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300 तिब्बतियों ने भी लोकसभा चुनाव में किया अपने मताधिकार का प्रयोग

लोकसभा चुनाव 2019 में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर भारतीय जनता पार्टी लगातार दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाने जा रही है। इस जीत पर विश्वभर के नेताओं ने पीएम मोदी को बधाई और शुभकामनाएँ दीं। श्री लंका, इस्राएल, भूटान, पुर्तगाल, चीन, अफगानिस्तान समेत कई देशों से बधाईयाँ आने के बाद अब तिब्बत के बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा ने चुनाव में शानदार जीत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और NDA को बधाई दी है।

उन्होंने एक पत्र में लिखा है कि वो प्रार्थना करते हैं कि पीएम मोदी भारत के लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने और आगे आने वाली चुनौतियों से निपटने में कामयाब हों। इसके साथ ही तिब्बतियों के लोकतांत्रिक रुप से निर्वाचित राष्ट्रपति लोबसांग सांग्ये ने भी पीएम मोदी और एनडीए को हार्दिक शुभकामनाएँ दी हैं।

दलाई लामा 1959 से भारत में रह रहे हैं। पिछले 60 वर्षों से भारत में रह रहे दलाई लामा खुद को भारत में सबसे अधिक लंबे समय तक रहने वाले अतिथि मानते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, 2014 में वोट डालने का अधिकार मिलने के बाद इस बार तकरीबन 300 तिब्बतियों ने धर्मशाला में मतदान किया। इस दौरान कई भिक्षुओं और महिलाओं को भी लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सा लेते देखा गया। भारतीय नागरिकता और अधिकार पाने के लिए संघर्ष कर रहे तिब्बती समुदाय के एक जाने-माने चेहरे लोबसांग वांग्याल ने यहाँ के भागसू पोलिंग बूथ पर अपना वोट डाला। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों ने तिब्बती शरणार्थियों के जीवन को प्रभावित किया है। उनका कहना है कि प्रत्येक पार्टी के बारे में तिब्बतियों के अपने विचार हैं और मतदाताओं ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर वोट डाला है। हालाँकि, इस दौरान कई तिब्बती कार्यकर्ताओं ने वोट डालने के कदम का विरोध करते हुए विभिन्न जगहों पर हंगामा भी किया।

दलाई लामा भारत के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि भारत की उदारता और दयाशीलता की वजह से ही वो लोग निर्वासन के बावजूद अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को बचा कर रख पाए। इसके साथ ही राष्ट्रपति सांग्ये ने भारत को तिब्बतियों का दूसरा घर बताया और कहा कि जितना भारत और वहाँ के उदार लोगों ने तिब्बतियों के लिए किया है, उतना किसी भी देश ने नहीं किया। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने साल 2018 में थैंक यू इंडिया कार्यक्रम का आयोजन कर भारत सरकार और यहाँ के लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया था।

निर्वासन में जी रहे कश्मीरी पंडितों के 86% वोट भाजपा को मिले

सन 1996 में एक विशेष प्रावधान के तहत 1989-90 के बाद से राज्य के बाहर निर्वासन में जीवन जी रहे कश्मीरी पंडितों को अपने मूल लोकसभा क्षेत्रों के लिए मतदान करने का अधिकार दिया गया था। इस अधिकार का प्रयोग करते हुए 2019 के लोकसभा निर्वाचन में करीब 13,537 कश्मीरी पंडितों ने मतदान किया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक इन 13,537 लोगों में से 11,648 (86%) वोट भाजपा को मिले।

खास बात ये हैं कि घाटी की 2 सीटों (अनंतनाग और श्रीनगर) पर भाजपा प्रत्याशियों को ये वोट मिले हैं। आँकड़ों पर यदि गौर करें तो ज्ञात होगा कि अनंतनाग में भाजपा प्रत्याशी को मिले वोट में राज्य से बाहर रह रहे कश्मीरी पंडितों का बहुत बड़ा योगदान है। यहाँ भाजपा प्रत्याशी को मिले 10,225 वोटों में से 7,251 वोट कश्मीरी पंडितों ने दिए हैं। इसी प्रकार श्रीनगर में भाजपा प्रत्याशी को कुल 4,631 वोट मिले जिसमें से 2,584 वोट कश्मीरी पंडितों ने दिए। बारामूला इलाके में इसका अनुपात केवल 23 फीसद रहा।

गौरतलब है 1980 के दशक में आखिर में उग्रवाद के कारण घाटी के कई क्षेत्रों में कश्मीरी पंडितों को पलायन करना पड़ा था। इसके बाद मतदान तो दूर की बात उनका अपने घर को देखना भी मुश्किल हो गया था। ऐसे में 1996 में प्रावधान को लागू किया था ताकि राज्य से बाहर रह रहे नागरिकों के लिए मताधिकार का प्रयोग करना संभव हो पाए। निर्वाचन आयोग ने भी इस प्रावधान के तहत कश्मीरी पंडितों के वोट देने की प्रक्रिया को समय के साथ और भी अधिक सुविधाजनक बनाया है।

मंत्रिपरिषद का त्यागपत्र, सदन भंग और संसदीय दल के नेता का चयन: जानिए कैसे बनेगी सरकार

शुक्रवार (मई 24, 2019) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रपति कोविंद को इस्तीफा सौंप दिया। राष्ट्रपति ने सभी का त्यागपत्र स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री से नई सरकार बनने तक पद पर बने रहने का आग्रह किया है। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जिसमें 16वीं लोकसभा को भंग करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

16 वीं लोकसभा का कार्यकाल 3 जून को समाप्त हो रहा है और 17वीं लोकसभा का गठन 3 जून से पहले किया जाना है। ऐसे में नए सदन के गठन की प्रक्रिया तीनों चुनाव आयुक्तों के राष्ट्रपति से मिलने के बाद शुरू होगी जब वह नवनिर्वाचित सदस्यों की सूची राष्ट्रपति को सौंपेंगे।

बता दें लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की ऐतिहासिक जीत के बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसी सिलसिले में आज शनिवार को एनडीए की संसदीय दल की बैठक शाम 5 बजे बुलाई गई है जिसमें गठबंधन के सभी नवनिर्वाचित सांसद शामिल होंगे। इस बैठक में औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसदीय दल का नेता चुना जाएगा। संसदीय दल के नेता को ही राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। 

नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक इस बात को लेकर अटकलें तेज हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई कैबिनेट में किसे कौन सा पद मिलेगा। ऐसे में केंद्रीय कैबिनेट की एक बैठक भी हुई जिसमें सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमन, मेनका गांधी, पीयूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर आदि शामिल हुए। स्वास्थ्य खराब होने के कारण अरुण जेटली इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे। खबरों के अनुसार मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अरुण जेटली वित्त मंत्री का कार्यभार नहीं लेंगे। इसका कारण उनकी बिगड़ी सेहत बताया जा रहा है। ऐसे में हो सकता है केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय या दोनों मंत्रालयों का प्रभार दिया जाए। इसके अलावा अमित शाह को रक्षा मंत्री का पद सौंपा जा सकता है।

दिग्गी को जिताने के लिए 5 क्विंटल मिर्ची से हवन करने वाले बाबा हुए अंडरग्राउंड, हारने पर हवनकुण्ड में समाधि लेने वाले थे

देश की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट भोपाल से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह की जीत का दावा करने वाले और उनकी जीत के लिए 5 क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करने वाले महामंडलेश्वर वैराग्यानंद गिरी महाराज उर्फ़ मिर्ची बाबा इन दिनों गायब चल रहे हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही बाबा की तलाश की जा रही है, लेकिन अभी तक कोई भी उनसे संपर्क नहीं कर पाया है। उम्मीदें लगाईं जा रही हैं कि शायद मिर्ची बाबा अंडरग्राउंड हो गए हैं।

मध्य प्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट पर भाजपा की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को करीब तीन लाख वोट से करारी शिकस्त दी है। दिग्विजय सिंह ने जीतने के लिए पूजा-पाठ का सहारा लिया था। पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ।

दिग्विजय सिंह को भोपाल सीट से विजयी बनाने के लिए महामंडलेश्वर स्वामी वैराग्यानंद ने कुल 5 क्विंटल मिर्च डालकर एक विशाल हवन किया था और वहीं प्रतिज्ञा ली थी कि अगर कॉन्ग्रेस ये सीट हारती है, तो वह इसी हवनकुण्ड में समाधि ले लेंगे। कॉन्ग्रेस के हारने के बाद स्वामी वैराग्यानंद उर्फ मिर्ची बाबा को लोग खोजना शुरू कर चुके हैं, पर वह कहाँ हैं इसके बारे में कोई पता ही नहीं चल रहा।

मिर्ची बाबा का फोन भी चुनाव परिणाम आने के बाद से बन्द ही बता रहा है। बता दें कि मध्य प्रदेश की 29 सीट पर भाजपा ने अपना परचम लहराया है। एक मात्र छिंदवाड़ा सीट ही कॉन्ग्रेस के हिस्से आई है। राज्य की सत्ता में होते हुए कॉन्ग्रेस की इतनी बड़ी हार पार्टी आलाकमान को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

दिग्विजय सिंह के लिए सिर्फ मिर्ची बाबा ने ही नहीं, बल्कि भाजपा से राज्यमंत्री रह चुके कम्पयूटर बाबा ने भी करीब 7 हजार साधू-संतों के साथ हवन-यज्ञ किया था। जिसके बाद बाबा और दिग्विजय सिंह पर चुनाव आयोग का कहर भी फूटा था, क्योंकि बाबा ने यज्ञ और प्रचार में खर्च हुई धनराशि का हिसाब नहीं दिया था। ऐसे में आयोग ने यज्ञ और साधु-संतों द्वारा दिग्विजय सिंह के पक्ष में किए प्रचार-प्रसार का पूरा खर्च भी दिग्विजय सिंह के ही खाते में जोड़ दिया था।

निराशाजनक हार के बाद अखिलेश यादव की बड़ी कार्रवाई, सभी प्रवक्ताओं की हुई छुट्टी

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के एसपी-बीएसपी गठबंधन को मिली करारी हार से निराश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ी कार्रवाई की है। इस कार्रवाई के तहत अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी पार्टी प्रवक्ताओं को अपने पद से हटा दिया है। ये निकाले गए प्रवक्ता वही हैं, जो पार्टी का पक्ष रखने के लिए न्यूज चैनल्स पर बैठे नजर आते थे। मीडिया रिपोर्टस् के अनुसार पार्टी के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने इस बारे में एक प्रेस रिलीज जारी कर सभी न्यूज चैनल्स से आग्रह किया है कि वह इन प्रवक्ताओं को अपने चैनल में डिबेट के लिए ना बुलाएँ।

जिन प्रवक्ताओं के खिलाफ अखिलेश यादव ने ये निर्णय लिया है, उनमें जूही सिंह, नावेद सिद्दीकी, जगदेव सिंह यादव, सुनील सिंह जैसे कई बड़े नाम भी शामिल हैं। न्यूज़ चैनल्स के साथ-साथ इस चिट्ठी को प्रवक्ताओं के पास भी भेज दिया गया है।

लोकसभा चुनाव में न केवल जातीय गणित फेल हुआ है, बल्कि वंशवादी राजनीति को भी भारी झटका लगा है। राजनीतिक परिवार से आने वाले अधिकांश उम्मीदवारों को इस बार हार का सामना करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर हुए चुनाव में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी व राष्ट्रीय लोकदल के महागठबंधन के बावजूद भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर 62 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि 2 सीटों पर उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल ने जीत हासिल की।

NDA की बैठक कल, नरेंद्र मोदी को चुना जाएगा संसदीय दल का नेता

संसद के सेंट्रल हॉल में कल शाम 5 बजे बीजेपी संसदीय दल की बैठक होगी जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी संसदीय दल का नेता चुना जाएगा। बीजेपी संसदीय दल की बैठक के बाद एनडीए की बैठक होगी। इस बैठक में उद्धव ठाकरे, रामविलास पासवान समेत सभी एनडीए नेता और सांसद रहेंगे। इस बैठक में भी नरेंद्र मोदी को एनडीए का नेता चुना जाएगा। इसके बाद मंत्रिमंडल गठन और पोर्टफोलियो को लेकर अमित शाह कल और परसों अलग-अलग एनडीए सहयोगियों के साथ भी विचार विमर्श करेंगे।

बता दें कि इस बार लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले इतिहास रच दिया है। पार्टी ने अकेले अपने दम पर 303 सीट पर विजय हासिल की है, जो बहुमत से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद बीजेपी ने एनडीए के घटक दलों को साथ लेकर चलने की बात कही है। वहीं इस बार के चुनाव में यूपीए को 82 और महागठबंधन को महज 15 सीट हासिल हो पाई हैं।

आज केंद्रीय मंत्रियों के बैठक के बाद 16वीं लोकसभा भंग करने का प्रस्ताव पास हो गया। पीएम मोदी ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंप दिया है। राष्ट्रपति ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और नरेंद्र मोदी और मंत्रिपरिषद से अनुरोध किया है कि वे नई सरकार के पद ग्रहण करने तक बने रहे।

AltNews वालो, ज़ाकिर मूसा ‘अलगाववादी’ नहीं, आतंकी था जो इस्लामी ख़िलाफ़त चाहता था

फ़र्ज़ी फ़ैक्ट-चेक और इंटरनेट पर घूमने वाले मीम की ‘सच्चाई’ खोजने में महारत प्राप्त वेबसाइट AltNews ने फिर ऐसा कारनामा किया है जिसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है। AltNews के संस्थापक, प्रतीक सिन्हा ने खूंखार आतंकवादी ज़ाकिर मूसा के अपराधों पर पर्दा डालते हुए उसे आतंकवादी न कहकर ‘अलगाववादी’ के रूप में प्रदर्शित किया। बता दें कि 23 मई को, जम्मू और कश्मीर में आतंकवादी ज़ाकिर मूसा को भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया। मूसा हिज़्बुल का पूर्व कमांडर था और फ़िलहाल अल-क़ायदा से जुड़े आतंकी संगठन अंसार ग़ज़ावत-उल-हिंन्द का सरगना था। वो इस्लाम से जुड़े प्रोपेगेंडा चलाने के लिए जाना जाता था।

जहाँ एक तरफ़, मूसा को ढेर करने की ख़बर को लोगों ने सुरक्षाबलों की क़ामयाबी के रूप में देखा, तो दूसरी तरफ़ मीडिया गिरोह के कुछ ऐसे बड़े लोग मूसा की मौत की ख़बर को पचा नहीं सके। इनमें से एक नाम द वायर की वरिष्ठ संपादक आरफ़ा ख़ानम शेरवानी का है। मूसा की मौत पर BTVI के संपादक आदित्य राज कौल ने जब यह ख़बर शेयर की, जिसमें उन्होंने लिखा कि यह भारतीय लोकतंत्र की जीत है, तो आरफ़ा को यह बात बर्दाश्त नहीं हुई और जवाब में लिखा कि अब राइट विंगर्स (RW) ट्रोल्स और RW पत्रकारों के बीच अंतर करना कठिन है।

न्यूज़ 24 के संपादक मानक गुप्ता ने अरफ़ा के एक हिंदी ट्वीट का जवाब देते हुए हिंदी में ही जवाब दिया, जो 22 मई को पोस्ट किया गया था। उन्होंने लिखा था कि वह (मूसा) अब नहीं आएगा, और अगर कोई भी उससे मिलना चाहता है, तो वह ख़ुद ऊपर चला जाए।

लेकिन, प्रतीक सिन्हा, जो इन दिनों अपने चुटकुलों, मीम्स और फ़ोटो की काँट-छाँट कर फ़ैक्ट-चेक का दावा करने के लिए फेमस है, उसके लिए इतना पर्याप्त नहीं था। सिन्हा ने आतंकवादी ज़ाकिर मूसा को एक आतंकवादी की जगह ‘अलगाववादी’ के रूप में संदर्भित किया। यह मामला सतही तौर पर मामूली-सा लग सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। अलगाववादी एक ऐसा व्यक्ति होता है जो एक समूह, समाज, संस्कृति या धर्म को तोड़ने  का समर्थन करता है, उसे अलगाववादी कहा जाता है। अलगाववादी अपनी माँग रखने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वो तरीक़े क़ानून के ख़िलाफ़ नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए, ऐसे कई अलगाववादी हैं जो केवल अहिंसक तरीकों का उपयोग करते हैं।

दूसरी ओर, आतंकवादी हिंसा के ज़रिए आतंक पैदा करते हैं, नागरिकों और सशस्त्र बलों को निशाना बनाते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ज़ाकिर मूसा जैसे इस्लामी आतंकवादी इस्लामी शासन स्थापित करने के लिए लोगों में ख़ौफ़ पैदा करते हैं। इसलिए, एक आतंकवादी संगठन के सरगना को अलगाववादी नेता कहना न केवल भ्रम फैलाने जैसा है, बल्कि आतंकवादियों द्वारा मानवता पर किए गए क्रूर अत्याचारों पर पर्दा डालने के भी समान है, जो किसी अपराध से कम नही।

मीम से अब जीजा-साली शायरी और अकबर बीरबल के चुटकुलों के फैक्ट चेक से अपनी वृत्ति चलाने वाले प्रतीक सिन्हा ने उसी ट्वीट में एक शब्द का इस्तेमाल किया जो उसके कुत्सित कार्यों और निकृष्टता के हिसाब से हास्यास्पद है। प्रतीक सिन्हा ने अपनी नीचता की सीमा कई बार लाँघते हुए कई बार नवजात शिशु की जानकारी से लेकर किशोर वय बालकों तक की जानकारी डॉक्सिंग के जरिए इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दी है, जिसके कारण उस लड़के को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जान से मारने की धमकी तक दी। ऐसा निहायत ही बेशर्म व्यक्ति जब ‘classy’ शब्द का इस्तेमाल करता है तो विडम्बना घास चरने चली जाती है।

जुम्मे की नमाज के दौरान मस्जिद में धमाका, इमाम की मौत, 16 घायल

काबुल की एक मस्जिद में शुक्रवार (मई 24, 2019) की नमाज के दौरान विस्फोट में अफगानिस्तान के एक प्रतिष्ठित धार्मिक विद्वान की मौत हो गई और अन्य 16 लोग घायल हो गए। अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि विस्फोट कैसे हुआ। विस्फोट पूर्वी काबुल में अल-तक्वा मस्जिद में हुआ जहाँ मावलावी रैहान इमाम थे। जुमे की नमाज में और वो भी रमजान के पवित्र महीने में अच्छी-खासी संख्या में लोग शामिल होते हैं।

गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता नसरत रहीमी ने कहा, ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण रूप से विस्फोट में मावलावी रैहान मारे गए और 16 अन्य नमाजी घायल हो गए।” विस्फोट दोपहर को करीब 01:20 मिनट पर हुआ। पुलिस प्रवक्ता फिरदौस फरामर्ज ने रैहान के मारे जाने की पुष्टि की और कहा कि जाँचकर्ता विस्फोट की प्रकृति की जाँच कर रहे हैं।

साध्वी प्रज्ञा: जिसने टूटी रीढ़ के साथ हिन्दू टेरर के नैरेटिव को छिन्न-भिन्न कर दिया

लोकसभा चुनाव-2019 में कुछ सीटों पर चुनावी लड़ाई किसी जंग से कम नहीं रही, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और दिग्विजय के बीच की चुनावी लड़ाई भी न सिर्फ एक साध्वी और एक नेता की लड़ाई थी बल्कि यह लड़ाई सीधे-सीधे सच और झूठ के बीच थी। घटनाक्रमों और परिस्थितियों ने इसे एक तरह से धर्मयुद्ध में बदल दिया था। यह धर्म और अधर्म की लड़ाई बन चुकी थी।

जीत के समीकरण को समझने से पहले यदि आँकड़ों पर नज़र डालें तो साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ‘दिग्गी राजा’ अर्थात मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और साथ ही ‘हिन्दू आतंक’ के झूठ को स्थापित करने में सारी हदें पार करने वाले दिग्विजय सिंह को 3,64,822 वोटों के अंतर से हराया। लोकसभा चुनाव 2019 में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कुल 8,66,482 और दिग्विजय सिंह को 5,01,660 वोट मिले। प्रज्ञा ठाकुर को इस सीट पर 60% से भी ज्यादा वोट मिले हैं। बीएसपी कैंडिडेट माधो सिंह अहिरवार को 11,277 और नोटा को कुल 5,430 वोट मिले हैं।

साध्वी प्रज्ञा की जीत उम्मीद जगाने वाली है और साथ ही बहुतों के प्रोपेगेंडा को करारा तमाचा भी, इस चुनाव में साध्वी प्रज्ञा की जीत क्यों बड़ी है और दिग्विजय सिंह की हार ज़रूरी, ऐसा क्यों कहा जा रहा है? यह जानने के लिए हमें कुछ घटनाक्रमों को सिलसिलेवार समझना होगा।

कायदे से, साध्वी प्रज्ञा की जीत की बुनियाद दिग्गी राजा ने खुद ही रख दी थी, जब रखी थी तो सोचा भी नहीं था कि ‘भगवा आतंक’ से लेकर हिंदुत्व और उसके प्रतीकों के प्रति नफ़रत का जो बीज वो बो रहे हैं, एक दिन जब वृक्ष बनेगा तो क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कल इसी के नीचे दबकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की हत्या हो जाएगी? अगर कोई सोचे की सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाकर या किसी शांतिप्रिय धर्म की मूल अस्मिता से खिलवाड़ कर, देश में लम्बे समय तक अपनी खोखली राजनीति को ज़िंदा रख पाएगा तो वह गफ़लत में है। बेशक पहले चल गया हो या छिप गया हो, लेकिन जब एक बार नक़ाब हटता है तो कहीं भी मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ता। दिग्विजय सिंह के साथ यही हुआ।

कॉन्ग्रेस काल में उन्होंने हिंदुत्व को कलंकित करने का जो षडयंत्र रचा था, उसका भंडाफोड़ तो होना ही था। हुआ भी और कॉन्ग्रेस अपने ही बिछाए जाल में बुरी तरह फँस गई।

साजिश के बीज

मालेगाँव में बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को 2008 में गिरफ्तार किया गया। उन पर इलज़ाम यह था कि उनके नाम पर जो स्कूटर रजिस्टर्ड था उसका इस्तेमाल धमाके की घटना को अंजाम देने के लिए हुआ है। हालाँकि, बाद में यह बात सामने आई कि दो साल पहले ही उसे उन्होंने बेच दिया था।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उन्हें इस मामले में क्लीन चीट दे दी है, अदालत ने उनके खिलाफ मकोका (MCOCA) के तहत आरोप हटा दिए हैं और अब उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है। इस मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने उन्हें 2017 में जमानत दे दी थी और तब से वह जमानत पर हैं।

थोड़ा पीछे से शुरू कर वर्तमान परिस्थियों पर आते हैं

कॉन्ग्रेस ने सहनशीलता और सहिष्णुणता की गौरवशाली परम्परा वाली सनातन धर्म के वाहकों को हिंदुत्व के दायरे में समेटकर और उसमें भी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए संघ और भाजपा के ‘भगवा’ के प्रति लगाव को देखते हुए उसे बदनाम करने के लिए हिन्दुओं को बदनाम करना चाहा, इसके लिए भी उसने संघ या बीजेपी से किसी भी तरह से जुड़े अधिकारियों और भगवाधारी साध्वी और संतों को चुना। शायद यह सोचकर कि इस कदम से मुस्लिम मतदाताओं को बीजेपी से पूरी तरह से अलग कर दिया जाए, उनमें अनचाहा डर बैठा दिया जाए। ताकि उनका वोट और समर्थन तो हासिल हो ही साथ ही जातिगत समीकरण की वजह से दलित और वंचित उनके साथ ही रहेंगे या इनके वोटों के ठेकेदारों को कॉन्ग्रेस मिलाकर रखेगी और योजना के मुताबिक बाकी का नैरेटिव वामपंथी बुद्धिजीवी और उनके खेमें के पक्षकार स्वतः पूरी कर देंगें।

लम्बे समय से सत्ता में होने की वजह से कॉन्ग्रेसी दिग्गजों और उनके रणनीतिकारों को ठीक से पता था कि जनता को कैसे बेवकूफ बनाना है, उसे कब कौन से सब्जबाग दिखाने है या सिर्फ योजनाएँ बना देनी है, कहाँ से और कैसे पूरा होगा, इससे कोई सरोकार नहीं है या कोई भी उल-जलूल वादा कर सत्ता पर अधिपत्य जमाए रखना है। क्योंकि तब तक कॉन्ग्रेस के दिग्गजों से कठिन सवाल करने वाले ‘निष्पक्ष’ पत्रकार नहीं थे। जो थे वो स्टूडियो से ही पार्टी का मोर्चा संभालने वाले ‘पक्षकार’ थे। आज भी ऐसे लोग उसी नमक का क़र्ज़ उतारते नज़र आ जाते हैं।

खैर, सबने अपनी भूमिका निभाई, ‘भगवा आतंक’ अस्तित्व में आया लेकिन तमाम ‘निष्पक्ष’ लिबरल पत्रकार मानवता के सीने पर मूँग दलने वाले नक्सलियों, अलगाववादियों, उग्रवादियों का न धर्म ढूँढ पाए और न उनका कोई प्रतीक ही सामने ला पाए जिससे जनता इन्हें ठीक से पहचान सके। यहाँ तक कि यही मीडिया कश्मीर से लेकर देश के लगभग हर कोने में आत्मघाती हमलावरों व आतंकियों का भी कोई धर्म नहीं ढूँढ पाई थी। और तो और, उनके मानवाधिकारों की रक्षा में लगातार कैम्पेनिंग करती रही। यहाँ तक कि अफजल गुरु की फाँसी पर रोक लगाने के लिए भी आधी रात उसी गिरोह के कुछ भटके हुए लोग सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए थे।

देश को खोखला करने और राष्ट्रवाद को गाली बना देने में जिन लोगों ने कॉन्ग्रेस का साथ दिया था, उन सबने अपनी कीमत वसूली। परिणामस्वरुप कॉन्ग्रेस अपने ही घोटालों के बोझ से दबने लगी। देश की जनता को सारा खेल समझ आने लगा। जाँच एजेंसियाँ जो कॉन्ग्रेस के दबाव में हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा थी, आरोप पत्र तक दाखिल करने में असमर्थ होने लगीं। आरोप तो थे लेकिन सबूत नदारद। आप झूठ गढ़ सकते हैं, अपने दुष्प्रचार की मदद से उसे जनता के बीच फैला भी सकते हैं, लेकिन कोर्ट का क्या? उसे तो नैरेटिव नहीं बल्कि सबूत चाहिए। शायद पहले लगा हो कॉन्ग्रेस को कि वह भी मैनेज हो जाएगा क्योंकि इससे पहले कॉन्ग्रेसी दिग्गज नेताओं को संस्थाओं की स्वायत्तता से खेलने में महारत हासिल था।

समय बदल रहा था, अब 2012-2013 के बाद से ही देश में सोशल मीडिया का तेजी से उभार और विस्तार हो रहा था। कॉन्ग्रेसी गिरोह के विरोध में भी कुछ मीडिया हाउस अस्तित्व में आ चुके थे या कॉन्ग्रेस से तंग आकर, जो सच है उसे निष्पक्षता से कहने का साहस दिखाने को तैयार हो गए थे। क्योंकि जनता सड़कों पर थी और आक्रोश चरम पर। यहाँ तक कि RVS मणि जैसे कुछ नौकरशाहों ने भी अपनी किताब में जो सच था उसे जनता के सामने ले आने का निश्चय कर लिया था। RVS मणि ने अपनी किताब ‘हिन्दू टेरर’ में इस पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है।

वर्त्तमान परिदृश्य: अधर्म के खिलाफ धर्म की जंग

लगभग 30 साल से बीजेपी जिस भोपाल से जीतती आ रही थी। जब वहाँ से कॉन्ग्रेस ने दिग्विजय सिंह को उतारा तो यह दिग्गी राजा को सबक सिखाने और साथ ही देश के सामने इस मामले से जुड़ी सच्चाइयों को पब्लिक डोमेन में लाने के लिए, उन्हें बहस का मुद्दा बनाने के लिए, बीजेपी के पास यह सुनहरा मौका था, जब एक षड्यन्त्रकारी के सामने एक पीड़िता को खड़ा कर दिया जाए, जिसने 9 साल तक इस षड्यंत्र की यंत्रणा सही है। हर वह दर्द झेला है जो एक साध्वी महिला को तोड़ देने के लिए और एक झूठ को स्थापित करने के लिए रचा गया था।

अमित शाह ने भोपाल से साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए कहा था कि यह ‘कथित भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ है। बाद में अपने कई बयानों पर विवादों में घिरीं प्रज्ञा सिंह की उम्मीदवारी पर सवाल उठने लगे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नई दिल्ली में पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा था कि साध्वी को भाजपा का उम्मीदवार बना कर पार्टी ने कोई गलती नहीं की है। शाह ने कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं पर ‘भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा गढ़ने का सीधे-सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि साध्वी प्रज्ञा की भाजपा से उम्मीदवारी ‘भगवा या हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा’ के खिलाफ भाजपा का सत्याग्रह है।

लोकसभा उम्मीदवार घोषित होने के पहले साध्वी प्रज्ञा ने भी एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘‘मैं धर्मयुद्ध के लिए तैयार हूँ।” प्रज्ञा ने दिग्विजय सिंह को ऐसे हिंदू विरोधी नेता की संज्ञा दी जो हिंदुओं को आतंकवादी बताते हैं। प्रज्ञा ने जनता से अपील की थी वह उनका साथ दें, उनकी जीत धर्म की जीत है।

हालाँकि, यह भी कहा जा रहा हैं कि 1984 दंगों के आरोपित कमल नाथ भी दिग्गी राजा को किनारे लगाना चाहते थे, इसलिए भी उनको भोपाल जैसी कठिन सीट दी गई। जबकि दिग्विजय ने भोपाल से लड़ने में अनिच्छा जताई थी। लेकिन कमलनाथ की बदौलत अब तो तय था कि दिग्विजय को भोपाल से ही लड़ना है, पार्टी ने घोषणा कर दी। 10 साल तक उसी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री अगर भागता तो भी जीत साध्वी की होती।

अब मरता क्या न करता, साध्वी प्रज्ञा के हिंदुत्व वाले सेंटीमेंट को बेअसर करने के लिए और एक बार फिर हिन्दुओं को भरमाने के लिए कंप्यूटर बाबा से लेकर मिर्ची बाबा के नेतृत्व में हठयोग से लेकर मिर्ची यज्ञ तक सारे जतन किए, यहाँ तक पार्टी अध्यक्ष जनेऊधारी राहुल गाँधी की तरह मंदिरों के चक्कर भी लगाए, लेकिन कुछ काम नहीं आया। उनका सारा नाटक, पार्टी के फ़र्ज़ी नारे से लेकर चुनावी वादे भी बेअसर रहे।

साध्वी प्रज्ञा की जीत दिग्गी जैसे धूर्त नेताओं के साथ-साथ उन तमाम ‘पक्षकारों’ के लिए भी करारा तमाचा है, जो उन पर आरोप सिद्ध न होने के बावजूद, यहाँ तक कि NIA की अदालत से बरी होने, मकोका हटाए जाने के बाद जब वह कानून सम्मत तरीके से 2017 से जमानत पर बाहर हैं, उनको लगातार इस तरह से पेश करते रहें जैसे वह एक खूँखार किस्म की आतंकी है। जबकि ऐसे ही पत्रकारों के लिए सजायाफ्ता लालू जैसे लोग सामाजिक न्याय के ‘मसीहा’ बने हुए हैं। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ में उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार नज़र आ रहा है।

जबकि, कोर्ट का साफ मानना है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो तब तक कोई भी अपराधी नहीं होता, अगर आरोप लगना ही अपराधी होने का सबूत है तो ऐसे ‘पक्षकारों’ और ‘चाटुकारों’ के लिए जमानत पर चल रहे पूरे खानदान में ‘प्रॉमिसिंग प्राइममिनिस्टर’ नज़र नहीं आना चाहिए। 1984 के दंगो को खुला समर्थन देने वाले प्रधानमंत्री के लिए आज भी ‘मिस्टर क्लीन’ का ताज पहनाने के लिए न्यौछावर हो जाने वाले, और उसी दंगे के आरोपित कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया तो किसी के कंठ से कोई भी कठिन सवाल नहीं फूटा। और न ही देश में विरोध की कोई लहर उठी, न कोई अवार्ड वापसी हुई। उसी दंगे के आरोपित यशपाल सिंह आदि को भी उसी चश्में से देख सकें तो आरोपित और अपराधी का घालमेल करें, नहीं तो निष्पक्षता का मुखौटा उतारकर, यह स्वीकार करें कि हम पत्रकार नहीं बल्कि ‘पारिवारिक पक्षकार’ हैं। जो बीजेपी से जुड़े मामलों में जज और परिवार से जुड़े मामलों के ताउम्र वकील हैं।

खैर, जनता ने साध्वी प्रज्ञा को संसद में भेजकर और कॉन्ग्रेस के तमाम फ़र्ज़ी वायदों को धता बताते हुए एक बार फिर उसका सूपड़ा साफ कर और दिग्गी राजा जैसे धूर्त नेताओं को उसके किए की, प्रतीकात्मक ही सही, सजा देकर अपना मत और जनमत ज़ाहिर कर दिया है। लेकिन उन ‘पक्षकारों’ को कौन सजा देगा जो लगातार पत्रकारिता की आड़ में झूठ परोस रहे हैं और लगातार जनता की आड़ लेकर अपनी नफरत और कुंठा को देश की आवाज़ बना कर परोस रहे हैं? क्या उनके लिए भी कोई सजा है?

शायद सीधे-सीधे नहीं पर उनके झूठ का नकाब उतरना और उनका बार-बार झूठा साबित होना ही आने वाले समय में उनकी प्रासंगिकता को ख़त्म कर देने के लिए पर्याप्त है। कहते हैं कि अगर एक बार किसी की विश्वसनीयता ख़त्म हो गई तो उसकी कही हर बात सिर्फ मनोरंजन का साधन रह जाती है और ऐसे नेता और ‘पक्षकार’ पत्रकार ताश की गड्डी का महज एक जोकर होकर रह जाते हैं, जो होते तो हैं लेकिन ज़रूरी नहीं, उनके बिना भी धूमधाम से खेल जारी रहता है।

मेरठ: मोदी के नारों को लेकर 2 पक्षों में हुई जमकर मारपीट

शुक्रवार (मई 23, 2019) की सुबह मेरठ के किठौर थानाक्षेत्र में दो पक्षों के युवकों में आपसी झड़प की खबर आई। अमर उजाला में प्रकाशित खबर के मुताबिक पुलिस ने बताया है कि एक दुकान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारों को लेकर अनुसूचित जाति व गुर्जर समाज के युवकों के बीच कहा-सुनी हुई।

ये घटना गुरुवार शाम की है। हालाँकि, उस समय मामले को शांत करा दिया गया। लेकिन, शुक्रवार को ये बात बढ़ गई और अनुसूचित पक्ष के युवक क्षेत्र के मंदिर पर आए। यहाँ दोबारा ऐसी ही किसी बात को लेकर विवाद शुरू हो गया।

दोनों पक्षों के युवक लाठी-डंडे लेकर एक दूसरे को मारने के लिए खड़े हो गए। थोड़ी ही देर बाद वहाँ मार-पीट शुरू हो गई। सूचना मिलने पर पुलिस मौक़े पर आई। दोनों पक्षों को समझाकर मामले को शांत कराया गया। इस घटना को देखने के बाद गाँव में पुलिस तैनात कर दी गई है। खबर के अनुसार सीओ आलोक कुमार सिंह व थाना प्रभारी प्रेमचंद सिंह पुलिस फोर्स के साथ मौके पर मौजूद हैं।

बता दें कि यह पहला मौक़ा नहीं है जब नारों को लेकर ऐसी आपसी झड़प देखने को मिली हो। कुछ समय पहले मोदी विरोधी नारे लगने के कारण मेरठ के थाना लिसाड़ीगेट क्षेत्र में भी लोग भड़क गए थे और दूसरे पक्ष के साथ मारपीट की नौबत आ गई थी।