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विजय शंकर की एड़ी में चोट से मयंक अग्रवाल को मौका, रायडू के हाथ लगी निराशा

भारतीय ऑलराउंडर विजय शंकर विश्व कप 2019 से बाहर हो गए हैं। दरअसल, एड़ी में लगी चोट की वजह से वो रविवार (30 जून) को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ प्लेइंग इलेवन का हिस्सा नहीं थे। सोमवार (1 जुलाई) को यह घोषणा की गई कि अब वो विश्व कप के बाक़ी मैचों में नहीं खेल सकेंगे। ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि उनकी जगह पर मयंक अग्रवाल को जगह मिल सकती है।

कर्नाटक के सलामी बल्लेबाज मयंक अग्रवाल ने पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ क्रिकेट में डेब्यू किया था, लेकिन वो अब तक भारत के लिए एक दिवसीय टीम से डेब्यू नहीं कर पाए हैं। 

BCCI के एक सीनियर अधिकारी के अनुसार, “जसप्रीत बुमराह की गेंद पर विजय शंकर की एड़ी में चोट लग गई थी। अभी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और वो विश्व कप के बाक़ी मैंचों में नहीं खेल पाएँगे। वो स्वदेश वापस लौटेंगे।”

बता दें कि इंग्लैंड के ख़िलाफ़ विजय शंकर की जगह ऋषभ पंत को प्लेइंग इलेवन में शामिल किया गया था। टीम मैनेजमेंट उनकी जगह मयंक अग्रवाल को जगह मिल गई है। फ़िलहाल वो सलामी बल्लेबाज़ हैं और वर्तमान स्थिति को देखते हुए उन्हें राहुल से नंबर-4 पर बल्लेबाज़ी कराने का निर्णय लिया जा सकता है। ऋषभ पंत और अम्बाती रायडू और नवदीप सैनी रिज़र्व खिलाडी थे।

भारत के कप्तान विराट कोहली ने रविवार को इंग्लैंड के खेल के दौरान सूचित किया था कि ऑलराउंडर के पैर के अँगूठे में दर्द था और संकेत भी अच्छे नहीं थे। इसके अलावा, इंग्लैंड के खेल की पूर्व संध्या पर कोहली ने विजय शंकर की प्रशंसा भी की थी।

‘अपने बॉयफ्रेंड के कहने पर ज़ायरा वसीम ने लिया फ़िल्म इंडस्ट्री को अलविदा कहने का निर्णय’

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने अभिनेत्री जायरा वसीम द्वारा इस्लाम के नाम पर बॉलीवुड से दूरी बनाने के पीछे अजीबोग़रीब कारण गिनाया है। जहाँ कई नेता, मुस्लिम धर्मगुरु और बॉलीवुड की हस्तियाँ जायरा के फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ने को लेकर अपनी-अपनी राय दे रहे हैं, फ़ारूक़ ने कहा कि क्या पता कहीं उनके बॉयफ्रेंड ने उन्हें ऐसा करने को कहा हो। हालाँकि, पूर्व केंद्रीय मंत्री फ़ारूक़ ने यह भी कहा कि इस्लाम किसी को कोई भी काम या जॉब करने से नहीं रोकता। उन्होंने इस्लाम को काफ़ी लिबरल मज़हब बताते हुए दावा किया कि जायरा के होने वाली पति या बॉयफ्रेंड ने उन्हें ऐसा करने को कहा होगा।

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने आगे कहा, “अगर मैं उन्हें कभी मिलूँगा तो उन्हें ये बात ज़रूर बोलूँगा कि वह काफी अच्छा काम कर रही थीं। ये उनकी पर्सनल च्वाइस है। बॉलीवुड में काम करने से कोई गैरमुस्लिम नहीं बन जाता है।” फ़ारूक़ की राय इस मामले में उनके बेटे उमर अब्दुल्ला से अलग दिखी। उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि यह जायरा का निजी निर्णय है और हम इस पर टिप्पणी करने वाले कौन होते हैं? उन्होंने कहा था कि जायरा अपनी करना चाहती हैं, यह उनका निजी मामला है। उमर अब्दुल्ला ने जायरा को शुभकामनाएँ देते हुए उनके ख़ुश रहने की कामना की थी।

वहीं, दूसरी तरफ़ वरिष्ठ बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर ने भी अंदेशा जताया है कि जायरा को बॉलीवुड छोड़ने के लिए किसी ने दबाव डाला है। खेर ने कहा कि उन्हें जायरा के निर्णय से दुःख हुआ है। उन्होंने जायरा को अकेले छोड़ने की अपील करते हुए कहा कि अगर उन्होंने मज़हब के आधार पर ऐसा निर्णय लिया है तो हो सकता है कि किसी ने उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया हो। जम्मू कश्मीर पुलिस अधिकारी इम्तियाज़ हुसैन ने कहा कि वो जायरा के इस निर्णय का स्वागत करते हैं लेकिन इसमें मज़हब और आस्था को बीच में लाना ग़लत है।

न्यूज़ एंकर आतिका फ़ारूक़ी ने कहा कि मज़हब संस्कृति, कला एवं मनोरंजन के विरुद्ध नहीं है बल्कि वह तो इन सबका समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि मज़हब ज़रूर ज़ायरा के इस निर्णय पर हँस रहा होगा। फ़ारूक़ी ने लिखा “मैं भी उनके इस निर्णय पर हँस रही हूँ। ज़ायरा ने अल्लाह के साथ मेरे संबंधों को नुक़सान पहुँचाया है।

सोनम महाजन ने ट्विटर पर पूछा कि अगर किसी हिन्दू अभिनेत्री ने धर्म को कारण बता कर इंडस्ट्री छोड़ी होती तो क्या होता? सोनम ने कहा कि तब लेफ्ट लिबरल गिरोह के लोग हिन्दू धर्म को एक आदिम व्यवस्था बताते और उस अभिनेत्री के निर्णय के लिए उसकी आलोचना कर रहे होते।

बता दें कि इंस्टाग्राम व फेसबुक पर किए पोस्ट में ज़ायरा वसीम ने फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ने की घोषणा करते हुए लिखा कि फ़िल्मों में काम करना उनके अल्लाह के साथ संबंधों के बीच में आ रहा है। उन्होंने इस्लाम का हवाला देते हुए क़ुरान की आयतें लिखीं और अपने इस निर्णय के बचाव की कोशिश की। उनकी फ़िल्म ‘स्काई इज ब्लू’ कुछ दिनों बाद रिलीज होने वाली है।

‘तबरेज को मिले शहीद का दर्जा’: विरोध के नाम पर मेरठ में हज़ारों उपद्रवियों का कहर, लहराए ISIS के झंडे

मॉब लिंचिंग ग़लत है लेकिन इसके विरोध के नाम पर आतंक फैलाना इससे भी ज्यादा ग़लत है। कल रविवार (जून 30, 2019) को मेरठ में यही हुआ। मुस्लिम समाज के लोगों ने जब मॉब लिंचिंग का विरोध करते हुए हुडदंग शुरू किया, तब स्थानीय पुलिस प्रशासन के बड़े अधिकारी भी लाचार नज़र आए। ‘युवा सेवा समिति’ ने फैज-ए-आम कॉलेज से हापुड़ अड्डे तक पैदल मार्च का प्रोग्राम बनाया था। खबर पर आगे बढ़ने से पहले बता दें कि इस समिति के अध्यक्ष का नाम बदर अली है, जिसे पुलिस पहले ही नोटिस जारी कर चुकी है। पुलिस द्वारा मना करने के बावजूद दोपहर के बाद से भीड़ जुटनी शुरू हो गई और देखते-देखते शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर अशांति का खेल खेला जाने लगा।

इस मामले में दोनों ही संस्थाओं ने पुलिस के आदेश का मखौल उड़ाया- एक फैज-ए-आम कॉलेज ने और दूसरे बदर अली की युवा सेवा समिति ने। पुलिस ने धारा-144 लगे होने की बात कह प्रदर्शन के लिए मना भी किया लेकिन इन संस्थाओं पर कोई असर नहीं पड़ा। जब फैज-ए-आम से मार्च निकलना शुरू हुआ, तब उस भीड़ द्वारा मज़हबी टिप्पणियाँ की गईं और उन्मादी नारे लगाए गए। बदमाशों ने इंस्पेक्टर तक को नहीं छोड़ा। इंस्पेक्टर को सरेआम गिरेबान पकड़ कर धमकाया गया। इन्स्पेटर के हाथ से डंडा भी छीन लिया गया। इंस्पेक्टर का गला पकड़े जाने के बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। इसके बाद राहगीरों तक को नहीं बख्शा गया। इस कारण लम्बा ट्रैफिक जाम लग गया और लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

मामले को हाथ से फिसलता देख पुलिस ने शहर के काजी व मौलवियों का सहारा लिया। काजी के कहने पर बदर अली व उसके संगठन ने अपना मार्च ख़त्म किया। पुलिस और उपद्रवियों के बीच काफ़ी देर तक भिड़ंत चली। पुलिस द्वारा लाठीचार्ज करने पर यह अफवाह फैलाया गया कि पुलिस बेकसूर लोगों को मार रही है, लेकिन ऐसा नहीं था। बवाल को और भड़काने के लिए ऐसी अफवाहें फैलाई गईं लेकिन जब लोगों को सच्चाई का पता चला तो उन्होंने राहत की साँस ली। इस मामले में कुल 70 लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गई है, जिनमें से कुछ के नाम हैं- बदर अली, आमिर गाजी, दानिश सैफी, वासिद अली, नईम सागर, वकार, अरशद सैफी, मारूफ, हाजी सईद, इमरान, अकरम शाह, इक़बाल अब्बासी, रशीद, जाविद व अन्य।

‘हिंदुस्तान’ के मेरठ संस्करण में छपी ख़बर

उपद्रवियों और पुलिस की कुल तीन जगह बुरी तरह झड़प हुई। उपद्रवियों ने पूरा हापुड़ हवाई अड्डा जाम कर दिया था। कम से कम हज़ारों लोग उस भीड़ में शामिल थे, जिनमें से अधिकतर युवा थे। तबरेज अंसारी के फोटो-बैनर के साथ इन्होंने हंगामा किया। भीड़ द्वारा अंसारी को शहीद का दर्जा देने की भी माँग की गई। मामला इतना बढ़ गया कि एसएसपी को मौक़े पर पहुँच कर स्थिति को नियंत्रित करना पड़ा। कुल पाँच थानों में उपद्रवियों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए हैं। पुलिस ने इस मामले में रासुका के तहत कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। पुलिस को बवाल शांत कराने के लिए काजी जैनुस सजिदीन की मदद लेनी पड़ी, जिनके समझाने के बाद भीड़ शांत हुई।

दैनिक जागरण के मेरठ संस्करण में छपी ख़बर

स्थानीय भाजपा नेताओं ने दावा किया कि इस जलूस में आईएसआईएस के झंडे भी लहराए गए। अधिकारियों को कुछ वीडियो फुटेज सौंपी गई है, जिसके आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि यहाँ कुछ आतंकी भी छिपे हो सकते हैं, जो माहौल बिगाड़ने की साज़िश में शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि इस पूरे बवाल की योजना पहले ही तैयार कर ली गई थी और बदर अली ख़ुद भीड़ में शामिल नहीं हुआ बल्कि युवाओं को आगे कर के काम चलाया। सिटी एसपी से धक्कामुक्की की गई। देहात क्षेत्र से भी युवकों को बुलाए जाने की बात सामने आई है।

₹1500 करोड़ के इस्लामिक बैंक घोटाले में SIT ने BBMP के पार्षद सैयद मुजाहिद को किया गिरफ्तार

विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) के पार्षद सैयद मुजाहिद को रविवार (जून 30, 2019) को आई मॉनेटरी एडवाइजरी (I Monetary Advisory) के 1,500 करोड़ रुपए के घोटाले के संबंध में पुलकेशिनगर में एमएम रोड स्थित उनके निवास से गिरफ्तार किया।

पुलिस का कहना है कि मुजाहिद आईएमए ग्रुप के नेता मोहम्मद मंसूर खान के साथ वित्तीय लेनदेन में शामिल था। आईएमए घोटाला को अंजाम देने के बाद मंसूर खान 8 जून को देश से फरार हो गया। एसआईटी की टीम ने काउंसिलर के आवास की तलाशी ली और उसे गिरफ्तार करने से पहले घंटे तक पूछताछ की। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, कि जाँच के दौरान एक एसयूवी, दो सेलफोन और कई दस्तावेज बरामद किए, जो कि IMA ग्रुप की कंपनियों से संबंधित थे।

मुजाहिद को 15 दिनों तक पुलिस की हिरासत में रखा जाएगा। पूछताछ में पता चला कि मुजाहिद को जब इस  बात की भनक लगी कि वो एआईटी स्कैनर की नज़र में है तो वो दुबई भागने की फिराक में था। एक अधिकारी ने बताया कि IMA निवेश घोटाला के सामने आने के बाद मुजाहिद दो सप्ताह के लिए गायब हो गया था और फिर वो हाल ही में वो परिवार से मिलने के लिए आया था। पुलिस उसके बारे में जानकारी एकट्ठा कर रही थी और जैसे पुलिस को उसके घर पर होने की बात पता चली, उसे घर से गिरफ्तार कर लिया गया। 

गौरतलब है कि, साल 2006 में खाड़ी से लौटे मोहम्मद मंसूर खान ने इस्लामिक बैंकिंग और हलाल निवेश के नाम पर एक फर्म बनाई जिसका नाम रखा ‘आई मॉनेटरी एडवाइजरी’ (I Monetary Advisory)। इस्लामिक बैंकिंग के नाम पर मंसूर खान ने अपने समुदाय के लोगों से इस फर्म में निवेश करने को कहा। मंसूर खान ने लोगों को बड़े रिटर्न का वादा करके निवेश करने का लालच दिया और जब लोगों ने बड़ी संख्या में निवेश किया, तो उसने उस पैसे से ज्वेलरी, रियल एस्टेट, बुलियन ट्रेडिंग, फार्मेसी, प्रकाशन, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में जमकर व्यवसाय किया और धन कमाया और फिर देश छोड़कर फरार हो गया। फर्म में तकरीबन 10 हजार निवेशकों ने 2,000 करोड़ रुपए का निवेश किया था। मंसूर खान ने लोगों से 14% से 18% तक के रिटर्न का वादा किया था।

क्रिकेट के नाम पर बजरंग बली, उनकी गदा और हिन्दू धर्म का उड़ाया मजाक: कुनाल कामरा की लगी क्लास

वर्ल्ड कप 2019 में भारत और इंग्लैंड के मुक़ाबले से पहले भारतीय टीम की जर्सी का रंग बदल दिया गया था। इस मैच में भारतीय टीम ने नारंगी रंग की जर्सी पहनी थी। यूँ तो भारतीय टीम की जर्सी का रंग नीला ही होता है, लेकिन इंग्लैंड की टीम के ख़िलाफ़ भारतीय टीम की जर्सी का रंग बदलने का निर्णय लिया गया वर्ना दोनों टीमों का रंग नीला ही होता।

भारतीय टीम की जर्सी का रंग बदलने पर कॉमेडियन कुनाल कामरा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक मीम शेयर किया। ट्विटर पर शेयर किए गए इस मीम में एक खिलाड़ी भगवा और नीली रंग की जर्सी पहने नज़र आ रहा है। उसके सिर पर मुकुट है और हाथ में बल्ले की जगह गदा है, तो वहीं सामने से आती गेंद की जगह एक तीर है जिसका बचाव करते यानी रोकते हुए खिलाड़ी को दिखाया गया।

इस मीम के लिए ट्विटर यूज़र्स ने कुनाल कामरा को ट्रोल करना शुरू कर दिया। एक यूज़र ने लिखा कि मोदी जी का यही प्लान है। किसी दिन तुम्हारी ब्लडप्रेशर से दिमाग की नस फट जाएगी।

एक यूज़र ने लिखा कि कुनाल कामरा के ट्वीट को जिन लोगों ने लाइक किया है उन पर शर्म आती है, यह उस क्रिकेट टीम के बारे में है जिसका वह मजाक उड़ा रहा है। यह भारत के बारे में है। वो हिन्दुओं की भावना को आहत कर रहे हैं वो अलग बात है। लेकिन, जिस तरह से वह भारतीय टीम को ट्रोल कर रहे हैं वह उनकी बीमार मानसिकता को दर्शाता है।

वहीं, एक यूज़र ने लिखा, “मैंने कुनाल के कॉमेडी सीन भी देखे हैं, यह एक ही तरह की शर्मनाक अपमानजनक बातें है… यह कॉमेडी तो बिल्कुल भी नहीं है… वो इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नफ़रत फैलाने और लोगों को बाँटने के लिए करते हैं।”

‘CM केजरीवाल और सिसोदिया ने स्कूल चमकाने के नाम पर किया ₹2,000 करोड़ का घोटाला’

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही वक्त रह गया है। इस बीच आज (जुलाई 1, 2019) दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। इस दौरान मनोज तिवारी ने कहा, “हम एक ऐसे स्कैम का खुलासा करने जा रहे हैं, जिसमें दिल्ली के सीएम और डिप्टी सीएम शामिल हैं। एक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि स्कूलों में कमरों के निर्माण के लिए अतिरिक्त ₹2000 करोड़ दिए गए थे, जो केवल ₹892 करोड़ में बनाए जा सकते थे। इन स्कूलों के निर्माण के लिए जिन 34 ठेकेदारों को टेंडर दिए गए, उनमें उनके रिश्तेदार भी शामिल हैं।

दिल्ली भाजपा के आधिकारिक ट्विटर पर दी गई जानकारी के अनुसार, मनोज तिवारी ने मनीष सिसोदिया पर घोटाला करने का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की माँग की है। उन्होंने कहा कि जिस लोकपाल की बात केजरीवाल करते थे, वो उसी लोकपाल को इस घोटाले की जानकारी देने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अच्छे से अच्छे होटल का कमरा भी ज्यादा से ज़्यादा ₹5000 sq.ft से ज्यादा का नहीं बनता, लेकिन केजरीवाल सरकार स्कूल का कमरा ₹8800 sq.ft का बनवा रही है। ये दिल्ली की जनता के टैक्स का ऐसा दुरुपयोग है, जो कहीं देखने को नहीं मिलेगा।

इसके साथ ही, भाजपा सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने कहा कि दिल्ली सरकार कहती है कि उन्होंने शिक्षा का बजट बढ़ाया है। क्या बजट इसलिए था कि इतना बड़ा घोटाला कर सके ताकि इस पैसे का इस्तेमाल चुनाव में कर सकें। उन्होंने कहा कि आलीशान बंगले में भी ₹2200 रुपए sq.ft से ज्यादा का खर्च नहीं आता और दिल्ली सरकार ₹8800 sq.ft का कड़ी टुकड़ी का कमरा बनवा रही है। उन्होंने कहा कि कड़ी टुकड़ी की छत कभी स्कूल में उपयोग नहीं होता, लेकिन इसका उपयोग केजरीवाल सरकार स्कूल के कमरे बनाने में कर रही है। यह कड़ी टुकड़ी की छत सबसे सस्ती बनती है और यह बच्चों की जान के साथ खिलवाड़ है।

दिल्ली की उत्तर पश्चिमी सीट से भाजपा सांसद हंसराज हंस ने भी इस बारे में कहा कि मीडिया को भी अपने स्तर पर जाँच करनी चाहिए कि शिक्षा के नाम पर केजरीवाल सरकार ने इतनी बड़ी लूट की है।

मजहब के नाम पर जायरा ने सिर्फ़ खुद के सपनों को नहीं मारा, बल्कि दूसरी लड़कियों को भी गड्ढे में ढकेला है

दंगल गर्ल जायरा वसीम द्वारा मजहब और करियर के बीच में लिया गया फैसला कल से मुझे भीतर तक बेचैन करता रहा। उन्होंने मजहब का हवाला देकर बॉलीवुड को अलविदा कहा। उनके द्वारा की गई घोषणा में बताया गया कि उनका एक्टिंग करियर उन्हें उनके मजहब से दूर कर रहा था, इसलिए उन्होंने ये कदम उठाया।

मालूम नहीं कि ये फैसला उनकी मर्जी से लिया गया है या उन्होंने किसी दबाव में आकर इसकी घोषणा की। लेकिन अगर वास्तविकता में जो वजह उन्होंने बताई, वही उनके फैसले का आधार है तो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि यह स्थिति कितनी भयावह है। जहाँ इस्लामी मजहब में जन्मी दुनिया भर की लड़कियाँ अपने सपनों को पूरा करने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं, वहीं जायरा और उन जैसी लड़कियाँ आगे होते हुए भी खुद को पीछे की ओर ढकेल रही हैं।

जायरा के इंस्टाग्राम पोस्ट के पहले पन्ने का स्क्रीनशॉट

मुझे दुख इस बात का नहीं है कि उन्होंने बॉलीवुड को छोड़ा, मुझे पीड़ा इस बात से है कि उन्होंने इसके पीछे मजहब को वजह बताया, दुख इस बात का है कि उन्होंने एक्टिंग को यह कह कर छोड़ा कि यह उनके मजहब के खिलाफ है। सोचिए, जिस मजहब को जायरा ने करियर छोड़ने के पीछे का कारण बताया है उसके चलते 2015 में महज 6 साल की फरहीन के सिर से दुपट्टा हटने के कारण उसके पिता जाफर हुसैन ने उसे जमीन पर पटककर मार डाला था। उसके कारण 2018 में हल्दवानी की रहने वाली शहनवाज की माँ की मौत के बाद उसकी पढ़ाई छुड़वा दी गई थी और इसी मजहब के कारण 2018 में एक पिता ने प्रोफेसर बनने का सपना देखने वाली लड़की को घर में कैद कर लिया था। कोई लंबा अरसा नहीं बीता जब खबर आई थी कि ईरान में सिर से दुपट्टा हटाने के कारण एक लड़की को आधिकारिक रूप से 2 साल कैद सुना दी गई। ये सभी घटनाएँ खबरों में सिर्फ़ इसलिए आई थीं क्योंकि मजहब इनके पीछे मुख्य वजह था। फिर भी जायरा ने ऐसा फैसला लिया… आखिर क्यों?

मजहब की दुहाई देने वाली ऐसी अनगिनत खबरों को हम आए दिन सोशल मीडिया से लेकर मीडिया के कॉर्नर में पढ़ते हैं, लेकिन फिर भी हम स्थिति को सुधारने से ज्यादा उसको बिगाड़ने का प्रयास करते हैं। मुझे हैरानी है इस बात से कि हर मौक़े पर लड़कियों के अधिकारों और उनकी आजादी का ‘झंडा’ लेकर चलने वाला लिबरल गिरोह यहाँ पर आकर जायरा का न केवल समर्थन कर रहा है बल्कि उनके मजहब में हस्तक्षेप करने से भी मना कर रहा है। ये वही लिबरल गिरोह है जो हिंदू-मुस्लिम की खबर में मुस्लिम के दोषी होने के बाद भी हिंदू को दोषी ठहराता है, ताकि उनका सेकुलरिज्म कायम रहे। लेकिन, जायरा का ऐसे तर्क देकर अपने सपनों को पीछे छोड़ना कितना भयानक है शायद अभी इसकी कल्पना न वह कर पा रही हैं और न ही इसका आभास लिबरल गिरोह को हो रहा है, जिन्हें आज तथाकथित सेकुलरिज्म साबित करने के लिए अपने ही अजेंडे के ख़िलाफ़ जाना पड़ रहा है।

आप एक बार खुद सोचिए, जायरा वसीम 2016 में दंगल फिल्म आने के बाद उन तमाम लड़कियों के लिए रोल मॉडल बनकर उभरी थीं, जिन्हें समाज की आलोचनाएँ और मजहब की रोक के कारण अपने सपनों को कुचलना पड़ता है। उन पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा, क्या मजहब के ठेकेदार, अपनी विचारधारा भुनाने के लिए दोबारा जायरा को उन लड़कियों के सामने उदाहरण बनाकर पेश नहीं करेंगे, जिनमें जायरा का दंगल लुक देखकर आगे बढ़ने का जोश आया था, जिन्होंने जायरा को देखकर सीखा था कि कैसे लीक से हटकर खुद की पहचान बनाई जा सकती है।

दंगल फिल्म में उनकी एक्टिंग से न केवल उनके फिल्मी किरदार ने लोगों को उनका प्रशंसक बनाया था बल्कि उनके निजी जीवन के संघर्ष ने भी उन लड़कियों के मन में गहरी छाप छोड़ी थी, जो मजहब की बेड़ियों को तोड़कर आगे निकलना चाहती थीं, लेकिन मुमकिन नहीं हो पा रहा था। मैं मानती हूँ कि बहुत बड़े तबके पर जायरा द्वारा दिखाई गई इस हिम्मत का खासा असर नहीं पड़ा होगा, लेकिन जिन पर पड़ा होगा, उनका क्या? जिन्होंने जायरा के संघर्ष में खुद का भविष्य सोचा होगा, उनका क्या? वो जायरा जिसने अपने सपने के लिए उन तमाम आलोचनाओं को पछाड़ा था, जो उसके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए की जा रही थी। जायरा द्वारा दंगल फिल्म में निभाए गए धाकड़ रोल में मजहब की उलाहनाएँ देकर उनके बालों की कटिंग से लेकर उनके पहनावे पर सवाल उठे थे, लेकिन उन्हें मिलती प्रशंसा ने इन सभी बातों को खारिज कर दिया था।

मैं और मेरे जैसे बहुत सारे लोग जायरा के फैसले के बाद अक्षम होंगे इस बात को समझने में कि आखिर एक्टिंग करना पाप कैसे हो सकता है? आखिर कैसे एक कलाकार होने के गुण आपको आपके खुदा से दूर ले जाते हैं, आखिर कैसे इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर पहुँचने के बाद भी आप ऐसी मानसिकता में जकड़े रहते हैं, जो आपको आगे ले जाने की बजाय पीछे ढकेलती है। ये परवरिश होती है या फिर हमारा समुदाय हमें ऐसा करने के लिए प्रभावित करता है?

जायरा के इस फैसले पर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने तथाकथित लिबरलों और उन सभी मजहब के ठेकेदारों से सवाल किया है, जो यह कह रहे हैं कि जायरा के इस फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। तस्लीमा कहती हैं कि महिलाओं का हमेशा से नारी-विरोधी और पितृसत्तात्मक समाज ने ब्रेनवॉश किया है ताकि वह अनपढ़, आश्रित, गुलाम, सेक्स की वस्तु और बच्चे पैदा करने की मशीन बनकर रह जाएँ। उनका कहना है महिलाओं के पास न आजादी है और न चुनने का विकल्प।

तस्लीमा के अलावा इस फैसले पर रवीना टंडन और पायल रोहतगी जैसे कलाकारों ने भी अपना विरोध दर्ज कराया है। रवीना टंडन ने अपने ट्वीट में लिखा, “कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो लोग जिन्होंने महज 2 फिल्मो में काम किया है, इस इंडस्ट्री के प्रति कृतज्ञता महसूस नहीं करते हैं कि उन्हें यहाँ क्या-क्या मिला है।” उन्होंने आगे कहा, “आशा करिए कि वो शांति के साथ यहाँ से निकल जाएँ और अपने उल्टे रास्तों पर चलने वाली सोच को खुद तक ही सीमित रखें।”

जबकि पायल रोहतगी ने ट्वीट करके जायरा वसीम को एक अंधभक्त और कट्टर मुस्लिम बताया। उन्होंने इस फैसले के लिए कुरान के विचार का हवाला दिया है। उन्होंने कहा, “इससे लगता है कि इस्लाम ऐसा धर्म है जहाँ महिलाएँ पुरुषों के बराबर नहीं हैं। मुझे पढ़कर काफी खुशी हुई।”

जायरा वसीम का इस्लाम के सामने अपने एक्टिंग करियर को नकारना बताता है कि हम उसी परवरिश और समुदाय में जकड़े हुए हैं, जो जब चाहे हमारी सोच और सपनों पर हावी होकर उसे ध्वस्त कर सकता है। हम कितना ही आगे क्यों न बढ़ जाएँ, लेकिन बावजूद इसके हमारा वातावरण हमें अपने अनुसार फैसले लेने के लिए प्रभावित करता है। जायरा का फैसला उन सभी प्रोग्रेसिव लोगों के मुँह पर तमाचा है जो मानते हैं कि बॉलीवुड जैसी जगह पहुँचने के बाद धर्म या मजहब बहुत छोटी बातें रह जाती हैं, जबकि हकीकत यह है कि इनकी जकड़ इतनी मजबूत है कि यहाँ तक पहुँच कर, सफल होकर भी एक लड़की ‘माय लाइफ, माय रूल्ज’ जैसे तर्क देकर हिजाब में फँसे रहना चाहती है, एक लड़की पितृसत्तात्मक समाज से जन्मी बंदिशों को इज्जत और सम्मान का केंद्र कहती है और उससे उभरने की बजाए उस दलदल में फँसे रहने की गाँठें स्वयं बाँधती हैं। आज की हकीकत सिर्फ़ इतनी है कि एक लड़की, जिसके बढ़ते कदमों ने आशा की लौ को धधकाया था वो मजहब की हवा में बुझ गई है, और इस अंधेरे का एहसास उसे खुद नहीं है।

बस अब यह उम्मीद है कि हमारे समाज की वो लड़कियाँ जो आगे बढ़ने के सपने देखती हैं, जिन्हें खुद की शिक्षा और सुरक्षा धर्म-मजहब से ऊपर लगती है, वे जायरा में अपना आईडल न खोजें। वे तस्लीमा नसरीन जैसी लेखिकाओं और मसीह अलीनेज़ाद जैसी लड़कियों को अपना आदर्श मानें, जिन्होंने मजहब और अस्तित्व की लड़ाई में खुद के औचित्य को बचाना उचित समझा और सही मायने में लाखों महिलाओं के लिए आईडल हैं।

ज़ायरा वसीम पर सेलेब्रिटी दो-फाड़, कोई बोले- ‘ड्रामेबाज़’, तो कोई ‘साहसी’

ज़ायरा वसीम के ‘सन्यास’ पर बॉलीवुड समेत सेलिब्रेटी, साहित्यकारों, नेताओं आदि का वर्ग पूरी तरह दो-फाड़ हो गया है। जहाँ अभिनेत्री रवीना समेत कुछ लोगों ने उनके बॉलीवुड के कथित नकारात्मक चित्रण की आलोचना की है, वहीं कुछ लोगों ने उनकी निजी ‘चॉइस’ बताते हुए उनका बचाव किया है।

‘दो फिल्म पुरानी लड़की के पुरातनपंथी विचार’

रवीना टंडन ने अप्रत्यक्ष रूप से ज़ायरा वसीम पर कटाक्ष करते हुए उन्हें ‘कृतघ्न’ कहा है। उनके अनुसार महज़ दो फिल्म पुरानी लड़की के कृतघ्न हो जाने से बॉलीवुड को कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे लोगों को केवल शिष्टाचारपूर्वक निकल जाना चाहिए, और अपने पुरातनपंथी विचार खुद तक ही सीमित रखने चाहिए।

‘इसके बाद क्या? बुरका या नकाब?’

कनाडाई-पाकिस्तानी लेखक तारिक फतह ने पूछा कि ‘इस्लाम की राह’ पर ज़ायरा वसीम कितना आगे जाने वालीं हैं? बुरका और नकाब भी पहनना शुरू कर देंगी?

‘मूर्खतापूर्ण निर्णय… औरतों की ब्रेनवॉशिंग’

बांग्लादेशी मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन, जो इस्लाम के खिलाफ ‘लज्जा’ नामक किताब लिखने के बाद से फ़तवेबाजों के निशाने पर रहीं हैं, ने इसे ‘मूर्खतापूर्ण निर्णय’ करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि मज़हब के नाम पर औरतों की ब्रेनवॉशिंग कर उन्हें अनपढ़ से लेकर सेक्स गुलाम तक रखा जाता है।

‘टैलेंट न हो तो आमिर खान भी स्टार नहीं बना सकता’

ज़ायरा के खिलाफ बयान देने तो केआरके भी उतर आए। ज़ायरा की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि ज़ायरा के पास प्रतिभा नहीं है, और वह ड्रामेबाज़ हैं।

‘लिबरल’ वर्ग की हैरतअंगेज़ प्रतिक्रिया

खुद को ‘प्रगतिशील’ और अपने से भिन्न राय रखने वालों को एक लाइन से दकियानूसी संघी करार देने वाले लिबरल वर्ग की प्रतिक्रिया इस मामले में हैरतअंगेज़ है। जहाँ बहुत सी शख्सियतों ने मुँह बंद रखना ही सही प्रतिक्रिया समझी, वहीं कुछ अन्य तो उनके बॉलीवुड को इस्लाम से असंगत बताने के समर्थन में ही उतर आईं।

कॉन्ग्रेस की फ़िलहाल स्टार कैम्पेनर और 2014 में लोकसभा प्रत्याशी (और मुस्लिम) नगमा ने लिखा कि ज़ायरा वसीम ‘साहसी लड़की’ हैं, जिन्होंने (ऐसा कर) ‘रूढ़िवादी छवि को तोड़ कर दिखाया है’।

मिंट की स्तम्भकार और हारवर्ड की प्रतिष्ठित 2020 नीमैन फेलोशिप जीतने वाली अशवाक मसूदी ने तो मामले को मज़हब से उठाकर लैंगिक भेदभाव का मुद्दा बनाने की कोशिश कर डाली।

कॉन्ग्रेस ‘फैन’ ज़ैनाब सिकंदर ने इसे नुसरत जहां के सिन्दूर से जोड़ कर प्रतिक्रिया को इस्लाम के खिलाफ किसी साजिश के तौर पर पेश करने की कोशिश की।

मामले में समाजवादी पार्टी के लोक सभा सदस्य एसटी हसन भी कूद पड़े। उन्हें ‘अंग-प्रदर्शन’ और ‘सेक्स-अपील वाला’ कुछ भी दिखाए जाने को गैर-इस्लामिक करार दिया।

Video: आज़म ख़ान ने इशारों में किया जया प्रदा पर ‘अंडरवियर’ से भी ज्यादा अश्लील टिप्पणी

सपा सांसद आज़म ख़ान ने एक बार फिर से शर्मनाक बयान दिया है। जयाप्रदा के अंतर्वस्त्रों पर कमेंट कर चुके आज़म ख़ान इस बार एक क़दम और आगे बढ़ गए और अपने भाषण में एक से बढ़ कर एक अश्लील शब्दों का प्रयोग किया। आज़म ख़ान ने एक भाषण के दौरान कहा, “मैंने *#$खाना नहीं खोल रखा है। मैंने कोई नाचघर नहीं खोल रखा है। मैं यह शब्द जानबूझ कर इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि लोगों को पता है कि ये शब्द सीधा कहाँ जाकर लग रहा है? जिस समाज में इस लफ्ज को मोहतरम मान लिया जाएगा, वह समाज क्या तरक्की करेगा, क्या सिर उठा कर चलेगा?

विवादित बयानों के शूरमा माने जाने वाले आज़म ख़ान ने संसद को भी नौटंकी बताया। उन्होंने कहा कि वे जैसे ही संसद पहुँचे, उन्हें लगा कि वे किसी नौटंकी में आ गए हैं। उन्होंने संसद में सांसदों की वेशभूषा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वो लोग एकदम मदारी की तरह लग रहे थे। भाजपा पर निशाना साधते हुए आज़म ख़ान ने आगे कहा:

“आपने देखा कि अंजाम क्या हुआ? कितनी दौलत ख़र्च हुई थी? कितनी ताक़त लगाई गई? वो कहते थे कि आज़म ख़ान जीत गए तो जड़ से नाक निकल जाएगी। अरे, नाक नहीं जाने क्या-क्या निकल गई। सपा सांसद ने आगे कहा कि हमने खुद कहते हुए सुना है कि पूरी भारतीय जनता पार्टी हार जाती, लेकिन आजम खान नहीं जीतता हमें ख़ुशी थी। हम इतने बुरे हैं। सिर्फ इसलिए बुरे हैं कि हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। शरीफों की इज्जत है। वो लोग रास्ते बताएँगे, ऐसे लोग देवी-देवता अपने आप को बनाएँगे। हमारे मरे हुए माँ-बाप 3 दिन तक टेलीविजन पर डिस्कस होंगे।”

अमर सिंह ने रामपुर के सांसद आज़म ख़ान के इस बयान की कड़ी निंदा की है। सिंह ने कहा कि आज़म ख़ान जैसे लोग महिलाओं का सम्मान करना नहीं जानते। जया प्रदा पर आज़म ख़ान द्वारा बार-बार विवादित और अश्लील टिप्प्णी किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए अमर सिंह ने याद दिलाया कि जया बच्चन भी उन्हीं की पार्टी की नेता हैं और वे कई फ़िल्मों में काम कर चुकी हैं। आज़म ख़ान को चुनाव प्रचार के दौरान विवादित बयानों के कारण प्रतिबंधित भी किया गया था।

‘ज़ायरा का अकाउंट हैक हो गया था, उसने नहीं कहा बॉलीवुड इस्लाम से दूर कर देता है’

ज़ायरा वसीम का प्रकरण ‘फ़िल्मी’ होता जा रहा है। पहले तो महज़ 18 साल की उम्र में उन्होंने इस्लाम के लिए बॉलीवुड को अलविदा कह कर देश को कल चौंका दिया, और अब उनके मैनेजर के हवाले से खबर आ रही है कि उनके इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि सोशल मीडिया अकाउंट किसी ने ‘हैक’ कर लिए और ऐसा लिख दिया कि वह इस्लाम का ठीक से पालन करने के लिए फ़िल्में छोड़ रहीं हैं।

मीडिया से कोई बात नहीं, न ही पुलिस शिकायत

लेकिन यह खबर लिखे जाने तक न ही ज़ायरा वसीम के परिवार ने मीडिया से बात कर इस दावे की पुष्टि या इसका खंडन किया है, और न ही पुलिस में अपने अकाउंट के हैक होने के बाबत कोई शिकायत उनके द्वारा दर्ज कराए जाने की बात पता चली है। वह पोस्ट्स भी जस-की-तस उनके इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हैं ही।

इन पोस्ट्स में ज़ायरा वसीम ने लिखा था कि इतनी शोहरत और सफलता मिलने के बाद भी वह सच में खुश नहीं हैं। नई जीवनशैली से एडजस्ट करते हुए उन्हें यह अहसास हुआ कि उनके कैरियर ने उनके मज़हब के साथ उनके रिश्ते पर असर डाला है। अपनी दिक्कतों के बारे में बात करते हुए ज़ायरा ने लिखा कि उन्हें तसल्ली केवल अल्लाह और कुरान में मिली। उन्होंने कहा, “कुरान की महान और पाक समझ में मुझे पूर्णता और अमन मिला। दिलों को अमन तभी मिलता है जब वह अपने बनाने वाले, उसकी खासियतें, उसके रहम और उसके हुक्म का इल्म हो जाता है।”

कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं हैं

ज़ायरा के मुताबिक उन्होंने पहला कदम अपनी सच्ची राह के अहसास से उठाया और फिल्मों को अलविदा इसलिए कहा ताकि वह अपने मज़हब पर गौर फरमा सकें। 2017 में ज़ायरा कट्टरपंथी इस्लामियों के निशाने पर आ गईं थीं। उनके अनुसार वह एक ‘प्रदूषित’ माध्यम में काम करतीं थीं, और पूरे सम्प्रदाय के लिए शर्म और बदनामी का सबब थीं। उनके राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती से मिलने के बाद भी वह ट्रोलों के निशाने पर आ गईं थीं।