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आतंक का एक मजहब है: एक ने स्वीकारा, आप भी स्वीकारिए

‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम के दौरान बहुत सी चीजें कही गईं, दिखीं और दिखाई गईं। मोदी के लिए एक भीड़ आई थी, जिसे कुछ कुख्यात पत्रकार रोहिंग्या और बांग्लादेशी भीड़ सदृश बताते हुए लेख लिखते पाए गए। फर्क बस यही है कि ऐसे पत्रकार अब इतना नीचे गिर चुके हैं कि इनके लिए राह चलते थूकना और सड़क पर छुरा मारना, एक ही अपराध है जो कि इन्होंने पहले भी बताया है कि ‘जय श्री राम’ कहलवाने पर किसी को मजबूर करना ‘हिन्दू आतंकवाद’ है, जबकि इस्लामी आतंक तो आज तक आ ही नहीं सका भारत में।

खैर, ट्रम्प न तो एनडीटीवी के स्टूडियो में काम करता है, न ही उसे इस बात से फर्क पड़ता है कि आतंकवाद के साथ समुदाय विशेष को जोड़ने पर उसे लिबरल या वामपंथी लॉबी क्या कहेगी। अमेरिकी टॉक शो को मसाला भले ही मिल जाएगा, वो उसे रेसिस्ट और कम्यूनल भले ही कह देंगे, लेकिन उससे यह सच्चाई जो है, वो नहीं बदल सकती कि आईसिस के झंडे पर ‘अल्लाहु अकबर’ लिखा हुआ है और पूरा विश्व कट्टरपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक से जल रहा है।

इसलिए, लिबरलों के स्थानविशेष से धुँआ और आग भले ही निकल रहा हो, लेकिन वो सिवाय चार स्वनिर्मित वाक्यांशों के, जो बहुत मीठे शब्दों में भी शुतुर्मुर्ग की गर्दन रेत में होने जैसा से लेकर ‘हेड इन आस’ के लक्षण ही हैं, कि ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’, ‘हम ऐसा करके इस्लामोफोबिया फैला रहे हैं’, ‘ऐसा करने से हम एक समुदाय को अलग-थलग ढकेल रहे हैं’, और कुछ कह भी नहीं सकते।

आप इन वाक्यांशों पर गौर कीजिए कि ये आखिर कहना क्या चाहते हैं? आतंक का कोई मजहब नहीं होता? सच्ची? फिर इन हमलों को देखिए और बताइए कि इनकी जड़ में क्या है? क्या यहाँ इस्लामी कट्टरपंथ नहीं है जिसे पूरी दुनिया खिलाफत के नीचे चाहिए या वो आज तक पता नहीं किस हमले का बदला पूरे विश्व के बड़े शहरों में निर्दोषों को मार कर लेते हैं?

इन्हीं आतंकियों ने बेल्जियम से लेकर फ़्रांस तक, मैड्रिड, बार्सीलोना, मैन्चेस्टर, लंदन, ग्लासगो, मिलान, स्टॉकहोम, फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट, दिजों, कोपेनहेगन, बर्लिन, मरसाई, हनोवर, सेंट पीटर्सबर्ग, हैमबर्ग, तुर्कु, कारकासोन, लीज, एम्सटर्डम, अतातुर्क एयरपोर्ट, ब्रुसेल्स, नीस, पेरिस में या तो बम धमाके किए या लोन वूल्फ अटैक्स के ज़रिए ट्रकों और कारों से लोगों को रौंद दिया। हर बार आईसिस या कोई इस्लामी संगठन इसकी ज़िम्मेदारी लेता रहा और यूरोप का हर राष्ट्र अपनी निंदा में ‘इस्लामोफोबिक’ कहलाने से बचने के लिए इसे सिर्फ आतंकी वारदात कहता रहा।

पिछले पाँच सालों में यूरोप में 20 से ज़्यादा बड़े आतंकी हमले

पिछले पाँच सालों में यूरोप में 20 से ज़्यादा बड़े आतंकी हमले हुए हैं, जिसमें महज़ 18 महीने में 8 हमले सिर्फ फ़्रान्स में हुए। इस्ताम्बुल में तीन बार बम विस्फोट और शूटिंग्स हुईं। बेल्जियम, जर्मनी, रूस और स्पेन इनके निशाने पर रहे। यूरोपोल द्वारा 2017 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार आईसिस ने यूरोप में आतंकी हमलों के लिए वहाँ शरण पाने वाले कट्टरपंथियों की मदद ली। स्वीडन की न्यूज एजेंसी टिडनिन्गारनास टेलिग्रामबायरा के अनुसार पश्चिमी यूरोप में हुए 37 हमलों में दो तिहाई हमलावर (68 में से 44) घृणा फैलाने वाले लोगों के प्रभाव में आकर हमला करने को तैयार हुए। उनका रेडिकलाइजेशन ऑनलाइन नहीं था, बल्कि उन्हें निजी तौर पर मिलने के बाद ऐसा करने को कहा गया, और वो तैयार हुए।

फिर भी इसे हम इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद न कह कर सिर्फ आतंकवाद कहते रहेंगे। आखिर आतंकवाद के पहले के दो शब्द क्यों जरूरी हैं? इसके लिए हमें यह समझना होगा कि किसी भी चीज का सामान्यीकरण कैसे होता है। पहले कच्ची सड़कें होती थीं, तो पक्की सड़क को हम पक्की सड़क कहते थे। फिर वो इतनी आम हो गई कि सड़क का मतलब ही पक्की सड़क हो गया, जो कि सपाट हो, बिना तोड़-फोड़ के। कई चीजों को हम ‘सरकारी’ जब कहते हैं तो हम उसे यह जताने के लिए कहते हैं कि वो बेकार हालत में होगी।

जैसे कि बिहार सरकार मर्सीडीज की बसें भी चलाती है, लेकिन जब कोई आपको कहे कि सरकारी बस से चलेंगे तो आपकी रूह काँप जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ कि शुरु में अच्छी रही सेवाएँ, कालांतर में बुरी होती गईं और उसके पहले एक विशेषण लगा क्योंकि अधिकांशतः उसकी हालत, या उसका अर्थ उसी संदर्भ में रहा जिसके लिए हम उसे सामान्य रूप में बोलते हैं। सरकारी बस बेकार ही होगी, सरकारी अस्पताल बेकार होंगे… जबकि अपवाद स्वरूप आपको दोनों ही सेवाओं में बेहतर उदाहरण मिलेंगे। जैसे कि एम्स या बिहार की मर्सीडीज बसें।

इसी तरह, जब आतंकवाद के पीछे, लगभग हर बार, एक ही मजहबी परचम हो, एक ही नारा हो, और एक ही तरह के लोग हों, जो एक ही मजहब के नाम पर ऐसा करते हों तो फिर आपका उसे सिर्फ आतंकवाद कहना समस्या को बदतर ही बनाता है। किसी भी रोग को दूर करने के लिए पहले उसके कारणों को पहचानना जरूरी है। जैसे कि मधुमेह है, और आप मीठा ज्यादा खाते हैं, लेकिन आपका डॉक्टर यह कहे कि इन्हें एक रोग है, हम इलाज करेंगे। रोग का कारण मीठा है, और आप उसे पूरी तरह से छोड़ते हुए, निकल लेंगे, तो उसका इलाज नहीं हो पाएगा। रोगी को भी नहीं पता कि मीठा खाने से हो रहा है, घरवालों को भी नहीं पता, तो फिर उसके भोजन में रसगुल्ले देते रहिए और सोचते रहिए कि डॉक्टर की दवाई काम करती रहेगी।

मजहबी आतंकवाद के साथ यही हो रहा है। जब तक कट्टरपंथी शिक्षा, बच्चों और किशोरों के जेहन में एक मज़हबी सर्वश्रेष्ठता का झूठा दम्भ, हर गैर-मजहबी व्यक्ति को दुश्मन मानने की जिद, मजहब के नाम पर कत्लेआम को जन्नत जाने का मार्ग बताना और इस तरह की बेहूदगी बंद नहीं की जाएगी तो दुनिया जलती रहेगी। क्योंकि यहाँ एक कश्मीरी आतंकी मरता है तो उसका बाप शोक नहीं मनाता, वो हार्डवायर्ड है अपने मजहबी शिक्षा के कारण, उसका दिमाग रिपेयर होने के परे है, वो कहता है कि और बच्चे होते तो उन्हें भी कुर्बान कर देता।

ऐसी सोच पर आप कैसे लगाम लगाएँगे? यहाँ बच्चों के मरने की, आतंकी होने की ग्लानि कैसे होगी इस बाप को जिसने ताउम्र यही तालीम ली है कि धरती समुदाय विशेष की है और इसके हर समर्थक को पाँच काफिर ढूँढ कर उसे मजहबी बनाना ही उसका परम कर्तव्य है। वो आखिर क्यों नहीं कैमरे पर बोलेगा का कि मजहब की राह में और भी बच्चे कुर्बान कर दूँगा!

क्या मैं बिगट हूँ, कम्यूनल हूँ या तुमने अपनी मुंडी स्थानविशेष में घुसा ली है?

ये मैंने बहुत सुना है और मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सामने वाले मुझे बस इन्हीं शब्दों से ही घेर सकते हैं, इन शब्दों के बाद इनके पास, अपनी ही बात को संदर्भ सहित समझाने के लिए एक अक्षर तक नहीं मिलेगा। इन्होंने आतंक को हिन्दुओं से जोड़ने की पुरजोर कोशिश की। कोर्ट में मामले लंबित हैं, लेकिन इनके गिरोह ने अपनी ही सरकार में, अपनी ही पुलिस के साथ, कुछ हिन्दुओं पर आरोप लगाया और आरोप लगाने के साथ ही ऐलान कर दिया कि ये ‘हिन्दू आतंक’ है।

कोर्ट तो अपना काम खैर करती रहेगी, लेकिन क्या हमारे पास इतनी घटनाएँ हैं आतंक की, इसी देश में, जो मजहबी आतंक की भयावहता के समकक्ष हो, गिनती में उसके लाखवें हिस्से जितना भी हो कि हिन्दुओं का नाम आतंक से जोड़ दिया जाए? फिर, गैंग नए नैरेटिव पर उतर आता है। आतंक की परिभाषा में अब किसी समुदाय विशेष को थप्पड़ मारना, उससे ‘जय श्री राम’ कहलवाना भी आ जाता है और यह गिरोह गँड़थैय्यो नाच करने लगता है।

गिरोह चिल्लाने लगता है कि अगर ये आतंक नहीं तो और क्या है! जबकि आप इन चांडालों को, इन पतित पत्रकारों को, इन बरसाती सेलिब्रिटीज़ को, इन दोगले वामपंथियों को, इन पापी लिबरलों को, आप बेखौफ बता सकते हैं कि आतंक क्या है: आतंक है कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीर में ली गई 42,000 जानें और निर्वासित हुए लाखों कश्मीरी पंडित; आतंक है संकटमोचन मंदिर में फटा बम; आतंक है सरोजिनी नगर मार्केट का ब्लास्ट; आतंक है मुंबई लोकल ट्रेनों में हुए कई धमाके; आतंक मुंबई शहर में 2008 में विकराल रूप लेकर आया था; आतंक था संसद भवन में आरडीएक्स से भरी कार लेकर घुसना और बहादुर जवानों को मार देना; आतंक था उरी, पठानकोट, पुलवामा; आतंक है कोयम्बटूर की बॉम्बिंग; आतंक है रघुनाथ मंदिर पर हमला; मुंबई के बसों पर किए गए धमाके; आतंक है अक्षरधाम मंदिर को निशाना बनाना; आतंक है दिल्ली के सीरियल ब्लास्ट्स; आतंक है 2008 में हुए 11 कट्टरपंथी आतंकियों द्वारा किए गए हमले; आतंक है जयपुर के धमाके…

गिनते-गिनते थक जाओगे और सबकी जड़ में बड़ी ईमानदारी से अपने संगठन का नाम लेता हुआ समुदाय विशेष का शांतिप्रिय मिल जाएगा कि काफिरों का यही हश्र होगा। भारत में 1970 से अब तक लगभग 20,000 मौत और 30,000 घायलों में से सबसे बड़ा प्रतिशत मजहबी आतंक के नाम दर्ज है। इसलिए, जब आतंक के नाम कोई मजहब ट्रम्प जोड़ता है तो वो भारतीय और वैश्विक, दोनों ही, परिदृश्यों में सोलह आने सच हैं।

इस्लामोफोबिया क्या है? आतंकवाद के मूल कारणों को गिनाना घृणा कैसे फैलाता है?

किसी को ‘इस्लामोफोबिया’ से ग्रस्त बताना या उसे ‘इस्लामोफोब’ कहना कहाँ तक सही है अगर वो सत्य बोल रहा हो? अगर भारत में 2018 से अभी तक बीफ माफिया ने बीस लोगों को मार दिया और मारने वाले हमेशा समुदाय विशेष के थे, मरने वाले हमेशा हिन्दू, और आप ये आँकड़ा रख देंगे तो क्या ये मजहब से घृणा हो गई? क्या यह एक सच्चाई नहीं है कि अपराधी हर धर्म और मजहब में होते हैं? अगर कठुआ की बच्ची का बलात्कार करने वाले आठ लोग हिन्दू थे, तब तो सारे हिन्दू, पूरा हिन्दू धर्म और ‘हिन्दुस्तान’ ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया था, जबकि दसियों मौलवियों द्वारा, मस्जिदों और घरों के अंदर बच्चियों का यौन शोषण और बलात्कार होता रहा, तब मजहब और उनका लीडर तो बलात्कारी नहीं बताया गया?

ये कौन सा फोबिया है? और क्या हम एक दूसरे को ‘इस्लामोफोब’ और ‘हिन्दूफोब’ बता कर बाता-बाती करते रहेंगे या हम ये स्वीकारेंगे कि कई कट्टरपंथी शरीर पर बम लपेट कर, मजहबी नारा लगाते हुए बाजारों में फट रहे हैं? क्या हमने वो तमाम वीडियो नहीं देखे हैं जहाँ आदमी एक मजहबी नारा लगाता है, और लोग जान ले कर भागने लगते हैं? आखिर एक मजहबी नारे से मजहब कब अलग हुआ और उसे इन्हीं आतंकियों के कारण, इसी मजहब के मानने वालों ने भी दहशत और डर का नारा कब मान लिया, क्यों मान लिया, ये आपको नहीं पता? या आप पता करना ही नहीं चाहते?

आप हजार धमाकों का गुनाह, उस एक अपराध के बराबर कर देंगे जहाँ किसी निरीह कथित अल्पसंख्यक को ‘जय श्री राम’ बोलने पर चार लुच्चे हिन्दुओं ने मजबूर किया और उसके बाद आप दस खबरें ऐसी ले आएँगे जहाँ हर बार ‘जय श्री राम नहीं बोलने पर हिन्दुओं ने पीटा’ की हर खबर झूठी साबित होगी? क्या मैं आपको यह कहूँ कि तुम मुझे चार थप्पड़ मार लो और मैं ‘अल्लाहु अकबर’ बोल देता हूँ, और मैं तुम्हारे घर में बम फोड़ कर दस लोगों को मार दूँगा, तो आप इसे बराबर की बात मान लेंगे?

ये जो फर्जी की बातें कुछ मजहब के लोग करते हैं कि ये आतंकी ‘असली शांतिप्रिय’ नहीं है, सच्चे इस्लाम को नहीं जानते, वो हर आतंकी हमले पर स्वतः ऐसा क्यों नहीं कहते कि इस्लाम के नाम पर जो ये नवयुवक बाज़ारों में फट रहे हैं, वो मजहब का नाम खराब कर रहे हैं? क्या इन्होंने इस बात को कभी स्वीकारा है कि ये लोग एक तय तरीके से तैयार किए जाते हैं? क्या इन तथाकथित अच्छे और सच्चे ‘शंतिप्रियों’ ने सोशल मीडिया, पब्लिक जगहों पर, उसी तरह एक लाख की भीड़ जुटाई है जैसी वो कथित चोर तबरेज की मौत पर जुटाते हैं?

ऐसा नहीं होता, ऐसा नहीं दिखता कि लाखों की इस्लामी भीड़ मथुरा के भारत यादव की भीड़ हत्या पर, चौक चौराहों पर निकल आती है और कहती है कि वो इस भीड़ हत्या के खिलाफ हैं। सोशल मीडिया पर एक नजर घुमा लीजिए कि अगर हिन्दुओं ने भीड़ हत्या की तब भी हिन्दू ही उसकी भर्त्सना करता दिखता है, और समुदाय विशेष ने की तब भी हिन्दू ही। कट्टरपंथी तब ही जमा होता है जब जयपुर के पुलिस कॉन्स्टेबल की छड़ी गलती से किसी समुदाय विशेष के दम्पत्ति को छू जाती है, और एक भीड़ पुलिस स्टेशन से लेकर शहर की गाड़ियों में आग लगा देती है।

इसलिए, जब आप इस्लामोफोबिया की परिभाषा में आतंकवादी द्वारा स्वयं को घोषित तौर पर ‘शांतिप्रिय’ कहने, मजहब के नाम पर खुद को शहीद बनाने, मजहब का सबसे पाक नारा चिल्लाने वाले का नाम और मजहब बताने को ही रख देते हैं, तब तो पूरी दुनिया इस्लामोफोब है। यहाँ घाव हड्डी तक पहुँच गया है और आप कह रहे हैं कि इसे फूल कहो, सोचो कि तुम बगीचे में टहल रहे हो! नहीं, ये कैंसर है और ये शरीर को भीतर से नष्ट करता जा रहा है।

समुदाय को स्वयं समझना होगा इस समस्या को

राजनैतिक तरीकों से परे, पूरी तब्दीली तब ही आएगी जब समुदाय के भीतर से ऐसी आवाजें उठेंगी। इससे इनकार नहीं कि मजहब का हर आदमी इसे मौन सहमति नहीं देता। उसी मजहब के कई लोग हैं जो लगातार लिखते और बोलते हैं। लेकिन वो बहुत ही कम हैं। दूसरी बात यह भी है कि जिस दिन समुदाय विशेष से एक व्यक्ति मुखर होना चाहता है, उसे अपने ही समुदाय से प्रतिबंध से लेकर ब्लासफेमी जैसी चीजों से रूबरू होना पड़ता है। मजहब विशेष के ऐसे उदारवादियों को न तो वामपंथी जगह देते हैं, न उनका अपना समुदाय।

सेंसिबल लोगों को जब सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिलेगी, तो फिर हमारी नाली कोई दूसरा कब तक साफ करता रहेगा, और क्यों साफ करेगा? आप आतंकवाद तो छोड़िए, तीन तलाक से लेकर हलाला जैसी बातों पर अगर सुधार लाने की बात करते हैं तो समुदाय के स्वघोषित ठेकेदार आपको सामूहिक रूप से घेर लेते हैं और बताते हैं कि ये बहुत वैज्ञानिक बात है, ये मजहब का मसला है, तुम्हें इससे क्या!

अम्बेदकर ने हिन्दू समाज की कई बातों पर लगातार बोला और हिन्दुओं ने उन्हें नकारने की जगह सर पर बिठाया, स्वीकारा। आज भी उनकी बातों पर चर्चा होती है, हिन्दू ही इस चर्चा में शामिल होता है, अपने ही गाँव-समाज की कुप्रथाओं से लड़ता है। अगर आज की तारीख में अंबेदकर जैसा कोई मजहब विशेष का व्यक्ति इन बातों पर बोलना चाहेगा तो उसे कोई भी रिफॉर्मर या क्रांतिकारी नहीं कहेगा, उसके सर पर इनाम रखे जाएँगे, उसे सरे-बाजार मारा ही नहीं जाएगा बल्कि जश्न मनाया जाएगा कि मजहब के दुश्मन को रास्ते से हटा दिया गया।

ट्रम्प के शब्द हर बड़े राष्ट्राध्यक्ष को दोहराना चाहिए

चाहे वो मोदी हों, मर्कल हों, मैक्राँ हों, जॉनसन हो या कोई वैसा राष्ट्र जो यह नहीं चाहता कि उसके किसी एयरपोर्ट पर, चर्च में, सड़क पर, पार्क में, मंदिर पर या बस-ट्रेन में बम फूटे, छुरा चले, ट्रकों से लोगों को रौंदा जाए, तो सबसे पहला काम तो वो यह करें कि एक स्वर में इस मुसीबत को उसके पूरे नाम से स्वीकारें कि हाँ, कट्टरपंथी आतंकवाद ने इन सारे देशों में दहशत फैलाई है, जानें ली है, परिवारों को तोड़ा है।

जब तक स्वीकारोक्ति नहीं होगी, तब तक इससे लड़ने की हर योजना विफल होती रहेगी। जब तक आप इन आतंक की फैक्टरियों को निशाना नहीं बनाएँगे, मजहब की आड़ में आतंकी समूह चलाते नामों की फंडिंग नहीं रोकेंगे, आतंकियों को अपने देश के लिए, दूसरे देशों को अस्थिर करने हेतु एसेट की तरह पालना नहीं छोड़ेंगे, इन्हें बचपन से ही ऐसी शिक्षा से दूर नहीं करेंगे जो इन्हें भविष्य में सुसाइड जैकेट पहनने पर भी परेशान नहीं करता, तब तक आप लाशें गिनते रहेंगे और ये जान लीजिए कि लोन वूल्फ अटैक हो या पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से किए गए हमले, वो नहीं रुकेंगे।

दाऊद इब्राहिम से शरद पवार के संबंध जगजाहिर, उनके CM रहते ही भागे थे मुंबई धमाकों के आरोपित: पूर्व रॉ अधिकारी

दाऊद इब्राहिम और उसकी डी कंपनी से कई नामचीनों के तार जुड़े होने का अंदेशा समय-समय पर लगता रहता है। अब रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने इस संबंध में बड़ा खुलासा किया है। एनके सूद के अनुसार एनसीपी के मुखिया शरद पवार और कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के बेहद करीबी माने जाने वाले पार्टी सांसद अहमद पटेल के दाऊद से करीबी संबंध थे।

कॉन्ग्रेस और एनसीपी नेताओं से अपनी इसी करीबी का फायदा उठाकर अंडरवर्ल्ड डॉन देश से भाग निकलने में कामयाब रहा। उसे पकड़ कर लाने के खुफिया ऑपरेशन भी इसकी भेंट चढ़े। 1993 मुंबई ब्लास्ट के इस गुनहार को केंद्र सरकार ने हाल ही में यूएपीए कानून के तहत आतंकी घोषित किया है।

सूद ने एक साक्षात्कार में कहा कि जब दाऊद और मुंबई धमाकों के अन्य आरोपी देश से भागे, तब पवार मुख्यमंत्री थे। उनके मुताबिक धमाकों के बाद दाऊद और उसके गुर्गों के खिलाफ कानून-प्रवर्तन एजेंसियों ने सख्ती नहीं की। इस सबसे संकेत मिलते हैं कि शरद पवार और दाऊद के बीच संबंध थे। उन्होंने कहा, “यह जगजाहिर है कि शरद पवार के दाऊद इब्राहिम से संबंध थे।”

सूद ने पाकिस्तान को लेकर पवार के हालिया बयान का भी इस दौरान जिक्र किया। पवार ने हाल में पाकिस्तान को शांति प्रिय मुल्क बताते हुए कहा था कि भारत सरकार उसके खिलाफ दुष्प्रचार कर रही है। सूद ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के सरपरस्त मुल्क पाकिस्तान की तारीफ करने के पीछे पवार और दाऊद इब्राहिम के ही संबंध ही हैं। दाऊद के साथ उनका व्यापारिक संबंध भी रहा है।

पूर्व रॉ अधिकारी ने कहा कि बालाकोट एयरस्ट्राइक के वक्त पवार ने कहा कि हमला पाकिस्तान पर नहीं, जम्मू-कश्मीर पर हुआ है। जो शख्स कभी कॉन्ग्रेस का कद्दावर नेता रहा हो, कई महत्वपूर्ण मह​कमे सॅंभाल चुका हो और महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री रह चुका हो, उसका इस तरह बयान देना दिलचस्प है। उन्होंने कहा जब इस स्तर का नेता इस तरह के बयान देता है तो यह धारणा और मजबूत होती है कि इसके पीछे के कारण कुछ और हैं।

मुंबई में जब मार्च 1993 में 12 सिलसिलेवार धमाके हुए थे और सैकड़ों निर्दोष मारे गए थे, तब पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। सूद ने दावा किया कि उस वक्त पवार ने 12 की बजाए एक मस्जिद सहित 13 जगह धमाके होने की बात कह लोगों की आँखों में धूल झोंका था। उनके अनुसार, शायद वे पाकिस्तान और दाऊद इब्राहिम से देश का ध्यान भटकाना चाहते थे। इसके अलावा, सूद ने कहा कि जब जाँच एजेंसियों ने सरकार से दाऊद इब्राहिम की सम्पत्तियों को ज़ब्त करने के लिए कहा, तो पवार ने यह कहकर कि यहाँ दाऊद की कोई संपत्ति नहीं है इसमें अड़ंगा डाला।

सूद ने कहा कि दाऊद को पकड़ने में मनमोहन सरकार ने भी कोई रुचि नहीं दिखाई थी। रिटायर होने के बाद अजित डोभाल को उसे दुबई में गिरफ़्तार कर देश लाने के लिए बुलाया गया था। ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए दो अधिकारियों का चयन किया गया। जब डोभाल उन्हें हवाई अड्डे की ओर जाने वाली कार में ऑपरेशन के बारे में बता रहे थे, तो दिल्ली के डीएसपी ने उन्हें दुबई जाने और अपने ऑपरेशन को अंजाम देने से रोक दिया। इस तरह के एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन में, एक सरकारी कर्मचारी के अंतिम मिनट के हस्तक्षेप से पता चलता है कि कॉन्ग्रेस, एनसीपी और अन्य वरिष्ठ नेता नहीं चाहते थे कि दाऊद पकड़ा जाए।

दाऊद इब्राहिम के स्वैच्छिक आत्मसमर्पण की पेशकश के बारे में सूद ने दावा किया कि शरद पवार जैसे नेता और डी-कंपनी के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले नेता नहीं चाहते थे कि वे भारत लौटे। इससे शरद पवार समेत उससे जुड़े नेताओं को डर था कि दाऊद ने मुँह खोला तो उनका राजनीतिक करियर चौपट हो सकता है। सूद के अनुसार शरद पवार ने सरेंडर के बदले दाऊद इब्राहिम की मामूली माँगों को भी नहीं स्वीकार किया। उसने आर्थर जेल में रखने और थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट नहीं देने की माँग की थी।

पूर्व रॉ अधिकारी ने बताया कि कई कॉन्ग्रेस नेताओं, विशेष रूप से सोनिया गाँधी के करीबी अहमद पटेल का भी दाऊद इब्राहिम के साथ संबंध था। सूद के अनुसार कुछ प्रभावशाली लोगों जिनमें ज्यादातर राजनेता थे के दखल के कारण ही दाऊद देश से भागने में कामयाब हो पाया। उन्होंने कहा कि उस समय खाड़ी देशों में रॉ की यूनिट को जानबूझकर बर्बाद किया गया। इसमें रतन सहगल और हामिद अंसारी की भूमिका होने की बात उन्होंने कही। सहगल बाद में सीआईए का एजेंट साबित हुआ। बकौल सूद ये तथ्य संदेह पैदा करते हैं।

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से बंद 50 हजार मंदिर खोलने की तैयारी में सरकार, जल्द होगा सर्वे: गृह राज्यमंत्री

जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार सालों से बंद पड़े 50 हजार मंदिरों को खोलने की तैयारी में है। जानकारी के मुताबिक सरकार जल्द इन मंदिरों की पहचान करने के लिए सर्वेक्षण करवाने वाली है। इस खबर की पुष्टि खुद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने की है। उन्होंने बताया है कि जिन मंदिरों का सर्वेक्षण सरकार करवाने जा रही है, वो ऐसे मंदिर हैं, जिन्हें तोड़ा गया है या फिर उनकी मूर्तियाँ खंडित की गई हैं। इसके अलावा गृह राज्य मंत्री ने जानकारी देते हुए बताया कि मंदिरों के साथ घाटी में लंबे वक्त से बंद पड़े स्कूलों को भी दोबारा खोलने के लिए भी सर्वेक्षण कराया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “हमने कश्मीर घाटी में बंद पड़े स्कूलों के सर्वे के लिए एक कमिटी का गठन किया है, जिन्हें दोबारा खोला जाएगा। इसके अलावा पिछले कुछ सालों में करीब 50 हजार मंदिर बंद हुए हैं, जिनमें से कुछ नष्ट हो गए थे और मूर्तियाँ टूटी हुई हैं। हमने ऐसे मंदिरों के सर्वे का भी आदेश दिया है। “

इस दौरान गृह राज्य मंत्री रेड्डी ने घाटी में सिनेमा खोलने के बारे में भी बात कही। उन्होंने कहा, “घाटी में पिछले 20 सालों से कोई सिनेमा नहीं खुला हुआ है, इसलिए हम एक सिनेमा खोलने की भी सोच रहे हैं। हम उन स्कूलों, सिनेमाघरों और मंदिरों का सर्वेक्षण करवाएँगे जिन्हें बंद कर दिया गया है।”

इसके अलावा उन्होंने मोदी सरकार के बारे में बताया कि मोदी सरकार कश्मीर में आतंकवाद मिटाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए ऑपरेशन भी चलाया जा रहा है। हमारी सरकार घाटी से नफरत को जड़ से खत्म करके रहेगी।

गौरतलब है कि दशकों तक घाटी में आतंकवाद के कारण पलायन के लिए मजबूर हुए कश्मीरियों के विस्थापन के बाद कई मंदिरों को वहाँ बंद कर दिया गया था और आतंकियों ने बड़ी तादाद में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार करने के साथ मूर्तियों को भी खंडित किया था। यहाँ मंदिरों में तोड़फोड़ हुई थी और उनके द्वार भी बंद कर दिए गए थे। इन मंदिरों में शोपियाँ के भगवान विष्णु और पहलगाम में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर भी हैं। जिन्हें अब सरकार खोलने की तैयारी में है।

परमादरणीय रवीश कुमार, भारत का दिल छोटा नहीं, आपकी नीयत में खोट है

एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने ह्यूस्टन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाल रैली का मज़ाक बनाया है। एक फेसबुक पोस्ट में सोशल मीडिया को गाली देने वाले रवीश कुमार ने ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ की बात करते हुए यह दिखाना चाहा कि अमेरिका में भारत से ज्यादा लोकतंत्र है। अब रवीश से यह पूछने भला कौन जाएगा कि उनके लिए लोकतंत्र को मापने का पैमाना क्या है? लोकतंत्र में कितनी मात्रा में नमक-मिर्ची होनी चाहिए, यह तो रवीश ही बता पाएँगे क्योंकि उसी अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत की, मोदी की जम कर प्रशंसा की है।

रवीश कुमार अमेरिका के बारे में कहते हैं कि वहाँ इतना लोकतंत्र हैं कि आप वहाँ जाकर बस सकते हैं, वहाँ की नागरिकता ले सकते हैं और चुनाव लड़ कर सांसद भी बन सकते हैं। लेकिन, क्या रवीश प्रवासी और ‘अवैध प्रवासी’ के बीच का अंतर समझते भी हैं? आज जब अमेरिका ख़ुद अवैध प्रवासियों को निकाल बाहर करने के लिए कृतसंकल्पित दिख रहा है, रवीश अवैध प्रवासियों के बसने को लोकतंत्र मापने का पैमाना बना रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘हाउडी मोदी’ में अवैध प्रवासियों के बारे में क्या कहा, इसे जानने से पहले एक आँकड़े पर नज़र डालिए।

रवीश कुमार ने अपने लेख में भारतीयों को कमतर बताया

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका अवैध प्रवासियों को देश से निकाल बाहर करने में अव्वल रहा है। 2016-18 में अमेरिका ने क़रीब सवा 7 लाख अवैध आप्रवासियों को निकाल बाहर किया। 2016 में 2,40,255 आप्रवासी निकाल बाहर किए गए। वहीं 2017 और 2018 में यह आँकड़ा क्रमशः 2,26,119 और 2,56,085 रहा। अब हो सकता है कि रवीश जिस थर्मामीटर का इस्तेमाल कर के लोकतंत्र को माप रहे हों, उसमें यह आए कि डोनाल्ड ट्रम्प कम लोकतान्त्रिक हैं और ओबामा ज्यादा। अगर ऐसा है तो रवीश को बताया जाना चाहिए कि 2012 में बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहते 4,09,849 अवैध आप्रवासियों को डिपोर्ट किया गया। इस संख्या को छूने में तो ट्रम्प प्रशासन भी नाकाम रहा है।

रवीश लिखते हैं कि अमेरिका की किसी भी संस्था में भारतीय अपनी प्रतिभा के दम पर जगह बना सकते हैं। क्या भारतीय कम्पनियाँ टॉस कर के कर्मचारियों को हायर करती हैं? दुनिया के हर लोकतान्त्रिक देश में या कहीं भी, कोई भी अपनी प्रतिभा के दम पर ही किसी कम्पनी में जाता है और आगे बढ़ता है। लेकिन नहीं, रवीश की मानें तो अमेरिका में प्रतिभा के दम पर, जबकि भारत में सिक्का उछाल कर हायरिंग होती है। रवीश के अनुसार, मातृभूमि और पुण्यभूमि का सिद्धांत ‘बोगस’ है। जिस अमेरिका का हवाला देकर रवीश भारत के लोकतंत्र को कोस रहे हैं, उसी अमेरिका के राष्ट्रपति के शब्दों पर गौर करें।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी भारत और भारतीयों के लिए सचमुच असाधारण कार्य कर रहे हैं। विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र के मुखिया ने कहा कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग कड़ी मेहनत करते हैं और वे लगातार समृद्ध, संपन्न और विकसित हो रहे हैं। उन्होंने भारत के हालिया आम चुनाव की प्रशंसा करते हुए इसे सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक चुनाव बताया। ट्रम्प के अनुसार, अमेरिका में रहने वाले 40 लाख भारतीय अद्भुत हैं और वे वहाँ की संस्कृति को समृद्ध बना रहे हैं, मान बढ़ा रहे हैं और समाज की उन्नति में योगदान दे रहे हैं।

जिस देश में भारतीय रहे रहे हैं, उस देश का मुखिया उन्हें उनकी प्रतिभा, व्यवहार और कार्यों के कारण उन्हें रखना चाहता है। जबकि, रवीश पूछते हैं कि अगर अमेरिका ने भारतीयों को निकाल दिया तो? जैसा कि ट्रम्प ने कहा, अमेरिकी-भारतीय समाज अमेरिका पर गर्व करता है। कितने रोहिंग्या हैं जो भारतीय संस्कृति को अपनाते हैं, यहाँ के विकास में योगदान देते हैं या फिर यहाँ के लोगों को नौकरी देते हैं? ट्रम्प ने कहा कि भारतीय मूल के लोगों ने अमेरिका में काफ़ी रोजगार पैदा किया है। रवीश एक रोहिंग्या मुस्लमान का नाम बता दें, जिसनें भारतीयों को रोजगार दिया हो?

अमेरिका में भारतीय किसी की कृपा से नहीं रहते हैं, रवीश आख़िर यह कब समझेंगे? जबकि, भारत में आए दिन लूटपाट से लेकर अन्य आपराधिक वारदातों में शामिल रहने वाले रोहिंग्या यहाँ अवैध तरीके से बसे हुए हैं। भारत के लोगों की तुलना बांग्लादेश और म्यांमार से आने वाले रोहिंग्याओं से करने वाले रवीश को यह मालूम होना चाहिए कि भारतीय को अमेरिका अपने संसाधन पर बोझ इसलिए नहीं बताते क्योंकि सारे भारतीय वहाँ के नियम-क़ानून का पालन करते हुए उस देश की समृद्धि के लिए कार्य करते हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति यह स्वीकार कर रहे हैं कि भारतीयों से उनके मुल्क को फायदा है, जबकि रवीश अमेरिका के छद्म वकील का वेश धारण कर दावा करने में लगे हुए हैं कि भारत के लोग वहाँ के संसाधनों पर बोझ हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि सीमा को सुरक्षित करना दोनों ही देशों का लक्ष्य है, लेकिन रवीश उसी अमेरिका का उदाहरण देकर अप्रत्यक्ष रूप से भारत को सीख देते हैं कि भारत में विदेशी नागरिकों को अवैध तरीके बसना चाहिए, भले ही वे यहाँ आकर अपराध करें और समाज के विकास में कोई योगदान न दें।

भारत में जो सचमुच अल्पसंख्यक हैं, वे भी यहाँ उसी तरीके से रहते हैं, जैसे बाकी लोग। रवीश कहते हैं कि भारत में अगर कोई अमेरिकी आकर बस जाए तो उसे लोग शक की निगाहों से देखने लगेंगे, वो अपना व्यापार नहीं कर पाएगा। रवीश को इतिहास में जाकर पता करना चाहिए कि 7 लाख से भी अधिक लोगों को रोजगार देने वाले टाटा समूह की स्थापना किसने की थी और टाटा परिवार किस संप्रदाय से ताल्लुक रखता है? आपको बता दें कि टाटा परिवार पारसी हैं। अब रवीश बताएँ की रतन टाटा को भारत में कितने लोग शक की निगाह से देखते हैं और कौन उनके कारोबार में व्यवधान डाल रहा है? उनका लॉजिक यहीं फुस्स हो जाता है।

रवीश लिखते हैं कि भारत का आत्मविश्वास कमज़ोर है और हमारा दिल छोटा है। रवीश कुमार ने भारतीयों पर आरोप लगाया कि वह दुनिया भर में जाकर केवल खा रहे हैं लेकिन दुनिया को खिला नहीं रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा आरोप है। क्या अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अमेरिका का खा रहे हैं? यह एक अपमानजनक भाषा है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के शब्दों से रवीश को करारा तमाचा लग सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि भारतीय लोग अमेरिकी नागरिकों के जीवन की रक्षा कर रहे हैं। वे मेडिकल फील्ड में अनुसन्धान से जुड़े अभूतपूर्व कार्य कर रहे हैं और अनगिनत ज़िंदगियाँ बचा रहे हैं।

ट्रम्प कहते हैं कि भारतीय मूल के लोग अमेरिकी लोगों के जीवन रक्षक हैं, जबकि रवीश कहते हैं कि भारत के लोग अमेरिका का खा रहे हैं लेकिन बदले में खिला नहीं रहे हैं। ट्रम्प कहते हैं कि भारतीय मूल के लोगों ने हज़ारों अमेरिकी नागरिकों को रोज़गार दिया है, लेकिन रवीश पूछते हैं कि भारत के लोगों को अगर अमेरिका ने भगा दिया तो? अगर कोई व्यक्ति किसी देश में जाकर वहाँ के विकास, समृद्धि, सम्पन्नता में योगदान देते हुए वहाँ के नियम-क़ानूनों का पालन कर रहा है और वहाँ के नागरिकों की ज़िंदगी बचाने का काम कर रहा है, तो भला उसे क्यों भगाया जाएगा?

परिकल्पनाओं पर धारणा बनाने वाले वास्तविकता से दूर जा चुके रवीश कुमार को एक बार फिर से ‘हाउडी मोदी’ में डोनाल्ड ट्रम्प का भाषण सुनना चाहिए। उन्हें जवाब मिल जाएगा कि आखिर क्यों भारतीय लोग रोहिंग्या नहीं हैं, जो अवैध रूप से भारत में आकर बस जाएँ और यहाँ कोई योगदान ही न दें, उल्टा आपराधिक गतिविधियों में उनका नाम आए। रवीश आँकड़े देखें। या फिर रवीश अगर अमेरिका के बारे में उसके राष्ट्रपति और सरकार से भी ज्यादा जानते हैं तो फिर कोई बात नहीं।

370 के बाद अमित शाह ने रखा ‘एक पहचान’ का प्रस्ताव, आधार, पासपोर्ट, DL सब एक कार्ड में हो

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अब देश में एक पहचान पत्र का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा है कि इस पहचान पत्र में पासपोर्ट, आधार, और वोटर आईडी कार्ड सब कुछ समाहित होंगे। गृह मंत्री ने अपने प्रस्ताव में बैंक अकॉउंट को भी इसी कार्ड से जोड़ देने की सलाह दी है।

गृहमंत्री अमित शाह ने साल 2021 में होने वाली जनगणना को लेकर भी एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि आगामी वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना में मोबाइल ऐप का इस्तेमाल होगा। शाह ने कहा है कि इससे हमें कागज से डिजीटल जनगणना की तरफ जाने में मदद मिलेगी।

उन्होंने इस दौरान ये भी कहा कि एक ऐसा सिस्‍टम भी होना चाहिए कि यदि किसी शख्‍स की मौत हो जाए तो ऑटोमेटिक उसकी जानकारी पॉपुलेशन डाटा में अपडेट हो जाए।

उन्होंने दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान माँग की कि हम ऐसा कार्ड चाहते हैं जो सभी की जरूरतें जैसे आधार, पासपोर्ट, बैंक अकॉउंट, ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर आईडी की जरूरत को पूरा कर सके। जिसकी संभावनाएँ हैं।

अमित शाह ने बताया कि देश के पहले डिजिटल सेंसस पर कुल 12 हजार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। उन्होंने कहा, “जनगणना कोई बोरिंग काम नहीं होता है। इससे सरकार को अपनी स्‍कीम लोगों के लिए लागू करने में मदद मिलती है। राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर (NPR) कई मुद्दों को सुलझाने में सरकार की मदद करता है। ये देश के इतिहास में पहली बार होगा, जब जनगणना का काम ऐप के जरिए होगा”

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ देश में अभी आधार की अनिवार्यता पर जनमानस में लगातार बहस चल रही है। उस बीच गृहमंत्री ने पहचान पत्र का ये प्रस्‍ताव रखा है।

किश्तवाड़ में आतंकी अहमद शेख़, निसार और आज़ाद हुसैन गिरफ़्तार, BJP नेताओं की हत्या की गुत्थी सुलझी

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया है। इन आतंकवादियों की गिरफ़्तारी के साथ ही बीजेपी नेता चंद्रकांत शर्मा और उनके PSO की हत्या और एक अन्य बीजेपी नेता अनिल परिहार की हत्या की गुत्थी भी सुलझ गई है। गिरफ़्तार किए गए आतंकियों के पास से पुलिस ने हथियार व गोला बारूद भी बरामद किया है।

तीनों आतंकियों के बारे में पता चला है कि ये किश्तवाड़ में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हुए थे। आतंकियों की पहचान, निषाद अहमद शेख़, निसार और आज़ाद हुसैन के रूप में हुई है।

जम्मू क्षेत्र के आई जी मुकेश सिंह ने बताया, “पिछले एक साल में किश्तवाड़ में 4 आतंकी घटनाएँ हुईं। किश्तवाड़ पुलिस की लगातार कोशिश, सीआरपीएफ, सेना और NIA टीम की मदद से हमने ये चारो केस सुलझा लिए हैं।” इसके आगे उन्होंने बताया,

“हमने इन घटनाओं से जुड़े 3 लोगों को गिरफ़्तार किया है। ये आतंकी नेता चंद्रकांत शर्मा (बीजेपी) और उनके पीएसओ की हत्या में शामिल थे। गिरफ़्तार लोगों में से एक निसार अहमद शेख है जो बीजेपी नेता अनिल परिहार की हत्या की साज़िश में शामिल था।”

ख़बर के अनुसार, इस साल के अप्रैल महीने में बीजेपी के चंद्रकांत शर्मा और उनके पीएसओ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वहीं, पिछले साल 1 नवंबर को किश्तवाड़ ज़िले में बीजेपी के प्रदेश सचिव अनिल परिहार और उनके भाई की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

इससे पहले सांबा और कठुआ ज़िले में आतंकी हमले की आशंका के चलते हाई अलर्ट जारी किया गया था। जानकारी के अनुसार आतंकियों की ओर से सांबा और कठुआ समेत कुछ ज़िलों में दहशतगर्द बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के कोशिश में हैं। सुरक्षा एजेंसियों से मिली जानकारी में ख़ासतौर पर सैन्य क्षेत्रों को निशाना बनाए जाने की बात कही गई है।

सऊदी में रह रहा आतंकी अब्दुल वहाब शेख दबोचा गया, BJP नेता हरेन पांड्या की हत्या में था शामिल

साल 2003 में जिहादी गतिविधियों में शामिल मोस्ट वांटेड आतंकी अब्दुल वहाब शेख को पकड़कर गुजरात पुलिस ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। जानकारी के मुताबिक जेद्दाह (सऊदी अरब) से अहमदाबाद लौटने के दौरान पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर अब्दुल को हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया। वह साल 1999 से सऊदी अरब में रह रहा था। उस पर बीजेपी और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं की हत्या की साजिश रचने और आतंकी गतिविधियों के लिए पैसे भेजने का आरोप है।

क्राइम ब्रांच के एसीपी बीवी गोहिल ने बताया , “गुजरात एटीएस, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने आतंकी अब्दुल वहाब शेख को गिरफ्तार कर लिया है। सऊदी अरब के जेद्दाह से अहमदाबाद वापस आने पर उसे गिरफ्तार किया गया। उस पर 2003 के एक आतंकी साजिश के लिए धन मुहैया करने के आरोप हैं।”

उल्लेखनीय है कि साल 2003 में 3 नेताओं की हत्या की साजिश रची गई थी। साजिश के तहत जिन नेताओं पर हमला हुआ उनमें भाजपा नेता हरेन पांड्या एवं वीएचपी के नेता जयदीप पटेल और जगदीश पटेल का नाम शामिल थे। हरेन पांड्या की हत्या कर दी गई जबकि वीएचपी के दोनों नेता बच गए थे।

2003 के इस मामले में पुलिस ने 82 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। जिसमें 12 से ज्यादा आरोपित फरार थे। इनमें से कुछ भागने में विदेश कामयाब रहे थे। ऐसे में गुजरात के गृहमंत्री प्रदीप जाडेजा ने 16 साल बाद हुई गिरफ्तारी के लिए गुजरात एटीएस को बधाई दी है। उन्होंने कहा, “मैं गुजरात की आतंक निरोधी इकाई (एटीएस) को बधाई देता हूँ। आतंकी अब्दुल वहाब शेख से उसकी भूमिका पर पूरी तरह से पूछताछ की जाएगी।”

भरे सदन में नेहरू को सुनाने वाला राष्ट्रकवि जो चाहता था ‘हर-हर-बम’ का महोच्चार

भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का तैल चित्र संसद भवन में लगा हुआ है। उनका जन्म बिहार के बेगूसराय जिले स्थित सिमरिया गाँव में आज ही के दिन 1908 में हुआ था। लोकसभा चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से लेकर जेएनयू छात्र संगठन के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार तक वहाँ स्थित दिनकर के प्रतिमा पर लोकार्पण करने पहुँचे। ये तो रही राजनीति की बात। नेता वोट के लिए अक़्सर महापुरुषों का सम्मान करते रहते हैं। लेकिन, दिनकर किसी जाति, धर्म, विचारधारा और क्षेत्र से ऊपर के कवि थे। एक ऐसा लेखक, जो पद्य में महारथी था लेकिन जब गद्य लिखा तो वह भी ऐतिहासिक साहित्य बन गया।

रामधारी सिंह दिनकर समसामयिक समस्याओं के समाधान की तलाश के लिए लिखते थे। वह भारत-चीन युद्ध में भारत की हार पर क्रुद्ध होकर अपने विचारों को प्रकट करने के लिए अपने लेखनी का सहारा लेते थे। उनकी कृतियाँ ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के दौरान जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेता के लिए भी प्रेरणा बन जाती थीं और वह इसका उपयोग लाखों की भीड़ में ऊर्जा का संचार करने के लिए करते थे। वह राज्यसभा सांसद रहे। वह एक शिक्षाविद थे, जो भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। लेकिन, दिनकर की कृतियों में क्या अलग था?

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की एक बहुत बड़ी ख़ासियत यह थी कि इतिहास और भारतीय धर्म-ग्रंथों के मामले में उनका ज्ञान अभूतपूर्व था, जिसे जनमानस तक पहुँचाने के लिए उन्होंने अपनी लेखनी का सहारा लिया। वह बात-बात में किसी भी वर्तमान समस्या का समाधान ढूँढने के लिए द्वापर युग जा पहुँचते थे। ख़ुद उन्होंने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ और ‘कुरुक्षेत्र’ में ऐसा स्वीकारा है। जब कृष्ण से कर्ण संवाद कर रहा होता है तो उसकी बातों में दिनकर रिश्ते-नातों की महत्ता, त्याग की भावना और वैभव-विलास को लेकर एक उचित विचार-प्रक्रिया को बुन रहे होते हैं।

मनोज वाजपेयी की आवाज़ में ‘रश्मिरथी’ के कुछ अंश

जब मृत्युशैया पर पड़े भीष्म युधिष्ठिर से अपने जीवन के अनुभव साझा कर रहे होते हैं, तब उनके शब्दों में दिनकर शासन चलाने के तरीके और सत्तासीनों के लिए एक नियमावली तैयार कर रहे होते हैं। आज जब पीएम मोदी ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात करते हैं तो तालियाँ बजती हैं। लेकिन, दिनकर ने बिना पक्षपात किए सम्पदा और समृद्धि के मामले में जन-जन की समान भागीदारी सुनिश्चित करने और हर चीज में उनकी समान हिस्सेदारी की बात करते हुए ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखा था:

शान्ति नहीं तब तक; जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।

वामपंथी ही कुछ ऐसी ही बात करते हैं लेकिन उनकी विचारधारा में ‘जबरदस्ती’ है, ‘हिंसा’ है और ‘हर प्रकार की सत्ता से संघर्ष’ है, जिसके कारण यह एक तानाशाही रवैये को जन्म देता है, जहाँ दूसरों की बातें सुनी ही नहीं जाती। दिनकर की विचारधारा सभी पक्षों की राय विस्तृत रूप से जानने के बाद ही आकार लेती है। वह द्वापर से आती है। भारतीय संस्कृति से आती है, इतिहास से आती है, धर्म-ग्रंथों की कहानियों से आती है। ‘रश्मिरथी’ में जब स्वयं श्रीकृष्ण कर्ण को पांडव कुल में मिल जाने और बदले में पूरे भारतवर्ष का सम्राट बनने को कहते हैं तो वह अस्वीकार कर देता है। इसकी वजह है ‘दुर्योधन से उनकी मित्रता’। कर्ण दुर्योधन के स्नेह से अभिभूत है और दिनकर उसके शब्दों में मित्रता की परिभाषा कुछ इस तरह बताते हैं:

मैत्री की बड़ी सुखद छाया, शीतल हो जाती है काया,
धिक्कार-योग्य होगा वह नर, जो पाकर भी ऐसा तरुवर,
हो अलग खड़ा कटवाता है, खुद आप नहीं कट जाता है।
जिस नर की बाह गही मैने, जिस तरु की छाँह गहि मैने,
उस पर न वार चलने दूँगा, कैसे कुठार चलने दूँगा,
जीते जी उसे बचाऊँगा, या आप स्वयं कट जाऊँगा,
मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब उसे तोल सकता है धन?
धरती की तो है क्या बिसात? आ जाय अगर बैकुंठ हाथ।
उसको भी न्योछावर कर दूँ, कुरूपति के चरणों में धर दूँ।

काफ़ी सुन्दर तरीके से दिनकर ने कर्ण की भावनाओं को शब्द दिया है और उसका पक्ष पेश किया है। कर्ण कहता है कि मित्रता एक घने पेड़ की ठंडी छाया की तरह है और ऐसे पेड़ को छोड़ कर कौन जाएगा? कर्ण का तर्क है कि वह जिस पेड़ की छाया में खड़ा है, उसे कैसे कटने देगा? दिनकर ने कर्ण के शब्दों में मित्रता और धन की तुलना करते हुए लिखते हैं कि मित्रता के आगे वैकुण्ठ तक का भी त्याग करना पड़े तो यह ग़लत नहीं है। दरअसल, रामधारी सिंह दिनकर कर्ण के शब्दों की प्रासंगिकता आज के ज़माने में खोज रहे हैं और द्वापर से एक उदाहरण लेकर अपनी बात को साबित भी कर रहे हैं।

रामधारी सिंह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में भीष्म के शब्दों में आज के सत्ताधीशों को शासन करने का तरीका सिखाया है और शत्रु से निपटने का गुर बताया है। भला इसके लिए उन्हें शरशैया पर पड़े भारतवर्ष के उस बूढ़े महावीर से अच्छा कौन मिलता, जिसनें महाभारत जैसे पूरे युद्ध को देखा हो, उसमें हिस्सा लिया हो और कुरुवंश की कई पीढ़ियों को अपना मार्गदर्शन दिया हो। कुरुक्षेत्र में दिनकर शांति की वकालत करते हैं लेकिन ऐसी परिस्थितियों की भी बात करते हैं, जब युद्ध को टाला ही नहीं जा सके। शत्रु को बार-बार क्षमा करने और उसके कुकृत्यों को झेलते रहने का विरोध करते हुए भीष्म ‘कुरुक्षेत्र’ में कहते हैं:

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

दिनकर की इस कृति में कवि के मन में अंग्रेजों के अत्याचार से उत्पन्न पीड़ा साफ़ झलक देखी जा सकती है। पांडवों ने पग-पग पर कौरवों को क्षमा किया लेकिन शत्रु इसका ग़लत फायदा उठा कर एक से बाद एक बड़ी ग़लती करता रहा और पांडवों को नुकसान पहुँचाता रहा। दिनकर ने भीष्म के शब्दों को अपनी लेखनी से सँवारते हुए लिखा है कि अत्याचार को सहन करना भी ग़लत है। अत्याचार सहन करने से व्यक्ति की क्षमता जाती रहती है। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ ज्यादतियाँ हों या पाकिस्तान द्वारा बार-बार की जाने वाली हरकतें, भारत और भारतीयों ने जब भी पलटवार किया है, तभी सफलता मिली है।

दिनकर लिखते हैं कि क्षमा भी वही कर सकता है जो सचमुच बलशाली हो, क्षमतावान हो। भारत-चीन युद्ध के बाद भी वह व्यथित थे। उस समय वह राज्यसभा सांसद थे। नेहरू की नीतियों से ख़फ़ा होकर कहा,

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे, ‘हर-हर-बम’ का फिर महोच्चार।

दिनकर ने संसद में अपनी ये कविता तब पढ़ी, जब भारत चीन से युद्ध हार गया था। यहाँ भी देखिए, वह समसामयिक घटनाक्रम की समस्याओं के समाधान के लिए फिर द्वापर पहुँचते हैं और उस समय के शासक युधिष्ठिर को लेकर आते हैं। दिनकर लिखते हैं कि ऐसे समाय में युधिष्ठिर की नहीं बल्कि गदावीर भीम धनुर्धारी अर्जुन की ज़रूरत है। कई लोगों का मानना है कि दिनकर ने नेहरू के लिए युधिष्ठिर का उदाहरण दिया। दिनकर यहाँ भगवान शिव की बात करते हैं, उनके तांडव नृत्य की बात करते हैं और ‘हर-हर-बम’ की बात करते हैं।

राष्ट्रकवि दिनकर पर कुमात्र विश्वास का शो (साभार: ABP News)

रामधारी सिंह दिनकर भारतीय संस्कृति और इतिहास से उदाहरण लेकर आते तो हैं लेकिन सोचिए अगर आज के ज़माने में कोई ऐसा करे तो वर्ग विशेष द्वारा उसे सांप्रदायिक थाने में कितना वक़्त लगाया जाएगा? वह राष्ट्र के लिए और राष्ट्र की जनता के लिए सोचते थे। तभी भरी सभा में देश के पीएम के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत रखते थे और चोट भी ऐसी कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। रामधारी सिंह दिनकर की जन्मतिथि 23 सितम्बर है। उनके जीवन के बारे में, उनकी लेखनी के बारे में और उनके विचारों के बारे में चर्चा करने का आज से बेहतर समय भला क्या हो सकता है?

500 आतंकी घुसपैठ की फिराक में, पाकिस्तान ने फिर शुरू किया बालाकोट अड्डा: सेना प्रमुख

जम्‍मू-कश्‍मीर मेंअनुच्‍छेद-370 को निरस्त किए जाने के बाद से घाटी में मौजूद आतंकवादियों का सम्पर्क उनके पाकिस्‍तान स्‍थित आकाओं से टूट गया है। ऐसा होने से अब आतंकवादियों को किसी भी तरह का निर्देश नहीं मिल पा रहा है। यह जानकारी भारतीय सेनाध्‍यक्ष जनरल विपिन रावत ने सोमवार को चेन्‍नई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दी।

उन्होंने कहा कि बालाकोट को पाकिस्तान ने हाल ही में फिर से शुरू कर दिया है। इससे पता चलता है कि बालाकोट प्रभावित हुआ था। वह क्षतिग्रस्त और नष्ट हुआ था। इसलिए लोग वहाँ से चले गए थे और अब वह फिर से सक्रिय हो गया है।

इस कार्यक्रम में पाकिस्तान को आड़े हाथों लेते हुए उन्‍होंने कहा कि पाकिस्‍तान आतंकवादियों की घुसपैठ कराने के लिए सीजफायर का उल्‍लंघन करता है, लेकिन हमें पता है कि उससे कैसे डील करना है। हमारे जवानों को पता है कि ऐसी परिस्थियों से कैसे निपटना है।

उन्होंने कहा कि क़रीब 500 घुसपैठिए भारत में घुसने की फिराक में हैं। किसी भी तरह की घुसपैठ को रोकने के लिए जवान उच्‍चतम स्‍तर के अलर्ट पर हैं। विपिन रावत ने कहा, “मुझे लगता है कि कुछ तत्वों द्वारा इस्लाम की व्याख्या इस तरह की जा रही है, जैसे लगता है कि वे व्यवधान पैदा करना चाहते हैं। मुझे लगता है कि हमारे पास प्रचारक हैं जो इस्लाम के सही अर्थ को बता सकते हैं।”

सेनाध्यक्ष ने सरहद पर जारी तनाव के संदर्भ में कहा कि हमारी उत्तर-पश्चिम की सीमाओं पर तनाव की स्थिति है। उन्होंने कहा कि हर देश को अपनी सीमाओं को सुरक्षित करना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि देश में किसी भी तरह से घुसपैठ न होने पाए। पाकिस्तान का नाम लिए बिना सेनाध्यक्ष ने कहा कि हमारा पश्चिमी पड़ोसी राज्य प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और जम्मू-कश्मीर में हिंसा फैलाने की कोशिश कर रहा है।

ग़ौरतलब है कि पुलवामा में आतंकी हमले के बाद 26 फरवरी को भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान स्थित बालाकोट में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की थी। भारतीय वायु सेना की इस एयरस्ट्राइक में जैश के ट्रेनिंग कैम्प ध्वस्त हो गए थे। वायु सेना की रिपोर्ट के अनुसार बालाकोट में उनके 80% निशाने सही लगे।

अलवर में गौ तस्कर मुनफेद खान की भीड़ ने की पिटाई, उसकी गाड़ी से 7 गोवंश बरामद, अस्पताल में भर्ती

राजस्थान के अलवर जिले में रविवार (सितंबर 22, 2019) देर रात गौ तस्करी के आरोप में मुनफेद खान नामक शख्स की पिटाई की घटना सामने आई। बताया जा रहा है कि गौ तस्करी के कई मामलों के आरोपित मुनफेद की स्थिति इस घटना के बाद गंभीर है, उसे शाहजहाँपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहाँ उसका इलाज चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसके शरीर में कई फ्रैक्चर आए हैं।

आजतक में प्रकाशित खबर की मानें तो पुलिस ने बताया कि देर रात खुसा की ढाणी में भीड़ ने मुनफेद खान को घेरा और उसकी गाड़ी से 7 गोवंश बरामद किए। इस दौरान लोगों का गुस्सा उसपर फूट पड़ा और उन्होंने मुनफेद की जमकर पिटाई कर दी।

हालाँकि, मौक़े पर पहुँची पुलिस ने मुनफेद को बचाकर शाहजहाँपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया, लेकिन वहाँ उसकी स्थिति गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि भीड़ का शिकार हुआ गौ तस्कर पुलिस की नाकाबंदी तोड़कर भाग रहा था, लेकिन हड़बड़ाहट में वो भीड़ के हत्थे चढ़ गया।

गौरतलब है कि इससे पहले भी राजस्थान से गौ तस्करी के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ पर गौ तस्करों पर लोगों का गुस्सा फूटता हुआ देखा गया। 1 अप्रैल 2017 को पहलू खान वाली घटना इसका सबसे ज़्यादा सुना हुआ उदहारण है। इसके अलावा साल 2018 में रकबर खान नामक शख्स भी इस आरोप में भीड़ के गुस्से का शिकार हुआ था, तब इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई थी।