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कृष्णानंद राय केस: 400 राउंड गोलियाँ, गवाहों की रहस्यमयी मौत लेकिन हत्यारा कोई नहीं

राज्य में भाजपा की सरकार। केंद्र में भाजपा की सरकार। लेकिन मार दिए गए एक भाजपा विधायक को न्याय नहीं मिल पाया। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। 2005 में हुई हत्या के मामले में आज तक कोई अपराधी नहीं! किस पर दोष लगाया जाए? क्या सरकारें अपना काम करने में विफल रहीं? क्या न्यायपालिका को सच नहीं दिख पाया? या फिर मुख़्तार अंसारी और उसके परिवार का रसूख सब पर भारी पर गया? आज इसकी चर्चा हम इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि मुख़्तार अंसारी और उसके भाई बसपा सांसद अफ़ज़ल अंसारी को इस मामले में दिल्ली की एक अदालत ने बरी कर दिया। आरोपितों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी किया गया।

सबसे पहले इस ख़बर की बात करेंगे। उसके बाद हम इस घटना को रीविजिट करने 15 वर्ष पीछे जाएँगे और फिर हम वापस लौट कर यह देखने की कोशिश करेंगे कि आख़िर इतनी बड़ी हत्या के मामले में आरोपितों के बरी हो जाने, या फिर दोषियों के पकड़ में न आने के पीछे का कारण क्या है? जिम्मेदारी किसकी है? कृष्णनंदन राय की पत्नी अलका राय की याचिका पर इस केस को दिल्ली ट्रांसफर किया गया था क्योंकि यूपी में इसके निष्पक्ष सुनवाई होने की उम्मीद परिजनों को नहीं थी। दिल्ली की अदालत ने ‘साक्ष्य के अभाव’ में उन आरोपितों को भी बरी कर दिया।

कोर्ट का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोपितों का दोष साबित करने में नाकाम रहा। अदालत 2 अन्य आरोपितों को पहले ही बरी कर चुकी है। सीबीआई ने मामले की लम्बी जाँच की लेकिन दोष नहीं साबित कर पाई। ये थी ख़बर। अब आते हैं अपने सवाल पर। मुख़्तार अंसारी, उसके भाई व बहनोई के ख़िलाफ़ कोई भी अपराध साबित करने में सीबीआई व पुलिस नाकाम क्यों रही? यह सवाल इसीलिए जायज हो जाता है क्योंकि दिसंबर 2005 को एसटीएफ एसएसपी अखिल कुमार ने साफ़-साफ़ कहा था कि ये हत्या मुख़्तार अंसारी ने कराई है। अब जरा पीछे जाकर इस हत्या की वारदात के बारे में जानते हैं।

गवाहों की रहस्यमयी मौतें

लेकिन उससे पहले इस घटना से जुड़ी कुछ रहस्यमयी बातों को जानते हैं, जिसके बाद आपको पता चलेगा कि क़ानून की देवी की आँखों में सचमुच पट्टियाँ बंधी होती हैं, जिसके पार उन्हें कुछ नहीं दिखता। जब कृष्णानंद राय व उनके सहयोगियों की हत्या हुई, उस समय कोई ऐसा भी था जो बच गया था। उस व्यक्ति का नाम था- शशिकांत राय। वह एक तरह से इस घटना के मुख्य चश्मदीद गवाह थे। थे इसलिए, क्योंकि अब वो नहीं रहे। सैंकड़ों राउंड गोलियों के बीच ज़िंदा बच जाने वाला शख़्श शराब पीने के बाद संदिग्ध स्थिति में सड़क पर बेहोश पड़ा पाया गया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।

एक और गवाह था, उनका नाम था- मनोज गौड़। यह भी था, क्योंकि अब ये भी नहीं रहे। सितंबर 2006 को मनोज गौड़ की भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इन दोनों घटनाओं के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ उन्हें डॉक्टरों ने ‘ब्रांको न्यूमोनिया’ की वजह से मृत करार दिया। जब वो अस्पताल में भर्ती थे, तब प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई। दो अन्य गवाह भी थे- संजीव राय और मुन्ना राय। ये दोनों अभी भी हैं, लेकिन गाज़ीपुर में नहीं है। दोनों ही रहस्यमयी तरीके से किसी अन्य ज़िले में जाकर बस गए। और दोनों ने अपने बयान भी अदालत में दर्ज नहीं कराए।

क्या हुआ था उस दिन?

वह 29 नवंबर 2005 का दिन था, जिसे गाज़ीपुर वाले आज भी ‘ब्लैक डे’ कहते हैं। कृष्णानंद राय मुहम्मदाबाद से विधायक थे। वह पिछली केंद्र सरकार में 5 वर्षों तक मंत्री रहे मनोज सिन्हा के क़रीबी भी थे। वही मनोज सिन्हा, जिन्हें गाज़ीपुर से हरा कर मुख़्तार अंसारी का भाई अफ़ज़ल अंसारी इस वर्ष सांसद बना है। यह बात बहुत कम ही लोगों को पता है कि कृष्णानदान राय इस घटना में मारे जाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं थे बल्कि उनके साथ उनके 6 अन्य सहयोगियों की भी जान गई थी। ये हत्या इतनी वीभत्स थी और इतने बेख़ौफ़ तरीके से अंजाम दिया गया था, जिससे कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि इसके पीछे कितनी बड़ी ताक़तें थीं।

शासन से बेख़ौफ़ हत्यारों ने 400 राउंड गोलियाँ चलाईं थीं। घटना के बाद पोस्टमॉर्टम के दौरान मृतकों के शरीर से 67 गोलियाँ निकाली गईं। इतनी ज्यादा संख्या में बुलेट अंदर धँसने के बाद शायद ही कोई ज़िंदा बचे, वो भी तब जब ये गोलियाँ एके-47 दागी गई हों। विधायक राय लोगों में लोकप्रिय थे, इस कारण जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। विरोध प्रदर्शन करने वालों में कई ऐसे लोग भी शामिल थे, जो आज यूपी व दिल्ली में सत्ता के सर्वेसर्वा हैं। आपको बता दें कि देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उस वक़्त इस हत्या के विरोध में धरना दिया था। राजनाथ ने एक-दो दिन नहीं बल्कि 14 दिनों तक धरना दिया था और उनका धरना ख़त्म कराने के लिए ख़ुद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आना पड़ा था।

5 वर्षों तक राजनाथ सिंह देश के गृह मंत्री रहे और उनके कार्यकाल के दौरान भी यह जाँच अहम प्रक्रियाओं से गुजरी लेकिन हत्यारा कोई नहीं! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोषियों को न बख्शने की बात करते हैं और क़ानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए पुलिस को उन्होंने सशक्त किया है लेकिन हत्यारा कोई नहीं! सीबीआई जैसी एजेंसियाँ कथित बाहुबलियों और बड़ी मछलियों पर हाथ डालने से न हिचकने का दावा करती हैं लेकिन हत्यारा कोई नहीं! 15 वर्षों तक 7 आरोपितों पर मामला चलता है और विभिन्न संस्थाएँ अपने-अपने स्तर से जाँच करती हैं लेकिन हत्यारा कोई नहीं! उस समय की सपा सरकार का दौर गया, मनोज सिन्हा 5 साल मंत्री रहे लेकिन हत्यारा कोई नहीं!

कृष्णानंद राय हत्याकांड: नहीं मिला न्याय

तो फिर 400 राउंड गोलियाँ किसने चलाई? नहीं पता चल पाएगा। शायद इसलिए नहीं चल पाएगा क्योंकि सलमान ख़ान ने हिरन मारा या नहीं, यही मामला 20 वर्षों से अटका पड़ा है। 1998 में एक काला हिरन का शिकार कर लिया जाता है और ग्लैमर वर्ल्ड के आरोपितों के ख़िलाफ़ दो दशक तक चली जाँच के बाद भी मामले में क्या डेवलपमेंट्स हुए हैं, कुछ भी क्लियर नहीं है। ऐसे कैसे मिलेगा न्याय? जिस देश की न्याय व्यवस्था एक जानवर के शिकारी को सज़ा देने में नाकाम रही है, उससे एक नेता के कातिलों को सज़ा दिलाने की उम्मीद ही बेमानी है। सवाल सिर्फ़ विधायक का नहीं है बल्कि उनके साथ मारे गए 6 अन्य लोगों का भी है।

हो सकता है विधायक का परिवार संपन्न रहा हो और न्याय के लिए वह आगे की प्रक्रिया में जा सकता है लेकिन उनके साथ मारे गए उनके 6 सहयोगियों के परिजनों की आशाएँ भी इसी मामले से जुड़ी हैं। विधायक की पत्नी अलका राय ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि प्रदेश में सुनवाई होने से जवानों की जान को ख़तरा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया, तभी मामला प्रदेश से बाहर ट्रांसफर किया गया। इससे समझा जा सकता है कि कृष्णनंदन राय के हत्यारों के पीछे कितनी बड़ी ताक़तें काम कर रही थीं। जिसके कारण मामले को यूपी से दिल्ली भेजा जा सकता है, वो कुछ भी कर सकते हैं, कम से कम सज़ा से तो बच ही सकते हैं!

गाज़ीपुर की जनता भी उन्हें भूल जाएगी। ऐसा ही होता आया है। भले ही उनकी शवयात्रा में 5 किलोमीटर लम्बी लाइन लगी हो, जनता क्यों इस पचड़े में पड़ना चाहेगी क्योंकि उसे भी पता है कि जो अदालत और जाँच एजेंसियों को धता बता सकता है वो कुछ भी कर सकता है। क्या कृष्णनंदन राय ने ख़ुद को ही गोली मार ली? क्या उन्होंने 67 बुलेट्स ख़ुद अपने और अपने सहयोगियों के शरीर में घुसेड़ दिए? अफसोस, इन सवालों के जवाब शायद फाइलों में धूल फाँकते रह जाएँगे न्याय के इंतजार में।

कॉन्ग्रेस MLA और पूर्व CM के बेटे ने इंजीनियर पर कीचड़ उड़ेला, पुल की रेलिंग से बाँधा

नेता पुत्रों की दबंगई का एक और वीडियो सामने आया है। इसमें महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से कॉन्ग्रेस विधायक नीतेश राणे अपने समर्थकों के साथ एक इंजीनियर को धमकाते, उस पर कीचड़ उड़ेलते और उसे पु​ल की रेलिंग से बाँधते नजर आ रहे हैं। नीतेश के पिता नारायण राणे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बीते साल सितंबर में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी और फिलहाल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के करीब बताए जा रहे हैं। हालाँकि औपचारिक तौर पर नारायण राणे अभी भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं।

नीतेश की दबंगई के शिकार बने इंजीनियर प्रकाश शेडकर मुंबई-गोवा हाइवे पर कनकावली के करीब बारिश के कारण बने गड्ढों का निरीक्षण कर रहे थे। इसी दौरान नीतेश अपने समर्थकों के साथ मौके पर पहुँचे। वीडियो में देखा जा सकता है कि नीतेश इंजीनियर को धमका रहे हैं और इसी दौरान उनके समर्थक बाल्टी भर कीचड़ इंजीनियर पर उड़ेल देते हैं। इसके बाद भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो एक नदी पर बने पुल की रेलिंग में इन लोगों ने इंजीनियर को बाँध दिया।

सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने वाले नीतेश पहले विधायक नहीं हैं। बीते दिनों मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय और उनके समर्थकों का भी इसी तरह का वीडियो सामने आया था। इसमें आकाश इंदौर नगर निगम के अधिकारी को बल्ले से मारते दिखे थे। बाद में उनकी गिरफ्तारी भी हुई और फिलहाल वे जमानत पर बाहर हैं। आकाश मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। आकाश की इस हरकत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी नाराजगी जता चुके हैं।

कट्टा पकड़वाने पर ₹1,000, पिस्टल पर ₹5,000: देखें UP पुलिस द्वारा जारी की गई रेट लिस्ट

उत्तर प्रदेश पुलिस अपराध और जुर्म से निपटने के सबसे क्रिएटिव तरीके ईजाद करने में शायद सबसे आगे चल रही है। इस बार एक और पहल कर के UP के बलरामपुर जिले में पुलिस ने आम आदमी को रोजगार का मौका उपलब्ध कराया है। अगर आप घर बैठे अपराध से लड़कर पुलिस की मदद करने का सपना देखते हैं और साथ में पैसा भी कमाना चाहते हैं तो यह मौका आपके लिए है। पुलिस अधीक्षक देवरंजन वर्मा द्वारा जारी एक पैम्फलेट के मुताबिक ‘मुखबिर रोजगार योजना‘ शुरू की गई है। पुलिस पैम्फलेट में विभिन्न प्रकार की सूचनाओं के लिए इनाम राशि भी सूचीबद्ध की गई है। 

क्या है ये मुखबिर योजना?

इस योजना के अंतर्गत अपराधियों और उनकी गतिविधियों की जानकारी देने वालों को पुरस्कार के रूप में धनराशि दी जाएगी। पुलिस ने अलग-अलग मुखबरी का अलग-अलग इनाम तय किया है। इसके मुताबिक चोरी का पता लगाने में मदद करने पर 1,000 रुपए और कट्टा बरामद करवाने में भी 1,000 रुपए मिलेंगे।

अगर आप ज्यादा रुपए कमाना चाहते हैं तो आपको 5,000 रुपए कमाने के लिए बिना लाइसेंस वाली रिवॉल्वर या पिस्तौल की सूचना देनी होगी। पुलिस जब रिवॉल्वर पकड़ लेगी तो 5,000 रुपए का इनाम देगी। सुरक्षा के लिहाज से इस तरह की सूचना को पुलिस अधीक्षक को उनके आधिकारिक मोबाइल नंबर पर दी जा सकती है।

‘मुखबिर रोजगार योजना’ रेट लिस्ट

सूचना देने वाले की पहचान रखी जाएगी गुप्त

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस को सूचना देने वाले व्यक्ति की पहचान गुप्त रखी जाएगी। अगर सूचना सही पाई जाती है तो पुरस्कार की राशि नगद या खाते में डाली जाएगी। पुलिस द्वारा शुरू की गई यह पहली योजना मानी जा रही है। मुखबिरों को पैसा अब तक गुप्त कोष से दिया जाता है जो हर जिले में पुलिस प्रमुख के पास होता है। वर्मा के अनुसार, “हम आम लोगों तक पहुँच बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जिनके पास आसपास के क्षेत्र में किसी भी संदिग्ध गतिविधियों के बारे में जानकारी हो सकती है। इसके नतीजे भी आने शुरू हो गए हैं। हम पहले ही इस योजना के माध्यम से आधा दर्जन मामलों पर काम कर चुके हैं, जो अब गाँव और जिले के ग्रामीण अंदरूनी इलाकों में लोकप्रिय हो रही है।”

‘युवराज’ राहुल के सम्मान में अब कॉन्ग्रेस महासचिव हरीश रावत ने भी दिया इस्तीफ़ा

लोकसभा चुनाव 2019 में मिली करारी शिक़स्त के बाद से ही कॉन्ग्रेस में इस्तीफ़ों का दौर लगातार जारी है। राहुल गाँधी के त्यागपत्र के बाद पार्टी के एक और दिग्गज़ नेता ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। असम के प्रभारी व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कॉन्ग्रेस महासचिव पद से इस्तीफ़ा दे दिया है।

हरीश रावत के अनुसार, “लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस पार्टी की हार और संगठनात्मक कमज़ोरी के लिए हम पदाधिकारीगण उत्तरदायी हैं। असम में पार्टी द्वारा अपेक्षित स्तर का प्रदर्शन न कर पाने के लिए प्रभारी के रूप में मैं उत्तरदायी हूँ। मैंने अपनी कमी को स्वीकारते हुए अपने महामंत्री के पद से पूर्व में ही त्यागपत्र दे दिया है।”

इसके आगे उन्होंने कहा कि पार्टी के लिए समर्पित भाव से काम करने के लिए मेरी स्थिति के लोगों के लिए पद आवश्यक नहीं है, मगर प्रेरणा देने वाला नेता आवश्यक है। प्रेरणा देने की क्षमता केवल श्री राहुल गाँधी में है, उनके हाथों में बागडोर रहे तो यह संभव है कि हम 2022 में राज्यों में हो रहे चुनाव में वर्तमान स्थिति को बदल सकते हैं और 2024 में भाजपा और श्री नरेंद्र मोदी को परास्त कर सकते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक शक्तियाँ व सभी कॉन्ग्रेसजन, श्री राहुल गाँधी को अध्यक्ष पद पर देखना चाहते हैं।

राष्ट्रीय महासचिव के पद से इस्तीफ़ा देने की जानकारी हरीश रावत ने फेसबुक पर भी शेयर की।

हाल ही में देहरादून में बुलाई गई कॉन्ग्रेस की समीक्षा बैठक में भी फूट देखने को मिली थी। इसमें कॉन्ग्रेस के हरीश रावत, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर इंदिरा हरदेश और पूर्व प्रदेश किशोर उपाध्याय समेत पार्टी के सभी पूर्व और वर्तमान विधायक भी मौजूद थे। ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जब प्रदेश कार्यालय पहुँचे, तो उन्हें रिसीव करने कोई भी बड़ा नेता नहीं पहुँचा था। इस बात से नाराज हरीश रावत बिना प्रदेश अध्यक्ष से मिले ही सीधे मीटिंग हॉल में पहुँच गए।

बेसबॉल बैट से पिटाई मामले में AAP विधायक सोमदत्त को 6 महीने की सज़ा, ₹2 लाख का जुर्माना

दिल्ली के सदर इलाके से आम आदमी पार्टी के विधायक सोमदत्त को दिल्ली की रोज़ एवेन्यू की विशेष एमपी/ एमएलए अदालत ने 2015 के एक मामले में 6 महीने की सजा सुनाई है। साथ ही उन पर ₹2 लाख का जुर्माना भी लगाया है।

गौरतलब है कि सोमदत्त के ख़िलाफ़ यह मामला 2015 में गुलाबी बाग का है, जब आप विधायक ने चुनाव प्रचार के दौरान शिकायतकर्ता संजीव राणा की बेसबॉल बैट से पिटाई की थी। उस दौरान सोमदत्त विधायक नहीं थे।

हालाँकि चुनाव प्रचार के दौरान की गई मारपीट मामले पर संज्ञान लेते हुए पिछली सुनवाई (29 जून) में ही अदालत ने आप विधायक को दोषी ठहरा दिया था, लेकिन 4 जुलाई को सभी दलीलें सुनने के बाद सोमदत्त की सजा मुकर्रर की गई।

अदालत ने इस बात पर गौर किया है कि संजीव राणा की गवाही में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है और न ही उनके पास सोमदत्त को फँसाने के लिए कोई विशेष कारण है। इसलिए आप विधायक को आईपीसी धारा 325 यानी जान बूझकर चोट पहुँचाने के तहत दोषी माना गया।

पूरा मामला

संजीव की शिकायत के मुताबिक 10 जनवरी 2015 को वह अपने फ्लैट में थे। तभी 50-60 लोग उनके दरवाजे पर पहुँचकर, घर की घंटी बजाने लगे। जब संजीव ने इसका विरोध किया तो नाराज़ सोमदत्त ने बेसबॉल बल्ले से उनके पैर पर मार दिया। इसके बाद वह उसे खींचकर सड़क पर ले गए और वहाँ उन्हें लात-घूँसों से मारना शुरू कर दिया। इसके बाद पीड़ित के भाई ने पुलिस बुलाई और पीसीआर वैन ही उन्हें हिंदूराव अस्पताल लेकर गई।

बता दें कि इस मामले पर सोमदत्त ने अपनी सफाई में कहा था कि राजनैतिक दुश्मनी के कारण यह मामला दर्ज करवाया गया है। संजीव भाजपा के सदस्य हैं और वह जान बूझकर उनका टिकट कटवाना चाहते हैं। जबकि संजीव ने साफ़ किया है कि वह किसी राजनैतिक दल से जुड़े हुए नहीं हैं।

आपको बता दें कि दिल्ली की इसी रोज एवेन्यू कोर्ट ने जून 25, 2019 को कोंडली से आप विधायक मनोज कुमार को चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने के मामले में 3 महीने की सजा और ₹10 हजार जुर्माने की सजा सुनाई थी।

भीमा-कोरेगाँव मामले का आरोपित वारवरा राव माओवादी हमले की साजिश के सिलसिले में गिरफ्तार

भीमा-कोरेगाँव मामले के आरोपित वारवरा राव को कर्नाटक पुलिस ने करीब डेढ़ दशक पुराने एक माओवादी हमले के सिलसिले में गिरफ्तार किया। फरवरी 10, 2005 को कर्नाटक के तुमकुर के थिरुमानी थाना क्षेत्र में हुए इस हमले में आठ लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 6 कर्नाटक रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान, एक रसोइया और एक आम नागरिक था। पुलिस के मुताबिक वारवरा राव इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता था।

प्रोडक्शन वारंट लेकर पुणे पहुँची कर्नाटक पुलिस ने यरवदा जेल से राव को हिरासत में लिया। भीमा-कोरेगाँव मामले के आरोपित राव न्यायिक हिरासत में यरवदा जेल में बंद थे। इस मामले की उसकी गिरफ्तारी नवंबर 17, 2018 को हैदराबाद हाई कोर्ट का नजरबंदी का आदेश समाप्त होने के बाद हुई थी। राव बीते साल तब सुर्खियों में आया था, जब पुलिस ने देशभर में कई जगहों पर माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में छापेमारी और गिरफ्तारी की थी। भीमा-कोरेगाँव मामले में माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में पुणे पुलिस राव सहित 23 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2005 में हुए माओवादी हमले में इससे पहले राव की कभी गिरफ्तारी नहीं हुई थी। इस मामले के आरोपितों को 2016 में स्थानीय अदालत ने बरी भी कर दिया था और पुलिस ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की। इसके बाद कर्नाटक पुलिस ने एक स्थानीय अदालत से राव की गिरफ्तारी का वारंट हासिल किया और पुणे की अदालत से एनओसी मिलने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया था। अब राव को कर्नाटक पुलिस स्थानीय अदालत में पेश करेगी।

कमलनाथ से बिजली कटौती पर नाराज युवक ने फेसबुक पर लिखा ‘दर्द’, पुलिस ने कर लिया गिरफ़्तार

मध्य प्रदेश के सागर जिले में बिजली कटौती मामले को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी करना एक युवक को महँगा पड़ गया। यहाँ पुलिस ने मुख्यमंत्री कमलनाथ पर अभद्र टिप्पणी के मामले में बुधवार (जुलाई 03, 2019) को सचिन तनेजा (40) नाम के युवक को हिरासत में लिया है।

सचिन पर आरोप है कि उसने अपनी फेसबुक वॉल पर बिजली कटौती का जिक्र करते हुए राज्य सरकार को गालियाँ दी और अपने पोस्ट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ की तस्वीर भी लगाई, जिस पर एक कॉन्ग्रेस नेता ने पुलिस में उसकी शिकायत दर्ज करवा दी।

एनडीटीवी इंडिया की खबर के अनुसार मकरोनिया क्षेत्र की नगर पुलिस अधीक्षक अमृता दिवाकर ने बुधवार को पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि एक युवक ने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट की थी, जिस पर कॉन्ग्रेस की ओर से शिकायत दर्ज करवाई गई।

पुलिस ने इसी शिकायत के आधार पर युवक को हिरासत में ले लिया गया है और अब मामले पर कार्रवाई की जा रही है। हालाँकि सचिन तनेजा नाम का यह युवक कौन है, इसकी अभी जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन हिंदुस्तान की खबर के मुताबिक आरोपित के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और आईटी अधिनियम की धाराओं 67 और 67(ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

मध्य प्रदेश राज्य में यह ऐसी पहली घटना नहीं हैं, इससे पूर्व भी एक शिक्षक समेत अन्य लोगों द्वारा कमलनाथ सरकार पर अभद्र टिप्पणी करने पर कार्रवाई हो चुकी हैं। हालाँकि, बाद में मुख्यमंत्री के आदेश पर कार्रवाइयों को निरस्त करके आरोपितों को राहत दे दी गई।

हाँ, मुगलों ने हिन्दुओं का रेप किया, हजारों मंदिर तोड़े लेकिन बिरयानी बनानी भी तो सिखाई!

इतिहास से छेड़छाड़ छद्म बुद्धिजीवियों का पुरातन पेशा रहा है और अपने (कु)चिंतन को सर्वोपरि साबित करने की उनकी आदत भी। अगर इतिहास के बारे में ये अंग्रेजी में कुछ लिख दें, तो भला उसे काटने की हिम्मत किसमें होती थी? लेकिन, अब समय बदल गया है। इसी क्रम में हमारी नज़र ‘द वायर’ के एक लेख पर पड़ी, जो हिंदुत्व को लेकर लिखे गए तीन लेखों की सीरीज का दूसरा भाग है। इस आर्टिकल में सबकुछ है। अंग्रेजी है। सीरिया की बातें हैं। सन 1200 में पोप ने क्या किया, यह भी है। ऐतिहासिक घटनाओं का ज़िक्र हैं। कमी है तो बस सच्चाई की। लेख की शुरुआत ही होती है कई ऐसे धर्मों का जिक्र करने से, जो अन्य पुराने धर्मों से पैदा हुए।

यहाँ हम वायर के वरिष्ठ पत्रकार की तरह केवल उपदेश नहीं देंगे बाकि सबूतों के साथ ऐतिहासिक तथ्यों के ज़िक्र कर के लेखक द्वारा इस्लामिक आक्रांताओं को वाइटवाश करने की कोशिशों को एक्सपोज़ करेंगे। आगे बढ़ने से पहले बता दें कि प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ का यह लेख दुर्भाग्यपूर्ण है, राजपूतों और ब्राह्मणों का कुतर्कों की बिना पर अपमान करने वाला है और खिलजी, अकबर इत्यादि के गुणगान करने वाला है। भारतीय संस्कृति को कमतर आँकने की कोशिश की गई है। लेखक की नज़र में, लाखों जान देने, हज़ारों बलात्कार होने औरकई हज़ार बड़े मंदिर ढाहने की क़ीमत पर अगर एक पर्शियन कलाकृति मिलती है तो उसे पूजना चाहिए। तो आइए, पोस्टमॉर्टम शुरू करते हैं।

इस लेख को लिखने वाले प्रेम शंकर झा हैं, जिन्होंने एग्जिट पोल कैसे बुरी तरह ग़लत हो जाएँगे, इस पर भी एक लम्बा-चौड़ा लेख लिखा था। इन छद्म बुद्धिजीवियों के साथ दिक्कत यह है कि ये सुदूर सीरिया और मेसोपोटामिया की घटनाओं व इतिहास का विवरण तो सही देते हैं लेकिन जहाँ बात भारत के सांस्कृतिक व राजनीतिक इतिहास की आती है, ये गच्चा खा जाते हैं। या फिर यह भी हो सकता है कि जानबूझ कर ग़लत तथ्य पेश करते हैं। लेखकपहले तर्क से ही पगलैती करता नज़र आता है क्योंकि वह कहता है कि भारत में धर्म और इस्लाम का शुरुआती संपर्क काफ़ी शांतिपूर्ण रहा है। आप भी हँस लीजिए इस चुटकुले पर।

पहली बात, यहाँ लेखक ने चिरकाल से अरब और इस्लाम को एक कर के देखने की कोशिश की क्योंकि अरब और गुजरात के संपर्क को भी धर्म और मजहब वालों के बीच संपर्क के रूप में देखने की गई है। गुजरात में अरबों का आना-जाना इस्लाम के उत्थान से पहले से ही था और व्यापारिक रिश्तों के कारण वे गुजरातियों के संपर्क में थे। लेकिन, यहाँ लेखक ने बड़ी चालाकी से अरब और भारत के संपर्क को इस्लामी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहा, जबकि अरब तो इस्लाम अपनाने से पहले भी अरब ही थे। जब अरब में इस्लाम फैला, उसके बाद वे इस मज़हब के झंडाबरदार बन गए और उन्होंने इसे फैलाना शुरू किया।

लेखक का यह भी दावा है कि यहाँ आकर अरब वालों ने मस्जिदें बनानी शुरू की लेकिन किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक तनाव ने जन्म नहीं लिया। लेकिन, लेखक को यह समझना चाहिए कि साम्राज्यवाद और विस्तारवाद कभी भी हमारी संस्कृति नहीं रही है। अगर अरबों ने यहाँ आकर मस्जिदें बनाईं, तो इसका यह अर्थ है कि भारत तब भी उतना ही सहिष्णु था, जितना आज है। सर्वविदित है कि इस्लाम के उत्थान के बाद शुरुआती दिनों में लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्मान्तरण के लिए भारत आए थे, जिसनें बाद में लूटपाट और फिर साम्राजयवाद का रूप ले लिया। आज भी अंतिम चेर राजा के इस्लाम अपनाने के बाद मक्का जाने की कहानी पुरानी इस्लामी पुस्तकों में गर्व से उल्लेखित की जाती है।

भरता सहिष्णु है, तभी उसने धर्मान्तरण के इरादे से आए व्यापारियों को भी रहने की अनुमति दी। भारत का समाज काफ़ी खुले विचारों वाला था, तभी अरब से आए व्यापारियों में से कई ने भारतीय महिलाओं से विवाह किया और वे यहीं के होकर रह गए। जब महमूद गज़नी ने सोमनाथ पर हमला किया, तब तक इस्लाम साम्राज्यवाद का रुख अपना चुका था और धर्मान्तरण की मदांधता में गतिमान था। यहाँ लेखक ने इस बात को हाइलाइट करने की कोशिश की है कि सोमनाथ पर गज़नी द्वारा हमला करने के दौरान अरबों ने मरते दम तक मंदिर की रक्षा की। लेकिन, बड़ी चालाकी से लेखक ने एक तथ्य को छिपा दिया। इसकी सच्चाई हम आपको बताते हैं।

दरससल, लेखक धर्मान्तरण और ख़ूनख़राबे को सही साबित करने के लिए जिन अरबों द्वारा सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए जान देने की बात कर रहा है, उन्हीं अरबों के शासक ने इस मंदिर पर पर हमला किया था। वर्ष 725 में सिंध के अरब शासक अल-जुनैद ने महमूद गज़नी से पहले ही इस मंदिर में तबाही मचाई थी। ऐसे में लेखक का यह दावा खोखलेपन वाला है कि जिन अरबों ने महमूद गजनी के आने से 300 साल पहले ही इस मंदिर को तबाह किया था, उन्होंने इसकी रक्षा के लिए जान तक दे दी। हाँ, भारतियों को अपनी सहिष्णुता की कीमत क्या देकर चुकानी पड़ी, इस बारे में लेखक ने चुप्पी साध रखी है।

अब आते हैं लेखक के एक और झूठे और भ्रामक दावे पर, जिसमें यह कहा गया है कि दिल्ली सल्तनत वाला काल शायद संघ और हिदुत्व विचारधारा वाले लोग याद न करना चाहें। जिस समयावधि में न जाने उत्तर भारत में कई जगहों पर आततायियों के कारण महिलाओं को आग में कूदना पड़ा था, उस काल को तो तो याद रखना ही चहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी पता चले कि वो आक्रांता कौन थे? मुगलों ने कला को महत्त्व दिया, हुमायूँ ने मकबरा बनवाया, शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया, भारत और अरब की कलाओं के मिश्रण से नई कलाओं को जन्म दिया गया- इनकी कीमत क्या चुकानी पड़ी, इस बारे में लेखक सेलेक्टिव हो उठा है।

इंडो-इस्लामिक आर्किटेक्चर का गुणगान करते-करते लेखक ने इस बात को किनारे करने की कोशिश की है कि इस कला के अधिकतर नमूने हमारी पुरानी विरासतों को तबाह कर के बनाए गए। इसे यूँ समझिए। कोई लेखक के घर में घुस आता है और फिर उन्हें निकाल बाहर कर घर को ढाह देता है। इसके बाद वह व्यक्ति वहाँ कुछ नई कलाकृतियाँ बनता है, जो उसके अनुयायियों के लिए एक पवित्र स्थल बन जाता है। क्या लेखक की आने वाले पीढियाँ उन कलाकृतियों का गुणगान करेंगी और उस कलाकार को पूजेगी? नहीं, क्योंकि वह कलाकार नहीं बल्कि आक्रान्ता था। ठीक इसी तरह, अनगिनत मंदिरों और बौद्ध स्थलों को तबाह कर बनाई गई कलाकृतियों का गुणगान कर लेखक ने जता दिया है कि ‘द वायर’ में आक्रान्ताओं के लिए एक विशेष सम्मान है।

सल्तनत काल पर हिन्दुओं को क्यों गर्व करना चाहिए? लेखक कहता है कि इस दौरान कत्थक नृत्य का जन्म हुआ, इसीलिए। यह विचित्र तो है ही, साथ ही एक बड़ा झूठ भी है। दरअसल, कत्थक नृत्य का प्रचलन वैदिक काल से ही रहा है और पीढ़ियों से चली आ रही इस नृत्य परम्परा को पुजारियों और राजाओं तक ने संरक्षण दिया क्योंकि वे इसे हिन्दू धर्म की कथाओं के प्रचार-प्रसार का एक बड़ा माध्यम मानते थे। हाँ, मुग़ल काल के दौरान पर्शियन प्रभाव आने के बाद कत्थक नृत्य के तौर-तरीकों में बदलाव हुए लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पीढ़ी दर पीढ़ी बदलती एक व्यवस्था के जन्मकाल को लेकर झूठे दावे किए जाएँ। नहीं, कत्थक का जन्म सल्तनत काल में नहीं हुआ।

लेखक मजहबी आक्रान्ताओं को ‘अच्छा आक्रान्ता’ और ‘बुरा आक्रान्ता’ के रूप में देखना चाहता है। उसकी नज़र में खिलजी वंश ‘अच्छा आक्रान्ता’ था और मंगोल ‘बुरा आक्रान्ता’ थे। लेखक के विचारों से लगता है कि भारतियों को खिलजी की पूजा करनी चहिए क्योंकि उसनें हमें मंगोलों से बचाया। साम्राज्यवाद की इस लड़ाई में जब भारतीय पक्ष कोई था ही नहीं और दोनों ही पक्षों का मकसद खूनखराबा ही था, ऐसे में खिलजी अच्छा और मंगोल बुरा कहाँ से हो गया? मंगोलों को हराने के बाद खिलजी ने रणथम्भोर, वारंगल, चित्तौर, गुजरात और दिल्ली में क्या किया, इस बारे में लेखक ने चुप्पी साध रखी है। क्या वह कृत्य मंगोलों से अलग था?

जिस अमीर खुसरों की दुहाई देकर लेखक खिलजी की पूजा करने की बातें कर रहा है, उसी खुसरो ने लिखा है कि चित्तौर को जीतने के बाद खिलजी ने 30,000 हिन्दुओं को मार डालने का आदेश दिया था। खुसरो लिखता है कि उन्हें सूखे घास की तरह काट डाला गया। लेकिन नहीं, यह सब चलता है क्योंकि वह ‘अच्छा आक्रान्ता’ था। लेखक ने लगे हाथ धर्मान्तरण के लिए इस्लामिक आक्रान्ताओं को जिम्मेदार ठहराने की बजाय ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद को गाली भी दे दी है। यह आजकल का ट्रेंड है, कूल है, चलता है- इसीलिए छद्म बुद्धिजीवी जहाँ भी तथ्य से मार खाते हैं, यही उनका आख़िरी सहारा होता है। इसके बाद लेखक ने अकबर द्वारा शुरू किए गए धर्म दीन-ए-इलाही की प्रशंसा पर अपना ध्यान केंद्रित किया है और इसे सबसे अच्छा बताया है।

अकबर के बारे में कहा जाता है कि वह एक रुढ़िवादी था और तभी उसने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सिकरी में इबादतखाना बनवाया था, जहाँ मज़हबी चर्चे हुआ करते थे। एक वाकया है। जब मथुरा के ब्राह्मण पर पैगम्बर मुहम्मद को अपशब्द कहने का आरोप लगा तब मामला अकबर तक पहुँचा। कहा जाता है कि सभासदों की राय अलग-अलग होने के कारण अकबर कोई दंड नहीं दे पाया और उसनें यह कार्य शेख अब्दुल नबी को सौंप दिया। क्या आपको पता है उस ब्राह्मण को क्या सजा मिली? सज़ा-ए-मौत। पैगम्बर के बारे में अपशब्द कहने पर आरोपित को मार डालने वाले राजा के शासनकाल को लिबरल विचारधारा वाला बताया गया, यह सबसे बड़ी भूल है।

इस पूरे लेख का सार यह है कि जिन लोगों ने आपके घर में घुस कर महिलाओं का बलात्कार किया, उनका सम्मान कीजिए। लेखक का मानना है कि आपके घर को जबरन तोड़ कर एक कलाकृति बना दी जाए, आप उस कलाकृति की पूजा कीजिए। ‘द वायर’ का कहना है कि एक छोटे से राज्य को जीत कर 30000 हिन्दुओं को मार डालने वाले सुलतान की प्रशंसा कीजिए क्योंकि उसने मंगोलों को भगाया। इस लेख में हमें उन सारी चीजों की बानगी मिली है, जो हमें सालों से पाठ्य पुस्तकों से लेकर इतिहास की किताबों तक में पढ़ाया जाता रहा। राजस्थान के राजपूरों को गाली दीजिए और इस्लामी आक्रांताओं की तारीफों के पुल बाँधिए क्योंकि ‘उन्होंने युद्ध की नई तकनीकें सिखाई।’

जिन अरबों के शासक ने सोमनाथ मंदिर में तबाही मचाई, उन्हीं अरबों को धन्यवाद दीजिए क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर मंदिर को बचाने में अपनी जान लुटा दी। ये फेक नैरेटिव के बादशाह हैं। फेक नैरेटिव गढ़ना और उसे भुनाना इनके लिए दाएँ हाथ का खेल है। जिस कत्थक का मूल वैदिक काल तक जाता है, उस कत्थक को सुल्तानों के जमाने में पैदा होना बताया गया। भक्ति आंदोलन का श्रेय भी सुल्तानों को दीजिए, इस बात को नज़रअंदाज़ कीजिए कि भक्ति काल के कई संतों के साथ क्या किया गया? आश्चर्य नहीं होगा जब कल को ये लोग यह भी कहने लगे की रामायण और महाभारत आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं, इसका श्रेय इस्लामी आक्रांताओं को जाता है क्योंकि उन्होंने इस सहेज कर रखा। आपका इतिहास, आपको मुबारक।

मुगल धर्मान्तरण करने नहीं आए थे, वे बस अन्य राजाओं की भाँति अपना साम्राज्य फैला रहे थे- ऐसा लेखक का दावा है। अगर ऐसा है तो हार के डर से हुमायूँ ने अल्लाह के नाम पर अपने सैनिकों को उत्तेजित क्यों किया? खिलजी के दरबारियों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में हिन्दुओं को नीच क्यों कहा गया? कथित लिबरल अकबर के दरबार में पैगम्बर मुहम्मद को अपशब्द कहने के आरोप में ब्राह्मण को सज़ा-ए-मौत क्यों मिली? अगर इस्लामिक आक्रांता धर्मान्तरण के लिए नहीं आए थे, इस्लाम को फैलाने नहीं आए थे- तो उन सभी ने मस्जिदें ही क्यों बनवाई? बौद्ध विहार, जैन मठ और मंदिर क्यों नहीं बनवाए? ऐसे बेहूदा लॉजिक पेश कर ही इन छद्म बुद्धिजीवियों ने हमें दशकों तक ठगा है।

MP में पुलिस के सामने मरीज़ के परिजनों ने की डॉक्टर की पिटाई, वीडियो हुआ Viral

मध्य प्रदेश के भिंड में एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की पिटाई किए जाने की ख़बर सामने आई है। दरअसल, अटेर के नावली हार गाँव के निवासी लवली यादव का किसी से पुराना विवाद था। इस विवाद के चलते सोमवार (1 जुलाई 2019) को कुछ लोगों ने उसकी पिटाई कर दी। 

पुलिस की मौजूदगी में डॉक्टर को थप्पड़ मारते परिजन

पुलिस को इस मारपीट की जब सूचना मिली तो वो घटना-स्थल पर पहुँची। घायल अवस्था में पुलिस लवली को एमएलसी के लिए ज़िला अस्पताल ले गई। वहाँ पहुँचकर लवली के परिजनों ने पहले तो डॉक्टर से अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया और इसके बाद वो पुलिस के सामने ही डॉक्टर के साथ हाथापाई पर उतर आए।

डॉक्टर की पिटाई का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इस पूरे घटना में आप देख सकते हैं कि मरीज़ के साथ आए परिजनों ने किस तरह से डॉक्टर रुम में ही डॉक्टर की सरेआम पिटाई कर दी। अश्चर्य की बात तो यह है कि वहाँ पुलिस भी मौजूद थी, बावजूद इसके परिजन डॉक्टर को थप्पड़ मारने से बाज नहीं आए। इसी से पता चलता है कि दूसरों को जीवनदान देने वाले डॉक्टर मध्य प्रदेश में ख़ुद कितने सुरक्षित हैं।

जौनपुर की एक दरगाह से 17 साल की पूनम और 13 साल की पिंकी लापता, परिवार को मौलवी पर शक़

एक चौंकाने वाली घटना में, जौनपुर ज़िले के केराकत कोतवाली क्षेत्र के कढ़रा गाँव की दलित बस्ती की दो किशोरियाँ 27 जून, 2019 को एक दरगाह से लापता हो गईं। परिवार को अपनी बच्चियों के लापता होने में मौलवी पर संदेह है।

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में पुलिस थाना कोतवाली के तहत अहियापुर इलाक़े में मौला बाबा मज़ार पर महेंद्र की बेटी पूनम (17) अपनी माँ गुड्डी देवी के साथ दरगाह में दुआ माँगने के लिए गईं थी। गुड्डी देवी की भतीजी, पिंकी (13) भी उनके साथ गई थीं।

दुआ माँगने के बाद दोनों लड़कियाँ अचानक लापता हो गईं। मज़ार क्षेत्र में और उसके आसपास बड़े पैमाने पर उनकी तलाश के बावजूद, गुड्डी देवी उनका पता नहीं लगा सकीं। लापता होने के बाद इन लड़कियों के मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ़ हो गए।

गुड्डी देवी ने घर वापस जाकर अपने परिवार के सदस्यों को यह घटना सुनाई। परिजनों ने जन सुनवाई ऐप के माध्यम से जौनपुर पुलिस को इस घटना से अवगत कराया।

जन सुनवाई ऐप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा शुरू किया गया एक मोबाइल ऐप है, जहाँ नागरिक अपनी शिक़ायतें और सुझाव दर्ज कर सकते हैं। यह यूज़र्स के अनुकूल इंटरफेस उत्तर प्रदेश सरकार के जन सुनवाई (IGRS) पोर्टल से जुड़ा है। इस ऐप के माध्यम से की गई हर शिक़ायत को ट्रैक भी किया जा सकता है।

एसपी बिपिन कुमार मिश्रा को लिखे पत्र के अनुसार, लड़कियों के अपहरण के पीछे परिवार ने मौला बाबा मज़ार के मौलवी पर संदेह जताया। उन्हें लगता है कि दरगाह के मौलवी की साज़िश से किशोरियों का अपहरण कर लिया गया है। डरे-सहमे परिजनों ने पुलिस अधीक्षक से किशोरियों की जान व इज्जत बचाने के लिए प्रभावी क़दम उठाए जाने का आग्रह किया।

इस बीच, जौनपुर पुलिस ने इस शिकायत को स्वीकार किया और बताया कि लापता लड़कियों की तलाश के लिए एक टीम का गठन किया गया है।

इस तरह की घटनाएँ नई नहीं हैं। पिछले महीने, हैदराबाद के बोरबंडा इलाक़े में घर से बुरी शक्तियों को बाहर करने के बहाने आज़म नाम के एक स्वयंभू मुस्लिम धर्मगुरू को एक लड़की के साथ बार-बार बलात्कार करने के ज़ुर्म में पकड़ा गया। पिछले साल सितंबर में, आसिफ़ ख़ान उर्फ ‘आशु महाराज’ के ख़िलाफ़ एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने के ज़ुर्म में POCSO की धारा-376 और संबंधित धाराओं के तहत लोगों को धोखा देने का मामला दर्ज किया गया था।