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आचार संहिता उल्लंघन: पीएम मोदी को EC ने दी क्लीन चिट, कॉन्ग्रेस ने की थी शिकायत

लोकसभा चुनाव की गहमागहमी जारी है। इस बीच कॉन्ग्रेस की खिसियाहट कई बार सामने आ चुकी है। कॉन्ग्रेस सांसद सुष्मिता देव ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की थी। आचार संहिता उल्लंघन के इसी मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव आयोग ने क्लीन चिट दे दी है। बता दें कि महाराष्ट्र के वर्धा में राहुल गाँधी को लेकर दिए बयान के मामले में चुनाव आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि पीएम ने आचार संहिता का कोई उल्लंघन नहीं किया है।

पूरा मामला यूँ है, कॉन्ग्रेस ने आयोग से शिकायत की थी कि एक अप्रैल को महाराष्ट्र के वर्धा में एक रैली के दौरान पीएम ने राहुल गाँधी के वायनाड से चुनाव का मुद्दा उठाया था। कॉन्ग्रेस की शिकायत के मुताबित पीएम ने कहा कि कॉन्ग्रेस बहुसंख्यक आबादी वाले इलाकों से हटकर वहाँ चुनाव लड़ रही है जहाँ बहुसंख्यक आबादी माइनॉरिटी में हैं। कॉन्ग्रेस की यह शिकायत पाँच अप्रैल को की गई थी।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ शिकायत की है। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस ऐसे कई निराधार आरोप लगा चुकी है।

चुनाव आयोग ने चलाया अनुशासन का डंडा, आजम खान पर दूसरी बार 48 घंटे के लिए बैन

चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान पर दूसरी बार अनुशासन के तहत कार्रवाई की है। आयोग ने आजम खान को एक बार फिर से 2 दिन तक चुनाव प्रचार करने पर रोक लगाई है।

बता दें कि आजम खान 1 मई की सुबह 6 बजे से 48 घंटों तक के लिए चुनाव प्रचार नहीं कर पाएँगे। इन 48 घंटों के दौरान आजम खान का चुनावी रैली, रोड शो, इंटरव्यू, जनसंपर्क अभियान थम जाएगा। आजम खान ने 5 अप्रैल, 7 अप्रैल, 8 अप्रैल, 9 अप्रैल और 12 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के अलग अलग जगहों पर विवादित बयान देकर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया था।

बता दें कि इससे पहले चुनाव आयोग ने बीजेपी कैंडिडेट जया प्रदा पर आपत्तिनजक बयान देने के लिए बैन लगाया था। जया प्रदा पर टिप्पणी के लिए चुनाव आयोग ने आजम खान पर 72 घंटे का बैन लगाया था। आज़म खान के बेटे ने भी जया प्रदा पर अभद्र टिप्पणी की थी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने आजम खान के भाषणों की जाँच में पाया कि उनके स्पीच भड़काऊ थे और उन्होंने जिला निर्वाचन अधिकारी पर धार्मिक आधार पर टिप्पणी की थी। आयोग ने कहा है कि आजम खान के बयान चुनाव में ध्रुवीकरण पैदा कर सकते हैं, और इसका असर सिर्फ वहीं नहीं पड़ता है जहाँ ये भाषण दिए जाते हैं बल्कि सूचना के डिजिटल युग में सोशल मीडिया के ज़रिए, इसका प्रभाव पूरे देश पर भी पड़ सकता है।

हालाँकि, आजम खान ने चुनाव आयोग को भेजे अपने जवाब में बिना शर्त माफी माँगा था, लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी इस पेशकश को ठुकरा दिया था। चुनाव आयोग ने कहा है कि वह आजम खान द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए बयान की सख्त निंदा करता है और उन्हें चेतावनी देता है कि वे भविष्य में ऐसा आचरण न करें।

CJI यौन उत्पीड़न मामले में महिला ने जाँच में शामिल होने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी जिन्होंने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, ने तीन न्यायाधीशों के इन-हाउस पैनल द्वारा की जा रही जाँच से यह कहते हुए शामिल होने से इनकार किया है कि उन्हें लगता है कि वहाँ कोई न्याय मिलने की संभावना नहीं थी।

न्यायमूर्ति एसए बोबडे के नेतृत्व में वाले पैनल, जिसने सोमवार को अपना तीसरा इन-चैंबर सुनवाई किया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी के सामने महिला ने अपना बयान दिया था। अब तक हुई तीन सुनवाई में, महिला ने कहा कि उसे डर लग रहा है क्योंकि उसे अकेले इसमें शामिल होना है और यहाँ तक कि उसके वकील को भी कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनने दिया गया।

इतना ही नहीं मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला ने इस मामले की सुनवाई कर रही जजों की समिति पर भी सवाल खड़े किए हैं। महिला ने समिति पर यौन उत्पीड़न अधिनियम के नियमों का उल्लंघन करने का भी आरोप लगाया है।

महिला का आरोप है कि समिति द्वारा मुझसे बार-बार पूछा गया कि यौन उत्पीड़न की शिकायत मैंने क्यों देर से की। महिला ने कहा कि तीन जजों की समिति द्वारा पूछताछ से मैं घबरा गई थी। वहाँ का माहौल अजीब था। मेरे वकील भी साथ में नहीं थे। इसके अलावा महिला ने कहा कि उसे 26 और 29 अप्रैल को दर्ज किए गए बयानों की प्रति भी नहीं दी गई।

बता दें कि इससे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच के लिए गठित तीन जजों की आंतरिक जाँच समिति से जस्टिस एनवी रमण ने खुद को अलग कर लिया था। दरअसल, आरोप लगाने वाली महिला कर्मचारी ने ही इस समिति में जस्ट‍िस एनवी रमण को शामिल किए जाने पर ऐतराज जताया था। महिला का कहना था कि जस्ट‍िस रमण प्रधान जस्ट‍िस गोगोई के करीबी दोस्त हैं और उनके घर पर अक्सर उनका आना-जाना रहता है।

आसाराम के बेटे नारायण साईं को दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा, ₹1 लाख का जुर्माना

गुजरात के सूरत स्थित आश्रम में दो बहनों से दुष्कर्म के मामले में सूरत की कोर्ट ने मंगलवार (अप्रैल 30, 2019) को आसाराम के बेटे नारायण साईं को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसी के साथ कोर्ट द्वारा नारायण साईं पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है। कोर्ट ने शुक्रवार (अप्रैल 26, 2019) को सूरत की रहने वाली दो बहनों के साथ बलात्कार के आरोप में दोषी करार दिया था। अदालत ने इस मामले पर सजा सुनाने के लिए 30 अप्रैल का दिन मुकर्रर किया था।

गौरतलब है कि इन दोनों बहनों ने 2013 में पुलिस में दर्ज अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि आसाराम और नारायण साईं ने उनके साथ बलात्कार किया। दोनों बहनों की शिकायत के बाद नारायण साईं को हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पास पीपली से दिसंबर 2013 में गिरफ्तार किया गया था। एक बहन ने साईं पर 2002 और 2005 के बीच सूरत में आश्रम में रहने पर यौन शोषण करने का आरोप लगाया था, तो वहीं पीड़िता की बड़ी बहन ने अहमदाबाद में 1997 और 2006 में आश्रम में रहने के दौरान आसाराम पर यौन शोषण का आरोप लगाया था।

दोनों बहनों ने साईं और आसाराम के खिलाफ कथित शोषण की अलग-अलग शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने आसाराम और उसके बेटे के खिलाफ दुष्कर्म, यौन शोषण और अवैध तरीके से बंधक बनाकर रखना और अन्य अपराध के तहत मामला दर्ज किया था। इस मामले में पुलिस ने साईं के चार साथियों को भी गिरफ्तार किया था।

नारायण साईं के खिलाफ कोर्ट अब तक 53 गवाहों के बयान दर्ज कर चुकी है, जिसमें कई अहम गवाह भी हैं, जिन्होंने नारायण साईं को लड़कियों को अपने हवस का शिकार बनाते हुए देखा था या फिर इस कृत्य में आरोपियों की मदद की थी, लेकिन बाद में वो गवाह बन गए।

चक्रवात ‘फ़ानी’ से बचाव के लिए 1000 करोड़ रुपए का राहत फंड तैयार, Navy भी मुस्तैद

चक्रवात ‘फानी’ को हिंदुस्तान की ओर रुख कर आगे बढ़ता देखते हुए गृह मंत्रालय ने कमर कसनी शुरू कर दी है। इन्हीं तैयारियों के अंतर्गत ₹1000 करोड़ से अधिक का एक फंड उन चार राज्यों के लिए तैयार किया गया है जिनके इस चक्रवात की चपेट में आने की सम्भावना है। यह चारों राज्य भारत के पूर्वी समुद्र तट पर हैं।

पैसा सीधे राज्यों के आपदा रिस्पॉन्स फंड में

यह धनराशि चारों राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा की राज्य सरकारों के आपदा रिस्पॉन्स फंड में सीधे जमा की जाएगी। तमिलनाडु को ₹309.75 करोड़, आंध्र प्रदेश ₹200.25 करोड़, ओडिशा को ₹340.875 करोड़ और पश्चिम बंगाल को ₹235.50 करोड़ दिए जाएँगे। कल (सोमवार) शाम से हाई अलर्ट पर चल रहे यह राज्य इस राशि का उपयोग नुक्सान की रोकथाम और प्रभावित लोगों की सहायता के लिए करेंगे।

नेवी भी चौकस, बंगाल की खाड़ी में है तूफ़ान का उद्गम  

फ़ानी तूफ़ान का उद्गम बंगाल की खाड़ी में चेन्नै से 690 किमी और तमिलनाडु के ही अन्य शहर मछलीपट्टनम से 760 km दक्षिणपूर्व में बताया जा रहा है। गृहमंत्रालय के एक अधिकारी ने आज शाम को ही यह जानकारी दी कि पहले उत्तर की ओर बढ़ते इस तूफ़ान के बारे में अनुमान है कि 1 मई (कल, बुधवार) की शाम के आसपास यह ओडिशा की तरफ़ मुड़ जाएगा।

पूर्वी नेवल कमांड (ENC) को भी हाई अलर्ट पर मानवीय सहायता के लिए तैयार रहने को कहा गया है, इस आशय से नेवी के एक प्रवक्ता ने मंगलवार शाम को जानकारी दी है। चेन्नै और विशाखापत्तनम स्थित भारतीय नेवी के पोतों को आपदा सहायता, बचाव अभियान, मेडिकल सहायता आदि के लिए स्टैंडबाई पर रखा गया है। इन पोतों पर डॉक्टरों, दवाओं, कपड़ों, बचाव अभियान की रबर नावों सहित सभी सामग्री को संग्रहित कर लिया गया है।

नेवी कमांड स्थिति पर पैनी नजर रखे है और चारों राज्यों की राज्य सरकार के साथ लगातार संपर्क और समन्वय स्थापित किए हुए है

PM मोदी के खिलाफ लड़ रहे महागठबंधन प्रत्याशी तेज बहादुर का खारिज हो सकता है नामांकन, EC ने भेजा नोटिस

वाराणसी लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की तरफ से पीएम मोदी के खिलाफ मैदान में उतारे गए बीएसएफ के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव का नामांकन खारिज हो सकता है। जानकारी के मुताबिक, सोमवार को सपा की तरफ से दाखिल किए गए एक नामांकन पत्र की जाँच करते हुए निर्वाचन आयोग के पर्यवेक्षक ने नोटिस जारी करते हुए तेज बहादुर से एक अनापत्ति प्रमाण पत्र माँगा है।

आयोग की ओर से जारी किए गए नोटिस में तेज बहादुर को निर्देश दिए गए हैं कि वह बीएसएफ से एक अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर आएँ, जिसमें यह स्पष्ट हो कि उन्हें नौकरी से किस वजह से बर्खास्त किया गया। निर्वाचन आयोग ने इस प्रमाण पत्र को जमा करने के लिए बुधवार (मई 1, 2019) को दोपहर 11 बजे तक का वक्त दिया है। अगर तेज बहादुर समय रहते अनापत्ति पत्र जमा नहीं कर पाते हैं, तो उनका नामांकन खारिज हो सकता है।

वहीं, इससे पहले तेज बहादुर ने निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में जो पर्चा भरा था उसमें प्रस्तावकों के नाम को लेकर गड़बड़ियाँ पायी गई थी, जिसकी वजह से उसे रद्द कर दिया गया है।

सपा के प्रदेश प्रवक्ता मनोज राय धूपचंडी ने इसे बीजेपी की साजिश करार देते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती कि तेज बहादुर यादव नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरें। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि भाजपा के इशारे पर पर्यवेक्षक ने 24 घंटे के भीतर बीएसएफ में भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्तगी को लेकर अनापत्ति प्रमाणपत्र माँगा है और राजनीतिक साजिश के कारण ही ऐसा जान-बूझकर किया गया है। हालाँकि, अभी तक जिला प्रशासन की ओर से इसे लेकर कोई बयान नहीं दिया गया है।

बता दें कि,पहले समाजवादी पार्टी ने वाराणसी लोकसभा सीट से शालिनी यादव को अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन बाद में पार्टी ने बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव को अपना कैंडिडेट बताते हुए पार्टी नेताओं के माध्यम से उनका भी नामांकन करा दिया। मगर तेज बहादुर यादव के चुनाव लड़ने पर अभी भी संशय बरकरार है।

गौरतलब है कि तेजबहादुर यादव ने बीएसएफ में खाने को लेकर शिकायत की थी। उन्होंने वहाँ दिए जाने वाले भोजन को लेकर वीडियो बनाया था और उसे सोशल मीडिया में वायरल कर दिया था। उनके ख़िलाफ़ 2 मोबाइल फोन लेकर ऑपरेशनल ड्यूटी पर जाने और भोजन की गुणवत्ता को लेकर ग़लत अफवाह फैलाने का मामला साबित हुआ था, जिसके बाद बीएसएफ ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए तेज बहादुर यादव को बर्खास्त कर दिया था।

वाराणसी में राड़ा होना तय: SP जुटा शालिनी यादव को मनाने में, नामांकन वापस न लेने से बढ़ीं तेज बहादुर की मुश्किलें

किसी भी शर्त पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हराने की मशक्कत में जुटे SP और कॉन्ग्रेस की माथापच्ची के कारण वाराणसी लोकसभा सीट पर हर दिन नया मनोरंजन देखने को मिल रहा है। एक ओर जहाँ SP द्वारा सेना में मिलने वाली पीली दाल का वीडियो बनाने से चर्चा में आए BSF से बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव को टिकट दिए जाने के बाद मीडिया उनके समर्थन में माहौल बनाने में जुटा है, वहीं SP अभी अंदरूनी समस्याओं से ही जूझती नजर आ रही है।

आसान काम नहीं है शालिनी यादव को मनाना

BSF के पूर्व जवान तेज बहादुर के लिए समाजवादी पार्टी (SP) ने जिस शालिनी यादव का टिकट काटा है, वो पूर्वांचल के बड़े राजनीतिक घराने से संबंध रखती हैं। शालिनी यादव अब भी PM नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी से उम्मीदवार हैं क्योंकि उन्होंने अभी तक अपना नामांकन वापस नहीं लिया है। माना जा रहा है कि शालिनी यादव का अपना जनाधार है, इसलिए SP के नए उम्मीदवार और BSF के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। शायद इसीलिए पार्टी अब शालिनी को मनाने में जुटी हुई है।

शालिनी यादव पूर्वांचल में कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता रहे श्यामलाल यादव की बहू हैं। श्यामलाल यादव 1984 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर वाराणसी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। वो राज्यसभा के उप सभापति रहे थे। श्यामलाल 1957 से 1962 और 1967 से 1968 तक UP विधानसभा के सदस्य और केंद्रीय कृषि मंत्री भी रह चुके हैं। कुल मिलाकर शालिनी यादव बनारस के एक बड़े कॉन्ग्रेस परिवार से ताल्लुक रखती हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि वो 22 अप्रैल को ही कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देकर SP में शामिल हुई थीं। ऐसे में उन्हें मनाना SP के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

शालिनी ने वाराणसी के मेयर पद का चुनाव लड़ा था और उन्हें सवा लाख वोट मिले थे। हालाँकि, वो हार गई थीं। वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में ग्रेजुएट हैं। नामांकन वापसी के मामले पर शालिनी यादव की नाराजगी SP की परेशानी बढ़ा रही है।

यदि शालिनी यादव अपना नामांकन वापस नहीं लेती हैं, तो तेज बहादुर के साथ ही SP की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं। शालिनी का टिकट काटना एक तरह से महिलाओं का अपमान भी है, वो भी तब, जबकि पूर्वांचल में वैसे ही बहुत कम महिलाएँ मैदान में हैं।

शालिनी यादव ने अभी अपना नामांकन वापस नहीं लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका कहना है कि अगर अखिलेश यादव कहेंगे, तो वह अपना नामांकन वापस ले लेंगी। साथ ही, उन्होंने कहा है कि अगर पार्टी की तरफ से नहीं कहा जाएगा तो वो ऐसा नहीं करेंगी और चुनाव लड़ेंगी। इस पूरे प्रकरण में BJP का कोई नुकसान नहीं है, लेकिन SP का वोट प्रतिशत जरूर कम हो सकता है। इसका कारण यह है कि शालिनी यादव तेज बहादुर के मुकाबले एक गंभीर प्रत्याशी हैं।

बता दें कि BSF से बर्खास्त तेज बहादुर ने सोमवार को नामांकन के अंतिम दिन समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल किया है। जबकि, वो पहले ही निर्दलीय तौर पर भी नामांकन कर चुके थे।

मायावती ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना, MP की कमलनाथ सरकार से समर्थन वापस लेने की दी धमकी

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए कॉन्ग्रेस को यूपी के सपा, बसपा और रालोद के गठबंधन से बाहर कर बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही झटका दे चुकी हैं और अब मायावती एक बार फिर से कॉन्ग्रेस को मध्य प्रदेश में बड़ा झटका देने जा रही हैं। मायावती ने मंगलवार (अप्रैल 30, 2019) को ट्वीट कर कॉन्ग्रेस को सार्वजनिक तौर पर धमकी भी दे दी है। दरअसल, मध्यप्रदेश के गुना- शिवपुरी लोकसभा सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ खड़े बसपा प्रत्याशी लोकेंद्र सिंह राजपूत कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए हैं, जिसके बाद से बसपा सुप्रीमो मायावती कॉन्ग्रेस पर भड़की हुई हैं।

मायावती ने ट्वीट कर दोनों राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कॉन्ग्रेस पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया है। मायावती ने अपने ट्वीट में लिखा है कि सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के मामले में कॉन्ग्रेस भी बीजेपी से कम नहीं है। मध्य प्रदेश के गुना लोकसभा सीट पर बसपा उम्मीदवार को कॉन्ग्रेस ने डरा-धमकाकर जबर्दस्ती बैठा दिया है, लेकिन बसपा अपने चुनाव चिह्न पर ही लड़कर इसका जवाब देगी और अब कॉन्ग्रेस सरकार को समर्थन जारी रखने पर भी पुनर्विचार करेगी।

इसके साथ ही मायावती ने एक और ट्वीट करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेसी नेताओं द्वारा जो यह प्रचार किया जा रहा है कि भाजपा भले ही जीत जाए, लेकिन बसपा-सपा गठबंधन को नहीं जीतना चाहिए, यह कॉन्ग्रेस पार्टी के जातिवादी, संकीर्ण व दोगले चरित्र को दर्शाता है। इसलिए लोगों का यह मानना सही है कि बीजेपी को केवल हमारा गठबंधन ही हरा सकता है। लोग सावधान रहें।

बता दें कि लोकसभा चुनाव 2019 में भले ही कॉन्ग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन नहीं हुआ है, लेकिन पिछले साल नवंबर में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद जब कॉन्ग्रेस खुद के बल पर सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुई, तो प्रदेश में कॉन्ग्रेस को समाजवादी पार्टी, बसपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिला और फिर कमलनाथ के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी थी।

क्या स्वरा भास्कर की अभिव्यक्ति उनकी FoE और दूसरे व्यक्ति की FoE यौन कुंठा है?

लोकतंत्र में यह पहली बार देखने को मिला है कि जिस व्यक्ति को जो तरीका बेहतर लग रहा है, वो उसी को ढाल बनाकर, उसके समर्थन में हर संभव तर्क देते हुए उसे जायज ठहरा रहा है। बॉलीवुड में ‘नारीवाद’ की नई परिभाषा गढ़कर महिलाओं को अपमानित करने वाली स्वरा भास्कर और विवादों का रिश्ता नया नहीं है। ‘वीरे दी वेडिंग‘ फिल्म में खुलकर अपने ‘मन की बात‘ करने वाली स्वरा भास्कर को बहुत आसानी से नारीवाद का चेहरा बना कर पेश किया जाने लगा है। यह वर्तमान समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि महिलाओं के अधिकारों को उसके शारीरिक सुख और जबरन फूहड़पन मात्र से जोड़कर पेश कर देने से वो समाज में महिलाओं की नई पहचान दिलाने वाले ठहराए जाने लगते हैं।

इस फिल्म में स्वरा भास्कर ने हस्तमैथुन के दृश्य को फिल्माया था और इस दृश्य को एक बड़े वर्ग ने महिलाओं के प्रति रूढ़िवादिता को ख़त्म करने वाला एक ऐतिहासिक कदम भी बताया था। इस दृश्य के बाद से ही स्वरा भास्कर एक बड़ा नाम बन गई। युवाओं को नारीवाद, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता आदि मामलों पर ‘नई दिशा’ देने की जो जिम्मेदारी स्वरा भास्कर, कॉमेडी के नाम पर स्वयं कॉमेडी, यानी कुणाल कामरा, मल्लिका दुआ और AIB जैसे नव-क्रांतिकारियों ने उठाई है, वह मात्र एक दोयम दर्जे का भोंडापन है।

आम चुनावों के बीच नव-क्रांतिकारियों की तर्ज पर ही सोशल मीडिया पर तख्तियों के माध्यम से अपने विचार प्रकट करने वाले एक ट्विटर यूज़र ने मतदाताओं से इस चुनाव में समझदारी से अपने मताधिकार का प्रयोग करने की बात उठाई है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी राय भी दी है कि अपनी ऊँगली का इस्तेमाल ‘वीरे दी वेडिंग’ फिल्म वाली स्वरा भास्कर की तरह ना करें, बल्कि समझदारी से मतदान करने के लिए करें। लेकिन इस अपील से लिबरल समूह और खुद स्वरा कुछ नाराज नजर आ रहे हैं।

बस इस एक सन्देश के बाद लिबरल गैंग में माहौल ‘धुआँ-धुआँ’ हो गया। ‘प्लाकार्ड गाय’ को यौन कुंठित और बीमार बताया जाने लगा है। यहाँ तक की स्वरा भास्कर को उन्ही की फिल्म के दृश्य की याद दिलाने पर वो भड़क जाती है और उनका ट्रॉल समूह लोगों को बीमार साबित करने पर उतर आता है।

कॉन्ग्रेस के पार्टी ‘प्रवक्ता’ कुणाल कामरा के ‘कॉमेडी’ के नाम पर बनाए जाने वाले वीडियो से अभिव्यक्ति की आजादी, लोकतंत्र की हत्या, लिबरल, एनार्की, फासिज़्म, ‘माई लाइफ माई रूल्ज़’ जैसे शब्दकोश विकसित करने वाले लोगों का दूसरों की अभिव्यक्ति की आजादी से किलस जाना नई बात नहीं है।

नव-लिबरल्स की इस नई फसल को यह समझना अभी बाकी है कि अभिव्यक्ति की आजादी हमेशा आत्यंतिक होती है और यह दोनों ओर से समान रूप से जायज ही होती है। सामान्य शब्दों में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि स्वरा भास्कर की अभिव्यक्ति को उनका ‘अधिकार’ और प्लाकार्ड का समर्थन करने वालों की अभिव्यक्ति को यौन कुंठा और बिमारी बता देना ही सबसे बड़ी मानसिक कुंठा है।

यह हास्यास्पद बात है कि स्वरा भास्कर जैसे लोग आज उन लोगों के समर्थन में खड़े हैं जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी बयान देने के बाद आज खुलकर चन्दा माँगकर संसद पहुँचने का सपना देख रहे हैं। FoE को गाली अगर किसी ने बनाया है, तो वो यही लोग हैं। लेकिन जब आज यही अभिव्यक्ति इनके विपरीत काम कर रही है, तब इन्हें पसीना छूट रहा है।

हालाँकि, प्रतिक्रिया करने वालों को भी समझना चाहिए कि स्वतन्त्रता और अधिकारों के साथ ही जिम्मेदारी भी होती है। कथित लिबरल गैंग की तरह ही यदि अपने हर अधिकार का शोषण के स्तर तक इस्तेमाल किया जाने लगे तो उस अधिकार की प्रासंगिकता पर ही सवाल लगने शुरू हो जाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यदि आज मजाक बनकर रह गई है, तो उसमें सबसे बड़ा योगदान इंटेरनेट पर सस्ते कॉमेडियंस के वीडियो देखकर बने इन नव-लिबरल्स का ही है।

‘बकवास’ है राहुल गाँधी की नागरिकता वाली याचिका, 2015 में सुप्रीम कोर्ट से कुछ ऐसे बचे थे RaGa

आज राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर सियासी बवाल खड़ा हो गया है। काग़ज़ातों से ख़ुलासा हुआ है कि वह लंदन की एक कम्पनी के डायरेक्टर और सेक्रटरी थे और उस कम्पनी के रजिस्ट्रेशन फॉर्म में उन्होंने ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। संविधान के आर्टिकल 84(a) में लिखा हुआ है कि सांसद का चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए। इसके अलावा आर्टिकल 9 में इस बात का जिक्र किया गया है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने विदेशी नागरिकता ली है, वह भारत का नागरिक नहीं हो सकता। राहुल गाँधी अगर ब्रिटिश नागरिक हैं, जैसा कि 2003 के काग़ज़ातों से ख़ुलासा हुआ है, तो 2004, 2009, 2014 और 2019 में उनका सांसद का चुनाव लड़ना संविधान के ख़िलाफ़ है। अगर वह विदेशी नागरिक हैं तो भारतीय नागरिक नहीं हो सकते।

क्या आपको पता है कि 2015 में इसी प्रकार का एक पीआईएल दाखिल किया गया था जिसमें काग़ज़ातों के साथ राहुल गाँधी की नागरिकता पर सवाल खड़े किए गए थे। इस पीआईएल को सुप्रीम कोर्ट ने रिजेक्ट कर दिया था। इस पीआईएल में इस मामले को लेकर सीबीआई जाँच की माँग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस एच एल दत्तू और जस्टिस अमिताव राय की पीठ ने उन काग़ज़ातों की ‘प्रमाणिकता’ पर सवाल खड़े किए थे और यह भी पूछा था कि इन काग़ज़ातों को किस तरह से हासिल किया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को तुच्छ करार देते हुए कहा था कि क्या कोर्ट अब जाँच के लिए घुमना-फिरना शुरू कर दे? इसके साथ ही अदालत ने इस याचिका को औचित्यहीन और तुच्छ करार दिया था। इस पीआईएल के दाखिल होने के कुछ सप्ताह पहले ही भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने राहुल गाँधी की ब्रिटिश नागरिकता को लेकर ख़ुलासे किए थे और साथ ही डाक्यूमेंट्स भी पेश किए थे। उन्होंने पीएम मोदी को भी पत्र लिखा था। आज मंगलवार (अप्रैल 30, 2019) को राहुल गाँधी को गृह मंत्रालय द्वारा अपनी नागरिकता को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए जो नोटिस भेजा है, उसका आधार सुब्रह्मण्यम स्वामी के ख़ुलासे ही हैं।