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कृष्णाष्टमी पर संदेशों से परेशान हुए चीफ जस्टिस: रजिस्ट्रार ने जजों से मोबाइल पर मैसेज नहीं करने को कहा

इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने सभी जिला जजों को चिट्ठी भेज कर कहा है कि वे मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर के मोबाइल पर संदेश न भेजें। कृष्णाष्टमी पर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को कुछ न्यायिक अधिकारियों की ओर से शुभकामना संदेश भेजे जाने के बाद रजिस्ट्रार जनरल ने यह चिट्ठी भेजी है।

इसमें कहा गया कि इस तरह के संदेशों से समस्या खड़ी होती है और माननीय मुख्य न्यायाधीश को असुविधा होती है। उन्होंने इसको लेकर चिंता जताई है और भविष्य में किसी भी अवसर पर कोई संदेश उनके मोबाइल पर नहीं भेजे जाएँ।


साभार: barandbench.com

पत्र में जजों से इसे गंभीरता से लेने को कहा गया है। हालॉंकि किसी आवश्यक परिस्थिति में वे मुख्य न्यायाधीश को मैसेज भेज सकते हैं। रजिस्ट्रार जनरल ने जिला जजों से अपने अधीनस्था न्यायिक कर्मचारियों को भी इस संबंध में निर्देशित करने को कहा है।

‘फासीवादी, उनके हाथ खून से सने’ – अरुण जेटली के निधन पर लिबरपंथियों ने ऐसे मनाया जश्न!

भारत के पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर अंतिम साँस ली। किसी के चले जाने से जो एक आकस्मिक शोक का भाव उभरता है, यह संस्कृति शायद कुछ लोगों में नदारद है। ऐसा नहीं होता तो एक तरफ जब राष्ट्रीय स्तर के नेता के निधन पर शोक मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ स्व-घोषित उदारवादियों के लिए आज ‘जश्न’ का दिन है।

ये वो लोग हैं, जिनके पास उल्लास के नाम पर इन दिनों कुछ भी बचा नहीं है। इसलिए, हिंदुत्ववादी नेताओं के निधन के नाम पर ही सही, ये जश्न मनाने के आतुर रहते हैं। आज यह जश्न अरुण जेटली के नाम पर मना रहे हैं, कुछ दिन पहले पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मौत पर भी इसी तरह का व्यवहार कर रहे थे।

द क्विंट और द हिंदू का एक स्तंभकार है। यह ट्विटर पर क्वेंटिन टैरेंटुलिनो (Quentin Tarantulino) के नाम से जाना जाता है। यह लिखता है – जब कोई फासीवादी मरता है, तो अच्छा लगता है। हालाँकि इसने अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया, लेकिन स्क्रीनशॉट के जमाने में अपनी करतूतों को छिपाने से बच नहीं पाया।

एक बाबा ग्लोकल है। वो अरुण जेटली को ‘पीस ऑफ शिट’ कहता है। वो लिखता है कि उसे हिंदू वर्चस्ववादी नए-नाजी (तानाशाह) के साथ कोई सहानुभूति नहीं है।

ग्लोकल ने एक दूसरे ट्वीट में लिखा, “अरुण जेटली उन कुछ लोगों में से एक थे, जो ‘अंग्रेजी में नाज़ीवाद’ का बचाव कर सकते थे।’

अशोक स्वैन ने अलग लेवल पर जाते हुए ट्वीट किया, थोड़ा गूढ़ लिखते हुए। वैसे वो हमेशा जहर ही लिखते हैं। लेकिन इस इंसान का ट्वीट पढ़िए, भावनाएँ स्पष्ट हो जाएँगी।

मिनी नायर ने लिखा, “अरुण जेटली को माफ नहीं किया जा सकता, उनके हाथ खून से सने हैं।”

आर्य सुरेश ने कहा कि ‘अरुण जेटली कितने अच्छे व्यक्ति थे’ जैसे लाखों लेख के बावजूद यह भूला नहीं जा सकता कि उन्होंने एक ‘फासीवादी’ का समर्थन किया था।

नंदतारा नाम के यूजर ने लिखा, उन्होंने अपनी सारी अच्छाइयों को किनारे रख दिया और मोदी-शाह के ‘क्लोन’ बन गए।

स्व-घोषित ‘उदारवादियों’ और लिबरपंथियों का यह रेगुलर पैटर्न बन गया है। ये किसी भी भाजपा नेता की मृत्यु के बाद जश्न मनाते हैं। संवेदना, संस्कृति, जीवन-मरण जैसे शब्द इनकी डिक्शनरी में मानो है ही नहीं। अगर होता तो शायद ये वो नहीं होते, जो आज ये बन चुके हैं!

‘मैंने सद्भावना में बुला क्या लिया, राजनीति करने दौड़े चले आए राहुल गॉंधी, अब उनकी कोई जरूरत नहीं’

जम्मू-कश्मीर से बैरंग लौटाए गए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी और अन्य विपक्षी नेताओं को राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने खरी-खरी सुनाई है। मलिक ने कहा है, “मैंने उन्हें सद्भावना में बुलाया था। लेकिन, उन्होंने राजनीति शुरू कर दी। उनकी यह हरकत राजनीति के अलावा कुछ नहीं। राजनीतिक दलों को ऐसे वक्त में राष्ट्र हित को तरजीह देनी चाहिए।”

राज्यपाल ने कहा, “अब उनकी यहॉं कोई जरूरत नहीं है। उनकी जरूरत तब थी जब उनके साथी संसद में बोल रहे थे। यदि वे यहॉं आकर माहौल बिगाड़ना और दिल्ली में बोले गए झूठ को ही दोहराना चाहते हैं तो यह सही नहीं है।”

इससे पहले जम्मू-कश्मीर के हालात जानने के लिए विपक्षी नेताओं के साथ पहुॅंचे राहुल गाँधी को श्रीनगर एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकलने दिया गया था। सभी नेताओं को वहॉं से वापस दिल्ली भेज दिया गया। राहुल के साथ गए नेताओं में गुलाम नबी आज़ाद, डी राजा, शरद यादव, मनोज झा, मजीद मेमन शामिल थे।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शुक्रवार (अगस्त 23, 2019) रात को ही इन नेताओं से अपनी यात्रा टालने की अपील की थी। प्रशासन का कहना था कि उनके घाटी में आने से शांति-व्यवस्था और आम जनजीवन बहाल करने में बाधा पहुँचेगी। इसके बावजूद, राहुल 8 दलों के 11 विपक्षी नेताओं के साथ श्रीनगर पहुँच गए थे।

मेरी हत्या हो सकती है… मरना तो वैसे भी है, लेकिन माफ़ी नहीं माँगूंगी: रेपिस्ट पादरी का विरोध करने वाली नन

केरल में बलात्कार के आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ प्रदर्शन में भाग लेने वाली नन लूसी कलपूरा ने अपनी हत्या का अंदेशा जताया है। उन्होंने पुलिस से अपनी शिकायत वापस लेने और माफ़ी माँगने से भी इनकार किया है। कैथोलिक क्रिश्चन सोसायटी फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रिगेशन (FCC) ने कारण बताओ नोटिस जारी कर उनसे माफ़ी माँगने और शिकायत वापस लेने को कहा था।

सिस्टर लूसी का कहना है कि सितंबर 2018 के बाद उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उन्हें जिस तरह टॉर्चर किया गया, इसके लिए एफसीसी को उनसे माफी माँगनी चाहिए। उन्होंने कहा ये सिर्फ उनकी बात नहीं है। यह महिलाओं के अस्तित्व का मसला है। वे मर्दों की बपौती नहीं हैं।

लूसी ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा, “जैसे आप धूम्रपान करने के बाद अपने पैरों के नीचे सिगरेट को कुचल देते हैं, वैसा ही व्यवहार वो मेरी जैसी महिलाओं के साथ कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि अब समझौता करने की कोई गुंजाइश नहीं है। पहले भी उन्हें बहुत धमकियाँ मिल चुकी है, वो इन धमकियों की परवाह नहीं करती।

इतना ही नहीं, लूसी ने किसी भी अप्रिय घटना के लिए एफसीसी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा, “मेरी हत्या हो सकती है। मरना तो वैसे भी है। शायद हत्या ही मेरी नियति में है। इसके लिए एफसीसी और स्थानीय प्रशासन जिम्मेदार होगा। मैं यहाँ कॉन्वेंट में रहूँगी। मैंने पुलिस से सुरक्षा भी माँगी है। लेकिन उन्होंने अब तक कुछ नहीं किया है।”

गौरतलब है कि, इस हफ्ते की शुरुआत में सिस्टर लूसी ने कॉन्वेंट में बंधक बनाने और प्रार्थना से रोके जाने को लेकर पुलिस से शिकायत की थी। उन्होंने कहा था कि सोमवार (अगस्त 19, 2019) की सुबह जब प्रार्थना के लिए तैयार हुई तो कॉन्वेंट से निकल नहीं पाई, क्योंकि उन्हें बाहर से बंद कर दिया गया था। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मौके पर पहुँच उन्हें बाहर निकाला था।

दुष्कर्म में आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ पिछले साल सितंबर में हुए विरोध-प्रदर्शन में शामिल 5 ननों में से एक लूसी कलपूरा हैं। इसके कारण FCC ने उन्हें बर्खास्त कर 17 अगस्त तक कॉन्वेंट छोड़ने को कहा था। इसके खिलाफ उन्होंने वेटिकन में अपील कर रखी है। पिछले दिनों नन लूसी कलपूरा ने एक पादरी पर सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाकर खुद को अपमानित करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि पुलिस से शिकायत के बाद उनकी छवि खराब करने के लिए चर्च फर्जी वीडियो फैला रहा है।

J&K में पाबंदी राष्ट्रहित में: कश्मीर टाइम्स की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहुॅंचा PCI

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से जारी संचार पाबंदियों का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने समर्थन किया। पीसीआई ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर की है। राज्य में संचार व्यवस्थाओं पर रोक को ‘राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता’ के हित में बताते हुए कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन की याचिका में हस्तक्षेप की मॉंग की गई है।

भसीन ने पाबंदियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। उनका कहना है कि सूचनाओं के आदान-प्रदान पर व्यापक रोक बोलने और और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मोबाइल, इंटरनेट और लैंडलाइन सेवाओं सहित संचार के सभी तरीकों को तुरंत बहाल करने के लिए केंद्र सरकार को दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।

लाइव लॉ के अनुसार 16 अगस्त को CJI की अगुवाई वाली पीठ ने भसीन की याचिका पर सुनवाई को दो हफ्ते के लिए टाल दिया था और कहा था कि सरकार को सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए और समय दिया जाना चाहिए।

उनकी याचिका में हस्तक्षेप की माँग करने वाला PCI प्रेस काउंसिल अधिनियम 1978 के तहत ‘प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने और भारत में समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों के मानकों को बनाए रखने और सुधारने’ के उद्देश्य से बनाया गया वैधानिक निकाय है। याचिका में PCI ने कहा है कि उसका काम न केवल प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है बल्कि वो ‘नागरिकता के अधिकारों और जिम्मेदारियों दोनों की भावना को बढ़ावा’ और किसी भी विकास की समीक्षा करने व संभावनाओं के लिए जनहित और महत्व के समाचारों के प्रसार को प्रतिबंधित करने के लिए बाध्य है।

याचिका में कहा गया है, “संविधान के सबसे विवादास्पद प्रावधान को हटाने, जिसमें राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता के हित में संचार और अन्य सुविधाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है, वो भसीन के अधिकारों का हनन नहीं करता है।”

UAE ने अपने सर्वोच्च सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ से PM मोदी को नवाजा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शनिवार (अगस्त 24, 2019) को अबू धाबी में यूएई (UAE) के सर्वोच्च नागरिक सम्‍मान ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ से नवाजा गया। क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने प्रधानमंत्री को इस सम्मान से सम्मानित किया। बता दें कि, पीएम मोदी अपना दो दिवसीय फ्रांस दौरा खत्म कर अबू धाबी पहुँचे हैं। अबू धाबी पहुँचने पर पीएम मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

मोदी और क्राउन प्रिंस के बीच द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा भी हुई। इस साल अप्रैल में यूएई ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजने की घोषणा की थी। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस से रवाना होने के बाद ट्वीट करके बताया कि उनका फ्रांस दौरा काफी सफल रहा। उन्होंने कहा कि इस दौरान दोनो देशों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर बातचीत हुई। यह बातचीत आपसी सहयोग को बढ़ाएगी और नए मौके देगी। साथ ही उन्होंने फ्रांस की जनता और सरकार को मेहमानवाजी के लिए शुक्रिया भी कहा।


बैरंग वापस: J&K गए राहुल गाँधी समेत सभी विपक्षी नेताओं को एयरपोर्ट से ही वापस दिल्ली भेजा गया

जम्मू-कश्मीर के हालात जानने के लिए राहुल गाँधी समेत कई विपक्षी नेता श्रीनगर पहुँचे थे। न्यूज़ एजेंसी ANI के अनुसार, राहुल गाँधी समेत सभी विपक्षी राजनेताओं को एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकलने दिया गया और उन्हें एयरपोर्ट से ही वापस दिल्ली भेज दिया गया। इनमें गुलाम नबी आज़ाद, डी राजा, शरद यादव, मनोज झा, मजीद मेमन और अन्य नेता शामिल थे।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शुक्रवार (अगस्त 23, 2019) की रात बयान जारी कर विपक्षी राजनेताओं को घाटी की यात्रा करने से मना किया था। प्रशासन का कहना था कि उनके घाटी में आने से शांति-व्यवस्था और आम जनजीवन बहाल करने में बाधा पहुँचेगी। इसके बावजूद, पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी शनिवार (अगस्त 24, 2019) को 8 दलों के 11 विपक्षी नेताओं के साथ श्रीनगर पहुँच गए थे।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अपने बयान में कहा था कि ऐसे वक्त में जब सरकार राज्य के लोगों को सीमा पार आतंकवाद के खतरे और आतंकवादियों तथा अलगाववादियों के हमलों से बचाने की कोशिश कर रही है और उपद्रवियों तथा शरारती तत्वों को नियंत्रित कर लोक-व्यवस्था बहाल करने की कोशिश कर रही है, तब वरिष्ठ राजनेताओं की ओर से आम जनजीवन को धीरे-धीरे पटरी पर लाने में बाधा डालने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। अगर वो इलाके का दौरा करेंगे, तो उन पाबंदियों का भी उल्लंघन करेंगे, जो अब भी कई इलाकों में लागू है। वरिष्ठ नेताओं को समझना चाहिए कि शांति-व्यवस्था और जानहानि को रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।

नोटबंदी में गड़बड़ी पर पहली सजा: PNB के 3 कर्मचारियों को 4 साल की जेल, 4-4 लाख रुपए का जुर्माना

नोटबंदी के बाद अवैध तरीके से धन के लेन-देन के मामले में CBI की विशेष अदालत ने शुक्रवार (23 अगस्त) को पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के तीन कर्मचारियों को चार साल जेल की सज़ा सुनाई। नोटबंदी के दौरान गड़बड़ी करने के मामले में संभवत: यह सजा सुनाए जाने का पहला मामला है। अदालत ने कहा कि बैंक कर्मचारियों ने अपने कृत्यों से ‘उस संस्थान पर धब्बा‘ लगाया, जिसमें काम करते हुए वे आगे बढ़े।

विशेष न्यायाधीश राजकुमार चौहान ने पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों रामानंद गुप्ता, भुवनेश कुमार जुल्का और जितेन्दर वीर अरोड़ा को 10.51 लाख रुपए की वैध राशि को ग़लत तरीके से नोटबंदी की राशि के रूप में दिखाने और इसे ‘अनधिकृत और अवैध’ रूप से बदलने के लिए दोषी ठहराया।

अदालत ने कहा,

“दोषी के बैंक अधिकारी होने के कारण उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का पालन करें। दोषियों के कृत्य ने संस्थान पर धब्बा लगा दिया जिसमें काम करते हुए वे वरिष्ठ अधिकारी के पद तक पहुँचे…यह नोटबंदी के बाद बैंक अधिकारियों द्वारा शक्ति के दुरूपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण प्रतीत होता है।”

अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) के साथ धारा 409 (आपराधिक विश्वासभंजन), धारा 471 (फ़र्ज़ी दस्तावेज़ो को मूल दस्तावेज़ के तौर पर इस्तेमाल करना), 477 ए (खाते में धोखाधड़ी) के साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13 (2), धारा 13(1) (डी) (नौकरशा द्वारा आपराधिक आचरण) के तहत दोषी ठहराया। साथ ही अदालत ने हर दोषी पर चार- चार लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया।

ग़ौरतलब है कि तीनों बैंक कर्मचारियों के ख़िलाफ़ PNB की एक शाखा के उप सर्कल प्रमुख ने पांच अप्रैल 2017 को शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें कहा गया था कि आरोपियों ने PNB की सिविल लाइन ब्रांच में दो बार ग़लत रिकॉर्ड बनाया है, जो कि डिपॉजिटर द्वारा भरे गए असली वाउचर से मेल नहीं खा रहा था। डिपॉजिटर ने लीगल टेंडर के रूप में कैश जमा कराया था। इनमें, 100, 50, 20, 05, 02 और 1 रुपए के नोट और सिक्के थे।

तीनों बैंक कर्मचारियों ने साज़िश रचते हुए डिपॉजिट को चलन से बाहर हो गए 500 और 1000 के नोट के रूप में दिखाया। CBI के आरोप के मुताबिक़, बैंक कर्मचारियों ने 10.51 लाख रुपए को अवैध तरीके से एक्सचेंज किया। CBI ने 6 अप्रैल, 2017 को FIR दर्ज की थी। ट्रांजेक्शन की जाँच से पता चला कि कैश लेने के बाद कर्मचारियों ने अपनी आईडी से CBS सिस्टम में फीड किया था। बैंक के वाउचर में दर्ज डिनॉमिनेशन बैंक सिस्टम में अलग थे।

राहुल गाँधी संग विपक्षी डेलीगेशन पहुँचा श्रीनगर, एयरपोर्ट से बाहर निकलने की इजाजत नहीं

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शुक्रवार (अगस्त 23, 2019) की रात बयान जारी कर विपक्षी राजनेताओं को घाटी की यात्रा करने से मना किया था। प्रशासन का कहना था कि उनके घाटी में आने से शांति-व्यवस्था और आम जनजीवन बहाल करने में बाधा पहुँचेगी। इसके बावजूद, पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी शनिवार (अगस्त 24, 2019) को 8 दलों के 11 विपक्षी नेताओं के साथ श्रीनगर पहुँच गए।

विपक्षी डेलीगेशन के एयरपोर्ट पर पहुँचते ही हंगामा शुरू हो गया। सुरक्षा-व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्हें एयरपोर्ट से बाहर नहीं जाने दिया गया। राहुल के साथ मौजूद नेताओं में गुलाम नबी आजाद, एनसीपी नेता माजिद मेमन, सीपीआई लीडर डी. राजा के अलावा शरद यादव समेत कई दिग्गज नेता हैं। श्रीनगर एयरपोर्ट पर अलर्ट जारी कर दिया है। 

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अपने बयान में कहा था कि ऐसे वक्त में जब सरकार राज्य के लोगों को सीमा पार आतंकवाद के खतरे और आतंकवादियों तथा अलगाववादियों के हमलों से बचाने की कोशिश कर रही है और उपद्रवियों तथा शरारती तत्वों को नियंत्रित कर लोक-व्यवस्था बहाल करने की कोशिश कर रही है, तब वरिष्ठ राजनेताओं की ओर से आम जनजीवन को धीरे-धीरे पटरी पर लाने में बाधा डालने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। अगर वो इलाके का दौरा करेंगे, तो उन पाबंदियों का भी उल्लंघन करेंगे, जो अब भी कई इलाकों में लागू है। वरिष्ठ नेताओं को समझना चाहिए कि शांति-व्यवस्था और जानहानि को रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।

जाते-जाते जेटली गिना गए नेहरू और अब्दुल्ला की करतूतें, लिखा- ‘यह नया भारत है, बदला हुआ भारत है’

विचारों के प्रति प्रतिबद्ध, कानून के जानकार, हाजिरजवाब, दोस्तों के दोस्त… अरुण जेटली को आप जैसे चाहें याद कर सकते हैं। जेटली हर मसले का बारीक और विस्तृत विश्लेषण करने वाले नेताओं में से थे। किस विषय पर कब और कैसे अपनी बात रखनी है यह उनसे सीखा जा सकता है। यही कारण है कि उनका ब्लॉग भी काफी चर्चित रहा।

अपना आखिरी ब्लॉग में उन्होंने 6 अगस्त को लिखा था। इसमें संसद के सफल और ऐतिहासिक सत्र के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को विशेष तौर पर धन्यवाद देते हुए उन्होंने अपनी बात शुरू की है। तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर पर सरकार के फैसले की तारीफ करते हुए विस्तार से बताया है कि कैसे आर्टिकल 370 की वजह से चीजें बिगड़ी। कैसे नेहरू और शेख अब्दुल्ला के प्रयोगों की प्रयोगशाला बन गया जम्मू-कश्मीर।

ब्लॉग की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखा है, “संसद का वर्तमान सत्र सबसे अधिक सफल रहा है। इस सत्र में ऐतिहासिक बिल पारित किए गए हैं। ट्रिपल तलाक कानून, भारत के आतंकवाद विरोधी कानूनों को मजबूत करना और अनुच्छेद 370 पर निर्णय सभी अभूतपूर्व हैं। सरकार की नई कश्मीर नीति के समर्थन में जनता का मूड इतना मजबूत है कि कई विपक्षी दलों ने जनता की राय के आगे घुटने टेक दिए। राज्यसभा के लिए दो-तिहाई बहुमत से इस फैसले को मंजूरी देना किसी की भी कल्पना से परे है।”

फिर उन्होंने जम्मू-कश्मीर पर विफल प्रयासों का सिलसिलेवार तरीके से विवरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि विभाजन के बाद पश्चिम पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी भारत आए। पंडित नेहरू की सरकार ने उन्हें जम्मू-कश्मीर में बसने नहीं ​दिया। पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला पर भरोसा किया जिसने राज्य को अपने ‘पर्सनल किंगडम’ में बदल दिया।

उन्होंने लिखा है, “कश्मीर पर पंडित नेहरू ने हालात का आकलन करने में भारी भूल की थी। उन्होंने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पर भरोसा करके उन्हें राज्य की बागडोर सौंपने का फैसला किया। 1953 में उनका विश्वास शेख से उठ गया और उन्हें जेल में बंद कर दिया।”

जेटली ने फिर बताया है कि कैसे इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने कश्मीर में प्रयोग किए। उन्होंने बताया है कि बाद में शेख अब्दुल्ला को रिहा करने और बाहर से कॉन्ग्रेस का समर्थन सुनिश्चित कर इंदिरा गाँधी ने उनकी सरकार बनवाई। कुछ महीने के भीतर ही शेख अब्दुल्ला के सुर बदल गए और इंदिरा गाँधी को छले जाने का अहसास हो गया। 1987 में राजीव गाँधी ने एक बार फिर से नीतियों को बदला। शेख अब्दुल्ला के बेटे फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। चुनाव में धांधली हुई। कुछ उम्मीदवार जिन्हें जोड़-तोड़ कर हराया गया, वे बाद में अलगाववादी और आतंकवादी तक बन गए।

जेटली ने लिखा है, “जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की ऐतिहासिक भूल से देश को राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी। आज, जबकि इतिहास को नए सिरे से लिखा जा रहा है, उसने ये फैसला सुनाया है कि कश्मीर के बारे में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दृष्टि सही थी और पंडित नेहरू जी के सपनों का समाधान विफल साबित हुआ है।”

उन्होंने लिखा है, “1989-90 तक हालात काबू से बाहर हो गए। अलगाववाद के साथ आतंकवाद की भावना जोर पकड़ने लगी। कश्मीरी पंडितों को वैसे अत्याचार बर्दाश्त करने पड़े, जैसे अत्याचार केवल नाजियों ने ही किए थे। पंडितों को घाटी से खदेड़ दिया गया।”

ब्लॉग में जेटली ने आगे बताया है कि अलगाववाद के जोर पकड़ने पर विभिन्न राजनीतिक दलों की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार ने तीन नए प्रयास किए। अलगाववादियों के साथ बातचीत की कोशिश की, जो व्यर्थ साबित हुई। द्विपक्षीय मामले के रूप में पाक के साथ बातचीत की कोशिश की गई। जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों पर भरोसा कर उन्हें सत्ता में बिठाया। लेकिन यह भी असफल रहा।

कॉन्ग्रेस के लिए जेटली ने लिखा है, “कॉन्ग्रेस पार्टी की विरासत ने इस समस्या का सृजन किया और उसे बढ़ाया। अब कॉन्ग्रेस के लोग व्यापक तौर पर सरकार के फैसले का समर्थन कर रहे हैं। नया भारत बदला हुआ भारत है। केवल कॉन्ग्रेस इसे महसूस नहीं करती है। कॉन्ग्रेस नेतृत्व पतन की ओर अग्रसर है।”