Home Blog Page 5849

Fact Check: राजीव गाँधी के बेटे नहीं हैं राहुल गाँधी? झूठा है अमेरिकी ‘DNA विशेषज्ञ’ का दावा

आजकल जब राजीव गाँधी चुनावों में चर्चा का विषय हैं, तभी एक ऐसी तस्वीर सोशल मीडिया पर पाई गई जिसमें यह दावा किया गया है कि राहुल गाँधी राजीव गाँधी के पुत्र नहीं हैं। सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को लेकर इन दिनों अजीबो-गरीब दावा किया जा रहा है। जब राहुल गाँधी, ‘चौकीदार चोर है’ जैसी टिप्पणी पर माफ़ी माँगने और EVM हैक होने के नारों में व्यस्त है, उसी समय उनकी नाक के नीचे एक बेहद अजीबोगरीब और निंदनीय दावा ‘अमेरिकी DNA विशेषज्ञ’ के नाम से खूब चलाया जा रहा है।

दरअसल, अखबार की एक कटिंग इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि राहुल गाँधी, राजीव गाँधी के बेटे ही नहीं हैं। इस कटिंग में अमेरिकी डीएनए विशेषज्ञ मार्टिन सिजो के हवाले से इस खबर को लिखा गया है। दावा किया गया है कि मार्टिन सिजो के पास राजीव गाँधी और राहुल गाँधी के DNA हैं, जो अलग-अलग हैं।

अमेरिकी डीएनए विशेषज्ञ मार्टिन सिजो का दावा

इस अखबार की कटिंग को ट्विटर से लेकर फेसबुक पर कुछ लोगों द्वारा तत्परता से शेयर किया जा रहा है। एक सोशल मीडिया यूजर ने यह तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है, “तुम EVM-EVM खेल रहे और यहाँ तो DNA भी हैक निकला। डॉ मार्टिन का दावा है राजीव गाँधी और राहुल गाँधी DNA आपस मे मैच नहीं होता। ध्यान दीजिए डॉ साहब ने प्रियंका पर ये दावा नहीं किया। डॉ साहब भारत आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस को तैयार हैं। सिब्बल जी कृपया संज्ञान लें।”

मजे की बात ये कि खबर में दावा किया जा रहा है कि कथित डीएनए विशेषज्ञ मार्टिन सिजो भारत आकर इस बात के सुबूत देने के लिए तैयार हैं।

क्या है सच्चाई?

डॉ मार्टिन के नाम के किसी शख़्स का ज़िक्र हमें इंटरनेट पर नहीं मिला जो ऐसे दावे कर रहा हो। साथ ही, कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी इस तरह की ख़बरों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इससे सामने यही निकल कर आता है कि ये पूर्णतः एक फर्जी खबर है और राहुल गाँधी की छवि को धूमिल करने की कोशिश है।

हाल ही में राहुल गाँधी की नागरिकता पर भी सवाल उठे थे और मामला कोर्ट में है। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी ‘गियासुद्दीन’ टाइप की अफ़वाह उड़ाने वाले गैंग ने यह खबर फैलाई है। व्हाट्सएप्प पर इस तरह की बातों को कई लोग सत्य मान लेते हैं क्योंकि यह अख़बार जैसा दिखता है। हमें ऐसी सूचनाओं को ध्यान से पढ़ कर डिलीट कर देना चाहिए। किसी भी इमेज को पुराना दिखाने के लिए इंटरनेट पर कई प्रकार के ऐप्स उपलब्ध होते हैं, जो उस पर फ़िल्टर लगाकर फोटो को पुराना जैसा बना देते हैं। ये सब बहुत ही आसानी से होता है। इन्हीं टूल्स का सहारा लेकर कुछ कुत्सित मानसिकता वाले लोग ऐसे कार्य करते हैं, जो कि बहुत ही गलत है।

निष्कर्ष

हमारी पड़ताल में सामने आया है कि सोशल मीडिया पर जो दावा किया जा रहा है, वो गलत और झूठा है। पोस्ट में जिस DNA विशेषज्ञ मार्टिन सिजो का नाम लिया जा रहा है, उस नाम का कोई भी एक्सपर्ट मौजूद नहीं है और यह सिर्फ एक फेक न्यूज़ है।

दक्षिण एशिया के सबसे बड़े सूफी दरगाह में आत्मघाती हमला: 9 की मौत, 26 घायल

दक्षिण एशिया के सबसे बड़े सूफी दरगाह के पास आतंकियों ने आत्मघाती हमला किया है। इस हमले में 9 लोगों के मारे जाने की सूचना है, जिनमें से 5 पुलिसकर्मी हैं और बाकी पाकिस्तानी नागरिक। 26 अन्य घायल भी हुए हैं, जिनका इलाज चल रहा है। यह एक आत्मघाती हमला था, जिसमें सूफी दरगाह की सुरक्षा में लगे ‘इलीट फ़ोर्स’ की गाड़ी को निशाना बनाया गया। ये धमाका सुबह 8.45 के क़रीब हुआ, जब पुलिस की मोबाइल वैन दरगाह के पास पार्क की गई थी। शुरूआती जाँच से पता चला है कि इस हमले में 7 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री का प्रयोग किया गया। किंग एडवर्ड मेडिकल यूनिवर्सिटी के मुताबिक़, 9 लोग मारे गए हैं और 4 अन्य की हालत काफ़ी गंभीर है।

ब्लास्ट के बारे में मीडिया को जानकारी देते पंजाब पुलिस के आईजी (साभार: समा टीवी)

कुछ घायल लोगों को मायो अस्पताल में दाखिल कराया गया है। ये हमला लाहौर के ‘दाता दरबार’ नामक सूफी दरगाह में हुआ, जिसे मुग़लकाल में ही बनाया गया था। पंजाब इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस आरिफ हवाज़ ने कहा कि यह 100% पुलिस पर किया गया हमला था। उन्होंने बताया कि दरगाह की सुरक्षा के लिए 24 घंटे पुलिस की तैनाती रहती है। प्रशासन अभी जनरल सिक्योरिटी अलर्ट के तहत काम कर रहा है और दरगाह पर किसी बड़े ख़तरे की आशंका नहीं है। उन्होंने बताया कि हमलावर ने दरगाह के भीतर जाने वाले सीधे रास्ते के बीच खड़े पुलिस वाहन को निशाना बनाया।

ब्लास्ट के बाद मौके पर पुलिस

इस धमाके के बाद दरगाह के भीतर उपस्थित सभी लोगों को एग्जिट गेट की तरफ़ से बाहर निकाला गया और इसे खाली करा दिया गया। अभी दरगाह के भीतर प्रवेश को सीमित कर दिया गया है। आतंकरोधी विभाग और फॉरेंसिक विभाग के लोग वहाँ धमाके से जुड़े सबूत इकट्ठे कर रहे हैं और जाँच के बाद अधिक सूचना दी जाएगी। रमजान के महीने में लाहौर व आसपास के अन्य इलाक़ों में स्थित सभी इस्लामिक धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई और और वहाँ के प्रशासन को अलर्ट रहने को कहा गया है।

हमले में क्षतिग्रस्त वाहन

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस हमले की निंदा की है। पुलिस विभाग ने बताया कि लाहौर में अब तक अपनी ड्यूटी निभाते हुए 306 पुलिसकर्मी मारे जा चुके हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री उस्मान बुज़दार ने पुलिस से इस घटना को लेकर बृहद रिपोर्ट माँगी है और जाँच के आदेश भी दिए हैं। बुज़दार ने अपने सारे प्रस्तावित दौरों को रद्द कर सुरक्षा सम्बन्धी बैठकों में हिस्सा लिया। दाता दरबार या दाता गंज बख्श पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय सूफी दरगाहों में से एक है, जिसे सूफी संत अली हजवेरी की याद में बनवाया गया था। यहाँ 2010 में हुए बम धमाकों में दर्जन भर से भी अधिक लोग मारे गए थे।

‘चौकीदार चोर है’ बयान पर SC से राहुल ने माँगी बिना शर्त माफ़ी, केस बंद करने को ‘गिड़गिड़ाए’

सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर झूठ बोलने वाले राहुल गाँधी आज उसी सुप्रीम कोर्ट के सामने ‘गिड़गिड़ाते’ नज़र आए। राहुल गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में ‘चौकीदार चोर है’ वाला बयान दिया था और इसे एक तरह से अपनी पार्टी का चुनावी नारा बना दिया था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेता तक, सभी ने इस नारे को हाथोंहाथ लिया और लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने इस नारे के सहारे वैतरणी पार करने की ठानी। प्रियंका गाँधी ने तो एक क़दम और आगे बढ़ कर बच्चों तक से ये नारे लगवाए। अब राहुल गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपने इस बयान के लिए ‘बिना शर्त माफ़ी‘ माँगी है। इससे पहले वह सुप्रीम कोर्ट में इस बयान के लिए ख़ेद प्रकट कर चुके थे, जिसे अदालत ने नाकाफ़ी माना था।


राहुल गाँधी द्वारा दिए गए एफिडेविड में कही गई मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर राहुल ने माफ़ी माँगते हुए इस मामले को बंद करने की अपील की है। उन्होंने अपने ख़िलाफ़ अवमानना मामले को खत्म करने का निवेदन किया है। इस बारे में अगली सुनवाई की तारीख़ 10 मई को मुक़र्रर की गई है। राहुल गाँधी ने बयान दिया था, “अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार चोर है।” इसी पर राहुल गाँधी ने माफ़ी माँगते हुए अपने हलफनामे में कहा,

“मैं माननीय उच्चतम न्यायालय का सबसे ज़्यादा सम्मान करता हूँ और इज़्ज़त करता हूँ। मैंने कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही कभी ऐसी मंशा ज़ाहिर की है। मैं माननीय उच्चतम न्यायालय का ग़लत हवाला देने के लिए बिना शर्त माफ़ी माँगता हूँ। साथ ही मैं माननीय उच्चतम न्यायालय को यह भी बताना चाहता हूँ कि ये बयान ग़ैर-इरादतन, अनजाने में असावधानी से दिया गया था। मैं आग्रह करता हूँ कि कृपया मेरी क्षमा प्रार्थना स्वीकार की जाए और मेरे ख़िलाफ़ चल रहे अवमानना मामले को बंद कर दिया जाए।”

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के इस बयान को लेकर भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की थी, जिसके बाद यह सुनवाई प्रारम्भ हुई। जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने 15 अप्रैल को इस मामले के दाखिल किए जाने के बाद राहुल गाँधी को उनका बयान स्पष्ट करने का आदेश देते हुए कहा था कि अदालत ने कभी भी ऐसा (चौकीदार चोर है) नहीं कहा। इसके बाद राहुल गाँधी ने बहाना मारा था कि लगातार चुनाव प्रचार के कारण अचानक से उनके मुँह से ऐसा निकल गया था।

इस मामले में राहुल गाँधी के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इससे पहले अदालत को बताया था कि राहुल अपने ‘चौकीदार चोर है’ वाले बयान पर कायम हैं लेकिन इसमें सुप्रीम कोर्ट के नाम लेने के लिए खेद प्रकट करते हैं। मीनाक्षी लेखी ने राहुल द्वारा माफ़ी माँगने के बाद कहा था कि आप भाग सकते हैं लेकिन आप बच नहीं सकते। उन्होंने ‘माफ़ करो सरकार’ हैशटैग का प्रयोग करते हुए ट्विटर पर राहुल को घेरा था।

रवीश ‘कौन जात हो’ के कठिन सवाल चार्टर्ड प्लेन और 100 रुपए के दलित पानी बोतल में खो गए

मेरी दिली तमन्ना है कि भाजपा हार जाए, नरेंद्र मोदी पदच्युत हो जाएँ और वो रवीश कुमार को साक्षात्कार दे दें।

दरअसल मुझसे रवीश कुमार की तड़प देखी नहीं जाती। मोदी और भाजपा द्वारा नज़रअंदाज करने पर रवीश आजकल न केवल उल जलूल लिख रहे हैं बल्कि अपने ही बनाए उसूलों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं।

मुझे याद है ‘साहित्य आज-तक’ के एक कार्यक्रम में रवीश कुमार ने कहा था – “ये जो नेता हेलिकॉप्टर पर चढ़कर चुनाव में घूमता है, कहाँ से? आप कहते क्यों नहीं कि ये सब चोर हैं। चोर हैं ये सब। बिना चोरी संभव है क्या ये सब?” – तालियों से गूँज उठा था वो हॉल रवीश के इस वक्तव्य से। रवीश आम दिलों की धड़कन बन कर बोलने की कोशिश करते हैं। वो मँहगे कपड़ों, ऐशो आराम के सामान और अन्य फालतू खर्चों पर गाहे-बगाहे सवाल उठाते रहे हैं।

ऐसे में 7 मई को आलीशान जहाज़ में अखिलेश यादव का साक्षात्कार लेते रवीश ख़टके। तकरीबन 100 रुपए की पानी की बोतल लिए मायावती के साथ बैठे थे रवीश। अपने प्राइम टाइम के लंबे उद्घोषणाओं और स्वनिर्धारित वसूलों की खातिर क्या अखिलेश जी का साक्षात्कार उन्हें जमीन पर उतार कर नहीं लेना चाहिए था? ज़मीन के आदमी को जमीन पर ला कर बात करने का अलग आनंद भी आता और रवीश जी अपने कहे पर टीके भी रहते। 10 रुपए की बिसल्लरी (नकली बिसलेरी) न सही 15 रुपए का एक्वाफीना ही पी लेते… इतनी महँगी पानी की बोतल पीने वाली दलित समाज की रहनुमा मायावती से वो सवाल क्यों नहीं पूछ पाए। क्या ये सारे धारदार सवाल उन्होंने सिर्फ नरेन्द्र मोदी के लिए बचा रखे हैं? या फ़िर हाथी के दाँत दिखाने के और खाने के और वाली बात सिद्ध कर रहे वो?

कठिन सवालों में यह सवाल कहाँ था कि मायावती सुप्रीम कोर्ट को जो जवाब दे रही है 6000 करोड़ रुपयों की मूर्तियों पर वो कितना जायज है। यह सवाल कहीं नहीं दिखा कि स्टेज पर अखिलेश ने जो योगी का डुप्लीकेट खड़ा करके उपहास किया, उसमें राजनीति कितनी थी? यह सवाल किसी ने नहीं सुना कि मायावती गेस्ट हाउस कांड को भुला कर मुलायम के साथ स्टेज पर खड़े होने में असहज महसूस करती हैं या नहीं। कठिन सवालों में यह सवाल भी गायब था कि पिछले साल के दलित आंदोलन को अफ़वाहों के दम पर हवा दी गई, जिसमें ग़रीबों के दुकानों का नुकसान तो हुआ ही, करीब 12 लोगों की हत्या भी हुई। रवीश ने अखिलेश से यह नहीं पूछा कि वो जिस जहाज से उड़ते हैं, उसका पैसा कहाँ से आता है। रवीश ने ये सब नहीं पूछा क्योंकि रवीश को ये चार्टर्ड प्लेन वाली हवाई यात्रा याद रहेगी। वो भी अब कह सकेंगे कि वो भी ‘हवाई जर्नलिज़्म’ कर चुके हैं।

इस घटना से थोड़ा पिछे जाते हैं। बेगूसराय और कन्हैया सबको याद है। रवीश कुमार को संपूर्ण भारत में कन्हैया सबसे मजबूत उम्मीदवार लगा प्रधानमंत्री व भाजपा के खिलाफ। पहुँच गए लाव लश्कर समेत उनका महिमामंडन करने… एक और केजरीवाल को जन्म देने की कोशिश करने। स्टूडियो में आदर्शवादी बात करने वाले रवीश ने यहाँ भी वो सवाल नहीं पूछे जो शायद मोदी मात्र के लिए बचा कर रखा है उन्होंने। उन्होंने कन्हैया को कितने साल में डिग्री मिली नहीं पूछा… और ना ही ये कि कन्हैया बार-बार चंद्रशेखर के हत्यारे दल के नेता का पैर पकड़ने क्यों जाते हैं?

इसी बेगूसराय से जुड़ी एक और बात को समझने के लिए आइए थोड़ा और पीछे चलते हैं। जेएनयू में चुनाव का दौर था वो। एक ग़रीब किंतु अच्छा पढ़ा-लिखा वक़्ता लड़का अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार था। उसकी प्रतिभा के कायल हो रहे थे जेएनयू से जुड़े नए-पुराने लोग भी। रवीश कुमार ने भी इस लड़के की तारीफ की और प्राइम टाइम में कई फुटेज भी दिखाए। हालाँकि ये लड़का हार गया किंतु रवीश समेत कई लोग प्रभावित थे इससे। विडम्बना देखिए कि यही लड़का जयंत जिग्याशु राजद के उम्मीदवार के लिए इसी बेगूसराय में प्रचार कर रहा था किंतु रवीश जी एन वक़्त पर उसकी प्रतिभा को भुला गए। एक प्रतिभावान और संभावना से भरे लड़के से मिलकर शायद वो खुद से कोई मुश्क़िल सवाल नहीं पूछना चाहते थे।

हमने-आपने सबने देखा है रवीश रुआंसे मुँह पर कटीली मुस्कान लिए कैमरे के सामने कहते हैं – क्या आडवाणी अकेले में रोते होंगे? यही रवीश कभी राहुल गाँधी से यह नहीं पूछ पाए कि पार्टी में आपसे अधिक अनुभवी और विद्वान जयराम रमेश, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, पवन बंसल आदि-आदि क्यों उपेक्षित हैं? देश के लोकतंत्र की चिंता से पूर्व परिवार की चाटुकारिता से परहेज करते हुए क्यों राहुल गाँधी अपने दल में लोकतंत्र नहीं ला पाते?

कुल मिलाकर रवीश वास्तविकता में मुश्क़िल सवाल न तो सामने वाले से पूछते हैं और न ही खुद से… उन्हें बड़े जहाज़, मंच पर जाकर फोटोबाजी और महँगे प्रसाधन से भी परहेज नहीं। ऐसे में मोदी जी को बिना झिझक… प्रधानमंत्री रहते रवीश के सामने बैठ कर कहना चाहिए – ‘पांडे जी तुम हमसे कम नहीं हो स्यापा करने में बे… हें हें हें हें’!

‘पैगंबर मोहम्मद या फातिमा पर फिल्म बनाने का साहस किसी में नहीं, लेकिन ‘सेक्सी दुर्गा’ बना सकते हैं’

लोकसभा चुनावों में दो चरण की वोटिंग बाकी है। सत्ता पाने को नेता लोग हर जोड़-तोड़ कर रहे हैं। इसी चक्कर में बोलते-बोलते कभी-कभार कुछ ऐसा बोल जाते हैं, जिससे बवाल मचना तय है। ताजा उदाहरण केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का है। मंगलवार को रमजान शुरू होने के दिन ही उन्होंने फिल्मों के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर कुछ ऐसा बोल दिया कि सियासी और सामाजिक दोनों पारा गरमा गया है।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने विवादास्पद मलयालम फिल्म ‘सेक्सी दुर्गा’ का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि कोई भी इस तरह की फिल्म बना सकता है लेकिन पैगंबर मोहम्मद या फातिमा पर फिल्म बनाने का साहस किसी में नहीं है।

मलयालम फिल्म ‘सेक्सी दुर्गा’ का पोस्टर

दक्षिणी दिल्ली से बीजेपी प्रत्याशी रमेश बिधूड़ी के लिए प्रचार करते वक्त गिरिराज सिंह ने एक जनसभा को संबोधित किया। इस रैली में गिरिराज सिंह ने न सिर्फ फिल्मों के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बयान दिया बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए एक मुहावरे का भी इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, “केजरीवाल ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ का हिस्सा हैं। वह देशद्रोह के मामले में JNU के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार के खिलाफ रोड़ा अटका रहे हैं।”

आपको बता दें कि बेगूसराय लोकसभा सीट पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के खिलाफ कन्हैया कुमार भाकपा के प्रत्याशी हैं। गिरिराज सिंह इससे पहले भी ‘वंदेमातरम’ और एक समुदाय विशेष को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

Uber ड्राइवर इरफान ने IT प्रोफेशनल महिला से की छेड़खानी, जान से मारने की धमकी

‘सुरक्षा और आराम के लिए कैब लेना’ वाली सलाह खासकर महिलाओं के लिए अब सटीक नहीं है। आए दिन कुछ ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, जिससे कैब कंपनियों के संचालन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसा ही एक हादसा शनिवार की रात 4 मई को हुआ।

अगली सीट पर बिठाने का बहाना

गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली एक लड़की दिल्ली स्थित द्वारका आई थी। रात में वापस गुरुग्राम लौटते समय शिवानी (बदला हुआ नाम) ने उबर से एक कैब बुक किया। जब कैब आई तो वो पीछे की सीट पर बैठ गईं। कैब चलने के 2-3 मिनट बाद ही ड्राइवर इरफान ने पीछे के टायरों में हवा कम होने का बहाना बनाया और शिवानी को आगे वाली सीट पर बैठने के लिए कहा। शिवानी ने भी इस बहाने को सच माना और आगे की सीट पर बैठ गई। बस यहीं से शुरू हो गया इरफान की गंदी हरकतों का खेल।

जब शिवानी अगली सीट पर बैठीं तो ड्राइवर इरफान किसी से गंदी-गंदी गालियाँ देकर बात करने लगा। इसके बाद उसने शिवानी की जाँघों को छूआ, ऐसे जैसे गलती से हो गया हो। लेकिन बाद में वो इसी हरकत को बार-बार करने लगा। जिस रास्ते से वो कैब ले जा रहा था, वो एकदम अंधेरा और सुनसान रास्ता था। शिवानी को कुछ समझ नहीं आया क्या किया जाए। 100 नंबर पर कॉल करने से ड्राइवर को शक हो जाता, इस डर से उसने उबर ऐप के SOS बटन दबाकर मदद माँगी। लेकिन आश्चर्यजनक यह कि उबर की ओर से कोई खास मदद नहीं मिली।

मदद के नाम पर राइड कैंसल

उबर ने मदद के नाम पर सिर्फ इतना किया कि ड्राइवर को कॉल कर राइड कैंसल करने को कहा। उबर की तरफ से आए फोन को सुनकर ड्राइवर ने शिवानी को धमकाया और जान से मारने की बात करने लगा। शिवानी ने बताया, “मैंने उबर हेल्पलाइन को बताया कि एरिया सुनसान है, मुझे इस एरिया की जानकारी नहीं है। मुझे लगा कि वे मेरी मदद करेंगे, पुलिस को फोन करेंगे। लेकिन राइड कैंसल करके उन्होंने ड्राइवर की ही मदद कर दी और मुझे सुनसान रास्ते पर उतार दिया। उन्हें कोई मतलब नहीं कि मैं घर कैसे जाऊँगी।”

शिवानी के अनुसार कैब से उतर कर भागने के बाद भी ड्राइवर इरफान ने उसे डराना नहीं छोड़ा। कुछ दूरी तक उसने पीछा भी किया। बाद में शायद वह डर कर या किसी और वजह से पीछा करना छोड़ दिया और चला गया। हिम्मत जुटा कर शिवानी ने तब दूसरी कैब बुक की और घर पहुँची। 7 मई को द्वारका नार्थ थाने में जब वो केस दर्ज कराने पहुँची तो पुलिस ने भी 6 घण्टे बाद आरोपित ड्राइवर इरफान के खिलाफ केस दर्ज किया।

उबर का रटा-रटाया बयान

उबर की प्रवक्ता दिशा लूथरा ने अपने बयान में कहा, “जो भी हुआ वह किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है। ऐसे अपराध के लिए हमारे ऐप में कोई जगह नहीं है। हम कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं और उनकी जाँच में सहयोग कर रहे हैं। ड्राइवर को उबर से हटा दिया गया है।”

रवीश कुमार SP-BSP के मंच पर कौन सा ‘कठिन सवाल’ पूछने गए थे? कौन जात हो वाला?

लोकसभा चुनावों की गहमागहमी जारी है, अब जबकि केवल दो चरण ही शेष हैं, राजनीतिक नेता चुनाव प्रचार में अपना सर्वश्रेष्ठ झोंक देने को तत्पर हैं। उत्तर प्रदेश में, महागठबंधन के साथी सपा और बसपा ने आज जौनपुर में एक संयुक्त रैली का आयोजन किया, जिसे अखिलेश यादव और मायावती ने संबोधित किया।

हालाँकि, रैली में सपा और बसपा का नेतृत्व पूरी ताकत से मौजूद था, लेकिन कार्यक्रम में एक महान टीवी पत्रकार की अप्रत्याशित उपस्थिति ने कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। जहाँ एक तरफ महागठबंधन के नेता रैली को संबोधित कर रहे थे, वहीं NDTV इंडिया के पत्रकार रवीश कुमार को मंच पर खड़ा देखा गया। रवीश कुमार के सपा या बसपा में शामिल होने की कोई खबर नहीं है, इसलिए यह सवाल लाज़मी है कि एक स्वघोषित निष्पक्ष और दूसरों को ‘डफ़र’ कहने वाला पत्रकार एक चुनावी रैली के मंच पर क्या कर रहा था?

वैसे चुनावी रैलियों में पत्रकारों की उपस्थिति कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि उन्हें अपने मीडिया घरानों के लिए रिपोर्ट करने के लिए ऐसी रैलियों में शामिल होना पड़ता है। लेकिन इसके लिए पत्रकार ऐसे आयोजनों में प्रेस के लिए आरक्षित स्थान लेते हैं। न कि वे मंच पर खड़े होकर भाषणों का हिस्सा बनते हैं। क्या इससे यह समझा जाए कि रवीश कुमार एक पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि एक मंचीय प्रतिभागी के रूप में रैली में भाग ले रहे थे।

यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि रवीश कुमार ने कभी भी बीजेपी के लिए अपनी नफरत नहीं छिपाई है। उनकी भाजपा और खासतौर से मोदी के प्रति नफरत जगजाहिर है। जिसे वह अपनी भाषा में सत्ता से ‘कठिन सवाल’ पूछना कहते हैं।

लेकिन आज जिस तरह से उन्हें सपा-बसपा की रैली में भाग लेते हुए देखा गया। जितने प्रेम से वह आज मंच की शोभा बढ़ा रहे थे, उससे उनका अखिलेश और मायावती के प्रति भाव साफ नज़र आ रहा है।

वैसे उनका रैली में इस तरह से शरीक होने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि पिछले साल रवीश कुमार द्वारा संचालित एक कार्यक्रम में, सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा था कि उन्हें उस पत्रकार की हत्या नहीं करने का पछतावा है जिसने उनकी आलोचना की थी। रवीश कुमार ने अखिलेश यादव की सहनशीलता की प्रशंसा करते हुए उस शो की शुरुआत की थी। उनकी आपसी जुगलबंदी तभी ज़ाहिर हो गई थी।

रवीश कुमार नीचे दी गई रैली के वीडियो में मंच पर देखे जा सकते हैं:


ट्रम्प को पीछे छोड़ दुनिया के दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता बने PM नरेंद्र मोदी, राहुल आसपास भी नहीं

सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बादशाहत बरकरार है। पीएम मोदी सोशल मीडिया पर फॉलो किए जाने वाले दुनिया के दूसरे नेता बन गए हैं। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर फॉलो किए जाने के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी पीछे छोड़ दिया है। एक नए अध्ययन के अनुसार, लोकप्रियता के मामले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले दुनिया के दूसरे नेता बन गए हैं।

यदि पीएम मोदी के सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नजर डालें तो फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम प्लेटफार्म्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फॉलोवर्स की संख्या 11,09,12,648 है। यह आँकड़ा ऑनलाइन दृश्यता प्रबंधन एवं कंटेंट मार्केटिंग सॉस प्लेटफार्म सेम्रुश ने अपनी नई रिपोर्ट में दिया है। सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले राजनेताओं की लिस्ट में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा पहले स्थान पर हैं। बराक ओबामा के फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम प्लेटफार्म्स पर सबसे ज्यादा 18,27,10,777 फॉलोवर हैं।

हालाँकि, प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को पछाड़ दिया हो, लेकिन ट्विटर पर सबसे ज्यादा फॉलोअर्स के मामले में ट्रम्प दूसरे सबसे लोकप्रिय राजनेता बने हुए हैं।

राहुल गाँधी के आँकड़ें भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं

वहीं, विपक्ष के नेता और रोजाना ED ऑफिस के चक्कर काटने वाले मनी लॉन्ड्रिंग मामलों के आरोपित रॉबर्ट वाड्रा के साले और कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी के फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर केवल 1.20 करोड़ फॉलोअर्स हैं।

मूर्खों और मूढ़मतियों का ओजस्वी वक्ता है कन्हैया: JNU के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-2

कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्टों का साथ चोली-दामन का रहा है। कब एक, दूसरे में परिवर्तित हो जाए, कहा नहीं जा सकता है। आखिर, ‘दुर्घटनावश हिंदू’ और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जब अंग्रेजों से ‘ट्रान्सफर ऑफ पावर’ किया था, तो सब कुछ जस का तस ही रखा। केवल चेहरे बदले, बाक़ी नेहरू के पास न तो भारत का विज़न था, न ही भारत को किसी भी तरीके से वह बदलना चाहते थे, तो अंग्रेजों और मुगलों का भारत ही उनकी नज़र में सब कुछ था, जिसके सबसे तीसरे दर्जे के नागरिक हिंदू थे।

नेहरू जीवन भर ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ ही करते रहे, इस क्रम में वह भारत को कभी समझे ही नहीं। हर एक हिंदू प्रथा, वस्तु, स्मारक या व्यक्ति उनके लिए न्यूनतम मज़ाक और अधिकतम घृणा का पात्र था। इसीलिए, सोमनाथ के जीर्णोद्धार के जुर्म में उन्होंने राजेंद्र बाबू को दमे से मरने दिया, अपने अंग्रेज दोस्तों को सपेरों और नजूमियों से तो मिलवाया, पर भारत की महान सभ्यता और संस्कृति पर लौह-कपाट जड़ दिए।

जब उन्होंने राष्ट्रवादी तरीके से इतिहास-लेखन तक को बाधित किया, तो भला कम्युनिस्टों से बेहतर अधिकारी कौन होता, जो शिक्षा को विकृत करे। तथाकथित लौह-महिला इंदिरा ने उस विष-बेल को बाकायदा सींचकर इतना जड़ीभूत कर दिया कि आज हम जो रोमिला, चंद्रा, हबीब आदि की विषैली शिक्षाएँ देख रहे हैं, वही मुख्यधारा बन चुकी है, यहाँ तक कि आर्य-आक्रमण का सिद्धांत, सभी तरह से खारिज होने के बाद भी पढ़ाया जा रहा है।

खैर, विषयांतर हो गया। हमारे समय कैंपस में एसएफआइ (SFI), एआइएसएफ (AISF) और आइसा (AISA) का जोर था। उसके एक नेता थे बत्तीलाल बैरवा, जो कि फिलहाल कॉन्ग्रेस में हैं। एक हुआ करते थे, नासिर हुसैन। साक्षात ज़हर की पुड़िया। वह कॉन्ग्रेस से राज्यसभा में पाए जा रहे हैं। हमारे जूनियर संदीप सिंह तो खैर आजकल राहुल बाबा के ही दाहिने हाथ हैं, उनकी किचन-कैबिनेट के सदस्य हैं।

अब, एक बार फिर से थोड़ा पीछे जाइए। याद कीजिए, जब कन्हैया कुमार का कांड हुआ, तो देश की तमाम यूनिवर्सिटीज में या तो पहले या बाद से तथाकथित आंदोलन चल रहे थे। चाहे वह गजेंद्र चौहान के बहाने IIFT का हो, या फिर नकली दलित रोहित वेमुला की आत्महत्या (जो दरअसल, उसके कॉमरेड की वजह से ही की गई) के बहाने हैदराबाद यूनिवर्सिटी का बवाल हो, या टीआइएसएस का मसला हो या जाधवपुर का। योजना यह थी कि एक नहीं बीस-पच्चीस कन्हैया तैयार किए जाएँ। एक जिग्नेश पहले ही तैयार किया जा चुका था। उसी क्रम में जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष मोहित पांडे, शहला रशीद और कन्हैया को तैयार किया जा रहा था। एक तरह से 1977 टाइप फर्जी माहौल तैयार करने की योजना थी, जहाँ विद्यार्थियों को आगे कर राहुल बाबा की ताजपोशी करानी थी।

अफसोस। सोशल मीडिया के इस दौर में यह योजना परवान न चढ़ सकी और बिहार में पहले लालू प्रसाद ने और फिर तेजस्वी ने कन्हैया को घास न डाली।

कन्हैया कुमार के बारे में एक सबसे बड़ा दुष्प्रचार क्या है? यही न कि वह बहुत अच्छा बोलता है। मुझे अपने देश के लोगों पर तरस आता है। क्या हमारी मेधा इतनी सिकुड़ गई है, इतनी कम हो गयी है कि यह आदमी भी वक्ता हो गया?

कम्युनिस्टों में भी एकाध लोग ठीक-ठाक पढ़े-लिखे होते थे। जेएनयू के उस जमाने में एक तरफ बत्तीलाल बैरवा थे, तो दूसरी तरफ कविता कृष्णन भी थीं, वीजू कृष्णन भी थे। बत्तीलाल हमें हँसाने के काम आते थे, पर व्यक्तिगत स्तर पर मैं कविता या वीजू को उनकी विचारधारा के लिए कितना भी कोसूँ, वे कम से कम तथ्यों या सबूतों के साथ बात करते थे, उनकी भाषा बताती थी कि वक्तृता किसे कहते हैं। (इसका कविता जी के मौजूदा ट्वीट्स से अंदाज़ा न लगाएँ)।

कन्हैया को यह लेखक देखता भी नहीं है, सुनता भी नहीं है, क्योंकि उसका जो तथाकथित क्रांतिकारी भाषण एड-ब्लॉक पर हुआ था, वह दो सेकंड सुनकर मैं समझ गया था कि यह निहायत ही बदतमीज, तथ्यविहीन, दो कौड़ी की गटरछाप भाषा बोलने वाला आदमी है। मुझे इसके साथ मंच शेयर करने को कहा जाए, तो मैं नहीं करूँगा, क्योंकि मुझे शर्म आती है कि यह गंदा वक्ता मेरा जूनियर है, जो सिवाय मुँह चियारने के, गलतबयानी के और कुछ नहीं करता। (हर एक कम्युनिस्ट बिल्कुल यही करता है)

कन्हैया की देह-भाषा देखिए, उसका उच्चारण देखिए, उसका पूरा व्यवहार देखिए। क्या आपको शर्म नहीं आती कि वह आदमी आज की पीढ़ी के लिए शानदार वक्ता है, सत्ता से प्रश्न पूछने वाला क्रांतिकारी है, राजसत्ता को चुनौती देनेवाला है। क्या यही शिक्षा-पद्धति हमने बनाई है, क्या यही आदर्श हमने तैयार किए हैं?

(पहला भाग यहाँ पढें। अगले भाग में अब कन्हैया से यह कहानी कम्युनिस्टों के कुकर्म की गौरवगाथा की ओर आगे बढ़ेगी)

— व्यालोक पाठक

अमेरिका में हेट क्राइम की शिकार भारतीय बच्ची को बचाने आगे आए हजारों लोग

अमेरिका में हेट क्राइम की शिकार और अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही एक भारतीय बच्ची को बचाने के लिए हजारों की संख्या में लोग आगे आए हैं। अस्पताल में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही 13 साल की बच्ची का नाम धृति नारायण है और वो क्लास 7 की छात्रा है। यह भारतीय बच्ची अमेरिका में हेट क्राइम की शिकार हुई है, उसके सिर में गंभीर चोटे आई है और वो अभी लाइफ सपोर्ट पर अस्पताल में है। बच्ची के इलाज के लिए 8 दिनों के भीतर क्राउड-फंडिंग के जरिए 6 लाख डॉलर (करीब 4.17 करोड़ रुपए) से ज्यादा जुटाए जा चुके हैं। अब तक 12,400 से ज्यादा लोगों ने रुपए दिए हैं। टारगेट 5 लाख डॉलर था और यह 6 लाख डॉलर के आँकड़े को पार कर चुका है।

एक पूर्व सैनिक ने मुस्लिम समझकर कार से किया था हमला

www.gofundme.com के अनुसार, कैलिफॉर्निया में 23 अप्रैल को धृति, उसके भाई, पिता और परिवार के दूसरे सदस्य सड़क पार कर रहे थे, तभी सनीवले इलाके में एक पूर्व सैनिक इशाह पीपल्स ने कार से हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि पूर्व सैनिक पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित है। वह इराक युद्ध भी लड़ चुका है। इस हमले में धृति के पिता और 9 साल के उसके भाई को भी चोट आई है।

अमेरिकी पुलिस के मुताबिक मामला हेट क्राइम का लग रहा है क्योंकि परिवार को मुस्लिम समझकर टारगेट किया गया था। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है और उस पर मामला दर्ज कर जेल भेज दिया गया है।