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सिख नरसंहार: CM कमलनाथ तक पहुँची आँच, चश्मदीद ने SIT के समक्ष दर्ज कराया बयान

1984 सिख नरसंहार मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ के ख़िलाफ़ गवाह मुख्तयार सिंह ने मामले की जाँच कर रही एसआईटी के समक्ष पेश होकर अपना बयान दर्ज कराया। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के पास 2 सिखों को भीड़ द्वारा मार डालने के मामले में कमलनाथ के ख़िलाफ़ बयान दर्ज किया गया। दिल्ली गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने इसे सिख समुदाय के लिए बड़ी जीत करार दिया है।

मुख्तयार सिंह जब अपना बयान दर्ज कराने के लिए एसआईटी के दफ्तर पहुँचे, तब उनके साथ सिरसा भी थे। अकाली दल के नेता सिरसा दिल्ली के राजौरी गार्डन से विधायक हैं। उन्होंने इससे पहले गवाह मुख्तयार की सुरक्षा के लिए उचित बंदोबस्त करने की माँग की थी, क्योंकि हाई प्रोफाइल केस होने के कारण उन्हें नुकसान पहुँचाया जा सकता है। मुख्तयार सिंह अगले सप्ताह कुछ डॉक्युमेंट्स के साथ फिर एसआईटी के समक्ष पेश होंगे। उनके साथ पत्रकार संजय सूरी की गवाही भी दर्ज की जाएगी।

दोनों ही गवाहों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दर्ज किए जाएँगे। गवाह मुख्तयार सिंह ने सार्वजनिक रूप से यह बताने से इनकार कर दिया कि उन्होंने एसआईटी से क्या कहा, क्योंकि मामले की अभी चल रही है। जाँच कमिटी में डिस्ट्रिक्ट पुलिस कमिश्नर और रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज शामिल हैं। 72 वर्षीय कमलनाथ को गाँधी परिवार का विश्वस्त माना जाता है। बता दें कि गृह मंत्रालय ने सिख दंगे से जुड़े कई मामलों की फाइलें फिर से खोलने का निर्णय लिया है, जिसके परिणामस्वरूप कमलनाथ व अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ फिर से इन मामलों की जाँच चल रही है।

वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने अपनी पुस्तक में रकाबगंज गुरुद्वारा पर हमले का जिक्र किया है। फुल्का ने लिखा है कि भीड़ द्वारा गुरुद्वारा को नुक़सान पहुँचाया गया था और 2 सिखों को ज़िंदा जला डाला गया था। फुल्का लिखते हैं कि हत्यारों द्वारा 5 घंटे तक उत्पात मचाया गया और कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ पूरे 2 घंटे तक भीड़ के साथ रहे। तत्कालीन कमिश्नर और एडिशनल कमिश्नर ने भी मौके पर कमलनाथ की मौजूदगी की पुष्टि की थी। अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी थी कि कमलनाथ ने ही भीड़ का नेतृत्व किया था।

कमलनाथ से जुड़ा ये केस FIR संख्या 601/84 पर आधारित है। 1 नवम्बर 1984 की यह घटना उन 7 मामलों में से एक है, जिन्हें फिर से खोला गया है। ये मामला उन बयानों और संजय सूरी (क्राइम पत्रकार) जैसे गवाहों पर आधारित है। हालाँकि उस समय इस मामले में हुई FIR में कमलनाथ का नाम नहीं था और ट्रॉयल रूम ने ये केस बंद कर दिया था, लेकिन अब जैसे ही ये मामला खुला है, लोगों की नजरे फिर से कमलनाथ पर अटक गई हैं।

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब दिल्ली में संसद भवन के पास स्थित है। इसे सन 1783 में सिख योद्धा बघेल सिंह द्वारा बनवाया गया था। नौवें सिख गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों पर इस्लामिक आक्रांताओं के अत्याचारों का विरोध किया तो उन्हें औरंगजेब ने उनका शीश काटने का हुक्म दे दिया। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद इसी ऐतिहासिक स्थल पर उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

बाबा सिद्दीकी के बेटे को टिकट मत दो, वह दागदार है: कॉन्ग्रेस के 12 नेताओं ने खोला मोर्चा

महाराष्ट्र में अब कॉन्ग्रेस के नेता ही अपनी पार्टी में चल रहे वंशवाद के ख़िलाफ़ मुखर हो रहे हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हो चुका है और कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन बना कर चुनाव लड़ रही है। दोनों ही दलों के कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। एनसीपी की हालत तो यह है कि इसके संस्थापक सदस्यों में अब सिर्फ़ अकेले शरद पवार ही पार्टी में बचे रह गए हैं। वह एनसीपी के अध्यक्ष भी हैं। मुंबई में 12 कॉन्ग्रेस नेताओं ने पूर्व विधायक बाबा सिद्दीकी के बेटे को टिकट दिए जाने के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस किया।

बता दें कि 1997 से 2014 तक लगातार 17 वर्षों तक विधायक रहे बाबा सिद्दीकी महारष्ट्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। अपनी इफ्तार पार्टी के लिए सुर्खियाँ बटोरने वाला बाबा जियाउद्दीन सिद्दीकी को मुंबई भाजपा के अध्यक्ष आशीष शेलार ने हरा दिया था। हर साल होने वाली उनकी इफ्तार पार्टी में बॉलीवुड की ख़ान त्रिमूर्ति से लेकर कई अभिनेता-अभिनेत्री शामिल होते हैं। उनके बेटे ज़ीशान सिद्दीकी को टिकट दिए जाने का विरोध करते हुए मुंबई कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने इसे वंशवाद करार दिया।

हालाँकि, अभी तक कॉन्ग्रेस ने उम्मीदवारों की सूची नहीं ज़ाहिर की है लेकिन बांद्रा ईस्ट कॉन्ग्रेस के 12 नेताओं ने पार्टी आलाकमान से कहा है कि किसी बाहरी उम्मीदवार के बजाय स्थानीय नेता को टिकट दिया जाए। प्रेस कांफ्रेंस करने वालों में मुंबई कॉन्ग्रेस के जनरल सेक्रेटरी, सेक्रेटरी, मुंबई महिला कॉन्ग्रेस की उपाध्यक्ष सहित कई अधिकारी शामिल थे। कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि ख़राब समय से गुजर रही पार्टी अगर स्थानीय नेताओं को टिकट दिया तभी वे पार्टी को जीता पाएँगे। उन्होंने वंशवाद को बढ़ावा न देने की अपील की।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि अगर ज़ीशान सिद्दीकी को टिकट दिया गया तो वे सभी न सिर्फ़ कॉन्ग्रेस पदाधिकारी के पद से बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे देंगे। कॉन्ग्रेस नेताओं का कहना है कि ज़ीशान का आपराधिक इतिहास भी है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस पर प्रतिक्रिया देते हुए कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं ने कहा कि स्थानीय नेताओं को प्रेस के पास जाने की बजाय आलकमान से बात करनी चाहिए थी। हालाँकि, उन्होंने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की कि बाबा सिद्दीकी के बेटे ज़ीशान को टिकट दिया जाएगा या नहीं।

महाराष्ट्र में पहले से ही बुरी स्थिति में चल रही कॉन्ग्रेस के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं है, क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर तो विपक्षी दशकों से वंशवाद का आरोप लगाते रहे हैं लेकिन अब निचले स्तर पर कॉन्ग्रेस के ही नेता इसके ख़िलाफ़ मुखर हो रहे हैं।

रामलला की सैलरी ₹1000 प्रतिदिन, लोगों ने पूछा- हर महीने दान में मिलने वाले ₹6 लाख कहाँ जाते हैं?

अयोध्या विवाद पर इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई चल रही है। दलीलों से दूर रामलला अभी भी जन्मस्थान पर एक टेंट में विराजमान हैं। वहाँ साथ में लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की प्रतिमाएँ भी हैं। राम जन्मभूमि अयोध्या में स्थापित इस मंदिर में रामलला व उनके भाइयों को सरकार से मिलने वाले पेमेंट में बढ़ोतरी की गई है। प्रतिमाओं को प्रतिदिन नहलाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। चन्दन और पुष्पहारों से की जाने वाली इस पूजा प्रक्रिया में कुल 16 चीजों का प्रयोग किया जाता है।

मंदिर में एक कूलर और ब्लोअर भी लगा है, जिसे मौसम के हिसाब से चलाया जाता है। प्रत्येक वर्ष रामनवमी के अवसर पर सभी प्रतिमाओं के लिए नए कपड़े ख़रीदे जाते हैं। कुल मिला कर देखें तो रामलला के लिए पूरी व्यवस्था करने में प्रतिदिन 1000 रुपए का ख़र्च आता है। कई वर्षों से मंदिर के कर्मचारी और पुजारी पेमेंट बढ़ने की माँग कर रहे थे। पिछले महीने उत्तर प्रदेश सरकार ने पेमेंट राशि को 26,200 रुपए से बढ़ा कर 30,000 रुपए कर दिया।

आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि मात्र 3,800 रुपए की यह बढ़ोतरी 1992 के बाद पिछले 27 सालों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास के वेतन में भी 1,000 रुपए का इजाफा किया गया है। अब उन्हें प्रति महीने 13,000 रुपए मिलेंगे। वह 1992 से ही इस पद पर हैं। उन्होंने कहा कि अब रामलला की पूजा प्रक्रिया और बेहतर तरीके से हो पाएगी। मंदिर में अन्य 8 कर्मचारियों की सैलरी 7,500 रुपए से 10,000 रुपए के बीच है। उनकी सैलरी में भी 500 रुपए का इजाफा किया गया है।

महंत दास ने कहा कि पेमेंट बढ़ाए जाने से रामलला मंदिर के लिए प्रसाद, भोजन, पानी, बिजली की व्यवस्था सही से हो पाएगी। उन्होंने बताया कि पहले मिलने वाली राशि पर्याप्त नहीं थी और कई बार उन्हें अपनी जेब से रुपए लगाने पड़ते थे। उन्होंने बताया कि उनके पास पूजा व अन्य प्रक्रिया के लिए सामान ख़रीदने के लिए फण्ड नहीं होते हैं। महंत ने जानकारी दी कि उन्हें राशन की दुकानों, माली और मिठाई वगैरह में भी रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं।

महंत सत्येंद्र दास ने सरकार से माँग करते हुए कहा कि रामलला व अन्य प्रतिमाओं के लिए साल में 4 बार नए कपड़े ख़रीदे जाने चाहिए, लेकिन ऐसा वर्ष में एक बार सिर्फ़ रामनवमी के अवसर पर ही होता है। विश्व हिन्दू परिषद के स्थानीय प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा कि बहुत सारे श्रद्धालु अब रामलला को कपड़े चढ़ा रहे हैं, जिससे अब पुजारियों के लिए काम आसान हो गया है।

एक और जानने लायक बात यह है कि मंदिर को प्रत्येक महीने 6 लाख रुपए दान में मिलते हैं, जो सरकार द्वारा संचालित बैंक खाते में जाते हैं। मंदिर रोज सुबह 7 बजे खोला जाता है और 11 बजे तक श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद रामलला को भोग लगाया जाता है। दोपहर 2 बजे से 6 बजे तक मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है और फिर इसे शाम 8 बजे तक के लिए खोला जाता है और पूजा होती है।

सोशल मीडिया पर श्रद्धालुओं ने माँग करते हुए कहा कि जब मंदिर को मिलने वाले दान का प्रबंधन सरकार के हाथों में है तो रामलला की पूजा और व्यवस्था के लिए इतने कम रुपए क्यों दिए जाते हैं? लोगों ने रामलला की पेमेंट बढ़ाने की माँग की। सवाल यह भी है कि जब मंदिर को दान में प्रति महीने 6 लाख रुपए मिलते हैं तो इसे रामलला और मंदिर की व्यवस्था में ख़र्च क्यों नहीं किया जाता?

कॉन्ग्रेस सरकारों की कर्जमाफी: किसानों को नहीं मिली राहत, यूपी पर गला फाड़ने वाला मीडिया भी चुप

पिछले वर्ष के अंत में हुए विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कर्जमाफी का वादा कर सरकार गठन में सफलता प्राप्त की। अपने तरकश के सारे तीर फेल हो जाने के बाद कॉन्ग्रेस ने कर्जमाफी का दाँव खेला था, क्योंकि पंजाब में भी यह फॉर्मूला कामयाब रहा था।अर्थशास्त्रियों ने इसे लेकर आपत्ति जताई कि इससे बैंकों पर दबाव बढ़ेगा और वे किसानों को क़र्ज़ देना ही बंद कर देंगे, लेकिन वोट बैंक की चिंता में दुबले होते जा रहे राजनीतिज्ञों ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया। ख़ैर, उससे पहले भाजपा भी यूपी में कर्जमाफी का वादा कर चुकी थी।

योगी आदित्यनाथ सरकार के पास किसानों की कर्जमाफी के लिए योजना थी, क्योंकि सरकार ने बॉन्ड्स बेच कर बैंकों को नुक़सान होने से रोका। वहीं, कॉन्ग्रेस के पास ऐसी कोई योजना नहीं थी। जैसे-तैसे कर उसने सरकार का गठन तो कर लिया, लेकिन कर्जमाफी अधर में लटक गई। मध्य प्रदेश में तो लोकसभा चुनाव का बहाना बना कर इसे टरकाया गया। आम चुनाव के लिए आचार संहिता लागू होने से पहले ही किसनों को मैसेज जाने लगे कि कर्जमाफी अब चुनाव के बाद होगी।

इन सबके बावजूद मीडिया ने इन ख़बरों को तवज्जो नहीं दी, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कर्जमाफी को लकीर बड़ा दुष्प्रचार अभियान चलाया गया। इसमें मुख्यधारा की मीडिया से लेकर प्रोपगेंडा पोर्टल्स तक शामिल रहे। मीडिया ने ऐसी ख़बरें चलाईं कि कई किसानों का 10 रुपए और 20 रुपए का क़र्ज़ माफ़ हुआ है। स्थानीय स्तर पर अधिकारियों द्वारा की गई गड़बड़ियाँ हाइलाइट की गई, जबकि कॉन्ग्रेस शासित प्रदेशों में सीधे राज्य सरकार के स्तर पर हुई बड़ी धांधलियों को कवर तक नहीं किया गया। मध्य प्रदेश में तो कर्जमाफी पर सवाल पूछने पर किसान को ज्योतिरादित्य सिंधिया की सभा से ही भगा दिया गया।

आजतक ने यूपी में कर्जमाफी की ख़बर चलाई कि किसानों को सर्टिफिकेट तो मिल गया लेकिन उसमें लिखी रक़म संदिग्ध थी, क्योंकि 10-20 लेकर 100-200 रुपए तक के क़र्ज़ माफ़ किए गए। जबकि, मंत्रियों का कहना था कि ये वो राशि थी जो कर्जमाफी के बाद बच गई थी। योगी सरकार ने कहा कि उसने ढाई साल में 43 लाख किसानों का 25 हज़ार करोड़ रुपए का क़र्ज़ माफ़ किया। कई फ़र्ज़ी व्यक्तियों ने भी इस योजना का लाभ उठा लिया, बाद में जिसकी जाँच हुई। यूपी में लघु व सीमान्त किसानों का 1 लाख रुपए तक का क़र्ज़ माफ़ किया गया था।

कॉन्ग्रेस के कर्जमाफी स्कीम की पोल इसी से खुल गई कि लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने इसी को मुद्दा बनाया और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान- तीनों ही राज्यों में पार्टी को बुरी हार मिली। जिन किसानों ने कर्जमाफी की उम्मीद में कॉन्ग्रेस को वोट दिया था, कुछ ही महीने बाद वे कॉन्ग्रेस से रूठ गए। इससे पता चलता है कि इन राज्यों में कर्जमाफी की प्रक्रिया ठीक से पूरी नहीं की गई। मध्य प्रदेश में तो राज्य सरकार ने पीएम किसान निधि को भी कई दिनों तक सिर्फ़ इसीलिए रोक कर रखा, क्योंकि राज्य सरकार कर्जमाफी पर काम करने का दावा कर रही थी।

लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि कमलनाथ सरकार ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ के अंतर्गत लाभार्थी किसानों की सूची केंद्र सरकार को भेजने में देरी कर रही है, क्योंकि कॉन्ग्रेस को शक है कि इससे भाजपा और मोदी को चुनावी लाभ मिल जाएगा। इस योजना के पहले पहले फेज में 1 करोड़ से भी अधिक किसानों के खाते में 2000 रुपए गए, लेकिन उनमें मध्य प्रदेश का एक भी किसान नहीं था। इसका मतलब ये कि कर्जमाफी में गड़बड़ी तो हुई ही, केंद्र सरकार की योजना को भी रोक कर रखा गया और यही किसानों के आक्रोश का कारण बना।

मध्य प्रदेश में कर्जमाफी फेल हुई है, ऐसा सिर्फ़ विपक्ष का ही नहीं मानना है। ख़ुद कॉन्ग्रेस के नेता भी ऐसा ही मानते हैं। एक दशक तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं। उनके भाई लक्ष्मण सिंह ने सीधा कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के कर्जमाफी के वादे पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि चुनाव के दौरान राहुल को कर्जमाफी का वादा नहीं करना चाहिए था। उन्होंने कर्जमाफी को असंभव करार दिया। उन्होंने कहा कि 45 हज़ार करोड़ की कर्जमाफी आसान काम नहीं है। उन्होंने कहा कि कमलनाथ सरकार कर्जमाफी का आकलन करने में विफल साबित हुई है।

जब पार्टी के बड़े नेता ही स्वीकार कर रहे हैं कि कर्जमाफी किसी भी क़ीमत पर संभव नहीं है तो मीडिया में इस पर सन्नाटा क्यों है? यूपी से ढूँढ-ढूँढ कर कर्जमाफी को लेकर गड़बड़ियों की ख़बर को हाइलाइट करने वाला और दुष्प्रचार फैलाने वाला मीडिया मध्य प्रदेश में कर्जमाफी की खस्ता हालत को राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं हाइलाइट कर रहा? राजस्थान की भी यही स्थिति है। कई किसानों ने कर्जमाफी न होने के कारण विरोध प्रदर्शन किया। ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ ने इस वर्ष जनवरी में प्रदर्शन किया।

बता दें कि यह संगठन भाजपा से सम्बद्ध नहीं है। ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध किसान संगठन है। किसानों ने आरोप लगाया कि गहलोत सरकार ने कई ‘नियम एवं शर्तों’ के साथ कर्जमाफी की, वो भी आधी-अधूरी। किसानों का कहना था कि पहले कहा गया कि सभी किसानों का कर्ज माफ़ किया जाएगा, बाद में कहा जाने लगा कि केवल राष्ट्रीय बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का ही कर्ज माफ़ होगा। किसानों का यह गुस्स्सा लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार के पीछे के कई प्रमुख कारणों में से एक रहा।

राजस्थान में कर्जमाफी में शर्तों की बानगी देखिए। एक तो कहा गया कि केवल राष्ट्रीय बैंकों से लिया गया क़र्ज़ ही माफ़ होगा। दूसरे यह कि पंचायत या नगर पंचायत जनप्रतिनिधियों, सरकारी नौकरों व पेंशनधारियों के परिवारों को इस सूची से बाहर रखा जाएगा। इससे कई लोग ऐसे ही कर्जमाफी की सूची से बाहर हो गए। 23 जून को राजस्थान के श्री गंगानगर में सोहन लाल नामक किसान ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले उन्होंने एक वीडियो बनाया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस की कर्जमाफी स्कीम से किसानों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ है।

उन्होंने वीडियो में अशोक गहलोत सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि बैंक अभी भी किसानों को परेशान कर रहे हैं और इसके गहलोत सरकार को परिणाम भुगतने होंगे। राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और दिवंगत वयोवृद्ध नेता मदन लाल सैनी ने दावा किया था कि 3 किसानों ने राजस्थान सरकार की कर्जमाफी योजना का लाभ न मिलने के कारण आत्महत्या कर ली। कॉन्ग्रेस नेता या तो ये कहते रहे कि कर्जमाफी की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो गई है या फिर लोकसभा चुनाव को लेकर लागू आचार संहिता पर उन्होंने सारा ठीकरा फोड़ दिया। राजस्थान में तो सरकार बनने के बाद जारी हुए बजट में भी कर्जमाफी को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा गया।

कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गाँधी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में सरकार गठन के 10 दिनों के भीतर कर्जमाफी का ऐलान किया था। गड़बड़ियाँ तो होनी ही थीं, क्योंकि बिना किसी योजना के इतना बड़ा चुनावी वादा और वो भी इतनी कम समयसीमा में कर दी गई। तभी उनकी ही पार्टी के नेता अब उन्हें नसीहत दे रहे हैं। मध्य प्रदेश में तो स्थिति यह हो गई कि सरकार गठन के 4 महीने बाद किसानों ने 3 दिन का विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि उन्हें कर्जमाफी का लाभ नहीं मिला। बैंक लगातार किसानों को नोटिस भेजते रहे कि उन्हें डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाएगा। मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री से मिलने के बावजूद किसानों ने प्रदर्शन जारी रखा।

कॉन्ग्रेस शासित पंजाब की स्थिति भी गड़बड़ है। वहाँ के तो अधिकारियों ने ही स्वीकार किया कि राज्य सरकार वित्तीय कारणों ने किसानों की कर्जमाफी करने में विफल साबित हुई है। किसान नेताओं का कहना था कि छोटे कृषकों को कर्जमाफी का कोई लाभ नहीं मिला। छत्तीसगढ़ की स्थिति और और भी बदतर है। बस्तर सहित कई नक्सल प्रभावित इलाक़ों में किसानों के सरकारी डेटाबेस में ही खामी आ गई और इस वजह से कर्जमाफी लागू ही नहीं हो सकी। वहाँ भी कर्जमाफी न होने की वजह से एक किसान द्वारा आत्महत्या की ख़बर आई।

यहाँ सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश में इतने बड़े स्तर पर कर्जमाफी हुई और वहाँ की सरकार ने बैंकों पर बोझ न पड़ने के लिए योजना भी बनाई, फिर भी मीडिया के एक वर्ग द्वारा स्थानीय स्तर पर हुई ग़लतियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर फेक नैरेटिव चलाया गया। जबकि, कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में बड़े-बड़े चुनावी वादों के बावजूद किसानों ने आत्महत्या किया, विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन इन ख़बरों को प्राथमिकता नहीं दी गई। कर्जमाफी पर मीडिया की सेलेक्टिव रिपोर्टिंग के बावजूद विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को जिताने वाले किसानों ने लोकसभा चुनाव में उससे मुँह मोड़ लिया।

…अल्लाह का सम्मान नहीं किया तो भारत के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे: सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्षकार

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन ने अपनी दलीलें पेश की। जन्मस्थान को ‘न्यायिक व्यक्ति’ माने जाने पर धवन ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा विवाद ही इस बात को लेकर है कि राम का जन्मस्थान कहाँ है?

सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश धवन ने दलील दी “हम राम का सम्मान करते हैं, जन्मस्थान का भी सम्मान करते हैं। इस देश में अगर राम और अल्लाह का सम्मान नहीं होगा तो देश खत्म हो जाएगा।” उन्होंने कहा कि अगर मान भी लिया जाए राम का जन्म वहाँ हुआ था, तो भी जन्मस्थान के रूप में उतने बड़े क्षेत्र पर दावा ठोकना एक निहायत ही कमज़ोर दलील है। धवन ने हिन्दू पक्ष की उस दलील पर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि विवादित स्थल के सारे ढाँचों को ध्वस्त कर एक भव्य मंदिर का निर्माण होना चाहिए।

धवन ने कहा कि हिन्दू पक्ष सिर्फ़ यहाँ राम का जन्म होने की बात करते हैं, लेकिन उनकी अर्जी में कहीं भी उस क्षेत्र की बाउंड्री का जिक्र नहीं है। पूरी विवादित जमीन जन्मस्थान नहीं हो सकती। कुछ तो निश्चित स्थान होगा। पूरा क्षेत्र जन्मस्थान नहीं हो सकता।

धवन ने राम के साथ अल्लाह का भी नाम लिया। उन्होंने कहा:

“इसमें कोई शक नहीं है कि राम का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर राम और अल्लाह का सम्मान नहीं किया गया तो भारत जैसा विविधताओं से भरा देश अलग-थलग हो जाएगा। हिन्दू पक्ष ने यह दिखाया है कि जन्मस्थान को लेकर आस्था है, लेकिन उन्होंने यह नहीं साबित किया है कि यहाँ पूजा होती थी। हाँ, ये कहा जा सकता है कि चबूतरे पर प्रार्थना होती थी लेकिन पूरे क्षेत्र के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। 1949 तक तो भीतरी क्षेत्र में एक प्रतिमा तक नहीं थी।”

धवन ने बाबरी मस्जिद को लेकर कहा कि वहाँ हमेशा से नमाज़ पढ़ी जाती रही है। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद कभी भी वीरान नहीं पड़ा। अर्थात, इतिहास में किसी भी समय मस्जिद सुनसान नहीं रहा। राजीव धवन ने दावा किया कि ज्यादा से ज्यादा यह हुआ होगा कि कुछ दिनों तक मस्जिद का प्रयोग किसी ने नहीं किया गया होगा। धवन ने कहा कि जो भी शासक रहा हो और उसने धर्म या क़ुरान में से किसी का भी उल्लंघन किया हो, फ़ैसला संविधान के अनुरूप ही होना है।

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि 18 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी हो जाने की उम्मीद है, ताकि कोर्ट को फ़ैसला लिखने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। सुब्रह्मण्यम स्वामी सहित तमाम विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि 17 नवम्बर से पहले इस मामले में निर्णय आ जाएगा।

हॉस्टल में मृत मिली हिंदू मेडिकल छात्रा की ‘हत्या’ की न्यायिक जॉंच नहीं कराएगा पाकिस्तान

अपने हॉस्टल के कमरे में मृत मिली मेडिकल छात्रा नमृता चंदानी को इंसाफ दिलाने के लिए पाकिस्तान गंभीर नहीं है। एक पाकिस्तानी अदालत ने इस मामले की न्यायिक जॉंच की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। प्रशासन पहले से ही इस मामले को आत्महत्या बता रफा-दफा करने की कोशिश में लगा है।

पाकिस्तान के लरकाना जिले के सत्र न्यायाधीश ने मृतका की मौत पर न्यायिक जाँच कराने से इनकार कर दिया है। नमृता सिंध के घोटकी शहर से थी, जहाँ हाल ही में एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई थी। उसका शव 17 सितंबर को हॉस्टल के कमरे में चारपाई पर संदिग्ध हालत में मिली थी। कमरा अंदर से बंद था और गले में रस्सी बंधी थी।

सिंध पुलिस ने 20 सितंबर को इस मामले में 2 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनकी पहचान उसके सहपाठी अली शान मेमन और मेहरान अब्रो के तौर पर की गई थी। इनमें से एक नमृता का क्रेडिट कार्ड भी इस्तेमाल करता था।

ऐसा माना जा रहा है कि धर्मपरिवर्तन से इनकार करने पर नमृता की हत्या की गई थी। नमृता के भाई विशाल जो खुद मेडिकल कंसलटेंट हैं शुरुआत से इसे हत्या बता रहे हैं। उन्होंने नमृता की गर्दन पर तार के निशान देखने की बात कही थी। ऐसे ही निशान उसके हाथ पर थे। लेकिन नमृता की दोस्त का दावा है कि उसके गले में दुपट्टा बॅंधा था।

लेकिन, फिर भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन इसे आत्महत्या साबित करने की कोशिश करता रहा। जबकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘गला घोंटने के साफ निशान दिखाई देते हैं।’ ऐसे में मामले की न्यायिक जॉंच की मॉंग अदालत द्वारा ठुकराए जाने से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान की पूरी मशीनरी अल्पसंख्यकों को लेकर कितनी गंभीर है।

3 बीवी-15 बच्चे: जिले का सबसे बड़ा परिवार फिर भी मोहम्मद शरीफ को चाहिए और औलादें

देश में बढ़ती जनसंख्या जहाँ एक ओर चिंता का गंभीर विषय बना हुआ है, वहीं एक शख़्स ऐसा भी है जो 15 बच्चों का अब्बू होने के बावजूद संतुष्ट नहीं है। उत्तर प्रदेश में लखीमपुर के बौधियान कलां गाँव का रहने वाला मोहम्मद शरीफ़ का कहना है कि तीन बीवियों और 15 बच्चों का उसका परिवार इस ज़िले का सबसे बड़ा परिवार है। इस गाँव की कुल आबादी 6,000 है।

शरीफ ने बताया कि 1987 में जब जट्ट बेगम से उसका पहला निक़ाह हुआ तो उस वक़्त उसकी उम्र 14 साल की थी। पहली बीवी से उसके तीन बेटे और पाँच बेटियाँ हैं। शरीफ़ ने बताया कि नूर से मुलाक़ात होने के बाद नब्बे के दशक में उसने दूसरा निक़ाह किया। उससे चार बेटियाँ और एक बेटा है। इसके बाद 2000 में, शरीफ़ ने तरन्नुम बेगम (नेपाली) से तीसरा निक़ाह किया। उससे उसे एक बेटा और एक बेटी है।

दिलचस्प बात यह है कि खुद शरीफ़ को अपने सभी बच्चों के नाम याद नहीं रहते। उसने बताया कि हर शाम घर पहुँच कर वह बच्चों के सिर गिनता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी बच्चे घर पर मौजूद हैं। शरीफ़ का सबसे बड़ा बेटा 24 साल का है और सबसे छोटी बेटी 2 साल की है।

मोहम्मद शरीफ़ का कहना है कि उसे बहुत प्यार करने वाला परिवार मिला है, जहाँ सभी एक साथ रहते हैं। यहाँ तक ​​कि उसकी तीनों बीवियाँ भी साथ रहती हैं। शरीफ़ ने बताया कि वो कभी ऐसी स्थिति नहीं आने देता जिससे परिवार में बीवियों और बच्चों के बीच किसी तरह की बहस या विवाद उत्पन्न हो जाए।

पेशे से किसान मोहम्मद शरीफ को इस बात पर पूरा भरोसा जताया कि अगर अल्लाह ने हमें धरती पर भेजा है, तो वह सुनिश्चित करता है कि कोई भी खाली पेट न सोए। शरीफ़ ने बताया कि उसे अक्सर मज़दूरी के बदले अनाज मिलता है और इससे परिवार का गुज़ारा चलता है।

हाल ही में शरीफ़ ने अपनी तीन बीवियों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत तीन आवासों के लिए आवेदन किया है। शरीफ परिवार नियोजन कार्यक्रमों से अनजान हैं और ज़ोर देकर कहता है कि बच्चे अल्लाह का उपहार हैं। उसने बताया कि अगर अल्लाह उसके परिवार को और औलाद दे तो उसे और ख़ुशी होगी।

आतंक का एक मजहब है: एक ने स्वीकारा, आप भी स्वीकारिए

‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम के दौरान बहुत सी चीजें कही गईं, दिखीं और दिखाई गईं। मोदी के लिए एक भीड़ आई थी, जिसे कुछ कुख्यात पत्रकार रोहिंग्या और बांग्लादेशी भीड़ सदृश बताते हुए लेख लिखते पाए गए। फर्क बस यही है कि ऐसे पत्रकार अब इतना नीचे गिर चुके हैं कि इनके लिए राह चलते थूकना और सड़क पर छुरा मारना, एक ही अपराध है जो कि इन्होंने पहले भी बताया है कि ‘जय श्री राम’ कहलवाने पर किसी को मजबूर करना ‘हिन्दू आतंकवाद’ है, जबकि इस्लामी आतंक तो आज तक आ ही नहीं सका भारत में।

खैर, ट्रम्प न तो एनडीटीवी के स्टूडियो में काम करता है, न ही उसे इस बात से फर्क पड़ता है कि आतंकवाद के साथ समुदाय विशेष को जोड़ने पर उसे लिबरल या वामपंथी लॉबी क्या कहेगी। अमेरिकी टॉक शो को मसाला भले ही मिल जाएगा, वो उसे रेसिस्ट और कम्यूनल भले ही कह देंगे, लेकिन उससे यह सच्चाई जो है, वो नहीं बदल सकती कि आईसिस के झंडे पर ‘अल्लाहु अकबर’ लिखा हुआ है और पूरा विश्व कट्टरपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक से जल रहा है।

इसलिए, लिबरलों के स्थानविशेष से धुँआ और आग भले ही निकल रहा हो, लेकिन वो सिवाय चार स्वनिर्मित वाक्यांशों के, जो बहुत मीठे शब्दों में भी शुतुर्मुर्ग की गर्दन रेत में होने जैसा से लेकर ‘हेड इन आस’ के लक्षण ही हैं, कि ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’, ‘हम ऐसा करके इस्लामोफोबिया फैला रहे हैं’, ‘ऐसा करने से हम एक समुदाय को अलग-थलग ढकेल रहे हैं’, और कुछ कह भी नहीं सकते।

आप इन वाक्यांशों पर गौर कीजिए कि ये आखिर कहना क्या चाहते हैं? आतंक का कोई मजहब नहीं होता? सच्ची? फिर इन हमलों को देखिए और बताइए कि इनकी जड़ में क्या है? क्या यहाँ इस्लामी कट्टरपंथ नहीं है जिसे पूरी दुनिया खिलाफत के नीचे चाहिए या वो आज तक पता नहीं किस हमले का बदला पूरे विश्व के बड़े शहरों में निर्दोषों को मार कर लेते हैं?

इन्हीं आतंकियों ने बेल्जियम से लेकर फ़्रांस तक, मैड्रिड, बार्सीलोना, मैन्चेस्टर, लंदन, ग्लासगो, मिलान, स्टॉकहोम, फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट, दिजों, कोपेनहेगन, बर्लिन, मरसाई, हनोवर, सेंट पीटर्सबर्ग, हैमबर्ग, तुर्कु, कारकासोन, लीज, एम्सटर्डम, अतातुर्क एयरपोर्ट, ब्रुसेल्स, नीस, पेरिस में या तो बम धमाके किए या लोन वूल्फ अटैक्स के ज़रिए ट्रकों और कारों से लोगों को रौंद दिया। हर बार आईसिस या कोई इस्लामी संगठन इसकी ज़िम्मेदारी लेता रहा और यूरोप का हर राष्ट्र अपनी निंदा में ‘इस्लामोफोबिक’ कहलाने से बचने के लिए इसे सिर्फ आतंकी वारदात कहता रहा।

पिछले पाँच सालों में यूरोप में 20 से ज़्यादा बड़े आतंकी हमले

पिछले पाँच सालों में यूरोप में 20 से ज़्यादा बड़े आतंकी हमले हुए हैं, जिसमें महज़ 18 महीने में 8 हमले सिर्फ फ़्रान्स में हुए। इस्ताम्बुल में तीन बार बम विस्फोट और शूटिंग्स हुईं। बेल्जियम, जर्मनी, रूस और स्पेन इनके निशाने पर रहे। यूरोपोल द्वारा 2017 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार आईसिस ने यूरोप में आतंकी हमलों के लिए वहाँ शरण पाने वाले कट्टरपंथियों की मदद ली। स्वीडन की न्यूज एजेंसी टिडनिन्गारनास टेलिग्रामबायरा के अनुसार पश्चिमी यूरोप में हुए 37 हमलों में दो तिहाई हमलावर (68 में से 44) घृणा फैलाने वाले लोगों के प्रभाव में आकर हमला करने को तैयार हुए। उनका रेडिकलाइजेशन ऑनलाइन नहीं था, बल्कि उन्हें निजी तौर पर मिलने के बाद ऐसा करने को कहा गया, और वो तैयार हुए।

फिर भी इसे हम इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद न कह कर सिर्फ आतंकवाद कहते रहेंगे। आखिर आतंकवाद के पहले के दो शब्द क्यों जरूरी हैं? इसके लिए हमें यह समझना होगा कि किसी भी चीज का सामान्यीकरण कैसे होता है। पहले कच्ची सड़कें होती थीं, तो पक्की सड़क को हम पक्की सड़क कहते थे। फिर वो इतनी आम हो गई कि सड़क का मतलब ही पक्की सड़क हो गया, जो कि सपाट हो, बिना तोड़-फोड़ के। कई चीजों को हम ‘सरकारी’ जब कहते हैं तो हम उसे यह जताने के लिए कहते हैं कि वो बेकार हालत में होगी।

जैसे कि बिहार सरकार मर्सीडीज की बसें भी चलाती है, लेकिन जब कोई आपको कहे कि सरकारी बस से चलेंगे तो आपकी रूह काँप जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ कि शुरु में अच्छी रही सेवाएँ, कालांतर में बुरी होती गईं और उसके पहले एक विशेषण लगा क्योंकि अधिकांशतः उसकी हालत, या उसका अर्थ उसी संदर्भ में रहा जिसके लिए हम उसे सामान्य रूप में बोलते हैं। सरकारी बस बेकार ही होगी, सरकारी अस्पताल बेकार होंगे… जबकि अपवाद स्वरूप आपको दोनों ही सेवाओं में बेहतर उदाहरण मिलेंगे। जैसे कि एम्स या बिहार की मर्सीडीज बसें।

इसी तरह, जब आतंकवाद के पीछे, लगभग हर बार, एक ही मजहबी परचम हो, एक ही नारा हो, और एक ही तरह के लोग हों, जो एक ही मजहब के नाम पर ऐसा करते हों तो फिर आपका उसे सिर्फ आतंकवाद कहना समस्या को बदतर ही बनाता है। किसी भी रोग को दूर करने के लिए पहले उसके कारणों को पहचानना जरूरी है। जैसे कि मधुमेह है, और आप मीठा ज्यादा खाते हैं, लेकिन आपका डॉक्टर यह कहे कि इन्हें एक रोग है, हम इलाज करेंगे। रोग का कारण मीठा है, और आप उसे पूरी तरह से छोड़ते हुए, निकल लेंगे, तो उसका इलाज नहीं हो पाएगा। रोगी को भी नहीं पता कि मीठा खाने से हो रहा है, घरवालों को भी नहीं पता, तो फिर उसके भोजन में रसगुल्ले देते रहिए और सोचते रहिए कि डॉक्टर की दवाई काम करती रहेगी।

मजहबी आतंकवाद के साथ यही हो रहा है। जब तक कट्टरपंथी शिक्षा, बच्चों और किशोरों के जेहन में एक मज़हबी सर्वश्रेष्ठता का झूठा दम्भ, हर गैर-मजहबी व्यक्ति को दुश्मन मानने की जिद, मजहब के नाम पर कत्लेआम को जन्नत जाने का मार्ग बताना और इस तरह की बेहूदगी बंद नहीं की जाएगी तो दुनिया जलती रहेगी। क्योंकि यहाँ एक कश्मीरी आतंकी मरता है तो उसका बाप शोक नहीं मनाता, वो हार्डवायर्ड है अपने मजहबी शिक्षा के कारण, उसका दिमाग रिपेयर होने के परे है, वो कहता है कि और बच्चे होते तो उन्हें भी कुर्बान कर देता।

ऐसी सोच पर आप कैसे लगाम लगाएँगे? यहाँ बच्चों के मरने की, आतंकी होने की ग्लानि कैसे होगी इस बाप को जिसने ताउम्र यही तालीम ली है कि धरती समुदाय विशेष की है और इसके हर समर्थक को पाँच काफिर ढूँढ कर उसे मजहबी बनाना ही उसका परम कर्तव्य है। वो आखिर क्यों नहीं कैमरे पर बोलेगा का कि मजहब की राह में और भी बच्चे कुर्बान कर दूँगा!

क्या मैं बिगट हूँ, कम्यूनल हूँ या तुमने अपनी मुंडी स्थानविशेष में घुसा ली है?

ये मैंने बहुत सुना है और मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सामने वाले मुझे बस इन्हीं शब्दों से ही घेर सकते हैं, इन शब्दों के बाद इनके पास, अपनी ही बात को संदर्भ सहित समझाने के लिए एक अक्षर तक नहीं मिलेगा। इन्होंने आतंक को हिन्दुओं से जोड़ने की पुरजोर कोशिश की। कोर्ट में मामले लंबित हैं, लेकिन इनके गिरोह ने अपनी ही सरकार में, अपनी ही पुलिस के साथ, कुछ हिन्दुओं पर आरोप लगाया और आरोप लगाने के साथ ही ऐलान कर दिया कि ये ‘हिन्दू आतंक’ है।

कोर्ट तो अपना काम खैर करती रहेगी, लेकिन क्या हमारे पास इतनी घटनाएँ हैं आतंक की, इसी देश में, जो मजहबी आतंक की भयावहता के समकक्ष हो, गिनती में उसके लाखवें हिस्से जितना भी हो कि हिन्दुओं का नाम आतंक से जोड़ दिया जाए? फिर, गैंग नए नैरेटिव पर उतर आता है। आतंक की परिभाषा में अब किसी समुदाय विशेष को थप्पड़ मारना, उससे ‘जय श्री राम’ कहलवाना भी आ जाता है और यह गिरोह गँड़थैय्यो नाच करने लगता है।

गिरोह चिल्लाने लगता है कि अगर ये आतंक नहीं तो और क्या है! जबकि आप इन चांडालों को, इन पतित पत्रकारों को, इन बरसाती सेलिब्रिटीज़ को, इन दोगले वामपंथियों को, इन पापी लिबरलों को, आप बेखौफ बता सकते हैं कि आतंक क्या है: आतंक है कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीर में ली गई 42,000 जानें और निर्वासित हुए लाखों कश्मीरी पंडित; आतंक है संकटमोचन मंदिर में फटा बम; आतंक है सरोजिनी नगर मार्केट का ब्लास्ट; आतंक है मुंबई लोकल ट्रेनों में हुए कई धमाके; आतंक मुंबई शहर में 2008 में विकराल रूप लेकर आया था; आतंक था संसद भवन में आरडीएक्स से भरी कार लेकर घुसना और बहादुर जवानों को मार देना; आतंक था उरी, पठानकोट, पुलवामा; आतंक है कोयम्बटूर की बॉम्बिंग; आतंक है रघुनाथ मंदिर पर हमला; मुंबई के बसों पर किए गए धमाके; आतंक है अक्षरधाम मंदिर को निशाना बनाना; आतंक है दिल्ली के सीरियल ब्लास्ट्स; आतंक है 2008 में हुए 11 कट्टरपंथी आतंकियों द्वारा किए गए हमले; आतंक है जयपुर के धमाके…

गिनते-गिनते थक जाओगे और सबकी जड़ में बड़ी ईमानदारी से अपने संगठन का नाम लेता हुआ समुदाय विशेष का शांतिप्रिय मिल जाएगा कि काफिरों का यही हश्र होगा। भारत में 1970 से अब तक लगभग 20,000 मौत और 30,000 घायलों में से सबसे बड़ा प्रतिशत मजहबी आतंक के नाम दर्ज है। इसलिए, जब आतंक के नाम कोई मजहब ट्रम्प जोड़ता है तो वो भारतीय और वैश्विक, दोनों ही, परिदृश्यों में सोलह आने सच हैं।

इस्लामोफोबिया क्या है? आतंकवाद के मूल कारणों को गिनाना घृणा कैसे फैलाता है?

किसी को ‘इस्लामोफोबिया’ से ग्रस्त बताना या उसे ‘इस्लामोफोब’ कहना कहाँ तक सही है अगर वो सत्य बोल रहा हो? अगर भारत में 2018 से अभी तक बीफ माफिया ने बीस लोगों को मार दिया और मारने वाले हमेशा समुदाय विशेष के थे, मरने वाले हमेशा हिन्दू, और आप ये आँकड़ा रख देंगे तो क्या ये मजहब से घृणा हो गई? क्या यह एक सच्चाई नहीं है कि अपराधी हर धर्म और मजहब में होते हैं? अगर कठुआ की बच्ची का बलात्कार करने वाले आठ लोग हिन्दू थे, तब तो सारे हिन्दू, पूरा हिन्दू धर्म और ‘हिन्दुस्तान’ ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया था, जबकि दसियों मौलवियों द्वारा, मस्जिदों और घरों के अंदर बच्चियों का यौन शोषण और बलात्कार होता रहा, तब मजहब और उनका लीडर तो बलात्कारी नहीं बताया गया?

ये कौन सा फोबिया है? और क्या हम एक दूसरे को ‘इस्लामोफोब’ और ‘हिन्दूफोब’ बता कर बाता-बाती करते रहेंगे या हम ये स्वीकारेंगे कि कई कट्टरपंथी शरीर पर बम लपेट कर, मजहबी नारा लगाते हुए बाजारों में फट रहे हैं? क्या हमने वो तमाम वीडियो नहीं देखे हैं जहाँ आदमी एक मजहबी नारा लगाता है, और लोग जान ले कर भागने लगते हैं? आखिर एक मजहबी नारे से मजहब कब अलग हुआ और उसे इन्हीं आतंकियों के कारण, इसी मजहब के मानने वालों ने भी दहशत और डर का नारा कब मान लिया, क्यों मान लिया, ये आपको नहीं पता? या आप पता करना ही नहीं चाहते?

आप हजार धमाकों का गुनाह, उस एक अपराध के बराबर कर देंगे जहाँ किसी निरीह कथित अल्पसंख्यक को ‘जय श्री राम’ बोलने पर चार लुच्चे हिन्दुओं ने मजबूर किया और उसके बाद आप दस खबरें ऐसी ले आएँगे जहाँ हर बार ‘जय श्री राम नहीं बोलने पर हिन्दुओं ने पीटा’ की हर खबर झूठी साबित होगी? क्या मैं आपको यह कहूँ कि तुम मुझे चार थप्पड़ मार लो और मैं ‘अल्लाहु अकबर’ बोल देता हूँ, और मैं तुम्हारे घर में बम फोड़ कर दस लोगों को मार दूँगा, तो आप इसे बराबर की बात मान लेंगे?

ये जो फर्जी की बातें कुछ मजहब के लोग करते हैं कि ये आतंकी ‘असली शांतिप्रिय’ नहीं है, सच्चे इस्लाम को नहीं जानते, वो हर आतंकी हमले पर स्वतः ऐसा क्यों नहीं कहते कि इस्लाम के नाम पर जो ये नवयुवक बाज़ारों में फट रहे हैं, वो मजहब का नाम खराब कर रहे हैं? क्या इन्होंने इस बात को कभी स्वीकारा है कि ये लोग एक तय तरीके से तैयार किए जाते हैं? क्या इन तथाकथित अच्छे और सच्चे ‘शंतिप्रियों’ ने सोशल मीडिया, पब्लिक जगहों पर, उसी तरह एक लाख की भीड़ जुटाई है जैसी वो कथित चोर तबरेज की मौत पर जुटाते हैं?

ऐसा नहीं होता, ऐसा नहीं दिखता कि लाखों की इस्लामी भीड़ मथुरा के भारत यादव की भीड़ हत्या पर, चौक चौराहों पर निकल आती है और कहती है कि वो इस भीड़ हत्या के खिलाफ हैं। सोशल मीडिया पर एक नजर घुमा लीजिए कि अगर हिन्दुओं ने भीड़ हत्या की तब भी हिन्दू ही उसकी भर्त्सना करता दिखता है, और समुदाय विशेष ने की तब भी हिन्दू ही। कट्टरपंथी तब ही जमा होता है जब जयपुर के पुलिस कॉन्स्टेबल की छड़ी गलती से किसी समुदाय विशेष के दम्पत्ति को छू जाती है, और एक भीड़ पुलिस स्टेशन से लेकर शहर की गाड़ियों में आग लगा देती है।

इसलिए, जब आप इस्लामोफोबिया की परिभाषा में आतंकवादी द्वारा स्वयं को घोषित तौर पर ‘शांतिप्रिय’ कहने, मजहब के नाम पर खुद को शहीद बनाने, मजहब का सबसे पाक नारा चिल्लाने वाले का नाम और मजहब बताने को ही रख देते हैं, तब तो पूरी दुनिया इस्लामोफोब है। यहाँ घाव हड्डी तक पहुँच गया है और आप कह रहे हैं कि इसे फूल कहो, सोचो कि तुम बगीचे में टहल रहे हो! नहीं, ये कैंसर है और ये शरीर को भीतर से नष्ट करता जा रहा है।

समुदाय को स्वयं समझना होगा इस समस्या को

राजनैतिक तरीकों से परे, पूरी तब्दीली तब ही आएगी जब समुदाय के भीतर से ऐसी आवाजें उठेंगी। इससे इनकार नहीं कि मजहब का हर आदमी इसे मौन सहमति नहीं देता। उसी मजहब के कई लोग हैं जो लगातार लिखते और बोलते हैं। लेकिन वो बहुत ही कम हैं। दूसरी बात यह भी है कि जिस दिन समुदाय विशेष से एक व्यक्ति मुखर होना चाहता है, उसे अपने ही समुदाय से प्रतिबंध से लेकर ब्लासफेमी जैसी चीजों से रूबरू होना पड़ता है। मजहब विशेष के ऐसे उदारवादियों को न तो वामपंथी जगह देते हैं, न उनका अपना समुदाय।

सेंसिबल लोगों को जब सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिलेगी, तो फिर हमारी नाली कोई दूसरा कब तक साफ करता रहेगा, और क्यों साफ करेगा? आप आतंकवाद तो छोड़िए, तीन तलाक से लेकर हलाला जैसी बातों पर अगर सुधार लाने की बात करते हैं तो समुदाय के स्वघोषित ठेकेदार आपको सामूहिक रूप से घेर लेते हैं और बताते हैं कि ये बहुत वैज्ञानिक बात है, ये मजहब का मसला है, तुम्हें इससे क्या!

अम्बेदकर ने हिन्दू समाज की कई बातों पर लगातार बोला और हिन्दुओं ने उन्हें नकारने की जगह सर पर बिठाया, स्वीकारा। आज भी उनकी बातों पर चर्चा होती है, हिन्दू ही इस चर्चा में शामिल होता है, अपने ही गाँव-समाज की कुप्रथाओं से लड़ता है। अगर आज की तारीख में अंबेदकर जैसा कोई मजहब विशेष का व्यक्ति इन बातों पर बोलना चाहेगा तो उसे कोई भी रिफॉर्मर या क्रांतिकारी नहीं कहेगा, उसके सर पर इनाम रखे जाएँगे, उसे सरे-बाजार मारा ही नहीं जाएगा बल्कि जश्न मनाया जाएगा कि मजहब के दुश्मन को रास्ते से हटा दिया गया।

ट्रम्प के शब्द हर बड़े राष्ट्राध्यक्ष को दोहराना चाहिए

चाहे वो मोदी हों, मर्कल हों, मैक्राँ हों, जॉनसन हो या कोई वैसा राष्ट्र जो यह नहीं चाहता कि उसके किसी एयरपोर्ट पर, चर्च में, सड़क पर, पार्क में, मंदिर पर या बस-ट्रेन में बम फूटे, छुरा चले, ट्रकों से लोगों को रौंदा जाए, तो सबसे पहला काम तो वो यह करें कि एक स्वर में इस मुसीबत को उसके पूरे नाम से स्वीकारें कि हाँ, कट्टरपंथी आतंकवाद ने इन सारे देशों में दहशत फैलाई है, जानें ली है, परिवारों को तोड़ा है।

जब तक स्वीकारोक्ति नहीं होगी, तब तक इससे लड़ने की हर योजना विफल होती रहेगी। जब तक आप इन आतंक की फैक्टरियों को निशाना नहीं बनाएँगे, मजहब की आड़ में आतंकी समूह चलाते नामों की फंडिंग नहीं रोकेंगे, आतंकियों को अपने देश के लिए, दूसरे देशों को अस्थिर करने हेतु एसेट की तरह पालना नहीं छोड़ेंगे, इन्हें बचपन से ही ऐसी शिक्षा से दूर नहीं करेंगे जो इन्हें भविष्य में सुसाइड जैकेट पहनने पर भी परेशान नहीं करता, तब तक आप लाशें गिनते रहेंगे और ये जान लीजिए कि लोन वूल्फ अटैक हो या पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से किए गए हमले, वो नहीं रुकेंगे।

दाऊद इब्राहिम से शरद पवार के संबंध जगजाहिर, उनके CM रहते ही भागे थे मुंबई धमाकों के आरोपित: पूर्व रॉ अधिकारी

दाऊद इब्राहिम और उसकी डी कंपनी से कई नामचीनों के तार जुड़े होने का अंदेशा समय-समय पर लगता रहता है। अब रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने इस संबंध में बड़ा खुलासा किया है। एनके सूद के अनुसार एनसीपी के मुखिया शरद पवार और कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के बेहद करीबी माने जाने वाले पार्टी सांसद अहमद पटेल के दाऊद से करीबी संबंध थे।

कॉन्ग्रेस और एनसीपी नेताओं से अपनी इसी करीबी का फायदा उठाकर अंडरवर्ल्ड डॉन देश से भाग निकलने में कामयाब रहा। उसे पकड़ कर लाने के खुफिया ऑपरेशन भी इसकी भेंट चढ़े। 1993 मुंबई ब्लास्ट के इस गुनहार को केंद्र सरकार ने हाल ही में यूएपीए कानून के तहत आतंकी घोषित किया है।

सूद ने एक साक्षात्कार में कहा कि जब दाऊद और मुंबई धमाकों के अन्य आरोपी देश से भागे, तब पवार मुख्यमंत्री थे। उनके मुताबिक धमाकों के बाद दाऊद और उसके गुर्गों के खिलाफ कानून-प्रवर्तन एजेंसियों ने सख्ती नहीं की। इस सबसे संकेत मिलते हैं कि शरद पवार और दाऊद के बीच संबंध थे। उन्होंने कहा, “यह जगजाहिर है कि शरद पवार के दाऊद इब्राहिम से संबंध थे।”

सूद ने पाकिस्तान को लेकर पवार के हालिया बयान का भी इस दौरान जिक्र किया। पवार ने हाल में पाकिस्तान को शांति प्रिय मुल्क बताते हुए कहा था कि भारत सरकार उसके खिलाफ दुष्प्रचार कर रही है। सूद ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के सरपरस्त मुल्क पाकिस्तान की तारीफ करने के पीछे पवार और दाऊद इब्राहिम के ही संबंध ही हैं। दाऊद के साथ उनका व्यापारिक संबंध भी रहा है।

पूर्व रॉ अधिकारी ने कहा कि बालाकोट एयरस्ट्राइक के वक्त पवार ने कहा कि हमला पाकिस्तान पर नहीं, जम्मू-कश्मीर पर हुआ है। जो शख्स कभी कॉन्ग्रेस का कद्दावर नेता रहा हो, कई महत्वपूर्ण मह​कमे सॅंभाल चुका हो और महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री रह चुका हो, उसका इस तरह बयान देना दिलचस्प है। उन्होंने कहा जब इस स्तर का नेता इस तरह के बयान देता है तो यह धारणा और मजबूत होती है कि इसके पीछे के कारण कुछ और हैं।

मुंबई में जब मार्च 1993 में 12 सिलसिलेवार धमाके हुए थे और सैकड़ों निर्दोष मारे गए थे, तब पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। सूद ने दावा किया कि उस वक्त पवार ने 12 की बजाए एक मस्जिद सहित 13 जगह धमाके होने की बात कह लोगों की आँखों में धूल झोंका था। उनके अनुसार, शायद वे पाकिस्तान और दाऊद इब्राहिम से देश का ध्यान भटकाना चाहते थे। इसके अलावा, सूद ने कहा कि जब जाँच एजेंसियों ने सरकार से दाऊद इब्राहिम की सम्पत्तियों को ज़ब्त करने के लिए कहा, तो पवार ने यह कहकर कि यहाँ दाऊद की कोई संपत्ति नहीं है इसमें अड़ंगा डाला।

सूद ने कहा कि दाऊद को पकड़ने में मनमोहन सरकार ने भी कोई रुचि नहीं दिखाई थी। रिटायर होने के बाद अजित डोभाल को उसे दुबई में गिरफ़्तार कर देश लाने के लिए बुलाया गया था। ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए दो अधिकारियों का चयन किया गया। जब डोभाल उन्हें हवाई अड्डे की ओर जाने वाली कार में ऑपरेशन के बारे में बता रहे थे, तो दिल्ली के डीएसपी ने उन्हें दुबई जाने और अपने ऑपरेशन को अंजाम देने से रोक दिया। इस तरह के एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन में, एक सरकारी कर्मचारी के अंतिम मिनट के हस्तक्षेप से पता चलता है कि कॉन्ग्रेस, एनसीपी और अन्य वरिष्ठ नेता नहीं चाहते थे कि दाऊद पकड़ा जाए।

दाऊद इब्राहिम के स्वैच्छिक आत्मसमर्पण की पेशकश के बारे में सूद ने दावा किया कि शरद पवार जैसे नेता और डी-कंपनी के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले नेता नहीं चाहते थे कि वे भारत लौटे। इससे शरद पवार समेत उससे जुड़े नेताओं को डर था कि दाऊद ने मुँह खोला तो उनका राजनीतिक करियर चौपट हो सकता है। सूद के अनुसार शरद पवार ने सरेंडर के बदले दाऊद इब्राहिम की मामूली माँगों को भी नहीं स्वीकार किया। उसने आर्थर जेल में रखने और थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट नहीं देने की माँग की थी।

पूर्व रॉ अधिकारी ने बताया कि कई कॉन्ग्रेस नेताओं, विशेष रूप से सोनिया गाँधी के करीबी अहमद पटेल का भी दाऊद इब्राहिम के साथ संबंध था। सूद के अनुसार कुछ प्रभावशाली लोगों जिनमें ज्यादातर राजनेता थे के दखल के कारण ही दाऊद देश से भागने में कामयाब हो पाया। उन्होंने कहा कि उस समय खाड़ी देशों में रॉ की यूनिट को जानबूझकर बर्बाद किया गया। इसमें रतन सहगल और हामिद अंसारी की भूमिका होने की बात उन्होंने कही। सहगल बाद में सीआईए का एजेंट साबित हुआ। बकौल सूद ये तथ्य संदेह पैदा करते हैं।

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से बंद 50 हजार मंदिर खोलने की तैयारी में सरकार, जल्द होगा सर्वे: गृह राज्यमंत्री

जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार सालों से बंद पड़े 50 हजार मंदिरों को खोलने की तैयारी में है। जानकारी के मुताबिक सरकार जल्द इन मंदिरों की पहचान करने के लिए सर्वेक्षण करवाने वाली है। इस खबर की पुष्टि खुद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने की है। उन्होंने बताया है कि जिन मंदिरों का सर्वेक्षण सरकार करवाने जा रही है, वो ऐसे मंदिर हैं, जिन्हें तोड़ा गया है या फिर उनकी मूर्तियाँ खंडित की गई हैं। इसके अलावा गृह राज्य मंत्री ने जानकारी देते हुए बताया कि मंदिरों के साथ घाटी में लंबे वक्त से बंद पड़े स्कूलों को भी दोबारा खोलने के लिए भी सर्वेक्षण कराया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “हमने कश्मीर घाटी में बंद पड़े स्कूलों के सर्वे के लिए एक कमिटी का गठन किया है, जिन्हें दोबारा खोला जाएगा। इसके अलावा पिछले कुछ सालों में करीब 50 हजार मंदिर बंद हुए हैं, जिनमें से कुछ नष्ट हो गए थे और मूर्तियाँ टूटी हुई हैं। हमने ऐसे मंदिरों के सर्वे का भी आदेश दिया है। “

इस दौरान गृह राज्य मंत्री रेड्डी ने घाटी में सिनेमा खोलने के बारे में भी बात कही। उन्होंने कहा, “घाटी में पिछले 20 सालों से कोई सिनेमा नहीं खुला हुआ है, इसलिए हम एक सिनेमा खोलने की भी सोच रहे हैं। हम उन स्कूलों, सिनेमाघरों और मंदिरों का सर्वेक्षण करवाएँगे जिन्हें बंद कर दिया गया है।”

इसके अलावा उन्होंने मोदी सरकार के बारे में बताया कि मोदी सरकार कश्मीर में आतंकवाद मिटाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए ऑपरेशन भी चलाया जा रहा है। हमारी सरकार घाटी से नफरत को जड़ से खत्म करके रहेगी।

गौरतलब है कि दशकों तक घाटी में आतंकवाद के कारण पलायन के लिए मजबूर हुए कश्मीरियों के विस्थापन के बाद कई मंदिरों को वहाँ बंद कर दिया गया था और आतंकियों ने बड़ी तादाद में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार करने के साथ मूर्तियों को भी खंडित किया था। यहाँ मंदिरों में तोड़फोड़ हुई थी और उनके द्वार भी बंद कर दिए गए थे। इन मंदिरों में शोपियाँ के भगवान विष्णु और पहलगाम में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर भी हैं। जिन्हें अब सरकार खोलने की तैयारी में है।