20 दिनों में 5 गोल्ड जीत कर देश का नाम रोशन करने वाली हिमा दास परिचय की मोहताज नहीं। स्वर्णिम प्रदर्शन से लाखों भारतीयों को उन्होंने अपना मुरीद बना लिया है। इनमें सद्गुरु वासुदेव जग्गी भी हैं। सद्गुरु ने उन्हें गोल्डन शॉवर बताया है।
इस शब्द से सद्गुरु का अभिप्राय स्वर्ण वर्षा से था। लेकिन, लिबरलों ने इसे पोर्नोग्राफी से जोड़ दिया। असल में अर्बन डिक्शनरी में ‘गोल्डन शॉवर’ स्लैंग की तरह इस्तेमाल होता है। इसका अर्थ होता है ‘सेक्शुअल डिजायर के लिए किसी के ऊपर पेशाब करना।’
सद्गुरु ने ट्वीट किया, “हिमा दास, भारत के लिए गोल्डन शॉवर (सोने की बारिश) की तरह हैं। बधाई और आशीर्वाद।” सद्गुरु ने यह ट्वीट 18 जुलाई को किया था। मगर 23-24 जुलाई से अचानक उनके इस ट्वीट की आलोचना होने लगी।
उनका मजाक उड़ाने वाले कथित बुद्धिजीवियों में एक नाम ट्विंकल खन्ना का भी है। उन्होंने ‘गोल्डन शॉवर’ पर सद्गुरू का मज़ाक उड़ाते हुए उसी तरह के शब्दों के इस्तेमाल किया जिस तरह के शब्द पुलवामा के आतंकियों ने इस्तेमाल किए थे। हालाँकि लोगों की नाराजगी के बाद ट्विंकल ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।
सद्गुरु ने ‘गोल्डन शॉवर’ का इस्तेमाल कनकधारा स्तोत्रम के लिहाज से किया था। कनकधारा स्तोत्रम आदि शंकराचार्य रचित है। कहा जाता है कि जब आदि शंकराचार्य ने इसकी रचना की थी तो तो देवी लक्ष्मी ने स्वर्ण पुष्पों की बौछार की थी।
आध्यात्मिक गुरु होने के नाते संभव है कि सद्गुरु को यह ज्ञात नहीं होगा कि ‘गोल्डन शॉवर’ एक स्लैंग है। ज्यादातर लोग इससे अनजान ही होंगे।
इसके अलावा, ‘गोल्डन शॉवर’ एक सुंदर फूल ‘कैसिया फिस्टुला’ को भी कहते हैं। इसका इस्तेमाल सजावट और हर्बल चिकित्सा में किया जाता है। यह थाइलैंड का राष्ट्रीय फूल भी है। साथ ही केरल का राजकीय पुष्प भी है।
जाहिर है कि ट्विंकल खन्ना को देवी लक्ष्मी के आशीर्वाद या इस सुंदर फूल की विशेषताओं के बारे में कुछ नहीं पता था। लेकिन इस अनभिज्ञता ने उनकी कुत्सित मानसिकता को उजागर कर दिया है!
लोकसभा में बृहस्पतिवार को दिनभर चली चर्चा के बाद बहुप्रतिक्षित मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक यानी तीन तलाक पर रोक सम्बन्धी बिल पास हो गया। मत विभाजन के दौरान पक्ष में 303 और विपक्ष में 82 वोट पड़े। बिल में संशोधन के लिए विपक्षी दलों के तरफ से लाए गए प्रस्ताव भी ख़ारिज हो गए ।
Lok Sabha passes The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Bill, 2019. pic.twitter.com/At2g6iwjan
असदुद्दीन ओवैसी की ओर से लाए गए संशोधन को सदन ने ध्वनिमत से खारिज कर दिया। एनके प्रेमचंद्रन का संशोधन प्रस्ताव भी खारिज हो गया।
लोकसभा में बिल को विचार के लिए पेश करने के प्रस्ताव पर विपक्षी सांसदों ने वोटिंग की माँग की थी। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ने इसकी अनुमति दी। पक्ष में 303 वोट मिलने के बाद तीन तलाक बिल पास होने की घोषणा स्पीकर ने कर दी।
लोकसभा में दूसरी बार पास हुआ है यह बिल
कॉन्ग्रेस, डीएमके, एनसीपी समेत कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया जबकि टीएमसी और सरकार की सहयोगी जेडीयू ने सदन से वॉक आउट कर दिया। इससे पहले फरवरी में भी लोकसभा में बिल को मंजूरी मिल गई थी, लेकिन राज्यसभा ने इसे मंजूरी नहीं दी थी। सत्ता मैं लौटने के बाद सरकार ने विधेयक को दोबारा लोकसभा में पेश किया था। हालाँकि, राज्यसभा में तीन तलाक बिल पास कराना अब भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
ओवैसी ने कहा- यह कानून औरतों पर जुल्म जैसा
AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “तीन तलाक कानून महिलाओं के खिलाफ है। क्या शौहर जेल में रहकर भत्ता देगा? सरकार इस तरह औरतों को सड़क पर लाने का काम कर रही है। इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट की तरह होती है। यह जन्म-जन्म का साथ नहीं है। मैं सुझाव देता हूँ कि कानून न बनाकर मेहर की 500% रकम लौटाने का प्रावधान कर दिया जाए। हमको इस्लामिक देशों से मत मिलाइए वरना कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा।”
विधेयक में ये हुए थे बदलाव
अध्यादेश के आधार पर तैयार नए बिल के मुताबिक, आरोपित को पुलिस जमानत नहीं दे सकेगी। मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। उन्हें पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा।
बिल के मुताबिक, मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा माँ के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपित को उसका भी गुजारा देना होगा। तीन तलाक का अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफआईआर दर्ज कराएँ।
दिल्ली के गैंगस्टर अब्दुल नासिर ने केन्द्रीय राज्यमंत्री रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) ज्वाइन किया है। उसे पार्टी के यूथ विंग का प्रमुख बनाया गया है।
उसने 18 जुलाई को अठावले की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। गैंगवार के मामले में तिहाड़ जेल में बंद रहा नासिर इसी साल अप्रैल में पेरोल पर तिहाड़ जेल से निकला था। बाहर निकलने के बाद वह फरार हो गया और अब दिल्ली पुलिस उसकी तलाश कर रही है।
33 साल के नासिर पर मकोका के तहत मामला दर्ज है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री अठावले ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं थी। अब हम जॉंच कर रहे हैं।”
दिल्ली पुलिस के मुताबिक नासिर का छेनू पहलवान के साथ गैंगवार चल रहा था। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 2015 में हुए इस गैंगवार में 17 लोगों की हत्या हुई थी। इस गैंगवार में कड़कड़डूमा कोर्ट में दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की भी हत्या कर दी गई थी।
महिला नेत्रियों को लेकर अमर्यादित टिप्प्णी करने से सपा सांसद आजम खान बाज नहीं आ रहे। गुरुवार को लोकसभा में तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान उन्होंने भाजपा सांसद रमा देवी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।”
इस टिप्पणी ने उस वक्त सदन की अध्यक्षता कर रहीं रमा देवी को असहज कर दिया। इसके बाद खुद लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला ने चेयर सँभाल ली। केंद्रीय कानून मंंत्री रविशंकर प्रसाद समेत कई नेताओं ने आजम खान से माफी की मॉंग की।
BJP MP Rama Devi(in the chair) said ‘ This is not the way to speak, please expunge these remarks. Azam Khan replied ‘ You are very respected, you are like my sister.’ https://t.co/stEjzZJMut
इसके बाद आजम खान ने कहा, “मेरी मंशा गलत नहीं थी। मैं महिला स्पीकर को अपनी बहन मानता हूॅं।” लेकिन, बीजेपी के कुछ सदस्य उनसे माफी की मॉंग करते रहे। इस पर आजम खान ने बिफरते हुए कहा कि जलालत के बीच कुछ भी बोलना ठीक नहीं। यह कहते हुए वह लोकसभा से बाहर निकल गए।
हंगामे के बीच उनके बचाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी खड़े हुए। उन्होंने आजम खान की टिप्पणी को ‘कविता’ बताते हुए कहा कि उन्होंने जो कहा उसमें कुछ गलत नहीं था।
असल में, आजम जब अपनी बात रखने के लिए सदन में खड़े हुए तो उन्होंने कहा कि मुख्तार अब्बास नकवी कहॉं हैं। इस पर स्पीकर रमा देवी ने उनसे कहा कि आप इधर-उधर की बात न करें, बल्कि चेयर की ओर देखकर अपना विषय रखें। इस पर आजम खान ने स्पीकर को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।
पश्चिम बंगाल से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। बीरभूम जिले के रामपुरहाट सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों ने रुनी खातून नामक 22 वर्षीय युवती के पेट से 1.6 किलो गहने और सिक्के निकाले हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार युवती मानसिक रूप से अस्वस्थ है और गहने तथा सिक्के निगल जाती थी।
अस्पताल के सर्जरी विभाग के प्रमुख सिद्धार्थ बिस्वास ने बताया कि युवती को पेट दर्द के बाद अस्पताल लाया गया था। अल्ट्रासाउंड में उसके पेट में धातु की वस्तुएँ नजर आईं और उसकी सर्जरी की गई। उन्होंने बताया कि सवा घंटे चली सर्जरी के बाद युवती के पेट से 5 और 10 रुपये के 90 सिक्के, चेन, बालियाँ, झुमके, चूड़ियां, पायल, कड़ा और घड़ियाँ निकाली गई। ज्यादातर गहने तांबे और पीतल के थे। कुछ सोने के गहने भी थे।
युवती की मॉं ने बताया कि उसकी बेटी मानसिक रूप से अस्वस्थ है। पिछले कुछ दिनों से वह हर बार खाना खाने के बाद उल्टी कर रही थी।
महिला ने बताया कि उनकी बेटी अपने भाई की दुकान से सिक्के और गहने लाती थी। युवती के भाई की ज्वेलरी शॉप है। सर्जरी में शामिल एक डॉक्टर के मुताबिक जब भी भूख लगती थी युवती गहने और सिक्के निगल लेती थी। घरवालों का कहना है कि वे युवती पर नजर रखते थे, लेकिन कब वह गहने और सिक्के निगलती थी यह पता नहीं चल पाता था।
यूँ तो देश का एक बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीति से त्रस्त था ही, लेकिन देशी रियासतों के नवाबों और राजाओं ने भी जनता पर दमन और शोषण का कहर ढा रखा था। जब युद्ध के बहाने भारत देश की अभावग्रस्त प्रजा को लूटा जा रहा था, ऐसे समय में उत्तराखंड राज्य में जन्म लिया था बालक श्री दत्त ने, जो बाद में श्री देव सुमन के नाम से जाने गए। श्रीदेव सुमन (मूल नाम श्रीदत्त बडोनी) को टिहरी रियासत और अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ जनक्रान्ति कर अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए याद किया जाता है। आज उन्हीं श्री देवसुमन की पुण्यतिथि है। उनके बलिदान दिवस को उत्तराखंड राज्य में ‘सुमन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
ब्रिटिश हुकूमत और टिहरी की अलोकतांत्रिक राजशाही के खिलाफ लगातार आन्दोलन कर रहे श्रीदेव सुमन को दिसंबर, 1943 को टिहरी की जेल में नारकीय जीवन भोगने के लिए डाल दिया गया था। झूठे गवाहों के जरिए उन पर मुकदमा चलाया गया। इसी दौरान मुक़दमे की पैरवी करते हुए श्रीदेव सुमन ने कहा था- “हाँ, मैंने प्रजा के खिलाफ लागू काले कानूनों और नीतियों का हमेशा विरोध किया है। मैं इसे प्रजा का जन्मसिद्ध अधिकार मानता हूँ।”
देश का एक वर्ग शायद ही श्री देव सुमन के बलिदान से परिचित हो। लेकिन देश सरदार भगत सिंह के नाम को जरूर जानता है। मात्र 29 की अवस्था में ही जनता के लिए प्रजामण्डल की स्थापना की माँग करने के कारण अपनी ही रियासत के राजाओं द्वारा प्रताड़ना और क्रूरतापूर्ण शोषण के बाद प्राण त्यागने वाले श्रीदेव सुमन की कहानी सरदार भगत सिंह के बलिदान से कम नहीं है।
श्रीदेव सुमन: 25 मई, 1916 – 25 जुलाई, 1944
श्रीदेव सुमन का जन्म उत्तराखंड के टिहरी राज्य में हुआ था। ये वही टिहरी है, जहाँ पर आज एशिया का सबसे ऊँचा बाँध स्थित है। इस विशाल जलाशय को इन्हीं श्रीदेव सुमन के नाम पर ‘श्रीदेव सुमन सागर’ के नाम से भी जाना जाता है।
श्रीदेव सुमन का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब जनता राजशाही को ही आखिरी फरमान समझती थी। यूरोप प्रवास पर होते थे, तब प्रशासन के अधिकारी ही जनता पर मनमर्जी थोपते थे और राजा के लौटने पर उनके कान भरते थे। 25 मई, 1915 को श्रीदेव सुमन ने टिहरी के ही जौल गाँव में जन्म लिया था। हालाँकि, टिहरी रियासत को अंग्रेज कभी भी अपना गुलाम नहीं बना पाए थे, लेकिन यहाँ की हर कार्यवाही में उनका खुला हस्तक्षेप था। जैसा कि कुछ इतिहासकार भी लिखते हैं; राजपरिवार अंग्रेजों के एहसानों तले इस कदर डूबा हुआ था कि 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों को छुपने के लिए अपने राजमहल ले द्वार खोल दिए और खुद लोगों के घरों और जंगलों में दिन गुजारते गए। बदले में अंग्रेजों ने भी खूब कृपा बरसाई।
30 दिसम्बर, 1943 से 25 जुलाई, 1944 तक 209 दिन सुमन ने टिहरी की नारकीय जेल में बिताए। इस दौरान इन पर कई प्रकार से अत्याचार होते रहे, झूठे गवाहों के आधार पर जब इन पर मुकदमा दायर किया गया तो इन्होंने अपनी पैरवी स्वयं की और लिखित बयान देते हुए कहा-
“मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं जहाँ अपने भारत देश के लिये पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय में विश्वास करता हूँ वहीं, टिहरी राज्य में मेरा और प्रजामंडल का उद्देश्य वैध व शांतिपूर्ण उपायों से श्री महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन प्राप्त करना और सेवा के साधन द्वारा राज्य की सामाजिक, आर्थिक तथा सब प्रकार की उन्नति करना है। हाँ, मैंने प्रजा की भावना के विरुद्ध काले कानूनों और कार्यों की अवश्य आलोचना की है और मैं इसे प्रजा का जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूँ।”
लेकिन, इस सबके बावजूद झूठे मुकदमे और फर्जी गवाहों के आधार पर 31 जनवरी, 1944 को दो साल का कारावास और 200 रुपया जुर्माना लगाकर इन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया। इस दुर्व्यवहार के विरोध में सुमन ने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ कर दिया, जिससे जेल के कर्मचारी कुछ झुके, लेकिन उनकी बात महाराजा से नहीं करवाई गई। श्रीदेव सुमन लगातार माँग करते रहे कि उनकी बातें राजा तक पहुँचाई जाएँ, लेकिन बदले में उन्हें कठोर दंड और यातनाएँ दी गईं।
84 दिन तक जेल में प्रताड़ना और ऐतिहासिक अनशन
शासन की ओर से किसी प्रकार का उत्तर न मिलने पर श्रीदेव सुमन ने विरोध स्वरुप 3 मई, 1944 से अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया। इस बीच उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन पर कई क्रूर अत्याचार किए गए, लेकिन सुमन अडिग रहे। प्रशासन को यह डर था कि श्रीदेव सुमन की जेल में यदि मृत्यु हो गई तो जनता राजशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ देगी। सुमन के इस ऐतिहासिक अनशन का समाचार जब टिहरी की जनता तक पहुँचा, तो रियासत ने यह अफवाह फैला दी कि श्रीदेव सुमन ने अनशन समाप्त कर दिया है और 4 अगस्त को महाराजा के जन्मदिन पर उन्हें रिहा कर दिया जाएगा।
अनशन ख़त्म करने की शर्त पर यह प्रस्ताव सुमन जी को भी दिया गया। लेकिन श्रीदेव सुमन का जवाब था-
“क्या मैंने अपनी रिहाई के लिए यह कदम उठाया है? ऐसा मायाजाल डालकर आप मुझे विचलित नहीं कर सकते। अगर प्रजामण्डल को रजिस्टर्ड किए बिना मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं फिर भी अपना अनशन जारी रखूँगा।”
यह प्रस्ताव ठुकराने के बाद सुमन को जेल के अधिकारियों द्वारा काँच मिली रोटियाँ खाने को दी गईं। प्रताड़ना और अनशन से उनकी हालत बिगड़ती गई। जेलकर्मियों ने लोगों के बीच यह खबर फैला दी कि सुमन को न्यूमोनिया हो गया है, जबकि उन्हें जेल में कुनैन के इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन लगाए गए।
कम्बल में लपेट बोरी के अन्दर सिल दिया मृत शरीर
इन इंजेक्शंस के कारण वो डिहाइड्रेशन से जूझने पर पानी के लिए चिल्लाते, लेकिन उन्हें पानी नहीं दिया जाता था। 20 जुलाई की रात से ही उन्हें बेहोशी आने लगी और 25 जुलाई, 1944 को शाम करीब चार बजे इस अमर सेनानी ने अपने देश और अपने सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी अन्धेरी रात में सुमन की लाश उन्हीं के नीचे बिछे कम्बल में लपेट कर एक बोरी के अन्दर सिल दी गई। फिर एक वार्डन और एक कैदी उस बोझे को लेकर चुपके से जेल के फाटक से बाहर निकले और मृत शरीर को भागीरथी और भिलंगना के संगम से नीचे तेज प्रवाह में फेंक दिया। यह काम जनता से छुपकर किया गया क्योंकि उन्हें सुमन पर किए गए अत्याचारों से हुई इस मृत्यु से जनता द्वारा बगावत किए जाने का भय था।
बलिदान के बाद प्रजामंडल की स्थापना
लेकिन, श्रीदेव सुमन के बलिदान का जनता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और लोगों ने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। सुमन के बलिदान के बाद जनता के आन्दोलन ने टिहरी रियासत को प्रजामण्डल को वैधानिक करार देने पर मजबूर कर दिया। वर्ष 1948 में जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और प्रजामण्डल का मंत्रिपरिषद गठित हुआ। टिहरी गढ़वाल के भारतीय गणराज्य में शामिल हो जाने तक यह आन्दोलन चलता रहा। इसके बाद 1 अगस्त, 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारत गणराज्य में विलीनीकरण हो गया। यही वो समय था, जब वल्लभभाई पटेल हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर और भोपाल जैसी तमाम देशी रियासतों का भारत संघ में मिलाने के प्रयत्न कर रहे थे।
साहित्य से राजनीति तक सुमन का सफर
श्रीदेव सुमन के व्यक्तित्व में कई महापुरुषों की झलक थी। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। रियासत के खिलाफ श्रीदेव सुमन के विरोध में यदि भगत सिंह का जूनून नजर आता था, तो दूसरी ओर वे महात्मा गाँधी के विचारों से भी प्रभावित थे। सुमन एक श्रेष्ठ लेखक और साहित्यकार भी थे। उन्होंने पंजाब विश्विद्यालय से रत्न भूषण, प्रभाकर और बाद में विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षाएँ पास कीं थी। सुमन ने दिल्ली में देवनागिरी महाविद्यालय की स्थापना की और कविताएँ भी लिखने लगे। वर्ष 1937 में ‘सुमन सौरभ’ नाम से अपनी कविताएँ भी प्रकाशित करवाईं। इसी दौरान वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे।
टिहरी के ही गाँव चम्बाखाल में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने टिहरी से मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। विद्यार्थी जीवन के दौरान ही 1930 में देहरादून में सत्याग्रही आन्दोलन में शिरकत करने के कारण उन्हें 15 दिन की जेल और बैंतों से पीटे जाने की सजा मिली थी। इस सबके बीच उनका अध्ययन भी जारी रहा।
लोकतंत्र के शिल्पकार थे सुमन
पत्रकारिता और साहित्य के बाद जनता के लिए प्रतिबद्धता ने श्रीदेव सुमन को गढ़देश सेवा संघ की स्थापना के लिए विवश किया जिसे बाद में हिमालय सेवा संघ के नाम से जाना गया। वे जल्द ही पूरी तरह सामाजिक-राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए। उन्होंने राजशाही के खिलाफ जनता को जागरूक करने की शुरुआत की। 23 जनवरी को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजामण्डल की स्थापना के मौके पर इन्हें संयोजक मंत्री चुना गया।
श्रीदेव सुमन हिमालयी रियासतों में जनता को जागरूक करने के साथ ही उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का काम भी करते रहे। यहीं से श्रीदेव सुमन रियासत के अधिकारियों की नजर में आ गए और रियासत द्वारा इनके भाषण देने और सभा करने पर रोक लगा दी गई। रियासत के अधिकारियों ने इन्हें नौकरी और लाभ का भी लालच दिया, लेकिन उनके झाँसे में न आने पर सुमन को रियासत से निर्वासित कर दिया गया। श्रीदेव सुमन का प्रभाव जनता पर इतना ज्यादा था कि टिहरी रियासत द्वारा उनके भाषण देने पर रोक लगा दी गई, उन्हें इसके लिए जेल जाना पड़ा। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान वे गिरफ्तार किए गए और एक साल तक देश की विभिन्न जेलों में रखे गए।
टिहरी रियासत के जुल्मों के संबंध में इस दौरान जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा था कि टिहरी राज्य के कैदखाने दुनिया भर में मशहूर रहेंगे, लेकिन इससे दुनिया में रियासत की कोई इज्जत नहीं बढ़ सकती। श्रीदेव सुमन ने टिहरी की जनता के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलन्द करते हुए कहा था- “मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूँगा, लेकिन टिहरी के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूँगा।”
अपने शरीर के कण-कण के नष्ट हो जाने पर भी टिहरी के नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने का दम भरने वाले श्रीदेव सुमन ने अपने इस संकल्प को निभाया भी। उत्तराखंड के निर्माण में श्रीदेव सुमन जैस अमर बलिदानियों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। यह देवभूमि के साथ ही नायकों की भूमि भी है, जिन्होंने समय-समय पर अपने रक्त और बलिदान के उदाहरण पेश कर उत्तराखंड के इतिहास को गौरवशाली बनाया है।
लोकसभा में गुरुवार को तीन तलाक पर रोक से जुड़े बिल पर जारी चर्चा के बीच सपा सांसद एसटी हसन ने एक अनर्गल बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि बीवी को गोली मारने या जला कर मार डालने से बेहतर है कि उसे तीन तलाक दे दिया जाए। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से सांसद हसन इससे पहले हीरोइनों को ‘तवायफ’ बताने को लेकर चर्चा में रह चुके हैं।
सपा सांसद एस टी हसन का तीन तलाक़ पर बेहद विवादास्पद बयान,” घर आने पर अगर कोई अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी) को किसी और के साथ देख ले तो गुस्सा आएगा, उस गुस्से में अपनी पत्नी को मार डालने या जला देने से तो अच्छा यही है कि तीन तलाक़ देकर रुखसत कर दे”। pic.twitter.com/e2Y5bSQcdx
हसन ने कहा, “कभी-कभी ऐसे हालात होते हैं कि अलग होना ही रास्ता होता है तो गोली मारने से बेहतर है कि तीन तलाक देकर महिला को निकाल दिया जाए। सिर्फ हजरत अबू हनीफा को मानने वाले फिरके के लोग ही एक साथ तीन तलाक लेते हैं। यह लड़की वालों पर ही छोड़ दिया जाए कि अबू हनीफा को मानने वालों के यहाँ शादी करें या नहीं।”
ST Hasan, SP MP on Triple Talaq Bill: The criminality clause provides for 3-year-imprisonment & remuneration from man to the wife, how will he provide remuneration if he is in jail? A Muslim will go to jail for 3 years and others for 1 year, is this justice? https://t.co/TguF2keKiG
केंद्र सरकार ने तीसरी बार लोकसभा में इस बिल को पेश किया है। लोकसभा में बिल पर चर्चा के दौरान केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, “ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 24 जुलाई 2019 तक ट्रिपल तलाक के 345 मामले सामने आ चुके हैं।” साथ ही उन्होंने कहा कि यह इंसाफ और इंसानियत का मामला है, हमें मुस्लिम बहनों की चिंता है।
Union Minister Ravi Shankar Prasad in Lok Sabha: After Supreme Court judgement on triple talaq, 345 cases of triple talaq have come to light till 24th July 2019. https://t.co/tLdfqAFIRu
लोकसभा में तो सरकार के पास इस बिल को पास कराने के लिए पर्याप्त नंबर है, लेकिन राज्यसभा से इसे पास कराना आसान नहीं होगा। इस बिल को लेकर बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को सदन में मौजूद रहने के लिए कहा है। विधेयक में तीन तलाक को अपराध करार देने के साथ दोषी को जेल की सज़ा सुनाए जाने का भी प्रावधान है।
बिल का विरोध करेगी कॉन्ग्रेस
मोदी सरकार ने मई में इस बिल का मसौदा पेश किया था। इसके प्रावधानों को लेकर कई विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कॉन्ग्रेस ने इस मसले पर यूपीए के सभी सहयोगी दलों के साथ गुरुवार को बैठक की और इस बिल का विरोध करने का फैसला किया। विपक्ष के साथ एनडीए की सहयोगी जेडीयू भी इस बिल का विरोध करती है।
आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन ने बरेली रेलवे स्टेशन को बम से उड़ाने की धमकी दी है। धमकी मुस्लिम क्षेत्र से कांवड़ यात्रा निकालने को लेकर दी गई है। बरेली स्टेशन मास्टर को पत्र लिखकर धमकी दी गई है। पत्र भेजने वाले ने खुद को इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) का एरिया कमांडर मुन्ने खां उर्फ मुल्ला बताया है।
पत्र में उसने मुस्लिम क्षेत्र में कांवड़ यात्रा निकालने पर जंक्शन को बम से उड़ाने की धमकी दी है। खत मिलने के बाद यहाँ बुधवार रात में आनन-फानन में जंक्शन पर आरपीएफ और जीआरपी जवानों की गश्त तेज कर चेकिंग अभियान शुरू कर दिया गया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जिला प्रशासन और सिविल पुलिस को भी इसकी जानकारी दे दी गई है। जिसके बाद शीर्ष प्रशासनिक अफसर, खुफिया विभाग के साथ सिविल पुलिस ने भी जंक्शन पर लगातार निरीक्षण और निगरानी शुरू कर दी है।
खतरनाक आंतकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के कथित एरिया कमांडर ‘मुल्ला’ के बरेली जंक्शन को बम से उड़ाने की धमकी को लेकर पुलिस-प्रशासन काफी संजीदा है। गुरुवार को एडीजी अविनाश चंद्र जंक्शन पर निरीक्षण के लिए पहुँचे उन्होंने जीआरपी और आरपीएफ अधिकारियों को सुरक्षा में किसी तरीके की कोताही न बरतने के निर्देश दिए।
मुन्ने खाँ उर्फ मुल्ला, एरिया कमांडर, आइएम, बरेली मंडल के खत में लिखा है, “मैं एरिया कमांडर आइएम, रेलवे स्टेशन मास्टर को अवगत कराता हूँ कि मुसलमान क्षेत्र में कांवड़ यात्रा निकली तो जंक्शन को उड़ा दूँगा। अभी मैं शांति से काम चाहता हूँ। आप शासन-प्रशासन को अवगत करा देना।”
साभार- दैनिक जागरण
बता दें कि बरेली स्टेशन मास्टर के पास डाक के जरिए पहुँचे खत में दो मुहर लगी हैं। एक बरेली की मुहर है। वहीं, लिफाफे के अगले हिस्से पर डाक टिकट के साथ लगी मुहर साफ नहीं है। बावजूद इसके संबंधित जाँच अधिकारी टिकट और मुहर के जरिए डाक महकमे की मदद से यह पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं कि खत कहाँ से भेजा गया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एडीजी, अविनाश चंद्र ने बताया कि धमकी भरे खत का सच पता किया जा रहा है। पुलिस सतर्क है। चेकिंग भी कराई जा रही है। अगर किसी की खुराफात है तो उस पर भी कार्रवाई की जाएगी।
कथित रूप से आइएम के एरिया कमांडर मुल्ला के खत को लेकर आला अधिकारी संशय में हैं। वजह, खत में स्टेशन मास्टर बरेली को संबोधित करते हुए ‘सेवा में’ लिखा है। जानकार बताते हैं कि अमूमन आतंकी संगठन इस तरह के शब्द से संबोधित नहीं करते। बावजूद इसके पुलिस-प्रशासन या खुफिया विभाग कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
पश्चिम बंगाल से टीएमसी के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी का एक नया कारनामा सामने आया है। जानकारी के मुताबिक हुगली के हीरालाल पाल कॉलेज में एक प्रोफेसर को टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा सिर्फ़ इसलिए मारा गया क्योंकि वे उन छात्रों को बचाने का प्रयास कर रहे थे जिनसे टीएमसी कार्यकर्ता ‘टीएमसी जिंदाबाद’ और ‘ममता बनर्जी जिंदाबाद’ बुलवाने के लिए मारपीट कर रहे थे।
खबरों के मुताबिक यहाँ टीएमसी छात्र संगठन से जुड़े छात्र अन्य छात्रों से ‘ममता बनर्जी जिंदाबाद’ का नारा लगाने को कह रहे थे, लेकिन जब दूसरे छात्रों ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उन्होंने एक सीनियर छात्रा से मारपीट की। जब प्रोफेसर सुबरता चट्टोपाध्याय छात्रों को टीएमसी के छात्र संघ से बचाने के लिए बीच में आए तो टीएमसी कार्यकर्ताओं ने उनपर भी हमला कर दिया। जिसके बाद प्रोफेसर पर हुए हमले की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगी।
While so called intellectual were busy writting open letter to PM accusing intolerence, TMC student wing were busy showing intolerance, they are thrashing a professor who refuse to chant Mamata Banerjee Zindabad. pic.twitter.com/nnBa0YLKp7
प्रोफेसर के मुताबिक करीब एक बजे एक छात्रा एमए के एग्जाम के बाद अपने दोस्तों के साथ क्लासरूम में फोटो खींच रही थी कि तभी टीएमसी का छात्रसंघ वहाँ पहुँचा और उनसे बदसलूकी करने लगा। विवाद बढ़ने पर उन्होंने मामले को सुलझाना चाहा, लेकिन तृणमूल समर्थक छात्रों से ममता बनर्जी जिंदाबाद और तृणमूल जिंदाबाद के नारे लगाने को कहने लगे। जब छात्रों ने ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने छात्रा को थप्पड़ मार दिया।
इसके बाद जो हुआ उसे हम सोशल मीडिया पर वायरल हुई वीडियो में देख सकते हैं। किस तरह प्रोफेसर के साथ टीएमसी कार्यकर्ताओं ने न केवल सिर्फ़ धक्का-मुक्की की बल्कि उनके साथ बेरहमी से मारपीट भी की। इस घटना के बाद प्रोफेसर सुब्रतो कॉलेज के एंट्रेंस गेट पर अपना सिर पकड़कर बैठे गए और कहने लगे कि उनके चेहरे और सिर पर चोट आई है। खबरों की मानें तो इस मामले के मद्देनजर प्रोफेसर सुब्रतो चट्टोपाध्याय की तरफ़ से उत्तरपाड़ा थाने में तहरीर दे दी गई है।
उनका कहना है कि छात्र संघ के सदस्य कैंपस में हमेशा उपद्रवी बर्ताव करते हैं लेकिन फिर भी वे उनके नाम नहीं ले सकते। क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उन्हें कैंपस के अंदर नहीं घुसने दिया जाएगा।
गौरतलब है टीएमसी छात्र संघ के सदस्यों द्वारा आदिवासी महिला स्टाफ का शोषण करने के विरोध में इससे पहले भी रविंद्र भारती यूनिवर्सिटी के कई एचओडी और डीन इस्तीफ़ा दे चुके हैं। लेकिन हालातों में कोई सुधार नहीं हुआ।
उत्तर प्रदेश के बरेली के एक गॉंव में मजहब विशेष से खौफजदा हिन्दू समुदाय के लोग पलायन और धर्मांतरण को मजबूर हैं। दिल्ली से क़रीब 300 किलोमीटर दूर बरेली के मिल्क पिछोड़ा गाँव में हिन्दू अल्पसंख्यक और समुदाय विशेष वाले बहुसंख्यक हैं। इस गॉंव के हिन्दुओं की माने तो दूसरे समुदाय वाले उन्हें पूजा-पाठ नहीं करने देते। विरोध करने पर उनके घर की लड़कियों को उठाने की धमकी देते हैं। हिन्दुओं के मुताबिक कई बार गुहार लगाने के बावजूद प्रशासन उनकी नहीं सुन रहा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह गाँव बरेली ज़िला मुख्यालय से लगभग 70 किमी की दूरी पर है जो कि वरुण गाँधी के संसदीय क्षेत्र पीलीभीत की बहेड़ी विधानसभा के अंतर्गत आता है। गाँव में लगभग 150 हिन्दू और 1,000 समुदाय विशेष से हैं। गाँव के हिन्दुओं का कहना है कि ग्राम समाज की ज़मीन पर पिछले 70 वर्षों से एक छोटा-सा मंदिर है, जिसका निर्माण कार्य गाँव वाले मिलकर कराना चाहते हैं। लेकिन, दूसरे समुदाय के लोग उन्हें न तो पूजा करने देते हैं और न ही मंदिर का निर्माण करने दे रहे हैं। विरोध करने पर दूसरे समुदाय के लोग लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से उन पर हमला कर देते हैं।
इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने बरेली ज़िले के एसएसपी मुनीराज और एएसपी अर्पित विजयवर्गीय से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस ने ऐसी घटना से इनकार किया है।
दैनिक जागरण ने हिन्दू महिलाओं के हवाले से बताया है कि सम्प्रदाय विशेष के लोग मंदिर में घंटा बजाने और मूर्ति पर जल चढ़ाने भी नहीं देते। यदि कोई हिन्दू इसका विरोध करता है तो दूसरे समुदाय के लोग उनके घर की लड़कियों को उठा लेने की धमकी देते हैं। सरस्वती नामक महिला ने बताया कि रोज-रोज इस तरह के धमकी भरे माहौल में रहना दूभर हो गया है। सभी अधिकारियों से मदद की गुहार भी लगाई, लेकिन उसका कोई नतीजा अब तक नहीं निकला है। उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय विधायक छत्रपाल सिंह से भी कोई मदद नहीं मिली। सरस्वती ने कहा कि जहाँ पूजा-पाठ की स्वतंत्रता न हो, वहाँ से चले जाना ही बेहतर है।
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ग्रामीणों का कहना है कि केन्द्र में मोदी और राज्य में योगी सरकार है। बावजूद इसके हिन्दू न तो कांवड़ यात्रा निकाल सकते हैं और न ही पूजा-पाठ कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने पुलिस पर भी एकतरफ़ा कार्रवाई का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने हिन्दू समाज के सैकड़ों लोगों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज किया और सभी को मुचलका पाबंद भी किया। इन सब से तंग आकर ग्रामीणों ने यह फ़ैसला लिया है कि इस मामले पर अगर उनकी सुनवाई नहीं की गई तो या तो वो धर्म परिवर्तन कर लेंगे और या फिर गाँव छोड़कर चले जाएँगे।
ख़बरों के अनुसार, बरेली के एसएसपी मुनीराज का कहना है कि ग्रामीण नया मंदिर बनाना चाहते हैं, जो नियम के विरुद्ध है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार किसी नए धर्मिक स्थल का निर्माण नहीं हो सकता।