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मोदी सरकार में हुआ राफेल मुनाफे का सौदा, CAG ने लगाई मुहर

शनिवार (25 मई) को सरकार ने उच्चतम न्यायालय में सीधे-सीधे कहा कि राफेल सौदा देश के लिए मुनाफे का सौदा साबित हुआ है, और इस बात पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी मुहर लगा दी है। केंद्र ने यह भी कहा कि संप्रग सरकार के मुकाबले राजग सरकार द्वारा ख़रीदे गए लड़ाकू विमानों का ₹1000 करोड़ महंगा होना महज याचिकाकर्ताओं प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के दिमाग का फितूर है।

मीडिया रिपोर्टों के आधार पर याचिका, CAG के आकलन से लैस सरकार

याचिकाकर्ताओं ने याचिका का आधार मीडिया में चली कुछ ख़बरों को बनाया था जिनमें दावा किया गया था कि कॉन्ग्रेस सरकार के समय तय की गई 126 राफेल की कीमत से 36 राफेल विमानों का सौदा (जो राजग सरकार ने किया था) ₹1000 करोड़ ज्यादा महंगा है। केंद्र ने इसके खिलाफ कैग की रिपोर्ट को रखते हुए याचिका के आधार और औचित्य को ही सवालिया घेरे में ला दिया है। सरकार ने न्यायालय को बताया कि उसने कैग को सभी मूल्य संबंधित जानकारियाँ, दस्तावेज और रिकॉर्ड मुहैया करा दिए थे। उनके आधार पर कैग ने विमानों की कीमत का एक स्वतंत्र आकलन किया, और मोदी सरकार के 36 विमानों के सौदे और मनमोहन सरकार के 126 विमानों के सौदे का अध्ययन किया

केंद्र ने अपने 39 पन्नों के जवाब में कहा, “कैग का आकलन याचिकाकर्ताओं के उस मूल तर्क का समर्थन नहीं करता कि कि हर विमान को पहले तय की गई कीमत के मुकाबले ₹1000 करोड़ ज्यादा दाम देकर खरीदा गया। बल्कि कैग के कहे अनुसार तो 36 राफेल विमानों का सौदा तो अनुमानित मूल्य से 2.86% कम है। इसके अतिरिक्त नॉन-फर्म और फिक्स्ड कीमत का भी लाभ मिलेगा। इससे याचिकाकर्ताओं का केस ही खत्म हो जाता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रख लिया फैसला

इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। याचिका 14 दिसंबर के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए पड़ी थी। उस फैसले में अदालत ने केंद्र सरकार को राफेल विमानों की खरीद प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से क्लीन चिट दे दी थी

अमेठी में स्मृति ईरानी के करीबी BJP कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या

उत्तर प्रदेश के अमेठी से नवनिर्वाचित सांसद स्मृति ईरानी के करीबी माने जाने वाले भाजपा कार्यकर्ता और बरौलिया गाँव के पूर्व प्रधान सुरेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जानकारी के मुताबिक, शनिवार (मई 25, 2019) की रात सोते हुए सुरेंद्र सिंह पर अज्ञात बदमाशों ने ताबड़तोड़ गोली बरसा कर हत्या कर दी। गोली लगने से घायल सुरेंद्र सिंह को लखनऊ ट्रामा सेंटर ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।

घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पुलिस पहुँची पुलिस ने मामला दर्ज कर इसकी पड़ताल शुरू कर दी है। पुलिस ने इसे लेकर कई लोगों से पूछताछ कर हत्या के पीछे की वजह पता लगाने की कोशिश कर रही है। मगर फिलहाल इसके पीछे की वजह चुनावी रंजिश को बताया जा रहा है, क्योंकि सुरेंद्र सिंह अमेठी से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को शिकस्त देने वाली भाजपा नेता स्मृति इरानी के बेहद खास थे और स्मृति ईरानी के प्रचार में वो काफी सक्रियता से जुटे थे। वारदात से कुछ समय पहले ही वो स्मृति ईरानी की जीत का जश्न मनाकर लौटे थे।

घटना के बाद बरौलिया का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है। इसे देखते हुए आसपास के इलाके में भारी संख्या में पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी गई है। इस मामले पर अमेठी के एसपी का बयान आया है। उन्होंने कहा कि सुरेंद्र सिंह को शनिवार रात करीब 3 बजे गोली मारी गई। कुछ संदिग्धों को हिरासत में ले लिया गया है और जाँच जारी है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि हत्या का कारण कोई पुराना विवाद या फिर चुनावी रंजिश से जुड़ा मामला हो सकता है।

कॉन्ग्रेस में नया ड्रामा: राहुल गाँधी ने अध्यक्ष पद छोड़ा तो आत्महत्या कर लेंगे कार्यकर्ता, बोले चिदंबरम

लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त मिलने के बाद पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने 2014 की तरह एक बार फिर से अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का राग अलापा। जिसे कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी द्वारा नामंजूर कर दिया गया। दरअसल, पार्टी की हार के बाद शनिवार (मई 25, 2019) को हार की वजहों का विश्लेषण करने के लिए कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक की गई। जिसमें तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे। बैठक में राहुल गाँधी ने इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन पार्टी की कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से उनकी पेशकश को खारिज कर दिया।

इस दौरान देश के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम काफी भावुक हो गए। उन्होंने राहुल गाँधी से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि वो अध्यक्ष पद न छोड़ें। अगर वो अध्यक्ष पद से इस्तीफा देंगे, तो दक्षिण भारत के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता आत्महत्या कर लेंगे। इस बार तमिलनाडु और केरल में कॉन्ग्रेस ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। राहुल गाँधी के वायनाड से चुनाव लड़ने के कारण वहाँ पर वाम दल के खाते में सिर्फ 1 सीट आई, जबकि कॉन्ग्रेस गठबंधन को 19 सीटों पर जीत हासिल हुई।

बैठक के बाद कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि पार्टी हार स्वीकार करती है, लेकिन राहुल गाँधी ही पार्टी अध्यक्ष रहेंगे। पार्टी में बदलाव के पूरे अधिकार राहुल गाँधी को दिए गए हैं। इस बारे में राहुल गाँधी की बहन और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा का कहना था कि जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए। वहीं, जब पार्टी के नेताओं ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी से हस्तक्षेप करने और राहुल गाँधी को इस्तीफा देने से मना करने के लिए कहा, तो उन्होंने कहा कि यह राहुल को तय करना है कि वह पद छोड़ना चाहते हैं या नहीं।


गुजरात के 20 बच्चों की हत्या हुई है, ज़िम्मेदारी भाजपा सरकार की है, एलियन्स की नहीं

आग लगी, कुछ बच्चे जल गए, कुछ डर से कूद गए और मर गए। सूरत की बात है। सूरत गुजरात में आता है। गुजरात में भाजपा की सरकार है। सरकारों का काम होता है हर कमर्शियल संस्थान की फायर ऑडिट करना। सरकारों का काम यह भी होता है कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में आपदा से त्वरित बचाव के उपाय बताना। सरकारों का बहुत काम होता है, लेकिन सरकारें वैसे काम नहीं करतीं।

बीस बच्चों की जान चली गई। शॉर्ट सर्किट से आग लगी और सीढ़ियों वाले हिस्सों में फैली। भगदड़ मची और कई लोग दम घुटने की वजह से मर गए। कुछ बच्चे इस आशा में कूद गए कि कहीं बच जाएँगे। कुछ बचे, कुछ उतने भाग्यशाली नहीं थे।

जब आग लगती है, और वो बिजली के तारों में लगी हो तो धुआँ इतना सघन और ज़्यादा उठता है कि आप न साँस ले पाएँगे, न आगे बढ़ पाएँगे क्योंकि दिखना बंद हो जाता है। खास कर वैसी जगहों में जो बंद हो। 2008 में मैं एक ऐसी ही आग में फँसा था, और हमारे ऑफिस के सारे लोगों का सौभाग्य था कि अधिकतर लोग धुएँ के ऊपर पहुँचने से पहले टॉप फ़्लोर से छत पर पहुँच गए थे। मैं सीढ़ियों से बहुत दूर एक केबिन में खाना खा रहा था, और जबकि किसी को याद आई कि मैं रह गया तो वो अपनी जान पर खेल कर मुझे गरियाने आया कि वो भी मरेगा, मैं भी।

मैंने उस आग की भयावहता को देखा है जब मेरे लिए छत तक जाने की दस सीढ़ियाँ दस किलोमीटर जैसी हो गई थी। आपका शरीर जवाब देने लगता है क्योंकि आप धुएँ को फेफड़ों में भरते हैं जिसमें ऑक्सीजन नहीं होता। दिमाग सुस्त होने लगता है और आप बेहोश होते हैं, फिर कोई मदद न मिले तो आप मर जाते हैं। मेरा शरीर जब जवाब देने लगा और सामने दो मीटर चौड़े, ढाई मीटर ऊँचे खुले दरवाज़े को गर्मी के दोपहर की चिलचिलाती धूप को धुएँ ने ऐसे ढक लिया था कि मुझे लगा आज छत पर नहीं पहुँच पाऊँगा। लेकिन शायद वहाँ कुछ दोस्त इंतजार में थे, और उन्होंने मुझे खींच लिया। मैं बच गया।

सूरत के कोचिंग सेंटर के बच्चे नहीं बचे। सरकार ने ‘एन्क्वायरी’ के आदेश दे दिए हैं। नेताओं ने शोक संदेश जारी कर दिए हैं। परिवार वालों को चार लाख की सरकारी मदद की घोषणा भी हो गई है। एक दिन यह खबरों में भी चला। सोशल मीडिया पर दो दिन रहा। कल ये गायब हो जाएगा। देश बड़ा है, नई खबरें आएँगी, कोई और आपदा, इस आपदा की जगह ले लेगी। हम उस पर चर्चा करने लगेंगे।

कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में आग से बचाव को लेकर कई नियम कानून होते हैं। आपके पास अग्निशमन यंत्र होने चाहिए, उसकी तय समय पर चेकिंग होनी चाहिए, कर्मचारियों को इसके इस्तेमाल की जानकारी होनी चाहिए। सरकार के कर्मचारी उसका ऑडिट करते हैं, और सेफ़्टी का सर्टिफ़िकेट दिया जाता है। आप समझ सकते हैं कि भारत जैसे देश में यह काम कितनी जगहों पर सही तरीके से होता होगा, और भगवान को अगरबत्ती दिखा कर कम्पनी बचाए रखने की प्रार्थना से सारे काम होते रहते होंगे।

कई स्कूलों में इसकी ट्रेनिंग दी जाती है। मेरे स्कूल में दी जाती थी। लेकिन बाकी स्कूलों के बारे में मुझे पता है कि दूसरी क्लास की किताब में लाल-पीले रंग की आग और दमकल की फोटो दिखा कर ही फायर सेफ़्टी ख़त्म हो जाती थी। सड़क की बायीं ओर चलने से लेकर, घंटी बजाने और कूड़ेदान में कूड़ादान फेंकने से लेकर आग बुझाने की बात दो पन्ने में, प्राइमरी कक्षा में पढ़ा दी जाती है। और वो भी रटा दी जाती है कि सवाल आएँ तो जवाब लिख दिया जाए। वही बच्चा सड़क की दाहिनी ओर चलता है, मम्मी के कहने पर कूड़ादान बाहर फेंक देता है, और सायकिल चलाते वक्त घंटी नहीं बजाता।

वैसा ही व्यक्ति कोचिंग संस्थान खोलता है। वैसा ही व्यक्ति सरकार चलाता है। वैसा ही व्यक्ति कोचिंग में पढ़ता है। और, वैसा ही व्यक्ति लाशों की संख्या में से एक संख्या मात्र बन कर चला जाता है। ये आपदा नहीं, हत्याकांड है। इस हत्या का ज़िम्मा सबसे ज़्यादा कोचिंग संस्थान और सरकार पर है, और फिर आधा ज़िम्मा हमारे तंत्र का है जहाँ हम तैयार नहीं करते लोगों को।

जब उस आग से बच कर मैं घर आया, तो हमारे मित्र के भाई थे उन्होंने बताया कि वो हाल ही में एक फायर ड्रिल में गए थे। धुएँ से बचने का सबसे पहला तरीक़ा है ज़मीन पर लेट जाना क्योंकि धुआँ ज़मीन पर सबसे बाद में भरता है, क्योंकि उसकी प्रवृति ऊपर रहने की होती है। उसके बाद नाक पर किसी कपड़े को रख कर साँस लेने की कोशिश करनी चाहिए। अगर कहीं पानी हो, तो रुमाल या कपड़ा भिंगाकर नाक पर रख लीजिए, जान बचने की पूरी संभावना है। आप दम घुटने से नहीं मरेंगे। अगर पानी न मिले तो जान बचाने के लिए शरीर से लिक्विड निकालिए। कपड़े पर थूकिए, या फिर मूत्र का प्रयोग कीजिए। बचे रहने की संभावना बढ़ जाएगी

ये बातें मैं जानता था, लेकिन स्कूल के बाद भूल गया था। क्योंकि स्कूल में भी ड्रिल हमेशा नहीं होती थी। हो सकता है कि ये बातें आग लगने के वक्त याद न रहे, लेकिन अगर सबने वही पढ़ाई की होती, हर स्कूल में आपदा को लेकर तैयारी का चैप्टर प्रैक्टिकल के तौर पर पढ़ाया जा रहा होता, तो आपका सहकर्मी, आपका सहपाठी, आपका मित्र, आपकी बहन, आपकी बेटी आपको उस समय सलाह देकर बचाने की कोशिश कर सकते थे।

लेकिन, हमने कहीं नहीं पढ़ा। पढ़ा भी तो परीक्षा पास करने के लिए, जान बचाने के लिए नहीं। सरकारों ने नियम बनाए लेकिन यह याद नहीं कि ऑडिट किया कि नहीं। हो सकता है कि यह आपदा एक दुर्घटना हो, संस्थान ने ऑडिट भी कर रखा हो, उसके पास सेफ़्टी का सर्टिफ़िकेट भी हो। सर्टिफ़िकेट तो बन जाते हैं, लेकिन कई खबरें बताती हैं कि वहाँ अग्निशमन यंत्र थे ही नहीं! बीस जानें गईं। क्या सरकार कोचिंग वालों के ऊपर एक्शन लेकर अपना पल्ला झाड़ सकती है? अगर सरकार दोषी हुई तो क्या उस सबसे बड़े अफसर पर हत्या का मुकदमा चलेगा जिसके कार्यक्षेत्र में यह विभाग आता है?

नौकरशाहों, जनप्रतिनिधियों और वकीलों ने सारे कानून अपने हिसाब के कर रखे हैं। ज़िम्मेदारी सबसे निचले व्यक्ति पर थोपी जाती है, वो सस्पैंड होता है, बाकी लोगों पर असर नहीं होता। मोदी जी ने आज कहा है कि विश्व भारत की तरफ देख रहा है। रवीश जी ने कहा कि भारत में अब राजनीति का युग बदल गया है। भाजपा के समर्थक खुश हैं कि अब स्पष्ट बहुमत फिर से मिला है।

क्या हमारे तरीके बदलेंगे? क्या सरकार इन बातों पर गम्भीर होगी कि कोटा में बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं तो उसके लिए कुछ किया जाए? क्या स्कूलों के पाठ्यक्रम से लेकर पैरेंटल काउन्सलिंग जैसी चीज़ों पर बातें होंगी? क्या शिक्षा में किताबों की भागीदारी की बराबरी में लाइफ स्किल्स यानी जीवन जीने के लिए ज़रूरी बातों पर बच्चों को तैयार किया जाएगा? या फिर आपदाएँ नाम बदल कर आती रहेंगी, सरकारें चलती रहेंगी, सिस्टम भी चलता रहेगा?

वर्तमान गर्लफ्रेंड से मिलने गया था Alt News का ‘अलगाववादी’ जाकिर मूसा, भूतपूर्व गर्लफ्रेंड ने मरवा दिया

अजय देवगन की फिल्म दिलजले में दारा ने कहा भी था कि आतंकवादी की प्रेमकहानी नहीं होती। फिर भी एक एक कर जितने भी आतंकी मारे जा रहे हैं, उनके पीछे उनकी प्रेमिकाओं की बेवफाई की बात सामने आ रही है। आज ‘शाका’ का कहा वो डायलॉग अनायास ही प्रासंगिक हो उठा है और कश्मीर में सक्रिय उन आतंकियों पर शत-प्रतिशत लागू हो रहा है, जो जिहाद छेड़ने की मुहिम में जुटे हैं और अपनी प्रेमिकाओं से मिलने की चाहत में मौत को गले लगा रहे हैं।

कश्मीर में आतंकियों को प्रेमिकाओं से की जाने वाली बेवफाई भारी पड़ने लगी है। अल-कायदा के अंसार गजवत-उल-हिंद सेल का संस्थापक और प्रमुख जाकिर मूसा की मौत के लिए उसकी प्रेमिका को जिम्मेदार माना जा रहा है, जबकि कुछ अरसा पहले हिजबुल मुजाहिदीन के दूसरे पोस्टर ब्याय आतंकी कमांडर समीर टाइगर की मौत की जिम्मेदार भी एक युवती को ठहराया गया था।

कश्मीर में जारी आतंकवाद के इतिहास में यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें आतंकी कमांडरों की मौत का कारण युवतियाँ बनी हों। कई आतंकी कमांडर या तो अपनी प्रमिकाओं से मिलने की चाहत के कारण डूब गए या फिर उनकी उस बेवफाई के कारण जान से हाथ धोना पड़ा, जो उन्होंने प्रेमिकाओं से की थी।

ताजा मामला कश्मीर में सबसे मोस्ट वांटेड आतंकी जाकिर मूसा की मौत का है। उसकी मौत के लिए उसकी प्रेमिका को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुत्ते की मौत मरने से पहले जाकिर मूसा एनकाउंटर वाले दिन अपनी दूसरी प्रेमिका से मिलने आया था और यही बात उसकी पहली प्रेमिका को पसंद नहीं आई। इसी वजह से भूतपूर्व प्रेमिका ने जज्बाती होकर सुरक्षाबलों से मुखबिरी कर दी और मूसा कुत्ते की मौत मारा गया।

आधिकारिक आँकड़ों पर यकीन करें तो पिछले 30 साल के आतंकवाद के इतिहास में ऐसे सैंकड़ों मामलों में सुरक्षाबल आतंकी कमांडरों और उनके काडर को मार गिराने में उस समय कामयाब हुए, जब वे प्रेमिकाओं की गोद में सिर रख कर फिरदौस का हसीन नजारा लूटने के इरादों से उनसे मिलने आए या फिर अपनी प्रेमिकाओं से बेवफाई के चलते उनकी प्रेमिकाओं ने उनकी मुखबरी कर डाली।

जाकिर मूसा मुठभेड़ वाले दिन अपनी दूसरी प्रेमिका से मिलने उसके घर गया था तो उसकी पहली प्रेमिका ने उसकी मुखबिरी कर सेना को उसके प्रति जानकारी दे डाली थी।

इससे पहले का एक बड़ा मामला वर्ष 2016 के जुलाई महीने में हिज्बुल मुजाहिद्दीन के पहले पोस्टर बॉय और NDTV पत्रकार बरखा दत्त के अनुसार गरीब मास्टर के बेटा बुरहान वानी का भी था। बुरहान भी अपनी गर्लफ्रेंड की मुखबिरी पर मारा गया था। मीडिया में मिली जानकारियाँ बताती हैं कि बुरहान वानी ने कई महिलाओं और लड़कियों से संबंध बना रखे थे, जिस कारण बुरहान से उसकी गर्लफ्रेंड नाराज थी। उसकी गर्लफ्रेंड ने मोबाइल पर उसकी चैंटिंग भी देख ली थी और इसके बाद से वह बदला लेना चाहती थी। इसी क्रम में उसने सुरक्षा एजेंसियों को उसके बारे में सटीक जानकारी दे दी थी।

दिलजले फिल्म का वह कालजयी डायलॉग

इस फिल्म में दारा ने तो शाका को पहले ही कह दिया था कि आतकंवादियों की प्रेम कहानी नहीं होती। दारा ने ये कहने के बाद मटका तोड़ दिया था। आप भी देखिए, Alt News का ‘अलगाववादी’ जाकिर मूसा तो निपट ही चुका है। 

जब सोनिया ने राहुल से कहा, ऐसे छोटे-मोटे चुनावी हार को दिल पर नहीं लेते!

कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी की बैठक। राहुल जी ने त्यागपत्र दिया। सोनिया जी ने कहा, “बेटा, देश तो हमारा ही है, छोटे-मोटे चुनाव को दिल पर नहीं लेते। तुम छंगामल विद्यालय के योग्य थे, फिर भी हमने तुम्हें सेंट स्टीवेंस भेजा। मन पे मत लो, कुछ नहींं तो हथियार दलाली का काम फिर शुरू करा देंगे।”

राहुल जी के नेत्रकमल से अश्रुधारा बह निकली। यह देख कर पंजाब शिरोमणी सिद्धू जी उनके चरण कमलों मे गिर पड़े। सिद्धू जी को अपने स्थान पर पड़े देख कर पिद्दी गाँधी गुर्राए। राहुल जी ने कर कमलों से नेत्रकमल पोंछे, और चरण कमल से सिद्धू जी को हटाया।

सोनिया जी ने बुद्धिजीवी खेमे की ओर सुझाव के लिए संकेत फेंका। कोमल स्वर के स्वामी, पार्ट टाईम नेता और फुल टाईम चुनावी चिंतक सलीम भाई उर्फ़ योया जी गर्म पानी के गरारे कर के, संगीतमय स्वर में बोले, “देखिए… सारेगामापा।” वे अभी सुर ही बिठा रहे थे कि अलीमुद्दीन खान बोल पड़े, “इन्होंने तो चैनल पर बोला , कॉन्ग्रेस मस्ट डाई।”

योया जी ने डायबिटीक, सुलभ मुस्कान तत्काल धारण की और बोले, “मैंं तो कह रहा था कि कॉन्ग्रेस सभी विपक्षी दलों की धाय माँ है। आपको ही आआपा जैसे शिशु दलों को पाल पोस कर बड़ा करना है।”

“आप कोई काम के नहींं हैं। गुहा कहाँ हैं?” गुहा जी कोने मे दरी पर उकड़ूँ बैठे लिख रहे थे। सोनिया जी के आह्वाहन पर शीश उठा कर बोले, “वाह, वाह, वाह, वाह। मैंं देख पा रहा हूँ कि ऐसी परिस्थिति मे नेहरू होते तो ठीक ऐसे ही बैठते जैसे आज बाबा बैठे हैं और वे ना बैठते तो आज हम यहाँ न बैठते।” “अरे गुहा, इसी बैठा-बैठी मे पार्टी बैठ गई है। नेहरू ऐसे क्यों बैठते, अमेठी से कऊन कॉन्ग्रेसी हार सकता है।”

बरखा जी ने फ़ौरन गुटखा थूका और बोलीं, “हम इसको वीमेन इम्पावरमेंट से जोड़ सकते हैं। जब वाड्रा जी गाँव-गाँव मे कॉलोनी बना सकते हैं तो क्या राहुल अमेठी का विकास न कर सकते थे?” यह कह कर उन्होंने चहुँओर विजयी भाव से देखा और बोलीं, “बिल्कुल कर सकते थे, किंतु स्मृति ईरानी जी महिला हैं- राहुल जी चाहते थे कि वे जीतें, अत: तमाम दबावों के बावजूद उन्होंने विकास रोके रखा। राजीव शुक्ला जी जानते हैं कि कैसे दिन मे दो बार बाबा को ज़ोर से विकास आता था, पर वे उसे रोक लेते थे।”

“अरे वो आरनॉब तो कुछ भी कहला देता है बाबा से।” शैम्पूस्वामी ने तभी उस विलक्षण विधि से मस्तक को झटका दे कर अपने केश-विन्यास को नव-रूप दिया, जैसे कोई अरबी घोड़ा रेस के पूर्व कुलाँचे मारने को तत्पर हो गया हो। फिर वे बोले, “हे मातृतुल्य देवी, इस पत्नीतुल्य महिला समाज में आप एकमात्र मातृतुल्य हैं- इसका संज्ञान ले कर मैं बाबा को केरल ले गया, और वहाँ से वे विजयी हुए। केरल के लोग ज्ञानी हैं और वे बाबा की बातों को समझ गए।” कहते-कहते शैम्पूस्वामी बाईं ओर बैठी नई कार्यकर्ता को देख विचारों मे खो गए।

सोनिया जी बोलीं, “शशि, झूठ ना बोलो। वहाँ यह इसलिए नहींं जीता क्योंकि केरल वासी इसकी बातें समझ गए, बल्कि इसलिए जीता क्योंकि इसका ट्रांसलेटर अच्छा था। तुम्हारा बस चले तो अगला चुनाव तुम बाबा को लक्षद्वीप से लड़वाओगे। सैम, तुम्हारा क्या कहना है।”

सैम बोले, “हुआ सो हुआ…” यह सुनते ही राहुल जी उत्तेजित और उद्वेलित हो उठे, और सैम की ओर झपटे। सिद्धरमैया ने बीच-बचाव किया और बोले, “जाने दें बाबा, इस पर प्रेत बाधा है- इस पर अय्यर आए हुए हैं। जब तक कौए के पँख से, गिरगिट के ख़ून में डूबा कर इनके माथे पर फ़ोन का चित्र नहीं बनाया जाएगा, यह ठीक नहीं होंगे।”

माकन जी को फ़ौरन कौए के पँख के साथ केजरीवाल जी के निवास की ओर रवाना किया गया और मंथन को आगे बढ़ाया गया। राहुल बाबा चुपचाप मैगी खा रहे थे जो मानसिक दबाव कम करने के लिए माता जी ने उन्हें दी थी।

अचानक “फिच्च…” की आवाज़ आई, बरखा जी गुटखा थूक रही थीं। “कपिल, इसको मना करो। ये क्या आदत है?” सिबल जी कान खुजा कर बोले, “उमर ख़ालिद के साथ रह कर आदत हो गई है इसकी। आप बेकार चिंता कर रहीं हैं। जो माता है, वही बहन है- जो शून्य है, वह शून्य नहीं है। जो आज शून्य है, कल पिछत्तीस भी हो सकता है।”

“चुप रहो, सिबल। तुम्हारी सलाह ने अंडों की बारात लगाई है। बरखा से अच्छी ट्राईकलर वाली है। दिग्गी कहाँ हैं?” “वे सदमे मे हैं। दिग्गी भोपाल से गाड़ी की डिग्गी में छुप कर भागे हैं। कमल-कमल चिल्लाते हैं, पता नहीं भाजपा का भय है या कमलनाथ का?” “कमलनाथ का भय क्यों होगा? दिग्गी कोई सिख थोड़े हैं!” सोनिया जी बोलीं।

सिबल सहम गए और अपने आज़ाद लबों पर फ़ौरन 66-A लगाया। सोनिया जी बोलीं, “युवा कार्यकर्ताओं में रोष है। उनकी बात समझनी होगी, कुछ तो करना होगा।” पीछे से दिग्विजय जी की आवाज़ आई, “बगड़ बम।”
सोनिया जी आगे बोलीं, “क्या करना चाहिए? मोतीलाल वोरा जी से पूछा जाए!” मोतीलाल जी महाभारत काल मे संजय के टीवी का एंटीना घुमा कर रिसेप्शन ठीक करते थे, और सब परिस्थिति पर नज़र रखते थे। बोले, “किसी को इस्तीफ़ा देना होगा। पर किसे?”

दृष्टि एक चेहरे से दूसरे पर तैरती चली गई। ऐसे मातमी माहौल में जब कॉन्ग्रेस मुख्यालय एनडीटीवी-सा लगने लगा, तो कोई बोला, “चाय पी लें?” सोनिया जी ने अनमने भाव से संदेश बाहर भेजा। बाहर श्रद्धा भाव से नामपट्टिका निहारतीं पल्लवी जी ने मुसम्बी देवी को पटखनी देते हुए रामखिलावन को चाय लाने का आदेश पहुँचाया।

सोनिया जी गँभीरता से बोलीं, “लोग कहते हैं राहुल को इस्तीफ़ा देना चाहिए।” चिदम्बरम बोले, “हम क्या मर गए हैं?” “तो आप दे रहे हैं इस्तीफ़ा?”

“नहीं, नहीं। मेरा मतलब यह था कि यदि राहुल जी ठीक से संवाद नहींं कर पाए जनता से, तो इसका कारण उनका नींद में होना था। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि उन्हें अच्छी चाय नहीं मिलती थी। मैंंने पहले रामखिलावन को निकालने को कहा था, तो उन्होंने राम को मिथक बता कर मना कर दिया। अब समय आ गया है कि पार्टी हित में कठोर निर्णय लिए जाएँ। रामखिलावन, चाय की ट्रे रखो और इस्तीफ़ा दो।”

सोनिया जी प्रसन्न हो गईं। बोलीं, “तुम्हारी इसी नैरेटिव घुमाने की कला के कारण हम तुम्हारे बेटे की सुपरमैन मुद्रा में ईडी ऑफ़िस जाने जैसी बेहूदगी बर्दाश्त करते हैं।” फिर रामखिलावन की ओर घूम कर बोलीं, “रामखिलावन, इस्तीफ़ा दो।”

“पर आगे चाय कौन देगा मैडम?”
“तुम उसकी चिंता मत करो, मनमोहन जी ख़ाली हैं। तुम पेपर डालो।”
मुसम्मी देवी चीख़ते हुए कैमरे की ओर दौड़ीं, “रामखिलावन हैज रिजाईन्ड, राहुल जी हैज अराईव्ड।”
राहुल जी मैगी खाने मे व्यस्त हो गए।

NOTA: 21 सीटों पर हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट खींचे, भाजपा ने पाँच गँवाए, 7 जीते

NOTA को आम तौर पर शहरी उच्च-मध्यम वर्ग का चुनाव मानकर खारिज कर दिया जाता है। पर लोकसभा 2019 का निर्वाचन इसके उलट गवाही दे रहा है। NOTA जिन सीटों पर निर्णायक ताकत बनकर उभरा है, उनमें से कई ग्रामीण इलाकों और जनजाति-बहुल क्षेत्रों में स्थित हैं- यानि NOTA समाज के हर वर्ग में बढ़ रही है। सभी राजनीतिक दलों को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

NOTA के मायने

सैद्धांतिक रूप से NOTA किसी एक दल या विचारधारा नहीं बल्कि सम्पूर्ण समकालीन राजनीतिक वर्ग को ख़ारिज करने का प्रतीक है। एक वोटर NOTA दबाकर यह सन्देश देता है कि वह अमुक पार्टी से तो इतना नाराज है कि उसे वोट न दे, लेकिन अन्य किसी को भी अपने वोट के लायक या अपनी समस्या विशेष का समाधान नहीं मानता। अभी तक इसे शहरी उच्च-मध्यम वर्ग का शिगूफा माना जाता था, लेकिन मतदान के बाद की तस्वीर कुछ अलग है:

NOTA exit polls lok sabha results 2019 general elections NOTA seats

जैसा कि ऊपर की टेबल में देखा जा सकता है, अंडमान जैसे जनजातीय इलाकों, मछलीशहर जैसे तुलनात्मक रूप से पिछड़े इलाकों आदि में भी बड़ी संख्या में NOTA वोट पड़े हैं। अंडमान में कॉन्ग्रेस के कुलदीप शर्मा ने भाजपा के विशाल जॉली को केवल 1407 वोटों से हराया, जबकि NOTA 1412 लोगों ने दबाया। यानि इन 1412 NOTA वालों के वोट मिल जाते तो भाजपा प्रत्याशी कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार को हरा देते।

उसी तरह मछलीशहर में भाजपा जहाँ महज 180 मतों से जीती वहीं NOTA को इसके लगभग 50 गुने यानि 10,830 वोट मिले। मतलब अगर 10 प्रतिशत NOTA वाले भी दूसरे नंबर पर रहे बसपा प्रत्याशी को मिल जाते तो मामला पलट सकता था। अब जबकि राजनीतिक मुकाबले इतने करीबी होने लगे हैं, जनता में मतदान प्रतिशत और जागरुकता भी बढ़ रहे हैं तो भाजपा समेत सभी दलों के हित में होगा कि वे NOTA पर भी एक राजनीतिक प्रतिस्पर्धी के तौर पर ध्यान दें।

सीटों के सन्नाटे के बाद AAP ने स्वीकारा, EVM पर शक नहीं है, मोदी को हराना था लक्ष्य

लोकसभा चुनाव 2019 में हुई शर्मनाक हार को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 26 मई को कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत कर लोकसभा चुनाव में पार्टी की शर्मनाक हार पर चर्चा करेंगे। इसके लिए दिल्ली के पंजाबी बाग क्लब में पार्टी नेताओं को बुलाया गया है। खबर है कि इस हार की समीक्षा से सबक लेकर आम आदमी पार्टी नई रणनीति के साथ आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव की तैयारी में तत्परता से जुटेगी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक एवं कैबिनेट मंत्री गोपाल राय ने प्रेसवार्ता बुलाई। इसमें उन्होंने कहा कि इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर कराए गए एक आकलन से पता चलता है कि एक तरफ लोग मोदी को जिताने के लिए वोट कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ लोग मोदी को हराने के लिए भी वोट कर रहे थे।

पार्टी का साफ़ मानना है कि मोदी जी को जिताने वालों की संख्या ज्यादा थी। जिससे दिल्ली में भी मोदी जी को एक बड़ी जीत हासिल हुई। लेकिन साथ ही आम आदमी पार्टी का अभी भी मानना है कि विधानसभा चुनाव में लोग दोबारा से केजरीवाल को ही मुख्यमंत्री चुनेंगे।

यहाँ तक कि 24 मई को अलका लाम्बा ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “काश किसी की कुछ तो सुनी होती, जीतते ना सही, कम से कम जमानत तो जप्त ना होती। 2015 में 70 में से 67 जीतने वाले 2019 आते-आते 7 में से 3 पर जमानत ही जब्त करवा बैठे। अभी भी देर नही हुई, जनता को हमेशा एक अच्छे विकल्प की तलाश रहती है, बस जरूरत है फ़ालतू के घमंड को छोड़कर, हार से सबक लेने की।”

पार्टी की तरफ से बोलते हुए गोपाल राय ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने पूर्ण राज्य के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था। पार्टी का मानना था कि अगर आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी जीत कर संसद जाते हैं तो दिल्ली के लिए केंद्र से लड़कर और बेहतर काम करा सकेंगे। लेकिन चुनाव में जो वोट पड़े वो नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी के नाम पर पड़े।

गोपाल राय ने कहा कि हमें ईवीएम पर किसी भी तरह का संदेह नहीं है। हम दिल्ली लोकसभा चुनाव पर मंथन कर रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और जीतेगी।

AAP ने अलका लाम्बा को किया व्हाट्सएप्प ग्रुप से पदच्युत, जोड़ने-निकालने पर अलका ने किए मार्मिक ट्वीट

आम आदमी पार्टी के सबसे ख़ास बात ये है कि दुनिया में चाहे कुछ भी चल रहा हो, ये पार्टी लोगों के मनोरंजन में कमी नहीं होने देती है। इस पार्टी नेताओं की हरकतों से ऐसा महसूस होता है मानो इस पार्टी का जन्म व्हाट्सएप्प ग्रुप में जोड़ने और निकालने को राष्ट्रीय चर्चा बनाने के लिए ही हुआ था।

ताजा प्रकरण दिल्ली, चाँदनी चौक से AAP विधायक अलका लाम्बा को लेकर है। अलका लाम्बा से पार्टी की नाराजगियाँ सास-बहू धारावाहिक की तरह ही हर दूसरे दिन ट्विटर पर देखने को मिलती हैं। इस बार दिल्ली में लोकसभा चुनाव में एक भी सीट जीत पाने में नाकाम रही अरविन्द केजरीवाल की यह पार्टी अंदरूनी उठापटक झेल रही है।

अलका लाम्बा ने चुनाव नतीजे आने के बाद ट्विटर पर अरविन्द केजरीवाल को कुछ नसीहत दे डाली थी, जिसका परिणाम ये हुआ कि आम आदमी पार्टी ने अपनी विधायक को व्हाट्सएप्प ग्रुप से ही निकाल दिया। इस दुखद और बेहद मार्मिक घटना ने अलका लाम्बा के मन को गहरी ठेस लगाईं और उन्होंने ट्विटर पर अपना दुःख व्यक्त कर फिरसे व्हाट्सएप्प ग्रुप की चर्चा छेड़ दी है।

24 मई को अलका लाम्बा ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “काश किसी की कुछ तो सुनी होती, जीतते ना सही, कम से कम जमानत तो जप्त ना होती। 2015 में 70 में से 67 जीतने वाले 2019 आते-आते 7 में से 3 पर जमानत ही जब्त करवा बैठे। अभी भी देर नही हुई, जनता को हमेशा एक अच्छे विकल्प की तलाश रहती है, बस जरूरत है फ़ालतू के घमंड को छोड़कर, हार से सबक लेने की।”

शायद इस घमंड वाली बात से ही अरविन्द केजरीवाल ‘ट्रिगर’ हो गए और उनके हारे हुए प्रत्याशियों ने उनके इशारे पर अलका लाम्बा को ग्रुप से बाहर कर दिया। इसके बाद आज अलका लाम्बा ने कुछ और बेहद करुणामय और मार्मिक ट्वीट के माध्यम से अपनी बात सामने रखते हुए लिखा है कि बार-बार व्हाट्सएप्प ग्रुप में जोड़ने-निकालने से बेहतर होता, इससे ऊपर उठकर कुछ सोचते, बुलाते, बात करते, गलतियों और कमियों पर चर्चा करते, सुधार करके आगे बढ़ते। बता दें कि विगत मार्च के महीने ही उन्हें आम आदमी पार्टी के MLA वाले ग्रुप से निकाल दिया गया था। लेकिन, उस समय उन्हें फिरसे जोड़ लिया गया था।

इसके बाद अलका लाम्बा ने शक जाहिर करते हुए कल का ही एक ट्वीट रीट्वीट किया, जिसमें उन्होंने ओडिशा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व की तारीफ़ की थी। इसमें अलका लाम्बा ने लिखा है कि महागठबंधन के लिए इधर-उधर भागने से बढ़िया था कि नवीन पटनायक की तरह एक राज्य पर फोकस करते।

आत्ममुग्ध बौने के नाम से ट्विटर पर प्रसिद्द अरविन्द केजरीवाल को फिरसे ‘ट्रिगर’ करते हुए अलका लाम्बा ने लिखा है कि कुछ अंदरूनी सूत्र उन्हें बता रहे हैं कि अरविन्द केजरीवाल को नवीन पटनायक की तारीफ पसंद नहीं आई इसलिए उन्हें व्हाट्सएप्प ग्रुप से निकाल दिया गया है। हालाँकि, अलका लाम्बा ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह अंदरूनी सूत्र उस व्हाट्सएप्प ग्रुप में अभी तक मौजूद हैं या फिर उनको भी निकाल दिया गया है।

Breaking: जेट एयरवेज़ के पूर्व-चेयरमैन को मुंबई एयरपोर्ट पर रोका गया, विदेश जाने पर रोक

प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया के हवाले से आई खबर के अनुसार घाटे में चल रही जेट एयरवेज़ के पूर्व-चेयरमैन नरेश गोयल को सपत्नीक विदेश जाने से रोक दिया गया है। वह मुंबई हवाई अड्डे से विदेश जाने की फ़िराक में थे तभी मुंबई आव्रजन अधिकारियों ने उन्हें रोक दिया। माना जा रहा है कि यह 1.2 बिलियन डॉलर के कर्ज को देखते हुए एहतियातन किया गया है, ताकि विजय माल्या वाले प्रकरण की पुनरावृत्ति न हो।

कई वरिष्ठ अधिकारीयों ने भी दे दिया है इस्तीफा

जेट एयरवेज़ की माली हालत इस समय काफी ख़राब चल रही है। घाटे और कर्जे में डूबी कंपनी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जाँच शुरू किए जाने की भी खबरें आईं हैं। इसके अलावा कंपनी ने अपने स्टाफ की तनख्वाह भी नहीं दी है। 17 अप्रैल से कंपनी की वायुसेवा का परिचालन ठप है