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‘…अगर कॉन्ग्रेस राज्य में सभी सीटें नहीं जीत पाती है, तो सीएम को इस्तीफा दे देना चाहिए’

पंजाब में मतदान के दिन ही कॉन्ग्रेस के खेमे में भूचाल सा आ गया। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कल (मई 19, 2019) अपने कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पर हमला बोला। अमरिंदर सिंह ने कहा कि सिद्धू उन्हें हटाकर मुख्‍यमंत्री बनना चाहते हैं। जिसके बाद अब सिद्धू की पत्नी नवजोर कौर का बयान सामने आया है। इसमें उन्होंने कैप्टन पर निशाना साधा है। उन्होंने अमृतसर में वोट डालने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि अगर कॉन्ग्रेस राज्य की सभी सीटें नहीं जीत पाती है, तो सीएम को इस्तीफा दे देना चाहिए।

कल अमरिंदर सिंह ने सिद्धू द्वारा चुनाव प्रचार के अंतिम दिन बठिंडा में दिए गए विद्रोही बयान की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि मतदान से ठीक पहले उनकी गलत टिप्पणी से कॉन्ग्रेस को नुकसान होगा। इसके साथ ही कैप्‍टन ने सिद्धू के खिलाफ बड़ी कार्रवाई के संकेत भी दिए थे। उन्होंने कहा कि अगर वह सच्चे कॉन्ग्रेसी होते, तो अपनी शिकायत रखने के लिए सही समय का चयन करते, न कि मतदान से ठीक पहले इस तरह का बयान देते। पार्टी में अलग-अलग विचार के लोग होते हैं, लेकिन सिद्धू ने जो तरीका अपनाया वह गलत है। वह मुख्‍यमंत्री बनने के लिए इतने उतावले हैं कि उनको समय और मौके का भी ध्‍यान नहीं रहता।

हालाँकि अमरिंदर और सिद्धू के बीच अंदरूनी खींचतान काफी दिनों से जारी है, मगर सीएम अमरिंदर के बयान के बाद दोनों के बीच की नाराजगी अब खुल कर सबके सामने आ गई है। गौरतलब है कि सिद्धू ने 7 मई को बठिंडा में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार अमरिंदर सिंह राजा के समर्थन में प्रचार करते हुए कहा था कि यदि 2015 की बेअदबी की घटनाओं के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो वह इस्तीफा दे देंगे। इस दौरान उन्होंने सवाल भी किया था कि 2015 में बेअदबी और पुलिस गोलीबारी की घटनाओं के सिलसिले में बादल परिवार के जिम्मेदार सदस्यों के खिलाफ प्राथमिकी क्यों नही दर्ज की गई?

कोलकाता: 3 बजे के बाद अचानक गायब हुए वोटर, TMC गुंडों की चाल या भारी पड़ी गुंडई!

मतदान के आखिरी चरण में रविवार (मई 19, 2019) को कोलकाता के दो निर्वाचन क्षेत्रों में वोटिंग हुई। खबरों के मुताबिक यहाँ दोपहर 3 बजे के बाद अचानक मतदान केंद्र से मतदाता गायब दिखे। इस कारण 2014 के मुकाबले यहाँ वोटिंग कम हुई।

वैसे तो कोलकाता नॉर्थ और कोलकाता साउथ पर हुई वोटिंग की संख्या हमेशा बंगाल की अन्य सीटों पर हुए मतदान से कम ही रहती हैं। फिर भी, टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक इस बार मतदाताओं की उमड़ी भीड़ देखकर ऐसा लग रहा था मानो इन दोनों सीटों पर 2014 के आँकड़े टूटेंगे। लेकिन 3 बजे के बाद अचानक गायब हुए वोटर्स के कारण ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया।

जानकारी के मुताबिक, कोलकाता नॉर्थ में 1 बजे तक करीब 43.6% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। दोपहर 3 बजे तक यह आँकड़ा 54.9% तक पहुँच गया था। लेकिन दिन खत्म होते-होते कुल वोटिंग सिर्फ़ 61.1 % ही हुई। स्पष्ट है कि बाकी 3 घंटों में महज 6 प्रतिशत ही वोटिंग हुई।

इसी प्रकार कोलकाता साउथ में दोपहर तक 43.8% मतदाताओं ने वोट डाला। हालाँकि अगले 2 घंटों में 15% की तेजी देखने को मिली। नतीजतन 3 बजे के भीतर 58.6% मतदान हुआ। शाम होते-होते साउथ कोलकाता में इस बार कुल मतदान 67% रहा। जबकि 2014 में यह आँकड़ा 69.3% था।

इस वर्ष बंगाल के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों की बात करें तो मतदान प्रतिशत में काफ़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है। 2014 की कुल वोटिंग जहाँ 81.1% हुई थी वहीं इस साल राज्‍य में कुल मतदान का प्रतिशत 83.8 रहा है। लेकिन बीते दिनों टीएमसी के गुंडों द्वारा हुई हिंसा के कारण टीएमसी के नेताओं को लग रहा था कि इन क्षेत्रों में भी ज्यादा से ज्यादा मतदाता वोट डालने पहुँचेंगे पर ऐसा मुमकिन नहीं हुआ। कोलकाता के इन दो क्षेत्रों में मतदाताओं का ऐसा व्यवहार नेताओं के लिए भी हैरान करने वाला रहा।

साला ये दुःख काहे खतम नहीं होता है बे!

रवीश कुमार जब राहुल गाँधी के मुँह में जवाब ठूँस कर कुछ ज्ञान की बातें निकलवाने की फ़िराक़ में उनका लाइव इंटरव्यू ले रहे थे, तो राहुल गाँधी ने एक मारक लाइन कही थी कि ‘मैं तो मोदी जी से भी सीखता हूँ… उनसे ये सीखता हूँ कि देश को कैसे नहीं चलाना चाहिए।’ रवीश के गंभीर चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई और उन्होंने दोहरा दिया कि मोदी से यही सीख मिलती है कि देश को कैसे नहीं चलाना चाहिए।

राहुल गाँधी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो खुद भी खुद को सीरियसली नहीं लेते, वैसे व्यक्ति को रवीश क्यों सीरियसली लेंगे, ये जानने की कोशिश मैंने नहीं की। राहुल गाँधी ने सायकल ही ठीक से चला ली हो, जो कि अखिलेश के साथ उन्होंने कोशिश की थी, वही भारतीय जनता के लिए जश्न का समय होगा कि चलो ये आदमी कुछ तो चला लेता है, उस व्यक्ति के मुँह से देश चलाने की आकांक्षा और लगभग दो दशक से राज्य और देश की सरकार को चलाने वाले व्यक्ति पर बेतुका कटाक्ष सुन कर उसमें मीनिंग खोज लेना अलग स्तर की बुद्धिमानी है।

खैर, जो लोग रवीश की पिछले पाँच साल की पत्रकारिता टीवी और सोशल मीडिया पर देख रहे हैं, वो भी यह बात आसानी से मान लेंगे कि रवीश जी को पत्रकारिता के कॉलेजों को सिलेबस में केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए। रवीश जी एक केस स्टडी हैं कि पत्रकारिता को सरकारों के परे, न्यूट्रल होना चाहिए। न कि, सरकार बदलने पर उस सरकार के पीछे हाथ धो कर पड़ जाना चाहिए, और पाँच साल सोने के समय से भी टाइम निकाल कर फेसबुक पर चार बजे सुबह में लेख लिख कर जनता को बरगलाना चाहिए कि असली पत्रकारिता वही कर रहे हैं फर्जी के आँकड़े और सवाल दाग कर।

रवीश कुमार वही पत्रकार हैं जिन्हें देख कर बच्चों को सीखना चाहिए कि आपकी निष्पक्षता सरकार के आने या जाने पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। रवीश वही पत्रकार हैं जिन्हें देख कर पत्रकारिता के विद्यार्थी यह जान पाएँगे कि खुद को निष्पक्ष कहने वाले, दूसरे हर पत्रकार को तिरस्कार से देखने वाले, स्वयं को ही अंतिम सत्य मानने वाले पत्रकार जब गिरते हैं, तो वो गड्ढा अंतहीन होता है। आप उसमें ट्यूब के एक सिरे पर हाय रेजोल्यूशन कैमरा लेकर, ढकेलते जाइए, गिरता हुआ रवीश आपके कैमरे की जद से बाहर जाता रहेगा, जाता रहेगा…

एग्जिट पोल पर रवीश का रिएक्शन

कल शाम जब एग्जिट पोल आए तो पत्रकारिता के समुदाय विशेष का मन मुरझा चुका था, लोकिन प्रोग्राम तो करना था, तो खानापूर्ति करते नजर आए कई लोग। इसी पर बात करते हुए रवीश कुमार ने अपने सहयोगी से कई बातें कहीं। एक बात जो उन्होंने कही, वो यह थी कि उनके अनुसार कई एंकरों ने काफी मेहनत की है (भाजपा के लिए) तो उन्हें सरकार में मंत्री बनाना चाहिए।

ये बात रवीश कुमार ने बिलकुल सही कही, लेकिन ये आधा सत्य ही है। आधा सत्य यह है कि मीडिया दो हिस्सों में बँटा हुआ था पिछले पाँच सालों से। एक हिस्से को सब हरा दिख रहा था, दूसरे को पीला और प्राणहीन। एक हिस्सा सरकार के लिए कैम्पेनिंग कर रहा था, तो दूसरा सरकार के विरोध में। रवीश जी भी स्टूडियो से लेकर प्रेस क्लब और सड़कों तक पत्रकारिता के नाम पर कई रैलियाँ करते नजर आए।

कालांतर में उन्होंने ‘हेलिकॉप्टर पत्रकारिता’ से लेकर ‘चार्टर्ड प्लेन पत्रकारिता’ भी की। वो मायावती के साथ स्टेज पर भी चढ़े और खड़े रहे। ऐसे काम जब और पत्रकार करते थे तो रवीश ने मुखर हो कर उन्हें लताड़ा है कि ये लोग पत्रकारिता की जगह कुछ और ही कर रहे हैं। अब रवीश ने जब यह कहा है कि कई एंकरों को मंत्री होना चाहिए तो ज़ाहिर है कि वो यह बात अपने अनुभव से ही कह रहे होंगे। उन्होंने इस चुनाव में तमाम नेताओं से नज़दीकियाँ वैसे ही बढ़ाई जैसे वो बाक़ियों के ऊपर आरोप लगाते दिखे।

यह बात भी जगज़ाहिर है कि रवीश कुमार ने स्क्रीन काली कर के आनन-फानन में आपातकाल का इंडियन एक्सप्रेस बनने की नायाब नौटंकी की थी, और देश में सतहत्तर बार आपातकाल ला चुके हैं। लेकिन आपातकाल नहीं आया। उन्होंने कहा कि डर का माहौल है, लेकिन उसका भी कुछ फायदा हुआ नहीं। बाद में पता चला जिन-जिन के नाम पर इन्होंने माहौल बनाने की कोशिश की, लगभग सारे नाम उन कारणों से नहीं मरे जो रवीश बता रहे थे।

इन्होंने आइकॉन गढ़ने की कोशिश की, हर सामाजिक अपराध या हत्या पर सीधे सरकार को घेरते नजर आए, लेकिन बाकी समय चुप रहे जब सरकारें भाजपा की नहीं थी। यही आदमी बंगाल पर ममता का नाम तक नहीं लिख पाया था पिछले साल के पंचायत चुनावों की हिंसा पर जिसने हाल के समय में एक प्रदेश में सबसे ज़्यादा हत्यायें देखीं। बंगाल के दसियों दंगों पर ये आदमी चुप रहा, तब इसके ज़मीर ने इसको नहीं ललकारा कि वो कहे कि बंगाल में हर दूसरे जिले में नफ़रत की आग क्यों लगी हुई है?

रवीश कुमार सहजता से चुप्पी ओढ़े गोबर से खाद बनाना सिखाते रहे। गौरक्षकों पर इन्होंने चालीस-चालीस मिनट के कई प्राइम टाइम निकाले, लेकिन गौतस्करों द्वारा की जा रही चोरी से लेकर, उनके द्वारा ट्रक आदि चढ़ाकर प्रकाश मेशराम जैसे कई पुलिस वालों की हत्यायों पर ये चुप रहे।

क्योंकि रवीश कुमार जानते हैं कि इस चुप्पी की भी अपनी क़ीमत है। यही तो वो कारण है कि रवीश कुमार इतने आत्मविश्वास से बोल देते हैं कि एंकरो को मंत्री होना चाहिए। बाकी एंकर का पता नहीं लेकिन रवीश कुमार तो गठबंधन में मंत्री पद तो ज़रूर पा जाते। उनकी मेहनत सबको दिखी है। बाक़ियों ने सिर्फ चैनलों के स्टूडियो से पार्टियों के पक्ष में बोला, रवीश ने रात-रात जग कर, झूठ-प्रपंच जुटा कर खूब लिखा। साक्षात्कार दिए, बताया कि उनकी विचारधारा किसने मिलती है और वो क्या कर रहे हैं। इसलिए, जब वो कहते हैं कि एंकरों को मंत्री होना चाहिए, तो उनसे बेहतर कौन जानेगा ये बात! क्या पता डील हो चुकी है!

चुनाव आयोग से उठ चुका है विश्वास

रवीश ने कहा कि उनका चुनाव आयोग पर विश्वास नहीं है। वो पत्रकार हैं, कई सालों से पत्रकार हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला कैसे चुनाव आयुक्त बने थे, उन्हें यह बात याद ही होगी। तब उनका भरोसा चुनाव आयोग पर से नहीं उठा था। उनका भरोसा तब भी नहीं उठा था जब ममता के बंगाल में पंचायत चुनाव की हिंसा ने दसियों जानें लीं और एक तिहाई सीटों पर तृणमूल निर्विरोध जीत गई। इस व्यक्ति ने तब सवाल नहीं उठाए जब कॉन्ग्रेस जीत रही थी।

यही वो अंतिम तर्क है जब रवीश लोकतंत्र की अवधारणा पर ही सवाल खड़ने लगता है। अंतिम तर्क यही होता है कि ‘मैं नहीं मानता’, ‘मेरा तो विश्वास नहीं है’। आपका ये निजी मत हो सकता है, लेकिन आप चैनल के स्टूडियो में ‘निजी’ नहीं सार्वजनिक होते हैं। आप वहाँ जब इस तरह की बातें कैजुअली कहते हैं, तो आप वैसे ही प्रतीक पैदा करते हैं जैसा आपने मायावती की रैली के मंच से किया था। आपने अपनी प्रतिबद्धता दिखाई थी वहाँ खड़े हो कर।

आप जब हारने लगते हैं और खेल के नियमों पर ही सवाल करने लगते हैं तो पता चल जाता है कि आप किस स्तर के खिलाड़ी हैं। रवीश ने जो गड्ढा खोदना शुरू किया था, और निष्पक्षता से घृणा की पत्रकारिता की ओर रुख़ किया था, वो अब उन्हें अवसाद की ओर ले जा चुका है। अब बस उस अंतिम क्षण का इंतजार है जब यह पत्रकार टूट जाएगा क्योंकि दुनिया इसके हिसाब से नहीं चल रही। जब यह पत्रकार कहेगा कि भले ही भाजपा 41% वोट शेयर से जीत जाए, मैं नहीं मानता इसे जीत।

ये व्यक्ति बहुत दुःखी है। भीतर से घुटता हुआ आदमी जब कराहता है, और उसे बदलते माहौल में कुछ समझ में नहीं आता, उसे यह बात घालती हो कि लोग मोदी को क्यों वोट दे रहे हैं, तब उसकी पीड़ा इसी तरह के कुतर्कों के रूप में बाहर आती है। तब पूरी दुनिया गलत हो जाती है। तब वही वोटर गलत हो जाता है जिसने मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को विधानसभा दी थी, और अब भाजपा को लोकसभा दे रही है। तब पत्रकार यह मानने लगता है कि उसके वोट का मूल्य आम जनता के वोट से 32 करोड़ गुना ज्यादा होना चाहिए ताकि वो जिसे एक वोट दे दे, वो पार्टी सीधा प्रधानमंत्री बना ले। और हाँ, कैबिनेट में उन्हें एक जगह ज़रूर दे।

EVM पर एक ही पार्टी के चाचा-भतीजे में 36 का आँकड़ा: अजित ने जताया पूरा विश्वास, पवार बता रहे ‘बकवास’

अन्य विपक्षी दल के नेताओं की तरह नेशनल कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार, उनकी बेटी सुप्रिया सुले और उनके भतीजे अजित पवार ने ईवीएम पर अपनी अलग-अलग राय दी है। एक ओर जहाँ शरद पवार और उनकी बेटी को लगता है कि ईवीएम मशीन के साथ छेड़छाड़ की जा रही है वहीं उनके भतीजे अजित का कहना है कि यदि ईवीएम के सााथ छेड़खानी मुमकिन होती तो भाजपा 5 राज्यों में चुनाव नहीं हारती।

गौरतलब है कि ईवीएम से छेड़खानी मामले को लेकर पिछले महीने शरद पवार ने कई विपक्षी दलों के साथ मिलकर मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इस कॉन्फ्रेंस में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, टीएमसी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू समेत कई नेताओं ने ईवीएम के साथ छेड़खानी पर संदेह जताया था। लेकिन अजित के मुताबिक ऐसा नहीं है।

नवभारत टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक अजित पवार का कहना है, “कई लोगों को ईवीएम पर संदेह है। उन्हें लगता है कि इसके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। मुझे ऐसा नहीं लगता है, लेकिन ये लोग ऐसा कहते रहते हैं। अगर ऐसा होता, तो वे (बीजेपी) 5 राज्यों में चुनाव नहीं हारते।”

यह पहली बार नहीं है जब अजित ने अपने चाचा (शरद पवार) के बयान के विपरीत जाकर ईवीएम का बचाव किया हो। गत वर्ष 30 अक्टूबर को मीडिया से हुई बातचीत में भी अजित पवार ने बयान दिया था कि व्यक्तिगत रूप से उन्हें इन मशीनों पर पूरा भरोसा है।

बता दें कि शरद पवार ने फरवरी महीने में एक बड़ी घोषणा करते हुए इन लोकसभा चुनावों के लिए भतीजे अजीत पवार का नाम न देकर बेटी सुप्रिया सुले का नाम दिया था। इन दौरान उन्होंने कहा था, ”अप्रैल-मई 2019 के बीच होने वाले 17वें लोकसभा चुनाव में इस बार उनके भतीजे अजित पवार की जगह वह और उनकी बेटी सुप्रिया सुले चुनाव लड़ेंगी।”

भोपाल से प्रज्ञा की जीत, बेगूसराय से कन्हैया की हार और अमेठी में स्थिति संदिग्ध: एग्जिट पोल्स

बीते कुछ घंटों में एक के बाद एग्जिट पोल के मुताबिक़ भाजपा समर्थित राजग को पूर्ण बहुमत मिलने के आसार हैं। लोकसभा चुनाव 2019 कई मायनों में ऐतिहासिक है, लगभग 50 सालों में यह ऐसा पहला चुनाव होगा जहाँ किसी प्रधानमंत्री को लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिला हो।

साथ ही, ‘हिन्दू टेरर’ के कलंक से कलंकित और कॉन्ग्रेस की तुष्टीकरण एवम् साम्प्रदायिक नीतियों का शिकार बनी साध्वी प्रज्ञा के भोपाल से प्रत्याशी होने को भाजपा द्वारा लगातार प्रखर समर्थन देने के कारण भी यह चुनाव चर्चा में रहा। अगर एग्जिट पोल्स पर नजर दौराएँ तो लगभग सारे ही एग्जिट पोलों में साध्वी प्रज्ञा भाजपा के लिए भोपाल की सीट जीतती दिखती हैं।

इसके अलावा, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सरगना और नक्सली आतंकियों को शहीद बताने वाले, लिंग लहरा कर लड़कियों को धमकाने वाले वामपंथी कामरेड कन्हैया के कारण भी यह चुनाव गहमागहमी से भरा रहा। राष्ट्रकवि दिनकर की पावन धरती बेगूसराय पर बुर्क़ा डिफ़ेंडर जावेद अख़्तर से लेकर, भाड़े की प्रोटेस्टर शेहला रशीद और स्वघोषित फ्रीलान्स कलाकार-विचारक स्वरा भाष्कर तक के पैर पड़े। लेकिन, एग्जिट पोल्स की मानें तो कन्हैया तीसरे स्थान पर ही आ जाएँ, वही इनके लिए एक सांत्वना वाली बात होगी।

अमेठी की सीट भी इस बार चर्चित रही क्योंकि स्मृति ईरानी ने अपने लगातार किए गए प्रयासों के कारण राहुल गाँधी को ‘सेफ़ सीट’ वायनाड का रुख़ करा दिया। एग्जिट पोल्स में इस सीट पर कोई साफ आकलन नहीं है। कुछ जगहों पर भाजपा को जीतता बताया गया है, और कहीं-कहीं भाजपा-कॉन्ग्रेस में कड़ी टक्कर है। कुल मिला कर यहाँ की स्थिति संदिग्ध बनी हुई है।

10 में से 7 ने दिए भाजपा समर्थित राजग को 300+ सीटें

अगर सभी एग्जिट पोल्स पर नज़र डालें तो पता चलता है कि भाजपा के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन को आसान बहुमत मिलती दिख रही है। नीचे हमने सभी एग्जिट पोल्स की जो सूची तैयार की है, उनमें से अगर एक को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी में एनडीए स्पष्ट बहुमत की ओर जाता दिख रहा है। अर्थात, जनता ने जोड़-तोड़ वाली सरकार को नकार कर सभी संभावनाओं पर विराम लगा दिया है।

इन एग्जिट पोल्स की मानें तो, न तो कॉन्ग्रेस के समर्थन से कोई सरकार बन सकती है और न ही विपक्षी एकता से कोई खिचड़ी सरकार खड़ी हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल के लिए तैयार हैं।

नीचे सूचीबद्ध की गई 10 मीडिया एजेंसियों में से 7 ने राजग को 300 से अधिक सीटें दी है, जो 272 के जादुई आँकड़े से ज्यादा है।

मोदी, शाह और भाजपा के 300+: कहाँ रहे सही और कहाँ हुई चूक

2014 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली मोदी सरकार ने 2019 में भी पूरा दम-खम झोंक दिया है। ताज़ा आए एग्जिट पोल्स (10 में से 9) के रुझानों से प्रतीत होता है कि भाजपा पूर्ण बहुमत से एक बार फिर NDA की सरकार बनाने में सक्षम होगी।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के मुताबिक 2019 में उनके पास 11 करोड़ कार्यकर्ता हैं जो पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। हर ओर प्रधानमंत्री मोदी का प्रभाव देखने को मिल रहा है। शहर के एलिट क्लास से लेकर गाँव का पिछड़ा वर्ग भी मौक़ा मिलने पर मोदी सरकार के गुणगान करने से नहीं चूक रहा है। लेकिन, बावजूद इन सबके विपक्ष इन कोशिशों में जुटा हुआ है कि जनता के बीच भाजपा की कमियों और चूक को गिनवा कर उन्हें सत्ता से हटाया जाए ताकि देश में दोबारा से भ्रष्टाचार, घोटालों की राजनीति कायम हो सके।

हालाँकि, इस बात में दो-राय नहीं है कि किसी भी राजनैतिक पार्टी का दामन पूर्ण रूप से साफ़ नहीं होता है क्योंकि पार्टी से जुड़े लोग और नेता ही उसकी साख बनाने या बिगाड़ने का काम करते हैं। अब जैसे कॉन्ग्रेस पार्टी में सैम पित्रौदा और मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं के बयान पार्टी की गति के लिए स्पीड ब्रेकर का काम कर रहे हैं, वैसे ही भाजपा में भी दिग्गज़ नेताओं और नामी चेहरों की ओर से ऐसे बयान आए हैं जिन्होंने विपक्ष को मोदी सरकार पर उंगली उठाने का मौक़ा दिया है। इस लेख में हम उन बिंदुओं पर बात करेंगें जिसके कारण चुनाव प्रचार में भाजपा सरकार को फायदा पहुँचा लेकिन छोटी-छोटी गलतियों के कारण विपक्ष ने उन्हें आड़े हाथों लिया।

शुरुआत उन कार्यों को गिनाने से करते हैं जिनका जिक्र प्रचार में भी हुआ है और जिनके कारण पूरा देश और साथ में मोदी सरकार भी इस बात को लेकर निश्चिंत है कि 2019 में दोबारा से भाजपा ही सत्ता में आएगी।

अखबार में छपने वाली योजनाओं को मोदी सरकार ने कार्यन्वित किया

2014 में शुरू हुआ मोदीकाल ऐतिहासिक है इस बात में कोई संशय नहीं है। 2016 में हुई नोटबंदी की आलोचनाएँ भले ही मोदी सरकार ने एक निश्चित तबके और गिरोह के लोगों के कारण झेलीं लेकिन हकीकत यही है कि नोटबंदी के कारण देश ने कैशलेश स्थिति में खुद को डिजीटल रूप दिया। ये मोदी सरकार की डिजिटल इंडिया योजना का ही परिणाम है कि 2014-15 में जहाँ मात्र ₹316 करोड़ के ट्रान्जेक्शन हुए थे, वहीं 2017-2018 में यह आँकड़ा ₹2,071 करोड़ तक पहुँच गया।

आँकड़ों में आए इन उछालों को हम तकनीक का प्रभाव कहकर मोदी की कोशिशों को दरकिनार करने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन हम हकीकत को नहीं बदल सकते हैं। जो लोग सक्रिय होकर डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो शायद आज नहीं लेकिन कल इस बात को जरूर स्वीकारेंगे कि बिना मोदी सरकार द्वारा लिए इन बड़े फैसलों के मुरमुरे बेचने वाले व्यक्ति को कैशलेश पेमेंट की जरूरत समझाना असंभव था।

जिस बदलते भारत की तस्वीर हम कल्पना में सोचते थे उसे मोदी सरकार ने 5 सालों में हकीकत का चेहरा देने की कोशिश की है। उन योजनाओं को जमीनी स्तर पर कार्यान्वित किया गया जो सिर्फ़ अखबार में प्रचार का हिस्सा बनकर रह जाती थी। उज्जवला योजना ने जहाँ हर घर, हर रसोई में गैस सिलेंडर भेजा वहीं मेक इन इंडिया के कारण भारत ने अनेकों उपलब्धियाँ हासिल की।

सैमसंग जैसी प्रतिष्ठित मोबाइल कंपनी जो अभी तक केवल विदेशों में अपने मोबाइल सेट का निर्माण करती थी, उसने पहली बार इसी बीच भारत में अपने मोबाइल बनाने शुरू किए। नौकरी से ज्यादा इस दौरान लोगों ने व्यवसाय पर फोकस करना शुरू किया। युवाओं में छिपी प्रतिभाओं को कौशल योजना के तहत पहचाना गया। उन्हें अपना स्टार्ट अप शुरू करने के लिए प्रेरित किया गया। जन-धन योजना के जरिए हर तबके के लोगों के बैंक में खाते खुलवाए गए। आवास योजना की मदद से गरीब लोगों को छत मुहैया कराई गई।

राष्ट्रहित में मोदी सरकार की उपलब्धियाँ

सामाजिक उत्थान के अलावा मोदी सरकार ने राष्ट्रहित में अनेकों ऐसे फैसले लिए हैं जिनके कारण 2019 के लोकसभा चुनाव में भी 2014 वाली मोदी लहर बरकरार है। बालाकोट में एयरस्ट्राइक, उरी में सर्जिकल स्ट्राइक, अभिनंदन की वापसी, मसूद अजहर के वैश्विक आतंकी होने की घोषणा वो हालिया मुद्दे हैं जो शायद ही किसी के भीतर से मोदी के बतौर भावी प्रधानमंत्री होने पर सवाल उठाएँ।

ये मोदी सरकार की उपलब्धि ही है कि इन पाँच साल के कार्यकाल में सीमा के भीतर कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई हैं, और जो घटनाएँ हुई हैं उनका सेना ने मुँहतोड़ जवाब दिया है। पिछली सरकार के कार्यकाल में जहाँ सेना को आदेशों का इंतजार करना पड़ता था वहीं मोदी के कार्यकाल में सेना को हर रूप से मजबूती मिली। अमेरिका की असहमति के बावजूद भी मोदी काल में भारत एस-400 मिसाइल रूस से खरीदने वाला विश्व का तीसरा देश बना है।

नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे भगौड़ों को देश वापस लाकर सजा दिलाने के लिए हर मुमकिन कोशिशे की गईं। इसी काल में अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के बिचौलिया मिशेल एंडरसन को पकड़कर देश लाया गया। रोहिंग्याओं को वापस भेजने के लिए मोदी सरकार ने कड़े कदम उठाए। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को मोदी काल में पहचान मिली और कई शरणार्थियों ने मोदी सरकार के कारण पहली बार भारत में मतदान किया। असम में AFSPA हटाने का फैसला 29 साल बाद लिया गया। अब तक शहंशाह की जिंदगी गुजारने वाले रॉबर्ट वाड्रा पर ईडी ने शिकंजा कसा। डोकलाम जैसा विवाद मोदी काल में ही सुलझा है।

इसके अलावा देश में अन्य करों को खत्म करके जीएसटी लागू हुआ जिसका देश भर में निश्चित गिरोह द्वारा विरोध हुआ लेकिन विरोध में उठे सुरों पर खुद सवाल निशान लगे जब मनमोहन सिंह ने जीएसटी काउंसिल के लिए खुद अरूण जेटली को सम्मानित किया। मोदी काल में बड़े-बड़े राजनेताओं पर लगे आरोपों पर गंभीरता से कार्रवाई हुई।

मोदी से पहले भारत के नेता इजराइल और फिलीस्तीन की यात्रा पर जाने से बचते रहे थे लेकिन मोदी ने इस हिचक को तोड़ा। वह इजराइल भी गए और उन्होंने फिलिस्तीन की यात्रा भी की। मोदी ने इन दोनों देशों की अलग-अलग यात्रा कर कूटनीतिक स्तर पर दोनों देशों से रिश्तों को नई गर्मजोशी दी।

मोदी सरकार ने वंचित सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया, जिसकी किसी और सरकार से उम्मीद भी असंभव थी। पीएम ने किसान योजना के जरिए किसानों को साल में 6000 देने का वादा किया, जिसकी पहली किस्त किसान तक पहुँच भी चुकी है।

इन सबके अलावा मोदी के खिलाफ़ विपक्ष द्वारा की गई ओछी बयानबाजी मे भी चुनाव प्रचार में मोदी को काफ़ी फायदा पहुँचा है। जनता ने मोदी के खिलाफ होती बयानबाजियों में विपक्ष का असली चेहरा देखा है। जनता ये जानती और समझती है कि 2019 में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के अलावा देश के पास कोई और विकल्प नहीं हैं।

प्रधानमंत्री पर हुई ओछी बयानबाजियों को पढ़ने के लिए आप इस आर्टिकल को पढ़ सकते हैं- ‘मर्यादा’ का भार सिर्फ मोदी पर ही क्यों… विपक्ष ‘शब्दों की गरिमा’ का अर्थ भूल गया है क्या?

चुनाव प्रचार में हुई गलतियाँ

बेवजह अली और बजरंगबली में उलझे योगी आदित्यनाथ– मुख्यमंत्री योगी द्वारा चुनाव प्रचार में ‘अली और बजरंगबली’ वाला बयान काफ़ी विवादस्पद रहा जिसके कारण इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ा। योगी पार्टी का एक मुख्य चेहरा हैं, लेकिन उनकी ऐसी ही बयानबाजी के कारण उन पर 72 घंटे का बैन लगा। जिस समय का इस्तमाल वो पार्टी के समर्थन में कर सकते थे, उसमें उन्हें मौन धारण करना पड़ा।

मेनका गाँधी का मुस्लिम वोटर्स पर बयान– मेनका गाँधी को अपने बयान पर काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था, इस दौरान उन्होंने अपनी जीत का दावा करते हुए कहा था कि जीत के बाद अगर अल्पसंख्यक उनके पास काम करवाने आता है तो उन्हें इस बारे में सोचना पड़ेगा।

उदितराज का पार्टी छोड़ना- भले ही उदितराज को पार्टी ने इन चुनावो में एक बेहतर विकल्प के रूप में न देखा हो लेकिन ये बात सच हैं कि दिल्ली में उदितराज एक निश्चित तबके का चेहरा थे। अगर पार्टी चाहती तो उन्हें पहले निष्कासित किया जा सकता था, लेकिन उदितराज का इस तरह कॉन्ग्रेस में शामिल हो जाना। भाजापा की चुनाव प्रचार में हुई गलती की तरह है।

हेमंत करकरे से लेकर गोडसे पर साध्वी प्रज्ञा के बयान– भाजपा ने भोपाल सीट पर दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ साध्वी प्रज्ञा को उतारकर एक बड़ा दाव खेला था, लेकिन साध्वी प्रज्ञा के विवादित बयानों के कारण भाजपा सरकार को विपक्ष आड़ों हाथ लेता रहा।

जिन्ना के पक्ष में भाजपा नेता के बोल- मध्य प्रदेश में बीजेपी प्रत्याशी गुमान सिंह डामोर ने भी विवादास्पद बयान दिया था जिससे भाजपा पर सवाल उठे थे। गुमान ने इस दौरान कहा था कि अगर स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने की जिद्द न की होती तो इस देश का बँटवारा नहीं होता। मोहम्मद अली जिन्ना एक एडवोकेट और विद्वान व्यक्ति थे। गुमान के इस बयान पर सोशल मीडिया पर उनकी काफ़ी आलोचना हुई थी।

इसके अलावा 2018 में भाजपा की लगातार तीन राज्यों में हार भी इस बात को दर्शाती है कि कहीं न कहीं भाजपा के कार्यकर्ता मोदी की पनाह में अतिआत्मविश्वासी हो गए जिसका खामियाजा उन्हें तीन राज्यों को गवाकर चुकाना पड़ा। कई जगहों पर पार्टी ने उन उम्मीदवारों को टिकट दिया जिनसे स्थानीय लोगों को शिकायत थी। ऐसे उम्मीदवारों ने जनता के बीच अपने कार्यों को गिनाने की बजाए मोदी के नाम पर वोट माँगे। इस कारण से मोदी की छवि भी धूमिल हुई और पार्टी की साख पर भी सवाल उठे।

सरकार तो मोदी की ही बनेगी… कॉन्ग्रेस ने ऑफिशली मान ली अपनी हार

लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण का मतदान आज समाप्त हुआ। शाम साढ़े छह बजे से तमाम मीडिया चैनलों ने एग्जिट पोल दिखाने शुरू कर दिए। लगभग सारे एग्जिट पोल भाजपा गठबंधन मतलब NDA की सरकार बनने को लेकर रुझान दिखा चुके हैं। मतलब कॉन्ग्रेस के पास नंबर्स नहीं आने वाले हैं।

मीडिया चैनलों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर कुछ ‘जागरूक’ लोग ऐसे भी रहे जो एग्जिट पोल न सही, लेकिन पोल खूब चला रहे थे। ऐसी ही एक यूजर हैं सोनाक्षी पटेल। इन्होंने एक ट्वीट किया – सरकार किसकी बन रही है? मोदी के लिए लव वाला बटन दबाएँ, राहुल और सहयोगियों के लिए रिट्वीट करें। कॉन्ग्रेस के आधिकारिक हैंडल से इस ट्वीट को रिट्वीट किया गया।

मतलब कॉन्ग्रेस ने 23 तारीख को चुनाव नतीजे आने तक का भी इंतजार करना जरूरी नहीं समझा। समझे भी कैसे! देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस भी उमर अबदुल्ला के ट्वीट से सहमत हो गई है। उमर ने भी सभी एग्जिट पोल को गलत मानने से इनकार कर दिया और 23 मई को इंतजार करने की सिफारिश की थी।

10 Exit Polls में से 9 में NDA को बहुमत, 7 में 300 पार, राहुल बने रहेंगे ‘PM इन वेटिंग’

अगर सभी एग्जिट पोल्स पर नज़र डालें तो पता चलता है कि भाजपा के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन को आसान बहुमत मिलती दिख रही है। नीचे हमने सभी एग्जिट पोल्स की जो सूची तैयार की है, उनमें से अगर एक को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी में एनडीए स्पष्ट बहुमत की ओर जाता दिख रहा है। अर्थात, जनता ने जोड़-तोड़ वाली सरकार को नकार कर सभी संभावनाओं पर विराम लगा दिया है। इन एग्जिट पोल्स की मानें तो, न तो कॉन्ग्रेस के समर्थन से कोई सरकार बन सकती है और न ही विपक्षी एकता से कोई खिचड़ी सरकार खड़ी हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल के लिए तैयार हैं।

नीचे सूचीबद्ध की गई 10 मीडिया एजेंसियों में से 7 ने राजग को 300 से अधिक सीटें दी है, जो 272 के जादुई आँकड़े से ज्यादा है। इंडिया टुडे-एक्सिस के पोल ने जहाँ सबसे ज्यादा अधिकतम 365 सीटों का अनुमान लगाया है, न्यूज़ एक्स-नेता के एग्जिट पोल ने राजग को सबसे कम 242 सीटें दी है। अगर यूपीए की बात करें तो कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन बहुमत तो दूर, 10 में से 9 एग्जिट पोल में 140 का आँकड़ा पार करने में भी विफल रहा है। कॉन्ग्रेस की सीटें ज़रूर बढ़ेंगी, लेकिन राहुल गाँधी ‘पीएम इन वेटिंग’ ही रहेंगे।

10 एग्जिट पोल्स में से 9 में राजग को बहुमत

टाइम्स नाउ के Exit Poll के अनुसार 542 लोकसभा सीटों में एनडीए को 306 सीटें यूपीए को 132 और अन्य पार्टियों को 104 सीटें मिल रही हैं। द क्विंट C Voter एग्जिट पोल के अनुसार, NDA को पूर्ण बहुमत मिलेगा। सीटों की बात करें तो NDA को 287 सीटें मिलेंगी और UPA को 128 सीटें मिलने की उम्मीद जताई है। वहीं अन्य को 127 सीटें मिल सकती हैं।

वहीं अगर न्यूज़ 24-चाणक्या के एग्जिट पोल की बात करें तो भाजपा के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन को 350 सीटें मिलेगी, वहीं कॉन्ग्रेस नीत यूपीए मात्र 95 सीटों पर सिमट जाएगा। अन्य के खाते में 97 सीटें आएँगी। दूसरी तरफ़ इंडिया टुडे-एक्सिस द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल के अनुसार राजग को 339 से 365 सीटें आएँगी तो यूपीए 77 से १०८ पर सिमट जाएगी।

ध्रुव राठी के धैर्य का बाँध टूटा, बोले राहुल गाँधी ने 1 ही झूठ किया रिपीट, हमारा प्रोपेगैंडा पड़ा हल्का

इंटरनेट ट्रोल और NDTV पत्रकार ध्रुव राठी के धैर्य का बाँध भी एग्जिट पोल्स को देखकर आखिरकार टूट गया। ध्रुव राठी ने ट्विटर पर मीडिया और राजनीतिक समूहों के प्रति अपना रोष व्यक्त करते हुए 2 ट्वीट के माध्यम से अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है।

पहले ट्वीट में ध्रुव राठी ने लिखा है, “मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर एग्जिट पोल्स सही निकले। लोगों ने प्रोपेगैंडा के असर को हलके में लिया।” कॉन्ग्रेस की ओर इशारा करते हुए ध्रुव राठी ने कहा, “90% मीडिया, बॉलीवुड फिल्म, TV सीरियल्स, सोशल मीडिया एडवर्टीस्मेंट आपके कण्ट्रोल में होने के बावजूद, सभी आपको एक मसीहा के रूप में स्थापित और भी आपको ‘गंदा धंधा’ करने के लिए खुली छूट दे रखी है। इस सबका बड़ा असर हुआ है।”

ध्रुव राठी ने दूसरे ट्वीट में लिखा है, “सच्चाई चाहे जो भी हो, अगर एक आदमी किसी झूठ को दिन में 10 बार सुने, तो वो उसे सच मान लेता है। यहाँ तक कि हिटलर को भी आखिरी इलेक्शन में 33% जर्मन्स का समर्थन मिला था।”

इन दोनों ट्वीट्स को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि सोशल मीडिया पर प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए मशहूर ध्रुव राठी का निशाना कोई और नहीं बल्कि, कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी हैं। जिस प्रकार से राहुल गाँधी लगातार मोदी सरकार को घोटालों में घिरा हुआ साबित करने के लिए झूठे डाक्यूमेंट्स और बयानों का सहारा लेते रहे, शायद ध्रुव राठी उन्हीं से अपनी निराशा व्यक्त कर रहे थे। यहाँ तक कि राहुल गाँधी को ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने फटकार भी लगाई थी और उन्हें इसके लिए माफ़ी भी माँगनी पड़ी थी।

ट्रोल राठी स्वयं भी निम्न कोटि के प्रोपेगंडाबाज़ हैं जो अक्सर झूठ और प्रपंच के सहारा लेकर लोगों में भ्रांतियाँ फैलाते पाए जाते हैं। यही कारण है कि वो इस बात को बेहतर तरीके से समझते हैं कि लोगों ने उनके प्रोपेगंडा को हलके में लिया जिस कारण एग्जिट पोल में उनके फेवरेट आम आदमी पार्टी का डब्बा गोल हो गया। साथ ही, राहुल गाँधी को मसीहा बनाने की भी सारी कवायद काम नहीं आई। तमाम फ़र्ज़ी आँकड़ों की मदद से, रोजगार से लेकर दर्शन शास्त्र तक में अपनी रुचि दिखाने वाले राठी इस बात से बेहद निराश दिखे जो उनके ट्वीट में पढ़ने को मिलता है।

हमें ध्रुव राठी की स्थिति से सहानुभूति है और सलाह यह है कि ऐसे समय में उन्हें अपने दोस्तों और झुंड के साथ रहना चाहिए।

फिलहाल एग्जिट पोल के नतीजों को देखकर लिबरल गैंग और मीडिया गिरोहों में विशेष निराशा देखने को मिली है। रिपोर्ट्स लिखे जाने तक NDTV के ही वयस्क पत्रकार रवीश कुमार भी अपने प्राइम टाइम में अपने समर्थकों से धैर्य बनाए रखने की अपील करते देखे गए और उन्होंने कहा कि एग्जिट पोल की बातों में आकर हौसला ना खोएँ और 23 मई तक कम से कम प्रतीक्षा करें।

बौखलाई ममता का नया ज्ञान: गप्पबाज़ी से EVM हैक करेगी BJP! ये मजाक नहीं है

हालिया इतिहास के सबसे ‘खूनी’ चुनावों में से एक कराने के बाद अब ममता बनर्जी ने Exit Polls आते ही बहानेबाजी शुरू कर दी है। Exit Polls में भाजपा को लोकसभा चुनाव जीतता देखकर उन्होंने ट्वीट किया, “मुझे एग्जिट पोल पर विश्वास नहीं होता। हज़ारों EVM को मैनिपुलेट करने या उनको बदलने की साज़िश की जा रही है इस एग्जिट पोल की गप्पबाज़ी से। मैं सारी विपक्षी पार्टियों से एकजुट होने, मज़बूत बनने और बुलंद रहने की अपील करती हूँ।”

राग पुराना, ‘दिलजलों’ का पसंदीदा फ़साना

ममता बनर्जी और विपक्ष के अन्य नेताओं का EVM खटराग नया नहीं है। विपक्षी नेता इसे लेकर निर्वाचन आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए थे, लेकिन हर जगह उन्हें मुँह की ही खानी पड़ी। उसी समय यह स्पष्ट हो गया था कि नतीजे अगर उनके मन-मुताबिक नहीं हुए तो अपनी नकारात्मक, हिन्दूफोबिक, और भ्रष्ट राजनीति की हार मानने की बजाय EVM को बलि का बकरा बनाया जाएगा। और वही हो रहा है।

‘स्ट्रॉन्ग’ से मतलब क्या है? इरादा क्या?

आख़िर ममता बनर्जी ‘गॉसिप’ से ईवीएम को बदलने की बात किस विज्ञान के आधार पर कर रही हैं? एक ट्वीट से खुन्नस, निराशा और अज्ञान सब झलकता है। निर्वाचन आयोग ने जब चुनौती दी थी EVM हैक करके दिखाने की, तो कोई राजनीतिक दल नहीं पहुँचा। सभी बँगले झाँक रहे थे।

दूसरी बात यह है कि सारी विरोधी पार्टियाँ एकजुट हो कर करेंगी क्या? क्या ममता बनर्जी यहाँ किसी तरह की धमकी दे रही हैं? अपोज़िशन यूनाइट होकर, स्ट्रॉन्ग और बोल्ड होकर करेगा क्या? क्या किसी लोकतांत्रिक संस्था पर हमले की योजना बन रही है या फिर यह एक हार स्वीकारती, गुस्से से भरी हुई नेत्री का क्रोध मात्र है?