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झारखंड में टूटा महागठबंधन, राजद और कॉन्ग्रेस दोनों ने चतरा से उतारे उम्मीदवार

लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर उठापटक जारी है। झारखंड में महागठबंधन के सहयोगी दलों के बीच घमासान कम होने का नाम नहीं ले रहा है। झारखंड में कॉन्ग्रेस और आरजेडी अब आमने-सामने दिख रही है। महागठबंधन में सीटों के बँटवारे के दौरान राजद के खाते में पलामू की सीट तो कॉन्ग्रेस के खाते में चतरा की सीट आई थी। राजद लगातार चतरा सीट पर लड़ने की बात कह रही थी, लेकिन कॉन्ग्रेस ने साफ कर दिया था कि इस सीट पर वो समझौता नहीं करने वाली है। मगर राजद ने पलामू के साथ-साथ चतरा से भी शुक्रवार (अप्रैल 5, 2019) को अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया जिसके बाद कॉन्ग्रेस ने भी देर शाम अपने प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी।

चतरा सीट के लिए राजद उम्मीदवार सुभाष यादव के नामांकन दाखिल करने के वक्त मौजूद रहने के लिए तेजस्वी यहाँ पहुँचे थे। इस दौरान तेजस्वी ने एक सभा को संबोधित किया और साथ ही कॉन्ग्रेस से चतरा सीट से प्रत्याशी न उतारने की अपील की थी, लेकिन कॉन्ग्रेस ने राजद की अपील को दरकिनार करते हुए चतरा सीट से उम्मीदवार के तौर पर मनोज कुमार यादव के नाम का ऐलान कर दिया है। हालाँकि तेजस्वी ने यह भी कहा था कि अगर चतरा सीट पर कॉन्ग्रेस के साथ सहमति नहीं बनती है, तो इस सीट पर दोनों दलों के बीच दोस्ताना संंघर्ष होगा और कॉन्ग्रेस की तरफ से प्रत्याशी उतारने के बाद ये बात साफ हो गई है कि अब चतरा सीट पर फ्रेंडली फाइट देखने को मिलेगी।

चतरा संसदीय क्षेत्र से राजद प्रत्याशी सुभाष यादव के नामांकन के बाद जिला मुख्यालय स्थित जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में सभा का आयोजन किया गया। इस मौके पर बिहार विधानसभा के विधायक, झारखंड प्रदेश विधायक, झारखंड प्रदेश अध्यक्ष गौतम सागर राणा सहित कई नेताओं ने शिरकत की। इस मौके पर चतरा के पूर्व विधायक एवं झाविमो नेता सत्यनंद भोक्ता ने भी राजद का दामन थाम लिया। तेजस्वी यादव ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि देश और संविधान को बचाने के लिए भाजपा को हराना जरूरी है। उन्होंने कहा कि झारखंड में महागठबंधन मजबूत है, मगर इसके साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि अगर कोई गठबंधन तोड़कर, पार्टी छोड़कर जाना चाहता है, तो उसे बाँधकर नहीं रखा जा सकता।

गौरतलब है कि महागठबंधन के बीच सीट बँटवारे के फार्मूले के मुताबिक, कॉन्ग्रेस को 7 सीटें, झामुमो को 4 जबकि झारखण्ड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) को 2 सीटें और राजद को 1 सीट दी गई थी।

PIB MEME भाग-2 : रामाधीर सिंह ने वोटर्स से कहा ‘तुमसे हो जाएगा बेटा’

PIB सोशल मीडिया के माध्यम से MEME बनाकर जनता से मतदान करने का सन्देश दे रहा है। PIB कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर MEME के द्वारा युवाओं से मतदान के दिन मोबाइल पर PUBG खेलने की जगह मतदान करने का निर्देश देने की अपील करते देखा गया। 

वोटर्स को जागरूक करने की इस पहल में PIB ने कुछ और MEMES जारी किए हैं। PIB ने इस बार गैंग्स ऑफ़ वासेपुर से लेकर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे और बॉर्डर फिल्म के दृश्यों का इस्तेमाल किया है।

रामाधीर सिंह कह रहे हैं कि इस बार आप वोट देने जा रहे हो तो आपके लच्छन ठीक हैं
मथुरादास एक बार फिर बहाना बना ही रहा था कि सन्नी पाजी ने क्लास लगा दी। तुम भी मतदान के दिन बहना मत बनाना बच्चू वरना ढाई किलो का हाथ उठ जाएगा
अगर सिमरन के घरवालों को मनाना है, तो इस बार वोट कर आइए और सिमरन के पापा की नजरों में बन जाओ ‘रेस्पोंसिबल’

PIB की मतदान के लिए ये पहल अच्छी और एकदम रोचक है और युवाओं द्वारा सोशल मीडिया पर इन्हें खूब शेयर किया जा रहा है। क्रिएटिव कामों को देखकर अचानक ही मुँह से निकल पड़ता है ‘वाह मोदी जी वाह’।

इन 600 टुटपुंजिया कलाकारों का निशाना भी पुलवामा फिदायीन की तरह हिंदुत्व ही है

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब कुछ ही दिन बाकी हैं। भाजपा और मोदी सरकार को रोकने के लिए विपक्ष से लेकर अवार्ड वापसी गैंग और नेहरुवियन सभ्यता के तमाम बड़े और छोटे समुदाय मैदान में उतरकर अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

इस बार के आम चुनावों की ख़ास बात ये है कि लोकतंत्र के इस त्यौहार में इतनी बड़ी मात्रा में और बढ़-चढ़कर शायद ही आज़ादी के इतने वर्षों तक किसी ने भागीदारी और दिलचस्पी दिखाई हो। यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा सकता है कि तमाम ऐसे लोग, जिनके चेहरे और नाम तक लोग भूल चुके थे, उन्हें भी दोबारा से कैमरा, न्यूज़ और व्यूज में सफलतापूर्वक जगह मिली है, फिर चाहे अपने अस्त हो चुके फ़िल्मी करियर के बाद राजनीति के द्वारा रोजगार ढूँढती हुई उर्मिला मातोंडकर हो या फिर एक के बाद एक फ़्लॉप फिल्मों के कारण बदहवास स्थिति में घूमते नसीरुद्दीन शाह हों।

हिन्दू धर्म को सबसे ज्यादा उग्र बताकर उर्मिला मातोंडकर ने भी राजनीति के खानदान विशेष की नजरों में एक बार में ही अच्छी रैंक हासिल कर ली है, उनके इस बयान के बाद अब और भी TV स्क्रीन पर आने के मौके मीडिया गिरोह द्वारा दिए जाएँगे। इस लिस्ट में सबसे अच्छी पहचान नसीरुद्दीन शाह ने हासिल की है और इस बार मोदी के खिलाफ वोट करने की अपील करने के लिए इन 600 गुमनाम कलाकारों को ढूँढकर लाने की जिम्मेदारी भी विपक्ष ने नसीरुद्दीन शाह को ही सौंपी है।

अभिव्यक्ति की आजादी को मोहरा बनाकर हर दूसरे दिन खुलेआम हिन्दू धर्म और भारत की सहिष्णुता को बदनाम करने वाले नसीरुद्दीन शाह ने जमकर लहरिया लूटी है। उन्हीं के क़दमों पर चलते हुए इन पिछले 5 सालों में असहिष्णुता के दीवाने कई क्रांतिकारियों ने जन्म लिया, जो किसी ना किसी तरह से बेरोजगारी और गुमनामी की मार झेल रहे थे। इसलिए अभिव्यक्ति और असहिष्णुता का कारोबार खूब बिका है।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर आजकल एक नई सनसनी के जरिए ये गुमनाम कलाकार लोगों का ध्यान खींचने में एक बार दुबारा सफल हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह, गिरीश कर्नाड और उषा गांगुली सहित 600 से अधिक थिएटर हस्तियों ने एक पत्र पर हस्ताक्षर करके लोगों को ‘भाजपा और उसके सहयोगियों’ को सत्ता से बाहर करने के लिए कहा है।

इस पत्र में कहा गया है कि भारत और उसके संविधान का विचार खतरे में है। आर्टिस्ट यूनाइट इंडिया वेबसाइट पर बृहस्पतिवार शाम (मार्च 04,2019) को 12 भाषाओं में यह पत्र जारी किया गया है। इसमें लिखा है कि आगामी लोकसभा चुनाव देश के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण है और बीजेपी ने हिंदुत्व के गुंडों को नफरत और हिंसा की राजनीति करने के लिए स्वतंत्र कर दिया है

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में शांता गोखले, महेश एलकुंचवार, महेश दत्तानी, अरुंधति नाग, कीर्ति जैन, अभिषेक मजुमदार, कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, लिलेट दुबे, मीता वशिष्ठ, एम के रैना, मकरंद देशपांडे और अनुराग कश्यप शामिल हैं। इनमें लगभग 600 लोग ऐसे हैं, जिन्हें शायद ही कोई ठीक से जानता होगा।

मजे की बात है कि इन 600 में से 599 नाम के अलावा सिर्फ नसीरुद्दीन शाह ही अकेला ऐसा व्यक्ति है, जो वक़्त-बेवक़्त अपनी उल-जुलूल बयानबाजी और फ़्लॉप फिल्मों के रिकॉर्ड की वजह से चर्चा में बने रहने में सफल रहे हैं।

अगर बारीकी से देखा जाए तो इन 600 कलाकारों की वर्तमान हक़ीक़त भी शायद उसी नयनतारा सहगल जैसी है, जिसके जीवन की कुल अचीवमेंट कश्मीर समस्या के मुख्य अभियुक्त जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयालक्ष्मी पंडित की बेटी होना है और दूसरा इसी पहचान के कारण साहित्य अकादमी पुरस्कार पाना है। लेकिन दुखद बात ये कि वो उस पुरस्कार को भी अब लौटा चुकी हैं।

एक संयुक्त बयान में इन गुमनाम और चर्चा में आने के शौक़ीन 600 कलाकारों का मानना है कि आज भारत का विचार खतरे में है। बात सही भी है, हो सकता है कि ‘भारत का विचार’ से उनका तात्पर्य अपने पसंदीदा खानदान के युवराज राहुल गाँधी से हो और उनको सत्ता में देखना हो। वास्तविकता ये है कि ये सदियों से सत्ता में बैठा खानदान इनका आसमान बन चुका है और इसके सरक जाने के कारण ही ये सब गिरोह बौखला रहे हैं।

इन 600 कलाकारों को मनचाहे पद और पुरस्कार देने वाले लोग अब संसद में मात्र 45 की संख्या में सिमट गए हैं। आज सत्तापरस्त और राजनीति के इस खानदान विशेष की हालात ये है कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए ये अपने पारम्परिक अमेठी से दक्षिण की ओर अपना सेफ जोन तलाशने निकले हैं। इसलिए इनके ‘लोकतंत्र  और संविधान ’ का खतरे में होना स्वाभाविक है। मोदी सरकार द्वारा जिन संस्थानों का ‘दम घोंटे’ जाने का जिक्र ये 600 लोगों का बेरोजगार समूह कर रहा है, वो संस्थान, कॉन्ग्रेस कार्यालय और राजमाता सोनिया गाँधी का कार्यालय हो सकता है।

इन सबसे ऊपर इन 600 खलिहर लोगों ने जो बात अपने पत्र में लिखी है वो है ‘हिंदुत्व के गुंडों’ का वर्णन! गुमनामी में जी रहे इन 600 लोगों ने भी सस्ती लोकप्रियता के लिए वही विधि अपनाई है, जो पुलवामा आतंकी हमले में समुदाय विशेष के उस भटके हुए फिदायीन ने अपनाई थी, यानि हिंदुत्व पर हमला! विपक्ष ने हमेशा से ही अल्पसंख्यकों के वोट को रिझाने के लिए हिन्दुओं को आतंकवाद और गुंडागिर्दी से जोड़ने का आसान तरीका अपनाया है। इन 5 सालों में देखा गया है कि कोई ना कोई भटका हुआ व्यक्ति हिंदुत्व को उग्र संगठन और हिंसक धर्म की पहचान देने की पुरजोर कोशिशें करता नजर आया है।

इन 600 लोगों ने कहा है कि विकास के वादे के साथ पाँच साल पहले सत्ता में आई बीजेपी ने हिंदुत्व के गुंडों को नफरत और हिंसा की राजनीति करने के लिए स्वतंत्र कर दिया है। यही वजह है कि हम अपील करते हैं कि लोग संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकाचार की रक्षा करने और कट्टरता, घृणा और सत्ता से बाहर कुछ न सोचने वालों के खिलाफ वोट करें।

शायद इस पत्र को लिखने से पहले इन बेरोजगार कलाकारों को ये ध्यान नहीं रहा कि इनके अन्नदाता राहुल गाँधी जनेऊ और मानसरोवर की फोटोशॉप यात्राओं द्वारा हिन्दुओं के बीच अपनी छवि बनाने का प्रयास कर रहे हैं। या फिर ये भी हो सकता है कि अपने मालिकों द्वारा मुस्लिम लीग के साथ हुई नवीन सांठगांठ ने ही इन कलाकारों को यह बात कहने का हौंसला दिया हो।

पश्चिम बंगाल से लेकर केरल में, सम्पूर्ण उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक में जबरन धर्म परिवर्तन से लेकर हिन्दू नाबालिग लड़कियों के अपहरण और हिन्दूओं के खुलेआम निर्मम हत्या किए जाने तक पर मौन धारण कर लेने वाला मीडिया गिरोह पाकिस्तान जैसे देश के प्रति अपनी ममता और करुणा उड़ेलता देखा गया है। हर दूसरी आतंकवादी घटना, हिंसक गतिविधि, क़त्ल, अपहरण, बलात्कार में हिन्दुओं को शिकार बनाया जाता रहा है, लेकिन फिर भी हिन्दुओं को हिंसक बताना नया फैशन बनकर उभरा है। इन पाकिस्तान परस्तों ने भी इस मामले में पाकिस्तान की ही ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’ वाली रणनीति को अपनाया है।

अगर देखा जाए तो वास्तव में हिन्दुओं को इस देश में इस तरह के बयान देने चाहिए, लेकिन हक़ीक़त एकदम उलट है। हिन्दुओं को इस देश में एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा पीड़ित किया जाता रहा है, उनकी आस्थाओं को हर दूसरे दिन अपमानित करने वाले वो लोग हैं, जिन्हें इस देश ने अल्पसंख्यक होने के नाम पर खुली छूट दी है और अन्य की तुलना में ज्यादा अधिकार दिए हैं। हिन्दुओं के अधिकारों पर बात करना आपको सांप्रदायिक बना देता है, अपनी पहचान हिन्दू बताने पर आपको उग्र घोषित कर दिया जाता है।

खैर, दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है। अगर हिन्दुओं को हिंसक बताकर और मोदी के खिलाफ वोट करने की अपील से इन 600 गुमनामी में जी रहे कलाकारों को कुछ पहचान और सस्ती लोकप्रियता मिलती है, तो इन्हें अवश्य इस तरह के दो-चार और बयान देकर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करना चाहिए। वैसे भी मोदी सरकार के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी का जितना फायदा इन भटके हुए कलाकारों ने उठाया है, उतना शायद रोजाना TV चैनल पर आकर बागों में बहार है जैसे सवाल पूछ्कर TRP का रोना रोने वाले और फेसबुक पर TV ना देखने की अपील करने वाले व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के कुलपति ने भी नहीं उठाया होगा।

‘न मुस्लिमों के लिए कुछ किया न हिन्दुओं के लिए करूँगा’, PM मोदी ने ऐसा क्यों कहा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एबीपी को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कई महत्वपूर्ण बातें की इसमें उन्होंने हिन्दुस्तान के मुस्लिमो से अपने रिश्ते के एक सवाल के जवाब में कहा कि केंद्र की जितनी भी लाभकारी योजनाएँ चल रही हैं वो सभी सबका साथ, सबका विकास के मंत्र पर चल रही हैं।

ख़बर के अनुसार, पीएम मोदी ने कहा कि मुस्लिमों की स्थिति के आकलन के लिए सच्चर कमेटी गठित की गई थी, उस वक़्त वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, इसके बाद जब सच्चर कमेटी गुजरात पहुँची तो पीएम मोदी से सवाल पूछा गया कि उन्होंने उस समय मुस्लिमों के लिए क्या किया? इसके जवाब में पीएम मोदी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि गुजरात के मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं किया और न ही कुछ करेंगे, इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने हिन्दुओं के लिए भी कुछ नहीं किया और न ही कुछ करेंगे।

अपनी इस बात पर प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि उनके द्वारा सच्चर कमेटी को बताया गया कि उनकी सरकार का लक्ष्य गुजरात के एक-एक परिवार के लिए योजना बनाना है। एक-एक परिवार का विकास करने के लिए उनकी सरकार योजनाएँ बनाती है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोई भी योजना किसी जाति विशेष के लिए नहीं बननी चाहिए।

पीएम मोदी ने अपने साक्षात्कार में यह संदेश देने की पूरी कोशिश की है कि वो कभी हिन्दू और दूसरे समुदाय में कोई भेद नहीं रखते और शासन का यह काम बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि वो देश को जाति और वर्ग में बाँटे। इसीलिए केंद्र सरकार अपने मूल मंत्र सबका साथ, सबका विकास के तहत काम कर रही है और आगे भी करती रहेगी।

राहुल गाँधी ने Unitech प्रॉपर्टी को 2019 के हलफनामे में डाला, लेकिन यह 2014 में क्यों गायब था?

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने गढ़ में संभावित हार को देखते हुए अमेठी के अलावा, ‘सुरक्षित विकल्प’ के रूप में वायनाड से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरा। राहुल को डर है कि भाजपा के उम्मीदवार और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से हार सकते हैं, जो 2014 में अमेठी में हारने के बावजूद भी अपने निर्वाचन क्षेत्र में अथक काम कर रहीं हैं। हालाँकि, वायनाड का यह ‘सुरक्षित सीट’ राहुल गाँधी के लिए कुछ नए सवाल खड़े कर सकती है, जिनका उनके लिए जवाब देना और भी मुश्किल होगा।

राहुल गाँधी ने गुरुवार को वायनाड, केरल से अपना नामांकन दाखिल किया, जबकि उनकी बहन प्रियंका ने वायनाड में लोगों से आग्रह किया कि वह उनके भाई का ख्याल रखें। राहुल गाँधी के चुनावी हलफनामे ने उन संपत्तियों के बारे में गंभीर सवाल खड़े किए हैं जो ऑपइंडिया ने अपने पहले के कई खुलासों में देश के सामने रखा था।

अपने 2019 के चुनावी हलफनामे में, राहुल गाँधी ने सिग्नेचर टॉवर्स-II में दो संपत्तियों की खरीद की सूची दी है, जो यूनिटेक के स्वामित्व में है। चुनावी हलफनामे के मुताबिक, राहुल गाँधी ने घोषणा की है कि उन्होंने सिग्नेचर टावर-II में ऑफिस स्पेस B-007 और B-008, दो प्रॉपर्टी खरीदी हैं। शपथ पत्र में कहा गया है कि ऑफिस स्पेस B007, 1.65 करोड़ रुपए में और B008, 6.27 करोड़ रुपए में खरीदा गया था।

दिलचस्प बात यह है कि हलफनामे में कहा गया है कि ये सम्पत्तियाँ 1 दिसंबर 2014 को खरीदी गई थीं।

राहुल गाँधी का चुनावी हलफ़नामा -2019

इससे पहले, ऑपइंडिया ने बताया था कि कैसे राहुल गाँधी ने 2010 में यही दो प्रॉपर्टी खरीदी थीं। अक्टूबर 2010 में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा कॉन्ग्रेस को 2 जी के सम्बन्ध में नोटिस का जवाब देने के लिए कहा गया था और 2 जी पर कैग रिपोर्ट लोकसभा में पेश किए जाने से कुछ हफ्ते पहले, राहुल गाँधी ने यूनिटेक के गुड़गाँव में ‘सिग्नेचर टॉवर-II में दो ऑफिस खरीदने के लिए यूनिटेक के साथ एक करार किया था। राहुल गाँधी ने इस आलीशान टॉवर में B-007 और B-008 के लिए 1.44 करोड़ रुपए और 5.36 करोड़ रुपए का भुगतान किया था। शेष भुगतान संपत्तियों के कब्जे के बाद भुगतान करना था।

व्हिसलब्लोअर्स ने ऑपइंडिया से बात करने के बाद, रिपब्लिक टीवी ने उन दस्तावेजों को भी जारी किया जहाँ राहुल गाँधी ने खरीद के कागजात पर हस्ताक्षर किए थे।

स्रोत -रिपब्लिक TV

यही प्रॉपर्टी, B007 और B008 जो अक्टूबर 2010 में राहुल गाँधी द्वारा खरीदे गए थे, 2019 के चुनावी हलफनामे में प्रकट हुए हैं जिसे राहुल गाँधी ने वायनाड में दायर किया है।

दिलचस्प बात यह है कि जैसा कि हमने पहले बताया था, राहुल गाँधी के 2014 के चुनावी हलफनामे में, इन दोनों संपत्तियों को राहुल गाँधी द्वारा सूचीबद्ध नहीं किया गया था।

अक्टूबर 2010 में संपत्तियों को खरीदने के बाद भी 2014 में, राहुल गाँधी ने अपने चुनावी हलफनामे में केवल अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा के साथ संयुक्त रूप से ख़रीदा गया फार्महाउस ही सूचीबद्ध किया था।

राहुल गाँधी का चुनावी हलफ़नामा -2014

यूनिटेक 2 जी घोटाले में शामिल होने के लिए बदनाम है। 2008 की शुरुआत में, यूनिटेक की सहायक कंपनी, यूनिटेक वायरलेस को सरकार द्वारा पहले आओ, पहले पाओ की नीति के तहत 1,658 करोड़ रुपए में अखिल भारतीय दूरसंचार लाइसेंस प्रदान किया गया था। इसके बाद, उसने अपने 67% शेयर नॉर्वे के टेलीनॉर को 6,120 करोड़ रुपए में बेच दिए। इससे कंपनी का मूल्य 9,100 करोड़ रुपए हो गया। इस हिस्सेदारी की बिक्री तब हुई जब कंपनी के पास कोई अन्य संपत्ति नहीं थी। इसलिए, यह मानना उचित था कि यह उस लाइसेंस का मूल्य था जो उसके पास था।

फिर, कैग रिपोर्ट ने घोटाले से पर्दा उठा दिया। इसमें कहा गया है कि सस्ती स्पेक्ट्रम बिक्री से सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ जबकि यूनिटेक जैसी निजी संस्थाओं को लाभ पहुँचाया गया। आगे यह आरोप भी लगाया गया कि इस प्रक्रिया में नियमों और दिशानिर्देशों का खुलेआम उल्लंघन किया गया, जिससे लाइसेंस प्राप्त करने वालों और एक्चुअल में इसे प्राप्त करने वालों के बीच एक मिलीभगत का पता चलता है।

हमारे पिछले एक्सपोज़ में, हमने लिखा था:

घटनाओं की पूरी शृँखला की टाइम लाइन भी दिलचस्प है। अक्टूबर 2009 में, सीबीआई ने 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में अनियमितताओं का मामला दर्ज किया। 8 अक्टूबर 2010 को, सुप्रीम कोर्ट ने घोटाले पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या CAG की रिपोर्ट पर तत्कालीन यूपीए सरकार से जवाब माँगा। उसी साल अक्टूबर में, राहुल गाँधी ने गुरुग्राम के सिग्नेचर टावर्स-II में दो व्यावसायिक सम्पत्तियाँ खरीदीं, जो यूनिटेक के स्वामित्व में हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस संपत्ति का उनके 2014 के हलफनामे में उल्लेख नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इस तरह के कई सौदे संदिग्ध, घोटाला करने वाले व्यक्तियों द्वारा रणनीतिक रूप से किए गए हैं, जो उनके चुनावी हलफनामों में दिखाई देने से बचाने के लिए है।

उस समय हमने सोचा कि शायद 2014 के चुनावी हलफनामे में सम्पत्तियाँ लिस्ट नहीं की गई, क्योंकि हो सकता है 2010 से 2014 के बीच सम्पत्तियाँ राहुल गाँधी द्वारा बेच दी गई हों।

हालाँकि, राहुल गाँधी के 2019 लोकसभा चुनाव के हलफनामे में इन संपत्तियों के लिस्ट होने के साथ, कुछ प्रासंगिक सवाल पैदा हो रहे हैं कि राहुल गाँधी को जवाब देना चाहिए, क्यों उन्होंने इन संपत्तियों को अपने 2014 के हलफनामे में उल्लेख नहीं किया।

आइए देखते हैं, ऐसे दो संभावित परिदृश्य हैं जो उनके 2014 के चुनावी हलफनामे में इन संपत्तियों की अकथनीय अनुपस्थिति की व्याख्या करेंगे।

दृश्य- 1:

पहला परिदृश्य जो अपने 2014 के चुनावी हलफनामे से अनुपस्थित रहने वाले सिग्नेचर टॉवर की संपत्तियों की अनुपस्थिति की व्याख्या करेगा, अगर राहुल गाँधी ने 2010 की अक्टूबर में इन संपत्तियों को खरीदने के बाद अपने 2014 के चुनावी हलफनामे को दाखिल करने से पहले इन दो संपत्तियों को बेच दिया था और फिर से इसे 1 दिसंबर 2014 को खरीद लिया हो जैसा कि उनके  2019 हलफनामे में अब दावा किया गया है।

यह निश्चित रूप से, एक अधिक संभावनाहीन परिदृश्य है क्योंकि एक संपत्ति को एक बार बेचकर फिर से उसे अधिक मूल्य पर खरीदना कोई व्यावसायिक समझ की बात नहीं होगी। 2010 में, राहुल गाँधी ने इस आलीशान टॉवर में B-007 और B-008 के लिए 1.44 करोड़ रुपए और 5.36 करोड़ रुपए का भुगतान किया था। अपने 2019 के चुनावी हलफनामे में, राहुल गाँधी कहते हैं कि 2014 में ऑफिस स्पेस में B007, 1.65 करोड़ रुपए में और B008  7.93 करोड़ रुपए में खरीदा गया था।।

2010 में मूल्य जिसके लिए हस्ताक्षर किए गए एग्रीमेंट्स पेपर हैं और 2019 हलफनामे में दर्शाए गए मूल्य में पर्याप्त अंतर है। जिस संपत्ति का राहुल गाँधी ने दावा किया कि 2014 में उन्होंने खरीदी थी, वह उस लागत मूल्य से बहुत अधिक है, जो उन्होंने 2010 में साइन की थी।

इस प्रकार, यह बताने का कोई मतलब नहीं होगा कि राहुल गाँधी ने अक्टूबर 2010 में यूनिटेक से इन संपत्तियों को खरीदा, फिर अपने 2014 के चुनावी हलफनामे को दाखिल करने से पहले अपनी संपत्तियों को बेच दिया, और फिर दिसम्बर 2014 में उन्हीं संपत्तियों को बहुत अधिक मूल्य पर पुनर्खरीद करने के लिए आगे बढ़े। जो अब उनके 2019 के चुनावी हलफनामे में दिखाई दे रहा है।

दृश्य- 2

दूसरा और अधिक संभावित परिदृश्य यह है कि राहुल गाँधी ने 2014 के चुनावी हलफनामे में सभी संपत्तियों का खुलासा नहीं किया।

यदि संपत्ति को 2010 में खरीदा गया था, भले ही उस समय पूरी राशि का भुगतान किया गया हो या नहीं, संपत्तियों को 2014 के हलफनामे में सूचीबद्ध किया जाना चाहिए था। जैसा कि नहीं किया गया और इस बात का कोई तुक नहीं है कि अपनी संपत्ति बेचने और महीनों बाद, दिसम्बर 2014 में अपनी संपत्ति फिर से खरीदने की बात यह संदेह पुष्ट करता है कि राहुल गाँधी अपने 2014 के हलफनामे में सत्य बयान नहीं किया था।

झूठ बोलने का कारण, यह हो सकता है  कि वह शायद यह अच्छी तरह से जानते होंगे कि संपत्तियाँ यूनिटेक से खरीदी जा रही थीं, जो 2-जी घोटाले में आरोपित थे और जिसकी उनकी ही कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा जाँच की जा रही थी और वह इसे जनता की नज़र से छिपाना चाहते थे।

अगर वह तब झूठ बोल रहे थे तो वह अब भी झूठ बोल रहे हैं

यदि हम मानते हैं कि परिदृश्य 2 की अधिक संभावना है और यह कि संभवतः राहुल गाँधी ने 2014 के चुनावी हलफनामे में झूठ बोला था, तो इस बात के भी स्पष्ट कारण हैं कि राहुल गाँधी अपने 2019 के हलफनामे में भी झूठ बोल रहे हैं।

यदि हम स्वीकार करते हैं कि राहुल गाँधी ने अपने 2014 के चुनावी हलफनामे में झूठ बोला था और उन्होंने अक्टूबर 2010 में 2 यूनिटेक संपत्तियों की खरीद की थी और इसे अपने 2014 के हलफनामे में जोड़ने में विफल रहे, तो उनके 2019 के चुनावी हलफनामे में घोषणा की गई कि ये संपत्तियाँ दिसंबर 2014 में खरीदी गई थीं, भी सच नहीं है।

चुनावी हलफनामे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर या गलत तरीके से पेश करना एक गंभीर अपराध है जो उम्मीदवार को अयोग्य घोषित कर सकता है।

इन चौंकाने वाले तथ्यों के सामने आने के बाद, कोई भी केवल यह उम्मीद कर सकता है कि भारत के चुनाव आयोग द्वारा 2019 और 2014 के चुनावी हलफनामे में विसंगतियों की पूर्ण और गहन जाँच शुरू की जानी चाहिए।

नुपुर जे शर्मा की मूल रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद रवि अग्रहरि ने किया है।

सीआईआई के बाद पीएचडी ने कहा, यहाँ हैं नौकरियाँ

मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार रोजगार का मुद्दा लगातार भोथरा होता जा रहा है। उद्योगों के समूह सीआईआई के बाद पीएचडी चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स ने भी अपने सर्वेक्षण में यह पाया कि नौकरी तलाश रहे युवाओं के घरों से 64% घरों में कम-से-कम से एक व्यक्ति को नौकरी मिली है

गौरतलब है कि इससे पहले सीआईआई के सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आई थी कि केवल एमएसएमई सेक्टर की ही कंपनियों ने पिछले चार साल में 1.5 करोड़ रोज़गार प्रति वर्ष की दर से नौकरियों के अवसर उपलब्ध कराए हैं। यह न केवल विपक्ष के इन दावों के खिलाफ गया कि मोदी सरकार में नौकरी पाना पहले से भी मुश्किल हो गया है, बल्कि सीआईआई की कॉन्ग्रेस के साथ मानी जाने वाली नजदीकी के चलते इस आँकड़े को सिरे से खारिज करना भी कॉन्ग्रेस के लिए मुश्किल था।

(2013 में राहुल गाँधी ने जहाँ सीआईआई में भाषण दिया था, वहीं तब गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी सीआईआई के प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले उद्योग समूह फिक्की के 90वें वार्षिक समारोह में बोले थे। यही नहीं, मोदी को सीआईआई के 2003 के समारोह में भी 2002 के गुजरात दंगों को लेकर बैकफ़ुट पर धकेलने की कोशिश हुई थी। ऐसे परिप्रेक्ष्य में सीआईआई के जॉब-डेटा को नकारना कॉन्ग्रेस के लिए बहुत मुश्किल था, और अब ऊपर से पीएचडी ने सीआईआई के सर्वेक्षण पर मुहर लगा दी।)

55% शहरी, 45% ग्रामीण; मेट्रो शहर सबसे आगे

पीएचडी के सर्वे के अनुसार उसका सर्वेक्षण लगभग 27,000 लोगों के जवाबों पर आधारित है। यह संख्या किसी भी जॉब सर्वेक्षण के लिहाज से छोटी नहीं कही जा सकती। सर्वे में शामिल 55% लोग शहरी इलाकों के रहने वाले थे, वहीं 45% लोग ग्रामीण इलाकों के निवासी थे।

55% शहरी, 45% ग्रामीण घरों ने इस सर्वे में भागीदारी की

सर्वे में मेट्रो शहरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलुरु) के 77% युवाओं ने नौकरी तलाशने में सफलता की बात कही, वहीं टियर-2 शहरों में 67%, टियर-1 शहरों में 61%, और ग्रामीण इलाकों के 49% लोगों को नौकरी तलाशने में सफलता मिली।

साथ में पीएचडी ने इस और ध्यान भी आकर्षित कराया कि जहाँ निजी क्षेत्र की जितनी ज्यादा पैठ है, जैसे मेट्रो और टियर-2 शहर, वहाँ नौकरियाँ उतनी ज्यादा उपलब्ध हैं। पीएचडी के अध्यक्ष राजीव तलवार ने यह बात रिपोर्ट पर चर्चा के समय कही। इसे पीएचडी चेंबर की ओर से आर्थिक उदारीकरण और आर्थिक सुधारों को जारी रखने की वकालत की तौर पर देखा जा सकता है।

मेट्रो शहरों में नौकरी तलाशना सबसे आसान, पर अवसरों की कहीं कमी नहीं

टियर-2 शहर सबसे आगे, नौकरियों की गुणवत्ता भी बढ़ेगी यहाँ

टियर-2 शहर मेट्रो शहरों से भले नौकरियों की वर्तमान संख्या में पिछड़ गए हों पर उद्योग जगत निश्चित तौर पर इन्हें ही आगामी आर्थिक बढ़त के इंजन के रूप में देख रहा है। इस सर्वे में भी नौकरियों की भविष्य की संभावनाओं को टियर-2 शहरों में सबसे तेजी से बढ़ते हुए देखा गया है। साथ ही राजीव तलवार ने इसकी भी उम्मीद जताई कि न केवल संख्या बल्कि नौकरियों की गुणवत्ता में भी टियर-2 शहरों में बहुत संभावनाएँ हैं।. साथ ही यहाँ शिक्षा के भी बहुत सारे अवसर उत्पन्न होंगे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत का यह विकास केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक-सामाजिक है।

युवा शक्ति, निजी सेक्टर नौकरियाँ पैदा करने में आगे

सर्वे में शामिल 86% लोगों को 18-35 वर्ष की आयु में इन नौकरियों को पाने वाला बताते हुए तलवार ने इसे युवाओं की बढ़ रही आर्थिक भागीदारी और उन्हें उद्योग जगत द्वारा दी जा रहे मौकों के तौर पर पेश किया।

नए रोजगारों में युवा लोगों की भागीदारी 86%

इसके अलावा 60.4% नौकरियाँ निजी क्षेत्र की हैं, 21.2% सरकारी पदों पर नियुक्ति से पैदा हुईं, और सरकारी कम्पनियों ने 5.2% प्रतिशत लोगों को नौकरी दी।

5.1% लोगों ने कहा कि वे स्वरोजगार में लगे हैं, 3.3% प्रतिशत ने निजी-सरकारी भागीदारी (पीपीपी) वाले संस्थानों में स्वयं को नियुक्त बताया, और 4.8% के रोजगार इनमें से किसी भी श्रेणी के नहीं थे।

निजी क्षेत्र दे रहा है सबसे ज्यादा नौकरियाँ, फिर क्यों खा रहा है वामपंथी गालियाँ?

वहीं अगर नौकरी देने वाली कंपनियों के आकर की बात करें तो अधिकतम (49%) नौकरियाँ देने वाली कंपनियाँ मध्यम से बड़े आकार की थीं। इनमें भी बड़े आकार की कम्पनियों की भागीदारी 30% नौकरियां पैदा करने की रही, वहीं मध्यम आकार की कम्पनियों ने 19% रोज़गार दिए।

वहीं एमएसएमई के द्वारा दी गए 51% रोजगारों की अगर बात करें (यह वही सेगमेंट है जिसके 6 करोड़ नौकरियाँ पैदा करने की बात सीआईआई के सर्वे में कही गई थी) तो इनमें लघु उद्योगों ने 22% नौकरियाँ दीं हैं। वहीं 29% नौकरियाँ लघु से मध्यम आकार के उद्योगों ने दीं हैं।

सभी आकार की कम्पनियों में हैं अवसर

कंपनियों के क्षेत्र की बात करें तो बैंकिंग सेक्टर में सबसे ज्यादा नियुक्तियाँ (12.5%) हुईं हैं, जिसके बाद शिक्षा व प्रशिक्षण क्षेत्र में 12.1% नौकरियाँ मिलीं, वहीं आईटी व इससे जुड़े सेवा क्षेत्र ने 11.6% नियुक्तियाँ की हैं। इसका निहितार्थ इस तौर पर देखा जा सकता है कि आईटी सेक्टर में दबदबा कायम रखते हुए भारत शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में भी एक ताकत के तौर पर उभरने के लिए कमर कस रहा है।

इसके अलावा फैशन डिजाइनिंग, कंसल्टिंग, टैक्स व कानूनी सेवाएँ, डाटा एनालिटिक्स, आदि क्षेत्र भी बड़े नियोक्ताओं के तौर पर उभर रहे हैं।

आईटी के साथ नॉलेज सुपरपावर बनने की तैयारी, अर्थव्यवस्था की रीढ़ सुधारने के लिए बैंकिंग पर भी जोर

जो नौकरियाँ दी जा रहीं हैं, उनमें 79% लोग पूर्णकालिक रूप से कार्यरत (full-time employment) में हैं, 7% संविदा (contract) पर हैं, 6% अंशकालिक (part-time) हैं. 5% स्वरोजगार में हैं, और केवल 3% दैनिक रोजगार (दिहाड़ी) पर हैं।

“आईटी सेल की दिहाड़ी” है 79% full-time employment?

₹31,000+ है सबसे common तनख्वाह, महिलाओं-पुरुषों के बीच का भेद भी रहा पट  

केवल नौकरियों ही नहीं, लोगों की आय के मामले में भी इस सर्वे से जो तस्वीर निकलती है, उसे निराशाजनक तो नहीं ही कह सकते। न केवल नई नौकरियाँ पाने वाले इन लोगों में 60% की तनख्वाहें ₹10,000 से ₹50,000 के बीच हैं। यह कितना अच्छा है, इसपर दोराय बेशक हो सकती है, पर यह कॉन्ग्रेस द्वारा खींचे जा रहे स्याह खाके से तो बिलकुल मेल नहीं खाता. ₹31,252.28 पीएचडी के सर्वे में सबसे आम (median) तनख्वाह मानी गई है।

वेतन बढ़ रहे हैं या स्थिर हैं, और कीमतें घट रहीं हैं – लोगों के हाथों में बच रहा है ज्यादा पैसा

यदि नौकरी पाने वालों में लैंगिक असमानता की भी बात करें तो महिलाओं(40%) और पुरुषों(60%) में अंतर केवल 10% का होना बेहद उत्साहजनक माना जाएगा।

Women empowerment खुद-ब-खुद हो रहा है- आर्थिक सशक्तिकरण सभी सशक्तिकरणों का मूल है

परिवार की अंधी कमाई पर लगी लगाम के बाद राहुल की बिलबिलाहट लाज़मी है

नागपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के बाद कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जेल की धमकी दे डाली।

रैली को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा कि चौकीदार अनिल अंबानी जैसे घरों के बाहर तैनात होते हैं न कि किसानों के घर के बाहर। राहुल ने ‘चौकीदार चोर है’ का बिगुल फूँकते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की सत्ता आने पर देश में एक अलग चौकीदार होगा, जो जाँच करने की शुरूआत करेगा और ‘चौकीदार’ जेल जाएगा।

राहुल के ऐसे बोल यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि फ़िलहाल उन घोटालों का क्या, जिसमें गाँधी-वाड्रा परिवार के दलाली के रिश्ते उजागर हो चुके हैं। इन तमाम घोटालों पर राहुल क्या कहना चाहेंगे जिन पर गाँधी परिवार का एकछत्र राज रहा है, क्या वो उस जेल के बारे में भी बताएँगे कुछ जहाँ उन्हें भेज दिया जाना चाहिए?

बताना चाहूँगी कि राहुल गाँधी, भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल सौदे को लेकर इतना मगन थे कि उसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को तरह-तरह की धमकी तक दे रहे थे और देश की जनता को भी भ्रमित करने का दुष्प्रचार कर रहे थे, उसका क्या हुआ, आख़िर कैसे लगी उनके दुष्प्रचार पर लगाम। राहुल को इस चुप्पी का कारण बताना चाहिए था कि जिसे वो वेवजह का मुद्दा बनाकर बरगलाने का काम करते रहे असल में वो राफ़ेल डील यूपीए के मुक़ाबले 2.86% सस्ती थी और इसका ख़ुलासा कैग की रिपोर्ट से हुआ था।

एक के बाद एक हुए ख़ुलासे के बाद गाँधी-वाड्रा परिवार की मिलीभगत उजागर हुई जिसमें ज़मीनी सौदे और रक्षा सौदे शामिल थे, उन पर राहुल कोई सफ़ाई क्यों नहीं देते?

हथियारों के सौदागर संजय भंडारी के साथ अपने ख़ुद के प्रगाढ़ रिश्ते के बारे में क्या वो कभी अपनी चुप्पी तोड़ेंगे? अफ़वाह तो यह भी है कि राहुल गाँधी भारत में राफ़ेल डील के ख़िलाफ़ थे और यूरोफाइटर की पैरवी कर रहे थे। इस बात का ख़ुलासा एबीपी के पत्रकार ने किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि राहुल गाँधी जर्मनी में यूरोफाइटर के प्रतिनिधियों से मिले थे।

राहुल गाँधी जिस ‘चौकीदार’ को जेल का रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं असल में वो अपनी बौखलाहट को पचा नहीं पा रहे हैं क्योंकि उनके और उनके परिवार की अंधी कमाई पर लगाम जो लग गई है। इसके अलावा राहुल गाँधी बोफ़ोर्स तोप घोटाले के बारे में क्या कहेंगे जिसके तार सोनिया गाँधी और उनके बहनोई तक से जा जुड़े? अब यह बात अलग है कि बात चाहे राहुल की माँ सोनिया गाँधी के बहनोई की हो या उनके ख़ुद के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा की हो, घोटालों के बेताज़ बादशाह तो दोनों ही हैं, यहाँ तो वो कहावत एकदम सटीक बैठती है, ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’।

ज़रा गहराई से सोचिए कि भारत में अब तक जितने बड़े घोटाले हुए हैं उसके पीछे कौन है? इसकी तह तक जाने पर पता चलता है कि कॉन्ग्रेस ने ही हर बड़े घोटाले की नींव डाली है। चाहे वो वर्षों पुराना हो या ताज़ा मामला हो जिसमें पता चला है कि यूपीए का कार्यकाल (2004-14) में राहुल की इनकम में 1600% की वृद्धि हुई और मोदी काल में मात्र 70% की वृद्धि हुई। इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि गाँधी परिवार के राजकुमार कितने मेहनती हैं और ख़ून-पसीने की कमाई का हिसाब भी ठीक से नहीं लगा पाते क्योंकि एक सांसद के तौर पर इतना पैसा इकट्ठा करना असंभव है। घोटाले का पैसा जमा करना, फिर उसे संभालना, फिर छिपाए रखना और कड़ी मशक्कत के बावजूद भी अगर घोटालों में ‘परिवारवाद की छवि‘ उजागर हो भी जाए तो अनंत काल तक मौन धारण किए रखना, जानते हो कितने साहसिक और जोखिम भरा काम है? और इस साहसिक काम में गाँधी-वाड्रा परिवार को पुश्तैनी महारत हासिल है।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि चोरों के बीच में रहकर राहुल की फ़ितरत ही अनरगल भाषणबाजी की हो गई है। इसलिए हर जगह उन्हें चोर ही चोर नज़र आते हैं और उसमें भी मोदी का चेहरा सबसे पहले नज़र आता है। अब इसे राहुल का दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि जिन बेबुनियादी झूठे दावों के बलबूते वो आगामी लोकसभा चुनाव में फ़तह हासिल करना चाहते हैं वो इतने खोखले हो चुके हैं कि जर्जर होकर ढह जाने को तत्पर हैं। अभी देखना बाक़ी है कि अगली सरकार कितनी मुस्तैदी के साथ किसको किस जेल में भेजती है!

‘अगर मोदी की सुनोगे तो तुम सब इसका गंभीर परिणाम भुगतोगे’ चंद्रबाबू नायडू ने दी IT अधिकारियों को धमकी

देश में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इनकम टैक्स विभाग के अधिकारी जगह-जगह छापेमारी कर रहे हैं। इसी बीच TDP प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू विजयवाड़ा में धरना दे रहे हैं। नायडू का कहना है कि ये धरना इनकम टैक्स द्वारा TDP कार्यकर्ताओं और समर्थकों के यहाँ छापेमारी के विरोध में है।

IT विभाग की छापेमारी से बौखलाए चंद्रबाबू नायडू ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर जाँच नहीं रोकी गई तो उन्हें इसका परिणाम भुगतना होगा। इतना ही नहीं, इनकम टैक्स के जाँच अधिकारियों को भी TDP प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने धमकी देते हुए कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री की बात नहीं माननी चाहिए और अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उन सबको भी इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि TDP नेताओं के यहाँ छापेमारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर की जा रही है, एक बार जब चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद सब कुछ चुनाव आयोग की निगरानी में आ जाता है। नायडू ने कहा कि सभी पार्टियों के पास सामान अधिकार है और एक पार्टी जो उनका समर्थन नहीं करती है, वो उसे इस तरह से दबा नहीं सकते।

बता दें कि फिलहाल पूरा प्रशासन चुनाव आयोग के हाथ में है, हाल ही में भारिप बहुजन महासंघ (BBM) पार्टी के प्रमुख प्रकाश अम्बेदकर के खिलाफ भी चुनाव आयोग को धमकी देने के आरोप में FIR दर्ज हुई है। वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी भी चुनाव आयोग और इनकम टैक्स की छापेमारी से परेशान हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को अपना काम करने दिया जाए, लेकिन केवल संदेह के आधार पर हमें परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

भाजपा ने जारी की गुजरात में स्टार प्रचारकों की सूची, विवेक ओबेरॉय भी इसमें शामिल

आज (अप्रैल 5, 2019) को भाजपा ने गुजरात में अपने स्टार कैंपेनर्स की लिस्ट जारी कर दी है। इस लिस्ट में भाजपा से जुड़े 40 बड़े चेहरों के नाम है।

एक तरफ जहाँ इस लिस्ट में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडनवीस, निर्मला सीतारमण, स्मृति इरानी, योगी आदित्यनाथ जैसे बड़े नाम भी है। वहीं भाजपा की इस लिस्ट में हेमा मालिनी, परेश रावल और विवेक ओबेरॉय जैसे बॉलीवुड कलाकारों का नाम भी शामिल है।

राज्य के 26 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव मतदान के तीसरे चरण में यानी 23 अप्रैल को होंगे। वैसे तो इस सूची में अधिकतर नामों से जनता परिचित है। लेकिन, अब देखना है कि गुजरात में भाजपा ने जो यकीन विवेक पर दिखाया है, वो उसे सही साबित करने में कितने सफल हो पाते हैं।

बता दें इन दिनों विवेक प्रधानमंत्री मोदी पर बनी फिल्म में उनका किरदार निभाने के कारण ज्यादा चर्चाओं में है। रिपब्लिक भारत को दिए साक्षात्कार में विवेक ने यह भी कहा कि वह साफ़ कर देना चाहते हैं कि वो भाजपा के साथ नहीं हैं, बल्कि वो अपने देश के साथ हैं।

कार्टूनिस्टों का सर काटने पर ₹51 करोड़ देने वाले कसाई याकूब को बसपा का टिकट, शैम्पेन लिबरल्स ‘खामोश’

नरेंद्र मोदी सरकार पर अभिव्यक्ति की आज़ादी ख़त्म करने का आरोप अक्सर लगता रहा है। यह आरोप लगाने वाले भी ज्यादातर या तो महागठबंधन वाले होते हैं या फिर महागठबंधन वालों के वैचारिक समर्थक ‘शैंपेन लिबरल्स’। और महागठबंधन के लिए महत्वपूर्ण बसपा द्वारा याकूब कुरैशी नामक कसाई, जिन्होंने पैगम्बर माने जाने वाले मुहम्मद का कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट का सर कलम करने के लिए ₹51 करोड़ का इनाम रखा था, को अपना मेरठ लोकसभा क्षेत्र का उम्मीदवार बनाया है

बताते हैं कि यह केवल उनके गुस्से की क्षणिक अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि जब फ़्रांसीसी पत्रिका शार्ली हेब्दो के 8 पत्रकार सच में मार डाले गए (उन्होंने कार्टून बनाने वाले के समर्थन में वह कार्टून फिर से छापा था) तो याकूब कुरैशी ने अपना बयान दोहराया, और कहा कि वे अभी भी इनामी राशि उन कसाइयों (pun intended) को देने के लिए तैयार हैं

और साक्षी महाराज- साध्वी प्राची के बयानों को देश में बढ़ती असहिष्णुता का सबूत मानने वाले शैम्पेन लिबरल्स आज चुप हैं।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर हिंसा का भी आरोपित

कसाई कुरैशी पर इसी फरवरी में पर्यावरण कार्यकर्ताओं के साथ भी हिंसा करने का आरोप लगा था। वह कार्यकर्ता पर्यावरण बचाने के लिए (जो कि शैम्पेन लिबरल्स के पसंदीदा विषयों में से एक माना जाता है) के लिए माँस संयंत्रों पर प्रतिबन्ध चाहते थे। पर्यावरण सुधार संघर्ष समिति के पीड़ित पदाधिकारियों ने यह आरोप लगाया कि उन पर हमला 20-25 लोगों ने किया, जिनमें कुरैशी के माँस संयंत्र के मैनेजर साहब भी थे। मैनेजर साहब हमले वाली जगह के आस-पास ही कहीं रहने वाले बताए गए। हमले से पहले समिति के लोगों को धमकी भी दी गई थी। 15 दिन पहले भी हमला किया गया था।

अवैध होने के कारण बंद हुआ था कसाईखाना, बेटे पर जमीन कब्जियाने का आरोप

कसाई कुरैशी का कत्लखाना बंद करने के पीछे अधिकारियों ने जो कारण बताए थे, उनमें सबसे बड़ा उसके कई हिस्सों का अवैध होना था। बिना कई हिस्सों का नक्शा पास हुए उस कसाईखाने में भैंसे काटे जा रहे थे। मेरठ का पर्यावरण वैसे ही कसाईखानों की भीड़ से चरमरा रहा था। लिहाजा कसाई कुरैशी का कत्लखाना बंद कर दिया गया। उसी मामले में उन कत्लखानों के दोबारा चालू किए जाने का विरोध कर रही पर्यावरण सुधार संघर्ष समिति के लोग हमले का शिकार बने।

इसके अलावा कसाई कुरैशी के बेटे पर भी अवैध तरीके से एक किसान की जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगा था। पीड़ित की जमीन हथियाने के अलावा उसे जान से मार डालने की धमकी भी मिली थी