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फिर से खुलेंगी 1984 सिख नरसंहार से जुड़ी फाइल्स, कई नेताओं की परेशानी बढ़ी: गृह मंत्रालय का अहम फैसला

1984 सिख विरोधी दंगों की फाइलें फिर से खुलने वाली हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मामले को लेकर चल रही जाँच का दायरा बढ़ाते हुए यह अहम निर्णय लिया है। मंत्रालय ने स्पेशल जाँच टीम (SIT) को ऐसे सभी मामलों की फाइल्स फिर से खोलने की अनुमति दे दी है, जिनमें आरोपितों को या तो क्लीन चिट दे दी गई थी या फिर जाँच पूरी हो चुकी थी। अर्थात, अब सिख नरसंहार से जुड़े इन सभी मामलों की नए सिरे से जाँच होने की उम्मीद है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने अधिक जानकारी देते हुए बताया कि एसआईटी उस सभी मामलों की सूची बना रही है, जिसमें फिर से ट्रायल शुरू किया जाएगा अथवा जाँच फिर से शुरू की जाएगी।

वरिष्ठ अधिकारी ने ‘द हिन्दू’ से कहा कि एसआईटी ने क़ानूनी सलाह लेने के बाद सिख नरसंहार से जुड़े उन मामलों की सूची तैयार करनी शुरू कर दी है, जिनमें आरोपितों को बरी कर दिया गया या फिर दोषमुक्त कर दिया गया। इन सभी मामलों में नए सिरे से जाँच शुरू की जाएगी। वर्ष 2015 में भाजपा के सत्ता संभालने के एक वर्ष बाद ही केंद्र सरकार ने एक एसआईटी का गठन किया था जो मुख्य रूप से दिल्ली क्षेत्र में सिखों के ख़िलाफ़ 1984 में हुई हिंसा के मामले में जाँच कर रही है।

3 सदस्यीय एसआईटी को इन दंगों से जुड़े वैसे गंभीर आपराधिक मामलों की जाँच का जिम्मा सौंपा गया था, जिनके लिए दिल्ली में मामले दर्ज किए गए थे। इसमें कई बंद मामलों को भी फिर से खोलने की बात कही गई थी। सबूत होने की स्थिति में फिर से नई चार्जशीट फाइल करने को भी कहा गया था। एसआईटी की जाँच के बाद नवंबर 2016 में एक आरोपित को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। दिल्ली की एक अदालत ने महिपालपुर में 2 सिख युवकों की निर्मम हत्या के मामले में ये सज़ा सुनाई। इसी मामले में एक अन्य आरोपित को उम्रक़ैद की सज़ा दी गई। इस मामले को 1994 में ‘सबूत न होने’ के कारण बंद कर दिया गया था।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी के प्रतिनिधियों की बातें सुनने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जाँच का दायरा बढ़ा दिया। गृह मंत्रालय ने कहा कि 1984 सिख विरोधी दंगे के वीभत्स रूप को देखते हुए इससे जुड़े सभी ऐसे गंभीर मामलों में जाँच फिर से शुरू की जाएगी, जिसे बंद कर लिया गया था, या फिर जाँच पूरी कर ली गई थी। इस मामले में गठित एसआईटी का कार्यकाल इसी वर्ष जुलाई की अंतिम तारीख को ख़त्म होने वाला है। विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि मंत्रालय के इस निर्णय के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं।

सिरसा ने दावा किया कि कमलनाथ का नाम सामने आने के बावजूद पार्लियामेंट पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक एफआईआर में उनका नाम शामिल नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि ये एफआईआर कमलनाथ के घर से ही दर्ज की गई थी। ये मामला भी फिर से खोला जाएगा। दिसंबर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक रिटायर्ड जज के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया था, जो सिख नरसंहार से जुड़े 186 मामलों की जाँच कर रही है। कमिटी ने इस मामले में लोगों से भी सूचनाएँ एकत्रित की थी।

‘पतली गर्लफ्रेंड’ के मिलते ही पत्नी के मोटापे से हुआ परेशान, बोला- तलाक, तलाक, तलाक!

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से सोमवार (जुलाई 1, 2019) को ट्रिपल तलाक का एक नया मामला सामने आया। यहाँ फरधान थाना क्षेत्र की रहने वाली शाहीन नाम की मुस्लिम महिला ने पसगवां थाना क्षेत्र में रहने वाले अपने पति पर आरोप लगाया कि उसने शाहीन को मोटी होने के कारण तलाक दे दिया।

पुलिस को दर्ज कराई शिकायत में शाहीन ने कहा है कि उनके पति ने उन्हें मोटी और अपने लायक न बताकर तलाक दिया। जिसके बाद ससुराल वालों ने भी उन्हें घर से निकाल दिया।

जानकारी के अनुसार शाहीन की 5 साल की एक बेटी है और वह जब भी अपनी बच्ची को लेकर ससुराल जाती है तो वहाँ उसके पति के घरवाले उसके साथ मारपीट करते हैं और तीन तलाक का हवाला देकर घर से निकाल देते हैं।

शाहीन का आरोप है कि उनके पति का किसी और दुबली औरत के साथ संबंध हैं इसलिए उन्हें मोटी कहकर तलाक दे दिया गया।

आज तक की खबर के अनुसार पीड़ित महिला ने बताया है, “मेरा पति मुझसे कहता है कि तुम बहुत मोटी हो और मुझे अच्छी नहीं लगती, मुझे पत्नी के तौर पर कोई दूसरी लड़की चाहिए इसलिए हम तलाक दे रहे हैं।” हालाँकि, शाहीन का कहना है कि वह इस तरह के तलाक को नहीं मानती हैं इसलिए अपने पति के खिलाफ थाने में केस दर्ज करवाने आई है।

बता दें कि इस मामले में लखीमपुर खीरी की एसपी पूनम के अनुसार महिला की शिकायत पर एफआईआर दर्ज कर ली गई है और पुलिस को भी जाँच के आदेश दे दिए गए हैं, जाँच के बाद आगे कार्रवाई होगी।

‘अगर अनुच्छेद 370 अस्थायी है तो भारत में जम्मू कश्मीर का विलय भी अस्थायी है’

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद में की गई टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्ति की है। अमित शाह ने विपक्षी नेताओं को अनुच्छेद 370 ठीक से पढ़ने की नसीहत देते हुए इसे एक अस्थायी व्यवस्था बताया था। शाह ने कहा था कि इस अनुच्छेद की बात तो ख़ूब की जाती है लेकिन इसके लिए प्रयोग किया गया ‘अस्थायी’ शब्द को जानबूझ कर हाइलाइट नहीं किया जाता। अमित शाह ने जम्मू कश्मीर पर बात करते हुए कहा था:

“मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर में इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत की नीति पर काम कर रही है। लेकिन, वहाँ जिसके भी मन में भारत-विरोध है, उसके अंदर डर पैदा होना चाहिए। शंका के बीज कॉन्ग्रेस ने रोपे हैं। जो भी जनादेश आया हमने माना। भाजपा के राज में कोई धाँधली नहीं है। राज्‍य में विधानसभा चुनाव इसी साल के अंत तक होंगे। राज्‍य में चुनाव का समय चुनाव आयोग तय करेगा। हमारे समय में चुनाव आयोग आजाद है। हम टुकड़े-टुकड़े गैंग का हिस्‍सा नहीं हैं। हम जम्‍मू कश्‍मीर की आम जनता के ख़िलाफ़ नहीं हैं।”

अमित शाह के इस बयान पर पलटवार करते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फ़ारूक़ ने कहा कि अगर अनुच्छेद 370 अस्थायी है तो जम्मू कश्मीर का भारत में विलय भी अस्थायी है। अब्दुल्ला ने कहा कि महाराजा ने जो विलय का निर्णय लिया, वह भी अस्थायी है। अब्दुल्ला ने दावा किया कि उस समय जनमत संग्रह की बात कही गई थी। जनमत संग्रह के जरिए जम्मू कश्मीर के लोगों को यह निर्णय लेना था कि वे पाकिस्तान की तरफ जाएँगे या फिर भारत के। पूर्व केंद्रीय मंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने पूछा कि अगर जनमत-संग्रह हुआ ही नहीं तो अनुच्छेद 370 हटाने की बात कैसे की जा सकती है?

बता दें कि भाजपा ने चुनाव के वक़्त भी अनुच्छेद 370 और 35A को मुद्दा बनाया था। पार्टी ने सत्ता में आते ही इसे हटाने का वादा किया था। हाल ही में भाजपा नेता राम माधव ने भी कहा कि मोदी सरकार इस अनुच्छेद को निरस्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस पर कश्मीर को मिले विशेषाधिकार का इस्तेमाल अपनी सहूलियत के लिए करने का आरोप लगाया। उन्होंने कश्मीर मामले में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर आरोप लगाते हुए कहा कि अगर उन्होंने सरदार पटेल को जिम्मेदारी दी होती तो आज कश्मीर समस्या नहीं होती।

बता दें कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को विशेषाधिकार प्रदान करता है। इसमें वर्णित प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में क़ानून बनाने का अधिकार तो है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिए केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए। इसके अलावा राष्ट्रपति राज्य के संविधान को बरख़ास्त नहीं कर सकते। इस अनुच्छेद की वजह से कश्मीर में आरटीआई भी लागू नहीं है। इसके अलावा शहरी भूमि क़ानून भी वहाँ लागू नहीं होता। जम्मू कश्मीर का अपना अलग ध्वज है और वहाँ के निवासियों के पास दोहरी नागरिकता होती है। यहाँ विधानसभा का कार्यकाल भी 6 वर्षों का होता है।

भगवा ध्वज लहराना और नारे लगाना कोई अपराध नहीं: दलित उत्पीड़न पर हाईकोर्ट का अहम निर्णय

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक निर्णय देते हुए कहा है कि भगवा ध्वज फहराना दलित उत्पीड़न के अंतर्गत अपराध नहीं है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज किए गए एक मामले में आरोपित को जमानत देते हुए अदालत ने यह अहम फ़ैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इस क़ानून के तहत ऐसा करना कोई अपराध नहीं है। जस्टिस आईए महंती और जस्टिस एएम बदर की खंडपीठ ने शशिकांत महाजन नामक व्यक्ति को जमानत देते हुए ये बातें कहीं, जिसके ख़िलाफ़ पुलिस में भगवा ध्वज लहराने को लेकर मामला दर्ज किया गया था।

पिछले साल इसी मामले में विशेष अदालत ने महाजन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज़ कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया था। जुलाई 2018 में हाईकोर्ट ने उन्हें गिरफ़्तारी से राहत प्रदान की। महाजन का पहले से ही मानना था कि उपर्युक्त क़ानून के तहत उनके द्वारा किया गया कार्य किसी भी अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। उनके ख़िलाफ़ महज भगवा ध्वज लहराने और नारे लगाने को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

महाजन और कई अन्य लोगों के ख़िलाफ़ ठाणे के कल्याण में मामला दर्ज किया गया था। ये सभी भीमा-कोरेगाँव हिंसा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। भीमा-कोरेगाँव में 2 जनवरी 2018 को हिंसा हुई थी। भीमा कोरेगाँव की पृष्ठभूमि यह है कि यहाँ दो सदी पहले पेशवा और अंग्रेजों के बीच एक युद्ध हुआ था, जिसके बाद मराठा साम्राज्य का विजय रथ रुक गया था। पेशवा की तरफ से बाजीराव द्वितीय ने मराठा सेना का नेतृत्व किया था। राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की इस लड़ाई को कई लोग जातीय चश्मे से देखते हैं और इसी की बरसी मनाते समय 2018 में हिंसा भड़क गई थी।

भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में वामपंथियों व नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले कई कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया था। महाजन भी इस हिंसा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। हालाँकि, पुलिस ने अदालत में दलील दी कि इस अधिनियम के तहत अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। महाजन ने ‘जय भवानी’, ‘जय महादेव’ और ‘जय शिवराय’ जैसे नारे लगाए थे।

मस्जिद से निकली भीड़ ने किया बवाल व पत्थरबाज़ी, बंद कराई दुकानें: 600 लोगों पर मुक़दमा

मेरठ के बाद अब आगरा से बवाल की ख़बरें आई हैं। मेरठ की तरह आगरा में हुआ बवाल भी तबरेज अंसारी की भीड़ द्वारा हत्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के बाद शुरू हुआ। आगरा के मंटोला में तबरेज अंसारी की मॉब लिंचिंग के विरुद्ध जबरन दुकानें बंद कराई जाने लगी। हंगामेबाज़ों में अधिकतर ‘समुदाय विशेष’ के लोग शामिल थे। जबरन दुकानें बंद कराने के अलावा दुकानों में लूटपाट भी की गई। दुकानों में बोतलें फेंकी गईं। इसके बाद दोनों पक्षों की तरफ से पथराव हुआ। यह सब सोमवार (जुलाई 1, 2019) को तब शुरू हुआ, जब सैकड़ों की संख्या में समुदाय विशेष के लोग शहर की जामा मस्जिद के पास इकट्ठे हो गए।

उनकी योजना थी कि जामा मस्जिद से समाहरणालय तक पैदल मार्च निकाला जाए और फिर वहाँ पहुँच कर वरीय अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा जाए। लेकिन, वरिष्ठ अधिकारियों ने जामा मस्जिद पहुँच कर ही भीड़ से ज्ञापन ले लिया और उन्हें पैदल मार्च न करने की सलाह दी। इससे मुस्लिम समाज के युवा भड़क गए और प्रदर्शन करने पर उतारू हो गए। पुलिस के लाख रोकने के बावजूद वे पैदल मार्च की शक्ल में आगे बढ़ निकले। जब पुलिस ने बैरियर लगाया तो वे दूसरे रास्तों से कलेक्ट्रेट पहुँचने की कोशिश करने लगे। वो रास्ते में उपद्रव करते और बाजार बंद कराते चल रहे थे।

जब दुकानदारों ने दुकान बंद करने से मना किया तो उनसे लूटपाट की गई। एक मिठाई की दुकान में भी उपद्रवियों ने लूटपाट की। ख़ुद एसएसपी ने मौके पर पहुँच कर स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस ने कहा है कि बिना अनुमति जुलूस निकालने, अफवाह फैलाने और पत्थरबाज़ी करने सम्बन्धी कई मामले दर्ज किए गए हैं। सोमवार को शाम 6 बजे तक पुलिस ने एहतियातन इंटरनेट सेवाएँ भी बंद कर दी। व्यापारियों द्वारा थाने में मुक़दमे दर्ज कराए गए हैं, जिसके आधार पर पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार भी किया है। 38 नामजद सहित 600 लोगों पर मुक़दमा दर्ज किया गया है।

बलवा करने, अफवाह फैलाने, पत्थरबाज़ी करने, लूटपाट करने और बिना अनुमति सभा करने सम्बन्धी कई मामलों में पुलिस ने मामले दर्ज किए हैं। पुलिस का ख़ुफ़िया तंत्र भी इस मामले में फेल हो गया क्योंकि आगरा में तबरेज अंसारी की हत्या के विरुद्ध कई दिनों से गुस्सा सुलग रहा था और इंटरनेट पर भड़काऊ चीजें पोस्ट कर के लोगों को उकसाया जा रहा था। जामा मस्जिद पर पुलिसकर्मियों की ड्यूटी भी कम लगाई गई थी, जिसे उपद्रवियों के हंगामे के बाद बढ़ाया गया। पुलिस अगर पहले से सतर्क रहती तो मस्जिद के पास लोगों की भीड़ जुटने से रोका जा सकता था।

मंटोला में बवाल की ख़बरों के बाद आसपास के क्षेत्र के व्यापारी भी डर गए और उन्होंने अपनी-अपनी दुकानें बंद कर लीं। पुलिस के समझाने के बाद उन्होंने दुकानें खोलीं। पुलिस को मिश्रित आबादी वाले इलाक़ों में लगातार भ्रमणशील रहने के निर्देश दिए गए हैं। 6 मुक़दमों में एक मुक़दमा मोहम्मद ज़ाहिद ने भी दर्ज कराया है। जूता फैक्ट्री चलाने वाले ज़ाहिद ने आरोप लगाया है कि उसके समाज के लोगों ने जबरन फक्ट्री बंद कराने की कोशिश की और धमकियाँ दीं। मंटोला में पिछले एक दशक में लगभग 24 बवाल हो चुके हैं। इरफ़ान सलीम, शिराज कुरैशी, महमूद ख़ान, राहत अली, नदीम नूर, जुहैर ख़ान, हाजी बिलाल और तालिब शहजाद सहित कई लोगों पर मुक़दमे दर्ज किए गए।

नागालैंड में ‘मूल निवासी सर्टिफिकेट’ बँटेंगे, असम के NRC से मिलती-जुलती कवायद

नगालैंड ने भी अपने यहाँ असम के नागरिकता रजिस्टर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) से मिलती-जुलती कवायद करने जा रहा है। अपने मूल, जनजातीय निवासियों की पहचान के लिए वह एक नगालैंड मूलनिवासी रजिस्टर (आरआईआईएन) बनेगा, जिससे मूल नगाओं, और बाहरियों व नकली मूल निवासियों में अंतर किया जा सके। इसके आधार पर मूल निवासियों को मूल निवासी होने के प्रमाण व पहचान पत्र जारी किए जाएँगे। इसका उपयोग नगालैंड में बाहरियों की आवाजाही के लिए लागू परमिट (इनर लाइन परमिट) व्यवस्था में भी होगा।

घर-घर होगी गिनती, जिला प्रशासन करवाएगा सत्यापन

द हिन्दू में छपी खबर के अनुसार राज्य सरकार ने सभी डिप्टी कमिश्नरों को आदेश दिया है कि लोगों के नाम सहित इस काम के लिए लगने वाली टीमों की सूची अधिसूचना जारी होने के एक सप्ताह के अंत तक तैयार हो जाएँ। टीमों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने के अलावा हर ग्राम समिति के अध्यक्ष (विलेज काउन्सिल चेयरमैन), ग्राम विकास बोर्ड सचिव (विलेज डेवलपमेंट बोर्ड सेक्रेटरी) वार्ड अधिकारियों, कबीलों के ‘होहो’ (हर नगा दल या कबीले की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था), चर्च और गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को भी सूचित किए जाने के, सर्वे टीमों को आदेश होगा कि वे हर एक घर में जाएँगी, और वहाँ रह रहे मूल निवासियों की सूची बनाएँगी।

हर परिवार के सदस्य को अपने गाँव में ही गणना में जोड़ा जाएगा और गाँव-घर के बाहर रह रहे परिवार के सदस्यों को भी मूल, पारिवारिक गाँव के ही अप्रवासी निवासियों के तौर पर सूचीबद्ध किया जाएगा। सूची का स्वरूप हर व्यक्ति के ‘स्थाई निवास’ और ‘वर्तमान निवास’ को अलग-अलग लिखने का होगा। इन सूचियों को गाँवों और वार्डों में प्रकाशित कर जिला प्रशासन के पर्यवेक्षण में इसका सत्यापन गाँव और वार्ड के अधिकारी करेंगे। हर सूची पर उसके बाद गाँव या वार्ड के अधिकारी भी टीम के सदस्यों के साथ हस्ताक्षर करेंगे।

10 जुलाई से काम शुरू हो जाएगा

अगस्त में असम में प्रकाशित होने जा रहे एनआरसी के अंतिम ड्राफ्ट के एक महीने से भी कम समय पहले 10 जुलाई से इसकी पर्यवेक्षण टीमें हर गाँव और शहरी वार्ड को कवर करने निकल पड़ेंगी। शनिवार (29 जून) को राज्य के गृह आयुक्त आर रामकृष्णन ने इसके लिए अधिसूचना जारी कर दी है। इस अधिसूचना में एक मास्टर लिस्ट तैयार करने और नकली मूल-निवासी सर्टिफिकेटों की जाँच करने का लक्ष्य रखा गया है

11 सितंबर को पहली सूची, 10 दिसंबर तक प्रक्रिया समाप्त

अस्थायी सूचियों को 11 सितंबर को राय सरकार और जिलों की वेबसाइटों पर डालने के अलावा गाँवों और वार्डों में भी प्रकाशित किया जाएगा। 10 अक्टूबर (एक महीने) तक इस पर आपत्ति जताने का समय दिया जाएगा, और डिप्टी कमिश्नर आपत्तियों का निपटारा आधिकारिक रिकॉर्डों और सबूतों के आधार पर करेंगे। अंतिम सूची बनाने से पहले हर आपत्तिकर्ता को अपनी बात रखने का पूर्ण अवसर दिया जाएगा। सभी आपत्तियों के निपटारे के बाद मूल निवासियों को पहचान प्रमाण पत्र दिए जाएँगे। अधिकारियों के मुताबिक यह सब प्रक्रियाएँ समाप्त करने के लिए 10 दिसंबर तक का समय दिया गया है। अंतिम सूचियाँ जिले और राज्य स्तर पर प्रकाशित करने के अलावा गाँवों और वार्डों में भी प्रसारित की जाएँगी।

अंतिम सूची के आधार पर बने आरआईआईएन को ऑनलाइन इनर-लाइन परमिट प्रणाली के साथ भी एकीकृत किया जाएगा। इस प्रणाली का प्रयोग गैर-निवासियों को नगालैंड में प्रवेश और यात्रा की अनुमति देने वाले दस्तावेज इनर-लाइन परमिट को जारी करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। “आरआईआईएन के एक बार पूरा होने के बाद और कोई मूल निवासी प्रमाण पत्र जारी नहीं होंगे। केवल मूल निवासियों के पैदा होने वाले बच्चों को उनके जन्म प्रमाण पत्र के साथ मूल निवासी प्रमाण पत्र जारी कर दिए जाएँगे और आरआईआईएन को तदनुसार नवीनीकृत कर लिया जाएगा।”

फ्री चिकन देने से इनकार करने पर पड़ोसियों ने मुर्गियों को परोसा ज़हर

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक महिला की मुर्गियों को ज़हर देने का मामला सामने आया है। गुड्डी बाई नाम की महिला ने रविवार (30 जून) को जब यह शिक़ायत झांसी रोड पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई तब यह घटना सामने आई।

शिक़ायत के अनुसार, झांसी रोड थाना क्षेत्र में वैष्णो धाम मंदिर के पास रहने वाली गुड्डी बाई ने दावा किया कि उसके पड़ोसियों ने उसके एक मुर्गे और चार मुर्गियों को मार दिया।

गुड्डी बाई ने कहा कि वह रोज़मर्रा के श्रम से अपना जीवनयापन करती है जो कि पर्याप्त नहीं था इसलिए उसने अंडे बेचकर अतिरिक्त धन कमाने के लिए मुर्गियों को पालना शुरू कर दिया। गुड्डी बाई ने दावा किया कि उसके पड़ोसी सुरेंदर और सुमेर ने उससे एक मुर्गी माँगी थी।

अपनी शिकायत में, गुड्डी बाई ने बताया कि जब वह काम के लिए बाहर गई थी तो आरोपित सुरेंद्र और सुमेर उसके घर आए और उसकी बेटी से एक मुर्गी माँगी।

हालाँकि, जब गुड्डी बाई की बेटी ने उन्हें चिकन देने से इनकार कर दिया, तो दोनों पड़ोसियों ने मुर्गे की गर्दन को काट दिया और अन्य चार मुर्गियों को ज़हर दे दिया।

जब गुड्डी बाई काम से वापस आई, तो उसने अपनी मुर्गियों को मृत पाया। जब उनकी बेटी ने इस घटना के बारे में बताया, तो गुड्डी बाई ने अपनी मृत मुर्गियों को झांसी रोड पुलिस स्टेशन ले गई और शिक़ायत दर्ज कराई। इस मामले में पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है।

झांसी रोड पुलिस स्टेशन के उप-निरीक्षक और मामले के जाँच कर रहे अधिकारी, राजीव के अनुसार, ‘गुड्डी बाई ने सुरेंद्र और सुमेर के ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज की है, जिसके आधार पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-429 के तहत मामला दर्ज किया गया है।’

जाँच अधिकारी ने बताया कि क़ानून के अनुसार, अगर 50 रुपए से अधिक क़ीमत के किसी भी जानवर को मार दिया जाए या ज़हर दिया जाए, तो आरोपित को 5 साल की जेल होगी या उसे भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। हालाँकि, जानवर के मालिक के साथ समझौता करना भी एक विकल्प हो सकता है।

कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन PFI नेता पर चलेगा RSS कार्यकर्ता की हत्या का मुकदमा, SC ने खारिज की बचाव याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में बेंगलुरु में आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के बंगलुरु अध्यक्ष आसिम शरीफ की याचिका सोमवार (जुलाई 1, 2019) को खारिज कर दी। मामले में पहले ही पीएफआई नेता पर हत्या में संलिप्तता को लेकर आरोप तय हो चुके हैं। ये आरोप राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) द्वारा लगाए गए थे जो इस मामले की जाँच कर रही है। मामले में शरीफ के अलावा, कुछ अन्य लोगों के खिलाफ भी आरोपपत्र तैयार किए गए हैं।

आरोपित ने कोर्ट के इस फैसले को 2 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद आरोपी पर फिर से मुकदमा चलने के रास्ते साफ हो गए हैं। न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और एन वी रमन्ना की एक पीठ ने आरोपित की याचिका खारिज कर दी और अब उस पर ट्रायल चलेगा।

गौरतलब है कि, 16 अक्टूबर 2016 को बेंगलुरु के शिवाजी नगर इलाके में संघ के ही एक कार्यक्रम से लौट रहे 35 वर्षीय आरएसएस कार्यकर्ता रुद्रेश की धारदार हथियार से काट कर हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के मामले के बाद काफी राजनीतिक बवाल भी मचा था। आरएसएस के कार्यकर्ता की निर्मम हत्या के बाद स्वयंसेवक सड़क पर उतर गए थे। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये स्पष्ट किया कि मामले को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सबूत है।

इसके साथ ही एनआईए ने यह भी दावा किया था कि आरोपित असीम शरीफ ने लोगों को हिंदू संगठन में शामिल होने से रोकने के लिए आरएसएस के दो और कार्यकर्ताओं को मारने की साजिश रची थी। खबर के मुताबिक, इस हत्या में पीएफआई के चार अन्य नेता भी शामिल थे, जो रुद्रेश को मारने के लिए घात लगाए बैठे थे और मौका मिलने पर उन लोगों ने अचानक उन पर हमला बोल दिया।

क्या मौलवियों की धमकी से टूटी ज़ायरा, परिवार की खातिर फ़िल्मों से बनाई दूरी?

ज़ायरा वसीम द्वारा अल्लाह का हवाला देकर फ़िल्म इंडस्ट्री से दूरी बनाने के मामले में नया मोड़ आया है। कहा जा रहा है कि यह निर्णय उन्होंने डर कर लिया और उनके परिवार को लगातार धमकियाँ मिल रही थीं। इस मामले में एक मौलवी का भी वीडियो सामने आया है। उसका नाम है आदिल। मौलवी आदिल इस वीडियो में साफ़-साफ़ कहता नज़र आ रहा है कि ज़ायरा वसीम जैसी लड़कियाँ इस्लाम के लिए शर्म हैं। मौलवी ने कहा कि फ़िल्मों में अभिनय करना इस्लाम के अनुरूप नहीं है।

मौलवी आदिल का मानना है कि कश्मीर में कथित आज़ादी के लिए चल रहे ‘अभियान’ से भी ज्यादा ज़रूरी है ज़ायरा वसीम जैसी लड़कियों को बताना कि वे बॉलीवुड में काम करना छोड़ें। मौलवी आदिल ने ज़ायरा वसीम के माता-पिता को भी निशाने पर लिया। ज़ायरा वसीम ‘दंगल’ के ब्लॉकबस्टर होने के बाद कश्मीर घाटी में बहुत सारी लड़कियों की रोल मॉडल बन गई थीं और उनकी अगली फ़िल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में ऐसे विषय उठाए गए थे, जिससे उन्हें अपना रोल मॉडल मैंने वालों का उनमें विश्वास और प्रगाढ़ हुआ।

टाइम्स नाउ की ख़बर के अनुसार, ज़ायरा के माता-पिता का कश्मीर में अपने घर से बाहर निकलना तक दूभर हो गया था। उन्हें धमकियाँ मिलने लगी थी। राज्य सरकार को भी ऐसी ख़ुफ़िया इनपुट्स मिली थीं कि ज़ायरा वसीम व उनके परिवार की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है। वैसे ‘दंगल’ की रिलीज के बाद भी ज़ायरा की कट्टरपंथियों द्वारा काफ़ी आलोचना की गई थी लेकिन तब वो नहीं झुकी थीं। राज्य सरकार ने जम्मू में ज़ायरा व उनके परिवार को आवास देने की भी व्यवस्था करने की बात कही थी लेकिन राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद ऐसा नहीं हो पाया।

घाटी में ज़ायरा वसीम के परिवार वालों की हालत यह हो चुकी थी उन्हें अपने घर को बाहर से बंद कर के रखना होता था। वहाँ समाज में एक तरह की ग़लत धारणा है, जिसके कारण ज़ायरा व उनके परिवार वालों की ज़िन्दगी मुश्किल में गुज़र रही थी। इससे कश्मीरी मूल के वरिष्ठ बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर का वो शक सही साबित होता दिख रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि ज़ायरा वसीम का निर्णय उनका ख़ुद का ही है बल्कि इसके लिए उन्हें बाध्य किया गया है।

ज़ायरा वसीम ने बॉलीवुड से दूरी बनाने के पीछे का कारण बताते हुए कहा था कि उनका फ़िल्मों में काम करना उनके और अल्लाह के बीच में आ रहा था। इसके लिए उन्होंने क़ुरान की आयतों की भी दुहाई दी थी। इसके बाद कई हस्तियों ने इस बारे में अलग-अलग राय दी थी। जहाँ फ़ारूक़ अब्दुल्ला का कहना था कि ज़ायरा ने शायद अपने बॉयफ्रेंड के कहने पर यह निर्णय लिया, वहीँ सोनम महाजन ने पूछा की अगर किसी हिन्दू अभिनेत्री ने अपने धर्म को कारण बता कर ऐसा किया होता तो लेफ्ट लिबरल गिरोह की क्या प्रतिक्रिया रहती?

ISI का ‘हनी-ट्रैप’: जवानों को फँसाने के लिए चल रहे 125 फेसबुक अकाउंट पर ATS की नज़र

सेना के अधिकारियों और पूर्व सैनिकों को हनी-ट्रैप में फँसा कर उनसे गुप्त सैन्य जानकारी निकलवाने वाला एक गिरोह उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंक-निरोधक दस्ते (एटीएस) के निशाने पर है। संख्या में कुल 125 इन अकाउंटों को लेकर शक जताया जा रहा है कि ये पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI द्वारा भारतीय सैन्यकर्मियों को फ़ँसा कर उनसे जानकारी निकलवाने के लिए चलाए जा रहे हैं। 

आईबी, सैन्य इंटेलिजेंस के साथ जानकारी साझा 

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के मुताबिक एटीएस ने इस मामले से जुड़ा डाटा ख़ुफ़िया ब्यूरो (आईबी) और सैन्य गुप्तचर महानिदेशालय (डीएमआई) के साथ भी साझा किया है। इन सभी अकाउंटों की फ्रेंड-लिस्ट में कम-से-कम एक फ्रेंड सेना या फिर किसी अर्धसैनिक बल का है। सभी 125 अकाउंटों में करीब 1,000 के आस-पास फेसबुक फ्रेंड हैं, जिनमें कई जवानों और सेना में नौकरी के इच्छुक अभ्यर्थियों से लेकर के गैर कमीशन-प्राप्त अफसर भी शामिल हैं।

ब्रह्मोस इंजीनियर की गिरफ़्तारी के बाद से पुलिस चौकन्नी

पिछले साल ब्रह्मोस मिसाइल के एयरोस्पेस इंजीनियर निशांत अग्रवाल और बीएसएफ के जवान अच्युतानंद मिश्रा की अक्टूबर में गिरफ़्तारी के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस सोशल मीडिया पर कड़ी निगहबानी किए हुए हैं। दोनों ही लोगों को आईएसआई ने फेसबुक के ज़रिए हनी-ट्रैप किया था। अग्रवाल ने तो यहाँ तक कबूल किया कि उसने ट्रेनिंग के दौरान अपने सीनियर के कम्प्यूटर से भी डाटा चुराया। वह डाटा सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल से जुड़ा था।

फेसबुक पेज बन रहा ‘शिकारगाह’, सिविलियन्स भी रहे सतर्क

निकल के यह भी सामने आ रहा है कि ‘जॉइन इंडियन आर्मी’ नामक एक फेसबुक पेज को लाइक करने वालों में से ही हनी-ट्रैप हो सकने वाले शिकारों का ‘चयन’ हो रहा है। एटीएस के अतिरिक्त महानिदेशक असीम अरुण ने यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि हनी-ट्रैप करने वाले केवल सैन्यकर्मियों और सेना में रिश्ते रखने वालों ही नहीं, आम नागरिकों (‘सिविलियन्स’) के भी निशाना बनने से इंकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे एक भोले-भाले नागरिक युवक को कनाडा में नौकरी का लालच दे कर उससे सेना के जवानों की चौकियों और सैन्य आयुधागारों की फोटो खिंचवाईं गईं। उसे अपने आपको ‘साबित’ करने की चुनौती दी गई थी