पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर एक बार फिर फजीहत का सामना करना पड़ा है। इस बार पाकिस्तान को फटकार लगाने वाला देश ईरान है। पाकिस्तान द्वारा अपने दूतावास को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए ईरानी अधिकारियों ने 15 अगस्त को उत्तर-पूर्व शहर मशहद स्थित पाकिस्तानी दूतावास की दीवारों पर लगे भारत विरोधी पोस्टर हटा दिए।
पाकिस्तान ने कश्मीर पर 15 अगस्त को कथित ‘कश्मीर सोलिडेरिटी डे’ (Kashmir Solidarity day) के नाम ये पोस्टर दूतावास की दीवारों पर लगाए गए थेा। लेकिन आधी रात को स्थानीय पुलिस ने पोस्टर हटा दिए।
तेहरान में अधिकारियों ने पाकिस्तानी राजनयिकों से पूछा, “अगर इस्लामाबाद में ईरानी मिशन की दीवारों पर सऊदी अरब के खिलाफ पोस्टर लगाए जाएँ तो क्या पाकिस्तान इसकी इजाजत देगा?”
ईरान ने इन तरीकों को ‘अनुशासनहीन रणनीति’ बताया। तेहरान ने इस्लामाबाद को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी तीसरे देश के खिलाफ इस तरह के पोस्टर लगाना राजनयिक मानदंडों के खिलाफ है। पाकिस्तान ने एक मौखिक नोट के जरिए जब इस मुद्दे को उठाया तो तेहरान ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
‘भारत दुश्मन देश नहीं है’
ईरानी से मिली इस फटकार पर के बाद भी पाकिस्तान अपनी दलील पर अड़ा रहा। पकिस्तान ने दावा किया है कि उसके मिशन को किसी भी सन्देश के प्रदर्शन का अधिकार है। इसके जवाब में ईरान ने कहा कि पाकिस्तान से उसके दोस्ताना संबंध रहे हैं, लेकिन भारत भी कोई दुश्मन देश नही है।
इस घटना के बाद भारत ने दिल्ली में ईरान के राजदूत को एक विरोध नोट सौंपा है। इस घटना से पहले भी ईरान में पाकिस्तानी मिशन द्वारा बिना किसी अनुमति के भारत विरोधी दो प्रदर्शन आयोजित किए थे।
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से पाकिस्तान बौखलाहट में इस तरह की हरकत कर रहा है। वो अन्य देशों में भारत विरोधी प्रदर्शन प्रायोजित करवाता है। ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भारतीय उच्चायोग के सामने विरोध-प्रदर्शन के नाम पर दो मौकों पर पाकिस्तानी उत्पात मचा चुके हैं। ब्रिटेन में भारतीय दूतावास के पास भी पाकिस्तानी दो मौकों पर विरोध-प्रदर्शन के नाम पर उत्पात मचा चुके हैं।
पाकिस्तानियों ने प्रदर्शन के दौरान अंडे और टमाटर फेंके थे। इस गंदगी को ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त के साथ मिलकर भारतीयों ने साफ़ किया। तीन सितंबर को विरोध-प्रदर्शन के दौरान भारतीय उच्चायोग की इमारत पर अण्डे और टमाटर फेंकने वाले दो पाकिस्तानियों को CCTV कैमरा में पहचान कर लंदन पुलिस ने गिरफ्तार किया भी किया था।
कल रविवार (सितम्बर 8, 2019) को फ़िरोज़ गाँधी की पुण्यतिथि थी। उनके पोते राहुल गाँधी और पोती प्रियंका गाँधी ने उन्हें याद तक न किया। बात-बात पर नेहरू, इंदिरा और राजीव का नाम लेने वाले कॉन्ग्रेस नेता उन्हें याद तक नहीं करते। बहू सोनिया गाँधी ने सरनेम तो लिया लेकिन ससुर को भूला बैठीं। इसका कारण क्या है? इससे जानने के लिए हम 6 महीने पीछे चलते हैं और फिर नेहरू से लेकर इंदिरा काल में कॉन्ग्रेस की करतूतों को देख कर समझेंगे कि आखिर क्यों फ़िरोज़ को याद नहीं किया जाता?
आपको याद होगा जब प्रियंका गाँधी ने रविवार (मार्च 17, 2019) की रात स्वराज भवन में गुजारी थी। इस दौरान ‘भावुक’ प्रियंका ने अपनी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भी याद किया था। उन्होंने बताया था कि उनकी दादी बचपन में उन्हें ‘जॉन ऑफ ओर्क’ की कहानी सुनाया करती थी। लेकिन, प्रियंका गाँधी ने अपने दादाजी को याद करना मुनासिब नहीं समझा। आनंद भवन से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित फ़िरोज़ गाँधी की कब्र को प्रियंका ने वैसे ही नज़रअंदाज़ किया, जैसे राहुल व सोनिया करते आए हैं।
ऐसे में प्रियंका गाँधी जब अपनी दादी की बात कर रही थी, लोगों द्वारा यह पूछना लाजिमी था कि वह अपने दादा को कब याद करेंगी? पारसी समुदाय से आने वाले फ़िरोज़ जहाँगीर गाँधी का निधन 8 सितंबर 1960 को हो गया था। फ़िरोज़ ने महात्मा गाँधी से प्रेरित होकर अपना सरनेम ‘गैंडी’ से ‘गाँधी’ कर लिया था।
Priyanka Gandhi rides boat to test political waters in Uttar Pradesh Very sad!our leaders talk to us about Joan of Arc,told by their grandmother,not Rani of Jhansi,Kittur Rani Chenamma,our own heroes!When will our leaders learn to respect Indian heroes? https://t.co/LtRQUz8W8n
प्रियंका गाँधी से पहले राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी भी फ़िरोज़ गाँधी के कब्र को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार सहित सभी बड़े नेता राजीव गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी की समाधि पर तो जाते रहे हैं, लेकिन फ़िरोज़ गाँधी की समाधि को कोई पूछता तक नहीं। फ़िरोज़ के अलावा गाँधी परिवार के अन्य पूर्वजों की जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर सभी बड़े कॉन्ग्रेसी नेताओं का जमावड़ा लगता है, लेकिन फ़िरोज़ की जयंती और पुण्यतिथि कब आकर निकल जाती है, इसका पता भी नहीं चलता।
उनका कब्र यूँ ही सूना पड़ा होता है, सभी मौसम में, बारहो मास। चुनावी मौसम में भी कॉन्ग्रेस द्वारा इंदिरा, राजीव और नेहरू तो ख़ूब याद किए जाते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी में फ़िरोज़ का नाम लेने वाला भी कोई मौजूद नहीं है।
ऐसा नहीं फ़िरोज़ गाँधी कॉन्ग्रेसी नहीं थे या राजनीति में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी। गाँधी परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली के पहले सांसद भी फ़िरोज़ गाँधी ही थे। 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1957 में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। राजनीति में सक्रिय रहने वाले फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी काफ़ी मुखर थे।
आप जान कर चौंक जाएँगे कि उनके विरोध के कारण प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौरान कॉन्ग्रेस नेताओं के बड़े उद्योगपतियों के साथ अच्छे-ख़ासे सम्बन्ध बनने लगे थे, जिसका फ़िरोज़ ने भरपूर विरोध किया था।
क्या कॉन्ग्रेस इसलिए फ़िरोज़ गाँधी को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनका नेहरू सरकार की आलोचना करना फिर से प्रासंगिक हो जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस इसलिए फ़िरोज़ को याद नहीं करना चाहती, क्योंकि उनका नाम आते ही उनके कारण नेहरू के मंत्री के इस्तीफा देने की बात फिर से छेड़ी जाएगी? क्या कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ खान की बात इसलिए नहीं करना चाहती, क्योंकि बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं व उद्योगपतियों के बीच संबंधों की बात फिर से चल निकलेगी?
जब उनका नाम आएगा, तो इतिहास में फिर से झाँका जाएगा। अगर उनका नाम आएगा तो उनके सुनसान कब्रगाह की बात आएगी, कॉन्ग्रेस नेताओं व गाँधी परिवार की थू-थू होगी। अब कॉन्ग्रेस चाह कर भी फ़िरोज़ गाँधी की प्रासंगिकता को ज़िंदा नहीं करना चाहेगी, क्योंकि उनसे सवाल पूछे जाएँगे।
आपको बता दें कि पारसी फ़िरोज़ गाँधी का अंतिम संस्कार पूरे हिन्दू रीती-रिवाजों के साथ किया गया था। बीबीसी के अनुसार, उन्होंने कई बार अंतिम संस्कार के पारसी रीति-रिवाजों से नाख़ुशी जताई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका क्रिया-कर्म हिन्दू तौर-तरीकों से ही किया जाए। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने राहुल गाँधी को उनके दादा की याद दिलाई। जनवरी 2019 में शर्मा ने राहुल गाँधी को कुम्भ में आने का आमंत्रण देते हुए उन्हें फ़िरोज़ गाँधी के कब्रगाह पर मोमबत्ती जलाने की सलाह दी थी। शर्मा ने कहा था कि राहुल के ऐसा करने से दिवंगत आत्मा को शांति मिलेगी, फ़िरोज़ गाँधी की कब्रगाह भी प्रयागराज में ही है।
सूना पड़ा रहता है इलाहबाद में फ़िरोज़ गाँधी का समाधि-स्थल
पारसी कब्रगाह के एक कोने में फ़िरोज़ गाँधी की कब्र अभी भी आगुन्तकों की बाट जोह रही है। राहुल गाँधी शायद एक-दो बार वहाँ जा चुके हैं, लेकिन पिछले 8 वर्षों से शायद ही गाँधी परिवार का कोई व्यक्ति वहाँ गया हो। पिछले एक दशक में प्रियंका गाँधी के वहाँ जाने के कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। आलम यह है कि कब्रिस्तान की रखवाली के लिए एक चौकीदार है जिसके रहने के लिए दो कमरे बने हुए हैं। इसके अलावा कब्रिस्तान में एक कुआँ और एक मकान है। कब्र और कब्रिस्तान की स्थिति जर्जर हो चुकी है। अपने ही परिवार की उपेक्षा के कारण यह स्थिति हुई है। कहा जाता है कि 1980 में उनकी बहू मेनका गाँधी ने यहाँ का दौरा किया था। मेनका गाँधी अभी मोदी कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।
अगर कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ गाँधी की बात करती है तो यह भी याद दिलाया जाएगा कि उन्ही की पत्नी इंदिरा गाँधी ने अपने पति के द्वारा बनवाए गए क़ानून को कचरे के डब्बे में फेंक दिया था। नेहरू काल में नियम था कि संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था, लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इस बारे में कुछ लिखने या बोलने की कोशिश की तो उसे सज़ा तक मिल सकती थी। इसे हटाने के लिए फ़िरोज़ गाँधी ने संसद में प्राइवेट मेम्बरशिप बिल पेश किया। बाद में इस क़ानून को फ़िरोज़ गाँधी प्रेस लॉ के नाम से जाना गया। आपातकाल के दौरान इंदिरा ने अपने पति के नाम के इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी।
Because,
1. Feroze Gandhi fought corruption within Congress. His work forced a finance minister (TT Krishnamachari) to resign. From Dalmia case to Mundhra case, he fought corruption vehemently.
2. He fought for FoE and press freedom. He brought Press Law thru Pvt members bill.
क्या कॉन्ग्रेस को इस बात के चर्चा में आने का डर है? बाद में विरोधी जनता पार्टी की सरकार ने इस क़ानून को फिर से लागू किया। इस तरह से फ़िरोज़ गाँधी को अपनों ने ही दगा दिया, विरोधियों ने अपनाया।
क्या कारण है कि देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के पूर्वज की कब्रगाह पर कचरों का ढेर लगा पड़ा है? दशकों तक केंद्र से लेकर यूपी तक कॉन्ग्रेस की सरकार रही, लेकिन फ़िरोज़ गाँधी उपेक्षित क्यों रहे? सवाल तो पूछे जाएँगे। प्रियंका से भी पूछे जाएँगे। दादी को याद कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाली प्रियंका-राहुल को दादा को याद करने से शायद कोई राजनीतिक फ़ायदा न मिले। अफ़सोस कि भारत में एक ऐसा भी परिवार है जो अपने पुरखों को याद करने के मामले में भी सेलेक्टिव है।
जिस व्यक्ति के कारण आज कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार अपने सरनेम में ‘गाँधी’ लगाता है, उस व्यक्ति को उसके जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर उसीका परिवार याद नहीं करता। हम बात कर रहे हैं फ़िरोज़ गाँधी की, जिनके कारण इंदिरा का सरनेम नेहरू की जगह गाँधी हुआ। फ़िरोज़ इंदिरा गाँधी के पति थे। वह सोनिया गाँधी के ससुर थे और राहुल गाँधी के दादा थे। लेकिन, 8 सितम्बर को उनकी पुण्यतिथि पर न बहू ने याद किया और न ही पोते-पोती ने।
यहाँ तक कि जिस कॉन्ग्रेस पार्टी के वह सांसद थे, उस पार्टी ने भी उन्हें याद नहीं किया। अगर आप राहुल और प्रियंका का ट्विटर अकाउंट खँगालेंगे तो पाएँगे कि दोनों में से किसी ने भी अपने दादा को याद करने की जहमत नहीं उठाई। अगर कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार सत्ता का भागी बना रहा तो उसमें ‘गाँधी’ सरनेम का भी योगदान था। लेकिन, उस व्यक्ति को भुला दिया गया जिसके कारण यह सरनेम मिला।
फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले अग्रणी नेताओं में से एक थे। नेहरू काल के दौरान भी उन्होंने विभिन्न घोटालों के विरोध में आवाज़ उठाई। एलआईसी कम्पनी में हुए घोटाले के ख़िलाफ़ फ़िरोज़ द्वारा आवाज़ उठाए जाने के कारण तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ गया था। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी अगर विदेश में छुट्टियाँ न मना रहे हों तो ट्विटर पर काफ़ी सक्रिय रहते हैं लेकिन फ़िरोज़ गाँधी को याद करने के लिए उनके पास समय नहीं है।
फ़िरोज़ गाँधी के समाधी-स्थल पर उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं जाता
प्रियंका गाँधी ने फ़िरोज़ की पुण्यतिथि के दिन मोदी सरकार के विरोध में एक कविता शेयर की, अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई लेकिन अपने ही दादा को उन्होंने याद नहीं किया। ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार अपने निजी कार्यक्रमों की प्राइवेसी को लेकर कुछ ज्यादा ही सतर्क रहता है। राहुल, प्रियंका और सोनिया अक्सर इंदिरा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और राजीव गाँधी को याद करते रहते हैं, उनके जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर उनकी समाधी पर जाते रहे हैं।
I see that no one from the Congress paid tribute to Feroze Gandhi on his Punya Tithi yesterday!
Speaks a lot about how unforgiving & ruthless the Party is of those who dared to question unbridled power of lobbies.
और फ़िरोज़ गाँधी की समाधी? वहाँ कोई नहीं जाता। वह न तो इंदिरा का ‘शक्ति स्थल’ जितना हाई प्रोफाइल है और न ही राजीव गाँधी की ‘वीर भूमि’ की तरह भव्य। कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार के भाषणों में भी फ़िरोज़ गाँधी का नाम कहीं नहीं आता। उनका समाधी-स्थल लखनऊ-इलाहबाद हाइवे पर एक कोने में धूल फाँक रहा है। सोनिया गाँधी 2001 के बाद से वहाँ नहीं गईं। राहुल अंतिम बार 2011 में वहाँ गए थे। प्रियंका 2009 में वहाँ गई थीं।
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने देशवासियों को बड़ी ख़ुशख़बरी दी है। इसरो के मुताबिक़, चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम पूरी तरह सुरक्षित है। हाल ही में ऑर्बिटर ने उसकी थर्मल इमेज क्लिक की थी। इसका अर्थ यह है कि लैंडर में कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई है और वह पूरी तरह सेफ है। लैंडर को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा है।
बता दें कि लैंडर का इसरो से संपर्क टूट गया था, जिसके बाद से अभी तक उससे संपर्क साधने की कोशिशें जारी हैं। अब इसरो ने बताया है कि विक्रम सुरक्षित है और उससे संपर्क साधने का प्रयास किया जा रहा है। ऑर्बिटर के कैमरा द्वारा भेजी गई तस्वीरों के मुताबिक़, जहाँ विक्रम को लैंड करना था, उसने वहाँ से कुछ ही दूरी पर हार्ड-लैंडिंग की है।
खुद को पंजाबी फिल्मों का प्रोड्यूसर बताकर लड़कियों को पंजाबी फिल्म में काम दिलाने के नाम पर उनकी फोटोज मँगवाकर उन्हें गलत तरीके से यूज करने वाले ओबेद अफरीदी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित अफरीदी पंजाबी फिल्म प्रोड्यूसर गुनबीन सिंह सिद्धू के नाम का इस्तेमाल करके मॉडल्स से न्यूड व अश्लील फोटोज मँगवाता था। वो उन मॉडल्स को फिल्म इंडस्ट्री में सेटल करवाने का लालच देता था। अफरीदी मूल रूप से दिल्ली का रहने वाला है।
जब प्रोड्यूसर गुनबीन को इसको भनक लगी तो उन्होंने पुलिस से इसकी शिकायत की। मोहाली थाना फेज-1 के एसएचओ लखविंदर सिंह ने बताया कि प्रोड्यूसर की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए आरोपित ओबेद अफरीदी को गिरफ्तार कर लिया है और उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 419, 420 और इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 66 (सी) व 66 (डी) के तहत केस दर्ज किया गया है।
उन्होंने बताया कि आरोपित को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहाँ उसे एक दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया। जानकारी के मुताबिक, आरोपित ओबेद भी इसी लाइन में है। वो फोटोग्राफर है और गुनबीन को अच्छी तरह से जानता है। इसी का फायदा उठाकर वो खुद को गुनबीन बताकर अलग-अलग वीआईपी नंबरों से मॉडल्स व लड़कियों को फोन कर उनसे मनमर्जी का काम करवाने की बात कहता था।
गुनबीन पंजाबी फिल्म प्रोड्यूसर व व्हाइट हिल्स स्टूडियो कंपनी का मालिक है। उन्होंने बताया उन्हें पता चला कि उनके नाम का इस्तेमाल कर अलग-अलग फोन नंबरों से कोई शख्स लड़कियों को फोन कर रहा है। लड़कियों को परेशान करने के साथ-साथ उनका शोषण भी किया जा रहा है। कुछ जानकार लोगों ने उन्हें बताया और कुछ नंबर दिए जिनके जरिए उनका नाम इस्तेमाल करके लड़कियों से बात करके उसे गुमराह किया जा रहा था। इसके बाद पुलिस ने जाँच की, तो पता चला कि दिल्ली निवासी ओबेद अफरीदी उनके नाम का इस्तेमाल कर रहा था, जिसे मोहाली पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया है।
कर्नाटक के बेलगाम में बेटे को पबजी खेलने से रोकने के कारण एक पिता को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मामला सिद्धेश्वर नगर काकटी गाँव का है। जहाँ सोमवार (सितंबर 9, 2019) को एक 25 साल के बेटे ने अपने 61 वर्षीय पिता की गुस्से में हत्या कर दी।
लड़के की पहचान रघुवीर कुम्हार के रूप में हुई है, जबकि मृतक पिता का नाम शंकर देवप्पा कुम्हार है, जो 3 महीने पहले ही जिला सशस्त्र बल से सेवानिवृत्त में हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो रघुवीर पॉलीटेक्निक का छात्र था, लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था। मोबाइल गेम और नशे की लत के कारण वो 3 बार फेल भी हो चुका था। जिससे उसके माता-पिता काफ़ी दुखी रहते थे।
रघुवीर अपने पिता शंकर से ऑनलाइन गेम के लिए रविवार रात से ही पैसे माँग रहा था, लेकिन पिता ने उसे पैसे देने से मना कर दिया। गुस्सा में उसने पड़ोसियों की खिड़कियों के शीशे तोड़ दिए थे। पड़ोसियों ने इस घटना की शिकायत पुलिस से की और फिर उसे काकटी थाने ले जाया गया था। बाद में शंकर के थाने पहुँचने पर मामला शांत हुआ था। लेकिन पुलिस ने उसे चेतावनी दी कि अगर वो ऐसी अराजकता फिर फैलाएगा तो उन्हें सख्त कार्यवाई करनी पड़ेगी।
इस घटना के बाद सोमवार की सुबह करीब साढ़े 4 बजे शंकर को ऐसा एहसास हुआ कि रघुवीर अभी भी अपने फोन पर पबजी खेल रहा है। वे उसके कमरे में गए और फोन छीन लिया। इसके बाद रघुवीर तुरंत अपने पिता पर झपटा और जाकर उसने उस कमरे की कुंडी लगाई जिसमें उसकी माँ सो रही थी। फिर अपने पिता पर हसियां से हमला किया और उनके टुकड़े कर दिए।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौक़े पर पहुँची और रघुवीर को गिरफ्तार कर लिया। एसीपी ने बताया कि रघुवीर को ऑनलाइन गेम खासकर पबजी खेलने की लत लगी हुई थी। सोमवार की सुबह जब पिता ने उसे ऐसा करने से रोका तो उसने उनके हाथ-पाँव काट दिए।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रामपुर का अपना दौरा टाल दिया है। मुकदमों में उलझे पार्टी के भू-माफिया सांसद आजम खान के समर्थन में अखिलेश ने नौ सितंबर को रामपुर पहुॅंचने का ऐलान किया था। जिला प्रशासन ने रामपुर में धारा 144 लागू कर रखी है। कॉन्ग्रेस भी अखिलेश के इस दौरे का विरोध कर रही थी।
अखिलेश ने कहा कि उन्होंने अपनी यात्रा 2 दिन के लिए स्थगित कर दी है। अब वे 13-14 को रामपुर जाएँगे।
Akhilesh Yadav, SP chief: Since there is Muharram and ‘Ganesh Visarjan’ I am delaying my program by 2 days. I will send my next program of Rampur on 13 and 14 September to the district administration and I will also give a detail of my movement. pic.twitter.com/wZie5JCJWf
प्रशासन ने मोहर्रम और गणेश चतुर्थी को देखते हुए रामपुर में धारा 144 को लागू किया है। डीएम ने अखिलेश यादव के दौरे के बारे में बात करते हुए कहा कि अखिलेश यादव की तरफ से धरने की अनुमति नहीं माँगी गई थी। फिलहाल यहाँ पर धारा 144 लागू है। 50 से अधिक लोग गाँधी समाधि के पास इकट्ठा नहीं हो सकते हैं। इसलिए काफी लोगों के परमिशन को रद्द कर दिए गए हैं। यह नियम सभी पर लागू होता है, अखिलेश यादव पर भी।
DM of Rampur on Akhilesh Yadav visit: No permission has been sought from his side. Not more than 50 people can gather around Gandhi Samadhi. It is not viable. Sec144 is enforced here due to which we have cancelled many permissions. Same will be applicable to him (Akhilesh Yadav) pic.twitter.com/9h7GunWo6m
दौरा रद्द होने के बाद अखिलेश यादव ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। अखिलेश का कहना है कि उन्होंने प्रशासन को सारा कार्यक्रम दे दिया था। मगर डीएम ने मोहर्रम का हवाला दे हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने जिलाधिकारी पर आरोप लगाते हुए कहा वह सरकार को खुश करने में जुटे हैं। डीएम एक्सटेंशन चाहते हैं। वह यूपी में ही पोस्टिंग चाहते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि रामपुर में भाजपा-कॉन्ग्रेस और प्रशासन एक हैं।
गौरतलब है कि, अखिलेश यादव की यात्रा को लेकर कॉन्ग्रेस ने भी विरोध जताया था। यूपी कॉन्ग्रेस अल्पसंख्यक सेल के उपाध्यक्ष फैसल खान लाला ने इस बाबत सूबे की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को एक पत्र लिखकर अखिलेश पर दंगा कराने की साजिश रचने का आरोप लगाते हुए उचित कार्रवाई की माँग की थी। उन्होंने आरोप लगया था कि अखिलेश यादव के इस दौरे से रामपुर सहित पूरे प्रदेश का माहौल बिगाड़ने की साजिश है। बता दें कि, आजम खान के खिलाफ जमीन हड़पने, लूट, चोरी, डकैती, गैर इरादतन हत्या, भड़काऊ भाषण और हिंसा फैलाने जैसे तकरीबन 80 मुकदमे दर्ज हैं।
माँ-बाप के लिए लव, साथी जवानों के लिए शेरशाह और ये दिल माँगे मोर नारे को हिन्दुस्तानी फ़ौज का मंत्र बनाने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा के बलिदान को 20 साल हो चुके हैं। लेकिन आज भी उनका कमरा वैसा ही है, जैसा छोड़ कर वे जंगे मैदान में गए थे। जुड़वाँ भाई आज भी उनकी तस्वीर को सलामी दे कर ही घर से निकलते हैं।
विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के एक छोटे-से शहर पालमपुर में हुआ था। दो बहनों के बाद, जुड़वा बेटे यानी विक्रम बत्रा और विशाल बत्रा का जन्म पिता गिरधारी लाल बत्रा (जीएल बत्रा) और माँ कमल कांता बत्रा के लिए ढेरों ख़ुशियाँ लेकर आया था। रामायण का पाठ करने वाली माँ ने अपने दोनों बेटों को लव-कुश का नाम दिया और अपने घर का नाम रखा लव-कुश विला। विक्रम बत्रा का बचपन आम बच्चों जैसा ही था। लेकिन एक कहावत है- पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं…और पिता जीएल बत्रा को यह भान हो चुका था कि लव यानी विक्रम बत्रा में कुछ तो अलग है।
पालमपुर के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए विक्रम चंडीगढ़ चले गए। उनका सिलेक्शन मर्चेंट नेवी और इंडियन आर्मी दोनों में हुआ। एक तरफ आराम की ज़िदगी थी तो दूसरी तरफ, देश के लिए कुछ करने का जज़्बा। विक्रम बत्रा की माँ कमल कांता को आज भी वह दिन याद है जब उनके बेटे ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए कहा, “माँ पैसा ही सब कुछ नहीं होता, मुझे देश के लिए कुछ करना है” इस बात पर विक्रम बत्रा के माता-पिता को आज भी बड़ा फक्र है।
विक्रम बत्रा बतौर लेफ्टिनेंट 13 जम्मू-कश्मीर राइफ़ल्स का हिस्सा बन गए और उनकी पोस्टिंग द्रास सेक्टर के कारगिल में हुई। भारत हमेशा से ही शांति का दूत रहा है, 1999 में भी भारत शांति ही चाहता था। शांति का संदेश लेकर ही तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर की बस यात्रा की थी। लेकिन पाकिस्तान की नीयत जैसी आज है वैसी ही तब भी थी। धोखा देने की नीयत। उसने चुपचाप जम्मू-कश्मीर के कारगिल में द्रास सेक्टर की पहाड़ियों में अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। वहाँ अपने बंकर्स बना लिए। उसका इरादा भारत पर एक बड़ा हमला करने की थी। लेकिन, धोखे के इस दॉंव को हमारे जवानों ने विफल कर दिया।
विक्रम बत्रा और उनके साथियों को श्रीनगर लेह हाईवे के करीब प्वाइंट 5410 को हर हाल में दुश्मन से वापस छीनना था। इस लड़ाई में विक्रम बत्रा ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया और बताया कि जज़्बा किसे कहते हैं, हिम्मत किसे कहते हैं। 20 जून 1999 की सुबह 3:30 बजे विक्रम बत्रा और उनके साथियों ने इस महत्वपूर्ण चोटी पर फिर से तिरंगा लहरा दिया। इस जीत के बाद विक्रम बत्रा ने कहा था, “यह दिल माँगे मोर” और उसी वक़्त से यह नारा बन गया हिंदुस्तानी फ़ौज का मंत्र। विक्रम बत्रा के जज़्बे को देखते हुए यूनिट ने उनको नया नाम दिया ‘शेरशाह’ यानी ‘शेरशाह ऑफ़ कारगिल’।
पाकिस्तानी फ़ौज में विक्रम बत्रा का काफ़ी ख़ौफ़ था। इस हद तक था कि उन्हें मारने के लिए उन्होंने जो योजना बनाई उसका नाम ‘ऑपरेशन शेरशाह’ रखा। युद्ध में विक्रम बत्रा का काम अभी पूरा नहीं हुआ था। अभी और ऐसे कई इलाके थे जिन पर दुश्मन का क़ब्ज़ा था। उनका अगला टारगेट प्वाइंट 4875 से पाकिस्तानियों को मार भगाना था। इस ऑपरेशन पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी माँ से बात की थी। इसके अलावा, उन्होंने अपने जुड़वा भाई विशाल बत्रा को भी एक चिट्ठी लिखी थी।
कैप्टन बत्रा अपने साथियों के साथ प्वाइंट 4875 को दुश्मन के क़ब्ज़े से छुड़ाने निकल गए। दरअसल, यह एक ऐसी जगह थी जहाँ से श्रीनगर लेह राजमार्ग पर दुश्मन अपना दबदबा बनाए रख सकता था। इसे खाली कराना बहुत जरूरी था। लेकिन, वहाँ पहुँचना बेहद जोख़िम भरा था। 17,000 फीट की ऊँची पहाड़ी और सीधी चढ़ाई कोई आसान काम नहीं था। लेकिन आसान काम विक्रम बत्रा को पसंद भी कहाँ था। गोलियाँ चल रही थीं, गोले बरस रहे थे। लेकिन, विक्रम बत्रा और उनके साथियों के पाँव एक क्षण के लिए भी नहीं डगमगाए, क्योंकि रुकना तो उन्होंने सीखा ही नहीं था। यह लड़ाई क़रीब 36 घंटे तक चली। 7 जुलाई 1999 को लड़ी गई इस लड़ाई में अपने जूनियर लेफ्टिनेंट नवीन को बचाते हुए विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हो गए।
माँ ने विक्रम बत्रा के कमरे को आज भी वैसा ही रखा हुआ है जैसा उनके बलिदान से पहले था। विक्रम के जुड़वा भाई विशाल आज भी उनकी तस्वीर को सैल्यूट किए बिना घर से नहीं निकलते। उन्हें उस वक़्त बेहद गर्व महसूस होता है जब कोई कहता कि तुम विक्रम की तरह दिखते हो। विशाल आज जिस मुक़ाम पर हैं उसका पूरा श्रेय वो विक्रम बत्रा को ही देते हैं। लोग उन्हें विशाल बत्रा के तौर पर नहीं, बल्कि विक्रम बत्रा के भाई के तौर पर जानते हैं।
उनका कहना है कि भाई की याद तो हर पल आती है। वो हमारे रोम-रोम में बसा हुआ है। विक्रम के पिता का कहना है कि एक बेटे के तौर पर उसने हमारा जीवन धन्य कर दिया है। एक पिता को अपने बेटे से और क्या चाहिए।
कैप्टन बत्रा की बहन सीमा बत्रा सेठी की तो आज भी अपने भाई के बारे में बातें करते हुए आँखें डबडबा जाती है। भावुक होकर उन्होंने बताया वो हमारा रोल मॉडल है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि दुनिया में हर बहन को ऐसा ही भाई मिले…।
विक्रम बत्रा की माँ का कहना है कि देश के युवाओं को आर्मी ज्वॉइन करनी चाहिए और जब भी देश के लिए बलिदान होने का मौक़ा मिले तो उसे गँवाना नहीं चाहिए। 26 जनवरी 2000 को विक्रम बत्रा को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
उत्तर प्रदेश के रामनगर के गाँव हरदासपुर में नईम बेग नाम के शख्स ने अपनी बीवी की मौत के बाद डॉक्टर को सड़क पर घसीटकर जमके पीटा। इसमें नईम के साथ उसका परिवार भी शामिल था। पुलिस ने बड़ी मुश्किल डॉक्टर को बचाकर अपनी जीप में बैठाया, लेकिन नईम और उसके परिवार वालों ने उन्हें जीप से भी खींच लिया। बाद में एसडीएम और सीओ के साथ कई थानों की फोर्स पहुँची तो डॉक्टर की जान बची।
आखिर डॉक्टर की गलती क्या थी? दरअसल, हरदासपुर गाँव में नईम बेग की 30 वर्षीय पत्नी गुलशन ने अपने घर पर 4 सितंबर को बच्चे को जन्म दिया था। प्रसव के दौरान ज्यादा खून बहने की वजह से उसकी तबीयत बिगड़ गई। शुक्रवार को उसे नईम ने अस्पताल में भर्ती करवाया। जाँच के बाद मालूम चला कि उसका हेमोग्लोबिन 3.9 है। डॉक्टर ने गुलशन के उपचार के लिए 36 हजार रुपए जमा करने को कहा। नईम ने 25 हजार रुपए जमा करवाए और उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया।
Naeem Beg’s wife delivered a child at home on Wednesday. Lost so much blood her hemoglobin was 3.9 but it was only checked when she was taken to hospital on Friday. She died. Naeem Beg and his folk did #MobLynching of the doctor, brazenly pulling him even from the police car. pic.twitter.com/MAx49qd6Bi
शनिवार की सुबह 11 बजे खून चढाने के दौरान गुलशन की मौत हो गई। इसके बाद नईम अपने परिवार और अन्य लोगों के साथ अस्पताल पहुँचा और हंगामा शुरू कर दिया।
कुछ देर बाद भीड़ डॉक्टर को खींचकर सड़क पर ले आई और बुरी तरह पीटने लगी। बवाल की सूचना मिलते ही पुलिस वहाँ पहुँची और डॉक्टर को गाड़ी में बैठाने की कोशिश की। किंतु गुस्साई भीड़ ने डॉक्टर को जीप से भी खींच लिया और फिर मारना शुरू कर दिया। इस दौरान भीड़ में मौजूद महिलाओं ने पुलिस से धक्का-मुक्की भी की। एसडीएम और सीओ के अलावा कई थानों की फोर्स आने के बाद मामला काबू हुआ। दोनों पक्षों में बात करवाकर मामले को शाँत करवाया गया। करीब 4 घंटे बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ।
जानकारी के मुताबिक अभी तक दोनों पक्षों में से किसी ने भी इस घटना की शिकायत पुलिस से नहीं की है, इसलिए पुलिस ने किसी भी पक्ष पर कार्रवाई नहीं की है।
ससुराल के क्रूर व्यवहार से तंग आकर 21 साल पहले कीटनाशक पीकर आत्महत्या करने वाली मृतका वैशाली के मामले पर बीते बुधवार बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई की। इस दौरान मृतका की सास मंदाकिनी की सजा को अदालत द्वारा बरकरार रखा गया और उसके पति दिनेश को भी आईपीसी की धारा 498 के तहत दोषी पाया गया। जिसके आधार पर उसके खिलाफ़ सुनवाई के लिए नोटिस जारी हुआ।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति भारती डांगरे की बेंच ने की। अमेरिका की मैरी पॉलिन लोरी (जिन्हें महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने की वकालत करने के लिए जाना जाता है) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा ‘एक महिला होने में दर्द है, लेकिन इसमें गर्व भी है।’ फैसले में कहा गया है, “मृतक वैशाली ने कष्टों का सामना किया, लेकिन वह एक जननी होने के गर्व का अनुभव करने के लिए जीवित नहीं रह पाई, उसने पहले ही अपने जीवन की लौ को बुझा दिया और दुनिया छोड़कर चली गई।”
क्या है मामला?
गौरतलब है कि वैशाली की शादी 8 मई 1998 को दिनेश से हुई थी । जिसके 6 महीने बाद ही उसने जीवन से तंग आकर डूनेट मेथनॉल (कीटनाशक) पीकर अपना जीवन समाप्त कर लिया था।
वैशाली के पिता ने शिकायत दर्ज करवाते हुए उसकी सास मंदाकिनी, ननद रुपाली और पति दिनेश पर अपनी बेटी के साथ क्रूर व्यवहार करने का आरोप लगाया था। पिता के मुताबिक वैशाली ने उन्हें बताया कि सास उसे परेशान करती और कहती है कि वह कभी नहीं चाहती थी उनके बेटे की शादी उससे हो। इसके अलावा वैशाली की सास उससे 2 लाख रुपए की भी माँग करती थी।
वैशाली के पिता दादा साहेब ने जानकारी देते हुए बताया था कि 4 नवंबर को जब वह अपनी बेटी से मिलने अस्पताल गए तो वह बेहोश थी। जब उन्होंने दिनेश से पूछा तो उसने बताया कि वैशाली का उसकी (दिनेश) माँ और बहन से विवाद हुआ था। जिसके बाद वैशाली ने कीटनाशक पी लिया। जाँच से पता चला कि मौत डूनेट मेथनॉल पीने के कारण हुई।
आईपीसी की धारा 498-ए, 304 बी और 306 के तहत मामला दर्ज किया गया। जाँच रिपोर्ट आने के बाद इसमें 302 को भी जोड़ा गया। लेकिन कुछ समय बाद, बाकी आरोपितों को इस मामले में धारा 302 और 304 बी के दंडनीय अपराधों से बरी कर दिया गया और मंदाकिनी को दोषी ठहराते हुए 3 साल की सजा सुनाई गई।
हाई कोर्ट का निर्णय
अब कोर्ट ने 21 साल बाद इस मामले में लिए गए निर्णय की दोबारा से जाँच करते हुए कहा है कि कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का अवलोकन किया है। जिसमें उनका विचार है कि उस दौरान मृतक के पति दिनेश के ख़िलाफ़ उत्पीड़न के सबूतों पर कार्रवाई न करके सत्र न्यायाधीश ने बहुत बड़ी गलती की थी। जबकि अभियोजन पक्ष का हमेशा से कहना रहा है कि मृतका को उसकी सास के अलावा उसके पति दिनेश द्वारा भी उत्पीड़ित किया जा रहा था, जिसके कारण वह इन लोगों की शारीरिक और मानसिक क्रूरता की शिकार हो रही थी।
जस्टिस डांगरे की अदालत ने मामले की सुनवाई में कहा कि मौजूद सबूत बताते हैं कि वैशाली पर कठोरता और अत्याचार किए जा रहे थे, जिसके कारण उसने जीने की उम्मीद खो दी थी। उसकी सास उससे दुर्व्यवहार करती थी और उसका पति चुप्पी साधे रखकर अपनी माँ का साथ देता था, जो वैशाली के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देना जैसा था। इन्हीं चीजों को लेकर वैशाली के मन में नकारात्मक विचार आए और उसने मौत को गले लगाना उचित समझा।
कोर्ट का कहना है कि वैशाली के पति दिनेश की उसके उत्पीड़न में एक बड़ी भूमिका थी, जिसने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया। लेकिन मामले की सुनवाई में सत्र न्यायाधीस से ये पक्ष छूट गया और उन्होंने दिनेश को 498 ए आईपीसी धारा के दंडनीय अपराध से बरी कर दिया। अब कोर्ट ने दिनेश के खिलाफ सुनवाई के आदेश दिया हैं।