विवेकानंद का ‘सर्व-धर्म-समभाव’ इस्लाम के लिए एक मौका था, मुसलमानों को सोचना होगा क्यों गँवा दिया

हिन्दुओं ने विवेकानंद को निराश किया, उनकी वह हिदायत याद न रखकर कि "हिन्दू धर्म से बाहर जाने वाला हर इंसान केवल (हमारी संख्या में) एक कम नहीं, शत्रुओं (धर्म के) में एक अधिक है।"

ज़्यादा नहीं, केवल लोकसभा चुनाव के पहले तक हिन्दुओं को बरगलाने के लिए “ज़रा सोचो गाँधी जी अगर होते तो तुम्हारे बारे में क्या सोचते?” का चूरन चटाया जाता था, इमोशनल ब्लैकमेलिंग होती थी। मोहनदास गाँधी की भावनात्मक गुलामी का वह जुआ करोड़ों आम हिन्दुओं ने अपने गले से निकाल कर फेंक दिया है (गाँधीवादी नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने के बावजूद), और यह धमक लेफ्ट-इललिबरलों (छद्म-उदारवादियों) को साफ़ सुनाई दे रही है। इसीलिए अब यह गिरोह खोद-खाद के स्वामी विवेकांनद को निकाल लाया है अपने नए आदर्श के रूप में, “बताओ ‘ये’ होते तो क्या कहते” का बरगलाना चालू रखने के लिए।

और यही विवेकानंद थे जो कुछ साल पहले तक 1946 में कलकत्ता में ‘Direct Action Day’ पर मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं के सामूहिक हत्याकांड के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जाते थे, बावजूद इसके कि 1902 में खुद उनकी मृत्यु हो चुकी थी, वह भी महज़ इसलिए क्योंकि उन्होंने देशप्रेम को हिन्दुओं के धर्म से जोड़ने का ‘हराम’ कर्म कर दिया था। वही विवेकानंद जिन पर साम्प्रदायिक असहिष्णुता और ब्राह्मणवादी-जातिवादी अभिमान में आकर पुराणों को नकार कर ‘शुद्ध’ वेदों-उपनिषदों को बढ़ावा देने का कीचड़ उछाला जाता था। आज उन्हीं विवेकानंद का हवाला देकर ‘द हिन्दू’ अख़बार हिन्दुओं को ज्ञान दे रहा है कि अगर विवेकानंद ज़िंदा होते तो हिंदूवादी राजनीति से नाराज़ होते।

देखने में यह भारी-भरकम ज्ञान ज़रूर है लेकिन अगर तह-तह अलग-अलग छीली जाए तो वैसे ही खोखला है, जैसे खोखले तर्कों का पुलिंदा बनाकर आजकल लेफ्ट मारता है, इस उम्मीद में कि कोई एक-आधी अंधी-चुक्की सही बैठ जाए।

राष्ट्रवाद मिथक नहीं, जीवित सत्य है

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सबसे पहले तो लेखक राहुल मुखर्जी राष्ट्रवाद को जो ‘मिथक’ (‘myth’) कहते हैं, उस पर बात करनी ज़रूरी है। हालाँकि ‘myth’ के कुछ सूक्ष्म अर्थ (nuances) सकारात्मक भी होते हैं, लेकिन चूँकि यह द हिन्दू में छपा लेख है, और मंतव्य भी हिन्दुओं पर हमला है, अतः यह मानने में कोई बुराई नहीं कि जब राहुल मुखर्जी राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रनिर्माण करने वाले मिथकों में संघर्ष’ कहते हैं, तो उनका अर्थ राष्ट्रवाद को नकारात्मक, खोखला झूठ बताना ही होता है।

तो राहुल मुखर्जी जी, आप गलत हैं: भारत का राष्ट्रवाद कोई असत्य मिथक नहीं, जीवित सत्य है, जो हज़ारों राजनीतिक इकाईयों में बंटे होने के बावजूद समरकंद और ईरान से वर्तमान बाली-सुमात्रा-इंडोनेशिया तक के भूभाग को एक सभ्यता, एक राष्ट्र के रूप में अपनी ज़बान में स्वीकार्यता देने के लिए मजबूर करता था। असम, गुजरात, कंधार और केरल के रजवाड़ों के लिए अलग-अलग शब्द की बजाय हर भाषा में इस सभ्यता के लिए, इस भूभाग के लिए हमेशा से एक ही शब्द होना अपने आप में इस राष्ट्रवाद की सच्चाई का सबूत है।

विवेकानंद का सर्व-धर्म-समभाव

यह सत्य है कि कुछ मौकों पर विवेकानंद ने इस्लाम और ईसाईयत को भी शैवत्व, वैष्णव सम्प्रदाय, शक्तोपासना जैसा ही ‘एक अन्य धर्म’ माना था; केवल उन्होंने ही नहीं, जब इस्लाम और ईसाईयत पहली बार भारत की दहलीज़ पर आए तो हमने उन्हें उसी तरह स्वीकार किया जैसे हज़ारों सालों से हम मिस्रियों, ग्रीको-रोमन उपासकों, जापानी और चीनी बौद्धों, शिंटो मतावलम्बियों से लेकर हमें अपनी आस्था में ‘पापी’ मानने वाले लेकिन हमारे धर्म के खिलाफ आक्रामक न होने वाले यहूदियों और ‘अहुरों’ के उपासक पारसियों को स्वीकार किया था। इस ‘स्वीकार’ में एक उम्मीद थी- कि जैसे उपरोक्त मतावलम्बी भारत में अपनी आस्था अपने घर और अपने तक सीमित रखकर स्थानीय लोगों की आस्था का सभ्य लोगों की तरह सम्मान करते रहे हैं, वैसे ही इस्लामी और ईसाई भी करेंगे। लेकिन इसके बदले ईसाईयों और इस्लामियों ने हमारा ऋण कैसे ‘चुकाया’, यह इतिहास किसी को पढ़ाए जाने की ज़रूरत नहीं है।

वापिस विवेकानंद पर आएँ तो वे इस इतिहास से अनभिज्ञ नहीं थे। उन्होंने कुछ बार इस्लाम स्वीकार किए जाने और अंतरराष्ट्रीय धर्म सभा में “सहिष्णुता नहीं, स्वीकार करना” भले कहा हो, लेकिन वे वहाँ हिन्दू क्या सोचते हैं, यह कह रह थे; इस्लाम को लेकर उनकी समझ, कि इस्लाम क्या चाहता है, कुछ अन्य स्थानों पर साफ़ है। इस्लाम की दूसरों पर अल्लाह को ‘थोपने’ की प्रवृत्ति को वह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते थे। उनके अनुसार जिन्हें आज हम “मॉडरेट मुस्लिम” कहते हैं, जो दूसरों की आस्था को भी इस्लाम जितना सही मानने की बात करे, वह अपने पिता की आस्था/उपासना पद्धति (इस्लाम) की भाषा नहीं, सीधे सत्य बोल रहा है। यानी वे यह मानते थे कि इस्लाम कभी दूसरी आस्था को अपने विचारों में तो सम्मलित कर ही नहीं सकता।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर वे यह मानते थे कि इस्लाम की आस्था/आध्यात्मिक विचारधारा में तो अल्लाह के अलावा कोई और भी सत्य हो सकता है, ऐसा मानने का स्थान नहीं है तो उनका ‘सर्व-धर्म-समभाव’ आखिर था क्या? और इसका जवाब यह होगा कि यह इस्लाम से नहीं, मुस्लिमों से उम्मीद थी। यह मुस्लिमों से उम्मीद थी कि यद्यपि वे हिन्दुओं को अपनी आस्था, अपने मन और विचार में मूर्ति-पूजा के लिए, मोसेस को 10 हिदायतें (commandments) देने वाले अब्राहमिक पंथों के ‘ईर्ष्यालु’ देवता (for I, the LORD your God, am a jealous God; Exodus 20:5) के अलावा अन्य की पूजा करने के लिए हमारे नर्क में जाने की कामना करें, लेकिन सार्वजनिक व्यवहार में अपनी आस्था को उतारने न लगें। विवेकानंद के ‘सर्व-धर्म-समभाव’ में मुसलमानों को ‘benefit of doubt’ दिया गया था कि भले ही उनके पूर्वजों ने इस्लामी आयतों का, कुरान, हदीस और शरीयत का हवाला देकर हज़ारों मंदिर तोड़े, अनगिनत हत्याएँ और बलात्कार किए, लेकिन ऐसा नहीं है कि आधुनिक मुस्लिम इस पंथिक आक्रामकता के व्यवहार के अतिरिक्त और किसी तरह का व्यवहार कर ही नहीं सकते।

विवेकानंद का ‘सर्व-धर्म-समभाव’ उम्मीद थी कि शायद उसी Exodus के पहाड़ वाले jealous God को मानने वाले, लेकिन हिन्दुओं के साथ सैकड़ों वर्षों तक शांति से रहने वाले यहूदियों जैसा बर्ताव मुसलमान अब जाकर सीख जाएँगे।

किसने किया विवेकानंद को निराश?

विवेकानंद का ‘सर्व-धर्म-समभाव’ को हिन्दुओं ने नहीं, मुसलमानों ने निराश किया है। उनकी उम्मीद को निराश किया क्योंकि अगर हिन्दू कुछ समय और उन्हें benefit of doubt दे दें, कि इतिहास में बहा खून शायद पंथिक कारणों से कम, राजनीतिक कारणों से अधिक बहा, तो मुसलमान इस उद्गार का प्रत्युत्तर अपना व्यवहार हिन्दुओं की उम्मीदों के मुताबिक शांतिपूर्ण कर देंगे।

मुसलमानों ने समाज के तौर पर क्या उत्तर दिया, यह भी इतिहास के हर पन्ने में लिखित है। विभाजन के खून से, कश्मीरी पंडितों के खून से, कैप्टेन सौरभ कालिया के खून के साथ-साथ उनकी चीखों से, करोड़ों पाकिस्तानी मुसलमानों के खून से, यहाँ तक कि राइफलमैन औरंगज़ेब के भी खून से।

ऐसे में हिन्दुओं को नहीं, मुसलमानों को यह सोचने की ज़रूरत है कि हज़ार साल की हिंसा से बाद जब विवेकानंद ने रक्तिम स्लेट को अपने भगवा वस्त्र से पोंछ कर एक नया, ताज़ा पन्ना दिया, हिन्दुओं की आस्था का सम्मान करते हुए रहने के लिए, हिन्दुओं का जबरन मतांतरण न करते हुए अपनी आस्था की अन्य हिदायतों का पूरा पालन करने की आज़ादी के साथ, तो उनके पूर्वजों में से अधिकाँश ने उस पन्ने पर क्यों विभाजन की एक नई खूनी दास्ताँ लिख दी, क्यों मुस्लिम-बहुल कश्मीर को हिन्दू-बहुल भारत का साथ मंज़ूर नहीं हुआ और उन्होंने कश्मीरी पंडितों के साथ वो किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था।

हिन्दुओं ने विवेकानंद को निराश ज़रूर किया है, राहुल मुखर्जी जी, लेकिन निरर्थक साबित हुए ‘सर्व-धर्म-समभाव’ की टोकरी सर से फेंककर नहीं, उनकी वह हिदायत याद न रखकर कि “हिन्दू धर्म से बाहर जाने वाला (मतांतरण करने वाला, ज़ाहिर तौर पर इस्लाम या ईसाईयत में) हर इंसान केवल (हमारी संख्या में) एक कम नहीं, (धर्म के) शत्रुओं में एक अधिक है।” बाकी साथ में गाँधी जी का सम्पुट लगाना तो बंद कर ही दें तो बेहतर होगा; गाँधी राजनीतिक नेता भले रह जाएँ, हिन्दुओं के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेता की पदवी उनसे छिन ही नहीं रही है, बल्कि छिन चुकी है।

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