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मोदी के ग्रेजुएशन की डिग्री बनाम राहुल का बर्थ सर्टिफ़िकेट: सबूत नहीं माँगोगे शोना बाबू?

माताजी इटली की हैं। पिता जी भारत के प्रधानमंत्री थे। शादी हुई थी, तब प्रधानमंत्री दादी थीं। बालक पैदा हुआ, सबके सामने पैदा हुआ ऐसा बहन प्रियंका गाँधी का ताजा बयान है। बालक का नाम रखा गया राहुल। सुब्रह्मण्यम स्वामी कहते हैं कि असली नाम राओल विंची है, लेकिन हम उतने भीतर नहीं जाएँगे क्योंकि हम इन बातों पर चालीस मिनट के सत्रह प्राइम टाइम नहीं करते कि देश जानना चाहता है।

देश को कुछ नहीं जानना होता है। देश जान भी ले तो क्या कर लेगा इस सूचना का? लेकिन लोग लगे रहे, केस हुआ, सूचना का अधिकार इस्तेमाल किया गया, डिग्रियाँ निकलवाई गईं, डिग्री सही निकली तो उसे ही फेक कहा जाने लगा। मतलब यह है कि मतलब इस बात से नहीं था कि मोदी कितना पढ़ा लिखा है, बल्कि मतलब इससे था कि इनका झूठ सच साबित हो जाए। हुआ कुछ नहीं, खलिहर पत्रकार नौटंकी करते रहे और ‘देश जानना चाहता है’ के नाम पर वाहियात बातें परोसते रहे।

मुझे भी इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गाँधी का नाम राओल है कि राकरेला। नाम चाहे जो भी हो, वो रहेगा राहुल गाँधी ही जिसका दैनिक कार्य है सहजता से झूठ बोलना और देश की हर संस्था को अपनी जेब का सिक्का समझकर जहाँ-तहाँ उछालते रहना। कभी सीआरपीएफ़ पर झूठ, कभी सैन्य कार्रवाई पर झूठ, कभी सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर झूठ और बाकी टाइम तो प्रपंच चलता ही रहता है।

इसलिए, ऐसे आदमी के शर्ट में एक छेद हो, तो उँगली डाल कर पूरा फाड़ कर देख ही लेना चाहिए कि भाई तुम्हारे 2009, 2014 और 2019 के चुनावी हलफ़नामे में इतने बदलाव क्यों हैं? आखिर बैकऑप्स नामक कम्पनी का डायरेक्टर प्रियंका को चुनावों के तुरंत पहले क्यों बना दिया गया था? ऐसे काग़ज़ात क्यों बाहर आ रहे हैं जिसमें राहुल गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया है? फिर भारत में जो दस्तावेज हैं उसमें कुछ और क्यों लिखा हुआ है?

इससे हासिल क्या होगा? वही, जो मोदी की डिग्री का पोस्टमॉर्टम कर के हुआ था। अगर मोदी को डिग्री के नाम पर घेरने वाला आदमी इंग्लैंड में व्यवसाय करने के लिए ब्रितानी हो जाता है, और भारत में चुनाव लड़ने के लिए भारतीय, तो फिर रवीश कुमार के गंभीर शब्दों में, “इसकी जाँच क्यों नहीं करवा ली जाए। अगर इतने लोग कह रहे हैं तो क्या दिक्कत है, जाँच करा ली जाए।”

इससे किसी बात पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, बस यह बात जाननी ज़रूरी है कि वह व्यक्ति जो सत्ता के शीर्ष पर बैठना चाहता है, उसकी पार्टी के मुख्यमंत्री देश के बड़े राज्यों में हैं जहाँ मिलिट्री एवम् अन्य सुरक्षा संबंधी संस्थान हैं, उसकी प्रतिबद्धता एक व्यवसाय के लिए अंग्रेज़ होने से है, एक चुनाव के लिए भारतीय होने से है, या फिर उस हिन्दुस्तान से जहाँ उसकी बहन ने कहा कि वो सबके सामने पैदा हुए थे।

सवाल यह उठता है कि इस आदमी ने नागरिकता के बारे में झूठ क्यों लिखा। कहीं तो लिखा ही, या तो भारत के दस्तावेज़ों में, या ब्रिटेन के। अंग्रेज़ों को अगर पागल बनाया तो ठीक है क्योंकि उन्होंने दो सौ साल राज किया, तो थोड़ी टैक्स चोरी भी अगर कर ली तो माफ किया जाए, लेकिन भारत सरकार को उस कमाई का टैक्स दिया कि नहीं?

टैक्स भी छोड़िए, बस यह बता दीजिए कि सच क्या है। ब्रिटेन के अंग्रेज़ ही हैं तो कोई दिक्कत नहीं। आपकी माताजी को देश के लोगों ने दस साल ‘प्रधानमंत्री’ के तौर पर स्वीकारा ही है। उन्होंने देश चलाया है। आप भी चला लीजिएगा, इसमें संदेह नहीं। लेकिन देश की राष्ट्रीय सुरक्षा की चाभी क्या ऐसे व्यक्ति के हाथ में दी जा सकती है जो इटली में राओल विंची है, लंदन में ब्रिटिश नागरिक है, और भारत में राहुल गाँधी है जिसके कुर्ते की जेब फटी हुई है, जो दीवारों में कुछ ढूँढता रहता है, जो आँख मारता है, जो प्यार की बातें करता है, जो महिलाओं की बात करते हुए पता नहीं क्या-क्या बोल जाता है!

बंगाल में पत्रकारों की पिटाई पर चुप्पी Editors Guild के ‘गुप्त’ रोग का परिचायक

भारत में ग़रीब ऑटो वालों से लेकर करोड़ों कमाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकीलों तक, सभी की अपनी एक अलग यूनियन है। इस एकता का प्रभाव यह होता है कि उनमें से अगर किसी एक को भी कोई दिक्कत आती है तो पूरा समूह उसके साथ खड़ा हो जाता है। ऐसे ही भारत में डिजाइनर पत्रकारों का भी एक प्रतिनिधिमंडल है, समूह है, दल है या यूँ कहिए गिरोह है। यह एडिटर्स गिल्ड है। एडिटर्स गिल्ड भी एक प्रकार के ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित है, जिसे सीधी भाषा में ‘गुप्ता’ रोग भी कहा जा सकता है। आख़िर शेखर गुप्ता जैसे ‘निष्पक्ष’ पत्रकार जिस गिरोह के अध्यक्ष हों, उसके बारे में और कहा भी क्या जा सकता है? चाहे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या फिर आईआईटी के हॉस्टलों में मिल रहे खाने की भी जाति बता देना, इन सब में शेखर बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहते हैं या यूँ कहिए कि वो ऐसे कार्यक्रमों के योजनाकार होते हैं।

एडिटर्स गिल्ड इतना हिम्मती है कि ये मेघालय हाईकोर्ट के किसी निर्णय पर तो अफ़सोस जता सकता है लेकिन इतना कुटिल भी है कि बंगाल में पत्रकारों के पीटे जाने पर चुप्पी साध सकता है। एडिटर्स गिल्ड राहुल गाँधी द्वारा किसी पत्रकार पर की गई टिप्पणी को लेकर भाजपा नेताओं की आलोचना कर सकता है। जी हाँ, आपने बिलकुल सही पढ़ा। जैसा कि हमें पिछले कुछ दिनों में पता चला है, प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना अब इस देश में पाप हो गया है। अगर प्रधानमंत्री गिरोह विशेष को इंटरव्यू नहीं देते तो सिर्फ़ वही नहीं बल्कि उनका इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार भी ख़राब हो जाते हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसी तरह एएनआई की सम्पादक स्मिता प्रकाश पर टिप्पणी की थी। उनकी भी गलती यही थी- प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना।

पत्रकारों के हितों की बात करने वाले एडिटर्स गिल्ड से जनता ने राहुल के उस बयान के ख़िलाफ़ बयान जारी करने की माँग की थी, जिसमें उन्होंने स्मिता के बारे में कहा था कि वो सवाल भी ख़ुद पूछ रही थीं और जवाब भी ख़ुद दे रही थीं। लोगों द्वारा लगातार आवाज़ उठाने के बाद एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी तोड़ते हुए एक बयान तो जारी किया था, लेकिन उसमें राहुल गाँधी द्वारा स्मिता प्रकाश पर की गई टिप्पणी को लेकर आपत्ति जताने से ज्यादा पुराने घिसे-पिटे मुद्दों पर भाजपा नेताओं को निशाना बनाया गया था। यही एडिटर्स गिल्ड आज एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उस दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली सहित कई बड़े नेताओं ने एडिटर्स गिल्ड पर निशाना साधा था। लेकिन एडिटर्स गिल्ड के मुखिया गुप्ता जी हैं। गुप्ता जी उन बातों को गुप्त ही रखते हैं, जिनसे ममता और राहुल जैसे नेताओं की छवि को चोट पहुँचे।

आइए सबसे पहले जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में ऐसा हुआ क्या, जिसके कारण एडिटर्स गिल्ड की आलोचना की जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल स्थित आसनसोल में सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों पर हमले किए। लाठी-डंडों से लैस तृणमूल के गुंडों ने सजीव और निर्जीव वस्तुओं के बीच फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ करते हुए गाड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और रास्ते में आए लोगों की पिटाई की। इसी जद में रिपब्लिक टीवी के पत्रकार भी आ गए। क्या महिला और क्या पुरुष, तृणमूल के गुंडों ने कोई फ़र्क़ नहीं किया। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा पोषित गुंडों ने वहाँ चुनाव कवर कर रहे पत्रकारों को खदेड़ दिया और कैमरामैन से लेकर क्रू में शामिल अन्य लोगों पर भी हमले किए।

बंगाल में हिंसा को लेकर न सिर्फ़ एडिटर्स गिल्ड बल्कि बुद्धिजीवियों के हर खेमे में चुप्पी है। भाजपा और संघ कार्यकर्ता केरल और बंगाल में मरने के लिए ही होता है, ऐसा मानकर चलने वाले बुद्धिजीवियों के समूह को उस वक़्त गहरा धक्का लगता है जब अदालत की कार्यवाही को रिपोर्ट करने से हाईकोर्ट किसी पत्रकार को रोक देता है। इन्हें तब और ज्यादा गहरा धक्का लगता है जब किसी भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार पर अन्य कारणों से एकाध हज़ार का अर्थदंड लगाया जाता है। लेकिन, जब कर्नाटक में एक-एक कर पत्रकारों को गिरफ़्तार किया जाने लगता है तो फिर एडिटर्स गिल्ड उसी ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित हो जाता है, जिसमें नियम है कि भाजपा-विरोधी शासित राज्यों में पत्रकारों पर ज़ुल्म भी हो तो उस पर कुछ नहीं बोलना है और भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार की सीढ़ियों से गिरकर ऊँगली में चोट भी लगती है तो एक ‘Condemnation Letter’ जारी कर दिया जाता है।

इस ‘गुप्त’ या ‘गुप्ता’ रोग की कुछ विशेषताएँ हैं। इसमें न सिर्फ़ बंगाल में पत्रकारों की पिटाई को लेकर आँख-नाक-कान बंद रखना होता है बल्कि विरोध प्रदर्शन करने उतरे सैंकड़ों पत्रकारों की आवाज़ को भी बड़ी चालाकी से नज़रअंदाज़ कर देना होता है। पिछले वर्ष बंगाल में हुए पंचायत चुनावों के दौरान भी पत्रकारों पर कम अत्याचार नहीं किए गए थे। लेकिन, एडिटर्स गिल्ड ने लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर कोई अपील नहीं की। अगर एडिटर्स गिल्ड चाहता तो पिछले चुनावों से सबक लेते हुए पहले से ही आवाज़ उठा सकता था ताकि इस चुनाव में तृणमूल और वाम के गुंडें ऐसा न करें, लेकिन अफ़सोस यह कि पत्रकारों का हितैषी होने का दावा करने वाले एडिटर्स गिल्ड ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

एडिटर्स गिल्ड अटॉर्नी जनरल द्वारा ‘द हिन्दू’ जैसे शक्तिशाली अख़बार की आलोचना करने पर उसके साथ खड़ा होकर अटॉर्नी जनरल के बयान की निंदा करता है लेकिन प्रेस और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सैंकड़ों पत्रकार, कैमरामैन और टेक्निकल स्टाफ जब कोलकाता की सड़कों पर उतर अपने ख़िलाफ़ हो रही हिंसा का विरोध प्रदर्शन करते हैं, तब इस गिरोह के कानों में जूँ तक नहीं रेंगती। अगर आप एडिटर्स गिल्ड के ट्विटर पेज की पड़ताल करेंगे तो पाएँगे कि वहाँ केवल न्यूज़लॉन्ड्री और ‘द प्रिंट’ जैसे ख़ास मीडिया पोर्टल्स के लिंक्स शेयर किए जा रहे हैं और उनका पिछला बयान 7 मार्च को आया था, जो मेघालय हाई कोर्ट के निर्णय को लेकर था। उससे पहले उन्होंने उन पत्रकारों के बचाव में बयान दिया था, जो पहले से ही वीआईपी स्टेटस रखते हैं।

अगर राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त जैसे हाई प्रोफाइल, सक्षम, अमीर और पाँच सितारा पत्रकारों को कोई ट्विटर पर ‘रे’ भी बोल दे तो एडिटर्स गिल्ड इस चीज की निंदा में खड़ा होने में देर नहीं लगाता लेकिन जो निचले स्तर के पत्रकार हैं, ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं या गिरोह विशेष के ‘दुश्मन’ चैनलों में काम कर रहे हैं, अगर उन्हें बंगाल में नंगा कर के भी घुमाया जाता है तो एडिटर्स गिल्ड तो छोड़िए, गुप्ताजी या उनके किसी भी साथी की तरफ से चूँ की आवाज़ भी नहीं आती। ‘द प्रिंट’ की पत्रकार को इंटरव्यू के दौरान चिदंबरम खुली धमकी देते हैं लेकिन ‘अपने’ अगर बेइज्जत भी करते हैं तो चलेगा क्योंकि ‘अपने तो अपने होते हैं।’ यहाँ तक कि गुप्ताजी की अपनी वेबसाइट ‘द प्रिंट’ भी इसी ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित है जिसमें बंगाल से जुड़ी ऐसी ख़बरों को प्राथमिकता नहीं दी जाती क्योंकि इससे ‘अपनों’ के ख़फ़ा होने का ख़तरा है।

सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है लेकिन मीडिया में इसे लेकर शांति है। बंगाल में तृणमूल और केरल में वाम द्वारा संचालित हिंसा राजनीतिक हिंसा है, जिसमें दोनों पक्षों की ग़लती होती है जबकि अगर कोई पेशेवर अपराधी किसी पत्रकार की व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण हत्या कर दे तो इसमें अपराधियों के तार भाजपा से जबरन जोड़ने की कोशिश की जाती है। आम लोगों पर हो रही हिंसा को गिरोह विशेष नज़रअंदाज़ करता है और अपने पेशे के लोगों पर हो रहे अत्याचार को भी छिपाता है। एडिटर्स गिल्ड को पता है कि किस मामले को उठाकर उसे बड़ा बना देना है और किस मामले को जनता तक पहुँचने से रोकना है। उसे पता है कि ‘अपनों’ को फ़ायदा कैसे पहुँचे और यह भी ध्यान रखना है कि उन्हीं ‘अपनों’ को नुकसान न हो। बाकि जो ‘दुश्मन’ हैं, उन्हें नुकसान पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़नी है।

ये हिन्दू ‘बनने’ का मौसम आ गया है, हिन्दू-विरोध पर आधारित था नेहरूवादी सेक्युलरिज्म: जेटली

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने विपक्षी पार्टियों में स्वयं को हिन्दू दिखाने के लिए लगी होड़ पर कटाक्ष करते हुए अपने फेसबुक ब्लॉग पर लिखा कि अब तो सबके हिन्दू ‘बनने’ का मौसम आ गया है। उन्होंने कल शाम लिखी इस पोस्ट में नेहरूवादी सेक्युलरिज्म, उसमें छिपे हिन्दू धर्म के लिए तिरस्कार को भी रेखांकित किया। जेटली ने उन दिनों को भी याद किया जब “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” के नारे वाले स्टीकरों को विश्व हिन्दू परिषद ने प्रारंभ किया था, और भाजपा समेत चुनिन्दा संगठनों ने उसे उठाया और उसके लिए समाज की मुख्यधारा से तिरष्कृत भी हुए।

‘हिन्दू धर्म को पिछड़ा मानने पर आधारित है नेहरूवादी सेक्युलरिज्म’

जेटली ने भारत में मुख्यधारा के (छद्म) सेक्युलरिज्म को हिन्दू धर्म/हिंदुत्व के विरोध पर आधारित बताते हुए लिखा कि इसके जनक  नेहरू का मानना था कि हिंदुत्व पिछड़ा, कट्टरपंथी और दकियानूसी/अन्धाकरवादी है। वह इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में रुकावट मानते थे।

जेटली ने इस सैद्धांतिक हिन्दूफोबिया पर आधारित सेक्युलरिज्म के निर्वाचन में प्रतिबिंबित होने की प्रक्रिया का भी सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। बकौल जेटली, बहुपक्षीय निर्वाचन वाली राजनीतिक प्रणाली का फायदा उठाते हुए कॉन्ग्रेस समेत कई दलों ने हिन्दू समाज को खंडित कर समुदाय विशेष और एक किसी जाति को अपना वोट बैंक बना कर रखा। समुदाय विशेष को डराने और उनका ध्रुवीकरण करने के लिए हिन्दू एकता के खिलाफ एक हौव्वा खड़ा करने की कोशिश की

उन्होंने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि इस गोलबंदी को तोड़ने वाली पहली आवाज 1980 और 1990 के दशक में श्री लालकृष्ण आडवाणी की थी। उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि हालाँकि मज़हबी या पंथिक आग्रह भारत के राष्ट्र-राज्य का आधार नहीं हो सकते, पर सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को निशाने पर भी नहीं लिया जा सकता है। उनकी आधुनिक भाषा ने एक बड़ी आबादी को आकर्षित करना शुरू किया (जोकि पहले संघ परिवार-भाजपा/जनसंघ को बूढ़े/दकियानूसी लोगों का गुट मानती थी)। बहुसंख्यक समुदाय हालाँकि अभी भी सहिष्णु और उदार था पर आडवाणी के आह्वाहन पर अनवरत क्षमायाचना की मुद्रा से बाहर आने लगा था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कैसे राजीव गाँधी का शाहबानो मामले में कथित अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए हर हद पार कर देना और मनमोहन सिंह का ‘अल्पसंख्यकों’ को देश के संसाधनों का पहला हकदार बताना कॉन्ग्रेस द्वारा हिन्दुओं में जागृत हो रही इस चेतना को नज़रंदाज़ करने को ही दिखाता है।

‘मध्य वर्ग की आकंक्षाओं में भी है हिंदुत्व’

जेटली ने हिंदुस्तान की बदलती हुई सामाजिक-आर्थिक स्थिति का ज़िक्र करते हुए इसे मध्यम वर्ग को एकत्रित और विस्तृत करने वाला बताया। उन्होंने इसे आकांक्षी, बिना कट्टरपंथी आग्रहों के धार्मिक और राष्ट्रीय सुरक्षा में दिलचस्पी लेने वाला बताया। वह सेक्युलरिज्म की परिभाषा में बहुसंख्यकों पर दुराग्रही हमला स्वीकार नहीं करेगा। उनकी राय 370, आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बहुत स्पष्ट और पुख्ता है। उन्होंने सबरीमाला और राम मंदिर के मुद्दों पर मध्यम वर्ग की क्रुद्ध प्रतिक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे आजतक हिन्दुओं को गलियाँ दे-देकर ही अपनी दुकानें चलाने वालों की ‘प्रतिक्रिया’ को लेकर चिंतित कर दिया है।

‘राहुल गाँधी: जेएनयू वालों की तरफदारी से जनेऊ-धारी तक का सफ़र’

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का उदाहरण देते हुए जेटली ने कटाक्ष किया कि 2004, 2009, 2014 के चुनावों में अपना पंथिक आग्रह छिपा कर बैठे राहुल गाँधी कैसे अचानक से “जनेऊ-धारी ब्राह्मण” बन बैठे, और मंदिरों के चुनावी चक्कर लगाने प्रारंभ कर दिए।

उन्हें घेरते हुए जेटली ने पूछा कि उनका महबूबा मुफ़्ती-उमर अब्दुल्ला के अप्रत्यक्ष अलगावादी सुरों पर क्या रुख है? अयोध्या और सबरीमाला के मुद्दे पर उनकी राय स्पष्ट करने की चुनौती जेटली ने राहुल गाँधी को दी। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी लपेटते हुए जेटली ने लिखा कि राहुल गाँधी अफस्पा हटाना और सेना की ताकत को कमजोर करना चाहते हैं। जेटली ने यह भी याद दिलाया कि राहुल गाँधी ने जेएनयू काण्ड के अभियुक्तों के समर्थन में विश्वविद्यालय का दौरा किया था और आजतक अपने वहाँ जाने को लेकर कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है।

‘दिग्विजय सिंह: हिन्दू आतंकवाद के पेटेंट-धारी बने गर्वित हिन्दू’

कॉन्ग्रेस के ही दूसरे नेता दिग्विजय सिंह, जिन्हें राहुल गाँधी का पहला राजनीतिक शिक्षक माना जाता है, को भी जेटली ने नहीं बख्शा। जेटली के बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी बताने वाले बयान और आजमगढ़ जाकर मारे गए आतकंवादियों के परिजनों से मिलने को याद दिलाते हुए जेटली ने कटाक्ष किया कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ सिद्धांत का दिग्विजय सिंह के पास पेटेंट है, क्योंकि इसका पहला उपयोग उन्होंने ही किया था। जेटली ने आगे लिखा कि आज राजनीतिक मजबूरियों के चलते दिग्विजय ‘गर्वित हिन्दू’ हो गए हैं।

आम आदमी पार्टी

अरविन्द केजरीवाल की ‘आप’ पर प्रहार करते हुए जेएनयू मामले में उनकी भूमिका भी याद दिलाई। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे न केवल देश-विरोधी नारे लगाने वालों का नैतिक और राजनीतिक समर्थन किया गया, बल्कि आम आदमी पार्टी के नियंत्रण वाले दिल्ली सचिवालय ने दिल्ली पुलिस को आरोपियों पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाली फाइल दबा कर रखी। जेटली ने आरोप लगाया कि आप का दिल जिहादियों को दिया हुआ है।

उन्होंने आप की पूर्वी दिल्ली प्रत्याशी आतिशी ( सिंह/मार्लेना) का भी जिक्र करते हुए उनके जीवन-भर अपनी मार्क्सवादी-वामपंथी पृष्ठभूमि को उभारने और अब चुनाव के लिए ‘क्षत्राणी/राजपूतानी’ बन जाने को दोहरे मानदंडों का चरम बताया।

‘नव-परिवर्तितों के लिए बड़ी सुविधा का मौसम हैं निर्वाचन’

हिंदुस्तान की अधिकांश आबादी को राष्ट्रभक्त और इससे इत्तेफाक न रखने वालों को हाशिए पर पड़े अपवाद बताते हुए जेटली ने इस बात कर अफ़सोस जाहिर किया कि हाशिए पर पड़े इन अपवादों को मीडिया और सोशल मीडिया उनकी वस्तुस्थिति से कहीं अधिक तवज्जो दे उनके शोर को विस्तार दे रहा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर चाहे जितनी हाइप पा लें, निर्वाचन में जनता उन्हें नकार देगी- यही लोकतंत्र की ताकत है। अंतिम वाक्य में उन्होंने निर्वाचन-काल को नए-नए ‘परिवर्तित’ हुए लोगों के परिवर्तन के लिए सबसे अनुकूल मौसम बताया।

‘हाँ, मै भी चौकीदार हूँ’ वायरल रैप सॉन्ग ने खोली कॉन्ग्रेस के झूठों की पोल, देखें वीडियो

राहुल गाँधी का जब हर झूठ बेनकाब होने लगा तो उन्होंने मोदी के ‘चौकीदार’ शब्द को पकड़ लिया। और, कह डाला कि “चौकीदार चोर है”, फिर से कॉन्ग्रेसियों और उनके पक्षकारों ने उनको यह फील करवा दिया कि मोदी जो अपनी सभाओं में ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगवाता है, यह उसी की काट है। बस इसी नारे की खुमारी में चुनाव की नैया पार हो जाएगी।

फिर क्या था राहुल गाँधी अपनी हर सभा में ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगवाने लगे। इससे एकबारगी बीजेपी समर्थक भी कुछ परेशान हुए कि यह कैसा ढीठ इंसान हैं, जो एक झूठ को नारे की तरह प्रयोग कर रहा है।

तब हर बार की तरह कमान फिर से मोदी जी ने संभाली और उन्होंने “मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू कर दिया। उनके देखा-देखी, मोदी समर्थकों, सरकार के मंत्रियों ने भी इसमें सक्रियता से भाग लेना शुरू कर दिया। और कमाल तो तब हो गया जब पीएम, भाजपा अध्यक्ष, गृह मंत्री, सरकार के अन्य वरिष्ठ मंत्री, भाजपा के शीर्ष पदाधिकारियों, और सोशल मीडिया पर पार्टी के समर्थकों ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ जोड़ लिया।

यहाँ तक की राहुल ने इस नारे में सुप्रीम कोर्ट को भी शामिल करना चाहा। इसके लिए भी उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा और कोर्ट से माँफी माँगनी पड़ी। कॉन्ग्रेस का यह वार भी नाकाम हुआ। खिसियाई कॉन्ग्रेस और उसके समर्थक भौचक्के रह गए। उनके पक्षकार जगह-जगह चौकीदारों के बाईट ले, इसकी काट ढूँढने लगे लेकिन कुछ काम नहीं आया। ‘मैं भी चौकीदार’ के शोर ने कॉन्ग्रेस और उनके पक्षकारों की एलिटिस्ट मानसिकता को बेनकाब कर दिया।

अब तो कॉन्ग्रेस को जवाब देने के लिए ऐसे कई यूजर जनरेटेड वीडियो आ चुके हैं। जिसमें देश के युवाओं ने खुद कमान संभल ली है, जो कॉन्ग्रेस को उसी की भाषा में करारा जवाब दे रहे हैं। कॉन्ग्रेस की स्थिति अब खिसियाई बिल्ली खम्भा नोचे वाली हो गई है। आप भी देखिए देश कैसे जवाब दे रहा है।

‘राहुल गाँधी सबके सामने पैदा हुए थे’, भाई राहुल की नागरिकता पर बहन प्रियंका का खुलासा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष भाई राहुल गाँधी पर दोहरी नागरिकता के आरोपों पर कॉन्ग्रेस महासचिव बहन प्रियंका गाँधी ने अपने भाई का बचाव करते हुए इसे बकवास करार दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा को संबोधित करने के बाद प्रियंका गाँधी ने कहा, “पूरा देश जानता है कि राहुल हिंदुस्तानी हैं। वे सबके सामने पैदा हुए, बड़े हुए। बाकी सब बातें बकवास हैं।”

राहुल गाँधी की बहन और रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी ने बीजेपी के आरोप को पूरी तरह बेबुनियाद, बकवास और ड्रामा बताया है। उन्होंने कहा, “आज ये पूछ रहे हैं राहुल जी यहाँ के नागरिक हैं? अब बताओ इस तरह का प्रचार चल रहा है। आप सब अच्छी तरह से मेरे परिवार को जानते हैं। हमें किसी को सबूत देने की जरूरत नहीं है। हमारा सबूत आप है। आप जानते हैं हमें।”

गृह मंत्रालय ने बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत के आधार पर प्रियंका गाँधी के भाई राहुल गाँधी को नोटिस जारी किया है। मंत्रालय ने कहा है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष 15 दिन के अंदर इस पर जवाब दाखिल करें। बीजेपी सांसद ने गृह मंत्रालय में शिकायती पत्र में कहा है कि राहुल एक ब्रिटिश नागरिक हैं। उन्होंने इसके साथ ही यह भी दावा किया कि ब्रिटेन की एक कंपनी बैकॉअप्स लिमिटेड में राहुल गाँधी निदेशक और सेक्रेटरी थे। साथ ही, यह दावा किया है कि कंपनी के दस्तावेजों में उन्होंने खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया है।

मंत्रालय के मुताबिक, स्वामी का कहना है कि ब्रिटिश कंपनी के 10 अक्टूबर, 2005 और 31 अक्टूबर, 2006 को भरे गए सलाना टैक्स रिटर्न में राहुल गाँधी की जन्म तिथि 19 जून, 1970 बताई गई है। उसमें गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया है। सोमवार को जारी नोटिस के अनुसार, “इसके अलावा 17 फरवरी, 2009 को इस कंपनी की परिसमापन अर्जी में भी राहुल गाँधी की नागरिकता ब्रिटिश बताई गई है। आपसे अनुरोध किया जाता है कि इस संबंध में आप एक सप्ताह के भीतर अपना तथ्यात्मक रुख मंत्रालय के समक्ष पेश करें।”

भाजपा ने कहा राहुल गाँधी की हर चीज संदिग्ध

इस पर बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, “ये जो पदचिह्न नागरिकता के हम देख रहे हैं, राहुल गाँधी के ये जो पदचिन्ह हैं आखिर कहाँ जाकर रुकते हैं? कौन-सा वाला राहुल सच्चा है, राहुल लंदन वाले या राहुल लुटियंस वाले? आखिरकार कौन सा ‘राहुल’ ऑरिजनल है, देशी या विदेशी?”

संबित पात्रा ने आगे कहा, “राहुल गाँधी ने अपनी नागरिकता के संबंध में खुद ही भ्रम की स्थिति पैदा की है और अब उन्हें ही इस पर स्पष्टीकरण देना होगा। इसमें किसी तरह की राजनीति नहीं है। देश उनसे स्पष्टीकरण माँग रहा है।”

डियर लड़कियो, 16 की उम्र खुद को परिपक्व बनाने की है… सेक्स करने की नहीं

प्रेम और आकर्षण दो ऐसे शब्द हैं जिनके बीच फर्क़ की रेखा धागे जितनी महीन होती है। हर लड़की के जीवन में वो उम्र आती है जब वो इन दोनों को एक जैसा समझती है और अपनी दबी इच्छाओं को प्रेम का नाम देकर किसी की ओर आकर्षित होती है। मेरे ख्याल से ये उम्र लगभग 13-14 के बाद शुरू हो जाती है और 18-19 तक तो रहती ही है। इस दौरान शरीर के बहुत सारे हॉर्मोन्स में उठा-पटक हो रही होती है। कभी लड़की किसी लड़के को पसंद करती है तो कभी लड़का या कोई अधेड़ उम्र का आदमी उसे मजबूर कर देता है कि वो उसे पसंद करे। यहाँ प्रेम की परिभाषाएँ आकर्षण के धरातल पर तय हो रही होती हैं, वास्तविक प्रेम का इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता।

कहते हैं किसी चीज को धीरे-धीरे ग्रहण करने में उसके हर गुण और तत्व महसूस होते हैं ताकि हम समझ पाएँ कि हमें क्या पसंद आया और क्या नहीं… अब फिर चाहे वो कोई खाद्य वस्तु है या फिर युवावस्था। 14-16 की उम्र वो पड़ाव होती है, जब एक लड़की बाल अवस्था को पीछे छोड़ कर युवावस्था में कदम रख रही होती है। ऐसे में ’16 बरस की बाली उमर को सलाम’ जैसे गाने उसे पहले ही बता देते हैं कि अब आकर्षण से भरे प्रेम करने की उम्र हो चुकी है। कोई नज़र भर देख ले तो लड़की को उसमें प्यार की लौ धधकती दिखाई देती है। नतीजतन अपनी शिक्षा, करियर सब कुछ वो लड़की उस इंसान को समर्पित कर देती है जिसके स्पर्श से पहली बार उन्हें अपनी युवा हो जाने की अनुभूति हुई हो। हॉर्मोन्स की लड़ाई को इस दौरान लड़कियाँ प्रेम का स्पर्श कहती हैं।

पाश्चात्य संस्कृति पर न बात करते हुए मैं अपने समाज पर बात करना ज्यादा पसंद करूँगी। अभी हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने मानवाधिकारों के संरक्षण के मद्देनज़र एक सलाह दी कि 16 साल की आयु के बाद आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) कानून के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए। मद्रास हाईकोर्ट ने ‘आज’ के संदर्भ में ऐसा सुझाव तो दे दिया… हो सकता है इस सुझाव पर अभी विचार-विमर्श हो, तर्क-कुतर्क हों और फिर एक फैसला आए। लेकिन क्या इसके दूरगामी परिणामों की कल्पना की गई?

हम उस समाज में रहते हैं जहाँ अंग्रेजी फिल्मों के प्रभाव ने फ्रेंच किस करने की झिझक को खत्म कर दिया है। और इस बात को विकल्प में लाकर खड़ा कर दिया है कि 16 की उम्र में लड़की का आपसी सहमति से सेक्स करना पॉक्सो कानून के दायर से बाहर हो जाना चाहिए। मैंने पहले ही कहा कि ‘आकर्षण’ की भावनाएँ मेरे मुताबिक 14 की उम्र में प्रबल होने लगती हैं। ये मैंने खुद अपने आस-पास महसूस किया है कि जिस उम्र में लड़की को बोर्ड की परिक्षाओं की तैयारी करनी होती है उस उम्र में लड़की अपने शरीर के अंगों के बारे में किसी ऐसे इंसान से डिस्कस कर रही होती है, जिसे उसमें सिर्फ़ छाती और योनि के सिवा कुछ नज़र नहीं आता।

सही और गलत में फर्क़ समझने की उम्र में लड़की अपना जीवन उस व्यक्ति को सौंप देने की सोच लेती है, जिसे कई बार खुद नहीं मालूम होता कि वो न केवल किसी के भविष्य से ख़िलवाड़ कर रहा है बल्कि उसकी मनःस्थिति को भी कमजोर कर रहा है। मद्रास हाईकोर्ट के सुझाव से मुझे कोई आपत्ति नहीं है। आधुनिक दौर है, सब आधुनिकता के हिसाब से होना चाहिए लेकिन ये भी न भूला जाए कि हमारी पृष्ठभूमि क्या है! क्या हम ऐसे आधुनिक फैसलों को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? क्या हम समझते हैं कि 16 की उम्र में कानूनी संरक्षण पाने के बाद एक लड़की के भीतर की भावनाओं को समझा जाएगा या लड़की खुद सही और गलत समझने में सक्षम होगी? या ऐसी शिक्षा-व्यवस्था और माहौल है देश में, जहाँ 16 साल की लड़की इतनी परिपक्व हो जाए कि जिंदगी से जुड़े फैसले ले सके?

हमारे सामने आज अनेकों उदाहरण हैं जिन पर अफसोस करने से ज्यादा लड़कियों को सीखना चाहिए कि आकर्षण की उम्र में और प्रेम की उम्र में फर्क़ होता है। जो लड़कियाँ बहकावे में आकर शिक्षा-करियर को दरकिनार कर देती हैं, उन्हें देखकर क्या वाकई लगता है कि उन्होंने समझदारी में कदम उठाया है। जिन्हें 14-16 की उम्र में माँ-बाप बिना किसी कारण दुश्मन लगने लगें… क्या वाकई उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वो प्रेम की परिभाषा को समझने लगी हैं? ‘नाबालिग प्रेम’ में किया चुनाव कितना सही कितना गलत होता है, यह उन खबरों से जानने की जरूरत है, जहाँ भागी हुई नाबालिग लड़कियाँ वापस घर लौटने या किसी ‘गंदी’ जगह पर रहने को मजबूर होती हैं।

मद्रास हाइकोर्ट का सुझाव एक ‘निश्चित’ पक्ष के लिए तो सही हो सकता है लेकिन यदि इसे व्यवहारिक तौर पर देखा जाए तो इसके क्या परिणाम हैं आप सिर्फ़ कल्पना करिए… उस समाज में जहाँ लड़की की शिक्षा को लेकर जद्दोजहद चल रही हो, जहाँ घर-घर जाकर लड़की और उसके माँ-बाप को समझाना पड़े कि उसे पढ़ाइए, सशक्त बनाइए, बाल विवाह मत करिए! वहाँ 16 की उम्र में आपसी सहमति से सेक्स को पोस्को एक्ट से हटाना क्या उन लोगों को बढ़ावा देना नहीं है, जो आज कानून के डर से ही सही लेकिन लड़की की शादी के लिए 18 साल तक का इंतजार करते हैं। ये विरोधाभास से भरी स्थिति है कि एक ओर हम बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं कि बच्चों का बचपन न खोए और दूसरी ओर हम इन बातों पर सुझाव पेश कर रहे हैं।

कानून में संशोधन का सुझाव देते हुए हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने कहा, “16 साल की उम्र के बाद आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंधों या शारीरिक संपर्कों या इससे जुड़े कृत्यों को पॉक्सो कानून के कठोर प्रावधानों से बाहर किया जा सकता है। और इस तरह के यौन शोषण की सुनवाई ज्यादा उदार प्रावधान के तहत हो सकती है, जिन्हें कानून में शामिल किया जा सकता है।”

अपने देश में ऐसे ‘उदार प्रावधान’ के बारे में सोचिए। उस देश में जहाँ भटके नौजवानों को सही दिशा में लाने के लिए तरह-तरह के अभियान सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं। तंबाकू पर चेतावनी लिखे होने के बाद भी लोग धड़ल्ले से सेवन कर रहे हैं। ऐसे में इस तरह के संशोधन के बाद कुछ ओछी मानसिकता वाले लोगों पर क्या फर्क़ पड़ेगा! अभी तक कानूनी डर से ही सही, लड़की को 18 की उम्र के बाद ‘शादी मटेरियल’ समझने वाले लोग 16 की उम्र में बहलाना शुरू नहीं करेंगे? और क्या इसका प्रभाव ‘लड़की’ की मानसिकता और शिक्षा पर नहीं पड़ेगा?

मैं ये नहीं कहती कि सेक्स बहुत बुरी चीज है, इसके कारण लड़कियों का भविष्य बर्बाद हो रहा है, लेकिन ये जरूर कह रही हूँ कि जिस उम्र में सेक्स को लीगल करने की बात हो रही है, हमारा समाज उसके लिए तैयार नहीं है और न ही उसके लिए 16 के उम्र की लड़कियाँ तैयार हैं। कानून के तहत कहिए या समाज के तहत, मुझे लगता है कि लड़की को 16 की उम्र में सेक्स के लिए कानूनी छूट देने से ज्यादा उसे परिपक्व बनाने पर गौर करना चाहिए।

अपने आस-पास की लड़कियों को देखिएगा और गौर करिएगा कि उनको किस चीज़ से अधिक फायदा पहुँचेगा। 16 की उम्र में सेक्स करने के अधिकार से या शिक्षा-करियर-समाज के प्रति जागरूक करके। समाज की दबी आवाज़ें अगर शिक्षा के लिए उठें तो निःसंदेह ही बदलाव आता है। मैं मानती हूँ कि लड़की की उम्र 18 से कम होने के कारण कोर्ट में बहुत से ऐसे केस चल रहे हैं, जिसमें आपसी-सहमति से बने संबंधों को भी अपराध बताया जाता है, लेकिन इसका विकल्प ये नहीं है कि आप उम्र को घटाकर 16 कर दें… हाई कोर्ट ने इस मामले पर अपना सुझाव दिया है… आप भी सोच-समझकर इस पर अपना अपना पक्ष रखिए।

चाय बेचने वाले दलित सिख अवतार सिंह को निर्विरोध चुना गया उत्तरी दिल्ली का मेयर

कुछ समय पहले जीवन गुजर-बसर के लिए चाय बेचने वाले भाजपा पार्षद अवतार सिंह को कल उत्तरी दिल्ली का नया मेयर चुन लिया गया है। इस पद पर पहुँचने वाले अवतार पहले दलित सिख हैं।

एनडीटीवी इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें दिल्ली भाजपा प्रमुख ने इस पद के लिए नामांकित किया था। जिसके बाद उत्तर दिल्ली नगर निगम की आमसभा में हुए मतदान में निर्विरोध चुन लिया गया।

दिल्ली भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने अवतार की जीत पर बात करते हुए कहा कि अवतार भाजपा के बहुत मेहनती कैडर है। अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत वह चाय बेचने की शुरुआत करके मेयर के पद तक पहुँचे हैं।

बता दें कि अवतार सिंह रामलीला में कई किरदार भी निभाते थे। इतना ही नहीं मीडिया खबरों की मानें तो बताया जाता है कि जीवनयापन करने के लिए वह एक फाइव स्टार होटल में कुली का काम भी कर चुके हैं।

अवतार सिंह से पहले शुक्रवार (मार्च 26, 2019) को भाजपा पार्षद सुनीता कांगड़ को सर्वसम्मत्ति से एक बैठक में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की मेयर चुना गया था। यह निर्णय निकाय की आम बैठक में लिया गया था।

आतंकी मसूद अजहर मामले में चीन बैकफुट पर, तकनीकी रोक हटाने को तैयार, घोषित हो सकता है वैश्विक आतंकी

पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को 1 मई को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। खबरों के मुताबिक, मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने की राह में रोड़े अटका रहा चीन संयुक्त राष्ट्र समिति में 1 मई को अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में लगाई गई तकनीकी रोक हटा लेगा। अगर मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया जाता है, तो ये मोदी सरकार की एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी, क्योंकि भारत काफी लंबे समय से खासकर, 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद से इसके लिए जोर दे रहा है , मगर चीन लगातार अपनी वीटो का इस्तेमाल कर रोड़ा अटका रहा है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया कि अगर मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किया जाता है, तो यह उसके लिए मौत की चेतावनी होगी। पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, फ्रांस और यूके के नेतृत्व में मसूद को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने की माँग की गई थी, लेकिन चीन ने उसका बचाव किया था। उन्होंने बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्राँस द्वारा 13 मार्च को रखे गए प्रस्ताव पर चीन के तकनीकी पकड़ हटाने की उम्मीद है। वहीं सभी सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों ने इस कदम को पहले ही मंजूरी दे दी है।

वहीं, पाकिस्तान भी मसूद अजहर को ब्लैक लिस्ट करने के लिए तैयार है, मगर इसके लिए उसने एक शर्त भी रख दी है कि इसका आधार पुलवामा हमला नहीं होना चाहिए। रविवार (अप्रैल 28, 2019) को एक पाकिस्तानी टीवी शो में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद फैसल ने कहा, “हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा मसूद अजहर को वैश्विक आतंकियों की सूची में डालने से कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते इसका आधार पुलवामा हमला न हो।” फैसल ने कहा, “पहले भारत को इस बात का सुबूत देना होगा कि पुलवामा हमले से मसूद अजहर का कोई संबंध है। इसके बाद ही हम उसको प्रतिबंधित करने के बारे में बात कर सकते हैं। पुलवामा हमला एक अलग मुद्दा है। हम कई बार कह चुके हैं कि भारत कश्मीर में स्थानीय विरोध को कुचलने की कोशिश कर रहा है।”

हालाँकि, 50 वर्षीय अजहर जानलेवा बीमारी से ग्रसित है, लेकिन फिर भी वो अपने भाई अतहर इब्राहिम और रऊफ असगर की मदद से भारत के खिलाफ हमलों में सक्रिय भूमिका निभाता है। गौरतलब है कि 14 फरवरी को पुलवामा में हुए सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। इससे पहले 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले का भी जिम्मेदार भी यही आतंकी संगठन  है।

श्री लंका हमलावर और ज़ाकिर नायक का ‘फैन’ रियास केरल से गिरफ़्तार, आतंकी वारदात की कर रहा था तैयारी

एनआईए ने केरल से एक आतंकी को गिरफ़्तार किया है जो श्री लंका बम धमाकों में शामिल आतंकवादी ज़हरान हाशिम का अन्यायी है और खूँखार आतंकी संगठन आईएसआईएस से सहानुभूति रखता है। केरल से दबोचे गए इस शख़्स का नाम रियास अबूबकर है और ये किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने की साज़िश रच रहा था। वह केरल में आत्मघाती हमला करने की फ़िराक़ में था, ऐसा उसने एनआईए के सामने स्वीकार किया है। श्री लंका में हुए सीरियल ब्लास्ट में 360 से भी अधिक लोगों की जानें जा चुकी है और उसका साज़िशकर्ता हाशिम एक इस्लामी कट्टरपंथी मौलवी था, जिसके भड़काऊ भाषण तमिल में हुआ करते थे। अबूबकर उन्हीं भाषणों को लगातार सुन रहा था और उसके शैतानी दिमाग में भी कोई आतंकी वारदात को अंजाम देने की बात पनप रही थी।

29 वर्षीय अबूबकर एक अन्य इस्लामी उपदेशक ज़ाकिर नाइक के वीडियो भी देख रहा था। बता दें कि ज़ाकिर नाइक एक इस्लामिक ‘प्रवचनकर्ता’ है जो अपने वीडियो के माध्यम से जिहाद फैलाता है और आतंक को बढ़ावा देता है। भारतीय सरकार ने उसके एनजीओ पर प्रतिबन्ध लगा रखा है। इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन का संस्थापक ज़ाकिर एक भगोड़ा है और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को उसकी तलाश भी है। भारत में आईएस मॉड्यूल के ख़ुलासे के बाद से सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हैं और श्री लंका में हुए हमलों के बाद ख़ास सतर्कता बरती जा रही है। इसी क्रम में गिरफ़्तार आतंकी से एनआईए द्वारा लगातार पूछताछ की गई। रियास अबूबकर का नाम अबू दुजाना भी है।

अबूबकर लम्बे समय से एक अन्य भगोड़ा आतंकी अब्दुल राशिद अब्दुल्ला से भी संपर्क में था। इसके लिए उनसे ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग किया था। वह अब्दुल राशिद अब्दुल्ला के ऑडियो क्लिप्स सूना करता था और उसे वो वीडियो क्लिप ख़ास तौर पर पसंद था। जिसमें राशिद ने भारत में आतंकी हमले करने जैसी भड़काऊ बातें कही थीं। इस ऑडियो को उसने सोशल मीडिया पर भी वायरल किया था। इसके अलावा अबूबकर वालापट्टनम इस्लामिक स्टेट मामले में आरोपित अब्दुल खयूम से भी ऑनलाइन बातें कर रहा था। आतंकरोधी एजेंसियों का मानना है कि खयूम अभी सीरिया में है।

दरअसल, एनआईए को सूचना मिली थी कि 4 लोगों का एक समूह अब्दुल राशिद, अशफ़ाक़ मज़ीद, और अब्दुल खयूम से संपर्क में था। ये तीनों अभी अफ़ग़ानिस्तान या सीरिया में भाग खड़े हुए हैं और वहीं रह रहे हैं। इस ख़बर की पुष्टि के बाद एनआईए ने तलाशी अभियान शुरू किया। ये तलाशी अभियान रविवार (अप्रैल 28, 2019) कासरगोड और पलक्कड़ में चलाए गए। जुलाई 2016 में ख़बरें आई थीं कि कासरगोड के 15 युवा आतंकी संगठनों के झाँसे में आकर अफ़ग़ानिस्तान या सीरिया चले गए हैं। अबूबकर को गुरुवार को कोच्चि में एक एनआईए अदालत में पेश किया जाएगा।

30000 मदरसों को सरकारी नियंत्रण में लिया जाएगा, चरमपंथ और आतंक पर दुनिया के आगे झुका Pak

आतंकवाद और आतंकियों की परवरिश करने वाला पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच एक बड़ा एक्शन लेने के लिए मजबूर हुआ है। मदरसों के जरिए फैल रही चरमपंथी सोच से निपटने के लिए पाकिस्तान सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। दरअसल, पाकिस्तान ने सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को 30 हजार से अधिक मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में लाने का ऐलान किया है। पाकिस्तानी सरकार इन मदरसों को नियंत्रण में लेकर एक नए और बेहतर सिलेबस लागू करने वाली है। जिसमें नफरत भरे भाषण को हटाकर छात्रों को सभी धर्मों का सम्मान करने की तालीम दी जाएगी।

पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक मेजर जनरल आसिफ गफूर ने रावलपिंडी में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए बताया कि 1947 में पाकिस्तान में 247 मदरसे थे, जो कि 1980 में बढ़कर 2861 हो गए। हालाँकि, उन्होंने इस दौरान ये भी माना कि मौजूदा वक्त में पाकिस्तान में 30 हजार से ज्यादा मदरसे चलाए जा रहे हैं, मगर साथ ही उन्होंने मदरसों का बचाव करते हुए कहा कि इन 30 हजार मदरसों में से करीब 100 मदरसे ही आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। गफूर ने कहा कि सभी मदरसों को शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लगाया जाएगा और इसके तहत मदरसों के छात्रों को एक डिग्री भी दी जाएगी, जो शिक्षा बोर्ड से संबद्ध होगी।

उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रोग्राम पर शुरुआती तौर पर करीब ₹200 करोड़ का खर्च आएगा, तो वहीं हर साल तकरीबन ₹100 करोड़ के खर्च आने की संभावना है। इस प्रोग्राम के तीन चरण होंगे। पहले चरण के तहत एक बिल तैयार किया जाएगा, जो लगभग एक महीने में तैयार हो जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा और तीसरे एवं अंतिम चरण में बिल को लागू कराने का काम किया जाएगा।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गफूर ने यह भी माना कि पाकिस्तान में हिंसक चरमपंथी इस्लामी संगठन और जिहादी मौजूद हैं और अब तक की पाकिस्तानी सरकारें इससे लड़ने में नाकाम रहीं हैं। आसिफ गफूर ने कहा, “हमने हिंसक चरमपंथी संगठनों और जिहादी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है और हम उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं।” साथ ही उन्होंने कहा कि उनके देश की पूर्ववर्ती सरकारें इस सबसे निपटने में नाकाम रहीं।