धर्म सबसे पुराना धर्म है, इसके अलावा जितने भी धर्म हैं वो अलग-अलग विचारधारा के ज़रिए उत्पन्न हुए हैं। विश्व का सबसे प्राचीनतम धर्म सनातन धर्म है, जिसका कभी अंत नहीं हो सकता। उन्होंने कहा था, “आज भगवा वस्त्र पहनकर लोग चूरन बेच रहे हैं, भगवा वस्त्र पहनकर बलात्कार हो रहे हैं, मंदिरों में बलात्कार हो रहे हैं। क्या यही हमारा धर्म है? हमारे सनातन धर्म को जिन लोगों ने बदनाम किया है, उन्हें ईश्वर माफ़ नहीं करेगा।”

जिसके बाद उनके इस बयान पर काफी बवाल हुआ था और उन्होंने अपने बयान का बचाव करते हुए लिखा था कि हिंदू संत हमारी सनातन आस्था का प्रतीक हैं। इसीलिए उनसे उच्चतम आचरण की अपेक्षा की जाती है। अगर संत वेश में कोई भी गलत आचरण करता है, तो उसके खिलाफ आवाज उठनी ही चाहिए। सनातन धर्म, जिसका मैं स्वयं पालन करता हूँ, उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।

प्रिय BBC तुम्हारे बाप पहले ही आग लगा कर जा चुके हैं, तुम ख़बरों को मुसलमान बनाना कब छोड़ोगे?

प्रोपेगेंडा परस्त पत्रकारिता से अपनी पहचान बनाने वाले बीबीसी ने एक बार फिर अपनी बेहुदगी भरी हरक़त का खुला प्रदर्शन किया है। अपने एक लेख को सोशल मीडिया पर शेयर करते समय बीबीसी ने लिखा, “असम: पुलिस ‘पिटाई’ से मुसलमान महिला का गर्भपात।” इस लेख में बीबीसी ने 8 सिंतबर को असम के दरभंगा ज़िले की एक घटना का ज़िक्र किया, जिसके मुताबिक़ रऊफुल अली नाम के शख़्स पर एक लड़की के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था। उसकी तफ़्तीश के लिए पुलिस उसकी बहन के घर पहुँची, जहाँ पूछताछ के लिए अली की दोनों बहनों को पुलिस स्टेशन ले जाया गया।

पुलिस की पूछताछ के दौरान अली की बहनों के साथ कथित तौर पर जो भी बर्ताव हुआ, उसकी जाँच के आदेश ख़ुद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने सेंट्रल वेस्टर्न रेंज के डीआजी को दे दिए। साथ ही बूढ़ा आउट पोस्ट के इंचार्ज सब-इस्पेक्टर महेंद्र शर्मा और महिला कॉन्स्टेबल बिनीता बोड़ो को निलंबित भी कर दिया गया। ये सब तो वो बातें हैं, जिनसे यह पता चलता है कि इस मामले को न सिर्फ़ गंभीरता से लिया गया बल्कि तत्काल प्रभाव से तुरंत कार्रवाई भी की गई। लेकिन, आपत्ति तो बीबीसी की पत्रकारिता पर है जो इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि अपने इस लेख में बीबीसी ने इस घटना को साम्प्रदायिक रंग देने का पूरा प्रयास किया।

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि बीबीसी ने जब इस लेख को ट्विटर हैंडल से शेयर किया तो उसकी हेडिंग, “असम: पुलिस ‘पिटाई’ से मुसलमान महिला का गर्भपात” रखी, लेकिन इसी ख़बर की वेबसाइट पर जो हेडिंग रखी, उसमें से मुसलमान शब्द हटाकर “असम: पुलिस ‘पिटाई’ से महिला का गर्भपात” रखी। सोशल मीडिया पर शेयरिंग के दौरान हेडिंग में ‘मुसलमान’ शब्द जोड़ना बीबीसी की नीयत को साफ़ कर देता है। जबकि स्पष्ट है कि राज्य सरकार से इस मामले में जितनी तेज़ी से कार्रवाई की जानी चाहिए थी, वो की गई। बावजूद इसके बीबीसी ने अपने लेख में साम्प्रदायिकता का राग अलापा जो भारत के प्रति उसके रुख़ को स्पष्ट करता है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि एक महिला के साथ किया गया दुर्व्यवहार हर मायने में ग़लत है, फिर चाहे वो महिला किसी भी धर्म-जाति या समुदाय से संबंध रखती हो। महिलाओं के साथ हिंसात्मक रवैये का पुरज़ोर विरोध किया जाना चाहिए, फिर चाहे वो शब्दों के माध्यम से हो या सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन के माध्यम से हो। लेकिन, दु:ख इस बात का है कि प्रोपेगेंडा परस्त बीबीसी की पीड़ा शायद ‘मुसलमान’ महिलाओं तक ही सीमित है, जिससे साफ़ पता चलता है कि बीबीसी अपने पत्रकारिता के असल उद्देश्य से पूरी तरह से भटका हुआ है, ऐसी सूरत में बीबीसी की इस पत्रकारिता को दोगलापन न कहा जाए तो भला और क्या कहा जाए?

इससे पहले भी ऐसी अनेकों घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जिसमें बीबीसी अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए फ़ेक न्यूज़ फैलाने का काम बड़ी मुस्तैदी के साथ करता दिखा। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद भारत के संदर्भ में बीबीसी की रिपोर्टिंग ने ज़हर उगलना पहले के मुक़ाबले और तेज़ कर दिया है। बीबीसी की फ़ेक न्यूज़ की लिस्ट देखने के लिए यहाँ क्लिक करें, जिससे आप बीबीसी की रिपोर्टिंग की नीयत को आसानी से समझ सकेंगे।

पिछले महीने, बीबीसी उर्दू ने पत्थरबाज़ों के हाथों कश्मीरी ड्राइवर की मौत को जायज़ ठहराया, और फिर बाद में अपने लेख में से उस लाइन को हटा दिया। बीबीसी ने अपने लेख में लिखा था, “सेना के जवान बड़ी तादाद में ट्रक में ट्रैवल करते हैं, जिससे वहाँ के नौजवानों ने यह समझ लिया कि ट्रक में सुरक्षाबल हैं।” हालाँकि, कुछ देर बाद बीबीसी ने अपने लेख में से इस लाइन को हटा लिया, लेकिन जम्मू-कश्मीर के पुलिस अधिकारी इम्तियाज हुुसैन ने इस स्टोरी में उस लाइन का स्क्रीनशॉट ले लिया और ट्विटर पर शेयर कर दिया। भाषा उर्दू थी तो कई लोगों ने इसे रिट्वीट और कमेंट करके अनुवाद किया।

भारतीय सेना को बदनाम करने की बीबीसी की उन घृणित कोशिशों पर से पर्दा उठा था, जिसमें यह दावा किया गया कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के बाद भारतीय सेना वहाँ की जनता के साथ क्रूर व्यवहार कर रही है।

बीबीसी ने अपनी पूरी कोशिश की कि जम्मू-कश्मीर की सामान्य स्थिति को किस तरह से तनावपूर्ण स्थिति में दिखाया जा सके और विश्व मंच पर भारत की छवि को धूमिल किया जा सके। अपने प्रोपेगेंडा और नैरेटिव को सच साबित करने के लिए बीबीसी गर्त में गिरने तक को तैयार है।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के निष्क्रिय कर दिए जाने के बाद वहाँ के हालात पर भ्रामक ख़बरों का सिलसिला चल निकला था, जिस पर विराम लगाने के लिए गृह मंत्रालय ने एक ट्वीट किया, जिसमें लिखा गया था कि मीडिया में श्रीनगर के सौरा इलाक़े में घटना की ख़बरें आई हैं। 9 अगस्त को कुछ लोग स्थानीय मस्ज़िद से नमाज़ के बाद लौट रहे थे। उनके साथ कुछ उपद्रवी भी शामिल थे। अशांति फैलाने के लिए इन लोगों ने बिना किसी उकसावे के सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाज़ी की। लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने संयम दिखाया और क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की। गृह मंत्रालय के ट्वीट में यह स्पष्ट किया गया था कि अनुच्छेद-370 को ख़त्म करने के बाद से जम्मू कश्मीर में एक भी गोली नहीं चली है।

बीबीसी ने गृह मंत्रालय के इस ट्वीट को अपने कथित फ़र्ज़ी वीडियो से जोड़कर अपने लेख में लिखा कि श्रीनगर के सौरा में हुई थी पत्थरबाज़ी, सरकार ने माना! जबकि सच्चाई कुछ और थी, लेकिन आदतन बीबीसी ने भारत के ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग की, जिसका मक़सद केवल फ़र्ज़ी ख़बर को प्रचारित-प्रसारित करना था।

बीबीसी की पत्रकारिता फ़र्ज़ी ख़बरों को गढ़ने तक सिमट गई है, लेकिन इसका ख़ामियाज़ा और कोई नहीं बल्कि वो भोले-भाले लोग भुगतते हैं जो बीबीसी की इस दोगली पत्रकारिता को सच मान बैठते हैं और प्रोपेगेंडा के जाल में फँस जाते हैं।

हिन्दुओं के केंद्रीय गुंबद के नीचे पूजा करने का कोई सबूत नहीं: मुस्लिम पक्ष, जस्टिस भूषण ने जताई कड़ी आपत्ति

अयोध्या मामले की सुनवाई ने कुछ क्षणों के लिए अप्रिय मोड़ ले लिया जब मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने जस्टिस अशोक भूषण पर आक्रामक होने का आरोप लगा दिया। उनके इस आरोप से हैरत में पड़ी अदालत में जस्टिस भूषण के साथ ही मामले की सुनवाई कर रही बेंच के सदस्य जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस सीएस वैद्यनाथन ने तुरंत जस्टिस भूषण का बचाव किया, और अंततः राजीव धवन को माफ़ी माँगनी पड़ी।

‘साक्ष्य’ की परिभाषा बदलने की कोशिश

रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का विरोध करने के बावजूद रामभक्त होने का दावा कर चुके सुप्रीम कोर्ट में वकील राजीव धवन ने मुस्लिम पक्ष की ओर से बहस को आगे बढ़ाते हुए दावा किया कि केंद्रीय गुंबद की पूरी कहानी ही 19वीं शताब्दी में गढ़ी गई थी। हिन्दुओं के केंद्रीय गुंबद के नीचे पूजा करने का कोई सबूत नहीं है। इस पर जस्टिस भूषण ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान पेश एक गवाह की गवाही का ज़िक्र किया जिसने वहाँ पूजा करने का दावा किया था। “यह कहना सही नहीं होगा कि कोई साक्ष्य है ही नहीं।”

इसपर राजीव धवन ने कहा कि वे साक्ष्य को तोड़-मरोड़ नहीं रहे हैं, जिसपर भूषण ने जवाब दिया कि जो है, वह है।

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए भूषण ने कहा कि यद्यपि इस गवाही का हिन्दू पक्ष ने उल्लेख नहीं किया, लेकिन यह हाई कोर्ट के निर्णय का हिस्सा है। अतः ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट इसके बारे में सवाल पूछ ही नहीं सकता। इसी पर धवन ने कहा कि उन्हें जस्टिस भूषण के ‘टोन’ में आक्रामकता दिख रही है। तुरंत ही जस्टिस चंद्रचूड़ और सीएस वैद्यनाथन ने जस्टिस भूषण का बचाव किया। इसके बाद धवन ने माफ़ी माँग ली।

इसके बाद भी हालाँकि अपनी बात पर अड़े रहते हुए धवन ने दावा किया कि ऐसे गवाह पर, जिसे आज कुछ याद ही नहीं है, विश्वास नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस गवाही के साक्ष्य होने पर भी सवाल उठाए।

इसके बाद राजीव धवन की बहस कुछ समय और चली, और उसके बाद पीठ लंच के लिए उठ गई।

बांग्लादेशी या रोहिंग्या इस देश का नहीं है, उसकी पहचान कर, अलग करना समय की माँग

12 जुलाई 2017 की घटना है। ऐसी घटनाएँ छोटे स्तर पर हम और आप सबने कई बार देखी-सुनी है। नोएडा में एक पॉश सोसाइटी है महोगुन सोसायटी के नाम से। उसमें एक नौकरानी किसी घर में काम करती थी, नाम जोहरा बीबी। चोरी का इल्जाम लगा तो साफ मना कर दिया, फिर जब विडियो साक्ष्य की बात की गई तो कहने लगी पगार से काट लेना।

उसके बाद खबर आई कि फ्लैट मालिक ने उसे बंधक बना लिया और मारपीट की, पुलिस खोजने पहुँची तो वो किसी और टावर में मिली। जाहिर है कि बंधक लोग एक टावर से दूसरे में नहीं पाए जाते। फिर कुछ और जाँच हुई, बात बढ़ी और फिर 300 बांग्लादेशियों की भीड़ बग़ल से आ गई, और पत्थर, सरिया, कंक्रीट के टुकड़े आदि से पूरी सोसायटी पर हमला कर दिया।

इसमें ट्विस्ट ये था कि ज़ोहरा बीबी बांग्लादेशी हैं, ऐसा इल्ज़ाम लगा। इस पर वो सीधा कहती है कि उसके पास काग़ज़ात हैं। काग़ज़ात होने का मतलब ही है कि ‘मैं जो थी, उससे मतलब नहीं है, मैं जो हूँ वो क्या हूँ, ये समझो।’ इनके पास आधार है, राशन कार्ड है, वोटर कार्ड है।

दिल्ली तो छोड़िए, राजस्थान तक में बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं की झुग्गियाँ आपको मिल जाएँगी। असम में ये घुसपैठिए किंगमेकर बने बैठे थे क्योंकि किसी खास पार्टी ने इन्हें सिर्फ वोटों को लिए सारे कागज बनवा दिए थे। दिल्ली में भी इसी तरह के वादे होते हैं ऐसी झुग्गियों के लोगों से। इन्हें कहीं से ला कर बसाया जाता है, इन्हें वोटर कार्ड दिए जाते हैं, आधार कार्ड बनवाया जाता है और आप जब भी इनसे पूछिए कहाँ के हो तो सबका एक ही झूठ: बंगाल के मालदा से!

NRC क्यों जरूरी है

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सरकार इस देश के सही नागरिकों की पहचान करते हुए, घुसपैठियों, और गैरकानूनी रूप से घुसे लोगों की पहचान करेगी और उन्हें यहाँ के तंत्र से बाहर करेगी। ये संख्या सिर्फ असम में 50 लाख, पश्चिम बंगाल में 57 लाख और पूरे देश में लगभग 2 करोड़ बताई जाती है। वहीं रोहिंग्याओं की बात करें तो कानूनी रूप से यूएन द्वारा रजिस्टर्ड लोगों की संख्या 14,000 है जबकि गैरकानूनी रूप से रह रहे इन लोगों की संख्या 40,000 के करीब है।

आपको पता ही है कि भारत की जनसंख्या कितनी है और यहाँ गरीबी का स्तर क्या है। साथ ही आपको यह भी पता होगा कि सरकार के बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा ग़रीबी उन्मूलन योजनाओं में जाता है जहाँ कम दाम पर खाना देने या डायरेक्ट सब्सिडी देने में तीन लाख करोड़ रुपए जाते हैं। इसके अलावा स्वच्छता अभियान, वृद्धा पेंशन, बीमा योजना, स्वास्थ्य सुविधाएँ आदि में और भी लाखों करोड़ रुपए जाते हैं। और आपको जो पता नहीं है वो यह बात है कि ऐसी योजनाओं के कारण अर्थव्यवस्था चरमराती भी है, धीमी भी होती है और उसके प्रभाव लम्बे दौर में दिखते हैं।

फिर इन दो करोड़ लोगों का भार यह देश कैसे उठाए? खास कर तब जब ये लोग एक-एक जगह बड़ी संख्या में इकट्ठे हो कर उस क्षेत्र की जनसांख्यिकी को बदल देते हैं। कोई इलाक़ा अपनी पहचान खो कर अचानक से मुस्लिम बहुल हो जाता है, या वहाँ के अनुपात बिगड़ जाते हैं। मतलब, एक तो तुम घुसपैठिए हो, ऊपर से तुमने कागज बनवा लिए, फिर यहाँ सरकारें बनवा रहे हो क्योंकि किसी एक इलाक़े में तुमने बस कर वहाँ के लोगों की संख्या पर हावी हो गए! आप सोचिए कि जमीन आपकी, संस्कृति आपकी, लोकतंत्र आपका और प्रतिनिधि ग़ैरक़ानूनी रूप से बसे बांग्लादेशियों का! यही हो रहा है, और यही सबसे बड़ी समस्या है।

एनआरसी जरूरी है ताकि भारतीय के हक का पैसा कोई बांग्लादेशी या रोहिंग्या न उठाए और बाद में कहीं मजहबी नारे लगाते हुए किसी बाजार में फट पड़े। घुसपैठ सिर्फ ठुकराए हुए लोग ही नहीं करते हैं, इनमें वो लोग भी होते हैं जो गैरकानूनी से लेकर आतंकी गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं। इसलिए, इन लोगों को छाँटना और इन पर नजर रखना जरूरी है ताकि हमारे ही देश के नागरिक इनके आतंक का शिकार न हो जाएँ।

बाकी तरह के रिफ्यूजी भी तो लेता है भारत

फिर एक लँगड़ा तर्क आता है कि भारत तो तिब्बती शरणार्थियों को, तमिल रिफ्यूजी को, बौद्ध और हिन्दू लोगों को तो शरण दे रहा है, फिर एक समुदाय के साथ क्या दिक्कत है। पहली बात यह है कि देश की सरकार को पूरा हक है कि वो अपनी नीतियाँ कैसे बनाए। दूसरी बात, जो मुस्लिम बांग्लादेश से यहाँ आए हैं, वो किसी भी तरह से अपने देश में शोषण या भेदभाव का शिकार नहीं थे, न ही वो तय तरीकों से आए हैं।

दूसरी बात, जो हिन्दू, बौद्ध या अन्य गैर-मुस्लिम शरणार्थी भारत में शरण के लिए आए हैं, वो अपने देश में सताए गए लोग हैं। 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में तिब्बत के बौद्ध शरणार्थियों की संख्या लगभग 1,92,000 है, और श्रीलंका से भागे और तमिलनाडु में रहने वाले लोगों की संख्या एक लाख के क़रीब बताई जाती है। पाकिस्तान से, अगर बँटवारे को अलग रखें, आए हिन्दुओं की संख्या लगभग 20,000 है, जिसमें से 13,000 को भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है। अफ़ग़ानिस्तान में हिन्दुओं और सिक्खों की संख्या सिमट कर 5000 रह गई है। पाकिस्तान में हिन्दुओं का क्या हाल है, यह किसी से छुपा नहीं है।

ये अगर भारत में नहीं आएँगे, जहाँ इनकी धार्मिक जड़े हैं, संस्कृति है तो कहाँ जाएँगे। दूसरी बात, इनकी संख्या कुल मिला कर तीन-चार लाख ही है, बांग्लादेशी मुस्लिमों की तरह दो करोड़ नहीं। तीसरी बात, जब बाकी समय मुस्लिम अपने ‘कौम’ के लिए नारे लगाता है, तो आज पाकिस्तान, सऊदी, जॉर्डन, तुर्की, कतर, बहरीन या दसियों इस्लामी देश इनके लिए बंगाल की खाड़ी में जहाज क्यों नहीं भेज रहे? पाकिस्तान तो खैर भिखमंगों का देश है और वहाँ से तो पाकिस्तानी भी उब जाते हैं और सोचते हैं भारत में ही आतंकी बन कर फटना बेहतर है, तो वहाँ तो बांग्लादेशी मुस्लिम जाना भी नहीं चाहेंगे। लेकिन, बाकी तो सक्षम देश हैं, वो आगे क्यों नहीं आते अपने मुस्लिम कौम की मदद के लिए?

जनसंख्या और सीमित संसाधनों से जूझता भारत, जहाँ तेरह लाख बच्चे कुपोषण से मरते हैं, भुखमरी और ठंढ से लोग यहाँ मर जाते हैं, और हम इन दो करोड़ मुस्लिमों को इग्नोर करते चलें, इनकी शिनाख्त भी न करें? फिर यही शरणार्थी ठंढ में काँपते हुए मर जाएगा, भूख से मरेगा तो यही बिग बीसी टाइप की संस्थाएँ लिखेंगी कि ‘भारत में ठंढ में मुस्लिम मर गया’ जैसे कि ठंढ को मुस्लिमों की तरफ भाजपा ने फूँक मार कर मोड़ दिया!

विदेशी मीडिया की दोगलई और कुत्सित कवरेज

जैसा कि हमेशा से होता रहा है, द इकोनॉमिस्ट, बीबीसी, WSJ और वाशिंगटन पोस्ट जैसे मीडिया संस्थान पूरे बल से इसे ऐसे दिखा रहे हैं जैसे मुस्लिमों को गैरकानूनी बताया जा रहा है। भारत में 18 करोड़ मुस्लिम हैं, और वो हमारे नागरिक हैं, वो हमारे राष्ट्र का हिस्सा हैं, और उन्हें वही अधिकार प्राप्त हैं, जो किसी भी दूसरे नागरिक को। लेकिन अमेरिका में वाशिंगटन पोस्ट पढ़ने वालों को क्या पता कि स्थिति क्या है क्योंकि वहाँ के लोग तो सिख भाइयों को भी दाढ़ी के कारण मुस्लिम समझते हैं, और ट्रेन के आगे ढकेल देते हैं। ऐसे नस्लभेदी देश में आप जो लिख दें, वो सत्य हो जाता है। इसलिए, वो लिख देंगे कि भारत ने चालीस लाख मुस्लिमों को गैरकानूनी बना दिया, और अमेरिकी लोग मान लेंगे। जब अमेरिका मान लेगा, तो पूरी दुनिया मान लेगी।

फिर लोग बतलाते हैं कि ऑपइंडिया बीबीसी और वाशिंगटन पोस्ट को पत्रकारिता सिखा रहा है। हेल या! बिलकुल सिखाएँगे, क्योंकि ये जो हो रहा है, वो पत्रकारिता तो नहीं है। जब असम में किसी महिला को पुलिस मारती है, उसका दुर्भाग्य से गर्भपात हो जाता है, तो उसे ऐसे दिखाया जाता है कि ‘मुस्लिम महिला का गर्भपात’। प्रथमदृष्ट्या लगता है कि सही तो है, लेकिन जो बात पूरी खबर में नहीं मिलती वो यह है कि महिला को उसके मजहब के कारण नहीं पीटा गया था, और आरोपित पुलिस कर्मचारी निलंबित किए जा चुके हैं।

ये सब भारत की छवि धूमिल करने के लिए किया जा रहा है जबकि प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी अपने ही समर्थकों का आक्रोश, ऐसे ही मुद्दों के कारण दो बड़े राज्यों में चुनाव हार कर झेल चुकी है। कोशिश पूरी है कि भाजपा को, अमित शाह को, नरेन्द्र मोदी को ऐसे दिखाया जाए कि ये लोग तो मुस्लिमों को भारत से निकालने के फिराक में हैं, जबकि सत्य यह है कि समुदाय के आत्मसम्मान और विकास के लिए जितना इस सरकार ने किया है, उतना पिछली किसी सरकार ने नहीं किया।

तो इनका क्या किया जाए?

बांग्लादेशी मुस्लिमों को इनका देश स्वीकार नहीं रहा और रोहिंग्या वापस जाना नहीं चाहते क्योंकि उन्होंने म्यानमार में जो आतंक मचाया है, वहाँ उनका भविष्य उज्ज्वल है भी नहीं। प्रयास यही है कि इन्हें इनके देश वापस भेजा जाए लेकिन उसकी संभावना बहुत कम है। चाहे अमित शाह मंचों से बोल लें, या मोदी जी, आप चाह कर भी इतने लोगों को ज़बर्दस्ती भगा नहीं सकते।

इन्हें बसाने के पीछे हमारे ही देश के कुछ स्वार्थी नेताओं और पार्टियों की चोर मानसिकता रही है। इन्हें लगा कि वो हमेशा सत्ता में रहेंगे और इनके कांड छुपे रह जाएँगे। जबकि सत्ता तो साल भर में भी आती और जाती है, फिर स्थायित्व की ऐसी उम्मीद रखना मूर्खता ही है। इन्हें लगातार बंगाल और असम में बसाने से वोटर लिस्ट प्रभावित हुए और उसके दम पर चुनाव जीते गए। सीधा मतलब है कि वहाँ के स्थानीय लोगों के हक पर डाका पड़ा और सत्ता के गलियारों में वैसे लोग पहुँच गए जिन्हें जनता की सेवा से नहीं, विधानसभा या लोक सभा में पहुँचने भर से ही मतलब था। जाहिर है कि स्थानीय लोगों को ये अच्छा नहीं लगेगा, और उन्होंने लगातार इसको लेकर आवाज उठाई।

इसलिए ममता कहती है कि वो एनआरसी लागू नहीं होने देगी, जबकि हरियाणा में खट्टर कह रहे हैं कि वो लागू करेंगे। ये एक संक्रामक रोग की तरह फैल रहा है। इनको बसाने के पीछे सिर्फ सत्ता बल पाना ही उद्देश्य नहीं रहा है, उद्देश्य हिन्दू बहुल इलाकों में मुस्लिमों की आबादी बढ़ा कर उसके पूरे क्षेत्रीय चरित्र को निगलने की रही है। असम के भारतीय मुस्लिमों से, या बंगाल के भारतीय मुस्लिमों से कोई समस्या नहीं, वो हमारे अपने लोग हैं। समस्या उनसे है जो यहाँ आकर उन्हीं मुस्लिमों का हक छीन रहे हैं।

इनकी शिनाख्त जब हो जाएगी तो सरकार के लिए इन्हें अलग करना आसान हो जाएगा। क्योंकि अगर ऐसा न किया गया तो एक दिन कश्मीर के मंदिरों में जैसे नमाज पढ़े गए, और ‘लो मुजाहिद आ गए हैं मैदान में’ का नारा लगा, और रातों-रात लाखों कश्मीरी पंडितों को बेघर कर दिया गया, वैसे ही इन जगहों से भी लोग भगा दिए जाएँगे या फिर अपने मकानों पर ‘ये मकान बिकाऊ है’ लिखने पर मजबूर हो जाएँगे।

इन्हें वापस नहीं लौटाया जा सकता। लेकिन हाँ, इन्हें पूरे देश में काम करने की परमिट दे कर, बिलकुल छोटी संख्या में अलग-अलग जगहों पर बसाया जा सकता है ताकि वहाँ की डेमोग्रफी पर इनका असर न हो। डॉ पीटर हैमंड की किताब SLAVERY, TERRORISM & ISLAM – The Historical Roots and Contemporary Threat में दिखाया गया है कि जिन-जिन जगहों पर मुस्लिम शरणार्थी एक प्रतिशत से कम में होते हैं, वहाँ ये बहुत ही शांति से रहते हैं, बहुत मिलनसार होते हैं, ऐसा कुछ नहीं करते जिसे गैरकानूनी कहा जा सके। लेकिन आप अगर इन्हें इकट्ठा होने दीजिए, एक बड़े जगह पर रखिए तो ये धीरे-धीरे अपने दीवार खड़े करते हैं, गैरमुस्लिम लोगों को उनके इलाके में घुसने से मना करते हैं, फिर संख्या बढ़ने पर स्थानीय प्रशासन से अपने लिए मस्जिद आदि की डिमांड करते हैं, अधिकारों की बात करते हैं, और एक समय आता है कि स्वीडन जैसे देश को बलात्कार के नक्शे पर नंबर एक बना देते हैं। ये एक कड़वी सच्चाई है जिसे आँख मूँद कर इग्नोर नहीं किया जा सकता।

भारत सरकार के पास जब इनका सही आँकड़ा होगा, इनके फिंगर प्रिंट, रैटिनल स्कैन आदि होंगे तो इनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सकेगी। साथ ही, इन्हें एक तय तरीके से बाँट कर रखा जा सकेगा। ये एक सच्चाई है कि अगर इन्हें डिटेंशन कैम्प में रखा जाएगा तो ये भारत पर एक भार बन कर रहेंगे, सिर्फ खाएँगे, बीमार होंगे और सरकार का खर्च होगा। इसलिए, इन्हें काम करने की परमिट देना एक व्यावहारिक समाधान जैसा दिखता है। इन्हें इतनी छोटी टुकड़ियों में ऐसी जगहों पर भेजा जाए जहाँ इन्हें जनसंख्या का एक प्रतिशत तक भी होने में दस पीढ़ियाँ लग जाएँ।

संवेदना कहाँ है हमारी?

जब भी आप इनको ले कर संवेदनशील होते हैं तो ध्यान रखिए कि इनका पुराना रिकॉर्ड खराब रहा है और यह कि भारत की जनसंख्या कितनी है, संसाधन की स्थिति क्या है। दो करोड़ लोगों को नागरिक बना कर उन्हें अधिकार देना, भारतीय बजट पर एक बहुत बड़ा धक्का देगा क्योंकि ये ‘अल्पसंख्यक’ कहे जाएँगे। आपको पता ही है कि भारत की दूसरी सबसे बड़ी आबादी ‘अल्पसंख्यक’ का तमगा चिपकाए अपने लिए बजट में विशेष हिस्सा पाती है, इनके लिए योजनाएँ अलग से बनती हैं, और सरकारें इनके लिए बहुत सक्रिय रहती हैं।

इसलिए, इन बांग्लादेशी और रोहिंग्या के साथ-साथ जो भी शरणार्थी गैरकानूनी रूप से आए हैं, उन्हें बाहर करने की सारी कोशिशें जरूरी हैं। अगर वो संभव न हो, तो फिर इनकी टुकड़ियाँ बना कर लोकल पुलिस स्टेशनों में इन पर विशेष नजर रखने की बात करते हुए, उन्हीं इलाकों में इन्हें बसाया जाए जहाँ मुस्लिम बिलकुल ही कम हैं। बात यह नहीं है कि क्या मैं इन्हें पहले से ही गलत मान कर बैठा हूँ, बल्कि बात यह है कि कई रोग लाइलाज होते हैं, उनके लिए बचाव ही एकमात्र विकल्प है। मानवता की बातें तब ही संभव हैं, जब मेरे देश के मुस्लिमों को उनका हक पहले मिले, न कि दूसरे देश के घुसपैठियों को।

राहुल गाँधी को माफी माँगनी चाहिए, किसानों के कर्ज माफ करने में रहे विफल: कॉन्ग्रेस नेता

मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ने किसानों की कर्जमाफी के आधार पर राहुल गाँधी को आड़े हाथों लिया है। दरअसल, लक्ष्मण सिंह ने आवाज उठाई है कि राहुल गाँधी को मध्यप्रदेश के किसानों से माफी माँगनी चाहिए, क्योंकि वो अपने कर्जमाफी के वादे को पूरा करने में असफल रहे, जिसके बलबूते पर उन्होंने प्रदेश में सरकार बनाई थी।

उन्होंने कहा, “चूँकि वादा पूरा होने में अभी समय है, इसलिए राहुल गाँधी को 10 दिनों के भीतर सभी किसानों के कर्ज माफ करने की विफलता के लिए माफी माँगनी चाहिए।” लक्ष्मण सिंह के मुताबिक इस तरह के वादे कभी नहीं किए जाने चाहिए।

5 बार सांसद और 2 बार विधायक रह चुके लक्ष्मण सिंह ने कहा- अब समय है कि आगे वादे करने की बजाय,  उचित समय बताया जाए कि किसानों का पूरा कर्ज कब माफ कर दिया जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले लक्ष्मण सिंह ने बुधवार को इसी मुद्दे पर बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि चुनाव के दौरान राहुल गाँधी को 10 दिनों के भीतर क़र्ज़माफ़ी का वादा नहीं करना चाहिए था।

आँकड़े गिनाते हुए कॉन्ग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह ने कहा कि 45 हज़ार करोड़ की क़र्ज़माफ़ी आसान काम नहीं है। लक्ष्मण सिंह के अनुसार, इस वर्ष किसानों की क़र्ज़माफ़ी किसी भी क़ीमत पर नहीं हो सकती।

यहाँ बता दें कि इस बयान के सुर्खियों में आने के बाद इसे मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसी बीच मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने ही उनके भाई दिग्विजय सिंह पर परदे के पीछे से सरकार में दखल देने का आरोप लगाया है। इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया को कॉन्ग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के लिए उनके समर्थक लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, और फिलहाल कमलनाथ मध्य प्रदेश में सरकार और संगठन, दोनों के मुखिया बने हुए हैं। इसलिए ऐसे में जब दिग्विजय, सिंधिया और कमलनाथ के त्रिकोण में मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस की सियासत उलझी हुई है, तब लक्ष्मण सिंह का बयान मायने रखता है।

गुजरात का वो मुख्यमंत्री जिसे Pak एयर फोर्स ने हवा में ही मार डाला था, आज ही के दिन, ठीक 56 साल पहले

सरकार ने पिछले दिनों पाकिस्तान की एयरस्पेस के ऊपर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमान को गुजारने की अनुमति माँगी थी, ताकि उनकी अमेरिका यात्रा का मार्ग छोटा हो सके। लेकिन इस खबर ने ट्विटर पर हिन्दुस्तानियों को दुश्चिंता से भर दिया। और यह लकारन नहीं था- हिंदुस्तान की एक चुनी हुई राज्य सरकार के मुखिया को हवा में मार डाला था इसी पाकिस्तानियों ने, और बहाना दिया था कि उनका विमान सीमा के ‘बहुत पास’ उड़ रहा था

गुजरात के मुख्यमंत्री बलवंत राय और उनकी पत्नी की हत्या

1965 की हिंदुस्तान-पाकिस्तान जंग के समय गुजरात के मख्यमंत्री हुआ करते थे कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता बलवंत राय मेहता। कच्छ के रण में पाकिस्तानी वायुसेना के पायलट ने सीमा रेखा के करीब उनके विमान पर हमला कर उनकी, उनकी पत्नी की और विमान में सवार 6 अन्य बेगुनाहों की हत्या कर दी थी

बलवंत राय अपने बीचक्राफ़्ट मॉडल 18 के विमान में अहमदाबाद से पत्नी और अन्य लोगों के साथ सीमा-रेखा के पास के मीठापुर के लिए निकले थे। उनके विमान चालक थे वायुसेना के पायलट रह चुके जहाँगीर इंजीनियर और उनके साथ थे एक को-पायलट। मुख्यमंत्री मेहता की पत्नी श्रीमती सरोज, गुजरात डेली का एक पत्रकार और साथ में मेहता के तीन सहयोगी भी विमान में थे।

लेकिन उनकी लैंडिंग के पहले ही कैस हुसैन नामक पाकिस्तानी एयरफोर्स पायलट ने हिंदुस्तानी वायुसीमा के भीतर घुसकर मेहता के विमान पर हमला कर दिया। पायलट जहाँगीर ने अपने पीछे युद्धक विमान को पड़ा देखकर अपने विमान के डैने ज़ोर-ज़ोर से हिलाने शुरू कर दिए, और विमान को और ऊँचाई पर ले जाने लगे- यह दया की याचना करने, या फिर गैर-युद्धक/नागरिक विमान होने का संकेत होता है, जैसे थल युद्ध में सफ़ेद झंडा दिखाकर युद्ध-विराम, दया, या नागरिक/गैर-सैनिक होने का इशारा किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के हिसाब से ऐसे सफ़ेद कपड़े या झंडे के निशान पर युद्ध रोक कर अभयदान देना किसी भी सेना का बाध्यकारी फ़र्ज़ होता है। लेकिन कैस हुसैन ने एक न सुनी।

उसने एक-एक कर मेहता के विमान का पहले बायाँ और फिर दायाँ डैना ध्वस्त कर दिया। इसके बाद विमान गिरने लगा, और ज़मीन से टकराने के पहले ही उसमें आग लग गई। आग और हज़ारों फ़ीट की ऊँचाई से सीधे ज़मीन पर गिरने के बाद न किसी के बचने की संभावना थी, न ही कोई बचा।

‘हमने गलत हमला किया, लेकिन फिर भी हमारी ड्यूटी थी- कोई अफ़सोस नहीं’

इसमें पाकिस्तान का बहाना यह रहा है कि उसे ‘लगा’ कि हिंदुस्तान ने सीमा पर रेकी और जासूसी के लिए नागरिक विमानों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है- और अपने इसी ‘लगने’ के आधार पर उसने फाइटर पायलट कैस हुसैन को असैन्य विमान होने की दुहाई देते या दया की भीख माँगते विमान पर जानलेवा हमला करने का आदेश दे दिया। और-तो-और, हिंदुस्तान की सीमा में घुस कर हिंदुस्तान के एक नागरिक, अहिंसक जनप्रतिनिधि की हत्या करने के बाद ‘चोरी-सीनाज़ोरी’ को चरितार्थ करते हुए तर्क दिया जाता है कि “बलवंत राय का विमान आखिर युद्धक विमान जैसा क्यों था”, “(ठीक है कि वह हिंदुस्तानी सीमा के भीतर ही था, लेकिन) आखिर एक नागरिक विमान सीमारेखा के पास कर क्या रहा था?” और पाक-ऑक्युपाइड पत्रकारिता का समुदाय विशेष पाकिस्तान के ऐसे ही तर्कों को आवाज़ देता है, वैधता प्रदान करता है।

46 साल बाद हत्या को अंजाम देने वाले पायलट कैस हुसैन ने पत्र लिखकर अफ़सोस तो जताया, लेकिन केवल पायलट जहाँगीर इंजीनियर की बेटी फ़रीदा सिंह से, जबकि उसने अन्यायपूर्ण हत्या 8 लोगों की थी। और वह भी उसने अपने किए पर अफसोस नहीं जताया, बल्कि फ़रीदा और मारे गए अन्य लोगों के परिवार को हुई तकलीफ़ पर अफसोस जताया। यानी कल्पना करिए आपके घर में आकर कोई आपके प्रियजनों को चाकू मार दे, बाद में बहाना करे कि आपके पिताजी उसके दुश्मन ‘जैसे’ दिखते थे, आपको ही उलाहना दे कि भला वे घर में बैठने की बजाय गलियारे में कर क्या रहे थे! और सात में यह भी कहे कि उसे आपके पिता की बेवजह नृशंस हत्या, चाक़ू से मरते हुए उन्हें हुए दर्द को लेकर कोई अफ़सोस या शर्म नहीं है, लेकिन आपके यतीम हो जाने का अफ़सोस बिलकुल है! हत्यारे पाकिस्तानी पायलट कैस हुसैन ने भी बिल्कुल कुछ ऐसा ही किया है।

एक ट्विटर यूज़र के अनुसार मेहता के कच्छ दौरे की घोषणा भी पहले ही हो चुकी थी- यानी यह बहाना भी पाकिस्तान का खोखला ही निकलता है कि भला युद्ध काल में किसी नागरिक के सीमारेखा के पास होने का उसे कैसे पता होता।

‘यदि पाकिस्तान से कोई जिहाद के लिए भारत जाएगा तो…’

कश्मीर मुद्दे पर किसी भी गलती को करने से बचने की दिशा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बुधवार (सितंबर 18, 2019) को पाकिस्तानियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे जिहाद के लिए कश्मीर न जाएँ, क्योंकि इससे कश्मीरियों को नुकसान पहुँचेगा।

अपनी आवाम को संबोधित करते हुए इमरान खान ने कहा, “यदि पाकिस्तान से कोई जिहाद के लिए भारत जाएगा…तो वह कश्मीरियों के साथ अन्याय करने वाला पहला व्यक्ति होगा, वह कश्मीरियों का दुश्मन होगा।”

पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर स्थित तोरखाम टर्मिनल के उद्घाटन के मौक़े पर इमरान खान ने दावा किया कि भारत को कश्मीर के लोगों पर कार्रवाई करने के लिए महज एक बहाने की जरूरत है। (इसलिए उनके मुल्क के लोग कोई गलती न करें)। इस दौरान पाक प्रधानमंत्री ने फिर दावा किया कि भारत कश्मीर से ध्यान भटकाने के लिए ‘फॉल्स फ्लैग’ (फर्जी आरोप लगाकर) अभियान शुरू कर सकता है।

उल्लेखनीय है कि जिहादी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए इमरान खान का ये बयान उस समय आया है जब वो जल्द ही संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करने वाले है और साथ ही विश्व के सबसे शक्तिशाली देख अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात करने वाले हैं।

इमरान खान की मानें तो वो अगले हफ्ते होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का मुद्दा बहुत जोरदार तरीके से उठाएँगे।

इसके अलावा बता दें इमरान खान ने अपनी बातचीत में घोटकी की घटना का भी जिक्र किया। हालाँकि, उन्होंने हिंदू मंदिर पर हुए हमले की निंदा की, लेकिन ये भी कह दिया कि ये संयुक्त राष्ट्र महासभा के संबोधन में खलल डालने की एक साजिश है।

कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री ने किया PM मोदी का समर्थन, पार्टी को याद दिलाया 1998 AICC का प्रस्ताव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताने के बाद अब पूर्व मंत्री और कॉन्ग्रेस के युवा लेकिन प्रसिद्ध नेता जितिन प्रसाद ने भी इसी तर्ज पर जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। जितिन प्रसाद के पीएम मोदी की बात को समर्थन देने के बाद कॉन्ग्रेस में हलचल बढ़ गई है। उन्होंने कहा है कि अब देश में दो बच्चों के मानक पर व्यापक बहस होनी चाहिए। साथ ही इस संबंध में सरकार को कानून लेकर आना चाहिए, ताकि भावी पीढ़ी की मूलभूत जरूरतों को सुनिश्चित किया जा सके।

जितिन प्रसाद ने इस दौरान देशहित का हवाला देते हुए इस मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बताया। उन्होंने इस मुद्दे को उठाते हुए कॉन्ग्रेस के लोगों AICC के उस प्रस्ताव की भी याद दिलाई, जब 1998 में कॉन्ग्रेस ने पंचमढ़ी शिविर में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर व्यापक बहस और पॉलिसी बनाने की बात कही थी।

कॉन्ग्रेस में तब फैसला लिया गया था कि 1 जनवरी 2000 के बाद से किसी भी कॉन्ग्रेस नेता के अगर 2 बच्चे से ज्यादा होते हैं तो उन्हें न तो पार्टी में कोई पद दिया जाएगा और न ही उन्हें चुनाव में टिकट दिया जाएगा।

इसके अलावा जितिन ने अपने दूसरे ट्वीट में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के लिए लिखा, “शुरुआत में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता दो बच्चों के मानक पर जनसंख्या नियंत्रण उपायों को अपनाने के लिए 10 परिवारों को प्रेरित करें। ”

गौरतलब है कि इससे पहले भी इस संबंध में 1 सितंबर को जितिन प्रसाद ने ट्वीट किया था , जिसमें उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर चर्चा कराने की बात शुरू की थी और अब एक बार फिर उन्होंने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए आवाज उठाई है।

हालाँकि, जानाकरी के मुताबिक जितिन ने इस संबंध में मीडिया से बातचीत करते हुए ये भी कहा है कि ये कहना गलत है कि जनसंख्या नियंत्रण पीएम मोदी का आइडिया है, क्योंकि 1998 में इसे उनके वरिष्ठों ने सोचा था और डॉक्यूमेंट किया था। लेकिन बता दें कि अभी हाल फिलहाल में जनसंख्या को लेकर चिंता प्रधानमंत्री मोदी के अलावा किसी और पार्टी द्वारा नहीं जताई गई है, इसलिए प्रसाद की गुहार को पीएम मोदी की चिंता के तर्ज पर ही विस्तार के रूप देखा जा रहा है।

सब्जी में नमक-मिर्च कम, पति को खाने में नहीं आया स्वाद तो आरफा को दे दिया तीन तलाक

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से तीन तलाक का एक अजीब मामला सामने आया है। यहाँ एसएसपी के सामने आरफा नाम की महिला ने अपने परिवारवालों के साथ पेश होकर न्याय की गुहार लगाई है और बताया है कि उसके पति आजाद ने सिर्फ़ सब्जी में नमक-मिर्च कम डले होने के कारण उसे तलाक दे दिया और अतिरिक्त दहेज की माँग करते हुए उसे हत्या की धमकी भी दी।

जहाँगीराबाद कोतवाली क्षेत्र की रहने वाली आरफा बुधवार (सितंबर 18, 2019) को अपनी शिकायत लेकर एसएसपी के पास पहुँची। एसएसपी को आप बीती सुनाते हुए महिला ने बताया कि 9 सितंबर को उसके ससुराल में कुछ रिश्तेदार आए थे, जिनके लिए उसने खाना बनाया था। लेकिन सब्जी में नमक-मिर्च कम होने के कारण उसके पति को खाने में स्वाद नहीं आया और उसने गुस्से में आरफा को तीन तलाक दे दिया।

हिंदुस्तान अखबार के बुलंदशहर संस्करण में प्रकाशित खबर

बात यही नहीं खत्म हुई। तीन तलाक देने के बाद आजाद ने आरफा से मारपीट भी की और फिर उसे घर से भी निकाल दिया। पीड़िता की मानें तो उसे उसके पति ने अतिरिक्त दहेज के बिना वापस लौटने पर हत्या करने की भी धमकी दी।

इस घटना के बाद ही आरफा ने अपने एक साल के बच्चे को गोद में लेकर एसएसपी के आगे न्याय की गुहार लगाई है। जिसके मद्देनजर एसएसपी ने जहाँगीराबाद कोतवाली पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करके कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं और बताया है कि मामूली बात पर तीन तलाक देने के मामले में रिपोर्ट दर्ज करके जाँच की कार्रवाई की जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आरफा की शादी 4 दिसंबर 2016 को दिल्ली निवासी आजाद से हुई थी। लेकिन शादी के बाद से ही उसका पति, सास, ससुर, नंदोई समेत अन्य ससुराल के लोग उससे अतिरिक्त दहेज की माँग करते हुए उसे उत्पीड़ित करते थे और उसके साथ आए दिन मारपीट भी होती थी। जिसके चलते वो एक बार पहले भी शिकायत दर्ज करवा चुकी है। साथ ही उसके माएके वाले भी उसके ससुरालवालों को बातचीत करके समझाने का भी प्रयास कर चुके हैं।

राजनाथ सिंह ने तेजस में उड़ान भरकर रचा इतिहास, ऐसा करने वाले पहले रक्षा मंत्री

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बेंगलुरु में गुरुवार (19 सितंबर) की सुबह स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान में सफल उड़ान भरकर इतिहास रच दिया। वो देश के पहले रक्षा मंत्री बन गए, जिन्होंने तेजस में उड़ान भरी। रक्षा अधिकारियों ने बताया कि तेजस विमान भारतीय वायु सेना की 45वीं स्क्वाड्रन ‘फ्लाइंग ड्रैगर्स’ का हिस्सा है। इस लड़ाकू विमान को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी ने डिज़ाइन और विकसित किया है।

तेजस में उड़ान भरने से पहले राजनाथ सिंह ने पायलट की यूनिफॉर्म पहनकर एक फ़ोटो ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने लिखा, “सारी तैयारी हो चुकी है।”

ग़ौरतलब है कि वायु सेना तेजस विमानों की एक खेप अपने बेड़े में शामिल कर चुकी है। शुरुआती दौर में HAL को 40 तेजस विमानों के लिए ऑर्डर दिया गया था। साल 2018 में वायु सेना ने 50,000 करोड़ रुपए में 83 और तेजस विमानों की ख़रीद के लिए HAL को अनुरोध प्रस्ताव दिया था।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तेजस में उड़ान भर कर स्वदेशी विमानों पर भरोसा जताया और उन्हें प्रमोट करने का संदेश देने के लिए उन्होंने इसमें उड़ान का फ़ैसला लिया।

इससे पहले, पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने लड़ाकू विमान सुखोई में उड़ान भर कर इतिहास रचा था। सुखोई के बारे में बता दें कि वो दो इंजन वाला लड़ाकू विमान है जबकि तेजस एक इंजान वाला लड़ाकू विमान है।

स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस की विशेषताएँ

  • तेजस एयरक्राफ्ट की सर्वाधिक स्पीड 1.6 मैक है। 2000 किमी की रेंज को कवर करने वाले तेजस का अधिकतम थ्रस्ट 9163 केजीएफ है। 
  • इसमें ग्लास कॉकपिट, हैलमेट माउंटेड डिस्प्ले, मल्टी मोड रडार, कम्पोजिट स्ट्रक्चर और फ्लाई बाई वायर डिजिटल सिस्टम जैसे आधुनिक फीचर हैं। 
  • इस जेट पर दो आर-73 एयर-टू-एयर मिसाइल, दो 1000 एलबीएस क्षमता के बम, एक लेज़र डेजिग्नेशन पॉड और दो ड्रॉप टैंक्स हैं।
  • एक तेजस को बनाने में क़रीब 300 करोड़ रुपए का ख़र्च आता है। इसे बनाने में भारत निर्मित कार्बन फाइबर का इस्तेमाल किया गया है। इसी वजह से इसका वज़न 12 टन है और लंबाई 13.2 मीटर है, जो बेहद मज़बूत भी है।
  • तेजस के पंखों का फैलाव 8.2 मीटर है और ऊँचाई 4.4. मीटर है। रफ़्तार की बात की जाए तो 1350 किमी प्रति घंटा है।
  • दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए इस विमान में आर-73 एयर टू एयर मिसाइल, लेज़र गाइडेड मिसाइल और बियांड विजुएल रेंज अस्त्र मिसाइल लगाई जा सकती है।